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Saturday, January 22, 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२६)- प्रदीप चटर्जी नाम से कोई गीतकार नहीं -हरमंदिर सिंह 'हमराज़'

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में एक बार फिर आप सभी का हम स्वागत करते हैं। इस साप्ताहिक स्तंभ में हम साधारणतः 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' पेश किया करते हैं। कई बार यादों के ख़ज़ानें तो नहीं शामिल हो पाते, लेकिन जो भी पेश होता है वो ईमेल के बहाने से ही होता है। हर बार की तरह इस बार भी हम आप सभी से गुज़ारिश करते हैं कि इस शीर्षक को सार्थक करने के लिए आप अपने जीवन से जुड़ी किसी यादगार घटना या संस्मरण हमारे साथ बांटिये जिसे हम इस मंच के माध्यम से पूरी दुनिया के साथ बांट सके। ईमेल भेजने के लिए हमारा आइ.डी है oig@hindyugm.com।

दोस्तों, इसमें कोई शक़ नहीं कि इंटरनेट ने तथ्य तकनीकी और दूरसंचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी है, और ऐसी क्रांति आई है, ऐसा बदलाव लाया है कि अब इंटरनेट के बिना सब काम काज जैसे ठप्प सा हो जाता है। लेकिन जिस तरह से हर अच्छे चीज़ के साथ कुछ बुरी चीज़ें भी समा जाती हैं, ऐसा ही कुछ इंटरनेट के साथ भी है। जी नहीं, हम अश्लील वेबसाइटों की बात नहीं कर रहे; हम तो बात कर रहे हैं ग़लत जानकारियों की जो इंटरनेट पर अपलोड होते रहते हैं। दरअसल बात यह है कि इंटरनेट पर हर कोई अपना तथ्य अपलोड कर सकता है, अपने ब्लॊग या वेबसाइट या किसी सोशल नेटवर्किंग् साइट के ज़रिए। ऐसे में किसी भी दी जा रही जानकारी की सत्यता पर प्रश्न-चिन्ह लग जाता है। अब कैसे हर बात पर यकीन करें कि जो बात हम किसी वेबसाइट पर पढ़ रहे हैं, वह सच भी है या नहीं! तभी तो 'रिसर्च-पेपर्स' या डाक्टरेट की थीसिस में इंटरनेट से प्राप्त तथ्यों का रेफ़रेन्स मान्य नहीं होता। हम भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आलेख लिखते वक़्त जब इंटरनेट पर शोध करते हैं किसी गीत या फ़िल्म पर, तब हमें भी कुछ गड़बड़ी वाले तथ्य नज़र आ जाते हैं, और ऐसा नहीं है कि हम ख़ुद कभी ग़लतियाँ नहीं करते, हमसे भी कई बार जाने-अंजाने ग़लतियाँ हो जाती हैं, और वही बात हम पर भी लागू हो जाती है।

दोस्तों, पिछले दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चितलकर रामचन्द्र पर केन्द्रित लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' आयोजित की गई थी, जिसमें फ़िल्म 'पैग़ाम' का गीत शामिल हुआ था, जिसके बोल थे "दौलत ने पसीने को आज लात है मारी", जिसके गीतकार का नाम हमने बताया था कवि प्रदीप। अब क्योंकि कुछ वेबसाइटों पर इस फ़िल्म के गीतकार का नाम प्रदीप चटर्जी दिया गया है, तो हमारे कुछ मित्रों ने भी पहेली का जवाब देते वक़्त प्रदीप चटर्जी का नाम लिखा, जिस वजह से काफ़ी संशय पैदा हो गया गीतकार के नाम का। हम भी यकीन के साथ नहीं कर पाये कि क्या कवि प्रदीप और प्रदीप चटर्जी एक ही इंसान हैं या दो अलग। इंटरनेट पर काफ़ी खोजबीन करने के बाद भी जब मेरे हाथ कुछ ठोस ना लगा, तो मैंने सोचा कि क्यों ना उस इंसान से मदद माँगी जाये जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी हिंदी फ़िल्म गीत कोष तैयार करने में लगा दी है! जी हाँ, ठीक समझे आप, मैं हरमंदिर सिंह 'हमराज़' साहब की ही बात कर रहा हूँ। उन्होंने १९३१ से लेकर शायद १९९० तक के सभी फ़िल्मों के सभी गीतों को 'गीत-कोष' के रूप में प्रकाशित किया है और दशकों से 'लिस्नर्स बुलेटिन' नामक पत्रिका भी चला रहे हैं कानपुर से। तो मैंने जब हमराज़ जी को ईमेल भेजकर जानना चाहा कि आख़िर कवि प्रदीप और प्रदीप चटर्जी का क्या माजरा है और 'नास्तिक' और 'पैग़ाम' जैसी फ़िल्मों के गीतकार कौन हैं, तो उन्होंने तुरंत मेरे ईमेल का जवाब देते हुए कुछ ऐसा लिखा ---

"प्रदीप चटर्जी के नाम से कोई गीतकार १९३१ से लेकर अब तक इस फ़िल्म इण्डस्ट्री में नहीं हुए हैं। वो कवि प्रदीप ही थे, दादा साहब फाल्के सम्मानित, जिन्होंने 'नास्तिक' और 'पैग़ाम' में गीत लिखे हैं। यहाँ हर कोई आज़ाद है इंटरनेट पर लोगों को गुमराह करने के लिए। लखनऊ में एक डॊ. डी. सी. अवस्थी रहते हैं जिन्हें कवि प्रदीप पर शोध करने के लिए डाक्टरेट की डिग्री दी गई है।"

तो दोस्तों, आशा है आप सभी का संशय अब दूर हो गया होगा, प्रदीप चटर्जी नामक कोई गीतकार नहीं है, प्रदीप के नाम से जितने भी गीत आते हैं, वो सब कवि प्रदीप के ही लिखे हुए हैं, जिनका जन्म मध्य प्रदेश में हुआ है और जो बंगाली तो बिल्कुल नहीं हैं, इसलिए चटर्जी होने का सवाल ही नहीं। हाँ, आपकी जानकारी के लिए यह बता दूँ कि पंडित प्रदीप चटर्जी एक शास्त्रीय गायक ज़रूर हैं और यूट्युब में आप उनका गायन सुन सकते हैं। ख़ैर, अब आपको एक गीत सुनवाने की बारी है। कवि प्रदीप का लिखा एक ऐसा गीत आज सुनिए जिसे आप ने बहुत दिनों से नहीं सुना होगा, ऐसा हम दावा करते हैं। क्योंकि कवि प्रदीप का उल्लेख सी. रामचन्द्र पर केन्द्रित शृंखला में आयी है, इसलिए आज जिस गीत को हमने चुना है, उसे कवि प्रदीप ने लिखा और सी. रामचन्द्र ने ही स्वरबद्ध किया है। यह साल १९६० की फ़िल्म 'आँचल' का गीत है जिसे आशा भोसले, सुमन कल्याणपुर और सखियों ने गाया है। "नाचे रे राधा", यह एक नृत्य गीत है, बड़ा ही मीठा गाना है, हमें उम्मीद है कि गीत सुनते वक़्त आपके क़दम भी थिरक उठेगे, मचल उठेंगे। गीत की एक और खासियत है कि इसके दो वर्ज़न हैं, दोनों में वही आवाज़ें हैं लेकिन बोल अलग हैं। आइए ये दोनों वर्ज़न सुना जाये एक एक करके। गीत का संगीत संयोजन भी कमाल का है, बेहद सुरीला है। 'आँचल' वसंत जोगलेकर निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, नंदा, निरुपा रॊय और ललिता पवार। नंदा को इस फ़िल्म के लिए फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था और ललिता पवार भी इसी पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थीं।

गीत - नाचे रे राधा -१ (आँचल)


गीत - नाचे रे राधा -२ (आँचल)


तो दोस्तों, ये था इस हफ़्ते का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', आपको यह गीत सुनकर कैसा लगा ज़रूर बताइएगा, और हमें ईमेल ज़रुर कीजिएगा अपने सुझावों और अपने जीवन की किसी यादगार घटना के साथ, oig@hindyugm.com के पते पर।

Thursday, January 13, 2011

मैं हूँ एक खलासी, मेरा नाम है भीमपलासी....अन्ना के इस गीत को सुनकर आपके चेहरे पर भी मुस्कान न आये तो कहियेगा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 570/2010/270

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ५७०-वीं कड़ी के साथ हम हाज़िर हैं और जैसा कि इन दिनों आप सुन और पढ़ रहे हैं कि सी. रामचन्द्र के संगीत और गायकी से सजी लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' जारी है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर। आज हम आ गये हैं इस शृंखला के अंजाम पर। आज इसकी अंतिम कड़ी में आपको सुनवा रहे हैं चितलकर और साथियों का गाया एक और मशहूर गीत। सी. रामचन्द्र के संगीत के दो पहलु थे, एक जिसमें वो शास्त्रीय और लोक संगीत पर आधारित गानें बनाते थे, और दूसरी तरफ़ पाश्चात्य संगीत पर उनके बनाये हुए गानें भी गली गली गूंजा करते थे। इस शृंखला में भी हमने कोशिश की है इन दोनों पहलुओं के गानें पेश करें। आज की कड़ी में सुनिए उसी पाश्चात्य अंदाज़ में १९५० की फ़िल्म 'सरगम' से एक हास्य गीत "मैं हूँ एक खलासी, मेरा नाम है भीमपलासी"। एक गज़ब का रॊक-एन-रोल नंबर है जिससे आज ६० साल बाद भी उतनी ही ताज़गी आती है। माना जाता है कि किसी हिंदी फ़िल्म में रॊक-एन-रोल का प्रयोग होने वाला यह पहला गाना था। और वह भी उस समय जब रॊक-एन-रोल विदेश में भी उतना लोकप्रिय नहीं माना जाता था। राज कपूर, रेहाना और अन्य कलाकारों पर फ़िल्माया यह एक नृत्य गीत है। पी. एल. संतोषी ने फ़िल्म के गीत लिखे थे।

'सरगम' फ़िल्म का हर एक गीत अपने आप में एक प्रयोग था। इसी फ़िल्म का लता, चितलकर और साथियों का गाया "मौसमे बहार यार, दिल है गुलज़ार यार" में अरबी शैली को अपनाया गया था। लता, रफ़ी और चितलकर के गाये "सबसे बड़ा रुपैया" में लोक धुनों पर विदेशी रिदम का मिश्रण महसूस किया जा सकता है। इस फ़िल्म में एक और पहला प्रयोग था लता-चितलकर के गाये "मोम्बासा" गीत में, जिसमें सी. रामचन्द्र ने अफ़्रीकन संगीत का इस्तेमाल किया। १९५० में ही एक और फ़िल्म आयी थी 'संगीता', जिसमें भी उन्होंने देशी और विदेशी साज़ों के फ़्युज़न से लता-चितलकर का गाया "गिरगिट की तरह रंग बदलते फ़ैशन वाले बाबू" अपने आप में एक नया प्रयोग था। १९५१ में फ़िल्म 'ख़ज़ाना' में लता, चितलकर और साथियों ने गाया था "बाबड़ी बूबडी बम", जिसमें लैटिन अमेरिकी और कैरिबीयन बीट्स का प्रयोग था। इस तरह से बहुत सारे प्रयोग सी. रामचन्द्र ने किए हैं। ऐसे में उन्हें एक क्रांतिकारी संगीतकार के रूप में सम्मानित करना बहुत ही सटीक रहा। आज सी. रामचन्द्र के गये हुए ३० साल होने हो गये, लेकिन उनके रचे सदाबहार नग़में आज भी उनकी यादों को बिल्कुल ताज़ा रखे हुए है। दोस्तों, हमें उम्मीद है कि सी. रामचन्द्र के स्वरबद्ध और चितलकर के गाये इन गीतों का आपने पिछले दो हफ़्तों से आनंद लिया होगा। यह शृंखला आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा ईमेल के द्वारा। हमारा ईमेल आइडी है oig@hindyugm.com इसी के साथ अब सी. रामचन्द्र को समर्पित इस शृंखला को समाप्त करने की हमें इजाज़त दीजिए, और सुनिए यह मस्ती भरा गीत। 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' के साथ हम फिर हाज़िर होंगे शनिवार की शाम, तब तक के लिए, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि 'सरगम' के नाम पर सी. रामचन्द्र ने बांद्रा में बनवाए अपने बंगले का नामकरण किया था। वह बंगला तो बिक गया था, लेकिन बाद में पुणे के जिस बंगले में उनका परिवार रहता है, उसका नाम भी 'सरगम' है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 11/शृंखला 08
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - लता की आवाज़ जैसे जादू है इस गीत में

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - संगीतकार कौन हैं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह..हमारी ये शृंखला बेहद शानदार रहे, अमित जी ने शरद जी का बहुत जम कर मुकाबला किया, मगर उनके ९ अंकों पर शरद जी के १० अंक भारी पड़े, तो इस कारण एक शृंखला और शरद जी के नाम हुई, पर इस शृंखला में हमें दीपा जी, विजय दुआ और हिन्दुस्तानी जी जैसे नए योधा मिले, जो अगर इसी तरह चलते रहे तो आने वाली श्रृंखलाएं जबरदस्त होंगीं ये तय है....वैसे हमारे श्याम कान्त जी अभी तक गायब ही हैं, वैसे हम आपको बताते चलें कि अब तक श्याम जी ४, शरद जी ३ और अमित जी १ शृंखला जीत चुके हैं.....नयी शृंखला के लिए सभी को शुभकामनाएँ...

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, January 10, 2011

तुम मेरी जिंदगी में तूफ़ान बन कर आये.....कहीं लता जी का इशारा चितलकर पर तो नहीं था ?

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 567/2010/267

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में आप सभी का एक बार फिर बहुत बहुत स्वागत है। सी. रामचन्द्र के स्वरबद्ध और गाये गीतों की शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' इन दिनों आप सुन और पढ़ रहे हैं। कल हमने आपसे वादा किया था कि आज की कड़ी में हम आपको सी. रामचन्द्र और लता मंगेशकर के बीच के अनबन के बारे में बताएँगे। दोस्तों, राजु भारतन लिखित लता जी की जीवनी को पढ़ने पर पता चला कि इस किताब के लिखने के दौरान भारतन साहब सी. रामचन्द्र से मिले थे और सी. रामचन्द्र ने कहा था, "she wanted to marry me, but i was already married.... all i wanted was some fun, but that was not to be.." इसी किताब में "ऐ मेरे वतन के लोगों" के किस्से के बारे में भी लिखा गया है कि शुरु शुरु में यह एक डुएट गीत के रूप में लिखा गया था जिसे लता और आशा, दोनों को मिलकर गाना था। लेकिन जिस दिन मंगेशकर बहनों को दिल्ली जाना था उस फ़ंक्शन के लिए, आशा जी ने सी. रामचन्द्र को फ़ोन कर यह कह दिया कि दीदी अकेली जा रही हैं और वो इससे ज़्यादा और कुछ नहीं कहना चाहतीं। इसी गीत को प्रस्तुत करते हुए दिलीप कुमार ने गायिका और गीतकार के नामों की तो घोषणा कर दी लेकिन संगीतकार का नाम बताना भूल गए। इस बात से सी. रामचन्द्र आगबबूला होकर जब बैकस्टेज पर दिलीप साहब को टोका तो दिलीप साहब ने बस इतना ही कहा कि "अन्ना, मुझे नहीं मालूम था कि आपने इस गीत की धुन बनाई है"। राजु भारतन के किताब के अलावा सी. रामचन्द्र की मराठी में लिखी आत्मकथा 'माझ्या जीवांची सरगम' में उन्होंने बड़ी कुशलता के साथ उस "गायिका" का नाम हटा दिया है लेकिन उस आत्मकथा को पढ़ने वाला हर इंसान समझ सकता है कि इशारा किसकी तरफ़ है। उस आत्मकथा में जिस "सीता" का उन्होंने उल्लेख किया है, वो लता जी के सिवा और कोई नहीं है, यह बात भी हर कोई समझ सकता है। यह तो थी एक तरफ़ की कहानी। उधर लता जी के चाहनेवालों का यह मानना है कि सी. रामचन्द्र ने ही लता को एक बार प्रेम निवेदन किया था जिसे लता ने ठुकरा दिया था। इस अशालीन प्रस्ताव से गुस्से में आकर लता जी ने उनके साथ वही सलूक करना ठीक समझा जो उन्होंने नय्यर साहब और अपनी बहन आशा के साथ किया था। लता जी कभी शादी नहीं करना चाहती थी और ख़ास उस समय तो बिल्कुल नहीं जब उनके कंधों पर उनके पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी थी। दोस्तों, ये सब बातें जो अभी मैंने कहे, वो सब सुनी और पढ़ी हुई बातें हैं। असलियत क्या है यह किसी को भी नहीं मालूम। और हमें भी क्या लेना देना इन महान कलाकारों के व्यक्तिगत जीवन से। हमें तो इसी बात से ख़ुश रहना चाहिए कि क्या क्या नायाब गीत इन दोनों ने हमें दिए हैं।

दोस्तों, आज के अंक के लिए हमने जिस लता-चितलकर डुएट को चुना है, वह है फ़िल्म 'शगुफ़ा' का। १९५३ में एच. एस. रवैल ने दो ऐसी फ़िल्में निर्देशित की जिनमें संगीत सी. रामचन्द्र का था। इनमें से एक थी 'लहरें' जिसमें किशोर कुमार और श्यामा मुख्य कलाकार थे, और दूसरी फ़िल्म थी 'शगुफ़ा'। यह अभिनेता प्रेम नाथ की ही फ़िल्म थी उन्ही के बैनर पी. एन. फ़िल्म्स तले। प्रेम नाथ और बीना रॊय अभिनीत इस फ़िल्म में राजेन्द्र कृष्ण और सी. रामचन्द्र का फिर एक बार साथ हुआ और फिर एक बार जन्म लिए एक से एक सुमधुर गीत। इस फ़िल्म के अधिकतर गीत लता जी के गाये हुए थे जैसे कि "छीन सके तो छीन ले ख़ुशियाँ मेरे नसीब की, लायेगी रंग एक दिन आह किसी ग़रीब की", लोक शैली में रची "छोटा सा देखो मेरा नादान बालमा", हल्के फुल्के अंदाज़ में बना "ये कैसी ख़ुशी है ये कैसा नशा है, मुझे क्या हुआ है", जुदाई के दर्द में डूबी "घिर घिर आयी कारी बदरिया", और मिलन के रंग में रंगी "ये हवा ये समा चांदनी है जवाँ"। गीता दत्त और साथियों नें गाया "मेरी बहकी बहकी चाल" जिसका भी एक अलग ही मज़ा है। गीता दत्त ने सुंदर के साथ मिलकर एक हास्य क़व्वाली "कैसे खेल मोहब्बत में खेलें सितमगर तेरे लिए" ने एक बार फिर राजेन्द्र कृष्ण को हास्य गीतों के बादशाह के रूप में प्रमाणित किया। और इस फ़िल्म का जो ख़ास गीत रहा वह था लता और चितलकर का गाया आज का प्रस्तुत युगल गीत "तुम मेरी ज़िंदगी में तूफ़ान बनके आये"। ऐसा लगता है जैसे इस गीत के बोल भी लता और चितलकर के तरफ़ ही इशारा कर रहे हों। तो लीजिए पेश-ए-ख़िदमत है फ़िल्म 'शगुफ़ा' का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचद्र ने 'Academy of Indian Music' नामक संस्था भी चलाई, जहाँ प्रमिला दातार और कविता कृष्णमूर्ति उनकी शिष्याएँ रहीं।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -चितलकर और साथियों का गाया एक जोश भरा गीत है ये.

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म के निर्देशक कौन थे - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
बहुत खुशी हो रही है देखकर कि नए प्रतिभागियों कमान संभाल रखी है....अमित जी दीपा जी और हिन्दुस्तानी जी को बहुत बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, January 6, 2011

ऐ आँख अब ना रोना, रोना तो उम्रभर है...कितना दर्दीला है ये युगल गीत लता चितलकर का गाया

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 565/2010/265

सी. रामचन्द्र के स्वरबद्ध किए और उन्हीं के गाये हुए गीतों से सजी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' की पाँचवीं कड़ी में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों, अब तक इस शृंखला में हमने चितलकर की आवाज़ में दो एकल गीत सुनें और बाक़ी के दो गीत उन्होंने लता जी के साथ गाया था। आइए आज एक बार फिर एक मशहूर लता-चितलकर डुएट सुना जाये। यह गीत है १९४९ की फ़िल्म 'सिपहिया' का, जिसके बोल हैं "ऐ आँख अब ना रोना, रोना तो उम्रभर है, पी जाएँ आँसूओं को, बस वो जिगर जिगर है"। गीतकार हैं राम चतुरवेदी। आइए आज अपको एक फ़ेहरिस्त दी जाये लता-चितलकर डुएट्स की।

अलबेला (१९५१) - भोली सूरत दिल के खोटे, महफ़िल में मेरी कौन ये दीवाना आया, मेरे दिल की घड़ी करे टिक टिक टिक, शाम ढले खिड़की तले, शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के।
आज़ाद (१८५४) - कितना हसीं है मौसम।
बारिश (१९५७) - कहते हैं प्यार किस को पंछी, फिर वही चाँद वही हम वही तन्हाई।
भेदी बंगला (१९४९) - आँसू ना बहाना कांटों भरी राह से।
हंगामा (१९५२) - झूम झूम झूम राही प्यार की दुनिया, उल्फ़त की ज़िंदगी के साल हो हज़ार।
झमेला (१९५३) - देखो जी हमारा दिल लेके दग़ा नहीं, सुनोजी सुनो तुम से हुई है मुलाक़ात, बलखाती इठलाती आई है जो।
ख़ज़ाना (१९५१) - बाबडी-बूबडी जल गई दुनिया मिल गये, दो दिलवालों का अफ़साना ऐ चाँद किसी।
नदिया के पार (१९४९) - ओ गोरी ओ छोरी कहाँ चली कहाँ।
नास्तिक (१९५४) - ज़ोर लगाले ज़माने कितना ज़ोर लगाले, झुकती है दुनिया झुकानेवाला चाहिए।
संगीता (१९५०) - गिरगिट की तरह हैं रंग बदलते।
सरगम (१९५०) - बुड्ढ़ा है घोड़ा लाल है लगाम, वो हमसे चुप हैं, मौसम-ए-बहार आये दिल में, मैं हूँ अलादीन मेरे पास चराग़ तीन, मोमबासा रात मिलन की, भैया सब से भला रुपैया।
शगुफ़ा (१९५३) - तुम मेरी ज़िंदगी में तूफ़ान बनके।
शिनशिना की बबला बू (१९५२) - कौन है ऐसा महफ़िल में जो ना तेरा, शिन शिना की बबला बू, ये हँसी बाबा ये ख़ुशी बाबा, ये सिमटी कली कोई ले रस की कली ले।
सिपहिया (१९४९) - ऐ आँख अब ना रोना, लगा है कुछ ऐसा निशाना।
उस्ताद पेड्रो - तेरे दिल पे जादू कर गया।

दोस्तों, इस फ़हरिस्त को पढ़कर आपने ग़ौर किया होगा कि रोमांटिक गीतों के साथ साथ बहुत से गानें हास्य और मस्ती भरे छेड़ छाड़ वाले अंदाज़ के भी हैं और उस ज़माने में सी. रामचन्द्र इस तरह के गीतों के लिए जाने जाते थे। फ़िल्म 'सिपहिया' की बात करें तो मधुबाला और याकूब अभिनीत इस फ़िल्म में लता जी की गाई रचनाओं में शामिल हैं दर्द भरी धुन में कम्पोज़ की हुई "दर्द लगा के ठेस लगा के चले गये" और "आराम के ये साथी क्या-क्या", लेकिन इन गीतों की तज़ें कुछ ख़ास मुकाम हासिल ना कर सकी, पर फ़िल्म का सबसे मशहूर गीत "ऐ आँख अब ना रोना" और गज़ल शैली में गाई हुई "हँसी हँसी न रही और ख़ुशी ख़ुशी ना रही" में सी. रामचन्द्र फिर अपने उसी कामयाबी भरे मधुर अंदाज़ में लौटते हैं। लता, चितलकर के स्वर में "लगा है कुछ ऐसा निशाना" में सी. रामचन्द्र ने दादरा ताल पर कव्वाली के ठेके देकर अभिनव प्रयोग दर्शाया है। तो आइए लता मंगेशकर और चितलकर की इस जोड़ी के नाम आज का यह अंक करें और सुनें यह मीठा दर्द भरा गीत। फिर से वही बात दोहराता हूँ कि न जाने क्यों दर्दीले गीत ज़्यादा मीठे लगते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि 'अनारकली' के संगीत-निर्माण के दौरान सी. रामचन्द्र अपनी फ़िल्म 'झांझर' का भी निर्माण कर रहे थे। 'अनारकली' के निर्माता ने उन पर आरोप लगाया कि 'झांझर' की वजह से सी. रामचन्द्र 'अनारकली' के साथ अन्याय कर रहे हैं। लेकिन जब दोनों फ़िल्में रिलीज़ हुईं, तो 'अनारकली' के गीतों ने इतिहास रचा जबकि 'झांझर' पिट गई।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 06/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इतना सुनने के बाद गीत पहचानना मुश्किल नहीं.

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - इस गीत में शहनाई किस अन्य संगीतकार ने बजायी है - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर बहुत बढ़िया शरद जी...अमित जी और दीपा जी को भी बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Tuesday, January 12, 2010

मेरे पिया गए रंगून, किया है वहां से टेलीफून...मोबाइल क्रांति के इस युग से काफी पीछे चलते हैं इस गीत के जरिये

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 312/2010/12

'स्वरांजली' की दूसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। दोस्तों, 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की इस लघु शृंखला में इन दिनों हम याद कर रहे हैं फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के उन कलाकारों को जिनका इस जनवरी के महीने में जन्मदिन या स्मृति दिवस होता है। गत ५ जनवरी को संगीतकार सी. रामचन्द्र जी की पुण्यतिथि थी। आज हमारी 'स्वरांजली' उन्ही के नाम! जैसा कि हमने पहली भी कई बार उल्लेख किया है कि सी. रामचन्द्र उन पाँच संगीतकारों में शुमार पाते हैं जिन्हे फ़िल्म संगीत के क्रांतिकारी संगीतकार होने का दर्जा दिया गया है। ४० के दशक में जब फ़िल्म संगीत मुख्यता शास्त्रीय संगीत, लोक संगीत और सुगम संगीत पर ही आधारित हुआ करती थी, ऐसे में सी. रामचन्द्र जी ने पाश्चात्य संगीत को कुछ इस क़दर हिंदी फ़िल्मी गीतों में इस्तेमाल किया कि वह एक ट्रेंडसेटर बन कर रह गया। यह ज़रूर है कि इससे पहले भी पाश्चात्य साज़ों का इस्तेमाल होता आया है, लेकिन गीतों को पूरा का पूरा एक वेस्टर्ण लुक सी. रामचन्द्र जी ने ही पहली बार दिया था। और देखिए, जहाँ एक तरफ़ उनके "शोला जो भड़के", "संडे के संडे", "ईना मीना डीका", "मिस्टर जॊन बाबा ख़ान" जैसे गीत हैं, वहीं दूसरी तरफ़ कोमल से कोमल शास्त्रीय अंदाज़ वाले गानें भी बेशुमार हैं जैसे कि "धीरे से आजा री अखियन में", "जाग दर्द-ए-इश्क़ जाग", "जा री जा री ओ कारी बदरिया", "तू छूपी है कहाँ मैं तरसता यहाँ" वगेरह। कहने का अर्थ यह कि उन्होने अपने आप को वर्सेटाइल बनाए रखा और किसी एक स्टाइल के साथ ही चिपके नहीं रहे। आज उन्हे श्रद्धांजली स्वरूप हमने जिस गीत को चुना है उसे सुनते ही आपके चेहरे पर मुस्कुराहट खिल जाएगी। यह है सन् १९४९ की फ़िल्म 'पतंगा' का 'ऒल टाइम फ़ेवरिट' "मेरे पिया गए रंगून, किया है वहाँ से टेलीफ़ून"।

१९४९ में एच. एस. रवैल पहली बार फ़िल्म निर्देशन के क्षेत्र में उतरे 'वर्मा फ़िल्म्स' के बैनर तले बनी इसी फ़िल्म, यानी कि 'पतंगा' के साथ। फ़िल्म 'शहनाई' की सफलता के बाद सी. रामचन्द्र और गीतकार राजेन्द्र कृष्ण की जोड़ी जम चुकी थी। इस फ़िल्म में भी इसी जोड़ी ने गीत-संगीत का पक्ष संभाला। 'पतंगा' के मुख्य कलाकार थे श्याम और निगार सुल्ताना। याकूब और गोप, जिन्हे भारत का लौरल और हार्डी कहा जाता था, इस फ़िल्म में शानदार कॊमेडी की। 'शहनाई' की तरह इस 'रोमांटिक कॊमेडी' फ़िल्म को भी सी. रामचन्द्र ने ख़ूब अंजाम दिया। ख़ास कर आज का प्रस्तुत गीत तो जैसे एक कल्ट सॊंग् बन कर रह गया। टेलीफ़ोन पर बने गीतों का ज़िक्र इस गीत के बिना अधुरी समझी जाएगी। बल्कि युं कहें कि टेलीफ़ोन पर बनने वाला यह सब से लोकप्रिय गीत रहा है आज तक। शम्शाद बेग़म और स्वयं चितलकर का गाया हुआ यह गीत एक नया कॊन्सेप्ट था फ़िल्म संगीत के लिए (सी.रामचन्द्र को हम पहले ही क्रांतिकारी करार दे चुके हैं)। भले इस गीत को सुन कर ऐसा लगता है कि नायक और नायिका एक दूसरे से टेलीफ़ोन पर बात करे हैं, लेकिन असल में यह गीत एक स्टेज शो का हिस्सा है। उन दिनों बर्मा में काफ़ी भारतीय जाया करते थे, शायद इसीलिए रंगून शहर का इस्तेमाल हुआ है। (द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का रंगून से गहरा नाता था)। आज के दौर में शायद ही रंगून का ज़िक्र किसी फ़िल्म में आता होगा। फ़िल्म 'पतंगा' के दूसरे हल्के फुल्के हास्यप्रद गीतों में शामिल है शमशाद बेग़म का गाया "गोरे गोरे मुखड़े पे गेसू जो छा गए", "दुनिया को प्यारे फूल और सितारे, मुझको बलम का नाम", शमशाद और रफ़ी का गाया डुएट "बोलो जी दिल लोगे तो क्या क्या दोगे" और "पहले तो हो गई नमस्ते नमस्ते", शमशाद और चितलकर का गाया एक और गीत "ओ दिलवालों दिल का लगाना अच्छा है पर कभी कभी"। दोस्तों, यह वह साल था जिस साल लता मंगेशकर 'महल' और 'बरसात' जैसी फ़िल्मों में गीत गा कर चारों तरफ़ हलचल मचा दी थी। इस फ़िल्म में उन्होने भी कुछ गीत गाए। एक गाना था शमशाद बेग़म के साथ "प्यार के जहान की निराली सरकार है", और तीन दर्द भरे एकल गीत भी गाए, जिनमें जो सब से ज़्यादा हिट हुआ था वह था "दिल से भुला दो तुम हमें, हम ना तुम्हे भुलाएँगे"। दोस्तों, आज सी. रामचन्द्र जी को श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए हम भी यही कहते हैं कि आप ने जो संगीत हमारे लिए रख छोड़ा है, उसे हमने अभी तक कलेजे से लगाए रखा है, और आनेवाली तमाम पीढ़ियाँ भी इन्हे सहज कर रखेंगी ज़रूर! चलिए माहौल को अब थोड़ा सा हल्का करते हैं, और देहरादून से रंगून के बीच की इस बातचीत का मज़ा लेते हैं।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

अंगडाई लेकर जागी सुबह,
फिर किलकारियां गूंजी आँगन में,
उसकी पायल की झंकार सुन,
नींद से जागा है मेरा संसार....

अतिरिक्त सूत्र - इस संगीतकार की पुण्यतिथि ६ जनवरी है

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी लौटे हैं २ अंकों के लिए बधाई, अनुराग जी बिलकुल सही कहा आपने...इंदु जी आशा है अब तबियत बेहतर होगी आपकी

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, September 11, 2009

हम तो जानी प्यार करेगा, नहीं डरेगा....चितलकर और आशा ने जमाया जम कर रंग

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 199

'ओल्ड इज़ गोल्ड' में जारी है '१० गायक और एक आपकी आशा'। आशा भोंसले की आवाज़ वो सुरीली आवाज़ है, जानी पहचानी सी, कुछ नई कुछ पुरानी सी, कभी कोमल कभी बुलंद सी। आवाज़ वही पर अंदाज़ हमेशा नया। आशा जी की आवाज़ और अंदाज़ सिर्फ़ हिंदुस्तान में ही नहीं, विदेशों में भी ख़ूब लोकप्रिय हुआ। हाल में उन्होने कई विदेशी बैंड्स से साथ मिल कर 'पॊप ऐल्बम्स' में गाने गाए हैं, जो दुनिया भर में ख़ूब सुने गए। आशा जी की आवाज़ को पाने के लिए संगीतकार और फ़िल्मकार आज भी आमादा रहते हैं जैसा कि गुज़रे ज़माने के संगीतकार और फ़िल्मकार रहते थे। फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कारों की बात करें तो जिन गीतों के लिए आशा जी को सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का यह पुरस्कार मिला था, उनकी सूची इस प्रकार है -

१९६७ - ग़रीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा (दस लाख)
१९६८ - परदे में रहने दो (शिकारी)
१९७१ - पिया तू अब तो आजा (कारवाँ)
१९७२ - दम मारो दम (हरे रामा हरे कृष्णा)
१९७३ - होने लगी है रात (नैना)
१९७४ - चैन से हमको कभी आप ने जीने ना दिया (प्राण जाए पर वचन न जाए)
१९७८ - ये मेरा दिल यार का दीवाना (डॊन)

इसके बाद आशा जी ने यह पुरस्कार लेने से इंकार कर दिया था। 'उमराव जान' के गानें और 'इजाज़त' का गीत "मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है" के लिए उन्हे दो बार राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। फ़िल्म जगत में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए आशा भोंसले को भारत सरकार ने दादा साहब फालके पुरस्कार और पद्मविभुषण से सम्मानित किया है।

आशा जी के गाए युगल गीतो की इस विशेष शृंखला में १० में से ८ गायकों के साथ उनके गाए युगल गीत आप सुन चुके हैं, आज बारी है एक बार फिर से एक गायक-संगीतकर की। गायक चितलकर और संगीतकार सी. रामचन्द्र। आशा और सी. रामचन्द्र के साथ का सब से महत्वपूर्ण पड़ाव रहा है फ़िल्म 'नवरंग'। इस फ़िल्म में चितलकर ने आशा जी के साथ अपनी आवाज़ भी मिलाई "कारी कारी अंधियारी रात" गीत में। 'नवरंग' फ़िल्म आयी थी सन् १९५८ में। इसके पिछले साल, १९५७ में सी. रामचन्द्र के संगीत से सज कर जो फ़िल्में प्रदर्शित हुई थीं, उनके नाम हैं - आशा, बारिश, शारदा, तलाश, और नौशेरवान-ए-आदिल। इनमें से पहले तीन फ़िल्मों में आशा भोंसले के गाए गानें कामयाब रहे। ख़ास कर फ़िल्म 'आशा' का 'ईना मीना डीका' तो एक कल्ट सोंग बन कर रह गया। इस गीत की लोकप्रियता से प्रेरित होकर सी. रामचन्द्र ने उसी साल फ़िल्म 'बारिश' के लिए बना डाला "मिस्टर जौन, बाबा ख़ान, लाला रोशनदान"। इस गीत को भी आशा जी ने वही अंजाम दिया जो उन्होने 'ईना मीना डीका' को दिया था। फ़िल्म 'बारिश' में ही आशा जी ने एक युगल गीत गाया था सी. रामचन्द्र, यानी कि चितलकर के साथ। आज आइए सुनते हैं इसी गीत को। चितलकर जब भी माइक्रोफोन के सामने खड़े हुए हैं, अधिकतर समय उन्होने हल्के फुल्के और चुलबुले से गानें ही गाए हैं। प्रस्तुत गीत भी कुछ इसी अंदाज़ का है। "हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, नहीं डरेगा नहीं डरेगा"। सुनिए...



गीत के बोल:
चितलकर: जो सीने में न दिल होता
तो फिर हम तुम पे क्यूँ मरते
आँ बोलो ना
अरे जो सीने में न दिल होता
तो फिर हम तुम पे क्यूँ मरते

मोहब्बत जैसा घटिया काम
करते भी तो क्यूँ करते
हाय रे हाय रे
डॉज़ गाड़ी के इंजन की क़सम

हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, प्यार
अरे अरे अरे अरे
अरे दीवाने अबे मरेगा
नहीं डरेगा, नहीं डरेगा
हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, प्यार करेगा
हम तो जानी

आशा: (अभी है जवाँ दुनिया का कुछ नहीं है मज़ा चक्खा
चितलकर: प्यार नहीं तो दुनिया में फिर बोलो क्या है रक्खा ) \-2
रोक सको तो रोको हमको
रोक सको तो रोको हमको हम तो नैना चार करेगा
आशा: नहीं डरेगा
चितलकर: नहीं डरेगा
(हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, प्यार करेगा
हम तो जानी ) \-2

(दिल से दिल का सौदा करने ये है आया बंदा
मान भी जाओ प्यार से अच्छा नहीं है कोई धंधा ) \-2
आशा: जान की तेरी खैर नहीं है
चितलकर: अबे भाग जली
आशा: जान की तेरी खैर नहीं है अगर तू तकरार करेगा

चितलकर: नहीं डरेगा, नहीं डरेगा
(हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, प्यार करेगा
हम तो जानी ) \-2

आशा: (पहले तो दिल फेंक कभी ना देखा ऐसा वैसा
चितलकर: कभी हुआ है और ना होगा देखो मेरे जैसा ) \-2
मानो या ना मानो हम तो
मानो या ना मानो हम तो तुमको गले का हार करेगा

आशा: नहीं डरेगा
चितलकर: नहीं डरेगा
(हम तो जानी प्यार करेगा, प्यार करेगा, प्यार करेगा
हम तो जानी ) \-2
हाय हाय हाय हाय रे


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. रफी साहब के आलावा कौन हो सकते हैं ओल्ड इस गोल्ड के एतिहासिक अंक में आशा के जोडीदार.
२. इस फिल्म से मुकेश की आवाज़ में एक दर्द भरा विदाई गीत हम सुन चुके हैं.
३. एक अंतरे की दूसरी पंक्ति में इस शब्द पर ख़तम होती है -"पागल".

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी आपकी कशमकश जायज़ थी, जिसके लिए हम माफ़ी चाहेंगें, लेकिन पराग जी को अंक मिलेंगें, आप भी अब २४ के स्कोर पर हैं....आज का गीत इतना मस्त है की इसे सुनकर आप सब भी गिले शिकवे भूल जायेंगें हमें यकीन है, पाबला जी....आप तो हमारे लिए यूं भी विजेता हैं...गीत के बोल देने का नेक काम जो करते हैं आप, और हाँ आपकी उलझन तो दिलीप जी ने सुलझा ही दी है, पूर्वी जी, आपके लिए एक बार फिर दुःख तो है पर अंक देने में हम असमर्थ हैं....:)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, April 22, 2009

सन्डे के सन्डे....एक सदाबहार मस्ती से भरा गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 59

फ़िल्म संगीत के जानकारों को पता होगा कि ऐसे ५ संगीतकार हैं जिन्हें फ़िल्म संगीत के क्रांतिकारी संगीतकार का ख़िताब दिया गया है। ये ५ संगीतकार हैं मास्टर ग़ुलाम हैदर, सी. रामचन्द्र, ओ. पी. नय्यर, आर. डी. बर्मन, और ए. आर. रहमान। इन्हें क्रांतिकारी संगीतकार इसलिए कहा गया है क्यूँकि इन्होंने अपने नये अंदाज़ से फ़िल्म संगीत की धारा को नई दिशा दी है। यानी कि इन्होंने फ़िल्म संगीत के चल रहे प्रवाह को ही मोड़ कर रख दिया था और अपने नये 'स्टाइल' को स्वीकारने पर दुनिया को मजबूर कर दिया। इनमें से जिस क्रांतिकारी की बात आज हम 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में कर रहे हैं वो हैं सी. रामचन्द्र। सी. रामचन्द्र ने फ़िल्म संगीत में पाश्चात्य संगीत की धारा को इस तरह से ले आए कि उसने फ़िल्मी गीतों के रूप रंग को एक निखार दी, और लोकप्रियता के माप-दंड पर भी खरी उतरी। और यह सिलसिला शुरू हुआ था सन १९४७ की फ़िल्म 'शहनाई' से। इस फ़िल्म में "आना मेरी जान मेरी जान सन्डे के सन्डे" एक 'ट्रेन्ड-सेटर' गीत साबीत हुआ। और यही मशहूर गीत आज आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में।

'शहनाई' १५ अगस्त १९४७ को बम्बई के नोवेल्टी थिएटर में प्रदर्शित हुई थी जब पूरा देश स्वाधीनता की ख़ुशियां मना रहा था। शहनाई की वो पाक़ तरंगें और इस फ़िल्म का शीर्षक गीत "हमारे अंगना आज बजे शहनाई" चारों तरफ़ गूंज रहे थे। पी. एल. संतोषी निर्देशित एवं रेहाना और नासिर ख़ान अभिनित यह फ़िल्म फ़िल्मिस्तान के बैनर तले बनी थी। कहा जाता है कि फ़िल्मिस्तान के शशधर मुखर्जी को शुरू में यह गीत पसंद नहीं आया और इस गीत को फ़िल्म में रखने के वो ख़िलाफ़ थे। लेकिन संतोषी साहब ने गाने का फ़िल्मांकन किया और यह गीत पूरे फ़िल्म का सब से कामयाब गीत सिद्ध हुआ, और फ़िल्म की कामयाबी के पीछे भी इस गाने का बड़ा हाथ था। चितलकर यानी कि सी. रामचन्द्र और मीना कपूर का गाया यह गीत हास्य गीतों की श्रेणी में एक इज़्ज़तदार मुक़ाम रखता है। पश्चिमी ऑर्चेस्ट्रेशन और संगीत संयोजन के अलावा इस गीत की एक और ख़ास बात यह है कि इस गीत में फ़िल्म संगीत के इतिहास में पहली बार सीटी यानी कि व्हिस्‍लिंग (whistling) का इस्तेमाल किया गया था। इसके बाद कई गीतों में इस शैली का प्रयोग हुया जैसे कि "तुम पुकार लो (ख़ामोशी)", "ये हवा ये नदी का किनारा (घर संसार)", "हम हैं राही प्यार के हम से कुछ ना बोलिये (नौ दो ग्यारह)", "मैं खो गया यहीं कहीं (12 O'Clock)", "नख़रेवाली (न्यू डेल्ही)", "जीना इसी का नाम है (अनाड़ी)" वगेरह। अब शायद आपको अंदाज़ा हो गया होगा कि क्यूँ सी. रामचन्द्र को कांतिकारी संगीतकार का दर्जा दिया गया है। तो चलिये सी. रामचन्द्र की गायिकी और संगीत को नमन करते हुए फ़िल्म 'शहनाई' का यह सदाबहार गीत सुनते हैं।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. इस फिल्म का एक गीत पहले भी बजाया जा चूका है.
२. नौशाद का संगीत रफी साहब की आवाज़.
३. मुखड़े में शब्द है - "मिलन"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी लौटे सही जवाब के साथ और मनु ने मोहर लगायी...शाबाश भाई....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


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