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Sunday, June 28, 2009

नव पॉडकास्ट कवि सम्मेलन में 20 काव्य-रश्मियों की प्रभा

सुनिए ऑनलाइन कवि सम्मेलन का वार्षिक अंक

Rashmi Prabha
रश्मि प्रभा
पूरे भारत में गरमी अपना तांडव कर रही है। हर तरफ बस एक ही पुकार है कि अल्लाह मेघ दे, पानी दे। कभी-कभी हम जैसे भावुक हृदयवालों का मन होता है कि कहीं से खुदा को खोज निकालें और उससे विनती करें कि कृपया पानी दे दें। खैर फिलहाल हम तो आपके लिए एक ऐसी बारिश लाये हैं जिसमें आप अनुभूतियों की तरह-तरह की बूँदों से भीगेंगे। जी हाँ, आप सही समझे, गर्मी की मार से अल्पकालिक ही सही, एक राहत देने के लिए, हम लेकर हाज़िर हैं जून 2009 का पॉडकास्ट कवि सम्मेलन लेकर।

इस बार के इस कवि सम्मेलन में उचित मेघ का उचित समय पर बरसने का आह्वान किया है रश्मि प्रभा ने और इस बरसात की निरंतरता का प्रयोजन किया है खुश्बू ने। खुशी की बात है कि रश्मि प्रभा के प्रयास से इस कवि सम्मेलन में हर माह नये कवि जुड़ते जा रहे हैं। इस बार भी 9 प्रतिभागी पहली पार इस ऑनलाइन कवि सम्मेलन का हिस्सा बन रहे हैं।

पॉडकास्ट कवि सम्मेलन का यह 12वाँ अंक है। मतलब हिन्द-युग्म के इस आयोजन ने अपना एक वर्ष पूरा कर लिया है। इसमें हमारे श्रोताओं के प्रोत्साहन का बहुत योगदान रहा है।

बगैर लम्बी भूमिका के आपको सुनवाते हैं अपना वार्षिकांक कवि सम्मेलन-



प्रतिभागी कवि-सरस्वती प्रसाद, किरण सिन्धु, गौरव शर्मा, स्वप्न मंजूषा 'शैल', प्रीति मेहता, दीपाली आब, मनोज भावुक, अनिल मासूम शायर, संत कुमार शर्मा, अक्षय मन, दीपाली पन्त तिवारी, पारुल, ललित मोहन त्रिवेदी, नीरज गोस्वामी, प्रिया, संगीता स्वरुप, शिखा वार्ष्णेय, श्यामल सुमन, यायावर।

संचालन- रश्मि प्रभा

तकनीक- खुश्बू


यदि आप इस अंक को डाउनलोड करना चाहते हैं तो नीचे का लिंक इस्तेमाल करें
उच्च क्वालिटी का mp3 (90 kbps)निम्न क्वालिटी का wma (60 kbps)




आगामी कवि सम्मेलन 'बारिश' पर केंद्रित होगा

हम उम्मीद करते हैं कि जुलाई महीने की शुरूआत समूचे भारत में मानसून के आगत से होगी और आनेवाला सावन झूम-झूम बरसेगा। इसलिए हमने यह तय किया है कि जुलाई माह का पॉडकास्ट सम्मेलन 'बारिश' को ही समर्पित होगा। कृपया इस अंक में ज़रूर भाग लें। वर्षा, बरसात, बारिश आपके कवि-मन के किस तरह से छूती है, हम सुनना चाहते हैं।

1॰ अपनी आवाज़ में 'बारिश' विषय पर केंद्रित अपनी कविता/कविताएँ रिकॉर्ड करके भेजें।
2॰ जिस कविता की रिकॉर्डिंग आप भेज रहे हैं, उसे लिखित रूप में भी भेजें।
3॰ अधिकतम 10 वाक्यों का अपना परिचय भेजें, जिसमें पेशा, स्थान, अभिरूचियाँ ज़रूर अंकित करें।
4॰ अपना फोन नं॰ भी भेजें ताकि आवश्यकता पड़ने पर हम तुरंत संपर्क कर सकें।
5॰ कवितायें भेजते समय कृपया ध्यान रखें कि वे 128 kbps स्टीरेओ mp3 फॉर्मेट में हों और पृष्ठभूमि में कोई संगीत न हो।
6॰ उपर्युक्त सामग्री भेजने के लिए ईमेल पता- podcast.hindyugm@gmail.com
7.जुलाई अंक के लिए कविता की रिकॉर्डिंग भेजने की आखिरी तिथि- 18 जुलाई 2009
8. जुलाई अंक का पॉडकास्ट सम्मेलन रविवार, 26 जुलाई 2009 को प्रसारित होगा।


रिकॉर्डिंग करना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। हमारे ऑनलाइन ट्यूटोरियल की मदद से आप सहज ही रिकॉर्डिंग कर सकेंगे। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।

# Podcast Kavi Sammelan. Part 12. Month: June 2009.
कॉपीराइट सूचना: हिंद-युग्म और उसके सभी सह-संस्थानों पर प्रकाशित और प्रसारित रचनाओं, सामग्रियों पर रचनाकार और हिन्द-युग्म का सर्वाधिकार सुरक्षित है।

Thursday, April 16, 2009

सावन की रिमझिम में उमड़-घुमड़ बरसे पिया......महफ़िल-ए-गज़ल और मन्ना डे

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #०५

गर आपसे कहूँ कि हमारे आज के फ़नकार "श्री प्रबोध चंद्र जी" हैं तो लगभग १ या २ फीसदी लोग हीं होंगे जो इन्हें जानने का दावा करेंगे या फिर उतने लोग भी न होंगे। लेकिन यह सच है । अरे-अरे डरिये मत..मैं किसी अजनबी की बात नहीं कर रहा ...जिनकी भी बात कर रहा हूँ उन्हें आप सब जानते हैं। जैसे श्री हरिहर जरिवाला को लोग संजीव कुमार कहते हैं, वैसे हीं हमारे प्रबोध चंद्र जी यानि कि प्रबोध चंद्र डे को लोग उनके उपनाम मन्ना डे के नाम से बेहतर जानते हैं। मन्ना दा ने फिल्म-संगीत को कई कालजयी गीत दिए हैं। चाहे "चोरी-चोरी" का लता के साथ "आजा सनम मधुर चाँदनी में हम" हो तो चाहे "उपकार" का कल्याण जी-आनंद जी की धुनों पर "कसमें-वादे प्यार वफ़ा" हो या फिर सलिल चौधरी के संगीत से सजी "आनंद" फिल्म की "ज़िंदगी कैसी है पहेली" हो, मन्ना दा ने हर एक गाने में हीं अपनी गलाकारी का अनूठा नमूना पेश किया है।

चलिये अब आज के गाने की ओर रूख करते हैं। २००५ में रीलिज हुई "सावन की रिमझिम मे" नाम के एक एलबम में मन्ना दा के लाजवाब पंद्रह गीतों को संजोया गया था। यह गाना भी उसी एलबम से है। वैसे मैने यह पता करने की बहुत कोशिश की कि यह गाना मूलत: किस फिल्म या किस गैर-फिल्मी एलबम से है ,लेकिन मैं इसमें सफल नहीं हो पाया। तो आज हम जिस गाने की बात कर रहे हैं उसे लिखा है योगेश ने और अपने सुरों से सजाया है श्याम शर्मा ने और वह गाना है: "ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया"। वैसे इस एलबम में इस तिकड़ी के एक और गाने को स्थान दिया गया था- "कुछ ऎसे भी पल होते हैं" । संयोग देखिए कि जिस तरह हिन्दी फिल्मों में मन्ना दा की प्रतिभा की सही कद्र नहीं हुई उसी तरह कुछ एक संगीतकारों को छोड़ दें तो बाकी संगीतकारों ने योगेश क्या हैं, यह नहीं समझा। भला कौन "जिंदगी कैसी है पहेली" या फिर "कहीं दूर जब दिन ढल जाए" में छिपी भावनाओं के सम्मोहन से बाहर आ सकता है।

लोग माने या ना मानें लेकिन इस गाने और मन्ना दा के एक और गाने "लागा चुनरी में दाग" में गहरा साम्य है। साहिर का वह गाना या फिर योगेश का यह गाना निर्गुण की श्रेणी में आता है, जैसा कबीर लिखा करते थे, जैसे सूफियों के कलाम होते हैं। प्रेमिका जब खुदा या ईश्वर में तब्दील हो जाए या फिर जब खुदा या ईश्वर में आपको अपना पिया/अपनी प्रिया दिखने लगे, तब हीं ऎसे नज़्म सीने से निकलते हैं। मेरे मुताबिक इस गाने में भी वैसी हीं कुछ बातें कहीं गई है। और सच कहूँ तो कई बार सुनकर भी मैं इस गाने में छुपे गहरे भावों को पूरी तरह नहीं समझ पाया हूँ। राधा का नाम लेकर योगेश अगर सांसारिक प्रेम की बातें कर रहे हैं तो फिर मीरा या कबीर का नाम लेकर वो दिव्य/स्वर्गीय प्रेम की ओर इशारा कर रहे हैं। वैसे प्रेम सांसारिक हो या फिर दिव्य, प्रेम तो प्रेम है और प्रेम से बड़ा अनुभव कुछ भी नहीं।

हुलस हुलस हरसे हिया, हुलक हुलक हद खोए,
उमड़ घुमड़ बरसे पिया, सुघड़ सुघड़ मन होए।


दर-असल प्रेम वह कोहिनूर है ,जिसके सामने सारे नूर फीके हैं। प्रेम के बारे में कुछ कहने से अच्छा है कि हम खुद हीं प्रेम के रंग में रंग जाएँ। तो चलिए आप भी हमारे साथ रंगरेज के पास और गुहार लगाईये कि:

ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा....

पग-पग पर लाखों हीं ठग थे तन रंगने की धुन में,
सबसे सब दिन बच निकला मन पर बच ना सका फागुन में।
तो... जग में ये तन ये मेरा मन रह ना सका बैरागी,
कोरी-कोरी चुनरी मोरी हो गई हाय रे दागी।
अब जिया धड़के , अब जिया भड़के
इस चुनरी पे सबकी नज़रिया गड़े,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....

रंग वो जिस में रंगी थी राधा, रंगी थी जिसमें मीरा,
उसी रंग में सब रंग डूबे कह गए दास कबीरा।
तो... नीले पीले लाल सब्ज रंग तू ना मुझे दीखला रे,
मैं समझा दूँ भेद तुझे ये , तू ना मुझे समझा रे।
प्रेम है रंग वो , प्रेम है रंग वो,
चढ जाए तो रंग ना दूजा चढे,
ओ रंगरेजवा रंग दे ऎसी चुनरिया कि रंग ना फीका पड़े।
ओ रंगरेजवा.....




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक ख़ास शब्द होगा जो मोटे अक्षर में छपा होगा. वही शब्द आपका सूत्र है. आपने याद करके बताना है हमें वो सभी शेर जो आपको याद आते हैं जिसके दो मिसरों में कहीं न कहीं वही शब्द आता हो. आप अपना खुद का लिखा हुआ कोई शेर भी पेश कर सकते हैं जिसमें आपने उस ख़ास शब्द का प्रयोग क्या हो. तो खंगालिए अपने जेहन को और अपने संग्रह में रखी शायरी की किताबों को. आज के लिए आपका शेर है - गौर से पढिये -

सब हवायें ले गया मेरे समुन्दर की कोई,
और मुझको एक कश्ती बादबानी दे गया...

इरशाद ....


पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल में आपके लिए शब्द था -"खुदा" और सुजोई ने पेश की ये ग़ज़ल -

खुदा ने सोचा था कि रहेंगे सब इंसान प्यार से,
ज़मीन पे देखा तो अरमान लुटे नज़र आते हैं.
कुछ तो रहम किया होता खुदा पर इंसानों,
हाथ में तलवार लिए सरे-आम नज़र आते हैं.

नीलम जी भी उतर आई मैदान में इस शेर के साथ-

खुदा खुदी और तू,
सबमें शामिल है तेरी जुस्तजू,
वाह क्या बात है

और कमलप्रीत जी ने तो रंग ही जमा दिया ये कहकर कि -
उनकी आँखों में वो सुरूरे-इबादत है,
कि काफिर भी उठा ले अल्लाह का हलफ.

शन्नो जी, सजीव जी और आचार्य जी का भी महफिल में आने का आभार.

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -'शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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