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Sunday, February 2, 2014

बसन्त ऋतु की दस्तक और वाणी वन्दना

  
स्वरगोष्ठी – 153 में आज

पण्डित भीमसेन जोशी के स्वरों में ऋतुराज बसन्त का अभिनन्दन 

‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों आज संगीत-प्रेमियों की इस गोष्ठी में चर्चा के लिए दो उल्लेखनीय अवसर हैं। आज से ठीक दो दिन बाद अर्थात 4 फरवरी को बसन्त पंचमी का पर्व है। यह दिन कला, साहित्य और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की आराधना का दिन है। इसी दिन प्रकृति में ऋतुराज बसन्त अपने आगमन की दस्तक देते हैं। इस ऋतु में मुख्य रूप से राग बसन्त का गायन-वादन अनूठा परिवेश रचता है। आज के अंक में हम आपके लिए राग बसन्त की एक बन्दिश- ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’ लेकर उपस्थित हुए हैं। यह रचना आज इसलिए भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि इसे पण्डित भीमसेन जोशी ने अपना स्वर दिया है। यह तथ्य भी रेखांकन योग्य है कि 4 फरवरी को इस महान संगीतज्ञ की 93वीं जयन्ती भी है। चूँकि इस दिन बसन्त पंचमी का पर्व भी है, अतः आज हम आपको वर्ष 1977 की फिल्म ‘आलाप’ से लता मंगेशकर, येशुदास, दिलराज कौर और मधुरानी का गाया और राग भैरवी में निबद्ध सरस्वती वन्दना भी प्रस्तुत करेंगे। 
 



भारतीय संगीत की मूल अवधारणा भक्ति-रस है। इसके साथ ही इस संगीत में समय और ऋतुओं के अनुकूल रागों का भी विशेष महत्त्व होता है। विभिन्न रागों के परम्परागत गायन और वादन में समय और मौसम का सिद्धान्त आज वैज्ञानिक कसौटी पर खरा उतरता है। बसन्त पंचमी के अवसर पर ऋतुराज बसन्त अपने आगमन की आहट देते हैं। इस ऋतु में मुख्य रूप से राग बसन्त का गायन-वादन हमें प्रकृति के निकट ले जाता है। हमारे परम्परागत भारतीय संगीत में ऋतु प्रधान रागों का समृद्ध भण्डार है। छः ऋतुओं बसन्त और पावस ऋतु मानव जीवन को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। आज के अंक से हम बसन्त ऋतु के राग बसन्त की चर्चा कर रहे हैं। इस मनभावन ऋतु में कुछ विशेष रागों के गायन-वादन की परम्परा है, जिनमें सर्वप्रमुख राग बसन्त है।

यह भी एक सुखद संयोग ही है कि भारतीय संगीत के विश्वविख्यात कलासाधक और सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत पण्डित भीमसेन जोशी का जन्म भी बसन्त ऋतु में 4 फरवरी, 1922 को हुआ था। दो दिन बाद उनका 93वाँ जन्मदिवस है। सात दशक तक भारतीय संगीताकाश पर छाए रहने वाले पण्डित भीमसेन जोशी का भारतीय संगीत की विविध विधाओं- ध्रुवपद, खयाल, तराना, ठुमरी, भजन, अभंग आदि सभी पर समान अधिकार था। उनकी खरज भरी आवाज़ का श्रोताओं पर जादुई असर होता था। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बढ़त देते थे, उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। तानें तो उनके कण्ठ में दासी बन कर विचरती थी। संगीत-जगत के सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद स्वयं अपने बारे में बातचीत करने के मामले में वे संकोची रहे। आइए भारत के इस अनमोल रत्न की जयन्ती के अवसर पर उन्हीं के गाये राग बसन्त की एक रचना के माध्यम से उनका स्मरण करते हैं, साथ ही ऋतुराज बसन्त का अभिनन्दन भी। लीजिए, आप भी सुनिए- पण्डित भीमसेन जोशी के स्वर में राग बसन्त की तीनताल में निबद्ध यह मनोहारी प्रस्तुति। तबला पर पण्डित नाना मुले और हारमोनियम पर पुरुषोत्तम वलवालकर ने संगति की है।


राग बसन्त : ‘फगवा ब्रज देखन को चलो री...’ : स्वर – पण्डित भीमसेन जोशी




आइए, अब थोड़ी चर्चा राग बसन्त के बारे में कर ली जाए। राग बसन्त ऋतु प्रधान राग है। बसन्त ऋतु में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। अन्य अवसरों पर इस राग को रात्रि के तीसरे प्रहर में गाने-बजाने की परम्परा है। पूर्वी थाट के अन्तर्गत आने वाले इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं- स ग म॑ ध (कोमल) नि सं, तथा अवरोह के स्वर हैं- सं नि ध प म॑ ग रे स । इस राग में ललित अंग से दोनों मध्यम का प्रयोग होता है। आरोह में ऋषभ और पंचम स्वर वर्जित है। राग बसन्त का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। कभी-कभी संवादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी होता है। यह एक प्राचीन राग है। ‘रागमाला’ में इसे हिंडोल का पुत्र कहा गया है।

आज का यह अंक हम बसन्त पंचमी पर्व को दृष्टिगत करते हुए प्रस्तुत कर रहे हैं, अतः अब हम आपको राग भैरवी में निबद्ध एक सरस्वती वन्दना सुनवा रहे हैं। वर्ष 1977 में एक फिल्म ‘आलाप’ प्रदर्शित हुई थी। फिल्म के संगीत निर्देशक जयदेव ने राग आधारित कई गीतों का समावेश इस फिल्म में किया था। फिल्म का कथानक संगीत-शिक्षा और साधना पर ही केन्द्रित था। संगीतकार जयदेव ने एक प्राचीन सरस्वती वन्दना- ‘माता सरस्वती शारदा...’ को भी फिल्म में शामिल किया। राग भैरवी में निबद्ध यह वन्दना इसलिए भी रेखांकन योग्य है कि यह युगप्रवर्तक संगीतज्ञ, और भारतीय संगीत के उद्धारक पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर द्वारा स्वरबद्ध परम्परागत सरस्वती वन्दना है, जिसे फिल्म में यथावत रखा गया था। पलुस्कर जी का जन्म 1872 में हुआ था। उन्होने भक्तिगीतों के माध्यम भारतीय संगीत को समाज में प्रतिष्ठित किया था। आइए, सुनते हैं, राग भैरवी, तीनताल में निबद्ध यह वन्दना गीत। इस गीत को लता मंगेशकर, येशुदास, दिलराज कौर और मधुरानी ने स्वर दिया है। आप यह वन्दना गीत सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : ‘माता सरस्वती शारदा...’ : फिल्म आलाप : लता मंगेशकर, येशुदास, दिलराज कौर और मधुरानी





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 153वीं संगीत पहेली में हम आपको एक पुराने ग्रामोफोन रेकार्ड से वायलिन वादन का एक अंश प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – किस ताल में यह रचना निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 155वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 151वीं संगीत पहेली में हमने आपको गायन और सितार-वादन की जुगलबन्दी रचना का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग खमाज और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- भजन- ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। लखनऊ के चन्द्रकान्त दीक्षित ने केवल दूसरे प्रश्न का ही उत्तर दिया है और वह सही है, अतः उन्हें एक अंक मिलेगा। श्री दीक्षित ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘सिने-पहेली’ के नियमित प्रतिभागी हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में पहली बार भाग लेने पर हम उनका हार्दिक अभिनन्दन करते हैं। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


   
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज का हमारा यह अंक बसन्त पंचमी पर्व के प्रति समर्पित था। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


Sunday, August 18, 2013

भैरवी के कोमल स्वरों से आराधना

  
स्वरगोष्ठी – 133 में आज

रागों में भक्तिरस – 1

'भवानी दयानी महावाक्वानी सुर नर मुनि जन मानी...'


भारतीय संगीत की परम्परा के सूत्र वेदों से जुड़े हैं। इस संगीत का उद्गम यज्ञादि के समय गेय मंत्रों के रूप में हुआ। आरम्भ से ही आध्यात्म और धर्म से जुड़े होने के कारण हजारों वर्षों तक भारतीय संगीत का स्वरूप भक्तिरस प्रधान रहा। मध्यकाल तक संगीत का विकास मन्दिरों में ही हुआ था, परिणामस्वरूप हमारे परम्परागत संगीत में भक्तिरस की आज भी प्रधानता है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से हम एक नई श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं, जिसका शीर्षक है- ‘रागों में भक्तिरस’। इस श्रृंखला की प्रथम कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस नई श्रृंखला में हम आपको विभिन्न रागों में निबद्ध भक्ति संगीत की कुछ उत्कृष्ट रचनाओं का रसास्वादन कराएँगे। साथ ही उन्हीं रागों पर आधारित फिल्मी गीतों को भी हमने श्रृंखला की विभिन्न कड़ियों में सम्मिलित किया है। आज श्रृंखला की पहली कड़ी में हमने आपके लिए राग भैरवी चुना है। इस राग में पहले हम आपको 1977 में प्रदर्शित फिल्म ‘आलाप’ में शामिल, राग भैरवी पर आधारित एक प्रार्थना गीत सुनवाएँगे। इसके साथ ही सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी परवीन सुलताना के स्वरों में देवी-स्तुति से युक्त एक मनमोहक सादरा भी प्रस्तुत करेंगे। 


ज भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, इनका क्रमिक विकास प्राचीन वैदिक संगीत से ही हुआ है। जब हम भारतीय संगीत की परम्परा को सामवेद से जोड़ते हैं तब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या वैदिकयुग से पहले संगीत नहीं था? वैदिककालीन सभ्यता अपने उच्च शिखर पर थी। परन्तु संगीत की उपस्थिति तो उससे भी पहले थी। जब मानव को भावाभिव्यक्ति की आवश्यकता प्रतीत हुई, तभी उसे ध्वनियों का सहारा लेना पड़ा और तभी शब्दों व संगीत का जन्म हुआ। यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि मानव ने प्रकृति से प्रेरणा पाकर ही संगीत को जन्म दिया। नदियों की कल-कल ध्वनि, पक्षियों के कलरव, सागर की तरंगों और वायु के शीतल झोकों से उपजने वाला नाद हमारे संगीत का आधार बना। मानव ने अपनी प्रसन्नता, आशाएँ, अपेक्षाएँ, इच्छाएँ आदि भावों को व्यक्त करने के लिए ऊँची-नीची ध्वनियों का प्रयोग किया जो कालान्तर में संगीत बना। आगे चल कर यह संगीत सर्वाधिक उन्नत, आर्य संस्कृति का प्रमुख अंग बन गया। चूँकि भारतीय संगीत की परम्परा वैदिककालीन सभ्यता से जुड़ी है, इसीलिए संगीत की विविध शैलियों में आध्यात्म, धर्म और भक्ति के तत्त्व आज भी प्रमुख रूप से उपस्थित हैं। विषय के अनुसार भक्ति संगीत का कई प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है। भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में वन्दना या प्रार्थना गीतों का सर्वाधिक प्रयोग हुआ है। इस श्रृंखला की आरम्भिक कुछ कड़ियों में हम भक्ति संगीत के इसी स्वरूप पर चर्चा करेंगे।

भारतीय संगीत के कई राग हैं, जिनमें भक्तिरस खूब मुखर हो जाता है। प्रातःकाल गाये-बजाए जाने वाले राग, विशेषतः राग भैरवी, भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए आदर्श होते हैं। आज के अंक में हम आपके लिए राग भैरवी में निबद्ध भक्तिरस से अभिसिंचित दो रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे। वर्ष 1977 में फिल्म ‘आलाप’ प्रदर्शित हुई थी। फिल्म के संगीत निर्देशक जयदेव ने राग आधारित कई गीतों का समावेश फिल्म में किया था। फिल्म का कथानक संगीत-शिक्षा और साधना पर ही केन्द्रित था। संगीतकार जयदेव ने एक प्राचीन सरस्वती वन्दना- ‘माता सरस्वती शारदा...’ को भी फिल्म में शामिल किया। राग भैरवी में निबद्ध यह वन्दना इसलिए भी रेखांकन योग्य है कि यह युगप्रवर्तक संगीतज्ञ पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर द्वारा स्वरबद्ध परम्परागत सरस्वती वन्दना है, जिसे फिल्म में यथावत रखा गया था। प्रसंगवश यह भी उल्लेखनीय है कि भारतीय संगीत के इस उद्धारक की आज 140वीं जयन्ती है। पलुस्कर जी का जन्म आज के ही दिन वर्ष 1872 में हुआ था। फिल्म ‘आलाप’ में जयदेव ने इस सरस्वती वन्दना को यथावत सम्मिलित किया। आइए, सुनते हैं, राग भैरवी में निबद्ध यह वन्दना गीत। इस गीत को लता मंगेशकर, येशुदास, दिलराज कौर और मधुरानी ने स्वर दिया है।


राग भैरवी : ‘माता सरस्वती शारदा...’ : फिल्म आलाप : तीनताल 


राग भैरवी भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए एक आदर्श राग है। ‘भारतीय संगीत के विविध रागों का मानव जीवन पर प्रभाव’ विषय पर अध्ययन और शोध कर रहे लखनऊ के जाने-माने मयूर वीणा और इसराज वादक पण्डित श्रीकुमार मिश्र से जब मैंने इस विषय पर चर्चा की तो उन्होने स्पष्ट बताया कि भारतीय रागदारी संगीत से राग भैरवी को अलग करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती। यदि ऐसा किया गया तो मानव जाति प्रातःकालीन ऊर्जा की प्राप्ति से वंचित हो जाएगा। राग भैरवी मानसिक शान्ति प्रदान करता है। इसकी अनुपस्थिति से मनुष्य डिप्रेशन, उलझन, तनाव जैसी असामान्य मनःस्थितियों का शिकार हो सकता है। प्रातःकाल सूर्योदय का परिवेश परम शान्ति का सूचक होता है। ऐसी स्थिति में भैरवी के कोमल स्वर- ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद, मस्तिष्क की संवेदना तंत्र को सहज ढंग से ग्राह्य होते है। कोमल स्वर मस्तिष्क में सकारात्मक हारमोन रसों का स्राव करते हैं। इससे मानव मानसिक और शारीरिक विसंगतियों से मुक्त रहता है।

भैरवी के कोमल स्वर मन को शान्ति प्रदान करता है, वहीं भक्तिरस का संचार करने में भी सहायक होता है। अब हम आपको राग भैरवी में निबद्ध एक बेहद लोकप्रिय सादरा सुनवाते हैं। इस रचना के माध्यम से देवी-स्तुति की गई है। इसे अनेक वरिष्ठ कलासाधक अपने-अपने स्वरों से सुसज्जित कर चुके हैं, परन्तु सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी परवीन सुलताना ने अपने पुकारयुक्त स्वरों में जिस प्रकार इसे प्रस्तुत किया है, उससे यह भक्तिरस की अभिव्यक्ति का श्रेष्ठ उदाहरण हो जाता है। यह रचना झपताल में निबद्ध है।


राग भैरवी : ‘भवानी दयानी महा वाक्वानी सुर नर मुनि जन मानी...’ : बेगम परवीन सुलताना : झपताल





आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 133वीं संगीत पहेली में हम आपको एक द्रुत खयाल का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – खयाल के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – यह खयाल किस ताल में प्रस्तुत किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 135वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 131वीं संगीत पहेली में हमने आपको एक कजरी गीत का अन्तरा सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- स्थायी की पंक्ति- ‘बरसन लागी बदरिया रूम झूम के...’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- स्वर- विदुषी गिरिजा देवी। दोनों प्रश्नो के उत्तर हमारे नियमित प्रतिभागी जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हुई लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपको राग भैरवी की दो रचनाओं का रसास्वादन कराया। अगले अंक में हम आपके लिए एक और भक्तिरस प्रधान राग चुनेंगे और उसमें निबद्ध रचनाएँ भी प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


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