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Monday, February 15, 2010

दिया जलाकर आप बुझाया तेरे काम निराले...याद करें नूरजहाँ और उनकी सुरीली आवाज़ को इस गीत में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 346/2010/46

न दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अंतर्गत हम आपको ४० के दशक के हर साल का एक सुपरहिट गीत सुनवा रहे हैं अपनी ख़ास लघु शृंखला 'प्योर गोल्ड' में। आज इसकी छठी कड़ी में बारी है साल १९४५ की। ८ सितंबर १९४५। द्वितीय विश्व युद्ध का समापन। जापान के दो शहरों हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरा कर विश्व के मानचित्र से उनका अस्तित्व ही मिटा दिया गया। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का रहस्यात्मक तरीक़े से ग़ायब हो जाना और संभवत: ताइपेइ के एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु के चर्चे ही १९४५ के मुख्य विषय थे। भारत का स्वाधीनता संग्राम भी पूरे शबाब पर थी। फ़िल्म उद्योग भी इससे बेअसर नहीं रह पाई। कारखानों में बंदूक, बम, और हथियार का उत्पादन इतना ज़्यादा बढ़ चुका था कि जिससे बहुत ज़्यादा मात्रा में आर्थिक लाभ हो रहे थे। इस विशाल धन राशी को कई गुणा और बढ़ाने के उद्येश्य से इन्हे फ़िल्म निर्माण में लगाया जाने लगा। फ़िल्मस्टार्स के पारिश्रमिक कई गुणा बढ़ गए, जिसका एक हिस्सा आयकर से मुक्त भी किया जाने लगा। इस वजह से वो बड़ी हस्तियाँ जो कभी फ़िल्म स्टुडियोज़ के कर्मचारी हुआ करते थे, वो अब फ़्रीलांसिंग् पर उतर आए और धीरे धीरे फ़िल्मस्टार का अस्तित्व फ़िल्म कंपनी से बड़ी हो गई। फ़िल्म निर्माण की बड़ी कंपनियाँ जैसे कि कलकत्ता का 'न्यु थिएटर्स' और बम्बई का 'बॊम्बे टॊकीज़' धीरे धीरे कमज़ोर पड़ने लगे। आइए अब आपको १९४५ के उल्लेखनीय फ़िल्मी घटनाओं से थोड़ा सा अवगत करवाया जाए। अरुण कुमार जो बॊम्बे टॊकीज़ की फ़िल्मों में अशोक कुमार का प्लेबैक करने के लिए जाने जाते थे, वो इस साल संगीतकार बन गए और दिलीप कुमार - स्वर्णलता अभिनीत फ़िल्म 'प्रतिमा' में संगीत दिया। इस फ़िल्म के बाद देवीका रानी ने बॊम्बे टॊकीज़ के अपने शेयर अमीय चक्रवर्ती को बेच डाले और एक रूसी चित्रकार से शादी कर फ़िल्म जगत को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। दूसरी तरफ़ एक और बड़ी बैनर 'रणजीत मूवीटोन' के मालिक चंदुलाल शाह के जुए और रेस की आदतों की वजह से इस कंपनी को भारी अर्थिक संकट ने घेर लिया और यह कंपनी भी दिन ब दिन नीचे उतरती चली गई। गायक मुकेश ने अपना पहला पार्श्व गीत "दिल जलता है तो जलने दे" फ़िल्म 'पहली नज़र' के लिए अनिल बिस्वास के संगीत में रिकार्ड करवाया। उधर निर्देशक चेतन आनंद ने फ़िल्मी दुनिया में क़दम रखा झोपड़पट्टी के लोगों पर बनी फ़िल्म 'नीचा नगर' के ज़रिए। न्यु थिएटर्स में बिमल रॊय, जो एक सिनेमाटोग्राफ़र का काम करते थे, उन्होने अपना पहला फ़िल्म निर्देशित किया बंगला में (ओदेर पोथे), जिसका हिंदी में भी इसी साल 'हमराही' के नाम से निर्माण किया गया। १९४३ में जयंत देसाई ने सहगल और ख़ुरशीद को लेकर 'तानसेन' बनायीं थी, १९४५ में उन्होने सहगल के साथ सुरैय्या को लेकर बनाई 'तदबीर'। सन् ४५ में गायक जगमोहन मित्र को देबकी बोस की फ़िल्म 'मेघदूत' में कमल दासगुप्ता के संगीत में एक बेहद मशहूर गीत "ओ वर्षा के पहले बादल" गाने का मौका मिला, तो उधर ओ. पी. नय्यर साहब ने अपना पहला ग़ैर फ़िल्मी गीत "प्रीतम आन मिलो" सी. एच. आत्मा की आवाज़ में रिकार्ड किया जो बेहद मशहूर हुआ था।

१९४५ के साल को अगर गायिका और अभिनेत्री नूरजहाँ का अविभाजीत भारत में सब से कामयाब साल कहें तो ग़लत नहीं होगा। इस साल उनके गायन और अभिनय से सज कर तीन फ़िल्में प्रदर्शित हुईं जिन्होने बॊक्स ऒफ़िस इतिहास में नए झंडे गाढ़े। और इन फ़िल्मों का संगीत भी उतना ही धूम मचाने वाला। ये फ़िल्में थीं 'ज़ीनत', 'गाँव की गोरी', और 'बड़ी माँ'। फ़िल्म 'ज़ीनत' में नूरजहाँ का गाया "बुलबुलों मत रो" और "आंधियाँ ग़म की युं चली" तथा ज़ोहराबाई और कल्याणीबाई के साथ गाया हुआ उनकी क़व्वाली "आहें ना भरी शिकवे ना किए" बेहद मशहूर हुए थे। फ़िल्म 'गाँव की गोरी' के गीतों की लोकप्रियता के तो कहने ही क्या। "किस तरह भूलेगा दिल", "बैठी हूँ तेरी याद का लेकर के सहारा" और "ये कौन हँसा" जैसे गीत हर एक की ज़ुबान पर चढ़ गए थे। फ़िल्म 'बड़ी माँ' के गानें भी उतने ही असरदार थे। मास्टर विनायक, जो पहले प्रभात स्टुडियो से जुड़े हुए थे, ने 'बड़ी माँ' का निर्देशन किया था, और फ़िल्म के संगीतकार थे दत्ता कोरेगाँवकर, जिन्हे के. दत्ता के नाम से भी जाना जाता है। दोस्तों, यह वही कोरेगाँवकर साहब हैं जिन्होने लता मंगेशकर को उनका पहला एकल प्लेबैक्ड सॊंग् गाने का अवसर दिया था 'आपकी सेवा में' फ़िल्म में सन् '४७ में। वैसे 'बड़ी माँ' फ़िल्म में लता मंगेशकर और उनकी बहन आशा ने अभिनय किया था, और यह उनके अभिनय से सजी पहली हिंदी फ़िल्म थी। पार्श्वगायिका बनने से पहले इन दोनों बहनों ने अपने परिवार को चलाने के लिए कई फ़िल्मों में छोटे मोटे किरदार निभाए थे। फिर दोनों की क़िस्मत ने ऐसी करवट ली कि बाक़ी इतिहास है। ख़ैर, आज तो हम आपको सुनवा रहे हैं नूरजहाँ की आवाज़ में इस फ़िल्म का एक बड़ा ही लोकप्रिय गीत "दिया जलाकर आप बुझाया तेरे काम निराले, दिल तोड़ के जानेवाले"। गीत रचना ज़िया सरहदी की है। आइए सुनते हैं।



चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

झिलमिलाते तारों के बीच,
फलक पे चाँद को देखा हमने,
चांदनी छिटकी हुई थी दूर तक,
और रात खामोश थी...

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें २ अंक.
2. इस युगल गीत में उस ज़माने के एक मशहूर अभिनेता/गायक की आवाज़ थी, उनका नाम बताएं- सही जवाब को मिलेंगें २ अंक.
3. कौन थे इस मशहूर गीत के गीतकार- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.
4. ये गीत किस राग पर आधारित है - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
शरद जी ३ अंक और जुड़े आपके खाते में, पर रोहित जी इस बार आप चूक गए. जवाब जिया सरहदी है...खैर आज के लिए शुभकामनाएं

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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