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Monday, June 7, 2010

"ज़रा मुरली बजा दे मेरे श्याम रे" - सबिता बनर्जी की आवाज़ में एक भूला बिसरा भजन

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 411/2010/111

मस्कार दोस्तों! बेहद ख़ुशी और जोश के साथ हम फिर एक बार आप सभी का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में हार्दिक स्वागत करते हैं। पिछले डेढ़ महीने से आप हर शाम 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' का आनंद ले रहे थे, और हमें पूरी उम्मीद है और आप के टिप्पणियों से भी साफ़ ज़ाहिर है कि आपने इस विशेष प्रस्तुति को भी हाथों हाथ ग्रहण किया है। चलिए आज से हम वापस लौट रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अपने उसी पुराने स्वरूप में और फिर से एक बार गुज़रे ज़माने के अनमोल नग़मों के उसी कारवाँ को आगे बढ़ाते हैं। अब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कुल ४१० कड़ियाँ प्रस्तुत हो चुकी हैं, आज ४११-वीं कड़ी से यह सिलसिला हम आगे बढ़ा रहे हैं। तो दोस्तों, इस नई पारी की शुरुआत कुछ ख़ास अंदाज़ से होनी चाहिए, क्यों है न! इसीलिए हमने सोचा कि क्यों ना दस ऐसे गानों से इस पारी की शुरुआत की जाए जो बेहद दुर्लभ हों! ये वो गानें हों जिन्हे आप में से बहुतों ने कभी सुनी ही नहीं होगी और अगर सुनी भी हैं तो उनकी यादें अब तक बहुत ही धुंधली हो गई होंगी। पिछले डेढ़ महीने में हमने यहाँ वहाँ से, जाने कहाँ कहाँ से इन दस दुर्लभ गीतों को प्राप्त किया है जिन्हे इस ख़ास लघु शृंखला में पिरो कर हम आज से आप तक पहुँचा रहे हैं। तो प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर नई लघु शृंखला 'दुर्लभ दस'। शुरुआत ईश्वर वंदना के साथ; जी हाँ, एक भक्ति रचना से इस शृंखला का आग़ाज़ कर रहे हैं। ये है फ़िल्म 'बाजे घुंगरू' से सबिता बनर्जी की गाई हुई भजन "ज़रा मुरली बजा दे मेरे श्याम रे, पड़ूँ बार बार तोरी प‍इयाँ रे"। ये वो ही सबिता बनर्जी हैं जो आगे चलकर संगीतकार सलिल चौधरी की धर्मपत्नी बनीं और सबिता बनर्जी से बनीं सबिता चौधरी। युं तो इन्होने बंगला में ही ज़्यादा गीत गाए हैं, लेकिन हिंदी फ़िल्मों के लिए भी समय समय पर कई बार अपनी आवाज़ दी है।

'बाजे घुंगरू' १९६२ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था राम राज फ़िल्म्स ने। फ़िल्म को निर्देशित किया एस. श्रीवास्तव ने और इसके मुख्य कलाकार थे मनहर देसाई और नलिनी चोनकर। फ़िल्म में संगीत था धनीराम प्रेम का। प्रस्तुत भजन गीतकार शिवराज श्रीवास्तव का लिखा हुआ है। आपको यह भी बता दें कि इस फ़िल्म का शीर्षक गीत सबिता बनर्जी ने मोहम्मद रफ़ी और सीता के साथ मिलकर गाया था, जिसके बोल थे "बाजे घुंगरू छन छन छन"। संगीतकार धनीराम को शास्त्रीय संगीत को लुभावने रूप में ढालने की अपनी विशेषज्ञता प्रदर्शित करने का मौका इसी फ़िल्म में मिला। ख़ास कर आज की यह प्रस्तुत भजन, जिसमें सितार के टुकड़ों का इतनी मधुरता के साथ इस्तेमाल किया गया है कि भक्ति रस जैसे भजन के बोलों में ही नहीं बल्कि इसकी हर एक धुन में समा गई है। ६० के दशक का यह दौर धनीराम के संगीत सफ़र का आख़िरी दौर था। १९६२ में 'बाजे घुंगरू' के अलावा उन्होने फ़िल्म 'मेरी बहन' में भी संगीत दिया। फिर वर्षों उपेक्षित रहने के बाद उन्हे मिला १९६७ की फ़िल्म 'आवारा लड़की' में फिर एक बार शास्त्रीय शैली पर आधारित गानें बनाने का मौका। बहुत ही अफ़सोस की बात है कि इसके बाद धनीराम को किसी निर्माता ने मौका नहीं दिया। जैसे कि पंकज राग अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में लिखते हैं कि "यह विचार स्वयमेव ही आता है कि यदि कुछ निर्माताओं ने अपने 'बी' या 'सी' ग्रेड की सामाजिक फ़िल्मों में ही धनीराम को और अवसर दिया होता तो हमें शास्त्रीयता और सुगमता के बेहतरीन मिश्रण की पता नहीं कितनी और रसभरी रचनाएँ सुनने को मिल सकती थीं।" तो आइए दोस्तों, 'दुर्लभ दस' लघु शृंखला के पहले अंक में सुनते हैं शिवराज श्रीवास्तव का लिखा, धनीराम का संगीतबद्ध किया और सबिता बनर्जी का गाया फ़िल्म 'बाजे घुंगरू' से यह भजन।



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्मों में संगीतकार बनने से पहले धनीराम ने लाहौर में कई फ़िल्मों में गायक के रूप में अपनी क़िस्मत आज़माई थी, जैसे कि फ़िल्म 'धमकी' (१९४५) और 'झुमके' (१९४६)।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस धार्मिक गीत के गायक मुख्य रूप से एक संगीतकार हैं, लेकिन उन्होने इस फ़िल्म में संगीत नहीं दिया है। ये वो शख़्स हैं जिनके दोनों बेटे मशहूर संगीतकार जोड़ी के रूप में फ़िल्म जगत में छाए। तो फिर इस गीत के गायक का नाम बताएँ। ४ अंक।

२. इस गीत के संगीतकार धार्मिक और पौराणिक फ़िल्मों के संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं, और महत्वपूर्ण बात यह कि इनके संगीत से सजे एक धार्मिक फ़िल्म का एक गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हुआ कि उसे उस साल का सर्वश्रेष्ठ गीत करार दिया गया था। संगीतकार का नाम बताएँ। २ अंक।

३. यह फ़िल्म १९५३ की फ़िल्म है और फ़िल्म के शीर्षक में शक्ति की देवी का नाम छुपा है। फ़िल्म का नाम बताएँ। ३ अंक।

४. इस पूरे गीत में उसी देवी के चमत्कारों का वर्णन हुआ है जिनके नाम से फ़िल्म का शीर्षक है। गीत के बोल बताएँ। २ अंक।

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, February 23, 2010

गर तेरी नवाज़िश हो जाए...अंदाज़े मुहब्बत और आवाजे तलत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 354/2010/54

'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़' शृंखला की यह है चौथी कड़ी। १९५४ में तलत महमूद के अभिनय व गायन से सजी दो फ़िल्में आईं थी - 'डाक बाबू' और 'वारिस'। इनके अलावा बहुत सारी फ़िल्मों में इस साल उनकी आवाज़ छाई रही जैसे कि 'मिर्ज़ा ग़ालिब', 'टैक्सी ड्राइवर', 'अंगारे', 'सुबह का तारा', 'कवि', 'मीनार', 'सुहागन', 'औरत तेरी यही कहानी', और 'गुल बहार'। आज की कड़ी के लिए हमने चुना है फ़िल्म 'गुल बहार' की एक ग़ज़ल "गर तेरी नवाज़िश हो जाए"। संगीतकार हैं धनीराम और ख़य्याम। इस फ़िल्म में तीन गीतकारों ने गीत लिखे हैं - असद भोपाली, जाँ निसार अख़्तर और शेवन रिज़्वी। प्रस्तुत ग़ज़ल के शायर हैं शेवन रिज़्वी। नानुभाई वकील निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे शक़ीला, हेमन्त और कुलदीप कौर। दोस्तों, जमाल सेन और स्नेहल भाटकर की तरह धनीराम भी एक बेहद कमचर्चित संगीतकार रहे। यहाँ तक कि उन्हे बी और सी-ग्रेड की फ़िल्में भी बहुत ज़्यादा नहीं मिली। फिर भी जितना भी काम उन्होने किया है, जितने भी धुनें उन्होने बनायी हैं, वे सब फ़िल्म संगीत धरोहर के कुछ ऐसे अनमोल रतन हैं कि उनके योगदान को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। धनीराम फ़िल्म जगत में दाख़िल हुए थे १९४५ में जब पंडित अमरनाथ ने उनसे फ़िल्म 'झुमके' का "तेरे बग़ैर भी दिलशाद कर तो सकता हूँ" और 'धमकी' का "अपने कोठे मैं खड़ी" जैसे गीत गवाया था। गायक के रूप में धनीराम को निराशा ही हाथ लगी। बतौर संगीतकार उनकी पहली फ़िल्म थी १९४८ की 'पपीहा रे'। उसके बाद १९५३ में उनकी अगली फ़िल्म आई 'धुआँ', जिसका संगीत धनीराम ने वसंत देसाई के साथ शेयर किया, ठीक वैसे ही जैसे कि आज के गीत का संगीत उन्होने शेयर किया ख़य्याम साहब के साथ। धनीराम के सब से चर्चित फ़िल्म रही 'डाक बाबू' ('५४), लेकिन इस फ़िल्म के संगीत की भी उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी कि होनी चाहिए थी। धनीराम के करीयर की कुछ और महत्वपूर्ण फ़िल्मों के नाम हैं - 'गुल बहार', 'रूप बसंत', 'शाही चोर', 'आँख का नशा', 'शाही बाज़ार', 'तक़दीर', 'बाजे घुँघरू', 'मेरी बहन', और 'आवारा लड़की'। (सौजन्य: धुनो की यात्रा - पंकज राग)।

दोस्तों, हमने इस शृंखला की पिछली कड़ियों में आपको बताया कि किस तरह से तलत महमूद संगीत की दुनिया से जुड़े और कैसे उनके अभिनय की भी पारी शुरु हुई थी कलकत्ता के न्यु थिएटर्स में। फ़िल्मी प्लेबैक में उनकी एंट्री किस तरह से हुई यह हम आपको कल की कड़ी में बताएँगे। आज बात करते हैं उनके ग़ज़ल गायकी की। तलत साहब की आवाज़ में संगीतकारों को ग़ज़ल गायकी के सभी गुण दिखाई देते थे। उनका उच्चारण और अदायगी बिल्कुल पर्फ़ेक्ट हुआ करती थी, ना कम ना ज़्यादा। उनका एक्स्प्रेशन, उनके जज़्बात, उनका स्टाइल कुछ ऐसा था कि जो किसी भी दूसरे गायक में नहीं मिलता था। उनकी आवाज़ में जो मिठास, जो कोमलता, और जो दर्द था, वही उनको दूसरे गायकों की भीड़ से अलग करती थी। जब वो फ़िल्म जगत में आए तब उनके जैसे आवाज़-ओ-अंदाज़ वाला कोई भी गायक नहीं था। इसलिए एक ताज़े हवा के झोंके की तरह उनकी एंट्री हुई और आज तक उनके जैसी आवाज़ वाला कोई भी नहीं जन्मा। 'ग़ज़लों के बादशाह' के रूप में तलत साहब जाने गए, और जल्द ही वो एक 'लिविंग् लीजेण्ड' के रूप में माने गए। आज भले वो हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ के जलवे आज भी बरक़रार है। ६० के दशक के अंत में फ़िल्म संगीत ने जब करवट बदली, ग़ज़लों और सॊफ़्ट रोमांटिक गीतों का चलन कम होने लगा, तब तलत साहब को यह बदलाव रास नहीं आया और उन्होने अपना पूरा ध्यान ग़ैर फ़िल्मी ग़ज़लों में लगा दिया। ८० के दशक में भी उनकी गाई हुई ग़ज़लों के रिकार्ड्स जारी हुए हैं। इस शृंखला में भी हम उन्ही में से एक ग़ज़ल आपको सुनवाएँगे, लेकिन आज प्रस्तुत है फ़िल्म 'गुल बहार' की यह ग़ज़ल, जिसके चार शेर इस तरह से हैं -

गर तेरी नवाज़िश हो जाए गर तेरा इशारा हो जाए,
हर मौज सहारा दे जाए तूफ़ान किनारा हो जाए।

तुम हम से जफ़ाएँ करते हो, और हम ये दुआएं देते हैं,
जो हाल हमारा है इस दम वह हाल तुम्हारा हो जाए।

हम इश्क़ के मारे दुनिया में इतनी सी तमन्ना रखते हैं,
दामन जो तुम्हारा हाथ आए जीने का सहारा हो जाए।

परदा तो हटा दो चेहरे से वीरानें गुलिस्ताँ बन जाएँ,
जलवा जो दिखा दो तो रोशन क़िस्मत का सितारा हो जाए।



क्या आप जानते हैं...
धनीराम और दक्षिण के संगीतकार आर सुदर्शन ने मिलकर ए वी एम् की फिल्म "लड़की" में संगीत दिया था, इस फिल्म में गीता दत्त की आवाज़ एक खूबसूरत गीत था "बाट चलत नयी चुनरी रंग डाली". इन्हीं शब्दों को "रानी रूपमती" (१९५९) में रफ़ी और कृष्णराव चोनकर ने भैरवी में भी खूब गाया था

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

1. मतले में ये दो शब्द हैं - "ख्याल" और "करार", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. इस शायर का नाम वही है जो "मैंने प्यार किया" में सलमान खान का स्क्रीन नाम था, इस गीतकार का पूरा नाम बताएं- २ अंक.
3. इस गीत के संगीतकार ने १९३७ में फिल्म जीवन ज्योति से शुरूआत की थी इनका नाम बताएं- २ अंक.
4. इस गज़ल की फिल्म का नाम क्या है, अभी कुछ सालों पहले फिर इसी नाम की एक फिल्म बनी थी जिसमें "एक दिन तेरी राहों में..." जैसा सुपर हिट गाना था- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
इस बार निशाना एक दम सटीक है इंदु जी, अरे आप तो जवानों को मात दे रही हैं, आपको बू... कहने की जुर्रत भला हम कैसे कर सकते हैं, अवध जी की तस्वीर कल पहली बार देखी, आप भी खासे जवाँ हैं जनाब. आप दोनों को बधाई...शरद जी स्वागत है आपके २ अंक भी सुरक्षित...बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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