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Saturday, May 16, 2015

"छू कर मेरे मन को...", क्यों राजेश रोशन को अपने पैसे से इस गीत को रेकॉर्ड करना पड़ा?


एक गीत सौ कहानियाँ - 59

 

छू कर मेरे मन को...’ 





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 59-वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म ’याराना’ के मशहूर गीत "छू कर मेरे मन को, किया तूने क्या इशारा..." के बारे में जिसे किशोर कुमार ने गाया था। 

रबीन्द्र संगीत की धुनों पर आधारित हिन्दी फ़िल्मी गीतों की परम्परा बहुत पुरानी है। 30 के दशक से ही संगीतकार, ख़ास कर बंगाली संगीतकार, रबीन्द्र संगीत से प्ररणा लेकर फ़िल्मी गीत रचते रहे हैं। पंकज मल्लिक, कमल दासगुप्ता, अनिल बिस्वास, सचिन देव बर्मन, हेमन्त कुमार से लेकर बप्पी लाहिड़ी तक यह परम्परा जारी रही है। ये सभी बंगाली संगीतकारों के नाम हमने गिनाए। एक और संगीतकार हैं जिन्हें 100% बंगाली तो नहीं कह सकते, पर हाँ 50% ज़रूर बंगाली हैं। राजेश रोशन वह नाम है, उनकी माँ इरा रोशन बंगाली थीं और इस तरह से बंगाल के सुरीले संगीत की धारा उनके नसों में भी बही है। राजेश रोशन ने भी कई बार रबीन्द्र संगीत को आधार बना कर फ़िल्मी गीत रचे हैं। इनमें से सबसे प्रमुख गीत रहा है 1981 की फ़िल्म ’याराना’ का, "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा..." जो आधारित है "तोमार होलो शुरू, आमा होलो शारा" पर। निस्सन्देह यह गीत बेहद कामयाब रहा और आज भी अक्सर रेडियो पर सुनाई दे जाता है, पर राजेश रोशन से एक बड़ी भूल हो गई थी। दरअसल बात ऐसी थी कि रबीन्द्र संगीत का अधिकार शान्तिनिकेतन के विश्वभारती विश्वविद्यालय के पास सुरक्षित थी, जिसका अर्थ यह है कि किसी भी कलाकार को रबीन्द्र संगीत का इस्तेमाल करने के लिए विश्वभारती से अनुमति लेनी पड़ती थी। पर प्रस्तुत गीत के लिए ना राजेश रोशन ने अनुमति ली और ना ही ’याराना’ फ़िल्म के निर्माता ने। नतीजा यह हुआ कि फ़िल्म के रिलीज़ होने तक किसी को भनक तक नहीं पड़ी कि ऐसा कोई गीत बन रहा है। जैसे ही फ़िल्म रिलीज़ हुई और कलकत्ता के थिएटर में लोग इसे देखने पहुँचे, इस गीत को सुनते ही लोग भड़क उठे। बंगाल में कविगुरू की क्या अहमियत और सम्मान है यह हम सभी जानते हैं। कविगुरु की धुन का बिना अनुमति के हिन्दी फ़िल्मी गीत में सुनाई दे जाना बंगाल के लोगों को अच्छा नहीं लगा, और इसका विरोध प्रदर्शन हुआ। कई सिनेमाघरों में तोड़-फोड़ भे हुए जिससे फ़िल्म को थिएटरों से उतारना पड़ा। मामला ज़रूरत से ज़्यादा बिगड़ता देख ’याराना’ फ़िल्म के निर्माता और राजेश रोशन ने माफ़ी माँगी और विश्वभारती को क्षमा याचना का पत्र भेज कर विवाद को ख़त्म किया। राजेश रोशन के हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी बिल्कुल इसी धुन और मीटर का इस्तेमाल कर कुछ वर्षों बाद (1986 में) एक और गीत बनाया फ़िल्म ’मक्कार’ के लिए। किशोर कुमार की ही आवाज़ में यह गीत था "तू ही मेरा सपना, तू ही मेरी मंज़िल"। 1998 में फ़िल्म ’युगपुरुष’ फ़िल्म में एक बार राजेश रोशन ने रबीन्द्र संगीत "पागला हावा बादोल दिने" पर आधारित गीत बनाया "बंधन खुला पंछी उड़ा"।

यह तो थी "छू कर मेरे मन को" के संगीत की दास्तान। अब आते हैं इसके बोलों पर। गीतकार अंजान के बेटे समीर उस समय अपने पिता के साथ मौजूद थे जब यह गीत लिखा जा रहा था। विविध भारती के एक साक्षात्कार में समीर ने इस गीत के बारे में कुछ ऐसा बताया था - "छूकर मेरे मन को...", अब देखिए इस गाने के पीछे भी एक बड़ी अजीब सी कहानी है, और मुझे याद है, मैं और पापा गाँव जा रहे थे; तो उनकी कैसेट पे दो गानों की ट्यून, एक तो उस फ़िल्म का टाइटल गाना "तेरे जैसा यार कहाँ..." और यह दूसरा गाना। टाइटल गाना तो उन्होंने रास्ते में ही कम्प्लीट कर लिया था पर यह गाना, उनको लग रहा था कि बहुत अच्छा ट्यून राजू ने दिया है, मैं कुछ अच्छा करना चाह रह हूँ। और उन्होंने मुखड़ा मुझे सुनाया "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा", मुझे लगा कि बहुत ख़ूबसूरत गाना बनेगा। मगर जब हम गाँव से आए और सिटिंग् हुई और रेकॉर्डिंग् पर जब गाना पहुँचा तो संजोग की बात थी कि रेकॉर्डिंग् में जाने से पहले तक प्रोड्युसर ने वह गाना नहीं सुना था। और रेकॉर्डिंग में जब प्रोड्युसर आया और उन्होंने जैसे ही गाना सुना तो बोले कि रेकॉर्डिंग् कैन्सल करो, मुझे यह गाना रेकॉर्ड नहीं करना है। उन्होंने कहा कि इतना बेकार गाना मैंने अपनी ज़िन्दगी में नहीं सुना, इतना ख़राब गाना राजू तुमने हमारी फ़िल्म के लिए बनाया है, मुझे यह गाना रेकॉर्ड नहीं करना है। अब राजेश रोशन का दिमाग़ उस ज़माने में, उनको ग़ुस्सा बहुत आता था, उन्होंने कहा कि गफ़्फ़ार भाई, उनका नाम था गफ़्फार नडियाडवाला, सोरज नडियाडवाला, हमीद नडियाडवाला, हमीद उसके प्रोड्युसर थे, हमीद यह फ़िल्म बना रहे थे, यह गाना रहे ना रहे, लेकिन यह गान मैं रेकॉर्ड करने जा रहा हूँ और तुम अभी इसी वक़्त इस रेकॉर्डिंग् स्टुडियो से निकल जाओ, मुझे तुम्हारी शकल नहीं देखनी है, तुमको यह गाना नहीं समझ में आएगा, मैं यह गाना रेकॉर्ड करूँगा, तुमको इसका पैसा भी नहीं देना है, मैं अपने पैसे से रेकॉर्ड करूँगा। और उस आदमी ने अपने पैसे से वह गाना रेकॉर्ड किया और गाना रेकॉर्ड होकर जब अमिताभ बच्चन तक पहुँचा तो उन्होंने यह बात कही कि अगर यह गाना नहीं होगा फ़िल्म में तो मैं यह फ़िल्म नहीं करूँगा। और वह गाना माइलस्टोन बना।" लीजिए, अब आप भी यह गाना सुन लीजिए।

फिल्म याराना : 'छूकर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा...' : किशोर कुमार : राजेश रोशन



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




Sunday, April 17, 2011

मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है....अरे नहीं साहब ये तो गाने के बोल हैं, हमारे अंगने में तो आपका ही काम है...आईये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 636/2010/336

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! आज हम एक नए सप्ताह में क़दम रख रहे हैं और इन दिनों जारी है लघु शृंखला 'सितारों की सरगम', जिसके अंतर्गत हम कुछ ऐसे गीत सुनवा रहे हैं जिन्हें आवाज़ दी है फ़िल्म अभिनेता और अभिनेत्रियों नें। शृंखला के पहले हिस्से में जिन पाँच सितारों की सरगमी आवाज़ से आपका परिचय हुआ वो थे राज कपूर, दिलीप कुमार, मीना कुमारी, नूतन और अशोक कुमार। आइए आज से शुरु हो रही इस शृंखला के दूसरे हिस्से में बात करें अगली पीढ़ी के सितारों की। ऐसे में शुरुआत 'मेगास्टार ऒफ़ दि मिलेनियम' के अलावा और किनसे हो सकती है भला! जी हाँ, बिग बी अमिताभ बच्चन। साहब उनकी आवाज़ के बारे में क्या कहें, यह तो बस सुनने की चीज़ है। और मज़े की बात यह है कि फ़िल्मों में आने से पहले जब उन्होंने समाचार वाचक की नौकरी के लिए वॊयस टेस्ट दिया था, तो उसमें वो फ़ेल हो गये थे और उन्हें बताया गया था कि उनकी आवाज़ वाचन के लिए सही नहीं है। और क़िस्मत ने क्या खेल खेला कि उनकी वही आवाज़ आज उनकी पहचान है। बच्चन साहब नें जो सफलता और शोहरत कमाई है अपने लम्बे करीयर में और जो सिलसिला आज भी जारी है, इस ऊँचाई तक बहुत कम लोग पहुँच पाते हैं। हमारे बौने हाथ उनकी उपलब्धि को छू भी नहीं सकते। बहुत साल पहले विविध भारती के एक मुलाक़ात में बच्चन साहब से पूछा गया था कि "अमित जी, आप जिस मुकाम पर आ गये हैं वहाँ संघर्ष आपको छू भी नहीं सकता, पर जब पहली बार आपको सफलता मिली थी, उस वक़्त आपको कैसा महसूस हुआ था?"; इसके जवाब में अमित जी का कहना था, "पहली बात तो यह है कि संघर्ष कभी ख़त्म नहीं होती, आज भी मुझे उतना ही संघर्ष करना पड़ता है जितना उस ज़माने में करना पड़ता था। मेरे बाबूजी कहते हैं कि जब तक जीवन है संघर्ष है। और जहाँ तक सफलता का सवाल है, ख़ुशी तो हुई थी, पर उसके लिए कोई ख़ास तरीक़े से मनाया नहीं गया था।"

दोस्तों, अमिताभ बच्चन साहब के अभिनय का लोहा तो हर किसी ने माना ही है, उनकी गायन क्षमता की भी जितनी दाद दी जाये कम है। उन्होंने कई फ़िल्मों में गीत गाया है और कई बार संवाद भी ऐसे निराले तरीक़े से कहे हैं गीतों में कि उस वजह से गीत एक अलग ही मुकाम तक पहुँच गया है। ऐसा ही एक गीत है फ़िल्म 'सिलसिला' का "ये कहाँ आ गये हम युंही साथ साथ चलते"। फ़िल्म 'ख़ुदा गवाह' में भी उनका बोला हुआ संवाद "सर ज़मीन-ए-हिंदुस्तान' को सॊंग् साउण्डट्रैक में शामिल किया गया था। 'नसीब' के "चल चल मेरे भाई" और 'अमर अक्बर ऐंथनी' में "माइ नेम इज़ ऐंथनी गोल्ज़ल्वेज़" में भी उनके हुए संवाद यादगार हैं। अमिताभ बच्चन के गायन से समृद्ध फ़िल्मों में जो नाम सब से पहले ज़हन में आते हैं, वो हैं - 'सिलसिला', 'मिस्टर नटवरलाल', 'लावारिस', 'पुकार', 'जादूगर', 'महान', 'तूफ़ान', 'बागबान'। 'सिलसिला' में दो गीत उन्होंने गाये थे, "नीला आसमाँ सो गया" और "रंग बरसे भीगे चुनरवाली"। यह होली गीत तो शायद सब से लोकप्रिय होली गीत होगा फ़िल्म जगत का! 'मिस्टर नटवरलाल' में "मेरे पास आओ मेरे दोस्तों", 'पुकार' में "तू मयके मत जैयो, मत जैयो मेरी जान", 'जादूगर' में "पड़ोसी अपनी मुरगी को रखना सम्भाल मेरा मुर्गा हुआ है दीवाना", 'महान' में "समुंदर में नहाके और भी नमकीन हो गई है", 'तूफ़ान' में "बाहर है प्रॊब्लेम अंदर है प्रॊब्लेम", और 'बागबान' में "होली खेले रघुवीरा", "चली चली देखो चली चली" और "मैं यहाँ तू वहाँ, ज़िंदगी है कहाँ" जैसे गीत ख़ूब लोकप्रिय हुए। लेकिन जो एक गीत जिसके उल्लेख के बग़ैर बच्चन साहब के गीतों की चर्चा अधूरी है, वह है फ़िल्म 'लावारिस' का "मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"। अमिताभ बच्चन और अल्का याज्ञ्निक द्वारा अलग अलग गाये यह डबल वर्ज़न गीत लोक शैली में रचा हुआ एक हास्य गीत है जिसमें पत्नी की अलग अलग शारीरिक रूप को हास्य व्यंग के द्वारा दर्शाया गया है। अमिताभ बच्चन वाले वर्ज़न में अमित जी ख़ुद ही महिला का भेस धारण कर इन अलग अलग शारीरिक रूपों को दर्शाते हैं जिससे इस गीत को सुनने के साथ साथ देखना भी अत्यावश्यक हो जाता है। 'लावारिस' के संगीतकार थे कल्याणजी-आनंदजी, जिन्होंने कई अभिनेताओं से गीत गवाये हैं। जब उनसे इसके बरे में पूछा गया था 'विविध भारती' के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में, तब उन्होंने कहा था, "इत्तेफ़ाक़ देखिये, शुरु शुरु में पहले ऐक्टर्स ही गाया करते थे। एक ज़माना वो था जो गा सकता था वो ही हीरो बन सकता था। तो वो एक ट्रेण्ड सी चलाने की कोशिश की जब जब होता था, जैसे राइटर जितना अच्छा गा सकता है, अपने वर्ड्स को इम्पॊर्टैन्स दे सकता है, म्युज़िक डिरेक्टर नहीं दे सकता, जितना म्युज़िक डिरेक्टर दे सकता है कई बार सिंगर नहीं दे सकता, एक्स्प्रेशन-वाइज़, सब कुछ गायेंगे, अच्छा करेंगे, लेकिन ऐसा होता है कि वो सैटिस्फ़ैक्शन कभी कभी नहीं मिलता है कि जो हम चाहते थे वो नहीं हुआ। तो ये हमने कोशिश की, जैसे कि बहुत से सिंगरों ने गाया भी, कुछ कुछ लाइनें भी गाये, बहुत से कॊमेडी कलाकारों नें भी गाये, लेकिन बेसिकली जो पूरे गाने गाये, वो अमिताभ बच्चन जी थे, मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है"। तो आइए सुना जाये इस अनोखे सदाबहार गीत को जिसे लिखा है अंजान साहब नें।



क्या आप जानते हैं...
कि अमिताभ बच्चन को चार बार राष्ट्रीय पुरस्कार और १४ बार फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वो भारतीय संसद के निर्वाचित सदस्य भी रहे १९८४ से १९८७ के बीच।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 7/शृंखला 14
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - इस युगल गीत में किशोर दा की भी आवाज़ है.

सवाल १ - किस बड़ी अभिनेत्री ने अपने लिए पार्श्वगायन किया है यहाँ - १ अंक
सवाल २ - परदे पर इस अभिनेत्री के साथ कौन दिखते है अभिनय करते - २ अंक
सवाल ३ - गीतकार कौन हैं - ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
दरअसल अमित जी का पहला उत्तर गलत था, गुड्डी में धर्मेन्द्र की भूमिका अतिथि की थी, समित ने अमिताभ वाला रोल उनसे छिना था, खैर किसी और ने इसका सही जवाब नहीं दिया और खुद अमित जी ने ही अंततः समित का नाम लिया तो ३ अंक के हकदार वो ही हुए, हिन्दुस्तानी जी और शरद जी भी सही निकले. अनजाना जी कहाँ गायब रहे.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, June 28, 2010

ओ बाबुल प्यारे....लता की दर्द भरी आवाज़ में एक बेटी की गुहार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 427/2010/127

दिल लूटने वाले जादूगर कल्याणजी-आनंदजी के स्वरबद्ध गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला की सातवीं कड़ी में हम फिर एक बार सन् १९७० की ही एक फ़िल्म का गीत सुनने जा रहे हैं। देव आनंद-हेमा मालिनी अभिनीत सुपर डुपर हिट फ़िल्म 'जॊनी मेरा नाम'। एक फ़िल्म को सफल बनाने के लिए जिन जिन साज़ो सामान की ज़रूरत पड़ती है, वो सब मौजूद थी इस फ़िल्म में। बताने की ज़रूरत नहीं कि फ़िल्म के गीत संगीत ने भी एक बेहद महत्वपूर्ण पक्ष निभाया। फ़िल्म का हर एक गीत सुपरहिट हुआ, चाहे वह आशा-किशोर का गाया "ओ मेरे राजा" हो या किशोर की एकल आवाज़ में "नफ़रत करने वालों के सीने में प्यार भर दूँ", उषा खन्ना के साथ किशोर दा का गाया "पल भर के लिए कोई हमें प्यार कर ले" हो, आशा जी की मादक आवाज़-ओ-अंदाज़ में "हुस्न के लाखों रंग" हो, या लता जी के गाए दो गीत "मोसे मोरा श्याम रूठा" और "ओ बाबुल प्यारे"। इंदीवर और अनजान के लिखे इस फ़िल्म के ये सारे गीत गली गली गूंजे। अब इस फ़िल्म से किसी एक गीत को आज यहाँ पर सुनवाने की बात आई तो हम कुछ दुविधा में पड़ गए कि किस गीत को बजाया जाए। फिर शब्दों के स्तर पे अगर ग़ौर करें, तो "ओ बाबुल प्यारे" गीत को ही फ़िल्म का सर्वश्रेष्ठ गीत माना जाना चाहिए, ऐसा हमारा विचार है। और इसीलिए हमने इसी गीत को चुना है। सिचुएशन कुछ ऐसा है कि नायिका के बूढ़े पिता को क़ैद कर रखा गया है, और क़ैदख़ाने के ठीक बाहर नायिका यह गीत गा रही है, इस बात से बिल्कुल बेख़बर कि उनके और उनके पिता के बीच का फ़ासला बहुत ही कम है। गीत के बोलों में अनजान साहब ने जान डाल दी है कि गीत को सुनते हुए जैसे कलेजा कांप उठता है। मुखड़े में "ओ" का इस्तेमाल इस तरह का शायद ही किसी और गाने में किसी ने किया होगा! "ओ बाबुल प्यारे, ओ रोये पायल की छमछम, ओ सिसके सांसों की सरगम, ओ निसदिन तुझे पुकारे मन हो"। पिता-पुत्री के रिश्ते पर बने गीतों में यह एक बेहद महत्वपूर्ण गीत रहा है। गीत के तीसरे अंतरे में राजा जनक और सीता का उल्लेख करते हुए नायिका गाती हैं - "जनक ने कैसे त्याग दिया है अपनी ही जानकी को, बेटी भटके राहों में, माता डूबी आहों में, तरसे तेरे दरस को नयन"। और कल्याणजी-आनंदजी ने इस गीत की धुन भी कुछ ऐसी बनाई है कि बताना मुश्किल है कि गीतकार, गायिका और संगीतकार में किसे नम्बर एक माना जाए इस गीत के लिए!

फ़ारूख़ क़ैसर, आनंद बक्शी, इंदीवर और राजेन्द्र कृष्ण के बाद आज हम अनजान साहब की रचना सुन रहे हैं, और बताना ज़रूरी है कि अनजान साहब ने कल्याणजी-आनंदजी के साथ एक लम्बा सफ़र तय किया है। तो क्यों ना आज आनंदजी के 'उजाले उनकी यादों के' वाली मुलाक़ात से उस अंश को यहाँ प्रस्तुत किया जाए जिसमें उनसे पूछा गया था कि उनके हिसाब से उनका सब से अच्छा काम किस गीतकार के साथ हुआ है। सवाल पूछ रहे हैं विविध भारती के वरिष्ठ उद्‍घोषक श्री कमल शर्मा।

प्र: आनंदजी, आपको लगता है कि आपका जो 'best work' है, वो इंदीवर जी के साथ में हुआ है या आनंद बक्शी साहब के साथ में हुआ है?

उ: नहीं, हमने, क्या हुआ, जब अनजान जी आए न, अनजान जी से एक बात कही मैंने। तो स्ट्रगल के दिनों में जब आनजान जी आए, तो अनजान जी से कहा कि काम, बडे सीधे आदमी थे, बड़े सीधे सच्चे आदमी थे, उनसे कहा कि काम तो ईश्वर दिलाएगा, लेकिन ये जो स्ट्रगल पीरियड चला है आपका, इसमें एक ही काम कर लीजिए आप, कि तीन 'म्युज़िक डिरेक्टर्स' चल रहे हैं - कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और आर.डी. बर्मन - इन तीनों के पास जाओ कि पुरिया क्या बेचनी है, माल क्या देना है। बोले हर जगह तो गाना ही लिखूँगा। मैंने कहा कि ऐसा नही होता है, हर किसी का एक अलग लिखवाने का अंदाज़ होता है। तो बोले कि वह क्या होता है? मैंने कहा कि वो सोचो आप और फिर दो दिन के बाद आइए आप, ज़रा सोच के आइए कि क्या करना है। तो दूसरे तीसरे दिन आए तो बोले कि थोड़ी बात समझ में आई, कि आपके गानों में मैंने देखा कि फ़िलोसोफ़ी चाहिए। मैंने कहा कि सही कहा आपने, हमारे गीतों में फ़िलोसोफ़ी चाहिए कहीं ना कहीं, डायरेक्टली या इनडायरेक्टली। कि अपने हाथों से हवाओं को गिरफ़्तार ना कर, कि पहले पेट पूजा, फिर काम करो कोई दूजा, कुछ ना कुछ तो आएगा ही। लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के वहाँ थोड़ा गिरा गाना लाना पड़ेगा, क़व्वाली का रंग, थोड़ा ठेका लाना पड़ेगा, और आर.डी के पास जाएँगे तो लास्ट नोट जो होगी वह लम्बी होगी, तो ऊ, ई नहीं चलेगा वहाँ पे। तो बाद मे अनजान जी जब मिले, बहुत काम करने लगे थे, बोले 'गुरु, वह पुरिया बहुत काम आ रही है, जहाँ भी जाओ फ़टाफ़ट काम हो जाता है, कि उसके वहाँ जाना है तो क्या देना है'।

प्र: गुरु मंत्र तो आप ही से मिला था! (हँसते हुए)

उ: अब क्या हुआ था कि एक गाना था हमारा, फ़िल्म लाइन में चलता है ना, जुमले चलते हैं, कभी कुछ चलता है, कभी कुछ, बीच में जानू, जानेमन, जानेजिगर, ये सब चलने लगा था। मैंने अनजान जी को बोला कि अनजान जी, एक काम कीजिए ना, सारे के सारे एक में डाल देते हैं हम लोग, जानू, जानम, जानेमन, जानेवफ़ा, जानेजहाँ। अनजान जी बोले 'जान छूटे इनसे'।

तो दोस्तों, कुछ हँसी मज़ाक की बातें हो गईं, लेकिन अब वापस आते हैं आज के गीत के मूड पर, जो कि दर्द भरा है। लता जी के दर्दीले अंदाज़ में एक बेटी का अपने पिता को आहवान! सुनते हैं....



क्या आप जानते हैं...
कि कमल बारोट से कल्याणजी-आनंदजी ने कुछ बड़े सुंदर ग़ैर-फ़िल्मी गीत गवाए हैं और आज भी "पिया रे प्यार", "पास आओ कि मेरी" जैसे गीतों का अपना अलग आकर्षण है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ये एक एक्शन पैक फिल्म का हिट गीत है, जिसके नए संस्करण को इस फिल्म की लेखक जोड़ी में से एक के सुपुत्र ने निर्देशित किया था, फिल्म बताएं -२ अंक.
२. इस गीत को उसके संगीत संयोजन के लिए खास याद किया जाता है, किस गायिका की आवाज़ है इसमें - २ अंक.
३. मूल फिल्म के निर्देशक कौन थे - ३ अंक.
४. किस मशहूर अभिनेत्री पर फिल्माया गया था ये डांस नंबर- २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अरे अवध जी किसी सवाल को जवाब तो दिए होते, कम से कम दो अंक ही मिल जाते, खैर इस सही जवाब के साथ ३ अंक लिए शरद जी ने और आपसे आगे निकल आये, इंदु जी अपने व्यस्तता के बीच भी oig में आना नहीं भूलती यही उनका प्यार है...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, April 26, 2010

राजेश रोशन को था अपनी धुन पर पूरा विश्वास जिसकी बदौलत सुनने वालों को मिला एक बेहद मनभावन गीत

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ०६

राजेश रोशन ने अपने करीयर में कई बार रबीन्द्र संगीत से धुन लेकर हिंदी फ़िल्मी गीत तैयार किया है। इनमें से सब से मशहूर गीत रहा है फ़िल्म 'याराना' का "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा"। आज इस गीत की बारी 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में। क्योंकि यह गीत अंजान ने लिखा है, तो आज जान लेते हैं इस गीत के बारे में अनजान साहब के बेटे समीर क्या कह रहे हैं विविध भारती पर। "उन्होने (अंजान ने) मुखड़ा मुझे सुनाया "छू कर मेरे मन को किया तूने क्या इशारा", मुझे लगा कि बहुत ख़ूबसूरत गाना बनेगा। मगर जब हम गाँव से वापस आए और सिटिंग् हुई और रिकार्डिंग् पर जब गाना पहुँचा तो संजोग की बात थी कि रिकार्डिंग् में जाने से पहले तक प्रोड्युसर ने वो गाना नहीं सुना था। और रिकार्डिंग् में जब प्रोड्युसर आया और उन्होने जैसे ही गाना सुना तो बोले कि रिकार्डिंग् कैन्सल करो, मुझे यह गाना रिकार्ड नहीं करना है। उन्होने कहा कि इतना बेकार गाना मैंने अपनी ज़िंदगी में नहीं सुना, इतना खराब गाना राजु तुमने हमारी फ़िल्म के लिए बनाया है, मुझे यह गाना रिकार्ड नहीं करना है। अब राजेश रोशन का दिमाग़ उस ज़माने में, उनको ग़ुस्सा बहुत आता था, उन्होने कहा कि गफ़्फ़ार भाई, उनका नाम था गफ़्फ़ार नाडियाडवाला, सूरज नाडियाडवाला, हमीद नाडियादवाला, हमीद उसके प्रोड्युसर थे, हमीद, यह फ़िल्म बने ना बने, यह गाना रहे ना रहे, लेकिन यह गाना मैं रिकार्ड करने जा रहा हूँ और यह गाना मैं अपने पैसे से रिकार्ड करने जा रहा हूँ। और तुम अभी इसी वक़्त इस रिकार्डिंग् स्टुडियो से निकल जाओ, मुझे तुम्हारी शकल नही देखनी है, तुमको यह गाना नहीं समझ में आएगा, मैं यह गाना रिकार्ड करूँगा, तुमको इसका पैसा नहीं देना है, मैं अपने पैसे से रिकार्ड करूँगा। और उस आदमी ने अपने पैसे से वह गाना रिकार्ड किया और गाना रिकार्ड होके जब अमिताभ बच्चन तक पहुँचा तो उन्होने यह बात कही थी कि अगर यह गाना नहीं होगा तो मैं यह फ़िल्म नहीं करूँगा। और वह गाना माइलस्टोन बना।"

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - छूकर मेरे मन को
कवर गायन - रफीक शेख




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रफ़ीक़ शेख
रफ़ीक़ शेख आवाज़ टीम की ओर से पिछले वर्ष के सर्वश्रेष्ठ गायक-संगीतकार घोषित किये जा चुके हैं। रफ़ीक ने दूसरे सत्र के संगीत मुकाबले में अपने कुल 3 गीत (सच बोलता है, आखिरी बार, जो शजर सूख गया है) दिये और तीनों के तीनों गीतों ने शीर्ष 10 में स्थान बनाया। रफ़ीक ने पिछले वर्ष अहमद फ़राज़ के मृत्यु के बाद श्रद्धाँजलि स्वरूप उनकी दो ग़ज़लें (तेरी बातें, ज़िदंगी से यही गिला है मुझे) को संगीतबद्ध किया था। बम्पर हिट एल्बम 'काव्यनाद' में इनके 2 कम्पोजिशन संकलित हैं।


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

Sunday, April 25, 2010

प्रतिभा के धनी गीतकार अनजान को नहीं मिल सका कभी उनके लायक सम्मान

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # ०५

'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' की पाँचवीं कड़ी में आज प्रस्तुत है १९६४ की फ़िल्म 'बहारें फिर भी आएँगी' का गीत "आप के हसीन रुख़ पे आज नया नूर है, मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कसूर है"। इस गीत को मोहम्मद रफ़ी ने गाया है, ओ.पी. नय्यर ने स्वरबद्ध किया है, और लिखा है गीतकार अंजान ने। अंजान बनारस में कवि सम्मेलनों और मुशायरों में जाया करते थे। उन्हे हिंदी से बहुत लगाव था और अपनी रचनाओं में कम उर्दू का प्रयोग करते थे, लेकिन यह बात भी सच है कि बनारस में वो मुशायरों की शान थे। उनकी पकड़ उर्दू पर भी कम मज़बूत नहीं थी। इसका प्रमाण आज का प्रस्तुत गीत ही है। अंजान साहब लिखते हैं "जहाँ जहाँ पड़े क़दम वहाँ फ़िज़ा बदल गई, कि जैसे सर बसर बहार आप ही में ढल गई, किसी में यह कशिश कहाँ जो आप में हुज़ूर है, मेरा दिल मचल गया तो मेरा क्या कसूर है"। अंजान ने अपनी फ़िल्मी करीयर शुरु की १९५३ में बनी प्रेम नाथ की फ़िल्म 'प्रिज़नर्स ऒफ़ गोलकोण्डा' में गीत लिख कर। फिर उसके बाद कई कम बजट फ़िल्मों में गीत लिखे। इनमें फ़िल्म 'लम्बे हाथ' का गाना लोकप्रिय हुआ था, "प्यार की राह दिखा दुनिया को, रोके जो नफ़रत की आंधी, तुम में ही कोई गौतम होगा, तुम में ही कोई होगा गांधी"। 'बहारें फिर भी आएँगी' गुरु दुत्त साहब की आख़िरी फ़िल्म थी बतौर निर्माता। फ़िल्म को निर्देशित किया शाहिद लतीफ़ ने, लिखा अबरार अल्वी ने, और मुख्य कलाकार थे शर्मेन्द्र, माला सिन्हा, तनुजा और रहमान। महत्वपूर्ण बात इस फ़िल्म के बारे में यह है कि इस फ़िल्म का निर्माण गुरु दत्त साहब को नायक बना कर ही शुरु हुआ था, लेकिन उनकी अकाल मृत्यु की वजह से इसे फिर से शुरु करना पड़ा और इस बार धर्मेन्द्र को नायक बनाया गया। तो लीजिए १९६६ की इस फ़िल्म का यह यादगार गीत सुनिए।

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - आपके हसीं रुख पे
कवर गायन - हेमंत बदया




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हेमंत बदया
हेमंत एक संगीतमय परिवार से हैं. बैंगलोर के श्री लक्ष्मी केशवा से इन्होने ललित संगीत और पंडित परमेश्वर हेगड़े से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के गुर सीखे. टोरोंटो में रहने वाले हेमंत जी टीवी के अन्ताक्षरी और मस्त मस्त शोस में शान के साथ नज़र आये और कन्नडा संघ आईडल भी बने


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खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



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Wednesday, March 17, 2010

पीपरा के पतवा सरीके डोले मनवा...मिटटी की सौंधी सौंधी महक लिए "गोदान" का ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 376/2010/76



'१० गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला की छठी कड़ी में हमने आज एक ऐसी फ़िल्म के गीत को चुना है जिसकी कहानी एक ऐसे साहित्यकार ने लिखी थी जिनका नाम हिंदी साहित्य के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज है। मुंशी प्रेमचंद, जिनकी बहुचर्चित उपन्यास 'गोदान' हिंदी साहित्य के धरोहर का एक अनमोल नगीना है। 'गोदान' की कहानी गाँव में बसे एक किसान होरी और उसके परिवार की मर्मस्पर्शी कहानी है कि किस तरह से समाज उन पर एक के बाद एक ज़ुल्म ढाते हैं और किस तरह से वो हर मुसीबत का सामना करते हैं। सेल्युलॊयड के पर्दे पर 'गोदान' को जीवंत किया था निर्देशक त्रिलोक जेटली के साथ साथ अभिनेता राज कुमार, शशिकला, महमूद, शुभा खोटे, मदन पुरी, टुनटुन और कामिनी कौशल ने। फ़िल्म में संगीत था पंडित रविशंकर का और गीत लिखे शैलेन्द्र और अंजान ने। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि युं तो अंजान ने फ़िल्म जगत में १९५३ में ही क़दम रख दिया था 'प्रिज़नर्स ऒफ़ गोलकोण्डा' नामक फ़िल्म से, लेकिन उसके बाद कई सालों तक उनकी झोली में कम बजट की फ़िल्में ही आती रहीं जिसकी वजह से लोगों ने उनकी तरफ़ ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। जिस फ़िल्म के गीतों के अंजान और अंजान नहीं रहे, वह फ़िल्म थी 'गोदान'। 'गोदान' के वह राह खोल दिया कि जिसके बाद बड़े बड़े संगीतकारों ने उनसे गानें लिखवाने शुरु कर दिये। फ़िल्म 'गोदान' के गानें फ़िल्म के स्थान, काल, पात्र के मुताबिक लोक शैली के ही थे, जिनमें से उल्लेखनीय हैं गीता दत्त व महेन्द्र कपूर का गाया "ओ बेदर्दी क्यों तड़पाए जियरा मोरा रिझाय के", लता मंगेशकर का गाया "चली आज गोरी पिया की नगरिया" व "जाने काहे जिया मोरा डोले रे", मुकेश का गाया "हिया जरत रहत दिन रैन हो रामा", आशा भोसले का गाया "जनम लियो ललना कि चांद मोरे अंगना उतरी आयो हो", तथा मोहम्मद रफ़ी का गाया "बिरज में होली खेलत नंदलाल" और "पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा"। आज हम सुनने जा रहे हैं "पीपरा के पतवा सरीखे डोले मनवा के हियरा में उठत हिलोल, पूर्वा के झोंकवा में आयो रे संदेसवा के चल आज देसवा की ओर"। क्या ख़ूब तुलना की है अंजान साहब ने कि दिल ऐसे डोल रहा है जैसे कि हवा के झोंकों से पीपल के पत्त्ते सरसराते हैं। दोस्तों, यह गीत हम ख़ास बजा रहे हैं व्व्व्व के अनुरोध पर।



विविध भारती पर सन्‍ २००७ में एक शृंखला प्रस्तुत की गई थी जिसका शीर्षक था 'अंजान की कहानी समीर की ज़बानी'। तो उसमें अंजान साहब के सुपुत्र समीर साहब से जब यूनुस ख़ान ने आज के इस प्रस्तुत गीत का ज़िक्र किया था, तब समीर साहब ने कुछ इस तरह से अपने विचार व्यक्त किए थे इस गीत के बारे में - "मुझे भी यह गाना बहुत याद आता है और क्यों याद आता है क्योंकि मुझे मेरा गाँव याद आता है। मेरा गाँव जो है वह बाबसपुर, बनारस में है। बाबसपुर एयरपोर्ट, जहाँ पे प्लेन आती हैं, जाती हैं, वहाँ से जितना दूर गाँव का घर है, उतना ही दूर शहर का घर है। तो मेरा गाँव जो है, और उसमें मेरा मकान जो है, उसके चारों तरफ़ बांस के बहुत ज़्यादा पेड़ हुआ करते थे। तो जब मैं बड़ा हुआ और जब मैंने उनका (अंजान का) गाना सुना "बतवारी में मधुर सुर बाजे", तो पहले तो मुझे बतवारी का मतलब मालूम नहीं था। तो मैंने कहा कि "बतवारी" का मतलब क्या है? बाद में जब मैं लिखने लगा, समझने लगा और रेडियो से जुड़ा तब मुझे याद आया कि वो बांस से, बचपन में मम्मी बोला करती थीं कि बतवारी में मत जाना, वहाँ सांप हैं, वहाँ कीड़ें बहुत होते हैं। मुझे बतवारी याद आई और पता चला कि उन्होने बतवारी वहाँ से ली थी, और कितना ख़ूबसूरत गाना था, तो ऐसी सिमिलीज़, ऐसी सारी उपमाएँ केवल वही दे सकता है जो इस मिट्टी से जुड़ा हुआ हो!" बस्‍ दोस्तों, मेरा ख़याल है कि गाँव की मिट्टी से जुड़े इस गीत को लिखने वाले की तारीफ़ में ये शब्द काफ़ी हैं। इससे आगे आप ख़ुद सुन कर महसूस कीजिए।







क्या आप जानते हैं...





चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-



1. मुखड़े में शब्द है -"धूप", गीत पहचानें-३ अंक.

2. बासु चटर्जी निर्मित और निर्देशित इस फिल्म का नाम बताएं- २ अंक.

3. अमोल पालेकर और फिल्म की नायिका पर फिल्माए इस गीत के गीतकार कौन हैं-२ अंक.

4. पुराने दौर के एक अमर संगीत से सुपुत्र हैं इस गीत के संगीतकार, नाम बताएं-२ अंक.



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पिछली पहेली का परिणाम-

अनुपम जी बधाई, बहुत दिनों में पधारे आप, शरद जी और अवध जी आये सही जवाब लेकर. पारुल और उज्जवल आपके सन्देश पाकर खुशी हुई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी

पहेली रचना -सजीव सारथी




ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, September 20, 2009

चंदनिया नदिया बीच नहाए, वो शीतल जल में आग लगाए...लोक रंग में रंग ये गीत कलमबद्ध किया राजेंद्र कृष्ण ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 208

'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल को आज हम रंग रहे हैं लोक संगीत के रंग से। यह एक ऐसा गीत है जिसे शायद बहुत दिनों से आप ने नहीं सुना होगा, और आप में से बहुत लोग इसे भूल भी गए होंगे। लेकिन कहीं न कहीं हमारी दिल की वादियों में ये भूले बिसरे गानें गूंजते ही रहते हैं और कभी कभार झट से ज़हन में आ जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे इस गीत की याद हमें आज अचानक आयी है। दोस्तों, हेमन्त कुमार की एकल आवाज़ में फ़िल्म 'अंजान' का यह गीत है "चंदनिया नदिया बीच नहाए, वो शीतल जल में आग लगाए, के चंदा देख देख मुस्काए, हो रामा हो"। दोस्तों, यह फ़िल्म १९५६ में आयी थी। इससे पहले कि हम इस फ़िल्म की और बातें करें, मुझे थोड़ा सा संशय है इस 'अंजान' शीर्षक पर बनी फ़िल्मों को लेकर। इस गीत के बारे में खोज बीन करते हुए मुझे एक और फ़िल्म 'अंजान' का पता चला जो उपलब्ध जानकारी के अनुसार १९५२ में प्रदर्शित हुई थी 'सनराइज़ पिक्चर्स' के बैनर तले, जिसके मुख्य कलाकार थे प्रेमनाथ और वैजयनंतीमाला, संगीतकार थे मदन मोहन तथा गीतकार थे क़मर जलालाबादी। अब संशय की बात यह है कि जहाँ तक मुझे मालूम है सेन्सर बोर्ड के नियमानुसार एक शीर्षक पर दो फ़िल्में १० साल के अंतर पर ही बन सकती है। यानी कि अगर १९५२ में 'अंजान' नाम की फ़िल्म बनी है तो १९६२ से पहले इस शीर्षक पर फ़िल्म नहीं बन सकती। तो फिर ४ साल के ही अंतर में, १९५६ में, दूसरी 'अंजान' जैसे बन गई! हो सकता है कि मैं कहीं ग़लत हूँ। तो यह मैं आप पाठकों पर छोड़ता हूँ कि आप भी तफ़तीश कीजिए और 'अंजान' की इस गुत्थी को सुलझाने में हमारी मदद कीजिए। और अब बात करते हैं १९५६ में बनी फ़िल्म 'अंजान' की। इस साल हेमन्त कुमार के संगीत निर्देशन में कुल ८ फ़िल्में आयीं - अंजान, ताज, दुर्गेश नंदिनी, बंधन, अरब का सौदागर, एक ही रास्ता, हमारा वतन, और इंस्पेक्टर। इन ८ फ़िल्मों में से ५ फ़िल्मों में प्रदीप कुमार नायक थे। प्रदीप कुमार और हेमन्त दा के साथ की बात हम पहले भी आप को बता चुके हैं। तो साहब, फ़िल्म 'अंजान' एम. सादिक़ की फ़िल्म थी जिसमें प्रदीप कुमार और वैजयंतीमाला मुख्य भूमिकायों में थे। राजेन्द्र कृष्ण के लिखे और ख़ुद हेमन्त दा के स्वरबद्ध किए और गाए हुए इस गीत में कुछ तो ख़ास बात होगी जिसकी वजह से आज ५३ साल बाद हम इस गीत को याद कर रहे हैं।

गीतकार राजेन्द्र कृष्ण ने ५० के दशक में जिन तीन संगीतकारों के लिए सब से ज़्यादा गानें लिखे थे, उनमें से एक हैं सी. रामचन्द्र, दूसरे हैं मदन मोहन, और तीसरे हैं, जी हाँ, हेमन्त कुमार। आइए दोस्तों आज राजेन्द्र कृष्ण जी की कुछ बातें की जाए। अपने कलम से दिलकश नग़मों को जनम देनेवाले राजेन्द्र कृष्ण का जन्म ६ जून १९१९ को शिमला में हुआ था। बहुत कम उम्र में ही वे मोहित हुए कविताओं से। सन् १९४० तक गुज़ारे के लिए वे शिमला के म्युनिसिपल औफ़िस में नौकरी करते रहे। लेकिन कुछ ही सालों में उन्होने यह नौकरी छोड़ दी और मुंबई का रुख़ किया। एक फ़िल्म लेखक और गीतकार बनने की चाह लेकर उन्होने शुरु किया अपना संघर्ष का दौर। और यह दौर ख़तम हुआ सन् १९४७ में जब उन्होने फ़िल्म 'ज़ंजीर' में अपना पहला फ़िल्मी गीत लिखा। उसी साल उन्होने लिखी फ़िल्म 'जनता' की स्क्रीप्ट। उन्हे पहली कामयाबी मिली १९४८ की फ़िल्म 'आज की रात' से। और सन् १९४९ में संगीतकार श्यामसुंदर के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'लाहोर' में उनके लिखे गीतों ने उनके सामने जैसे सफलता का द्वार खोल दिया। तो दोस्तों, पेश है आज का गीत, जिस टीम में शामिल हैं राजेन्द्र कृष्ण, हेमन्त कुमार और प्रदीप कुमार, सुनिए...



(चन्दनिया नदिया बीच नहाये, ओ शीतल जल में आग लगाये
के चन्दा देख देख मुस्काये, हो रामा, हो रामा हो)-२

(पूछ रही है लहर लहर से, कौन है ये मतवाली)-२
तन की गोरी चंचल छोरी, गेंदे की एक डाली
ओ...ओ...ओ...ओ...
रूप की चढ़ती, धूप सुनहेरा रंग आज बरसाये
हो रामा, हो रामा हो

चन्दनिया नदिया बीच नहाये, ओ शीतल जल में आग लगाये
के चन्दा देख देख मुस्काये, हो रामा हो रामा हो

(परबत परबत घूम के आयी, ये अलबेली धारा)-२
क्या जाने किस आसमान से टूटा है ये तारा
ओ.... ओ.... ओ....
शोला बनके, फूल कंवल का, जल में बहता जाये
हो रामा, हो रामा हो

चन्दनिया नदिया बीच नहाये, ओ शीतल जल में आग लगाये
के चन्दा देख देख मुस्काये, हो रामा, हो रामा हो


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस गीत की अमर गायिका की जयंती है कल.
२. संगीतकार हैं श्याम सुंदर.
३. मुखड़े में शब्द है -"सहारा"

पिछली पहेली का परिणाम -
पराग जी आप एक बार फिर शीर्ष पर हैं अब...३० अंकों के लिए बधाई...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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