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Sunday, November 8, 2015

उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायकी : SWARGOSHTHI – 243 : USTAD ABDUL KARIM KHAN








स्वरगोष्ठी – 243 में आज

संगीत के शिखर पर – 4 : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ

खाँ साहब सम्पूर्ण भारतीय संगीत के प्रतिनिधि संगीतज्ञ थे





रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की चौथी कड़ी में हम उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक और बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में अत्यन्त लोकप्रिय संगीतज्ञ उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायकी पर चर्चा करेंगे। आज के अंक में हम खाँ साहब का गाया राग बसन्त में दो खयाल और राग झिंझोटी तथा राग भैरवी की दो ठुमरियाँ प्रस्तुत करेंगे।


ज हम एक ऐसे संगीत-साधक के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे जिसने उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच एक सेतु बनाने का महान सफल किया था। किराना घराने के इस महान कलासाधक का नाम है, उस्ताद अब्दुल करीम खाँ। इस महान संगीतज्ञ का जन्म उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुजफ्फरनगर जिले में स्थित कैराना नामक कस्बे में वर्ष 1884 में हुआ था। आज जिसे हम संगीत के किराना घराने के नाम से जानते हैं वह इसी कस्बे के नाम पर पड़ा था। एक संगीतकार परिवार में जन्में अब्दुल करीम खाँ के पिता का नाम काले खाँ था। खाँ साहब के तीन भाई क्रमशः अब्दुल लतीफ़ खाँ, अब्दुल मजीद खाँ और अब्दुल हक़ खाँ थे। सुप्रसिद्ध गायिका रोशन आरा बेग़म उनके सबसे छोटे भाई अब्दुल हक़ की सुपुत्री थीं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद रोशन आरा बेग़म का गायन लखनऊ रेडियो के माध्यम से अत्यन्त लोकप्रिय था। जन्म से ही सुरीले कण्ठ के धनी अब्दुल करीम खाँ की सीखने की रफ्तार इतनी तेज थी कि मात्र छः वर्ष की आयु में ही संगीत-सभाओं में गाने लगे थे। उनकी प्रतिभा इतनी विलक्षण थी कि पन्द्रह वर्ष की आयु में बड़ौदा दरबार में गायक के रूप में नियुक्त हो गए थे। वहाँ वे 1899 से 1902 तक रहे और उसके बाद मिरज चले गए। अब आप उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में राग बसन्त में निबद्ध दो खयाल सुनिए। विलम्बित एकताल के खयाल के बोल हैं- ‘अब मैंने देखे...’ तथा द्रुत तीनताल की बन्दिश के बोल हैं- ‘फगुआ ब्रज देखन को चलो री...’


राग – बसन्त : खयाल – ‘अब मैंने देखे...’ और ‘फगुआ ब्रज देखन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ





खाँ साहब के स्वरों में जैसी मधुरता, जैसा विस्तार और जैसी शुद्धता थी वैसी अन्य किसी गायक को नसीब नहीं हुई। वे विलम्बित खयाल में लयकारी और बोल तान की अपेक्षा आलाप पर अधिक ध्यान रखते थे। उनके गायन में वीणा की मींड़, सारंगी के कण और गमक का मधुर स्पर्श होता था। रचना के स्थायी और एक अन्तरे में ही खयाल गायन के सभी गुणो का प्रदर्शन कर देते थे। अपने गायन की प्रस्तुति के समय वे अपने तानपूरे में पंचम के स्थान पर निषाद स्वर में मिला कर गायन करते थे। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। उत्कृष्ट खयाल गायकी के साथ ठुमरी, दादरा, भजन और मराठी नाट्य संगीत-गायन में भी दक्ष थे। वर्ष 1925-26 में उनकी गायी राग झिंझोटी की ठुमरी- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन....’ अत्यन्त लोकप्रिय हुई थी। लगभग दस वर्षों के बाद 1936 में पी.सी. (प्रथमेश चन्द्र) बरुआ के निर्देशन में शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास, ‘देवदास’ पर इसी नाम से एक फिल्म का निर्माण हुआ था। फिल्म के संगीत निर्देशक तिमिर वरन ने उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी इसी ठुमरी को फिल्म में शामिल किया था, जिसे कुन्दनलाल सहगल ने स्वर दिया था। सहगल के स्वरों में इस ठुमरी को सुन कर खाँ साहब बड़े प्रसन्न हुए थे और उन्हें बधाई भी दी थी। आइए, आज हम आपको खाँ साहब के स्वरों में वही लोकप्रिय ठुमरी सुनवाते हैं।


ठुमरी राग झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ




उस्ताद अब्दुल करीम खाँ जैसे संगीतज्ञ सदियों में जन्म लेते हैं। अनेक प्राचीन संगीतज्ञों के बारे कहा जाता है कि उनके संगीत से पशु-पक्षी खिंचे चले आते थे। खाँ साहब के साथ भी ऐसी ही एक सत्य घटना जुड़ी हुई है। उनका एक कुत्ता था, जो अपने स्वामी, खाँ साहब के स्वरों से इतना सुपरिचित हो गया था कि उनकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आवाज़ सुन कर खिंचा चला आता था। इस तथ्य से प्रभावित होकर लन्दन की ग्रामोफोन कम्पनी ने अपना नामकरण और प्रतीक चिह्न, अपने स्वामी के स्वरों के प्रेमी उस कुत्ते को ही बनाया। यह माना जाता है कि हिज मास्टर्स वायस (HMV) के ग्रामोफोन रिकार्ड पर चित्रित कुत्ता उस्ताद अब्दुल करीम खाँ का ही है। आइए, अब चलते-चलते उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में प्रस्तुत है, अत्यन्त लोकप्रिय, भैरवी की ठुमरी। आप यह रसपूर्ण ठुमरी सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी राग भैरवी : ‘जमुना के तीर...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 243वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक वाद्य संगीत रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा भी की जाएगी।


1 – वाद्ययंत्र पर कौन सा राग बजाया जा रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस वाद्ययंत्र की आवाज़ है? वाद्य का नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 14 अक्टूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 245वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 241वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुविख्यात गजल गायक जगजीत सिंह की आवाज़ में द्रुत खयाल की एक रचना का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – दरबारी कान्हड़ा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत एकताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक – जगजीत सिंह

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



पिछली श्रृंखला के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की चौथी श्रृंखला (पहेली क्रमांक 231 से 241 तक) के प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना के अनुसार निम्नलिखित प्रतिभागियों ने पहले तीन स्थानो पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने 20-20 अंक अर्जित कर श्रृंखला में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। दूसरे स्थान पर 16 अंक के साथ हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी हैं और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने 10 अंक अर्जित कर तीसरा स्थान प्राप्त किया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे खयाल, ठुमरी, दादरा और नाट्य संगीत गायकी के शिखर पर प्रतिष्ठित उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त चर्चा की है। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 





Sunday, August 24, 2014

‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : SWARGOSHTHI – 182 : THUMARI JHINJHOTI


स्वरगोष्ठी – 182 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी - 1 : ठुमरी झिंझोटी


जब सहगल ने उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की गायी ठुमरी को अपना स्वर दिया 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हो रही श्रृंखला का शीर्षक है- ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’। दरअसल यह श्रृंखला लगभग दो वर्ष पूर्व ‘स्वरगोष्ठी’ में प्रकाशित / प्रसारित की गई थी। हमारे पाठकों / श्रोताओं को यह श्रृंखला सम्भवतः कुछ अधिक रुचिकर प्रतीत हुई थी। अनेक संगीत-प्रेमियों ने इसके पुनर्प्रसारण का आग्रह भी किया था। सभी सम्मानित पाठकों / श्रोताओं के अनुरोध का सम्मान करते हुए और पूर्वप्रकाशित श्रृंखला में थोड़ा परिमार्जन करते हुए हम इसे पुनः प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख, चित्र और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम के मिले-जुले रूप में प्रस्तुत होते हैं। आपका प्रिय स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ इस दूसरे माध्यम से प्रस्तुत होता आया है। इस अंक से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के परम्परागत रूप के साथ-साथ पूरे आलेख और गीत-संगीत को हम सुप्रसिद्ध उद्घोषिका और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में भी प्रस्तुत कर रहे हैं। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा।




भी संगीत-प्रेमी श्रोताओं का आज से शुरू हो रही हमारी नई लघु श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ में कृष्णमोहन मिश्र और संज्ञा टण्डन की ओर से हार्दिक स्वागत है। आपको शीर्षक से ही यह अनुमान हो गया होगा कि इस श्रृंखला का विषय फिल्मों में शामिल की गई उपशास्त्रीय गायन शैली ठुमरी है। सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर से फ़िल्मी गीतों के रूप में तत्कालीन प्रचलित पारसी रंगमंच के संगीत और पारम्परिक ठुमरियों के सरलीकृत रूप का प्रयोग आरम्भ हो गया था। विशेष रूप से फिल्मों के गायक-सितारे कुन्दनलाल सहगल ने अपने कई गीतों को ठुमरी अंग में गाकर फिल्मों में ठुमरी शैली की आवश्यकता की पूर्ति की थी। चौथे दशक के मध्य से लेकर आठवें दशक के अन्त तक की फिल्मों में सैकड़ों ठुमरियों का प्रयोग हुआ है। इनमे से अधिकतर ठुमरियाँ ऐसी हैं जो फ़िल्मी गीत के रूप में लिखी गईं और संगीतकार ने गीत को ठुमरी अंग में संगीतबद्ध किया। कुछ फिल्मों में संगीतकारों ने परम्परागत ठुमरियों का भी प्रयोग किया है। इस श्रृंखला में हम आपसे ऐसी ही कुछ चर्चित-अचर्चित फ़िल्मी ठुमरियों पर बात करेंगे।

आज के ठुमरी गीत पर चर्चा से पहले भारतीय संगीत की रस, रंग और भाव से परिपूर्ण ठुमरी शैली पर चर्चा आवश्यक है। ठुमरी उपशास्त्रीय संगीत की एक लोकप्रिय गायन शैली है। यद्यपि इस शैली के गीत रागबद्ध होते हैं, किन्तु ध्रुवपद और खयाल की तरह राग के कड़े प्रतिबन्ध नहीं रहते। रचना के शब्दों के अनुकूल रस और भाव की अभिव्यक्ति के लिए कभी-कभी गायक राग के निर्धारित स्वरों के साथ अन्य स्वरों का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। ऐसी ठुमरियों में जिस राग की प्रमुखता होती है, उसमें ‘मिश्र’ शब्द जोड़ दिया जाता है; जैसे 'मिश्र खमाज', 'मिश्र पहाडी', 'मिश्र काफी’ आदि। ठुमरियों में श्रृंगार और भक्ति रसों की प्रधानता होती है। कुछ ठुमरियों में इन दोनों रसों का अनूठा मेल भी मिलता है। ठीक उसी प्रकार जैसे सूफी गीतों और कबीर के निर्गुण पदों में उपरी आवरण तो श्रृंगार रस से प्रभावित रहता है, किन्तु आन्तरिक भाव आध्यात्म और भक्तिभाव की अनुभूति कराता है।

आइए, अब आज के ठुमरी गीत पर थोड़ी चर्चा कर ली जाए। इस श्रृंखला की पहली फ़िल्मी ठुमरी के रूप में हमने 1936 की फिल्म ‘देवदास’ का चयन किया है। यह फिल्म सुप्रसिद्ध उपन्यासकार शरतचन्द्र चट्टोपाध्याय के इसी शीर्षक के उपन्यास पर बनाई गई थी। शरत बावू का यह उपन्यास 1901 में लिखा गया और 1917 में पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ था। देवदास पर सबसे पहले 1928 में 'इस्टर्न फिल्म सिंडिकेट' ने मूक फिल्म बनाई थी, जिसमे देवदास की भूमिका नरेश चन्द्रा ने निभाई थी। सवाक फिल्मों के युग में देवदास उपन्यास पर अब तक सात फ़िल्में बन चुकी हैं। अकेले 'न्यू थिएटर्स' ने ही चार विभिन्न भाषाओं में इस फिल्म का निर्माण किया था। 1935 में पी.सी. बरुआ (प्रथमेश चन्द्र बरुआ) के निर्देशन में देवदास का निर्माण बांग्ला भाषा में हुआ था। 1936 में श्री बरुआ के निर्देशन में ही हिन्दी में और 1937 में असमी भाषा में यह फिल्म बनी थी। 1936 में ही 'न्यू थिएटर्स' के बैनर से पी.वी. राव के निर्देशन में इस फिल्म के तमिल संस्करण का निर्माण भी किया गया था, किन्तु दक्षिण भारत में यह फिल्म बुरी तरह असफल रही। 1953 में तमिल और तेलुगु में ‘देवदास’ के निर्माण का पुनः प्रयास हुआ और इस बार दक्षिण भारत में यह द्विभाषी प्रयोग सफल रहा। 1955 में एक बार फिर विमल राय के निर्देशन में देवदास का निर्माण हुआ, जिसमें दिलीप कुमार देवदास की भूमिका में थे। इसके बाद 2002 में शाहरुख़ खाँ अभिनीत फिल्म देवदास का निर्माण हुआ था।

आज हम आपके लिए फिल्म देवदास के जिस गीत को लेकर उपस्थित हुए हैं वह 1936 में हिन्दी भाषा में निर्मित फिल्म देवदास का है। फिल्म के निर्देशक पी.सी. बरुआ थे और देवदास की भूमिका में कुन्दनलाल सहगल, पारो की भूमिका में जमुना बरुआ और चन्द्रमुखी की भूमिका में राजकुमारी ने अभिनय किया था। फिल्म के संगीतकार तिमिर वरन (भट्टाचार्य) थे। तिमिर वरन उस्ताद अलाउद्दीन खाँ के शिष्य और संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वानों के कुल से थे। साहित्य और संगीत में कुशल तिमिर वरन को 'न्यू थियेटर्स' में प्रवेश करने पर पहली फिल्म देवदास का संगीत निर्देशन सौंपा गया। यद्यपि चौथे दशक का फिल्म संगीत प्रारम्भिक प्रयोगशील रूप में था किन्तु इस फिल्म के गीत आज आठ दशक के बाद भी श्रोताओं को मुग्ध कर देते हैं। फिल्म में ठुमरी शैली के दो गीत विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। ठुमरी शैली पर आधारित पहला गीत है- ‘बालम आय बसो मोरे मन में...’। प्राकृतिक परिवेश में प्रणय निवेदन के प्रसंग में फिल्माया गया यह गीत राग काफी के स्वरों में है। दूसरी ठुमरी है- ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ जो वास्तव में राग झिंझोटी की एक परम्परागत ठुमरी है जिसका स्थायी और एक अन्तरा सहगल साहब ने अत्यन्त संवेदनशीलता के साथ गाया है।



राग - झिंझोटी : फिल्म - देवदास 1936 : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : कुन्दनलाल सहगल : संगीत – तिमिर वरन






राग झिंझोटी की यह विशेषता होती है कि यह श्रृंगार रस प्रधान, चंचल प्रवृत्ति का होते हुए भी अद्भुत रस, भ्रम, बेचैनी और आश्चर्य भाव की अभिव्यक्ति में पूर्ण सक्षम होता है। राग झिंझोटी की यह ठुमरी 1925 -26 में महाराज कोल्हापुर के राजगायक उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में अत्यन्त लोकप्रिय थी। खाँ साहब किराना घराने के विलक्षण गायक थे। उन्हें उत्तर और दक्षिण भारतीय संगीत के बीच सेतु के रूप में जाना जाता था। दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत के कई रागों को उन्होने उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित किया था। फिल्म ‘देवदास’ के लिए इस गीत की रिकार्डिंग के बाद सहगल साहब की आवाज़ में इस ठुमरी को खाँ साहब ने सुना और सहगल साहब की गायन शैली की खूब तारीफ़ करते हुए उन्हें बधाई का एक सन्देश भी भेजा था। सहगल साहब ने परदे पर शराब के नशे में धुत देवदास की भूमिका में इस ठुमरी का स्थायी और एक अन्तरा गाया था। गायन के दौरान ठुमरी में किसी ताल वाद्य की संगति नहीं की गई है। पार्श्व संगीत के लिए केवल वायलिन और सरोद की संगति है। के.एल. सहगल की आवाज़ में राग झिंझोटी की इस फिल्मी ठुमरी के बाद हम इसी ठुमरी का पारम्परिक रूप उस्ताद अब्दुल करीम खाँ के स्वरों में प्रस्तुत कर रहे हैं।



राग - झिंझोटी : पारम्परिक ठुमरी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : उस्ताद अब्दुल करीम खाँ






'स्वरगोष्ठी' की इस श्रृंखला में अब हम आपको आज के इस आलेख और गीतों का समन्वित रूप श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी आवाज़ से सजाया है। आप इस प्रस्तुति का आनन्द लीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



ठुमरी राग झिंझोटी : ‘पिया बिन नाहीं आवत चैन...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन







आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 182वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक पुरानी रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 190वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – कण्ठ संगीत की इस रचना का अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – इस संगीत रचना में किस ताल का प्रयोग हुआ है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 184वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 180वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ द्वारा शहनाई पर प्रस्तुत बनारसी कजरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- (क) वाद्य शहनाई और (ख) कजरी धुन तथा पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दादरा और कहरवा। इस अंक के दोनों प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

180वीं कड़ी की पहेली के उत्तरों के साथ ही इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) भी पूर्ण हुई। इस श्रृंखला में निम्नलिखित प्रतिभागियों ने प्राप्तांकों के आधार पर प्रथम तीन स्थान प्राप्त किया है। सभी विजेताओं को 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की ओर से हार्दिक बधाई।

1- सुश्री विजया राजकोटिया, पेंसिलवानिया, अमेरिका - 20 अंक - प्रथम 
2- सुश्री क्षिति तिवारी, जबलपुर - 20 अंक -प्रथम 
3- सुश्री डी. हरिणा माधवी, हैदराबाद - 18 अंक - द्वितीय 
4- श्री हरकीरत सिंह, चण्डीगढ़ - 12 अंक - तृतीय


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक से हमने एक नया प्रयोग किया है। ‘स्वरगोष्ठी’ के परम्परागत आलेख, चित्र और गीत-संगीत के आडियो रूप के साथ-साथ सम्पूर्ण आलेख, गीतों के साथ श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत कर रहे हैं। आपको हमारा यह प्रयोग कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आगामी अंक में हम एक और परम्परागत ठुमरी और उसके फिल्मी रूप पर चर्चा करेंगे। आप भी अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन   
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

Sunday, December 15, 2013

विविध रागों में निबद्ध मीरा का एक भक्तिपद


स्वरगोष्ठी – 146 में आज

रागों में भक्तिरस – 14

‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’ 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की चौदहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी श्रृंखला के अन्तर्गत अब तक हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में हम कुछ बदलाव लाने का प्रयास कर रहे हैं। आज हम आपको भक्त कवयित्री मीराबाई का एक भजन प्रस्तुत करेंगे जिसे अलग-अलग गायिकाओं के स्वरों में और विभिन्न रागों में पिरोया गया है। हम आपको मीरा का यह कृष्णभक्ति से परिपूर्ण पद क्रमशः गायिका वाणी जयराम, लता मंगेशकर, गीता दत्त और सुमन कल्याणपुर की आवाज़ों में सुनवाएँगे। एक ही भजन को चार अलग-अलग आवाज़ों और धुनों में सुन कर आपको भजन की भावभिव्यक्ति और रस की ग्राह्यता में अन्तर करने का अवसर भी मिलेगा।   



भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा रही है। इस संगीत परम्परा में जड़ता नहीं है। यह तो गोमुख से निरन्तर निकलने वाली वह पवित्र धारा है जिसके मार्ग में अनेक धाराएँ मिलती है और इस मुख्य धारा में विलीन हो जाती हैं। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। परन्तु भक्तिरस की धारा जो वैदिक युग में समाहित हुई, वह अविच्छिन्न रूप से आज भी जारी है। आज भारतीय उपमहाद्वीप में संगीत की जितनी भी शैलियाँ प्रचलित हैं, इनका क्रमिक विकास प्राचीन वैदिक संगीत से ही हुआ है। 15वीं और 16वीं शताब्दी में संगीत के विकास में भक्त कवियों का भरपूर योगदान था। इस काल में सूरदास, मीराबाई, गोस्वामी तुलसीदास, कबीर, पुण्डरीक विट्ठल आदि ऐसे भक्तकवि हुए जिन्होने भक्तिकाल में साहित्य के साथ-साथ संगीत को भी प्रतिष्ठित किया। इनका प्रभाव आज भी साहित्य और संगीत के क्षेत्र में कायम है। इनमें से आज हम भक्त कवयित्री मीराबाई के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे। मीरा का जन्म 1498ई. में माना जाता है। मीरा राजस्थान के मेड़ता राज परिवार की राजकुमारी थीं। सात वर्ष की आयु में एक महात्मा ने उन्हें श्रीकृष्ण की एक मूर्ति दी। कृष्ण के उस स्वरूप पर वे इतनी मुग्ध हो गईं कि उन्हें अपना आराध्य और पति मान लिया। 1516ई. में मीरा का विवाह चित्तौड़ के शासक राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। परन्तु कृष्णभक्ति के प्रति समर्पित रहने और साधु-संतों के बीच समय व्यतीत करने के कारण उनका गृहस्थ जीवन कभी भी सफल नहीं रहा। मीरा वैष्णव भक्ति धारा की प्रमुख कवयित्री मानी जाती है। उनके रचे हुए लगभग 1300 पद हमे आज भी उपलब्ध हैं। उनके पदों में राजस्थानी बोली के साथ ब्रज भाषा का मिश्रण है। कुछ विद्वान मानते हैं कि मीरा के भक्तिकाव्य पर उनके समकालीन संगीत सम्राट तानसेन, चित्तौड़ के गुरु रविदास और गोस्वामी तुलसीदास का प्रभाव है। उनके रचे असंख्य पदों में से आज के अंक के लिए हमने जो पद चुना है, वह है- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’। इस पद के चार संस्करण हम प्रस्तुत कर रहे हैं। सबसे पहले प्रस्तुत है, गीतकार गुलज़ार द्वारा 1979 में निर्मित फिल्म ‘मीरा’ में शामिल यह भक्ति रचना। फिल्म का संगीत निर्देशन विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर ने किया था। पण्डित जी ने मीरा के इस पद में निहित करुणा मिश्रित भक्तिभाव की अभिव्यक्ति के लिए राग तोड़ी के स्वरों का चयन किया था। राग तोड़ी की चर्चा से पहले आप यह पद गायिका वाणी जयराम की आवाज़ में सुनिए और करुण और भक्तिरस के मिश्रण की अनुभूति कीजिए। रचना रूपक ताल में निबद्ध है।


राग तोड़ी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : वाणी जयराम ; फिल्म मीरा 



अभी आपने मीरा के इस पद की रसानुभूति राग तोड़ी के स्वरों में किया। अब थोड़ी चर्चा राग तोड़ी के विषय में कर ली जाए। राग तोड़ी इसी नाम के थाट तोड़ी से सम्बन्धित माना जाता है। इस राग में ऋषभ, गान्धार और धैवत स्वर कोमल प्रयोग किया जाता है। इसके साथ मध्यम स्वर तीव्र और निषाद स्वर शुद्ध प्रयोग होता है। इसके आरोह और अवरोह, दोनों में सात स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार इसकी जाति सम्पूर्ण-सम्पूर्ण होती है। इस राग का वादी स्वर धैवत और संवादी स्वर गान्धार है। राग तोड़ी के गायन-वादन का सबसे उपयुक्त समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। करुण और भक्तिरस की अभिव्यक्ति के लिए यह उपयुक्त राग है।
आइए, मीरा का यही पद अब एक भिन्न रूप में सुनें। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ में इसी भक्तिपद को शामिल किया गया था। इसके संगीतकार थे रोशन और इसे स्वर दिया, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार रोशन ने इस भक्तिपद को राग भीमपलासी के स्वरों में और कहरवा ताल में पिरोया था। राग भीमपलासी काफी थाट से सम्बन्धित है। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल तथा शेष स्वर शुद्ध प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। इसकी जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग भीमपलासी के स्वर भक्तिरस के साथ-साथ श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति में समर्थ होते है। राग के इसी स्वभाव के कारण मीरा के इस पद की प्रस्तुति में भक्ति के साथ श्रृंगाररस की अनुभूति भी होगी। लीजिए, भजन का यह दूसरा संस्करण भी सुनिए।


राग भीमपलासी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म नौबहार



मीरा के इसी पद का तीसरा संस्करण 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘जोगन’ में प्रयोग किया गया था। फिल्म में इस भक्तिपद का उपयोग काफी द्रुत लय में कीर्तन शैली में किया गया है। फिल्म के मुख्य कलाकार दिलीप कुमार, नरगिस, प्रतिमा देवी, पूर्णिमा, तबस्सुम आदि थे। अभिनेता राजेन्द्र कुमार की यह पहली फिल्म थी। भजन के इस संस्करण को सुनते समय कई रागों की झलक मिलती है। स्थायी में राग सिन्दूरा तो अन्तरे में राग झिंझोटी के दर्शन भी होते हैं। सामान्य रूप से इस गीत को राग मिश्र झिंझोटी पर आधारित कहा जा सकता है। फिल्म ‘जोगन’ में शामिल मीरा के इस पद को बुलो सी. रानी ने संगीतबद्ध किया था और गायिका गीता दत्त ने स्वर दिया था। इस प्रस्तुति के बाद इसी पद का चौथा स्वरूप भी आप सुनेगे। यह एक गैर फिल्मी संस्करण है, जिसे गायिका सुमन कल्याणपुर ने स्वर दिया है। मीरा के पारम्परिक अन्तरों के साथ इसे कृपशंकर तिवारी ने स्वरबद्ध किया है। इस प्रस्तुति में राग जोग की स्पष्ट झलक मिलती है। भारतीय संगीत का राग जोग भक्तिरस के साथ वैराग्य भाव का सृजन भी करता है। कर्नाटक संगीत पद्यति में राग नट इसके समतुल्य राग होता है। सम्पूर्ण जाति का यह राग पूर्वांग प्रधान होता है। आरोह में केवल शुद्ध गान्धार और अवरोह में शुद्ध और कोमल, दोनों गान्धार का प्रयोग किया जाता है। राग जोग का वादी स्वर षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। रात्रि का दूसरा प्रहर इस राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय माना जाता है। सुमन कल्याणपुर की इस प्रस्तुति में आपको मीरा के इसी पद में एक अन्य भाव का सृजन भी परिलक्षित होगा। आप मीरा के एक ही पद के इन संस्करणों की रसानुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग मिश्र झिंझोटी : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : गीता दत्त : फिल्म जोगन




राग जोग : ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी...’ : सुमन कल्याणपुर : गैर फिल्मी भजन





आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 146वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। यह पाँचवाँ और इस वर्ष का अन्तिम सेगमेंट है। 150वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस संगीत रचना के अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमे राग का नाम लिख भेजिए।

2 – इस रचना के स्वरों को ध्यान से सुनिए और हमे गायिका का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 148वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 144वीं कड़ी में हमने आपको विदुषी कला रामनाथ के वायलिन वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वायलिन। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी के साथ-साथ हमारे एक नए पाठक/श्रोता चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपको राग तोड़ी, भीमपलासी, मिश्र झिंझोटी और जोग पर आधारित मीराबाई के एक पद का रसास्वादन कराया। आगामी अंक में आप मीरा के ही एक अन्य पद की अलग-अलग स्वरों में की गई प्रस्तुति का रसास्वादन कर सकेंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की पन्द्रहवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों की प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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