rag kafi hori लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
rag kafi hori लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 25 अक्तूबर 2015

बेगम अख्तर की ठुमरी और ग़ज़ल : SWARGOSHTHI – 241 : THUMARI & GAZAL OF BEGAM AKHTAR




स्वरगोष्ठी – 241 में आज 

संगीत के शिखर पर – 2 : बेगम अख्तर की ठुमरी और ग़ज़ल

विदुषी बेगम अख्तर को उनकी जन्मशती वर्ष-पूर्ति पर सुरीला स्मरण 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी नई श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीतानुरागियों का एक बार फिर स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनकी प्रस्तुतियों की चर्चा करेंगे। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व और उनकी कृतियों को प्रस्तुत करेंगे। आज श्रृंखला की दूसरी कड़ी में हमारा विषय है, उपशास्त्रीय संगीत और इस विधा में अत्यन्त लोकप्रिय गायिका विदुषी बेगम अख्तर के व्यक्तित्व तथा कृतित्व की संक्षिप्त चर्चा करेंगे और उनकी गायी राग मिश्र खमाज और काफी की ठुमरी तथा एक ग़ज़ल सुनवाएँगे।


श्रृंगार और भक्तिरस से सराबोर ठुमरी और गजल शैली की अप्रतिम गायिका बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्तूबर, 1914 को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद नामक एक छोटे से नगर (तत्कालीन अवध) में एक कट्टर मुस्लिम परिवार में हुआ था। परिवार में किसी भी सदस्य को न तो संगीत से अभिरुचि थी और न किसी को संगीत सीखना-सिखाना पसन्द था। परन्तु अख्तरी (बचपन में उन्हें इसी नाम से पुकारा जाता था) को तो मधुर कण्ठ और संगीत के प्रति अनुराग जन्मजात उपहार के रूप में प्राप्त था। एक बार सुविख्यात सरोदवादक उस्ताद सखावत हुसेन खाँ के कानों में अख्तरी के गुनगुनाने की आवाज़ पड़ी। उन्होने परिवार में ऐलान कर दिया कि आगे चल कर यह नन्ही बच्ची असाधारण गायिका बनेगी, और देश-विदेश में अपना व परिवार का नाम रोशन करेगी। उस्ताद ने अख्तरी के माता-पिता से संगीत की तालीम दिलाने का आग्रह किया। पहले तो परिवार का कोई भी सदस्य इसके लिए राजी नहीं हुआ किन्तु अख्तरी की माँ ने सबको समझा-बुझा कर अन्ततः मना लिया। उस्ताद सखावत हुसेन ने अपने मित्र, पटियाला के प्रसिद्ध गायक उस्ताद अता मुहम्मद खाँ से अख्तरी को तालीम देने का आग्रह किया। वे मान गए और अख्तरी उस्ताद के पास भेज दी गईं। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें उस्ताद के कठोर अनुशासन में रियाज़ करना पड़ा। तालीम के दिनों में ही उनका पहला रिकार्ड- ‘वह असीरे दम बला हूँ...’ बना और वे अख्तरी बाई फैजाबादी बन गईं। उस्ताद अता मुहम्मद खाँ के बाद उन्हें पटना के उस्ताद अहमद खाँ से रागों की विधिवत शिक्षा मिली। इसके अलावा बेगम अख्तर को उस्ताद अब्दुल वहीद खाँ और हारमोनियम वादन में सिद्ध उस्ताद गुलाम मुहम्मद खाँ का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। 1934 में कलकत्ता (अब कोलकाता) के अल्फ्रेड थियेटर हॉल में बिहार के भूकम्प-पीड़ितों के सहायतार्थ एक संगीत समारोह का आयोजन किया गया था। इस समारोह में कई दिग्गज कलाकारों के बीच नवोदित अख्तरी बाई को पहली बार गाने का अवसर मिला। मंचीय कार्यक्रमों की भाषा में कहा जाए तो “अख्तरी बाई ने मंच लूट लिया”। बेगम अख्तर की गायकी का एक अलग ही अंदाज रहा है। उनकी भावपूर्ण गायकी का सहज अनुभव कराने के लिए अब हम प्रस्तुत करते हैं, एक ठुमरी। यह ठुमरी राग मिश्र खमाज में निबद्ध है, जिसके बोल हैं –“अँखियन नींद न आए...”। 


ठुमरी मिश्र खमाज : ‘अँखियन नींद न आए...’ : बेगम अख्तर




पण्डित जसराज
बेगम विदुषी बेगम अख्तर का उदय जिस काल में हुआ था, भारतीय संगीत का पुनर्जागरण काल था। ब्रिटिश शासनकाल में भारतीय संगीत जिस प्रकार उपेक्षित हुआ था, उससे जनजीवन से संगीत की दूरी बढ़ गई थी। ऐसी स्थिति में 1878 में जन्में पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर और 1896 में जन्में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने अपने अनथक प्रयत्नों से पूरी शुचिता के साथ संगीत को न केवल पुनर्प्रतिष्ठित किया बल्कि जन-जन के लिए संगीत-शिक्षा सुलभ कराया। इस दोनों संगीत-ऋषियों के प्रयत्नों के परिणाम बीसवीं शताब्दी के आरम्भिक दशकों में परिलक्षित होने लगे थे। बेगम अख्तर इसी पुनर्जागरण काल की देन थीं। उनकी गायकी में शुचिता थी और श्रोताओं के हृदय को छूने की क्षमता भी थी। अब हम आपके लिए बेगम अख्तर के स्वर में एक होरी ठुमरी प्रस्तुत करते हैं। सुविख्यात गायक पण्डित जसराज ने बेगम साहिबा और उनकी गायकी पर एक सार्थक टिप्पणी की थी, जिसे ठुमरी से पूर्व आप भी सुनेंगे। 


होरी ठुमरी : ‘कैसी ये धूम मचाई...’ : बेगम अख्तर




बेगम अख्तर यद्यपि खयाल गायकी में अत्यन्त कुशल थीं किन्तु उन्हें ठुमरी और गज़ल गायन में सर्वाधिक ख्याति मिली। स्पष्ट उच्चारण और भावपूर्ण गायकी के कारण उन्हे चौथे और पाँचवें दशक की फिल्मों में भी अवसर मिला। उन्होने ईस्टर्न इण्डिया कम्पनी की फिल्मों- एक दिन का बादशाह, नल-दमयंती, नसीब का चक्कर आदि फिल्मों में काम किया। 1940 में बनी महबूब प्रोडक्शन की फिल्म ‘रोटी’ में उनके गाये गीतों ने तो पूरे देश में धूम मचा दिया था। विश्वविख्यात फ़िल्मकार सत्यजीत रे ने 1959 में फिल्म ‘जलसाघर’ का निर्माण किया था। यह फिल्म उन्नीसवीं शताब्दी की सामन्तवादी परम्परा और भारतीय संगीत की दशा-दिशा पर केन्द्रित थी। फिल्म ‘जलसाघर’ में गायन, वादन और नर्तन के तत्कालीन उत्कृष्ट कलाकारों को प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत किया गया था। फिल्म में बिस्मिल्लाह खाँ (शहनाई), उस्ताद वहीद खाँ (सुरबहार), रोशन कुमारी (कथक), उस्ताद सलामत अली खाँ (खयाल गायन) के साथ बेगम अख्तर का गायन भी प्रस्तुत किया गया था। 

कैफी आज़मी
बेगम अख्तर ने अपने जीवन में ठुमरी, दादरा और गज़ल गायकी को ही लक्ष्य बनाया। खयाल गायकी में भी वे दक्ष थीं, किन्तु उनका रुझान उप-शास्त्रीय गायकी की ओर ही केन्द्रित रहा। उनकी गायकी में अनावश्यक अलंकरण नहीं होता था। उनके सुर सच्चे होते थे। बड़ी सहजता और सरलता से रचना के भावों को श्रोताओं तक सम्प्रेषित कर देती थीं। अब हम आपके लिए बेगम साहिबा की गज़ल गायकी का एक उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। उनके जीवनकाल में आयोजित एक कार्यक्रम में सुप्रसिद्ध शायर कैफी आज़मी और बेगम अख्तर की एक अनूठी जुगलबन्दी हुई थी। पहले कैफी आज़मी ने अपनी एक गज़ल पढ़ी। बाद में बेगम साहिबा ने उसी गज़ का सस्वर गायन प्रस्तुत किया था। शायर और गायिका की एक ही मंच पर हुई इस अनूठी जुगलबन्दी का आप आनन्द लीजिए और हमें आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हम विदुषी बेगम अख्तर की स्मृतियों को नमन अर्पित है। 


गजल : ‘सुना करो मेरे जाँ इनसे उनसे अफसाने...’ : बेगम अख्तर




संगीत पहेली 

‘स्वरगोष्ठी’ के 241वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत रचना का एक अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेताओं के साथ ही वार्षिक विजेताओं की घोषणा भी की जाएगी। 


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि रचना के इस अंश में किस राग का स्पर्श है? 

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए। 

3 – यह किस गायक की आवाज़ है? गायक का नाम बताइए। 

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 31 अक्टूबर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 243वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ के 239वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद अमजद अली खाँ द्वारा सरोद पर प्रस्तुत एक रचना का अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – कामोद, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दीपचंदी या चाँचर और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – सरोद। 

इस बार की पहेली के प्रश्नों का सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। 


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे ठुमरी, दादरा और गजल गायकी के शिखर पर प्रतिष्ठित बेगम अख्तर के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त चर्चा की है। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



रविवार, 9 मार्च 2014

होली की उमंग : राग काफी के संग


स्वरगोष्ठी – 158 में आज



फाल्गुनी परिवेश में राग काफी के विविध रंग
 

‘लला तुमसे को खेले होली, तुम तो करत बरजोरी...’



फाल्गुनी परिवेश में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली पाँच कड़ियों से हम बसन्त ऋतु के मदमाते रागों पर चर्चा कर रहे हैं और फाल्गुनी परिवेश के अनुकूल गायन-वादन का आनन्द ले रहे हैं। फाल्गुन मास में शीत ऋतु का क्रमशः अवसान और ग्रीष्म ऋतु की आगमन होता है। यह परिवेश उल्लास और श्रृंगार भाव से परिपूर्ण होता है। प्रकृति में भी परिवर्तन परिलक्षित होने लगता है। रस-रंग से परिपूर्ण फाल्गुनी परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। पिछले अंकों में हमने इस राग में ठुमरी, टप्पा, खयाल, तराना और भजन प्रस्तुत किया था। राग, रस और रगों का पर्व होली अब मात्र एक सप्ताह की दूरी पर है, अतः आज के अंक में हम आपसे राग काफी की कुछ होरी प्रस्तुत करेंगे, जिसे क्रमशः गायिका अच्छन बाई, विदुषी गिरिजा देवी और पण्डित भीमसेन जोशी की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है।


भारतीय पंचांग के अनुसार माघ मास के उत्तरार्द्ध से लेकर चैत्र मास के पूर्वार्द्ध तक बसन्त ऋतु का परिवेश होता है। यह शीत ऋतु के अवसान का और ग्रीष्म ऋतु के आगमन की अनुभूति कराने वाला समय होता है। इन दिनों प्रकृति में भी मनभावन परिवर्तन परिलक्षित होने लगता है। ऐसे परिवेश मे मानव ही नहीं, पशु-पक्षी भी उल्लास, उमंग और उत्साह से भर कर कुछ गाने और थिरकने का उपक्रम करने लगते हैं। भारतीय संगीत में होली गीतों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। ध्रुवपद शैली में धमार गायकी से लेकर ख़याल और ठुमरी गायकी तक इस रंग-विरंगे पर्व का उल्लास देखते ही बनता है। इन गायन शैलियों में श्रृंगार रस के अनेक चित्रों का दर्शन होता है। यहाँ तक कि ठुमरी का एक प्रकार तो 'होरी' या 'होली' नाम से ही जाना जाता है। इन ठुमरियों ने शब्द और स्वर दोनों स्तरों पर बहुत कुछ लोक-संगीत से ग्रहण किया है। आज के अंक में हम ठुमरी अंग की होली या होरी गायन शैली के कुछ रंग प्रस्तुत कर रहे हैं। लगभग एक शताब्दी पूर्व ठुमरी होरी का स्वरूप कैसा रहा, इसका एक उदाहरण अच्छन बाई की गायी एक प्राचीन ठुमरी होरी के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं।

भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ 1902 से हुआ था। सबसे पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, होरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग 500 व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक किशोर आयु की गायिका अच्छन बाई भी थीं, जिनके गीत 1908 में ग्रामोफोन कम्पनी ने रिकार्ड किये थे। अच्छन बाई के रिकार्ड की उन दिनों धूम मच गई थी। उस दौर में अच्छन बाई के स्वर में बने रिकार्ड में से आज कुछ ही रिकार्ड उपलब्ध हैं, जिनसे उनकी गायन-प्रतिभा का सहज ही अनुभव हो जाता है। अच्छन बाई के उपलब्ध रिकार्ड में से एक में उन्होने राग काफी होरी को पुराने अंदाज़ में प्रस्तुत किया है। इस होरी को अब आप भी सुनिए।



राग काफी : ठुमरी होरी : ‘चलो होरी खेलिए बृजराज...’ : अच्छन बाई






परम्परागत होरी अथवा होली गीतों में अधिकतर ब्रज की होली का प्रसंग होता है। श्रृंगार रस से अभिसिंचित ऐसी होरी में राधा-कृष्ण की छेड़-छाड़, ब्रजमण्डल में अबीर, गुलाल के उड़ते बादलों और मान-मनुहार का चित्रण प्रमुख रूप से होता है। आज की दूसरी होरी राग मिश्र काफी में है, जिसे सुप्रसिद्ध गायिका गिरिजा देवी ने गाया है। पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को कला और संस्कृति की नगरी वाराणसी (तत्कालीन बनारस) में हुआ था। पिता रामदेव राय जमींदार थे और संगीत-प्रेमी थे। उन्होंने पाँच वर्ष की आयु में ही गिरिजा देवी के संगीत-शिक्षा की व्यवस्था कर दी थी। गिरिजा देवी के प्रारम्भिक संगीत-गुरु पण्डित सरयूप्रसाद मिश्र थे। नौ वर्ष की आयु में पण्डित श्रीचन्द्र मिश्र से उन्होंने संगीत की विभिन्न शैलियों की शिक्षा प्राप्त करना आरम्भ किया। गिरिजा देवी का विवाह 1946 में एक व्यवसायी परिवार में हुआ था। उन दिनों कुलीन विवाहिता स्त्रियों द्वारा मंच प्रदर्शन अच्छा नहीं माना जाता था। परन्तु सृजनात्मक प्रतिभा का प्रवाह भला कोई रोक पाया है। 1949 में गिरिजा देवी ने अपना पहला प्रदर्शन इलाहाबाद के आकाशवाणी केन्द्र से दिया। यह देश की स्वतंत्रता के तत्काल बाद का उन्मुक्त परिवेश था, जिसमें अनेक रूढ़ियाँ टूटी थीं। गिरिजा देवी को भी अपने युग की रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा। आकाशवाणी से अपने गायन का प्रदर्शन करने के बाद गिरिजा देवी ने 1951 में बिहार के आरा में आयोजित एक संगीत सम्मेलन में अपना गायन प्रस्तुत किया। इसके बाद गिरिजा देवी की अनवरत संगीत-यात्रा जो आरम्भ हुई वह आज तक जारी है। उन्होने स्वयं को केवल मंच-प्रदर्शन तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि संगीत के शैक्षणिक और शोधकार्यों में भी अपना योगदान किया। 80 के दशक में उन्हें कोलकाता स्थित आई.टी.सी. संगीत रिसर्च एकेडमी ने आमंत्रित किया। यहाँ रह कर उन्होंने न केवल कई योग्य शिष्य तैयार किये बल्कि शोधकार्य भी कराए। इसी प्रकार 90 के दशक में गिरिजा देवी काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जुड़ीं और अनेक छात्र-छात्राओं को प्राचीन संगीत परम्परा की दीक्षा दी। गिरिजा देवी आधुनिक और स्वतंत्रता-पूर्व काल की पूरब अंग की बोल-बनाव ठुमरियों की विशेषज्ञ और संवाहिका हैं। आधुनिक उपशास्त्रीय संगीत के भण्डार को उन्होंने समृद्ध किया है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधा-कृष्ण की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मनमोहक काफी होरी।


राग मिश्र काफी : ठुमरी होरी : ‘तुम तो करत बरजोरी, लला तुमसे को खेले होरी...’ : विदुषी गिरिजा देवी






यद्यपि होली विषयक रचनाएँ राग काफी के अलावा अन्य रागों में भी मिलते हैं, किन्तु राग काफी के स्वरसमूह इस पर्व के उल्लास से परिपूर्ण परिवेश का चित्रण करने में सर्वाधिक समर्थ होते हैं। अब हम आपको राग काफी की एक होरी ठुमरी सुनवाते हैं। देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से अलंकृत पण्डित भीमसेन जोशी ने इसे प्रस्तुत किया है। सात दशक तक भारतीय संगीताकाश पर छाए रहने वाले पण्डित भीमसेन जोशी का भारतीय संगीत की विविध विधाओं- ध्रुवपद, खयाल, तराना, ठुमरी, भजन, अभंग आदि सभी पर समान अधिकार था। उनकी खरज भरी आवाज़ का श्रोताओं पर जादुई असर होता था। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बढ़त देते थे, उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। तानें तो उनके कण्ठ में दासी बन कर विचरती थी। संगीत-जगत के सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित होने के बावजूद स्वयं अपने बारे में बातचीत करने के मामले में वे संकोची रहे। आइए भारत के इस अनमोल रत्न की आवाज़ में राग काफी की यह होरी ठुमरी। इस रचना के माध्यम से ब्रज की होली का यथार्थ स्वर-चित्र उपस्थित हो जाता है। आप रस-रंग से भीगी यह होरी ठुमरी सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने देने की अनुमति दीजिए। अगले रविवार को ठीक होली के दिन रस-रंग से सराबोर कुछ और सांगीतिक रचनाओं के साथ हम उपस्थित होंगे।



राग मिश्र काफी : ठुमरी होरी : ‘होरी खेलत नन्दकुमार...’ : पण्डित भीमसेन जोशी 






आज की पहेली



‘स्वरगोष्ठी’ के 158वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह संगीत की कौन सी शैली है? इस संगीत शैली का नाम बताइए।

2 – इस प्रस्तुति-अंश को सुन कर राग पहचानिए और उसका नाम लिख भेजिए।


आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता



‘‘स्वरगोष्ठी’ की 156वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित कुमार गन्धर्व की आवाज़ में प्रस्तुत राग काफी के तराना का एक अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- तराना और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- पण्डित कुमार गन्धर्व। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों फाल्गुनी रस-रंग का प्रभाव है। इस फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा जारी है। हमारा अगला अंक ठीक होली के दिन प्रस्तुत होगा। इस विशेष अंक में हम होली के कुछ विशेष तचनाओं के साथ उपस्थित होंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला प्रस्तुत करेंगे। अगली श्रृंखलाओं के लिए विषय का सुझाव आप भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।




प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ