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Wednesday, December 23, 2009

ज़िंदगी मेरे घर आना...फ़ाकिर के बोलों पर सुर मिला रहे हैं भूपिन्दर और अनुराधा..संगीत है जयदेव का

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #६३

ज की महफ़िल में हम हाज़िर हैं शामिख जी की पसंद की अंतिम नज़्म लेकर। इस नज़्म को जिन दो फ़नकारों ने अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया है उनमें से एक के बारे में महफ़िल-ए-गज़ल पर अच्छी खासी सामग्री मौजूद है, इसलिए आज हम उनकी बात नहीं करेंगे। हम ज़िक्र करेंगे उस दूसरे फ़नकार या यूँ कहिए फ़नकारा और इस नज़्म के नगमानिगार का, जिनकी बातें अभी तक कम हीं हुई हैं। यह अलग बात है कि हम आज की महफ़िल इन दोनों के सुपूर्द करने जा रहे हैं, लेकिन पहले फ़नकार का नाम बता देना हमारा फ़र्ज़ और जान लेना आपका अधिकार बनता है। तो हाँ, इस नज़्म में जिसने अपनी आवाज़ की मिश्री घोली है, उस फ़नकार का नाम है "भूपिन्दर सिंह"। "आवाज़" पर इनकी आवाज़ न जाने कितनी बार गूँजी है। अब हम बात करते हैं उस फ़नकारा की, जिसने अपनी गायिकी की शुरूआत फिल्म "अभिमान" से की थी जया बच्चन के लिए एक श्लोक गाकर। आगे चलकर १९७६ में उन्हें फिल्म कालिचरण के लिए गाने का मौका मिला। पहला एकल उन्होंने "लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल" के लिए "आपबीती" में गाया। फिर राजेश रोशन के लिए "देश-परदेश" में, जयदेव के लिए "लैला-मजनूं" और "दूरियाँ"(जिस फिल्म से आज की नज़्म है) में, कल्याण जी-आनंद जी के लिए "कलाकार" और "विधाता" में और उषा खन्ना के लिए "सौतन" और "साजन बिना सुहागन" में गाकर उन्होंने अपनी प्रसिद्धि में इजाफ़ा किया। आगे चलकर जब उन्होंने लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के लिए "हीरो" , "मेरी जंग", "बंटवारा", "नागिन", "राम-लखन" और "तेजाब" में गाने गाए तो मानो उन्हें उनकी सही पहचान मिल गई। उन्हें "लता मंगेशकर" और "आशा भोंसले" के विकल्प के रूप में देखा जाने लगा और यही उनके लिए घाटे का सौदा साबित हुआ। "मंगेशकर" बहनों के खिलाफ उनकी मुहिम उनके लिए गले का घेघ बन गई। और उसी दौरान गुलशन कुमार से उनकी नजदीकी और उनके पति अरूण पौडवाल(एस डी बर्मन के सहायक) की मौत और फिर आगे चलकर गुलशन कुमार की मौत का उनकी ज़िंदगी और उनकी गायिकी पर गहरा असर पड़ा। सारी घटनाएँ एक के बाद एक ऐसे होती गईं कि उन्हें संभलने का मौका भी न मिला। उनके इस हाल के जिम्मेवार वे खुद भी थीं। उनका यह निर्णय कि वो बस टी-सीरिज के लिए हीं गाएँगी..शुरू-शुरू में सबको रास आता रहा, लेकिन आगे चलकर इसी निर्णय ने उन्हें अच्छे संगीतकारों से दूर कर दिया। उन्होंने चाहे जैसे भी दिन देखे हों लेकिन उनकी बदौलत हिन्दी फिल्म उद्योग को कई सारे नए गायक मिले..जैसे कि सोनू निगम, कुमार शानू, उदित नारायण और अभिजीत। उन्होंने दक्षिण के भी कई सारे गायकों के साथ बेहतरीन गाने गाए हैं जिनमें से एस पी और यशुदास का नाम खासा ऊपर आता है। वह फ़नकार जो कि अनुराधा पौडवाल के नाम से जानी जाती है, भले आज कम सुनी जाती हो लेकिन उनकी आवाज़ की खनक आज भी वादियों में मौजूद है जो कभी-कभार किसी नए गाने में घुलकर हमारे पास पहुँच हीं जाती है।

अनुराधा जी के बारे में इतनी बातें करने के बाद अब वक्त है आज के नगमानिगार से रूबरू होने का। तो आज की नज़्म के रचयिता कोई और नहीं बल्कि जगजीत सिंह जी के खासमखास "सुदर्शन फ़ाकिर" जी हैं। वो क्या थे, यह उनके किसी अपने के लफ़्ज़ों में हीं जानते हैं(प्रस्तुति: वीणा विज): १८ फरवरी ‘०८ की रात के आग़ोश में उन्होंने हमेशा के लिए पनाह ले ली |वो सोच जो ज़िन्दग़ी, इश्क , दर्दो-ग़म को इक अलग नज़रिये से ग़ज़लों के माध्यम से पेश करती थी, वह सोच सदा के लिये सो गई |बेग़म अख़्तर की गाई हुई इनकी यह ग़ज़ल” इश्क में ग़ैरते जज़्बात ने रोने न दिया”–किस के दिल को नहीं छू गई? या फिर “यह दौलत भी ले लो, यह शौहरत भी ले लो|भले छीनलो मुझसे मेरी जवानी, मग़र मुझको लौटा दो वो बचपन का सावन वो क़ाग़ज़ की कश्ती वो बारिश का पानी” –जन-जन को इस क़लाम ने बचपन की यादों से सरोबार कर दिया |इनके काँलेज के साथी जगजीत सिह ने जब इनकी यह नज्म गाई, तो दोनों ही इससे मशहूर हो गए |सालों से सुनते आ रहे, गणतंत्र दिवस पर एन. सी. सी.के बैंड की धुन” हम सब भारतीय हैं” यह भी फ़ाक़िर की रचना है |इससे पूर्व जवानी में फ़ाकिर आल इंडिया रेडियो जलंधर पर ड्रामा एवम ग़ज़लों के साथ व्यस्त रहे |फिर जब एक बार मुम्बई की ओर रुख़ किया तो ये एच.एम वी के साथ ता उम्र के लिए जुड़ गए |बेग़म अख़्तर ने जब कहा कि अब मैं फ़ाक़िर को ही गाऊंगी,तो होनी को क्या कहें, वे इनकी सिर्फ़ पाँच ग़ज़लों को ही अपनी आवाज़ दे सकीं थीं कि वे इस जहान से चलता कर गईं |हृदय से बेहद जज़्बाती फ़ाकिर अपनी अनख़, अपने आत्म सम्मान को बनाए रखने के कारण कभी किसी से काम माँगने नहीं गए | वैसे उन्होंने फिल्म ‘दूरियाँ, प्रेम अगन और यलग़ार” के संवाद और गीत लिखे थे | ये काफ़ी लोकप्रिय भी हुए थे |हर हिन्दू की पसंद कैसेट’ हे राम’ भी फ़ाक़िर की रचना है |इसने तो इन्हें अमर कर दिया है |संयोग ही कहिए कि जिस शव-यान में इनकी शव-यात्रा हो रही थी , उसमें भी यही ‘हे राम’ की धुन बज रही थी |सादगी से जीवन बिताते हुए वे जाम का सहारा लेकर अपने दर्दो-ग़म को एक नया जामा पहनाते रहे | जलंधर आने पर जब भी हम इकठे बैठते तो वे अपने कलाम को छपवाने की चर्चा करते या फिर मेरी रचनाओं को पढ़कर मुझे गाईड करते थे | रिश्ते में सालेहार थी मैं उनकी ,सो कभी हँसी-मज़ाक भी हो जाता था | तेहत्तर वर्ष कि उम्र में भी वे मस्त थे |लेकिन दुनिया से अलग- थलग, इक ख़ामोशी से चेहरा ढ़ाँके हुए |फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ फ़ाकिर को बहुत बड़ा शायर मानते थे |

अब उनके बारे में कुछ उन्हीं के शब्दों में: खुद के बारे में क्या कहूं? फिरोजपुर के नजदीकी एक गांव में पैदा हुआ। पिताजी एम.बी.बी.एस. डाक्टर थे। जालंधर के दोआबा कालेज से मैंने पॉलिटिकल साइंस में १९६५ में एम.ए. किया। आल इंडिया रेडियो जालंधर में बतौर स्टाफ आर्टिस्ट नौकरी मिल गई। खूब प्रोग्राम तैयार किए। 'गीतों भरी कहानी' का कांसेप्ट मैंने शुरू किया था। लेकिन रेडियो की नौकरी में मन नहीं रमा। सब कुछ बड़ा ऊबाऊ और बोरियत भरा। १९७० में मुंबई भाग गया।' 'मुंबई में मुझे एच.एम.वी. कंपनी के एक बड़े अधिकारी ने बेगम अख्तर से मिलवाया। वे 'सी ग्रीन साउथ' होटल में ठहरी हुई थीं। मशहूर संगीतकार मदनमोहन भी उनके पास बैठे हुए थे। बेगम अख्तर ने बड़े अदब से मुझे कमरे में बिठाया। बोलीं, 'अरे तुम तो बहुत छोटे हो। मुंबई में कैसे रहोगे? यह तो बहुत बुरा शहर है। यहां के लोग राइटर को फुटपाथ पर बैठे देखकर खुश होते है।'' 'जब मैं बेगम अख्तर से मिला तो मेरी उम्र २४ साल थी, लेकिन उन्होंने मेरी हौंसला-अफजाई की। मैंने उनके लिए पहली गजल लिखी, 'कुछ तो दुनिया की इनायात ने दिल तोड़ दिया' बेगम साहब बेहद खुश हुई। १९७० से १९७४ तक मेरी लिखी कुल छह गजलें एच.एम.वी. कंपनी ने बेगम अख्तर की आवाज में रिकार्ड कीं। मुझे याद है कि उन्होंने मेरी शायरी में कभी कोई तरमीम नहीं की। यह मेरे लिए फक्र की बात थी। एक बात और जो मैं कभी नहीं भूलता। वह कहा करती थीं, फाकिर मेरी आवाज और तुम्हारे शेरों का रिश्ता टूटना नहीं चाहिए।' फाकिर का क्या अर्थ है, पूछने पर उन्होंने कहा 'यह फारसी का लफ्ज है, जिसके मायने हिंदी में चिंतक और अंग्रेजी में थिंकर है।' 'मेरा एक गीत 'जिंदगी, जिंदगी, मेरे घर आना, आना जिंदगी। मेरे घर का इतना सा पता है..' इसे भूपेन्द्र ने गाया था। इस गीत के लिए मुझे 'बेस्ट फिल्म फेयर अवार्ड मिला था।'' कम हीं लोगों को यह मालूम होगा कि प्रख्यात गजल गायक जगजीत सिंह, जाने-माने लेखक, नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया और सुदर्शन फाकिर छठे दशक में जालन्धर के डीएवी कालेज के छात्र थे। तीनों में घनिष्ठ मित्रता थी और अपने-अपने इदारों में तरक्की के शिखर छूने के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया। आगे चलकर तीनों हीं सेलिब्रिटीज बने। फ़ाकिर के बारे में कहने को और भी बहुत कुछ है..लेकिन वो सब कभी बाद में। अभी तो उनके इस शेर का लुत्फ़ उठाना ज्यादा मुनासिब जान पड़ता है:

इश्क़ का ज़हर पी लिया "फ़ाकिर"
अब मसीहा भी क्या दवा देगा


वाह! क्या बात कही है "फ़ाकिर" ने। इश्क़ को ऐसे हीं नहीं लाईलाज कहते हैं।

इस शेर के बाद अब हम रूख करते हैं फिल्म "दूरियाँ" के इस नज़्म की ओर.....जिसे संगीत से सजाया ने जयदेव ने। यह नज़्म इश्क़ के नाजुक लम्हों को बयां करती है, उन्हें जीती है और हर सुनने वाले के दिल में उस कोमल भावना की घुसपैठ कराती है। यकीन नहीं आता तो आप खुद हीं सुनकर देख लें..फिर नहीं कहिएगा कि "कुछ कुछ" क्यों होता है:

भू: ज़िंदगी ज़िंदगी मेरे घर आना- आना ज़िंदगी
ज़िंदगी मेरे घर आना- आना ज़िंदगी
अ: ज़िंदगी ज़िंदगी मेरे घर आना- आना ज़िंदगी
ज़िंदगी मेरे घर आना- आना ज़िंदगी

भू: मेरे घर का सीधा सा इतना पता है
ये घर जो है चारों तरफ़ से खुला है
न दस्तक ज़रूरी, ना आवाज़ देना
मेरे घर का दरवाज़ा कोई नहीं है
हैं दीवारें गुम और छत भी नहीं है
बड़ी धूप है दोस्त
खड़ी धूप है दोस्त
तेरे आंचल का साया चुरा के जीना है जीना
जीना ज़िंदगी, ज़िंदगी

अ: मेरे घर का सीधा सा इतना पता है
मेरे घर के आगे मुहब्बत लिखा है
न _____ ज़रूरी, न आवाज़ देना
मैं सांसों की रफ़्तार से जान लूंगी
हवाओं की खुशबू से पहचान लूंगी
तेरा फूल हूँ दोस्त
तेरी भूल हूँ दोस्त
तेरे हाथों में चेहरा छुपा के जीना है जीना
जीना ज़िंदगी, ज़िंदगी

मगर अब जो आना तो धीरे से आना
यहाँ एक शहज़ादी सोई हुई है
ये परियों के सपनों में खोई हुई है
बड़ी ख़ूब है ये, तेरा रूप है ये
तेरे आँगन में तेरे दामन में
तेरी आँखों पे तेरी पलकों पे
तेरे कदमों में इसको बिठाके
जीना है, जीना है
जीना ज़िंदगी, ज़िंदगी




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "लगावट" और शेर कुछ यूं था -

कुछ उसके दिल में लगावट जरूर थी वरना
वो मेरा हाथ दबाकर गुजर गया कैसे

इस शब्द की सबसे पहले पहचान की शरद जी ने। आपने यह स्वरचित शेर भी पेश किया:

ये लगावट नहीं तो फिर क्या है
क़त्ल करके मुझे वो रोने लगा।

शरद जी के बाद महफ़िल की शोभा बनीं सीमा जी। पिछली महफ़िल में कहाँ थे आप दोनों? अब आ गए हैं तो जाईयेगा मत। नज़र-ए-करम बरकरार रखिएगा। ये रही आपकी पेशकश:

करे है क़त्ल लगावट में तेरा रो देना
तेरी तरह कोई तेग़-ए-निगाह को आब तो दे (ग़ालिब)

मस्ती में लगावट से उस आंख का ये कहना
मैख्‍़वार की नीयत हूँ मुमकिन है बदल जाना (फ़िराक़ गोरखपुरी)

शामिख जी..आपकी फरमाईशों को पूरा करना तो हमारा फ़र्ज़ है। आप इतना भी शुक्रगुजार मत हो जाया करें :) आप जो भी शेर ढूँढकर लाते हैं वे कमाल के होते हैं..बस यह मालूम नहीं चलता कि शायरों को कहाँ भूल जाते हैं। हर शायर "अंजान" हीं क्यों होता है? :) ये रहे आपके शेर:

नतीजा लगावट का जाने क्या निकले
मोहब्बत में वो आजमा कर चले (अंजान)

छूटती मैके की सरहद माँ गुजर जाने के बाद
अब नहीं आता संदेसा मान मनुहारों भरा
खत्म रिश्तों की लगावट माँ गुजर जाने के बाद (अंजान)

और अंत में महफ़िल में नज़र आईं मंजु जी। आप एक काम करेंगी? जरा यह मालूम तो करें कि हमारे बाकी साथी कहाँ सोए हुए हैं। तब तक हम आपके स्वरचित शेर का लुत्फ़ उठाते हैं:

उनकी लगावट से साँसे चल रहीं ,
नहीं तो कब के मर गये होते।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, June 2, 2009

एक हीं बात ज़माने की किताबों में नहीं... महफ़िल-ए-ज़ाहिर और "फ़ाकिर"

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१७

कुछ गज़लें ऐसी होती हैं,जिन्हें आप हर दिन सुनते हैं,हर पल सुनना चाहते हैं, और बस सुनते हीं नहीं, गुनते भी हैं,लेकिन आपको उस गज़ल के गज़लगो की कोई जानकारी नहीं होती। कई सारे लोग तो उस गज़ल के गायक को हीं "गज़ल" का रचयिता माने बैठे होते हैं। "जगजीत सिंह" साहब की ऐसी हीं एक गज़ल है- "वो कागज़ की कस्ती,वो बारिश का पानी"- मेरे मुताबिक हर किसी ने इस गज़ल को सुना होगा, मैंने भी हज़ारों बार सुना है। लेकिन इसके गज़लगो, इसके शायर का नाम मुझे तब पता चला, जब उस शायर ने अपनी अंतिम साँस ले ली। जिस तरह पिछले अंक में मैंने "खुमार" साहब के बारे में कहा था कि वे हमेशा "गुमनाम" हीं रहे, आज के शायर के बारे में भी मैं ऐसा हीं कुछ कहना चाहता हूँ। लेकिन हाँ ठहरिये, इतनी सख्त बात कहने की गुस्ताखी मैं आज नहीं करूँगा। दर-असल हर शायर का अपना प्रशंसक-वर्ग होता है, जिसके लिए वह शायर कभी "गुमनाम" नहीं होता। शायद ऐसे हीं एक प्रशंसक(नाम जानने के लिए पिछले अंक की टिप्पणियों को देखें) को मेरी बात बुरी लग गई। इसलिए आज के शायर के बारे में मैं इतना हीं कहूँगा कि महानुभाव मेरी(और लगभग सभी की) नज़र में बहुत हीं ऊँचा ओहदा रखते हैं, लेकिन यह दुनिया की बदकिस्मती थी कि वह इनको उतना न जान सकी,जितने रूतबे के ये हक़दार थे। "थे" इसलिए कहा, क्योंकि वह शायर अब स्वर्ग सिधार चुके हैं। "आदमी आदमी को क्या देगा", "अहल-ए-उल्फ़त के हवालों पे हँसी आती है", "हम तो यूँ अपनी ज़िंदगी से मिले", "मेरे दु:ख की कोई दवा न करो", "आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यॊं है", "इश्क़ में गैरत-ए-जज़्बात ने रोने न दिया", "किसी रंजिश को हवा दो कि मैं ज़िंदा हूँ अभी", "कुछ तो दुनिया की इनायत ने दिल तोड़ दिया", "शेख जी थोड़ी-सी पीकर आईये", "ज़िंदगी तुझको जिया है कोई अफ़सोस नहीं" - न जाने ऐसी कितनी हीं गज़लों को उन्होंने अपने अंदाज़-ए-बयां से हरा किया है। मुझे यकीन है कि इन सारी मशहूर गज़लों को कलमबद्ध करने वाले उस शख्स को पहचानने में अब आपको कोई मुश्किल न होगी।

गज़लों की बेगम "बेगम अख्तर" जब अपनी गायिकी(अपनी ज़िंदगी) के अंतिम दौर में थीं तो उस दौरान जिस शख्स ने उन्हें सबसे ज्यादा प्रभावित किया था, वही शख्स आने वाले दिनों में "जगजीत सिंह" का सबसे पसंदीदा शायर हो गया। "फ़िरोज़पुर" में जन्मे और "जालंधर" में पले-बढे उस शख्स की फ़नकारी बस गज़लों तक हीं सीमित नहीं रही, बल्कि "भक्ति रस" का भी उन्होंने भरपूर रसपान किया और औरों को भी उस रस में सराबोर कर दिया। "हे राम" एलबम के गाने इस बात के जीते-जागते सबूत हैं। जहाँ एक ओर जगजीत सिंह की आवाज़ का मीठापन वहीं दूसरी ओर भक्ति में डूबे बोलों का सम्मोहन। उस शायर, उस कवि, उस फ़नकार में बात हीं कुछ ऐसी थी कि लफ़्ज़ खुद-ब-खुद जिगर में उतर जाते थे। अब इतना कहने के बाद यह तो ज़ाहिर है कि उस शख्स पर और ज्यादा पर्दा डाले रखना गज़लों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। एक अदद नानी की कहानी और बारिश के पानी के लिए सारी दौलत और शोहरत को कुर्बान करने वाले "सुदर्शन फ़ाकिर" के बारे में जितना भी कहा जाए उतना कम है, फिर भी हमारी यह पूरी कोशिश रहेगी कि आप सबको उनकी ज़िंदगी से रूबरू कराया जाए। आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि आज की गज़ल के साथ एक और शख्सियत का नाम जुड़ा है और वह नाम ऐसा है कि बाकी नाम उसके सामने कहीं नहीं आते और शायद यही कारण है कि मैं यहाँ पर उनका जिक्र करने से कतरा रहा हूँ। गायकी के बेताज बदशाह "मोहम्मद रफ़ी" साहब ने आज की गज़ल को अपनी आवाज़ दी है। अब "रफ़ी" साहब की शख्सियत को एक छोटे से आलेख में समेटना सूर्य को दीया दिखाने के समान होगा। इसलिए रफ़ी साहब की बात कभी आराम से और दो-तीन आलेखों में करेंगे। आज के आलेख को बस "फ़ाकिर" साहब और इस गज़ल तक हीं सीमित रखते हैं।

"फ़ाकिर" साहब के बारे में कई लोगों का यह कहना है कि "उन्होंने बेगम साहब की जिद्द पर जालंधर रेडियो की नौकरी छोड़ दी और बंबई आ गए। यहाँ आकर भी उन्हें बहुत दिनों तक संघर्ष करना पड़ा।" इस बात का खंडन करते हुए एकबार फ़ाकिर साहब ने कहा था- "इस बात में कोई सच्चाई नहीं है। मैं दर-असल अपने पसंदीदा संगीतकार मदन मोहन के साथ काम करने के लिए बंबई आया था। लेकिन वह हो न सका। मुझे जयदेव के साथ काम करने का मौका मिला। और भीम सेन की फ़िल्म दूरियाँ में मेरा लिखा गीत "ज़िंदगी,ज़िंदगी मेरे घर आना ज़िंदगी" खासा प्रसिद्ध हुआ था। जहाँ तक मेरे संघर्ष करने का सवाल है तो मुझे एक दिन,एक पल के लिए भी संघर्ष नहीं करना पड़ा। मैंने सारे हीं गीत,सारी हीं गज़लें अपने हिसाब से लिखीं।" अब जब किसी की शायरी में हीं इतना दम हो तो उसे संघर्ष क्यों करना पड़े। मस्तमौला मिजाज के "फ़ाकिर" साह्ब को दूसरे शायरों की तरह हीं शराब का बेहद शौक था। उनका मानना था कि "शराब" और "शायर" में एक गहरा रिश्ता होता है। खुद की आदतों का जिक्र आने पर कहते थे "जब तक मैं दो प्याले शराब के निगल न जाऊँ तब तक मेरे जहन में शायरी की पैदाईश नहीं होती। लगभग हर गज़ल का मतला मैं शराब के नशे में हीं लिखता हूँ,लेकिन इस बात का ध्यान रखता हूँ कि गज़ल के बाकी शेर अगली सुबह हीं लिखूँ, जब नशा पूरी तरह उतर चुका हो।" यह तो हुई एक शायर की दास्तान अब इन शायर के कहे अनुसार "शराब" पीनी चाहिए या नहीं,यह तो मैं नहीं कह सकता,लेकिन इतना जरूर कह सकता हूँ कि मदहोशी की हालत में हीं दर्द और खुमार का अनुभव होता है। अब आज की गज़ल को हीं देखिए, दर्द और ग़म की तुलना शराब के नशे से की गई है। "जो ग़म-ए-दोस्त में नशा है शराबों में नहीं" - अगर गौर से आप इस पंक्ति को सुनेंगे तो आपको दुगने नशा का अनुभव होगा। शायर ने गम-ए-दोस्त, गम-ए-हबीब की तुलना शराब से करके शराब को ऊँचा स्थान दे दिया है। वहीं इस गज़ल के मक़ते में शराब को उसकी औकात भी बताई गई है। शराब की औकात या फिर शराब का ओहदा जो भी हो,लेकिन शायरों के दिल में शराब ने अपना एक अलग हीं मुकाम बना रखा है,फ़िर चाहे वह मुकाम अच्छा हो या फिर बुरा। यकीन न हो तो "फ़ाकिर" साहब का यह शेर हीं देख लीजिए:

हम तो समझे थे कि बरसात में बरसेगी शराब,
आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया।


"रेयर मोमेंट्स- मोहम्मद रफ़ी" से ली गई आज की गज़ल को संगीत से सजाया है "ताज अहमद खान" ने। वक्त आने पर कभी इनकी भी बात करेंगे अभी तो बस इस गज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं:

एक हीं बात ज़माने की किताबों में नहीं,
जो ग़म-ए-दोस्त में नशा है,शराबों में नहीं।

हुस्न की भीख न माँगेंगे न जलवों की कभी,
हम फ़क़ीरों से मिलो खुलके, हिजाबों में नहीं।

हर जगह फिरते हैं आवारा ख्यालों की तरह,
यह अलग बात है हम आपके ख्वाबों में नहीं।

न डुबो सागर-औ-मीना में ये ग़म ऐ "फ़ाकिर",
कि मक़ाम इनका दिलों में है शराबों में नहीं।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुझे गुस्सा दिखाया जा रहा है,
___ को चबाया जा रहा है ...


आपके विकल्प हैं -
a) मुस्कराहट, b) मोहब्बत, c) तबस्सुम, d) बनावट

इरशाद ....

पिछली महफ़िल के साथी-

पिछली महफिल का शब्द था शबनम और शेर कुछ यूं था-

कितने दिन के प्यासे होंगें यारों सोचो तो,
शबनम का कतरा भी जिनको दरिया लगता है...

जवाब दिया एक बार फिर नीलम जी ने पर कोई शेर अर्ज नहीं किया, हालाँकि मनु जी, सुमित जी आदि सभी महफिल में मौजूद थे पर जाने क्यों इस बार न "इरशाद" हुई न "वाह वाह". शायद शब्द मुश्किल लगा होगा. पर पिछली महफ़िल की शान बन कर आये कुलदीप अंजुम साहब जो इत्तेफ्फाकन "खुमार" साहब के मुरीद निकले, उन्होंने खुमार साहब पर कुछ बेशकीमती जानकारी भी हमें दी जिसके लिए हम उनके आभारी हैं, अंजुम जी यदि आपके पास उनके फ़िल्मी गीतों का संकलन मौजूद हो तो हमें उपलब्ध कराएँ. ताकि अन्य श्रोता भी उन्हें सुनकर अनद उठा सकें.
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर सोमवार और गुरूवार दो अनमोल रचनाओं के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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