Showing posts with label pandit shiv kumar sharma. Show all posts
Showing posts with label pandit shiv kumar sharma. Show all posts

Sunday, June 2, 2013

राग पहाड़ी का जादू


स्वरगोष्ठी – 123 में आज


भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति - 3

राग पहाड़ी में पिरोया मोहक गीत- ‘साजन की गलियाँ छोड़ चले...’ 



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के तीसरे अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज के अंक में हमने आपके लिए 1949 में प्रदर्शित फिल्म ‘बाज़ार’ का एक लोकप्रिय गीत- ‘साजन की गलियाँ छोड़ चले...’ चुना है। राग पहाड़ी पर आधारित गीतों में यह एक सदाबहार गीत है। इसके संगीतकार श्यामसुन्दर थे, जिनका नाम आज की पीढ़ी के लिए प्रायः अपरिचित सा ही है। इसके साथ ही आज हम आपके लिए विश्वविख्यात संगीतज्ञ द्वय पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और पण्डित शिवकुमार शर्मा की राग पहाड़ी में निबद्ध जुगलबन्दी की एक रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।   


श्यामसुन्दर
चौथे दशक के उत्तरार्द्ध से लेकर छठें दशक के पूर्वार्द्ध तक फिल्म संगीत के क्षेत्र में सक्रिय रहे संगीतकार श्यामसुन्दर के बारे में आज की पीढ़ी प्रायः अनभिज्ञ है। पंजाब के उल्लासपूर्ण लोक संगीत का आभिजात्य रूपान्तरण कर तत्कालीन फिल्म संगीत को सँवारने वाले संगीतकारों में श्यामसुन्दर का नाम सम्मान से लिया जाता है। अपने शुरुआती दौर में श्यामसुन्दर, संगीतकार झण्डे खाँ के वाद्यदल (आर्केस्ट्रा) में वायलिन वादक थे। श्यामसुन्दर को इस बात का श्रेय भी दिया जाता है कि उन्होने अपनी पंजाबी फिल्म ‘गुल बलोच’ में मुहम्मद रफी को पहली बार पार्श्वगायन का अवसर दिया था। इस फिल्म में मुहम्मद रफी ने गीत- ‘सोणिए नी हीरिए नी...’ गाया था और इसी गीत से रफी के लिए आगे के द्वार खुल गए। शुरुआती दौर की कुछ हिन्दी फिल्मों में श्यामसुन्दर ने अन्य संगीतकारों के साथ संयुक्त रूप से संगीत निर्देशन किया था। 1943 की फिल्म ‘जंगी जवान’ में असलम के साथ और 1944 की फिल्म ‘भाई’ में गुलाम हैदर के साथ उन्होने संगीत निर्देशन किया था। उन्होने 1943 में ही प्रभात फिल्म कम्पनी की फिल्म ‘नई कहानी’ में स्वतंत्र रूप से संगीत रचना की थी। परन्तु प्रभात की परम्परा के अनुसार इस फिल्म में राग आधारित संगीत के स्थान पर श्यामसुन्दर ने लोकप्रिय संगीत पर अधिक ध्यान दिया था। रागदारी संगीत के पक्षधर और प्रभात के एक अन्य संगीतकार केशवराव भोले ने फिल्म ‘नई कहानी’ में श्यामसुन्दर के संगीत पर शास्त्रीयता से विमुख होने का आरोप भी लगाया था।

लता मंगेशकर
आगे चल कर उन्होने रागों का आधार देना भी शुरू किया। 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘देवकन्या’ में अमीरबाई कर्नाटकी के गाये गीत- ‘पिया मिलन को जाने वाली सँभल सँभल कर चल...’ में श्यामसुन्दर ने अपने राग-प्रेम को स्पष्ट रूप से उजागर किया। 1949 में उनकी दो अत्यन्त सफल फिल्में ‘लाहौर’ और ‘बाज़ार’ प्रदर्शित हुईं। फिल्म ‘लाहौर’ के गीतों में जहाँ पंजाबी तालों का आकर्षण था, वहीं फिल्म ‘बाज़ार’ के गीतों की धुनों में रागों का स्पर्श था। फिल्म का एक गीत ‘साजन की गलियाँ छोड़ चले...’ सर्वाधिक लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ। लता मंगेशकर के गाये इस गीत में श्यामसुन्दर ने राग पहाड़ी का मोहक रूपान्तरण किया था। आम तौर पर ठुमरी में प्रयुक्त होने वाले दीपचन्दी ताल में निबद्ध होने के कारण इस गीत का सौन्दर्य द्विगुणित हो गया। आज भी यह गीत कभी-कभी रेडियो पर सुना जा सकता है। 1949 में प्रदर्शित, फिल्म ‘बाज़ार’ का राग पहाड़ी पर आधारित यह गीत लता मंगेशकर की आवाज़ में आप भी सुनिए।


राग पहाड़ी : फिल्म बाज़ार : ‘साजन की गलियाँ छोड़ चले...’ : संगीत श्यामसुन्दर



पण्डित शिव-हरि 
ऐसी मान्यता है कि राग ‘पहाड़ी’, देश के पर्वतीय क्षेत्रों में प्रचलित लोकधुन का शास्त्रीय रूपान्तरण है। सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित रघुनाथ सेठ का कथन है कि भारत के पर्वतीय क्षेत्रों सहित नेपाल के अधिकतर लोकधुनों में राग ‘पहाड़ी’ के स्वर मिलते हैं। यह राग बिलावल थाट के अन्तर्गत माना जाता है। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में मध्यम और निषाद स्वर वर्जित होते हैं तथा अवरोह में सभी सात स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसका आरोह राग भूप जैसा और अवरोह राग बिलावल जैसा होता है। इस राग का वादी स्वर मध्यम या पंचम तथा संवादी स्वर षडज होता है। ठुमरी, दादरा, गीत, गजल, भजन आदि उपशास्त्रीय और सुगम संगीत की रचनाओं के लिए राग ‘पहाड़ी’ एक आदर्श राग है। आइए, अब हम आपको राग पहाड़ी की एक मोहक रचना, वाद्य संगीत की जुगलबन्दी के रूप में सुनवाते हैं। विश्वविख्यात बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और सन्तूर वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा ने राग पहाड़ी में भावपूर्ण जुगलबन्दी प्रस्तुत की है। यह रचना हमने इन दोनों दिग्गज कलासाधकों द्वारा प्रस्तुत अलबम ‘कॉल ऑफ दि वैली’ से लिया है। आपने फिल्म ‘बाज़ार’ का राग पहाड़ी आधारित गीत सुना है। इसी राग में निबद्ध बाँसुरी और सन्तूर की इस जुगलबन्दी में आप फिल्मी गीत के स्वरों को ढूँढने का प्रयास कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग पहाड़ी : बाँसुरी और सन्तूर जुगलबन्दी : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और पण्डित शिवकुमार शर्मा



आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 123वीं संगीत पहेली में हम आपको छठें दशक की एक फिल्म के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 130वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – गीत के इस अंश में प्रयुक्त ताल का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 125वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 121वें अंक में हमने आपको 1943 में प्रदर्शित फिल्म 'रामराज्य' के राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भीमपलासी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल कहरवा। दोनों प्रश्नो के उत्तर हमारे नियमित प्रतिभागी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने गीत का राग तो ठीक पहचाना, किन्तु ताल पहचानने में भूल की है, अतः उन्हें एक अंक ही दिया जाता है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘भूले-बिसरे संगीतकार की कालजयी कृति’ के अगले अंक में हम आपको एक ऐसे ही एक और भूले-बिसरे संगीतकार का परिचय देते हुए उनका संगीतबद्ध एक मोहक गीत लेकर उपस्थित होंगे। आप भी हमारे भावी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, March 6, 2011

शततंत्री वीणा से आधुनिक संतूर तक, वादियों की खामोशियों को सुरीला करता ये साज़ और निखरा पंडित शिव कुमार शर्मा के संस्पर्श से

सुर संगम - 10 - संतूर की गूँज - पंडित शिव कुमार शर्मा

इसके ऊपरी भाग पर लकड़ी के पुल से बने होते हैं जिनके दोनों ओर बने कीलों से तारों को बाँधा जाता है। संतूर को बजाने के लिए इन तारों पर लकड़ी के बने दो मुंगरों (hammers) - जिन्हें 'मेज़राब' कहा जाता है, से हल्के से मार की जाती है।


विवार की मधुर सुबह हो, सूरज की सुनहरी किरणे हल्के बादलों के बीच से धरती पर पड़ रही हों, हाथ में चाय का प्याला, बाल्कनी पर खड़े बाहर का नज़ारा ताकते हुए आप, और रेडियो पर संगीत के तार छिड़े हों जिनमें से मनमोहक स्वरलहरियाँ गूँज रही हों! सुर-संगम की ऐसी ही एक संगीतमयी सुबह में मैं सुमित आप सभी संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ| हम सभी ने कई अलग-अलग प्रकार के वाद्‍य यंत्रों की ध्वनियाँ सुनी होंगी| पर क्या आपने कभी इस बात पर ग़ौर किया है कि कुछ वाद्‍यों से निकली ध्वनि-कंपन सपाट(flat) होती है जैसे कि पियानो या वाय्लिन से निकली ध्वनि; जबकि कुछ वाद्‍यों की ध्वनि-कंपन वृत्त(round) होती है तथा अधिक गूँजती है। आज हम ऐसे ही एक शास्त्रीय वाद्‍य के बारे में चर्चा करेंगे जिसका उल्लेख वेदों में "शततंत्री वीणा" के नाम से किया गया है। जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ भारत के एक बेहद लोकप्रिय व प्राचीन वाद्‍य यंत्र - संतूर की। आइये, संतूर के बारे में और जानने से पहले आनंद लें पंडित शिव कुमार शर्मा द्वारा प्रस्तुत इस पहाड़ी धुन का।

संतूर पर डोगरी धुन - पं. शिव कुमार शर्मा


'संतूर' एक फ़ारसी शब्द है तथा शततंत्री वीणा को अपना यह नाम इसके फ़ारसी प्रतिरूप से ही मिला है| फ़ारसी संतूर एक विषम-चतुर्भुज (trapezoid) से आकार का वाद्‍य है जिसमें प्रायः ७२ तारें होती हैं। इसकी उत्पत्ती लगभग १८०० वर्षों से भी पूर्व ईरान में मानी जाती है परन्तु आगे जाकर यह एशिया के कई अन्य देशों में प्रचलित हुआ जिन्होंने अपनी-अपनी सभ्यता-संस्कृति के अनुसार इसके रूप में परिवर्तन किए। भारतीय संतूर फ़ारसी संतूर से कुछ ज़्यादा आयताकार (rectangular) होता है और यह आमतौर पर अखरोट की लकड़ी का बना होता है। इसके ऊपरी भाग पर लकड़ी के पुल से बने होते हैं जिनके दोनों ओर बने कीलों से तारों को बाँधा जाता है। संतूर को बजाने के लिए इन तारों पर लकड़ी के बने दो मुंगरों (hammers) - जिन्हें 'मेज़राब' कहा जाता है, से हल्के से मार की जाती है। इसे अर्धपद्मासन में बैठकर तथा गोद में रखकर बजाया जाता है। यह मूल रूप से कश्मीर का लोक वाद्‍य है जिसे सूफ़ी संगीत में इस्तेमाल किया जाता था। तो आइये देखें और सुनें कि फ़ारसी संतूर भारतीय संतूर से किस प्रकार भिन्न है - इस वीडियो के ज़रिये।

फ़ारसी संतूर


हमारे देश में जहाँ भी संतूर के बारे में चर्चा की जाती है - वहाँ एक नाम का उल्लेख करना अनिवार्य बन जाता है। आप समझ ही गये होंगे कि मेरा इशारा किन की ओर है? जी हाँ! आपने ठीक पहचाना, मैं बात कर रहा हूँ भारत के सुप्रसिद्ध संतूर वादक पंडित शिव कुमार शर्मा की। इनका जन्म १३ जनवरी १९३८ को जम्मू में हुआ तथा इनकी माता जी श्रीमती ऊमा दत्त शर्मा स्वयं एक शास्त्रीय गायिका थीं जो बनारस घराने से ताल्लुक़ रखती थीं। मात्र ५ वर्ष कि अल्पायु से ही पंडित जी ने अपने पिता से गायन व तबला वादन सीखना प्रारंभ कर दिया था। अपने एक साक्षात्कार में वे बताते हैं कि उनकी माँ का यह सपना था कि वे भारतीय शास्त्रीय संगीत को संतूर पर बजाने वाले प्रथम संगीतज्ञ बनें। इस प्रकार उन्होंने १३ वर्ष की आयु में संतूर सीखना शुरू कर दिया तथा अपनी माँ का सपना पूरा किया। बम्बई में वर्ष १९५५ में उन्होंने अपनी प्रथम सार्वजनिक प्रस्तुति दी। आज संतूर की लोकप्रियता का सर्वाधिक श्रेय पंडित जी को ही जाता है। उन्होंने संतूर को शास्त्रीय संगीत के अनुकूल बनाने के लिये इसमें कुछ परिवर्तन भी किये। जहाँ तक पुरस्कारों की बात है - पंडित शिव कुमार शर्मा को कई राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष १९८५ में उन्हें अमरीका के बॊल्टिमोर शहर की सम्माननीय नागरिकता प्रदान की गई। इसके पश्चात्‍ वर्ष १९८६ में 'संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार', वर्ष १९९१ में 'पद्मश्री पुरस्कार' तथा वर्ष २००१ में 'पद्म विभूषण पुरस्कार' से उन्हें सम्मानित किया गया। अपने अनोखे संतूर वादन की कला-विरासत उन्होंने अपने सुपुत्र राहुल को भी अपना शिष्य बनाकर प्रदान की तथा पिता-पुत्र की इस जोड़ी ने वर्ष १९९६ से लेकर आज तक कई सार्वजनिक प्रस्तुतियाँ दी हैं। क्यों न हम भी इन दोनों की ऐसी ही एक मनमोहक प्रस्तुति का आनन्द लें इस वीडियो के माध्यम से।

पं. शिव कुमार शर्मा व राहुल शर्मा - जुगलबंदी



और अब बारी इस बार की पहेली की। 'सुर-संगम' की आगामी कड़ी से हम इसमें एक और स्तंभ जोड़ने जा रहे हैं - वह है 'लोक संगीत' जिसके अन्तर्गत हम भारत के भिन्न-भिन्न प्रांतों के लोक संगीत से आपको रू-ब-रू करवाएँगे। तो ये रहा इस अंक का सवाल जिसका आपको देना होगा जवाब तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। 'सुर-संगम' के ५०-वे अंक तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी तरफ़ से।

"इस समुदाय के गवैये-बजैये मुस्लिम होते हुए भी अपने अधिकतम गीतों में हिंदु देवी-देवताओं की तथा हिंदु त्योहारों की बढ़ाई करते हैं और 'खमाचा' नामक एक खास वाद्‍य क प्रगोग करते हैं। तो बताइए हम किस प्रांत के लोक संगीत की बात कर रहे हैं?"

पिछ्ली पहेली का परिणाम: कृष्‍णमोहन जी ने बिल्कुल सटीक उत्तर देकर ५ अंक अर्जित कर लिये हैं, बधाई!

हमारे और भी श्रोता व पाठक आने वाली कड़ियों को सुनें, पढ़ें तथा पहेलियों में भाग लें, इसी आशा के साथ, हम आ पहुँचे हैं 'सुर-संगम' की आज की कड़ी की समाप्ति पर। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, इसपर अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामि रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने मित्र सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए, नमस्कार!

प्रस्तुति- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

Sunday, February 8, 2009

सुनिए "इमोशनल अत्याचार" की ये कहानी

सप्ताह की संगीत सुर्खियाँ (11)
शास्त्रीय संगीत का किसी अन्य संगीत विधा से कोई मुकाबला नही है - पंडित शिव कुमार शर्मा
"येहुदी मेनुहिन कितने महान फनकार थे पर मेडोना या माइकल जेक्सन को हमेशा मीडिया ने अधिक तरजीह दी. ये ट्रेंड पूरी दुनिया का है अकेले भारत का नही. भारतीय शास्त्रीय संगीत को पॉप संस्कृति या फ़िल्म संगीत से भिड़ने की आवश्यकता नही है."- ये कथन थे ५४ वर्षों से भारतीय शास्त्रीय संगीत का परचम अपने संतूर वादन से दुनिया भर में फहराने वाले पंडित शिव कुमार शर्मा जी के. दिल्ली के पुराना किला में अपनी एक और लाइव प्रस्तुति देने आए पंडित जी ने संगीतकार ऐ आर रहमान को बधाई देते हुए कहा कि वो रहमान ही थे जिन्होंने फिल्मों में इलेक्ट्रॉनिक संगीत का ट्रेंड शुरू किया. उनसे पहले के संगीतकार धुन और prelude बनाते थे और बाकी कामों के लिए उन्हें साजिंदों पर निर्भर रहना पड़ता था. यश राज की बहुत सी सफल फिल्मों में साथी पंडित हरी प्रसाद चौरसिया के साथ जोड़ी बनाकर संगीत देने वाले पंडित शिव कुमार शर्मा ने ये पूछने पर कि वो फ़िर से कब फिल्मों में संगीत देंगे, पंडित जी का जवाब था - "फिल्मों में संगीत देने के लिए बहुत समय की जरुरत पड़ती है और कुछ आकर्षक विषय भी मिलने चाहिए..."



मैं ख़ुद को ऑस्कर में देख रहा हूँ - गुलज़ार

रहमान यदि ऑस्कर जीतेंगे तो मुझे सबसे अधिक खुशी होगी - जयपुर साहित्यिक समारोह में गुलज़ार साहब ने खुले दिल से इस युवा संगीतकार की जम कर तारीफ की. ७२ वर्षीया गुलज़ार साहब ने कहा कि मानसिक रूप से मैं अभी से ख़ुद को ऑस्कर में देख रहा हूँ. आवाज़ की पूरी टीम ऐ आर और गुलज़ार साहब के साथ साउंड मास्टर रसूल पूकुट्टी के भी ऑस्कर में विजयी होने की कामना करता है...आप सब भी दुआ करें.


कुमार सानु का मानवीय पक्ष

गायक कुमार सानु ने अपनी नई फ़िल्म "ये सन्डे क्यों आता है" के लिए चार बूट पोलिश करने वाले बच्चों को न सिर्फ़ अभिनय सिखाने के लिए अभिनय स्कूल में डाला बल्कि वो वापस अपने पुराने जीवन चर्या की तरफ़ न मुडें इस उद्देश्य से उनके लिए दो खोलियां (छोटे घर) भी खरीद दिए और उन्हें नियमित स्कूलों में दाखिल भी करवा दिया. बहुत नेक काम किया आपने सानु साहब हमें आपकी इस फ़िल्म का भी इंतज़ार रहेगा.


इमोशनल अत्याचार

देव डी, बड़ा ही अजीब लगता था ये नाम, पर निर्देशक अनुराग कश्यप ने इसके माने साफ़ कर दिए जब एलान किया कि ये आज के दौर के देवदास की कहानी है, तो देवदास ही हैं जो अब देव डी के नाम से जाने जा रहे हैं. "नो स्मोकिंग " जैसी उत्कृष्ट और तमाम लीकों से हटकर फ़िल्म देने वाले अनुराग से उम्मीदें हैं कि उनकी ये फ़िल्म कुछ अलग और नया देखने की चाह रखने वाले दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरेगी. इस हफ्ते का हमारा "सप्ताह का गीत" भी इसी फ़िल्म से है जो इन दिनों हर किसी की जुबां पर चढा हुआ है. अमिताभ वर्मा के लिखे इस "इमोशनल अत्याचार" को स्वरबद्ध किया है अमित त्रिवेदी ने जिनका अंदाज़ हमेशा की तरह एकदम नया और ताज़ा है, आवाज़ है बोनी चक्रवर्ती की. सुनिए और आनंद लीजिये -








Monday, August 25, 2008

वाह उस्ताद वाह ( १ ) - पंडित शिव कुमार शर्मा


संतूर को हम, बनारस घराने के पंडित बड़े रामदास जी की खोज कह सकते हैं, जिनके शिष्य रहे जम्मू कश्मीर के शास्त्रीय गायक पंडित उमा दत्त शर्मा को इस वाध्य में आपर संभावनाएं नज़र आयी. इससे पहले संतूर शत तंत्री वीणा यानी सौ तारों वाली वीणा के नाम से जाना जाता था, जिसके इस्तेमाल सूफियाना संगीत में अधिक होता था. उमा दत्त जी ने इस वाध्य पर बहुत काम किया, और अपने बाद अपने इकलौते बेटे को सौंप गए, संतूर को नयी उंचाईयों पर पहुँचने का मुश्किल काम. अब आप के लिए ये अंदाजा लगना बिल्कुल भी कठिन नही होगा की वो होनहार बेटा कौन है, जिसने न सिर्फ़ अपने पिता के सपने को साकार रूप दिया , बल्कि आज ख़ुद उनका नाम ही संतूर का पर्यावाची बन गया. जी हाँ हम बात कर रहे हैं, संतूर सम्राट पंडित शिव कुमार शर्मा जी की. पंडित जी ने १०० तारों में १६ तार और जोड़े, संतूर को शास्त्रीय संगीत की ताल पर लाने के लिए.अनेकों नए प्रयोग किया, अन्य बड़े नामी उस्तादों के साथ मंत्रमुग्ध कर देने वाली जुगलबंदियां की, और इस तरह कश्मीर की वादियों से निकलकर संतूर देश विदेश में बसे संगीत प्रेमियों के मन में बस गया.

पंडित जी ने बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया के साथ मिलकर जोड़ी बनाई और हिन्दी फिल्मों को भी अपने संगीत से संवारकर एक नयी मिसाल कायम की, यशराज फिल्म्स की कुछ बेहतरीन फिल्में जैसे, सिलसिला (१९८१), चांदनी (१९८९), लम्हें (१९९१) और डर (१९९३) का संगीत आज भी हर संगीत प्रेमी के जेहन में ताज़ा है.

पेश है दोस्तों, पदम् विभूषण ( २००१ ) पंडित शिव कुमार शर्मा, संतूर पर बरसते बादलों का जादू बिखेरते हुए, आनंद लें इस विडियो का. १४ अगस्त २००८, को बंगलोर में हुए बरखा ऋतू संगीत समारोह से लिया गया है ये विडियो, जो हमें प्राप्त हुआ है अभिक मजुमदार की बदौलत जिन्हें इस समारोह को प्रत्यक्ष देखने का सौभाग्य मिला. यहाँ पंडित जी राग मेघ बजा रहे हैं, तबले पर संगत कर रहे हैं योगेश सामसी. विडियो ७ हिस्सों में हैं ( ३-३ मिनट की क्लिप ), कृपया एक के बाद एक देखें.

भाग-1



भाग-2



भाग-3



भाग-4



भाग-5



भाग-6



भाग-7



विडियो साभार- अभिक मजूमदार
सोत्र - इन्टरनेट
लेख संकलन - सजीव सारथी.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ