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Saturday, September 13, 2014

अनजान की पुण्यतिथि पर बेटे समीर की बाल्य-स्मृति



स्मृतियों के स्वर - 09




अनजान की पुण्यतिथि पर बेटे समीर की बाल्य-स्मृति





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकीया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तंभ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज 13 सितंबर है। आज ही के दिन गीतकार अंजान इस दुनिया को छोड़ गये थे। उनके बेटे और इस दौर के गीतकार समीर की स्मृति में कैसे थे पिता अंजान, आइये आज के इस अंक में हम जाने...




सूत्र: सरगम के सितारे - अंजान की कहानी समीर की ज़ुबानी (विविध भारती)


समीर
"बात यह है कि जब मैं पैदा हुआ, वो (अनजान) तब बम्बई आ गये थे। इसलिए बचपन में मेरी और उनकी बहुत ज़्यादा मुलाक़ातें नहीं हो पायी। मेरी उनसे पहली मुलाक़ात हुई जब मैं 8 या 9 साल का था। वह रिश्ता जो डेवलप होता है, अजीब तरह से पनपता है, अजीब तरह से बड़ा होता है। पहली बार जब मैंने उनको देखा तो मुझे अच्छा लगा कि मैंने अच्छे आदमी को देखा और जब मैं उनके पास गया तो मुझे अच्छी तरह याद है कि उन्होंने मुझे गोद में लिया और मेरे सर पे हाथ रखा और दुआ दी मुझे, और कहा कि क्या करते हो? तो मैं शर्माके भाग गया, मैं यह भी नहीं कहा कि मैं पढ़ता हूँ। मुझे कुछ अजीब सा लगा, गाँव के बच्चे हुआ करते थे कि कोई सवाल करे तो शर्माके भाग जाते थे। उसके बाद जो दूसरी मुलाक़ात हुई उनसे वह भी तकरीबन 8 या 9 साल के बाद हुई। मुझे लगता है कि बचपन से और जवानी की दहलीज़ तक मेरी उनसे मुलाक़ात मुश्किल से 2 या 3 बार ही हुई। अब आप समझ सकते हो कि पिता और पुत्र का जो यह रिश्ता था और दोनो के दर्मियाँ जो एक रिश्ता होना चाहिये, वह कितना अजनबीयत लिए हुए था और कितना डिस्टैन्स लिए हुए था।

यह मैं जानता था कि पापा गीतकार हैं, मगर गीतकार किसे कहते हैं यह मुझे पता नहीं था। हमारे यहाँ, मुझे याद है कि हमारे दादाजी को जब लोग पूछते थे कि आपका बेटा क्या करता है, तो वो कहते थे कि फ़िल्म में गाने लिखता है। हमारे गाँव में यह पापुलर कहावत थी कि नचनिया पगनिया। वो कहते थे कि एक गीतकार को नचनिया पगनिया कहने का मतलब समझ में नहीं आया। बड़े गिरे स्तर का काम करना जिसे कहते हैं, ऐसा लोग मानते थे। पहले फ़िल्मों में काम करने को लोग अच्छा नहीं समझते थे, उनको लगता था कि कहीं जाकर गाने लिखते हैं मेरे पिताजी। और जब मैं बड़ा हुआ और समझने लगा और जब मेरी पहली बार मैंने उनका गाना सुना, मुझे याद है वह गाना, एक तो 'गोदान' के गाने, उसके बाद जो 'गोलकोन्डा के क़ैदी' जो फ़िल्म उन्होंने की थी, उसका गाना, फिर 'लम्बे हाथ' का वह गाना जो, पूरी तरह से अगर मैं कहूँ जो मुझे याद है, वह गाना था "प्यार की राह दिखा दुनिया को, रोके जो नफ़रत की आंधी"। यह गाना मुझे पूरी-पूरी तरह से याद आती है और यह गाना कई बार मैंने बचपन में सुना। मगर यह तमाम गाने कभी आते थे, सालों गुज़र जाये मगर सुनाई नहीं पड़ते थे। और बाक़ी गीतकारों के बहुत सारे गाने आते-जाते रहते थे। तो मुझे ऐसा लगा कि पापा कैसे गाने लिखते हैं कि एक बार सुना तो फिर कई साल तक सुनाई नहीं पड़ते। फिर वह फ़िल्म आयी जिसका मैं कहूँ कि गाना मैंने बहुत बार सुना, तब जाके लगा कि सही मायने में पिताजी एक गीतकार हैं और उन्होंने एक अच्छी फ़िल्म लिखी है। और उस फ़िल्म का नाम था 'बंधन' और गाना था "बिना बदरा के बिजुरिया कैसी चमकी"। और उसके बाद मुझे जहाँ तक याद है, धीरे धीरे उनके बाद जो फ़िल्में आयीं, 'अपने रंग हज़ार', 'डॉन', 'मुक़द्दर का सिकन्दर', ऐसी फ़िल्में।

अंजान
बताना ज़रूरी है कि कितना गर्व का बोध होता था मुझे अपने पिता के बारे में सबको बताते हुए। एक अजीब सी कहानी सुनाऊँगा, एक बहुत मज़ेदार कहानी है कि एक बार स्कूल में मुझसे किसी ने पूछा कि तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं? मैंने बोला कि वो गीतकार हैं। पहले तो उसको गीतकार का मतलब ही नहीं समझ में आया। तो बोला कि यह क्या काम होता है? मैंने बोला कि गाने लिखते हैं। तो बोले 'अच्छा अच्छा, कवि हैं'। यह गीतकार क्या होता है, यह मुझे भी नहीं मालूम था। तो एक बात मैंने ध्यान में रख ली कि जब भी बोलूँगा तो यह कि मेरे पिताजी कवि हैं, गीतकार कहूँ तो कोई समझता ही नहीं कि गीतकार क्या होता है। गर्व की बात करते हो तुम तो मैं यह कहूँगा कि जब मैं लोगों से जाके कहता था कि पिताजी गीतकार अंजान हैं तो हँसने लगते थे, कि यह आदमी पागल है, तुम्हारे पिताजी और गीतकार अंजान? हो ही नहीं सकता। क्यों कि हम लोग एक बहुत ही मध्यम श्रेणी के परिवार में रहते थे, ग़रीबी का एक दौर देखा था, और पापा का नाम बहुत बड़ा हो गया था। तो पापा ने कहा कि तुम अपनी बात तो छोड़ो, मैं, जब मीडिया नहीं था, एक्सप्लॉएटेशन नहीं थी, पापा जब जाके कहते थे कि मैं गीतकार अंजान हूँ, बहुत लोगों को संदेह होता था कि यह आदमी कोई और है। आदमी का नाम जो है, उसकी शख़्सियत से बड़ा हो जाता है। जैसे कि अभी मीडिया है, हमको एक्सपोज़र मिलता है, पहचानते हैं, वरना अगर मैं किसी से कहूँ, रास्ते में चलते हुए किसी से कहूँ कि मैं गीतकार समीर हूँ, तो लोगों को लगता है कि यह समीर नहीं हो सकता, क्योंकि उनको समीर नाम से बहुत सारी चीज़ें जुड़ी नज़र आती हैं - मरसीडीस होनी चाहिये, दो-चार लोग आगे-पीछे होने चाहिये, बॉडी-गार्ड होने चाहिए - तब जाकर उनको लगता है कि यह कोई सक्सेसफ़ुल आदमी है, पापुलर है। फिर ऐसा एक दौर आया कि मैंणे उनका नाम ही बताना बन्द कर दिया। भाई यह तो बड़ी अजीब सी बात होती है कि मैं कहता हूँ कि मैं अंजान का बेटा हूँ और सामने वाला उसको यकीन करने के लिए तैयार नहीं है तो बहतर है कि मैं बताऊँ ही नहीं कि मैं गीतकार अंजान का बेटा हूँ। और हर बड़े बाप के बेटे के साथ ऐसी ही स्थिति होती है, बशर्ते यह कि आप बचपन से लेके, जैसा कि मैंने कहा, जवानी तक हमारा उनका सान्निध्य नहीं रहा, हम एक दूसरे के पास नहीं रहे, वो किसी और दुनिया में जीते थे, मैं किसी और दुनिया में जीता था, तो इस दुराव के कारण, दूरी की वजह से हर चीज़ में एक फ़र्क सा होता गया। और इस दूरी की वजह से एक हीनता भी आती थी अन्दर, एक अजीब दौर से हम गुज़रते रहे। फिर भी, ये चीज़ें चलती रहीं, और मैं कहूँ कि इसी वजह से मैं यहाँ तक पहुँचा हूँ, क्योंकि अगर मुझे वो प्लैटफ़ार्म उस वक़्त मिल गया होता जहाँ पापा थे, बड़ी गाड़ियाँ, बड़ा फ़्लैट, पैसा, सब कुछ अगर मिल गया होता, तो शायद आज मैं गीतकार समीर नहीं बन पाया होता। वह दर्द था कहीं ना कहीं, वह जो हीनता की भावना थी, वह जो दूरी थी, वह जो मिलने की प्यास थी, उन तमाम चीज़ों ने मुझे, तमाम बातों ने मुझे यहाँ तक पहुँचाया।"


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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार 'विविध भारती' के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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