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Saturday, March 11, 2017

चित्रकथा - 9: शकील बदायूंनी के लिखे फ़िल्मी होली गीत


अंक - 9

शकील बदायूंनी के लिखे फ़िल्मी होली गीत

लायी है हज़ारों रंग होली...



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ परिवार की तरफ़ से आप सभी को होली पर्व की अग्रिम शुभकामनाएँ। रंगों का यह त्योहार आप सभी के जीवन में ख़ुशियों के रंग भर दे, हम ईश्वर से यही कामना करते हैं। हमारी फ़िल्मों में होली गीतों की परम्परा शुरु से ही रही है और एक से बढकर एक होली गीत हमारी फ़िल्मों के लिए बने हैं। आज हम ’चित्रकथा’ के माध्यम से कुछ ऐसे होली गीतों की चर्चा करने जा रहे हैं जिन्हें लिखा है गीतकार शकील बदायूंनी ने। शकील साहब के लिखे तमाम होली गीतों का रंग इतने सालों बाद भी उतना ही पक्का है जितना उस ज़माने में था।




कील बदायूंनी ने फ़िल्म जगत में 1947 की फ़िल्म ’दर्द’ से क़दम रखा और अपने जीवन के अन्तिम
समय तक फ़िल्म-संगीत की सेवा करते रहे। 1952 की फ़िल्म ’बैजु बावरा’ में जब शकील बदायूंनी, नौशाद अली और मोहम्मद रफ़ी ने मिल कर "मन तड़पत हरि दर्शन को आज" जैसी रचना का निर्माण किया, तब यह साम्प्रदायिक सदभाव का मिसाल बन गया। आगे चल कर भी शकील साहब ने श्री कृष्ण और राधा से संबंधित कई गीत लिखे। 1954 की फ़िल्म ’अमर’ में "राधा के प्यारे कृष्ण कन्हाई, तेरी दुहाई तेरी दुहाई" से इसकी शुरुआत हुई थी। और फिर जब उनकी कलम से होली के लिए गीत लिखे गए, तब उनमें केवल रंगों का ही नहीं बल्कि राधा-कृष्ण के रास का उल्लेख करते हुए इन गीतों को अमर कर दिया। शकील का लिखा पहला होली गीत था फ़िल्म ’मदर इंडिया’ में। शमशाद बेगम की खनकती आवाज़ में "होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बांसुरी" आज भी उसी ताज़गी से सुना जाता है जितना उस ज़माने में यह गीत मशहूर हुआ था। और मज़े की बात देखिए कि इस गीत में भी वही ’बैजु बावरा’ वाले गीत जैसा संयोग। शकील, नौशाद और शमशाद बेगम ने फिर एक बार धर्मनिरपेक्षता का मिसाल कायम किया। इस गीत को हिन्दी सिनेमा का पहला सुपरहिट होली गीत माना जाएगा। हालाँकि इससे पहले भी कुछ होली गीत फ़िल्मों में आ चुके थे, उदाहरणत: "होरी आई रे कान्हा बृज के बसिया" (जीवन प्रभात, 1937), "मोपे डार गयो सारी रंग की गागर" (कॉमरेड्स, 1939), "फागुन की रुत आई रे, ज़रा बाजे बांसरी" (होली, 1940), "भिगोई मोरी सारी (साड़ी) रे, देखो भीगे न चोली" (शादी, 1941), पर इनमें से किसी को भी वह सफलता नहीं मिली जितना ’मदर इंडिया’ के गीत को मिली। इस गीत के अन्तरे में शकील साहब लिखते हैं "बरसे गुलाल रंग मोरे आंगनवा, अपने ही रंग में रंग दे मोहे सजनवा"। किसी के रंग में रंगने की बात इसके बाद फिर कई गीतों में सुनने को मिली। इसी तरह से दूसरे अन्तरे में उन्होंने लिखा "छूटे ना रंग ऐसी रंग दे चुनरिया, धोबनिया धोये चाहे सारी उमरिया"। चुनरिया को प्रेम के रंग में रंगने की बात भी समय समय पर हमें सुनने को मिला है। फ़िल्म के सितुएशन के मुताबिक नरगिस के मन की पीड़ा को तीसरे अन्तरे में क्या ख़ूब उभारा है शकील साहब ने जब वो लिखते हैं "होली घर आयी तू भी आजा मुरारी, मन ही मन राधा रोये बिरहा की मारी"। यूं तो इस गीत का अधिकांश भाग कुमकुम पर फ़िल्माया गया है, पर शुरुआती नृत्य संगीत में प्रख्यात कथक नृत्यांगना सितारा देवी का नृत्य भी शामिल है जिसमें वो पुरुष वेश में कुमकुम के साथ नृत्य करते हैं।

1960 में शकील बदायूंनी साहब का लिखा दूसरा होली गीत आया। फ़िल्म ’कोहिनूर’, गीत "तन रंग लो
जी आज मन रंग लो, खेलो उमंग भर रंग प्यार के ले लो"। नौशाद के संगीत में मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर और साथियों का गाया यह गीत दिलीप कुमार और मीना कुमारी पर फ़िल्माया गया है। भले यह फ़िल्म श्याम-श्वेत थी, पर शकील साहब ने अपने शब्दों से इस गीत में ऐसे रंग भरे हैं कि इसे सुनते हुए हमारी आंखों के सामने होली का रंगीन दृश्य साकार हो उठता है। होली का त्योहार सिर्फ़ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि हँसी-मज़ाक, मीठी नोक-झोक और छेड़-छाड़ का भी है। इसलिए होली गीतों में अक्सर हमें प्रेमियों के आपसी छेड़-छाड़ के प्रसंग सुनने को मिलते हैं। शकील साहब ने इस गीत में छेड़-छाड़ के लिए लिखते हैं "आज मुखड़े से घुंघटा हटा लो जी, हो ज़रा सजना से अखियाँ मिला लो जी", जिसके जवाब में नायिका कहती हैं "रंग झूठे मोरे तन पे ना डालो जी, मन प्यार में साजन रंग लो"। यानी कि फिर से बात प्यार के रंग पे आकर टिकटी है। जैसा कि हम पहले भी कह चुके हैं कि शकील साहब के लिखे होली गीतों में राधा-कृष्ण का प्रसंग ज़रूर आता है, इस गीत के चौथे अन्तरे में भी उन्होंने बड़ी सुन्दरता से लिखा है "राधा संग होली खेले बनवारी रे हो, अंग अंग पे चलाए पिचकारी हो, कहे बैंया पकड़ के अनारी, दिल रंग लो जी धड़कन रंग लो"। फ़िल्म-संगीत समीक्षक कार्तिक जी ने इस गीत के बारे में कहा है कि श्याम-श्वेत फ़िल्मों में आनेवाली होली गीतों में यह गीत सबसे ज़्यादा रंगीन है, और बिल्कुल जिस तरह से उत्तर भारत में होली खेली जाती है, ठीक वैसे ही इस फ़िल्माया गया है। "आज मुखड़े से घुंघटा..." में जो रोमान्स है, वह कमाल का है। उन्होंने इस ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि यह गीत और ’मदर इंडिया’ का गीत "दुख भरे दिन बीते रे भैया", ये दोनों गीत शकील-नौशाद का गीत है और दोनों गीतों को मेघ मलहार राग पर आधारित किया गया है। यह वह राग है जो वर्षा ऋतु में गाया जाता है। अत: यह दिलचस्प बात है कि किसी होली गीत को मेघ मलहार पर आधारित किया जाए! कार्तिक जी आगे लिखते हैं कि इन दो गीतों में जो समानता है, वह यह है कि भारत मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान देश रहा है जहाँ वर्षा को ख़ुशी का प्रतीक माना जाता है। और क्योंकि होली भी ख़ुशी का त्योहार है, इसलिए ये दोनों गीत आपस में जुड़े हुए हैं। "दुख भरे दिन..." में भी शकील साहब लिखते हैं, "सावन के संग आए जवानी, सावन के संग जाए..."।

वर्ष 1966 में एक फ़िल्म आई थी ’फूल और पत्थर’। धर्मेन्द्र - मीना कुमारी अभिनीत इस फ़िल्म ने धर्मेन्द्र
को स्टार बना दिया। इस फ़िल्म ने उस साल कई पुरस्कार भी जीते। फ़िल्म में संगीत था रवि का और गीत लिखे शकील ने। नौशाद साहब के बाद शकील ने जिन संगीतकारों के साथ सबसे ज़्यादा काम किया है, उनमें से एक थे रवि साहब। ’फूल और पत्थर’ में आशा भोसले और साथियों का गाया एक होली गीत था "लायी है हज़ारों रंग होली, कोई तन के लिए, कोई मन के लिए"। गीत लक्ष्मी छाया पर फ़िल्माया गया था। फ़िल्म की कहानी कुछ ऐसी थी कि हालातों ने शाका (धर्मेन्द्र) को एक असामाजिक तत्व (डाकू) बना दिया था। जब एक महामारी ने पूरे कस्बे को ख़ाली करवा दिया, तब शाका को एक घर में डकैती करने का मौका मिल गया। लेकिन घर के अन्दर घुस कर उसे कुछ नहीं मिला सिवाय शान्ति के - शान्ति (मीना कुमारी) एक विधवा औरत, जिसे उसके निर्दयी रिश्तेदारों ने उसे मरने के लिए छोड़ गए। शाका उसका देखभाल कर उसे स्वस्थ कर देता है। जब घरवाले वापस आकर शान्ति को जीवित देखते हैं तो ख़ुश नहीं होते। और तो और घर में पराए मर्द को देख कर शान्ति के चरित्र पर सवाल उठाते हैं। शाका और शान्ति वहाँ से भाग कर शाका के घर में अपना नया संसार सजाने की कोशिश करते हैं। पर समाज की नज़रों उन्हें चैन से जीवन व्यतीत करने नहीं देते। इस बीच दोनों में प्रेम के पुष्प खिलते हैं। इस होली गीत का सिचुएशन ऐसा है कि होली की सुबह है, शाका बिस्तर पर बीमार बैठा है, उसके सर पर पट्टी बंधी हुई है। ऐसे में शान्ति उसके लिए प्लेट पर कुछ लाती है। प्लेट लेते हुए शाका शान्ति के हाथों में अपना हाथ फेर कर अपने प्यार का इज़हार करता है। शान्ति शर्माकर खिड़की की तरफ़ जाती है और बन्द खिड़की को खोल देती है। नीचे झाँकती है तो होली की टोली हुड़दंग मचा रही है। गीत शुरु होता है "लाई है हज़ारों रंग होली"। नीचे होली खेलटी खुले में हँस खेल रही है और उपर शान्ति मन ही मन मुस्कुरा रही है। इसी दृश्य को समझाने के लिए शकील साहब ने "कोई तन के लिए" और "कोई मन के लिए" का कितना सुन्दर प्रयोग किया है! पूरा का पूरा गीत सिम्बॉलिक यानी कि प्रतीकात्मक है। पहले अन्तरे में शकील लिखते हैं "कोई तो मारे भर पिचकारी, कोई रंग डाले नज़र मतवाली, कोई भीगे बदन हिचकोले पवन बोले, कहीं मचले जिया साजन के लिए"। शान्ति की जिया भी शाका के लिए मचल रहा है जो शान्ति के मुखमंडल पर साफ़ दिख रहा है। दूसरे अन्तरे में शान्ति की आंखों में पिया-मिलन की आस को दर्शाने के लिए शकील लिखते हैं "प्यार में लगे मधुर जोरा-जोरी, रंग बरसाये कन्हैया गोरा गोरी, ओ रूप देखो रचे है कैसे कैसे सजे हैं कैसे कैसे, अरमान भरी अखियों के लिए, लायी है हज़ारों रंग होली"। और तीसरे अन्तरे में तो बिल्कुल साफ़-साफ़ कहा गया कि "तन पे रंग हो तो सारा जग जाने, मन के रंग को तो कोई ना पहचाने, कहीं पायल छन छन बाजे, किसी का दिल नाचे, आई कैसी ख़ुशी जीवन के लिए"। शान्ति के मन में हज़ारों रंग जैसे एक साथ उछल पड़े हों, नीचे नाचती गाती लड़कियों के पायल बज रहे हैं और उपर शान्ति का मन ख़ुशी से नृत्य कर रहा है। कुल मिला कर फ़िल्म की कहानी और सिचुएशन के हिसाब से शकील साहब ने कमाल का लिखा है यह प्रतीकात्मक होली गीत।

शकील बदायूंनी साहब के साहबज़ादे हैं जावेद बदायूंनी जो इन्टरनेट के सोशल नेटवर्किंग् पर सक्रीय हैं।
उनसे मेरी पुरानी जान-पहचान होने के नाते मैंने उनसे पूछा कि बचपन में उनकी कैसे यादें हैं होली की? जावेद साहब ने बताया कि संगीतकार रवि साहब के घर पर होली बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता था और शकील साहब वहाँ हर साल जाते थे। फ़िल्म इंडस्ट्री के बहुत लोग वहाँ इकट्ठा होकर होली खेलते। लेकिन शकील साहब रंगों से दूर रहतेअ उर ना ही भंग या शराब पीते। आगे जावेद साहब ने बताया कि रवि साहब के साथ फ़िल्म ’फूल और पत्थर’ का यह होली गीत उनके दिल के बहुत क़रीब था। शकील साहब 1970 में बहुत कम उम्र में इस दुनिया से चले गए, नहीं तो शायद और भी बेमिसाल कुछ होली गीत उनके कलम से निकलते। लेकिन सच्चाई यह है कि शकील साहब ने जो तीन होली गीत हमें दिए हैं, वो अमर हो गए हैं, और हर साल होली में ये गीत कहीं ना कहीं से सुनाई दे ही जाते हैं और आगे भी देते रहेंगे।



आपकी बात


’चित्रकथा’ स्तंभ में हम आठ अंक पूरे कर चुके हैं और आज इसका नवा अंक प्रस्तुत हुआ है। पिछले आठ अंकों में प्रकाशित लेखों को आप सभी पाठकों ने सम्मान दिया, इसके लिए हम आपके अत्यन्त आभारी हैं। आँकड़ों के अनुसार बीते आठ कड़ियों की मिली-जुली रीडरशिप 2500 पार कर चुकी है। आपका यह स्नेह और स्वीकृति इसी तरह बना रहे और आगे भी आप इसी तरह इस स्तंभ से जुड़े रहें, यही हमारी कामना है। आप सभी का शुक्रिया।



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, March 26, 2009

बीसवीं सदी की १० सर्वश्रेष्ठ हिंदी फिल्में (भाग १)

विनोद भारद्वाज हमारी फिल्मों के प्रतिष्टित हिंदी समीक्षकों में से एक हैं. पिछले दिनों उनकी पुस्तक, "सिनेमा- कल आज और कल" पढ़ रहा था. इस पुस्तक में एक जगह उन्होंने बीती सदी की टॉप दस फिल्मों की एक सूची दी है. मुझे लगा १९९९ में उनके लिखे इस आलेख पर कुछ चर्चा की जा सकती है. हालाँकि खुद विनोद मानते हैं कि इस तरह का चयन कभी भी विवादों के परे नहीं रह सकता. पर विनोद के इस "टॉप १०" को यहाँ देकर मैं आप श्रीताओं/पाठकों की राय जानना चाहता हूँ कि उनके हिसाब से ये टॉप सूची परफेक्ट है या वो कोई और फिल्म भी वो इस सूची में देखना चाहते हैं. आज हम बात करेंगे ५ फिल्मों की (रिलीस होने के क्रम में), आगे की पांच फिल्में कौन सी होंगी ये आप बतायें. याद रखें इस सूची का प्रमुख आधार लोकप्रियता ही है. जाहिर है समीक्षकों की राय में जो सूची होगी वो बिलकुल ही अलग होगी. घबराईये मत, वो सूची भी मैं कल पेश करूँगा. फिलहाल लोकप्रिय के आधार पर २० वीं सदी की इन फिल्मों को परखते हैं -

१. किस्मत (१९४३) - बॉम्बे टौकीस की इस फिल्म के निर्देशक थे ज्ञान मुखर्जी. अशोक कुमार और मुमताज़ शांति की प्रमुख भूमिकाएं थी. यह एक संगीत प्रधान अपराध फिल्म थी जो अपने समय की हॉलीवुड की फिल्मों से प्रभावित थी. कोलकत्ता में ये फिल्म ३ साल तक एक ही सिनेमा घर में चलती रही थी. सुनते चलिए इसी फिल्म से अमीरबाई कर्नाटकी का गाया ये मधुर गीत-



२. आवारा (१९५१) - अभिनेता निर्देशक राज कपूर की ये सबसे लोकप्रिय फिल्म है. नर्गिस उनकी हेरोइन थी. ये फिल्म भारत में ही नहीं सोवियत संघ, अफ्रीका और अरब देशों में भी खूब लोकप्रिय हुई थी. शंकर जयकिशन का संगीत हिट था और फिल्म के एक गाने के "स्वप्न प्रसंग" ने बड़ी चर्चा पायी थी. सुनिए इस फिल्म का ये मधुर दोगाना -



३. अलबेला (१९५१) - मास्टर भगवान् इस फिल्म के निर्देशक - नायक थे. चुलबुली और शोख गीता बाली थी नायिका. सी रामचंद्र का शानदार संगीत इस मस्ती भरी अलबेली फिल्म के केंद्र में था. फिल्म गीत- नृत्य- संगीत के दम पर हिट हुई. 'शोला जो भड़के" ने बहुतों को भड़काया. सुनते हैं यही मस्त गीत -



४. देवदास (१९५५) - विमल राय के निदेशन में बनी देवदास दिलीप कुमार के अभिनय के लिए भी याद की जाती है. सुचित्रा सेन, मोती लाल और वैजयंतीमाला की भी फिल्म में प्रमुख भूमिकाएं थी. १९३५ में बनी के एल सहगल अभिनीत देवदास में बिमल राय कैमरा मैन थे. शरत के प्रसिद्ध उपन्यास के कई संस्करण अब तक बॉलीवुड में बन चुके हैं. देवदास के संगीत की मिठास का भी आनंद लें -



५. मदर इंडिया (1957) - अपनी ही फिल्म औरत (१९४०) का रंगीन संस्करण किया महबूब खान ने मदर इंडिया के रूप में. नर्गिस ने भारतीय माँ की बहुचर्चित भूमिका निभाई थी. राज कुमार, राजेंद्र कुमार, सुनील दत्त और कन्हैया लाल ने भी अपनी भूमिकाओं से फिल्म में जान डाली थी.नौशाद का संगीत था. ग्रामीण पृष्ठभूमि में एक बूढी माँ अपने विद्रोही बेटे को खुद अपने हाथों से मारने के लिए मजबूर हो जाती है. सुनिए इसी अविस्मरणीय फिल्म का ये सदाबहार गीत -



इसी आलेख में विनोद ने हॉलीवुड की टॉप १० फिल्मों का भी जिक्र किया है, जिसमें १९४१ में बनी "सिटिज़न केन" का दर्जा सबसे ऊपर रखा गया है. विनोद के अनुसार ये फिल्म हमेशा से हॉलीवुड के समीक्षकों की प्रिय रही है. इसी तर्ज पर यदि भारतीय टॉप १० सूची में से एक को चुनना पड़े तो विनोद "मदर इंडिया" को चुनना पसंद करेंगें. उनके अनुसार ये फिल्म सभी हिंदी फिल्मों का "माँ" है. शेष ५ फिल्मों की चर्चा लेकर कल उपस्थित होउंगा. तब तक आप अपनी सूची दें.

(जारी...)




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