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Friday, April 22, 2011

हर घर के कोने में एक पोस्ट बॉक्स होता है... रितुपर्णा घोष लाये हैं संगीत की एक अजीब दावत "मेमोरीस इन मार्च" में

Taaza Sur Taal (TST) - 09/2011 - Memories In March

'ताज़ा सुर ताल' के आज के अंक में मैं, सुजॉय चटर्जी, आप सभी का स्वागत करता हूँ। दोस्तों, जिस तरह से समाज का नज़रिया बद्लता रहा है, उसी तरह से हमारी फ़िल्मों की कहानियों में, किरदारों में भी बदलाव आते रहे हैं। "फ़िल्म समाज का आइना है" वाक़ई सही बात है। एक विषय जो हमेशा से ही समाजिक विरोध और घृणा का पात्र रहा है, वह है समलैंगिक्ता। भले ही सुप्रीम कोर्ट नें समलैंगिक संबंध को स्वीकृति दे दी है, लेकिन देखना यह है कि हमारा समाज कब इसे खुले दिल से स्वीकार करता है। फ़िल्मों की बात करें तो पिछ्ले कई सालों से समलैंगिक चरित्र फ़िल्मों में दिखाये जाते रहे हैं, लेकिन उन पर हास्य-व्यंग के तीर ही चलाये गये हैं। जब अंग्रेज़ी फ़िल्म 'ब्रोकबैक माउण्टेन' नें समलैंगिक संबंध को रुचिकर रूप में प्रस्तुत किया तो हमारे यहाँ भी फ़िल्मकारों ने साहस किया, और सब से पहले निर्देशक ओनिर 'माइ ब्रदर निखिल' में इस राह पर चलकर दिखाया। अभी हाल ही में 'डोन्नो व्हाई न जाने क्यों' में भी समलैंगिक संबंध को दर्शाया गया लेकिन फ़िल्म के नायक के परिवार वालों नें हक़ीक़त में ही उसे परिवार से अलग कर दिया। सबसे अफ़सोस की बात यह है कि जब समलैंगिक्ता को हास्य-व्यंग के रूप में प्रस्तुत किया गया, लोगों नें हाथों हाथ लिया, पर जब जब संवेदनशील तरीके से किसी ने इसे प्रस्तुत करने का प्रयास किया, इस समाज ने उसे हतोत्साहित ही किया। एक और फ़िल्मकार जिन्होंने इस विषय को रुचिकर तरीके से प्रस्तुत किया, वो हैं ऋतुपर्ण घोष। उनकी बांग्ला फ़िल्म 'आर एकटी प्रेमेर गौल्पो' (और एक प्रेम कहानी) में एक समलैंगिक निर्देशक का फ़िल्म के नायक से साथ प्रेम-संबंध का चित्रण लोगों नें बहुत पसंद किया। और अब आ रही है उनकी अगली फ़िल्म 'मेमोरीज़ इन मार्च'।

'मेमोरीज़ इन मार्च' मूलत: एक अंग्रेज़ी फ़िल्म है, जिसमें हिंदी और बांग्ला का भी प्रयोग हुआ है। यह केवल दो समलैंगिक प्रेमियों की कहानी ही नहीं, बल्कि यह कहानी है उस दर्द और पीड़ा की जो एक माँ झेलती है जब उसका बेटा एक सड़क हादसे में गुज़र जाता है। इस हादसे के बहुत दिनों बाद जब उसे यह पता चलता है कि उसके बेटे का एक पुरुष प्रेमी भी था, उसे एक और झटका लगता है। और अचानक वह अपने बेटे की ज़िंदगी के एक अनछुया पहलु से रु-ब-रु होती है। 'मेमोरीज़ इन मार्च' कहानी है एक माँ की और उसके स्वर्गवासी बेटे के प्रेमी की, और किस तरह से दोनों अपने अपने दुख बांटते हुए एक दूसरे के करीब आ जाते हैं। सुनने में आया है कि निर्देशक संजय नाग नें बहुत ही सुंदरता से पूरे विषय को प्रस्तुत किया है, और क्यों न हो जब ऋतु दा जैसे अनुभवी और १३-बार राष्ट्रीय पुरस्कार विजयी निर्देशक फ़िल्म से जुड़े हो। ऋतु दा नें इस फ़िल्म में स्वर्गवासी बेटे के प्रेमी की भूमिका निभाई है, जब कि माँ की भूमिका में हैं दीप्ती नवल। फ़िल्म का तीसरा चरित्र है राइमा सेन का जो उस स्वरगवासी लड़के की दोस्त थी।

और अब आते हैं मुद्दे की बात पर, यानी कि गीत-संगीत पर। 'मेमोरीज़ इन मार्च' के संगीतकार हैं देबोज्योति मिश्र और इसके सभी गीतों को लिखा है स्वयं ऋतुपर्ण घोष नें। ऐल्बम का पहला गीत है शुभोमिता बैनर्जी की आवाज़ में "सखी हम" और शायद यही इस ऐल्बम का सर्वोत्तम गीत है। दोस्तों, इस गीत के बारे में आपके 'सुर-संगम' के हमसफ़र सुमित चक्रवर्ती के शब्दों में - "यह गीत सुनने वाले के अंतर मन में जल की तरह उतरता जाता है। गायिका शुभोमिता बैनर्जी ने दिल को छू लेने वाले अन्दाज़ में इस गीत को गाया है। ऋतुपर्णो घोष ने इस गीत को बंगला एवं मैथिली में लिखकर एक अनोखा प्रयास किया है तथा इसमें चार चाँद लगाया है संगीतकार देबज्योति मिश्र ने इसे पियानो पर एक नर्म तर्ज़ पर रचकर। गीत का असर सुनने वाले के दिलो-दिमाग़ पर देर तक रहता है। मैं ख़ुद भी इसे कई बार लगातार सुनता रहा और देर तक गुनगुनाता भी रहा।" और दोस्तों, छोटी मुंह बड़ी बात होगी, शुभोमिता के गायन अंदाज़ को सुनते हुए मुझे पता नहीं क्यों लता जी की याद आ गई। मैं आवाज़ की नहीं, केवल अंदाज़ की बात कर रहा हूँ। अगर मुझसे कोई ग़लती हो गई हो तो क्षमा कीजिएगा। शुभोमिता और सखियों की आवाज़ों में एक और गीत है "मेरे लाला आज न जैयो जमुनार पार", लेकिन इस गीत में वह बात नहीं महसूस हुई जो "सखी हम" में हुई थी।

अगला गीत है शैल हाडा की आवाज़ में "अजीब दावत"। शैल, जिन्होंने अपनी पहली फ़िल्म 'सांवरिया' के शीर्षक गीत में ही अपना करिश्मा दिखा दिया था, और अभी हाल में 'गुज़ारिश' में भी अपने आप को सिद्ध किया था, इस गीत में भी साबित किया कि भले ही उनकी आवाज़ कम सुनाई दे, लेकिन जब भी सुनाई देती है एक अलग ही असर छोड़ती है। इसी गीत का एक और संस्करण है शिल्पा राव की आवाज़ में। शिल्पा के गाये पहले के गीतों की ही तरह यह गीत भी है, कोई नई बात महसूस नहीं हुई।

तीसरा गीत रेखा भारद्वाज की आवाज़ में है "काहा संग खेलूँ होरी"। 'वीर' फ़िल्म में "कान्हा" गाने के बाद एक बार फिर से उन्हें कान्हा, होरी, वृंदावन विषयों पर गाने का मौका मिला। कम से कम साज़ों से सजी इस गीत का भी अपना अलग चार्म है। इसी गीत का एक और संस्करण है कैलाश खेर की आवाज़ में। लेकिन "काहा संग खेलूँ होरी" इसमें बदल कर बन गया "कान्हा संग खेले होरी"। मेरी राय पूछें तो कैलाश की आवाज़ में यह गीत जैसे खिल सा उठा है। रेखा जी की आवाज़ को पूर्ण सम्मान देते हुए यह कहता हूँ कि कैलाश साहब नें जिस तरह का आधायत्मिक रंग इस गीत पर चढ़ाया है, वह बात रेखा जी के संस्करण में नज़र नहीं आई। कैलाश खेर का फ़ोर्टे है इस तरह के गीत, कमाल तो वो करेंगे ही! बेहद ख़ूबसूरत, दैवीय अनुभव होता है इस गीत को सुनते हुए।

'मेमोरीज़ इन मार्च' का अगला गीत है मोहन का गाया हुआ। "हर घर के कोने में एक पोस्ट बॉक्स होता है, कभी खाली, कभी सूनी, कभी खतों से भरी, अनसूनी, लहू जैसा लाल रंग का पोस्ट बॉक्स होता है", ऋतु दा की कलम से ऐसे ग़ैर-पारम्परिक बोल निकले हैं, इस तरह के बोल इन दिनों बांग्ला बैण्ड के गीतों में नज़र आता है। मोहन की गम्भीर और कशिश भरी आवाज़ में इस गीत में एक हल्की सी रॉक शैली भी सुनाई देती है। इस गीत में जो दर्शन छुपा है, मुझे जितना समझ में आया या फिर मैंने इसे जैसे ग्रहण किया, वह यह है कि हर इंसान (घर) के भीतर (कोने में) एक हृदय (पोस्ट बॉक्स) है, जो कभी एकाकी होता है तो कभी ख़ुशियों से भर जाता है, कभी उसकी बोली को कोई सुन नहीं पाता। वैसे इसका सटीक विश्लेषण तो फ़िल्म को देखते हुए ही किया जा सकता है।

'मेमोरीज़ इन मार्च' का जो ऐल्बम है वह है क्लास ऒडिएन्स के लिए। अच्छा संगीत पसंद करने वालों के लिए है यह ऐल्बम। हमारी तरफ़ से इस ऐल्बम को १० में से ९ की रेटिंग। और मुझे जो दो गीत सब से ज़्यादा पसंद आये वो हैं शुभोमिता का "सखी हम" और कैलाश खेर "कान्हा संग खेले होरी"। अगर आप नये गीतों के सी.डी खरीदते हैं, तो मैं आपको इस ऐल्बम की सी.डी खरीदने की सलाह भी देता हूँ। और इसी के साथ आज के 'ताज़ा सुर ताल' को समेटने की आज्ञा चाहता हूँ। इस फ़िल्म के गीतों को सुनिएगा ज़रूर और सुन कर नीचे टिप्पणी में अपनी राय अवश्य लिखिएगा, नमस्कार!

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, March 22, 2011

संगीत समीक्षा - सतरंगी पैराशूट - बच्चों की इस फिल्म के संगीत के लिए एकजुट हुए चार दौर के फनकार, देने एक सुरीला सरप्रायिस

Taaza Sur Taal (TST) - 06/2011 - SATRANGEE PARACHUTE

'आवाज़' के दोस्तों नमस्कार! मैं, सुजॊय चटर्जी, साप्ताहिक स्तंभ 'ताज़ा सुर ताल' के साथ हाज़िर हूँ। साल २०११ के फ़िल्मों की अगर हम बात करें तो 'ताज़ा सुर ताल' में इस साल हमनें जिन फ़िल्मों की चर्चा की है, वो हैं 'नो वन किल्ड जेसिका', 'यमला पगला दीवाना', 'धोबी घाट', 'दिल तो बच्चा है जी', 'ये साली ज़िंदगी', 'सात ख़ून माफ़' और 'तनु वेड्स मनु'। एक और महत्वपूर्ण फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी वर्ल्ड कप क्रिकेट शुरु होने से ठीक पहले, पटियाला हाउस, जिसका केन्द्रबिंदु भी क्रिकेट ही था। अक्षय कुमार, ऋषी कपूर, डिम्पल कपाडिया अभिनीत यह फ़िल्म अच्छी बनी, लेकिन इसके संगीत नें कोई छाप नहीं छोड़ी। और २०११ की अब तक की कुछ और प्रदर्शित फ़िल्में जो कब आईं और कब गईं पता भी नहीं चला, और न ही पता चला उनके संगीत का, ऐसी फ़िल्मों में कुछ नाम हैं - 'विकल्प', 'मुंबई मस्त कलंदर', 'होस्टल', 'यूनाइटेड सिक्स', 'ऐंजेल', 'तुम ही तो हो' वगेरह। क्रिकेट विश्वकप भी एक वजह है कि इन दिनों बड़े बैनर की फ़िल्में प्रदर्शित नहीं हो रही हैं। २०११ के कलेण्डर में अगर नज़र डालें तो मार्च के महीने के लिए केवल दो फ़िल्मों के रिलीज़ डेट्स दिये गये हैं - ४ मार्च को 'ये फ़ासले' और २५ मार्च को 'हैप्पी हस्बैण्ड्स'।

आज 'ताज़ा सुर ताल' में हम जिस फ़िल्म की चर्चा करने जा रहे हैं वह एक बच्चों की फ़िल्म है। एक ज़माना था जब बच्चों के लिए फ़िल्में बनती थीं जिनका बच्चे और बड़े, सभी आनंद लिया करते थे और वो फ़िल्में सफल भी होती थीं। लेकिन आज बच्चों के लिए फ़िल्मों का निर्माण लगभग बंद हो चुका है। और जो गिनी-चुनी फ़िल्में बनती हैं, उनका न तो कोई प्रचार होता है, और न ही किसी का इनकी तरफ़ ध्यान जाता है। आप ही बताइए 'सतरंगी पैराशूट' नाम से जो फ़िल्म आई है, इसके बारे में आप में से कितनों को पता है? फ़िल्म के शीर्षक से भी ज़्यादा कुछ अनुमान लगाना मुश्किल है और फ़िल्म में नये संगीतकार कौशिक दत्ता और गीतकार राजीव बरनवाल के होने से इस ऐल्बम से किस तरह की उम्मीद की जाये, ये भी विचारणीय है। इसलिए हमनें सोचा कि क्यों न हम ही इसके गीतों को सुन कर आपको इसकी समीक्षा दें! 'सतरंगी पैराशूट' विनीत खेत्रपाल निर्मित व निर्देशित फ़िल्म है, जिसमें मुख्य किरदारों में तो कुछ दिलचस्प बच्चे ही हैं, और साथ में हैं जैकी श्रॊफ़, के. के. मेनन, संजय मिश्रा और ज़ाकिर हुसैन। पप्पु की भूमिका में जिस बच्चे ने अभिनय किया है, उनका नाम है सिद्धार्थ संघानी। कहानी कुछ इस तरह की है कि पप्पु अपने अंधी दोस्त कुहू के लिए एक पैराशूट ढूंढने निकल पड़ता है। वो अपने दोस्तों के साथ इस तलाश में निकल पड़ता है और नैनिताल से पहुँच जाता है मायानगरी मुंबई। लेकिन उन्हें क्या पता मुंबई के असली रूप का! पप्पु और उसके दोस्त उग्रपंथियों के साथ जाने अंजाने में भिड़ जाता है, जो मुंबई में आतंक फैलाने के लिए पैराशूटों का इस्तेमाल करने वाले हैं।

'सतरंगी पैराशूट' ऐल्बम का पहला ट्रैक है "ज़िंदगी की राह में मुस्कुराता चल", जिसे कैलाश खेर नें गाया है। कैलाश खेर वैसे भी दार्शनिक गीत गाने के लिए जाने जाते हैं, और यह गीत भी उसी जौनर का है। गीत के शब्दों में कोई नई बात तो नहीं, लेकिन गीत का रिदम हमें गीत में बनाये रखता है, और सुनने में अच्छा लगता है। ऒर्केस्ट्रेशन भी "सुरीला" है और इस गीत को सुनते हुए दिल में एक चाह सी जगती है ऐल्बम के दूसरे गीत को सुनने की। ये सोचकर कि जिस तरह से इस गीत का संगीत कुछ अलग सा सुनाई दे रहा है, क्या दूसरे गीत में भी कोई ख़ास बात होगी?

ऐल्बम का दूसरा गीत है एक लोरी। दोस्तों, एक समय था जब किसी फ़िल्म के अलग अलग गीत अलग अलग सिचुएशन्स पर हुआ करते थे, और लोरी, भजन, क़व्वाली, देश भक्ति गीत, ग़ज़ल, तथा हर तरह के गीत बारी बारी से फ़िल्मों में आते रहते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों से तो फ़िल्मों में बस तीन ही तरह के गीत रह गये हैं - हप्पी सॊंग्, सैड सॊंग् और डान्स नंबर्स। ऐसे में 'सतरंगी पैरशूट' में श्रेया घोषाल की गाई लोरी की सराहना करनी ही पड़ेगी। "मेरे बच्चे तेरी माँ ये रोज़ कहानी सुनाये, चंदा मामा परियों वाली चैन से तू सो जाये, सपनें में फिर आये वह गिलहरी, बगिया में जो है कूदती रहती, तुम उसके पीछे भागते रहते, और मैं तुमको बस देखती रहती"। राजीव बरनवाल द्वारे बुनें इन प्यारे प्यारे बोलों पर श्रेया की सुरीली आवाज़ और नर्म अंदाज़ नें लोरी के मूड को बरक़रार रखा है, और लोरी जौनर के गीतों में बहुत दिनों के बाद एक इजाफ़ा हो गया है। कौशिक दत्ता नें इस गीत के ऒर्केस्ट्रेशन के साथ भी पूरा पूरा न्याय किया है। हमारी तरफ़ से तो इस गीत को भी "थम्प्स-अप"!!!

'सतरंगी पैराशूट' ऐल्बम का तीसरा गीत है शान की आवाज़ में। इस यात्रा-गीत के बोल हैं "चल पड़े हम क्या ठिकाना सोचा नहीं, मंज़िल पता है रस्ता कहाँ पता नहीं, बस चल दिये..."। जी हाँ, मुझे भी इस गीत को सुनते हुए शान का ही गाया प्रसिद्ध ग़ैर फ़िल्मी गीत "आँखों में सपने लिये घर से हम चल तो दिये" की याद आ गई थी। श्रेया की गाई लोरी की ही तरह इस गीत में भी गीतकार नें जो कहना चाहा है, संगीतकार नें धुन और ऒर्केस्ट्रेशन से उनका पूरा पूरा साथ निभाया है, जिस वजह से ऐल्बम में दिलचस्पी बनी रहती है, ठीक वैसे ही जैसे कि इस गीत में ज़िंदगी में बने रहने की सबक दी गई है।

और अब एक महत्वपूर्ण गीत। महत्वपूर्ण इसलिए कि इसे गाया है लता मंगेशकर नें। यह चमत्कार ही है कि ८३ वर्षीय लता जी नें २४ वर्षीय फ़िल्मकार की इस फ़िल्म के इस गीत में एक ८ वर्षीय बच्चे का पार्श्वगायन किया है। "तेरे हँसने से मुझको आती है हँसी, तेरी सारी बातें चुपचाप मैं सुनती" में लता जी की गायन के साथ साथ उनकी वह ख़ास हँसी भी सुनने को मिलती है जो हँसी उनके गाये बहुत से गीतों में हमनें समय समय पर सुना है। कुछ की याद दिलायें? 'प्रेम रोग' में "भँवरे ने खिलाया है फूल", 'सन्यासी' में "सुन बाल ब्रह्मचारी मैं हूँ कन्याकुमारी", 'एक दूजे के लिए' में "हम बने तुम बने", 'सितारा' में "थोड़ी सी ज़मीन थोड़ा आसमान" वगेरह। आपको बता दूँ कि 'सतरंगी पैराशूट' के इस गीत को स्वरबद्ध कौशिक दत्ता ने नहीं बल्कि शमीर टंडन नें किया है। वही शमीर टंडन जिन्होंने लता जी को 'पेज-३' और 'जेल' में गवाया है। शमीर आज के दौर के उन गिनेचुने संगीतकारों में से हैं जिनके साथ लता जी काम करती हैं। हमनें शमीर जी से सम्पर्क किया कि लता जी के साथ उनके ऐसोसिएशन के बारे में हमें कुछ विस्तार से बतायें, तो शमीर जी नें हमसे वादा किया है कि जल्द ही हमें इंटरव्यु देंगे, लेकिन व्यस्तता की वजह से यह संभव नहीं हो सका है। हमारी कोशिशें जारी हैं कि जल्द से जल्द हम उनसे बातचीत कर आप तक पहँचायें। ख़ैर, "तेरे हँसने से" गीत इस ऐल्बम रूपी अंगूठी का नगीना है, और यही सिर्फ़ काफ़ी है कि इसे लता जी नें गाया है। १९४२ में उन्होंने अपना पहला गीत रेकॊर्ड किया था और यह है साल २०११, यानी कि इस गीत के साथ लता जी के करीयर के ७० साल पूरे हो रहे हैं। आश्चर्य, आश्चर्य, आश्चर्य!!!

साधारणत: लोरियों पर माँ दादी नानी का एकतरफ़ा हक़ रहा है और फ़िल्मों की कहानियों में भी लोरी गीत इन्हीं किरदारों पर फ़िल्माये जाते रहे हैं। लेकिन कभी कभार गायकों नें भी लोरियाँ गाये हैं, जैसे कि सहगल साहब नें फ़िल्म 'ज़िंदगी' में "सो जा राजकुमारी सो जा", 'प्रेसिडेण्ट' फ़िल्म में "एक राज्य का बेटा लेकर उड़ने वाला घोड़ा", चितलकर नें 'आज़ाद' में "धीरे से आजा री अखियन में निंदिया", मुकेश नें फ़िल्म 'मिलन' में "राम करे ऐसा हो जाये", रफ़ी साहब नें 'ब्रह्मचारी' में "मैं गाऊँ तुम सो जाओ", और किशोर कुमार नें महमूद की फ़िल्म 'कुंवारा बाप' में "आ री आजा निंदिया तू ले चल कहीं" जैसी लोरियाँ न केवल गाये बल्कि ये लोरियाँ बहुत बहुत मशहूर भी हुईं। लेकिन उस गीत को आप क्या नाम देंगे जो वैसे तो लोरी नहीं है, पर बच्चा बड़ा होनें के बाद अपने बचपन में अपनी माँ से सुनी हुई लोरी को याद करते हुए गाता है? 'सतरंगी पैराशूट' में भी इसी तरह का एक गीत है राहत फ़तेह अली ख़ान का गाया हुआ। "तेरी लोरी याद है आती, तेरे बिना मैं सो न पाऊँ, कैसा है न जाने अंधेरा, देखो मैं डर डर जाऊँ"। मेरे ख़याल से यही गीत इस ऐल्बम का अब तक का सब से अच्छा गीत है, जो दिल को छू जाता है। राहत साहब की आवाज़ वह माध्यम है जो शब्दों को दिल की गहराइयों तक पहुँचाने का काम करती है। जैसा कि हमनें कहा लोरी को याद करते हुए गाया जा रहा है यह गीत, लेकिन इसकी शक्ल भी लोरी जैसी ही है। एक और 'थम्प्स-अप'!

जिस तरह से शमीर टंडन इस फ़िल्म एक अतिथि संगीतकार है वैसे ही पिंकी पूनावाला अतिथि गीतकार के रूप में इस फ़िल्म का एक गीत लिखा है - "कभी लगी हाथों को छू कर ख़ुशी उड गई, कभी लगी कभी न आयेगी हाथ ये मनचली, कभी छू लूँ कभी पा लूँ, कभी आँखें मूंद कोई सपना देख लूँ, कभी चलूँ कभी दौड़ूँ, कभी उड़ने की ख़्वाहिशें दिल में रख लूँ, उड़ जा उड़ जा ऊँचे आसमाँ को छू जा, जी जा जी जा अपने सपनों को जी जा"। और इसे आवाज़ें दी हैं 'ज़ी सा रे गा मा' प्रतियोगिता के प्रतिभागी अभिलाषा, अली शेर और ख़ुर्रम नें। गायकी अच्छी है इन सब की, और इन नई आवाज़ों में इस गीत का भाव भी सटीक बैठता है कि अपनें सपनों को जी जा, ऊँचे आसमाँ पे उड़ जा। एक और आशावादी गीत!
एक और सरप्राइज़ 'सतरंगी पैराशूट' ऐल्बम में आप पा सकते हैं उषा उथुप की आवाज़ में एक गीत, बल्कि एक रीमिक्स गीत। 'मिस्टर नटवरलाल' फ़िल्म का वह मशहूर गीत "मेरे पास आओ मेरे दोस्तों एक क़िस्सा सुनो" अमिताभ बच्चन का गाया हुआ, उसे उषा जी नें अपनी ख़ास शैली में गाया है। इन दोनों की हम तुलना नहीं करना चाहेंगे। उसमें बिग-बी का स्टाइल था, इसमें उषा उथुप की ख़ास अंदाज़-ए-बयाँ है जिसके लिए वो जानी जाती हैं। हम तो बस विनीत खेत्रपाल जी का शुक्रिया ही अदा करेंगे जिन्होंने चार अलग अलग दौर के गायकों को एक साथ इस फ़िल्म में लेकर आये हैं, यानी कि पहले दौर से लता मंगेशकर, उसके बाद उषा उथुप, आज की दौर से श्रेया, शान, राहत, और आनेवाले कल से अभिलाषा, अली शेर और ख़ुर्रम को। 'सतरंगी पैराशूट' ऐल्बम का समापन 'सतरंगी थीम' से होता है जो एक कर्णप्रिय पीस है, जिसका बेस पाश्चात्य है और एक अंतर्राष्ट्रीय अपील है।

हमारी तरफ़ से 'सतरंगी पैराशूट' ऐल्बम को १० में ७.५ की रेटिंग् दी जाती है। और आपके लिए यही सुझाव है कि इस फ़िल्म का संगीत अच्छा है, लेकिन कामयाब होगा कि नहीं यह फ़िल्म पर निर्भर करती है। अगर सही तरीक़े से प्रोमोट किया जाये तो यह संगीत भी कमाल कर सकता है। इस ऐल्बम से हमारा पिक है राहत फ़तेह अली ख़ान क गाया "तेरी लोरी याद है आती"। अब 'ताज़ा सुर ताल' स्तंभ से मुझे इजाज़त दीजिये, शाम को 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर दुबारा मुलाक़ात होगी, नमस्कार!



अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Monday, January 18, 2010

"इश्किया" विशाल और गुलज़ार ने दिया नया संगीतमय तोहफा

ताज़ा सुर ताल ०३/ २०१०

सुजॊय - सजीव, यह इस साल के पहले महीने जनवरी का तीसरा 'ताज़ा सुर ताल' है। हमने अब तक इस महीने 'दुल्हा मिल गया', और वीर फ़िल्मों के संगीत की चर्चा की है। इनमें से 'दुल्हा मिल गया' रिलीज़ हो चुकी है, लेकिन फ़िल्म अब तक रफ़्तार नहीं पकड़ पाई है शाहरुख़ ख़ान के होने के बावजूद।

सजीव - और सुजॊय, इसी महीने 'प्यार इम्पॊसिबल' और 'चांस पे डांस' भी प्रदर्शित हो चुकी है, लेकिन बहुत ज़्यादा उम्मीदें इनमें भी नज़र नहीं आ रही। बता सकते हो क्या कारण हो सकता है?

सुजॊय - मुझे तो यही लगता है कि 'अवतार' और '३ इडियट्स' का नशा अभी तक लोगों के ज़हन से उतरा नहीं है। क्या होता है न कि हब कोई फ़िल्म बहुत ज़्यादा हिट हो जाती है, तो उसके ठीक बाद रिलीज़ होने वाली फ़िल्में कुछ हद तक उसकी चपेट में आ ही जाते हैं। अच्छा सजीव, इससे पहले कि हम आज के फ़िल्म की बातें शुरु करें, क्यों न आप जल्दी जल्दी 'प्यार इम्पॊसिबल' और 'चांस पे डांस' के म्युज़िक के बारे में हमारे पाठकों को एक हल्का सा आभास करा दें!

सजीव - ज़रूर! देखो सुजॊय, जहाँ तक 'चांस पे डांस' के म्युज़िक का सवाल है, करीब करीब सभी गानें वेस्टर्ण डांस और फ़्युज़न डांस को आधार बनाकर ही तैयार किए गए हैं। बहुत ज़्यादा फ़ूट टैपरिंग् नंबर्स हैं जो डिस्कोज़ में काफ़ी कामयाब रहेंगे। "ढैन टे नैन" के बाद अब बारी है "पें पें पेपें" के साथ झूमने की। लेकिन इस बार विशाल भारद्वाज नहीं, बल्कि प्रीतम हैं संगीतकार। इस गीत को लोग पसंद कर रहे हैं, शहनाई और पाश्चात्य संगीत का अच्छा फ़्युज़न है इस गीत में।

सुजॊय - सजीव, मेरे पास उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान साहब के शहनाई का एक कैसेट था किसी ज़माने में, उसमें यह धुन थी, और यह कैसेट उस ज़माने में शादियों के रिसेप्शन में अक्सर बजते रहते थे। अच्छा, 'प्यार इम्पॊसिबल' में "टेन ऒन टेन" और "प्यार इम्पॊसिबल" गीतों के अलावा तो कोई गीत सुनने को ही नहीं मिला कहीं पर। मेरा ख़याल है कि इस फ़िल्म के संगीत में चर्चा करने लायक कोई भी ख़ास बात नहीं है। उदय चोपड़ा और प्रियंका चोपड़ा की जोड़ी को भी लोग पचा नहीं पाए।

सजीव - ख़ैर, आओ अब आते हैं आज की फ़िल्म पर जिसके गानें हम सुनेंगे भी और चर्चा भी करेंगे। पहला गाना पहले सुनों और बताओ कि आज किस फ़िल्म के संगीत को लेकर मैं हाज़िर हुआ हूँ।

गीत: दिल तो बच्चा है...Dil to bachha hai (ishqiya)


सुजॊय - वाह वाह, आज आप 'इश्किया' लेकर आए हैं। मैं भी कल सोच ही रहा था कि कब हम इस फ़िल्म को शामिल करेंगे। बेहद ख़ास फ़िल्म होने वाली है यह। और जहाँ तक इस गीत का सवाल है, राहत फ़तेह अली ख़ान का गाया हुआ, एक अलग ही अंदाज़ का और लीग से हट कर गाना है। और हम इस मंच पर ख़ास तौर पे उन फ़िल्मों को ही शामिल करते हैं जिनके संगीत में कुछ अहम बात दिखाई दे, क्यों सजीव?

सजीव - बिल्कुल सही कहा। और पता है इस फ़िल्म के गानें क्यों लीग से हट के है? क्यों कि इन्हे लिखा है गुलज़ार साहब ने। उनके ग़ैर पारम्परिक लेखनी जारी है और "दिल तो बच्चा है जी" में भी उन्होने उसी अंदाज़ का परिचय दिया है।

सुजॊय - 'माचिस', 'ओमकारा', और 'कमीने' जैसी कामयाब फ़िल्मों के बाद गुलज़ार साहब और विशाल भारद्वाज एक बार फिर से गीतकार संगीतकार जोड़ी के रूप में इस फ़िल्म में सामने आए हैं। अच्छा अभी हाल के कुछ सालों में राहत फ़तेह अली ख़ान ने कई लोकप्रिय गानें गाए हैं, ख़ास कर प्रीतम और साजिद वाजिद जैसे संगीतकारों के लिए। अब देखिए इस फ़िल्म में विशाल ने भी उनसे गाना लिया और क्या ख़ूब सुफ़ीयाना अंदाज़ का प्रदर्शन किया है राहत साहब ने!

सजीव - इस गीत में जो गीटार का इस्तेमाल हुआ सुनाई देता है, उसमें एक स्पनिश फ़ील सी आई है, और विशाल साहब तो भली भांति जानते हैं कि किस तरह से भारतीय और वेस्टर्ण म्युज़िक को मिक्स किया जाता है। कुल मिलाकर एक बेहद फ़्रेश गीत सुना हमने। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि यह गीत लोगों की जुबान से जल्द हटने वाला नहीं। हर कोई अपने दिल को बच्चा करार देने पर लगा है। चलो अब बारी है दूसरे गीत की। तो सुन लेते हैं यह गीत।

गीत: इब्न-ए-बतूता बगल में जूता...ibn-e-batuta (ishqkiya)


सुजॊय - फ़ुर्‍र्‍र्‍र‍र्‍र्‍ चुर्‍र्‍र्‍र‍र्‍र्‍ फ़ुर्‍र्‍र्‍र‍र्‍र्‍ चुर्‍र्‍र्‍र‍र्‍र्‍

सजीव - अरे अरे अरे ये क्या कर रहे हो?

सुजॊय - ओ हो सॊरी, गाना ख़तम हो गया? मैं तो बस गीत का मज़ा ले रहा था! बहुत दिनों के बाद कुछ अलग हट के गानें सुनने को मिले हैं ना तो इसलिए मैं उनमें बह सा गया था। जैसा संगीत भी मज़ेदार है, बोल तो और भी लाजवाब! गुलज़ार साहब अगैन ऐट हिज़ बेस्ट!

सजीव - बिल्कुल, और सुखविंदर सिंह और मिका की मस्ती भरी आवाज़ों ने और फ़ूट टैपरिंग् रीदम ने गाने को एक पेप्पी फ़ीलिंग् दी है। यह गीत ना हमें केवल किसी गाँव के खेतों की हरियाली में खींच ले जाते हैं, बल्कि एक हास्य रस का आभास भी कराते है। "थोड़ा आगे गतिरोधक है" जैसे बोल गुलज़ार साहब के कलम से ही निकलते रहे हैं।

सुजॊय - अब इससे पहले की अगले गीत की तरफ़ हम बढ़ें, आइए कुछ जानकारी हम अपने श्रोताओं व पाठकों को दे दें इस फ़िल्म के बारे में। विशाल भारद्वाज की फ़िल्म है और निर्देशक हैं अभिशेक चौबे। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं नसीरुद्दिन शाह, अरशद वारसी और विद्या बालन प्रमुख। गीतकार संगीतकार तो बता ही चुके हैं। दरसल 'इश्किया' बॊलीवुड की कोई फ़ॊर्मुला फ़िल्म नहीं है। इस बात का अंदाज़ा तो कोई भी इस बात से लगा ही सकता है कि फ़िल्म में नसीरुद्दिन शाह मुख्य भूमिका में हैं। यह फ़िल्म है दो गैंग्स्टर्स (हूलीगन्स) और एक आकर्षक गाँव की लड़की की। अब इस फ़िल्म की कहानी के बारे में पहले से ही बताने की ग़ुस्ताख़ी मैं नहीं करूँगा, वरना अगली बार से पाठक हमें पढ़ना ही बंद कर देंगे।

सजीव- हाँ, और फ़िल्मों का मज़ा तो थियटर में जाकर ख़ुद देखने में ही है। चलो अब तीसरा गाना सुनते हैं रेखा भारद्वाज की आवाज़ में। और इसमें है गुलज़ार साहब की शायरी। इस ग़ज़ालनुमा गीत में रेखा जी ने एक बार फिर से साबित किया है कि आज की दौर में उनकी गायकी एक बहुत ही ख़ास मुक़ाम रखती है।

सुजॊय - यह गीत टूटे सपनों के बारे में है, जीवन के प्यास के बारे में है, क़रार के बारे में है। अब और ज़्यादा कहने की ज़रूरत नहीं, सीधे सुनते हैं इस गीत को।

गीत: अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ...Ab mujhe koi intezaar (ishiqiya)


सजीव- वाह! मज़ा आ गया है! और अब रेखा जी की ही आवाज़ में एक और गीत जो मेरा इस ऐल्बम का सब से फ़ेवरीट गीत है। "बड़ी धीरे जली रैना, धुआँ धुआँ नैना"। फ़िल्म 'वीर' में "कान्हा" गाने के बाद एक बार फिर से कुछ शास्त्रीय अंदाज़ में रेखा की आवाज़ इस गीत को एक अलग ही मुक़म तक लेके गई हैं। गीत तो वैसे फ़्युज़न ही है, बीट्स वेस्टर्ण है, लेकिन कुल मिलाकर यह गीत बिल्कुल इस मिट्टी से जुड़ा हुआ है। पर्क्युशन का सही इस्तेमाल किया है विशाल ने।

सुजॊय - एक और ख़ास बात क्या है इन सभी गीतों में पता है? ये गानें अपने आप में इतने सशक्त हैं कि इन्हे सुनते हुए हम इस बात को अपने दिमाग़ में भी लाए कि ये गानें किन कलाकारों पर फ़िल्माए गए होंगे! ये ख़ुद ही अपनी पहचान रखते हैं और ये किसी तरह के फ़िल्मांकन की मोहताज नहीं बनेंगे, ऐसा मेरा ख़याल है। अब लग रहा है कि २०१० के दशक में फ़िल्म संगीत में क्रांति की नई लहर आएगी और एक अलग ही सुरीला दौर एक बार फिर से जी उठेगा। चलिए सुनते हैं यह गीत।

गीत: बड़ी धीरे जली रैना...badi dhiire jali (ishiqiya)


"इश्किया" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****१/२
इस जोड़ी से हमेशा ही उम्मीद रहती है, दिल तो बच्चा है के बोल बेहद मजेदार हैं, और धुन में राज कपूर एरा का रेट्रो अंदाज़ खूब जमता है, इब्ने-बतूता एकदम तरोताज़ा है और जिस अंदाज़ से "फुर्र्र" बोला जाता है देर तक कानों में गूंजता रह जाता है, रेखा के गाये दोनों ही गीत गुलज़ार की चिर परिचित ग्लूमी अंदाज़ के हैं, बड़ी धीरे जली में लाइव वाध्यों का सुन्दर इस्तेमाल हुआ है, अन्तरो के बीच बजते संगीत में गजब का आकर्षण है, इन्हें सुनते हुए आप पूरा दिन बिता सकते हैं फिर भी ऊब नहीं पायेगें...इस वर्ष की बहुत अच्छी संगीतमयी शुरुआत हुई है इशिकिया और कुछ हद तक वीर के संगीत के चलते...इश्किया को आवाज़ ने दिए साढ़े चार तारों की रेटिंग...

अब पेश है आज के तीन सवाल-

TST ट्रिविया # 07-सन् १९६२ में सम्पूरण सिंह एक मशहूर फ़िम निर्माता-निर्देशक के सहायक बने थे। बताइए उस निर्माता-निर्देशक का नाम।

TST ट्रिविया # 08-"दिल में ऐसे संभलते हैं ग़म जैसे कोई ज़ेवर संभालता है। टूट गए, नाराज़ हो गए, अंगूठी उतारी, वापस कर दिए। कंगन उतारे, सात फेरों के साथ वापस कर दिए। पर बाक़ी ज़ेवर जो दिल में रख लिए उनका क्या होगा?" ये अल्फ़ाज़ कहे थे गुलज़ार साहब ने विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में। इन अल्फ़ाज़ों को पढ़कर आपको क्या लगता है कि गुलज़ार साहब ने इसके बाद कौन सा अपना गाना बजाया होगा?

TST ट्रिविया # 09-'जुर्म और सज़ा' तथा 'ज़िंदगी और तूफ़ान' जैसी फ़िल्मों को आप विशाल भारद्वाज के साथ कैसे जोड़ सकते हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी एक बार आगे बड़ी चली जा रही हैं ३ में से २ सही जवाब देकर आपने कमाए ४ और अंक, बधाई...

Friday, February 1, 2008

आवाज़ के वाहक

हिन्द-युग्म ने इंटरनेट की जुगलबंदी से दुनिया भर में फैले युवा संगीतकारों, गीतकारों, गायकों, संगीत आलेखकों, संगीत समीक्षकों और वाचकों इत्यादि को एक मंच पर लाकर खड़ा कर दिया है। संगीत के हर पहलू का युग्म (जोड़) है हमारा यह प्रयास आवाज।

संगीतकार

हिन्द-युग्म ने १७ संगीतकारों की मदद से कुल ३७ गीत तैयार कर लिये हैं। वर्तमान में १५ संगीतकार अलग-अलग गीतों पर काम कर रहे हैं।

14. शिशिर पारखी,
15. कुमार आदित्य विक्रम


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