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Thursday, April 28, 2016

अखियाँ नु चैन न आवे....नुसरत बाबा का रूहानी अंदाज़ आज 'कहकशाँ’ में




कहकशाँ - 8
नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ और मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ें 
"अब तो आजा कि आँखें उदास बैठी हैं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है जुदाई के रंग में सराबोर दो रचनाएँ, पहली नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ की आवाज़ में और दूसरी मोहम्मद रफ़ी साहब की आवाज़ में।




अब तो आजा कि आँखें उदास बैठी हैं,
भूलकर होश-औ-गुमां बदहवास बैठी हैं।

इश्क़ की कशिश ही ऐसी है कि साजन सामने हो तो भी कुछ न सूझे और दूर जाए तब भी कुछ न सूझे। इश्क़ की तड़प ही ऐसी है कि साजन आँखों में हो तो दिल को सुकूं न मिले और दिल में हो तो आँखों में कुछ चुभता-सा लगे। रूह तब तक मोहब्बत के रंग में नहीं रंगता जब तक पोर-पोर में साजन की आमद न हो। लेकिन अगर दिल की रहबर "आँखें" ही साजन के दरश को प्यासी हों तो बिन मौसम सावन न बरसे तो और क्या हो। यकीं मानिए सावन बारहा मज़े नहीं देता :

आँखों से अम्ल बरसे जो दफ़-अतन कभी,
छिल जाए गीली धरती, खुशियाँ जलें सभी।

बाबा नुसरत ने कुछ ऐसे हीअ भावों को अपने मखमली आवाज़ से सराबोर किया है। "बैंडिट क्वीन" से यह पंजाबी गीत आप सबके सामने पेशे खिदमत है। लेकिन उससे पहले नुसरत फ़तेह अली ख़ाँ साहब के बारे में चन्द अलफ़ाज़ पेश है। ख़ास तौर से क़व्वाली को घर घर पहुँचाने और नए ज़माने के लोगों में इसे दिल-अज़ीज़ बनाने में उनका ख़ास योगदान रहा। उनकी आवाज़ की ख़ास बात यह है कि उनकी रूहानी आवाज़ सुनते हुए एक अलग ही दुनिया में हम पहुँच जाते है, और दिल चाहने लगता है कि गाना बस चलता ही जाए, चलता ही जाए! 13 अक्टुबर 1948 में पाक़िस्तान के फ़ैसलाबाद (जो पहले ल्यालपुर था) में जन्मे नुसरत अपने वालिद फ़तेह अली ख़ाँ के पाँचवीं औलाद थे। छह भाई बहनों में सिर्फ़ उन्होंने मौसिक़ी को आगे बढ़ाया। वैसे शुरुआती दिनों में उनके वालिद नहीं चाहते थे कि वो इस क़व्वाली गायन में आए क्योंकि इसे समाज में ऊँची निगाह से नहीं देखा जाता था। लेकिन नुसरत के जुनून और क़व्वाली के लिए इश्क़ को देख कर वालिद को उनके सामने झुकना पड़ा। तबले से शुरू करने के बाद नुसरत ने रागदारी और बोल बन्दिश की तालिम ली। 1964 में वालिद के इन्तकाल के बाद उनके चाचा मुबारक़ अली ख़ाँ और सलामत अली ख़ाँ ने उनकी तालीम को पूरा होने में उनकी मदद की। यह सोच कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि नुसरत साहब का पहला परफ़ॉरमैन्स था उनके वालिद के मज़ार पर, मौक़ा था वालिद का चेहलुम (चेहलुम यानी कि मुसलमानों में किसी की मौत के बाद चालीसवाँ दिन)। उस दिन वालिद की जुदाई में उनके गले से जो सुर निकले थे, शायद वो ही सुर उनके साथ हमेशा रहा, और शायद यही वजह है कि जुदाई के नगमें उनकी आवाज़ पाकर रूहानी बन जाते हैं। फिर चाहे वह "तेरे बिना नहीं जीना मर जाना" हो या "अखियाँ नु चैन न आवे"।






शायर वो क्या जो न झाँके ख़ुद के अंदर में,
क्या रखा है ख़ल्क-खुल्द, माह-ओ-मेहर में?

साहिर ने प्यासा में कहा है: "ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है" । इस सुखन के हर एक हर्फ़ से कई मायने निकलते हैं, जो ज़िंदगी को सच्चाई का आईना दिखाते हैं। एक मायना यह भी निकलता है कि "अगर बशर (इंसान) को अपनी ख़ुदी पर यकीं न हो, अपनी हस्ती का दंभ न हो, तो चाहे उसे सारी दुनिया ही क्यों न मिल जाए, इस मुक़ाम को हासिल करने का कोई फायदा नहीं।" जब तक इंसान अपने अंदर न झाँक ले और अपनी ताक़त का ग़ुमां न पाल ले, तवारीख़ गवाह है कि उसे कुछ भी हासिल नहीं हुआ है। जो इंसान अपने दिल की सुनता है और ख़ुद के बनाए रास्तों पर चलता है, उसे सारी दुनिया एक तमाशे जैसी लगती है और सारी दुनिया को वह कम-अक्ल से ज़्यादा कुछ नहीं। फिर सारी दुनिया उसे नसीहतें देनी शुरू कर देती है। सच ही है:

मेरी ख़ुदी से रश्क़ जो मेरा ख़ुदा करे,
नासेह न बने वो तो और क्या करे।

मिर्जा असदुल्लाह ख़ाँ "ग़ालिब" ने कहा है-

"मत पूछ कि क्या हाल है मेरा तेरे पीछे,
ये देख कि क्या रंग है तेरा मेरे आगे।"

ग़ालिब की इस ग़ज़ल को कई सारे गुलूकारों ने अपनी आवाज़ से सजाया है। आईये आज हम इस ग़ज़ल को "मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ में सुनते हैं और महसूस करते हैं कि इस ग़ज़ल के एक-एक शेर में कितनी कहानियाँ छिपी हुई हैं।









’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’ व सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

Tuesday, July 31, 2012

बाल मन की कवितायेँ -चाक से बच्चों की जुबान पर


शब्दों की चाक पर - एपिसोड 09

शब्दों की चाक पर हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 




1. रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी ...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.


2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगें. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से ये बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

आज की कड़ी में शैफाली गुप्ता और अभिषेक ओझा के साथ ढेरों नन्हें नन्हें मेहमान भी हैं, टोरंटो से अदीति, और देहरादून से कुहू हैं तो दिल्ली से स्टीवन और क्रिस्टिन के साथ हैं औरंगाबाद से उम्र में बड़ी पर मन से बच्ची सुनीता यादव भी. स्क्रिप्ट है विश्व दीपक की, संचालन रश्मि प्रभा का, प्रस्तुति है अनुराग शर्मा और सजीव सारथी का. तो दोस्तों सुनिए सुनाईये और छा जाईये...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)

या फिर यहाँ से डाउनलोड करें  सूचना - इस हफ्ते हम कवितायेँ स्वीकार करेंगें भाई बहिन के अनूठे रिश्ते, और प्रेम की पहचान त्यौहार रक्षा बंधन पर. अपनी रचनाएँ आप उपर दिए रश्मि जी के पते पर भेज सकते हैं. गुरूवार शाम तक प्राप्त कवितायेँ ही स्वीकार की जायेंगीं.

Tuesday, July 24, 2012

परिवर्तन - एक बोझ या सहज चलन जीवन का

शब्दों की चाक पर - एपिसोड 08

शब्दों की चाक पर हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 


1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.


2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगें. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से ये बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

चलिए अब लौटते हैं अभिषेक ओझा और शैफाली गुप्ता की तरफ जो आज आपके लिए लेकर आये हैं परिवर्तन और परिवर्तन के परिणामस्वरूप उपजे बोझ पर एक काव्यात्मक चर्चा जिसमें भाग ले रहे हैं १८ कवि. आज के कार्यक्रम की स्क्रिप्ट लिखी है हमारे प्लेबैक इंडिया के प्यारे सदस्य विश्व दीपक ने. तो दोस्तों सुनिए सुनाईये और छा जाईये...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)





या फिर यहाँ से डाउनलोड करें 

Wednesday, July 18, 2012

10 गज़लों गीतों के माध्यम से याद करें महान मेहदी हसन साहब को

तालियों की गडगडाहट से गूँजता सभागार और सुरों को अपने तान में समेटती मेहदी हसन साहब की आवाज़. दोस्तों शायद अब ये समां कभी किसी संगीत प्रेमी को देखना नसीब नहीं हो सकेगा क्योंकि खुदा ने उन्हें हम सब से छीनकर अपने पास बुला लिया है ताकि जन्नतें भी उनकी महफिलों से रोशन हो सके. पर उनकी आवाज़ का बेशकीमती खज़ाना तो आज भी हमारे पास सुरक्षित है और ये जादू, कभी कम नहीं हो सकेगा इस बात को हर संगीत प्रेमी स्वीकार करेगा.

दोस्तों सुनिए हमारा ये खास कार्यक्रम, जिसके माध्यम से हम श्रद्धान्जली दे रहे हैं शहंशाह-ए-ग़ज़ल मेहदी हसन साहब को, स्क्रिप्ट है विश्व दीपक की और स्वर है सजीव सारथी का. लगभग ढेढ घंटे के इस पोडकास्ट में आपको मिलेंगें मेहदी साहब के गायन के कई मुक्तलिफ़ अंदाज़. तो दोस्तों कुछ समय के लिए अपने रोजमर्रा के काम से मुक्त होकर डूब जाईये सुरों के इस अथाह समुन्दर में जिसका नाम है मेहदी हसन. 




आपकी सुविधा के लिए हम लिखित स्क्रिप्ट यहाँ संलग्न कर रहे हैं 

स्वर-साम्राज्ञी लता मंगेशकर ने जिनके वो सबसे प्रिय गायक थे, उनके इन्तेकाल की खबर सुनकर कहा -"आज बहुत बड़े ग़ज़ल गायक कलाकार मेहदी हसन साहब हमारे बीच नहीं रहे, मुझे इस बात का बहुत दु:ख है, ग़ज़ल-गायकी के क्षेत्र में उन्होंने बहुत बड़ा परिवर्तन लाया, आज उनके जाने से ग़ज़ल की बहुत बड़ी हानि हुई है, अब उन जैसा कलाकार फिर से आना मुश्किल है, वो बहुत बड़े शास्त्रीय संगीत के गायक भी थे, और उनके गाने में राजस्थान के संगीत की खुशबू भी थी, उन्होंने मेरे लिए कुछ गाने बनाए थे उनमें से हीं एक ग़ज़ल मैंने जो उन्होंने मुझे गाके भेजी थी, उसका मैंने डुएट रिकार्ड किया था, उनके साथ मेरा ये एक हीं गाना है, मैं ईश्वर से प्रार्थना करती हूँ कि मेहदी साहब की आत्मा को वो शांति प्रदान करें" यहाँ पर बताते चलें कि लता दी "सरहदें" एलबम के "तेरा मिलना बड़ा अच्छा लगे" गाने की बात कर रही हैं, जिसकी आधी रिकार्डिंग पाकिस्तान में और आधी हिन्दुस्तान में हुई थी, क्योंकि मेहदी हसन साहब चाह कर भी हिन्दुस्तान नहीं आ पड़े थे। यह ग़म उन्हें आखिर तक कचोटता रहा था। 

मेहदी हसन यानि कि हमारे खां साहब का जन्म राजस्थान के झुंझुनू जिले के लूणा गांव में १८ जुलाई १९२७ को हुआ था। खां साहब के हिसाब से उनका जन्म "कलावंत" घराने की १६वीं पीढी में हुआ था। "कलावंत" नाम से हीं मालूम चलता है कि इस घराने में "कला" की कैसी काबिलियत थी। मौशिकी की शुरूआती तालीम उन्होंने अपने अब्बाजान उस्ताद अजीम खान और चचाजान उस्ताद ईस्माइल खान से ली। दोनों में हीं ध्रुपद के अच्छे जानकार थे। सुनते है ये ठुमरी खान साहब की आवाज़ में खां साहब ने अपनी ग़ज़लों को राग यमन और राग ध्रुपद की बारीकियों से नवाज़ा था। इन्होंने ग़ज़ल-गायिकी को उस दौर में अलग पहचान दी, जब ग़ज़लों का मतलब उस्ताद बरकत अली खान, बेगम अख्तर और मुबारक बेगम हुआ करते थे। हिन्दुस्तान के बंटवारे से पहले फाजिल्का बंगला यानि कि अविभाजित पंजाब में उन्होंने अपना पहला पर्फोमेंश दिया। वह परफोर्मेंश ध्रुपद-खयाल पर आधारित था। खां साहब दर-असल ध्रुपद-गायक हीं बनना चाहते थे, ग़ज़ल तो पंजाबी में कहें तो "ऐं वैं" हीं हो गया। 

दोस्तों, खां साहब शहंशाह-ए-ग़ज़ल के नाम से जाने जाते थे। कहा जाता है कि ग़ज़लों में उनके जैसा सुर किसी और का नहीं लगा अब तक। हैरत होती है यह सोचकर कि ऐसा इंसान जो एक हुनर में इस कदर माहिर हो, उसकी शुरूआत किसी और हीं हुनर से हुई थी। जी हाँ, मौशिकी की पहली सीढी जो उन्होंने रेडियो पाकिस्तान के मार्फ़त १९५७ में चढी, वहाँ उनका कार्यक्रम ठुमरी का था। कहते हैं कि खां साहब ठुमरी और ध्रुपद के हीं होकर रह गए होते अगर रेडियो पाकिस्तान के दो अधिकारियों जेड ए बुखारी और रफ़ीक़ अनवर साहब ने उर्दू में उनकी खासी दिलचस्पी और साफ़ तलफ़्फ़ुज़ को देखकर उन्हें ग़ज़ल गाने के लिए प्रेरित न किया होता। हम शुक्रिया करते हैं उन दोनों का, जिनकी वजह से ग़ज़लों को खां साहब नसीब हुए। १९४७ में जब हिन्दुस्तान तक़्सीम हुआ तो मेहदी हसन साहब पूरे परिवार के साथ पाकिस्तान चले गए। हिन्दुस्तान छोड़ने का सबसे बड़ा नुकसान उन्हें यह हुआ कि पाकिस्तान में न रहने को घर, न खाने को रोटी.... पैसों की तंगहाली ने उन्हें मौशिकी से लगभग जुदा हीं कर दिया। पूरे परिवार का पेट पालने के लिए पहले वे एक साईकिल की दुकान में काम करने लगे। वहाँ से फारिग हुए तो उन्हें कार और डीजल ट्रैक्टर का मैकेनिक बनना पड़ा। सब ऐसा हीं चलता रहता अगर पाकिस्तान रेडियो ने उन्हें मौका न दिया होता। बस राह दिखाने की देर थी, मंज़िल ने तो खुद अपने राहगीर को चुन रखा था। 

मेहदी साहब ने जो चलना शुरू किया तो क्या फिल्मी मोड़, क्या गैर-फिल्मी मोड़.. हर जगह मील के पत्थर उन्हीं के नाम के थे। ग़ज़ल-गायिकी में अपना नाम सोने में दर्ज़ कर लेने के बाद उन्होंने पाकिस्तानी फिल्म-संगीत को आजमाना चाहा। उनका यह प्रयोग भी काबिल-ए-तारीफ़ रहा। १९६९ में रीलिज हुई फिल्म "तुम मिले प्यार मिला" में मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहाँ के साथ उनका गाना "आपको भूल जाएँ हम, इतने तो बेवफा नहीं" उतना हीं मशहूर है, जितना कि १९७५ की "मेरा नाम है मोहब्बत" फिल्म का नाहीद अख्तर के साथ गाया हुआ "ये दुनिया रहे न रहे मेरे हमदम" या फिर १९६७ की "ज़िंदगी कितनी हसीं है" फिल्म का "जब कोई प्यार से बुलाएगा"। फिल्म "दर्द" का "तेरी महफ़िल से ये दीवाना चला जाएगा" तो रूलाने में इतना कामयाब हुआ कि हिन्दुस्तान ने इसे "आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले" नाम से अपने इमोशन्स, अपनी भावनाओं में शामिल कर लिया।

बंटवारे के बाद अपना गाँव छूटने का दर्द उन्हें हमेशा सालता रहता था। १९७७ में जब वे पहली बार अपने गाँव लूणा आए तो इस कदर भाव-विभोर हो गए कि मिट्टी में लोट-लोट कर रोने लगे। उस समय वे जयपुर आए हुए थे सरकारी मेहमान बनकर। और उन्हीं के कहने पर सारा जत्था लूणा गया था। कहते हैं कि काफ़िला जब एक मंदिर के सामने से गुजर रहा था तो उन्होंने गाड़ी रूकवा दी और मंदिर की सीढियो के नीचे रेत में पलटियाँ खाने लगे। इस दृश्य के गवाह रहे कवि कृष्ण कल्पित बताते हैं कि उस वक़्त मेहदी साहब का बेटा डर गया कि वालिद साहब को क्या हो गया। बाद में जब मेहदी साहब से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि यहीं बैठकर वे भजन गाया करते थे। सालों बाद माँ से बेटा मिले तो आखिर यही होता है।

२००० में खां साहब पैरलाइसिस के शिकार हुए और तब से मौशिकी से दुर हो गए। उनकी आवाज़ चली गई। कई सालों तक उन्होंने कुछ न कहा। एक शख्स हैं..अफज़ल सुभानी ,जो अपने बारे में कहते हैं कि "पाकिस्तान से बाहर का मैं पहला शागिर्द हूं, जिसे मेहदी हसन साहब ने गंडा बांध कर विधिवत शिष्य बनाया था"। मेहदी साहब की आवाज़ जाने के बाद वे हमेशा उनकी खबर लिया करते थे। एक बार जब उन्होंने टेलीफोन किया तो मेहदी साहब ने खुद उठाया और पूरे जोश के साथ घोषणा की कि "मेरी आवाज़ वापस आ गई है।" अफ़ज़ल सुभानी की मानें तो मेहदी साहब को उन्होंने इससे ज्यादा खुश कभी नहीं पाया था। दु:ख है कि यह खुशी ज्यादा दिनों तक रह नहीं पाई। 

"अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें, जैसे सूखे हुए फूल किताबों में मिलें"... तुम बिछड़ गए खां साहब हम सबसे... अब तो बस यही दरख्वास्त है कि "रंजिश हीं सही दिल हीं दुखाने के लिए आ, आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ"। जिस शख्स के लिए मन्ना दा ने कहा था कि उनकी एक हीं तमन्ना है कि वे कभी मेहदी हसन की तरह गा सकें, मरहूम जगजीत सिंह जी ने कहा था कि जो ग़ज़ल गाना चाहता है वह पहले मेहदी साहब की तरह शास्त्रीय संगीत में पारंगत हो ले.... आज उस शख्स ने इस दुनिया से अपनी आवाज़ हटा ली है और भेंट कर दी है दूसरी दुनिया को.. जहाँ पहले से हीं कई फ़नकार उनका इंतज़ार कर रहे थे। १३ जून को वह आवाज़ हमेशा के लिए शांत हो गई। अल्लाह उनकी रूह को बरकत दे... आमीन!!


फुटनोट

दोस्तों जैसा कि आप वाकिफ हैं कि प्रस्तुत पोडकास्ट को हम किश्तों में प्रकाशित कर रहे हैं पिछले ढेढ दो हफ़्तों से, इन कड़ियों को निरंतर सुनते हुए हमारे नियमित श्रोता दिलीप कवठेकर जो खुद भी एक गायक हैं, अपनी तरफ से मेहदी साहब की एक ग़ज़ल को गाकर हमारे लिए भेजा है, क्यों न उनके इस श्रद्धा पुष्प को भी हम अपनी श्रद्धान्जली का हिस्सा बनायें...लीजिए सुनिए दिलीप जी की आवाज़ में मेहदी साहब की ये गज़ल

Tuesday, July 17, 2012

ख्वाब क्यों ???...कविताओं में जवाब तलाशता एक सवाल

शब्दों की चाक पर - एपिसोड 07

शब्दों की चाक पर हमारे कवि मित्रों के लिए हर हफ्ते होती है एक नयी चुनौती, रचनात्मकता को संवारने  के लिए मौजूद होती है नयी संभावनाएँ और खुद को परखने और साबित करने के लिए तैयार मिलता है एक और रण का मैदान. यहाँ श्रोताओं के लिए भी हैं कवि मन की कोमल भावनाओं उमड़ता घुमड़ता मेघ समूह जो जब आवाज़ में ढलकर बरसता है तो ह्रदय की सूक्ष्म इन्द्रियों को ठडक से भर जाता है. तो दोस्तों, इससे पहले कि  हम पिछले हफ्ते की कविताओं को आत्मसात करें, आईये जान लें इस दिलचस्प खेल के नियम - 


1. कार्यक्रम की क्रिएटिव हेड रश्मि प्रभा के संचालन में शब्दों का एक दिलचस्प खेल खेला जायेगा. इसमें कवियों को कोई एक थीम शब्द या चित्र दिया जायेगा जिस पर उन्हें कविता रचनी होगी...ये सिलसिला सोमवार सुबह से शुरू होगा और गुरूवार शाम तक चलेगा, जो भी कवि इसमें हिस्सा लेना चाहें वो रश्मि जी से संपर्क कर उनके फेसबुक ग्रुप में जुड सकते हैं, रश्मि जी का प्रोफाईल यहाँ है.


2. सोमवार से गुरूवार तक आई कविताओं को संकलित कर हमारे पोडकास्ट टीम के हेड पिट्सबर्ग से अनुराग शर्मा जी अपने साथी पोडकास्टरों के साथ इन कविताओं में अपनी आवाज़ भरेंगें. और अपने दिलचस्प अंदाज़ में इसे पेश करेगें.

3. हमारी टीम अपने विवेक से सभी प्रतिभागी कवियों में से किसी एक कवि को उनकी किसी खास कविता के लिए सरताज कवि चुनेगें. आपने अपनी टिप्पणियों के माध्यम से ये बताना है कि क्या आपको हमारा निर्णय सटीक लगा, अगर नहीं तो वो कौन सी कविता जिसके कवि को आप सरताज कवि चुनते. 

चलिए अब लौटते हैं अनुराग शर्मा और अभिषेक ओझा की तरफ जो आज आपके लिए लेकर आये हैं एक सवाल और उसके कुछ उलझे सुलझे जवाब. आज के कार्यक्रम की स्क्रिप्ट लिखी है हमारे प्लेबैक इंडिया के प्यारे सदस्य विश्व दीपक ने. तो दोस्तों सुनिए सुनाईये और छा जाईये...

(नीचे दिए गए किसी भी प्लेयेर से सुनें)





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Tuesday, May 31, 2011

गुरूदेव की "नौका डूबी" को "कशमकश" में तब्दील करके लाए हैं संजॉय-राजा..शब्दों का साथ दिया है गुलज़ार ने

Taaza Sur Taal (TST) - 15/2011 - KASHMAKASH (NAUKA DOOBI)

कभी-कभार कुछ ऐसी फिल्में बन जाती हैं, कुछ ऐसे गीत तैयार हो जाते हैं, जिनके बारे में आप लिखना तो बहुत चाहते हैं, लेकिन अपने आप को इस लायक नहीं समझते कि थोड़ा भी विश्लेषण कर सकें। आपके मन में हमेशा यह डर समाया रहता है कि अपनी नासमझी की वज़ह से कहीं आप उन्हें कमतर न आंक जाएँ। फिर आप उन फिल्मों या गीतों पर शोध शुरू करते हैं और कोशिश करते हैं कि जितनी ज्यादा जानकारी जमा हो सके इकट्ठा कर लें, ताकि आपके पास कही गई बातों का समर्थन करने के लिए कुछ तो हो। इन मौकों पर अमूमन ऐसा भी होता है कि आपकी पसंद अगर सही मुकाम पर पहुँच न पा रही हो तो भी आप पसंद को एक जोड़ का धक्का देते हैं और नकारात्मक सोच-विचार को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं। अंतत: या तो आप संतुष्ट होकर लौटते हैं या फिर एक खलिश-सी दिल में रह जाती है कि इस चीज़ को सही से समझ नहीं पाया।

आज की फिल्म भी कुछ वैसी है.. गुरूदेव रवींद्रनाथ टैगोर की लिखी कहानी "नौका डूबी" पर उसी नाम से बनाई गई बांग्ला फिल्म का हिंदी रूपांतरण है "कशमकश"। इस फिल्म के सभी गाने रवींद्र-संगीत पर आधारित हैं। फिल्म में ४ हिन्दी गाने हैं जिन्हें लिखा है गुलज़ार साहब ने और पाँचवां गाना एक सुप्रसिद्ध बांग्ला गाना है, जिसे अब तक कई सारे फ़नकार अपनी आवाज़ दे चुके हैं। फिल्म में संगीत दिया है संजॉय दास और राजा नारायण देब की जोड़ी ने। इन दोनों ने चिर-परिचित रवींद्र संगीत में अपनी कला का मिश्रण कर गानों को नए रूप में ढालने की यथा=संभव सफ़ल कोशिश की है। चलिए तो सीधे-सीधे गानों की ओर रुख करते हैं।

फिल्म का पहला गना है "मनवा भागे रे"। "सौ-सौ तागे रे".. ऐसी पंक्तियों को सुनकर हीं गुलज़ार साहब के होने का बोध हो जाता है। ऊपर से श्रेया घोषाल की सुमधुर आवाज़, जिसका कोई तोड़ नहीं है। पवन झा जी से मालूम हुआ है कि यह गाना रवींद्र संगीत के मूल गीत "खेलाघर बांधते लेगेची" पर आधारित है। वाद्य-संयोजन बेहतरीन है। बोल कैसे हैं.. आप खुद देख लें:

मनवा आगे भागे रे,
बाँधूं सौ-सौ तागे रे,
ख्वाबों से खेल रहा है,
सोए जागे रे..

दिन गया जैसे रूठा-रूठा,
शाम है अंजानी,
पुराने पल जी रहा है,
आँखें पानी-पानी..


दूसरा गाना है हरिहरण की आवाज़ में "खोया क्या जो पाया हीं नहीं।" आजतक लोग यही कहते आए हैं कि हाथों की लकीरों में किस्मत की कहानी गढी जाती है, लेकिन यहाँ पर गुलज़ार साहन निराशा का ऐसा माहौल गढते हैं कि अब तक की सारी दलीलों को नकार देते हैं। वे सीधे-सीधे इस बात का ऐलान करते हैं कि हथेलियों पर फ़क़त लकीरें हैं और कुछ नहीं, इन पर कुदरत की कोई कारीगरी नहीं। अपनी बात के समर्थन में वे भगवदगीता की उस पंक्ति का सहारा लेते हैं, जिसमें कहा गया है कि "तुमने क्या पाया था, जो तुमने खो दिया।" हरिहरण अपनी आवाज़ से इस दर्द को और भी ज्यादा अंदर तक ठेल जाते हैं और सीधे-सीधे दिल पर वार होता है। बखूबी तरीके से चुने गए वाद्यों की कारस्तानी इस दर्द को दूना कर देती है।

खोया क्या जो पाया हीं नहीं,
खाली हाथ की लकीरें हैं,
कल जो आयेगा, कल जो जा चुका..

बीता-बीता बीत चुका है,
फिर से पल-पल बीत रहा है..

तारे सारे रात-रात हैं,
दिन आए तो खाली अंबर,
आँख में सपना रह जाता है..


तीसरे गाने ("तेरी सीमाएँ") के साथ पधारती हैं श्रेया घोषाल। इनकी मीठी आवाज़ के बारे में जितना कहा जाए उतना कम होगा। ये जितने आराम से हँसी-खुशी वाले गीत गा लेती हैं, उतने हीं आराम से ग़म और दर्द के गीतों को निबाहती हैं। भले हीं संगीत कितना भी धीमा क्यों न हो, पता हीं नहीं चलता कि इन्हें किसी शब्द को खींचना पड़ रहा है। ऐसा हीं मज़ा लता दीदी के गीतों को सुनकर आया करता था (है)। अब जैसे इसी गीत को ले लीजिए - "मुक्ति को पाना है".. "मुक्ति" शब्द में अटकने की बड़ी संभावनाएँ थीं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं.. इसके लिए श्रेया घोषाल के साथ-साथ संगीतकारों की भी तारीफ़ करनी होगी। पहली मर्तबा मैंने जब इस गीत को सुना तो "मुक्ति" का इस्तेमाल मुझे कुछ अटपटा-सा लगा.. गुलज़ार साहब के नज़्मों में इस शब्द की कल्पना की जा सकती है, लेकिन गीत में? नहीं!! फिर मुझे ध्यान आया कि गुलज़ार साहब ने गुरूदेव के बांग्ला गीतों की तर्ज़ पर इस फिल्म के गीत लिखे हैं और बांग्ला गानों में ऐसे शब्द बहुतायत में नज़र आते हैं। यहाँ यह बात जाननी ज़रूरी है कि गुलज़ार साहब ने गीतों का अनुवाद नहीं किया, बल्कि वही माहौल बरकरार रखने की कोशिश की है।

तेरी सीमाएँ कोई नहीं हैं,
बहते जाना है, बहते जाना है..

तेरे होते दर्द नहीं था,
दिन का चेहरा ज़र्द नहीं था,
तुझसे रूठके मरते रहना है..

तुझको पाना, तुझको छूना,
मुक्ति का पाना है..


अब हम आ पहुँचे हैं चौथे गाने के पास, जो है "नाव मेरी"। एक बंगाली गायिका के बाद बारी है दूसरी बंगालन की यानि कि "मधुश्री" की। इनका साथ दिया है हरिहरण ने। इस गाने में गुलज़ार साहब अपनी दार्शनिक सोच के शीर्ष पर नज़र आते हैं। पहले तो वे कहते हैं कि सागरों में घाट नहीं होते, इसलिए तुम्हें बहते जाना है.. तुम्हारा ठहराव कहीं नहीं। और अंत होते-होते इस बात का खुलासा कर देते हैं कि तुम्हारे लिए किनारा किसी छोर पर नहीं, बल्कि तलछट में है.. तुम डूब जाओ तो शायद तुम्हें किनारा नसीब हो जाओ। इन पंक्तियों का बड़ा हीं गहरा अर्थ है। आप जब तक अपने आप को किसी रिश्ते की सतह पर रखते हैं और कोशिश करते हैं कि वह रिश्ता आपको अपना मान ले, तब तक आप भुलावे में जी रहे होते हैं। फिर या तो आपको एक रिश्ते से दूसरे रिश्ते की ओर बढना होता है या फिर ऐसे हीं किसी रिश्ते की सच्चाईयों में डूब जाना होता है। अगर आप डूब गए तो वह रिश्ता और आप एक हो चुके होते हैं, जिसे कोई जुदा नहीं कर सकता। इसलिए डूब जाने से हीं किनारा नसीब होगा ना कि किसी जगह सतह पर ठहरने से। संभव है कि गुलज़ार साहब ने कुछ और अर्थ सोचकर यह गाना लिखा हो (मैंने अभी तक फिल्म नहीं देखी, इसलिए यकीनन कह नहीं सकता), लेकिन मेरे हिसाब से यह अर्थ भी सटीक बैठता है।

नाव मेरी ठहरे जाने कहाँ!
घाट होते नहीं.. सागरों में कहीं..

दूर नहीं है कोई किनारा,
सागर जाती है हर धारा..

डूब के शायद इस नौका को,
मिल जाए किनारा..


इस फिल्म का अंतिम गाना है "आनंद-लोके मंगल-लोके", जिसे गाया है सुदेशना चटर्जी और साथियों ने। हिंदी रूपांतरण में बांग्ला गाने को यथारूप रखने से ज़ाहिर होता है कि निर्माता-निर्देशक ने गुरूदेव को श्रद्धांजलि अर्पित करने का प्रयास किया है। रवींद्र संगीत में आधुनिक वाद्य-यंत्रों का प्रयोग एक सफ़ल प्रयोग बन पड़ा है। भले हीं इसमें बांग्ला भाषा के शब्द हैं, लेकिन संगीत-संयोजन और गायिका की स्पष्ट आवाज़ के कारण गैर-बांग्लाभाषी भी इसे कम-से-कम एक बार सुन सकते हैं। मुझे जितनी बांग्ला आती है, उस हिसाब से यह कह सकता हूँ कि "सत्य-सुंदर" से गुहार लगाई जा रही है कि इस आनंद-लोक, इस मंगल-लोक में पधारें और स्नेह, प्रेम, दया और भक्ति का वरदान दें ताकि हम सबके प्राण कोमल हो सकें। आगे के बोल मुझे कुछ कठिन लगे, इसलिए न तो उन्हें यहाँ उपलब्ध करा पाया और ना हीं उनका अर्थ समझ/समझा पा रहा हूँ।

आनंद लोके मंगल लोके,
बिराजो सत्य-सुंदर..
स्नेह-प्रेम-दया-भक्ति,
कोमल करे प्राण..


तो ये थे "कशमकश" के पाँच गाने। आज के ढिंचाक जमाने में शांत और सरल गानों की कमी जिन किन्हीं को खल रही होगी, उनके लिए यह एलबम "टेलर-मेड" है। हिन्दी फिल्मों के ये दोनों संगीतकार नए हैं, लेकिन इनकी शुरूआत कमज़ोर नहीं कही जा सकती। इन दोनों के लिए तो यह सौभाग्य की बात है कि इन्हें रवींद्र संगीत पर काम करने का अवसर मिला और इनकी धुनों पर गुलज़ार साहब ने बोल लिखे। हाँ मुझे यहाँ गुलज़ार साहब से थोड़ी-सी शिकायत है। यूँ तो आप हर गाने में उपमाओं और "नई सोचों" की लड़ी लगा देते हैं और विरले हीं अपनी पंक्तियों को दुहराते हैं.. फिर ऐसा क्यों है कि "कशमकश" के गानों में "दुहराव-तिहराव" की भरमार है और हर गाने में एक या दो हीं नए ख़्याल हैं। यह मेरी नाराज़गी है अपने "आदर्श" से... आप लोग इस "बहकावे" में मत बहकिएगा। आप तो इन गानों का आनंद लें।

चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 7.5/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Wednesday, May 11, 2011

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३

सूफ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं|

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे ।
एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥


माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले|

आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..:

भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे ।
मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय ।
जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥

ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि ।
सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥

हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या ।
रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥

कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये ।
एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥

लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल ।
लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥

हँस हँस कुन्त ना पाया, जिन पाया तिन रोये ।
हाँसि खेले पिया मिले, कौन _____ होये ॥

जाको राखे साईंयाँ, मार सके ना कोये ।
बाल न बांकाँ कर सके, जो जग बैरी होये ॥

प्रेम न भाजी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-प्रजा जोही रूचें, शीश देई ले जाय ॥

कबीरा भाठी कलाल की, बहूतक बैठे आई ।
सिर सौंपें सोई पीवै, नहीं तो पिया ना जाये ॥

सुखिया सब संसार है, खाये और सोये ।
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोये ॥

जो कछु सो तुम किया, मैं कछु किया नांहि ।
कहां कहीं जो मैं किया, तुम ही थे मुझ मांहि ॥

अन-राते सुख सोवणा, राते नींद ना आये ।
ज्यूं जल छूटे माछरी, तडफत नैन बहाये ॥

जिनको साँई रंग दिया, कभी ना होये कुरंग ।
दिन दिन वाणी आफ़री, चढे सवाया रंग ॥

ऊंचे पानी ना टिके, नीचे ही ठहराय ।
नीचे होये सो भरि पिये, ऊँचा प्यासा जाय ॥

आठ पहर चौंसठ घडी, मेरे और ना कोये ।
नैना मांहि तू बसे, नींद को ठौर ना होये ॥

सब रगे तान्त रबाब, तन्त दिल बजावे नित ।
आवे न कोइ सुन सके, के साँई के चित ॥

कबीरा बैद्य बुलाया, पकड के देखी बांहि ।
बैद्य न वेधन जानी, फिर भी करे जे मांहि ॥

यार बुलावे भाव सूं, मोपे गया ना जाय ।
दुल्हन मैली पियु उजला, लाग सकूं ना पाय ॥




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो दोहे हमने पेश किए हैं, उसके एक दोहे की एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उन दोहों को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "चाह" और मिसरे कुछ यूँ थे-

चाह गयी चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह ।
जिनको कछु न चहिये, वो ही शाहनशाह ॥

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

चाहे गीता बांचिये या पढ़िए कुरआन
मेरी तेरी प्रीत है हर पुस्तक का ज्ञान - निदा फाजली .. वैसे इसमें चाल शब्द नहीं है, बल्कि चाहे है... इसलिए इस शेर को सही नहीं माना जा सकता..

चाह मेरे भारत की ,विश्व कप जाए जीत,
हर एक करे प्रार्थना , क्रिकेट से है प्रीत - मंजु जी आपकी चाह पूरी हो गयी, खुश हैं न ? :)

चाह होती है तो राह होती नहीं
हर ख्वाहिश कभी पूरी होती नहीं
जिंदगी जीने का ढूँढती है सबब
हर कली खिलके फूल होती नहीं. - शन्नो जी

कभी हम में तुम में भी चाह थी , कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना तुम्हे याद हो के न याद हो - मोमिन खां मोमिन

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, April 12, 2011

पोर-पोर गुलमोहर खिल गए..जब गुलज़ार, विशाल और सुरेश वाडकर की तिकड़ी के साथ "मेघा बरसे, साजन बरसे"

Taaza Sur Taal (TST) - 08/2011 - BARSE BARSE

कुछ चीजें जितनी पुरानी हो जाएँ, उतनी ज्यादा असर करती हैं, जैसे कि पुरानी शराब। ज्यों-ज्यों दिन बीतता जाए, त्यों-त्यों इसका नशा बढता जाता है। यह बात अगर बस शराब के लिए सही होती, तो मैं यह ज़िक्र यहाँ छेड़ता हीं नहीं। यहाँ मैं बात उन शख्स की कर रहा हूँ, जिनकी लेखनी का नशा शराब से भी ज्यादा है और जिनके शब्द अल्कोहल से भी ज्यादा मारक होते हैं। पिछले आधे दशक से इस शख्स के शब्दों का जादू बरकरार है... दर-असल बरकरार कहना गलत होगा, बल्कि कहना चाहिए कि बढता जा रहा है। हमने इनके गानों की बात ज्यादातर तब की है, जब ये किसी फिल्म का हिस्सा रहे हैं, लेकिन "ताज़ा सुर ताल" के अंतर्गत पहली बार हम एक एलबम के गानों को इनसे जोड़कर लाए हैं। हमने "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" में इनके कई सारे गैर-फिल्मी गाने सुनें हैं और सुनते रहेंगे। हम अगर चाहते तो इस एलबम को भी महफ़िल-ए-ग़ज़ल का हिस्सा बनाया जा सकता था, लेकिन चुकी यह "ताज़ा एलबम" है, तो "ताज़ा सुर ताल" हीं सही उम्मीदवार साबित होता है। अभी तक की हमारी बातों से आपने उन शख्स को पहचान तो लिया हीं होगा। जी हाँ, हम गुलज़ार की हीं बातें कर रहे हैं और एलबम का नाम है "बरसे बरसे"।

जब भी कहीं गुलज़ार का ज़िक्र आता है, तो दो संगीतकार खुद-ब-खुद हमें याद आ जाते हैं। एक तो पंचम दा और दूसरे विशाल। विशाल यानि विशाल भारद्वाज। गुलज़ार साहब ने पंचम दा के साथ कई सारे गैर-फिल्मी गानों पर काम किया है..उनमें से एक एलबम का ज़िक्र हमने महफ़िल-ए-ग़ज़ल में भी किया था। पंचम दा की तुलना में विशाल के गानों की गिनती काफ़ी पीछे रह जाती है, लेकिन आज के समय में विशाल हीं एकलौते ऐसे संगीतकार हैं, जिन्होंने गुलज़ार के लफ़्ज़ों के मर्म को पकड़ा है। विशाल-गुलज़ार के गानों को सुनकर इस बात का अनुमान हीं नहीं लग पाता कि संगीत पहले आया था या गीत। दोनों एक-दूसरे से जुड़े महसूस होते हैं। अब अगर इस जोड़ी में "तेरे लिए" (७ खून माफ़) और "जाग जा" (ओंकारा) जैसे सुमधुर गानों में अपनी मखमली आवाज़ का तड़का लगाने वाले सुरेश वाडेकर को शामिल कर लिया जाए तो इस तरह बनी तिकड़ी का कोई सानी न होगा। आज के एलबम "बरसे बरसे" की यही खासियत है। इस एलबम के गीत लिखे हैं गुलज़ार ने, संगीत दिया है विशाल भारद्वाज ने और आवाज़ है सुरेश वाडेकर की। अब आप खुद अंदाजा लगा सकते हैं कि एलबम के गीत कितने अनमोल होंगे! चलिए तो पहले गाने से शुरूआत करते हैं। यह गीत एलबम का शीर्षक गीत (टाईटल ट्रैक) है।

बरसे-बरसे मेघा कारा,
तन भींजे, मन भींजे म्हारा...
मैं भींजूँ अपने साजन में,
मुझमें भींजे साजन म्हारा..
बैयों में भर ले,
सौंधी माटी-सी मैं महकूँ रे,
आज न रैन ढले...

प्रीत का खेल नियारा,
हारूँ तो हो जाऊँ पिया की,
जीतूँ तो पी म्हारा..


इस गाने में राजस्थानी फोक़ (लोक-संगीत) का पुट इतनी खूबसूरती से डाला हुआ है कि एक बार डूबो तो निकलकर आने का मन हीं नहीं करता। सुरेश वाडेकर को सुनकर ऐसा एक पल को भी नहीं लगता कि वे दर-असल मराठी हैं। राजस्थानी शब्दों का उच्चारण न सिर्फ़ साफ़ है, बल्कि राजस्थान के किसी गाँव का माहौल भी उभरकर आ जाता है। विशाल अपने वाद्य-यंत्रों से श्रोताओं को बाँधकर रखने में कामयाब हुए हैं। "प्रीत का खेल नियारा" वाले अंतरे में गुलज़ार ने "अमीर खुसरो" को ज़िंदा कर दिया है। खुसरो ने भी यही कहा था कि "हारूँ तो मैं पी की और जीतूँ तो पी मेरा"। गुलज़ार ऐसा कमाल करते रहते हैं।

अगला गाना है "ऐसा तो होता नहीं है"। इस गाने में गुलज़ार की जादूगरी खुलकर नज़र आती है।

सब्जे में लिपटा हुआ कोई आ जाए अपना!

चंपा-सी तुम, तुम-सी चंपा,
फूलों से धोखा हुआ है..
ये तुम हो कि शम्मा जलाकर,
कोई लॉन में रख गया है।
एक लौ-सा जलता हुआ कोई आ जाए अपना!


जिस तरह से और जिन साज़ों के सहारे गाने की शुरूआत होती है, उसे सुनकर विशाल के संगीत की समझ का सही पता चलता है। चूँकि मुझे साज़ों की उतनी जानकारी नहीं, इसलिए ठीक-ठीक मैं यह कह नहीं सकता कि कौन-से साज़ इस्तेमाल हुए हैं। अगर आप जानते हों तो कृप्या हमें अवगत कराएँ। इस गाने में वाडेकर साहब "तेरे लिए" गाने के हैंग-ओवर में नज़र आते हैं। जब भी वे "कोई आ जाए अपना" कहते हैं तो सच में किसी अपने के आने की चाह खड़ी हो जाती है। "ऐसा तो होता नहीं है...सपनों से चलकर कोई आ जाए अपना"...इस पंक्ति के सहारे गुलज़ार साहब ने हर किसी की दिली-ख्वाहिश को एक झटके में हीं सच का आईना दिखा दिया है।

एलबम का तीसरा गाना है "तेरे नैन"। जहाँ पहला गाना राजस्थानी लोकगीत की याद दिलाता था, वहीं यह गाना खुद में पंजाबियत समेटे हुए है।

पीछ्छे पै गए तेरे नैन...

चले न मेरी मर्जी कोई,
जो कैंदे मैं करदा सोई,
दो दिन वीच मेरी सारी आकर,
कढ के लै गए तेरे नैन..

कोई पीर सयाना आवे,
आके मेरी जान छड़ावे,
मेरे सिरते इश्क़ दा टोना
कर के बै गए तेरे नैन..


गानों में नई सोच किस तरह डालते हैं, यह कोई गुलज़ार साहब से सीखे। "पीछ्छे पै गए तेरे नैन""... अब अगर किसी को अपनी माशूका की आँखों की तारीफ़ करनी होगी तो वह यह तो कतई नहीं कहेगा, क्योंकि उसे डर होगा कि उसकी माशूका कहीं बुरा न मान जाए। लेकिन गुलज़ार साहब जब यह कहते हैं तो उनके पास अपनी बात रखने और साबित करने के कई तरीके होते हैं.. तभी तो वह आराम से कह जाते हैं कि तुम्हारी आँखों ने मेरे सिर पर इश्क़ का टोना कर रखा है। इश्क़ की नई-नई अदाएँ कोई गुलज़ार साहब से सीखे। ऐसा मालूम पड़ता है जैसे गुलज़ार साहब के पास इश्क़ के कई सारे शब्दकोष हैं, जो इन्होंने खुद गढे हैं। इस गाने में विशाल और सुरेश वाडेकर की भागेदारी भी बराबर की है। गाने के बीच में तबले का बड़ा हीं सुंदर प्रयोग हुआ है। वाडेकर साहेब ने जिस तरह राजस्थानी ज़बान को अपना बना लिया था, अमूमन वैसी हीं महारत उनकी पंजाबी ज़बान में नज़र आती है।

तन्हाई में... देहों के टाँके टूटे..

पोर-पोर गुलमोहर खिल गए,
रग-रग में सूरज दहका रे,
साँसों की अंगनाई में..

ताप सहे कोई कितना,
रोम-रोम देह का पुकारे,
वो मंतर जाने सैयां,
तन-मन छांव उतारे,
रूह तलक गहराई में..


एक लंबे आलाप के साथ इस गाने की शुरूआत होती है। सुरेश वाडकर साहब शास्त्रीय संगीत में पारंगत है, इस बात का पता आलाप को सुनते हीं लग जाता है। "तन्हाई" कहते वक़्त ये अपनी आवाज़ में अजीब-सा भारीपन ले आते हैं, ताकि तन्हाई को महसूस किया जा सके। एकबारगी सुनने पर यह मालूम हीं नहीं किया जा सकता कि गुलज़ार साहब कहना क्या चाहते हैं, गाना है किस विषय पर? बात शुरू तो तन्हाई से होती है, लेकिन अगली हीं पंक्ति में "देहों के टाँके टूटे" कहकर गुलज़ार साहब प्यार के "अनमोल पल" की ओर इशारा करते हैं। आगे का हर-एक लफ़्ज़ यही बात दुहराता-सा लगता है। "रग-रग में सूरज दहका" या फिर "ताप सहे कोई कितना".. यहाँ किस ताप की बात हो रही है? क्या मैं वही समझ रहा हूँ, जो गुलज़ार साहब समझाना चाहते हैं या फिर मैं रास्ते से भटक गया हूँ? इस बात का फैसला कौन करेगा? अब जो भी हो, मुझे तो इस गाने में "प्यार..प्यार..प्यार.. और बस प्यार" हीं नज़र आ रहा है, तन्हाई के दर्द का कोई नामो-निशां नहीं है। और वैसे भी, तन्हाई से दर्द को जोड़ना सही नहीं, क्योंकि जब दो जिस्म एक हो जाते हैं, तो वह एक जिस्म-औ-जान अकेला हीं होता है, तन्हा हीं होता है। है या नहीं?

इस एलबम का अंतिम गाना है "ज़िंदगी सह ले"..

ज़िंदगी सह ले,
दर्द है.. कह ले।

पैरों के तले से जिस तरह ये
बर्फ़ पिघलती है, आ जा..
जंगलों में जैसे पगडंडी
पेड़ों से निकलती है, आ जा..


मेरे हिसाब से इस गाने का नाम "आ जा" रखा जाना चाहिए था, क्योंकि भले हीं मुखरे में ज़िंदगी को सह लेने की हिदायत दी जा रही है, लेकिन अंतरों में पुकार हीं पुकार है.. "आ जा" कहकर किसी को पुकारा जा रहा है। मुख्ररे के अंत में और अंतरों के बीच में एक शब्द है जिसे मैं सही से समझ नहीं पाया हूँ। "आ जा अभी/हबी आ सके.. तू आ".. यहाँ पर "अभी" है या "हबी"? अभी रखा जाए तो अर्थ सटीक बैठता है... अर्थ तब भी सही निकलता है, जब हबी हो, बस दिक्कत यह है कि "हबी" हिन्दी या उर्दू का शब्द नहीं, बल्कि अंग्रेजी का है.. हबी यानि कि हसबैंड। अब यह अगर यह फीमेल सॉंग होता तो मैं मान भी लेता कि हबी होगा, क्योंकि गुलज़ार साहब अंग्रेजी के शब्द गानों में इस्तेमाल करते रहते हैं, लेकिन यह तो मेल सॉंग है। एक तीसरा विकल्प भी है.. "हबीब", लेकिन "बीट्स" पर हबीब फिट नहीं बैठता। तो क्या हम मान लें कि वह शब्द "अभी" है? इस एलबम के किसी भी गाने का लिरिक्स इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं, इसलिए सही शब्द पता करना नामुमकिन हीं समझिए। खैर! जहाँ तक संगीत की बात है तो पहले बीट से लेकर अंतिम बीट तक विशाल श्रवणेन्द्रियों को थामे रखने में सफ़ल साबित हुए हैं। बस सुरेश वाडकर साहब से थोड़ी-सी चूक हो गई है। कुछेक शब्दों का उच्चारण साफ़ नहीं है.. इसलिए मज़ा हल्का-सा कम हो गया है।

कुल मिलाकर यह एलबम विविधताओं से भरा है और जैसा हम कहते हैं ना.. "विविधता में एकता"। तो ऐसा हीं कुछ यहाँ भी है। हर गाना अलग तरीके का है, लेकिन सबमें एक खासियत है और वह है "फ़ीलिंग".. "इमोशन्स".. "भाव"। इसलिए सभी गाने सुने जाने चाहिए। सुनकर अच्छा महसूस होगा, यकीन मानिए।

आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 8/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Wednesday, March 30, 2011

साहिब मेरा एक है.. अपने गुरू, अपने साई, अपने साहिब को याद कर रही है कबीर, आबिदा परवीन और गुलज़ार की तिकड़ी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११२

शे इकहरे ही अच्छे होते हैं। सब कहते हैं दोहरे नशे अच्छे नहीं। एक नशे पर दूसरा नशा न चढाओ, पर क्या है कि एक कबीर उस पर आबिदा परवीन। सुर सरूर हो जाते हैं और सरूर देह की मिट्टी पार करके रूह मे समा जाता है।

सोइ मेरा एक तो, और न दूजा कोये ।
जो साहिब दूजा कहे, दूजा कुल का होये ॥


कबीर तो दो कहने पे नाराज़ हो गये, वो दूजा कुल का होये !

गुलज़ार साहब के लिए यह नशा दोहरा होगा, लेकिन हम जानते हैं कि यह नशा उससे भी बढकर है, यह तिहरा से किसी भी मायने में कम नहीं। आबिदा कबीर को गा रही हैं तो उनकी आवाज़ के सहारे कबीर की जीती-जागती मूरत हमारे सामने उभर आती है, इस कमाल के लिए आबिदा की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। लेकिन आबिदा गाना शुरू करें उससे पहले सबा के झोंके की तरह गुलज़ार की महकती आवाज़ माहौल को ताज़ातरीन कर जाती है, इधर-उधर की सारी बातें फौरन हीं उड़न-छू हो जाती है और सुनने वाला कान को आले से उतारकर दिल के कागज़ पर पिन कर लेता है और सुनता रहता है दिल से.. फिर किसे खबर कि वह कहाँ है, फिर किसे परवाह कि जग कहाँ है! ऐसा नशा है इस तिकड़ी में कि रूह पूरी की पूरी डूब जाए, मदमाती रहे और जिस्म जम जाए वहीं का वहीं!!

कबीरा खड़ा बजार में, सब की चाहे खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।


कबीर... कबीर ऐसा नाम है, जिसे सुनते हीं दिल सूफ़ियाना हो जाता है। जैसे सूफ़ियों के हर कलाम में उस ऊपर वाले का ज़िक्र होता है, उसी तरह कबीर अपने गुरू, अपने साईं, अपने साहिब का ज़िक्र किसी न किसी बहाने अपने दोहों में ले हीं आते हैं। गुरू के प्रति कबीर का यह प्रेम अनुपम है। कबीर अपने गुरू की बहुत कदर करते थे। एक शिष्य के लिए गुरू का क्या महत्व होता है, यह बताने के लिए कबीर ने इतना तक कह दिया कि:

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥


गुरू का माहात्म्य जानना हो तो कोई कबीर से पूछे:

सब धरती कागद करूं, लेखन सब बनराय ।
सात समुंद्र कि मस करूं, गुरु गुन लिखा न जाय ॥


कबीर का अपने गुरू के प्रति प्रेम और लगाव का बखान आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक "हिन्दी साहित्य का इतिहास" में कुछ यूँ किया है:

कहते हैं, काशी में स्वामी रामानंद का एक भक्त ब्राह्मण था, जिसकी किसी विधवा कन्या को स्वामी जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद भूल से दे दिया। फल यह हुआ कि उसे एक बालक उत्पना हुआ जिसे वह लहरतारा के ताल के पास फेंक आयी। अली या नीरू नाम का जुलाहा उस बालक को अपने घर उठा लाया और पालने लगा। यही बालक आगे चलकर कबीरदास हुआ। कबीर का जन्मकाल जेठ सुदी पूर्णिमा, सोमवार विक्रम संवत १४५६ माना जाता है। कहते हैं कि आरंभ से हीं कबीर में हिंदू भाव से भक्ति करने की प्रवृत्ति लक्षित होती थी जिसे उसे पालने वाल माता-पिता न दबा सके। वे "राम-राम" जपा करते थे और कभी-कभी माथे पर तिलक भी लगा लेते थे। इससे सिद्ध होता है कि उस समय स्वामी रामानंद का प्रभाव खूब बढ रहा था। अत: कबीर पर भी भक्ति का यह संस्कार बाल्यावस्था से ही यदि पड़ने लगा हो तो कोई आश्चर्य नहीं।

रामानंद जी के माहात्म्य को सुनकर कबीर के हृदय में शिष्य होने की लालसा जगी होगी। ऐसा प्रसिद्ध है कि एक दिन वे एक पहर रात रहते हुए उप्त (पंचगंगा) घाट की सीढियों पर जा पड़े जहाँ से रामानंद जी स्नान करने के लिए उतरा करते थे। स्नान को जाते समय अंधेरे में रामानंद जी का पैर कबीर के ऊपर पड़ गया। रामानंद जी बोल उठे, ’राम-राम कह’। कबीर ने इसी को गुरूमंत्र मान लिया और वे अपने को गुरू रामानंद जी का शिष्य कहने लगे।

आरंभ से हीं कबीर हिंदू भाव की उपासना की ओर आकर्षित हो रहे थे। अत: उन दिनों जब कि रामानंद जी की बड़ी धूम थी, अवश्य वे उनके सत्संग में भी सम्मिलित होते रहे होंगे। रामानुज की शिष्य परंपरा में होते हुए भी रामानंद जी भक्ति का एक अलग उदार मार्ग निकाल रहे थे जिसमे जाति-पाँति का भेद और खानपान का आचार दूर कर दिया गया था। अत: इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीर को ’राम-राम’ नाम रामानंद जी से हीं प्राप्त हुआ। पर आगे चलकर कबीर के ’राम’ रामानंद के ’राम’ से भिन्न हो गए। अत: कबीर को वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत नहीं ले सकते। कबीर ने दूर-दूर तक देशाटन किया, हठयोगियों तथा सूफ़ी मुसलमान फकीरों का भी सत्संग किया। अत: उनकी प्रवृत्ति निर्गुण उपासना की ओर दृढ हुई। फल यह हुआ कि कबीर के राम धनुर्धर साकार राम नहीं रह गये, वे ब्रह्म के पर्याय हुए -

दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।
राम नाम का मरम है आना॥


सारांश यह है कि जो ब्रह्म हिंदुओं की विचारपद्धति में ज्ञान मार्ग का एक निरूपण था उसी को कबीर ने सूफ़ियों के ढर्रे पर उपासना का हीं विषय नहीं, प्रेम का भी विषय बनाया और उसकी प्राप्ति के लिए हठयोगियों की साधना का समर्थन किया। इस प्रकार उन्होंने भारतीय ब्रह्मवाद के साथ सूफ़ियों के भावात्मक रहस्यवाद, हठयोगियों के साधनात्मत रहस्यवाद और वैष्णवों के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद का मेल करके अपना पंथ खड़ा किया। उनकी बानी में ये सब अवयव लक्षित होते हैं।

गुरू गोविंद दोऊ खड़े काकै लागूं पाय,
बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो बताय।


गुरू को गोविंद के आगे खड़े करने वाले संत कबीर ने गुरू के बारे में और क्या-क्या कहा है, यह जानने के लिए चलिए आबिदा परवीन की मनमोहक आवाज़ की ओर रूख करते हैं। और हाँ, आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "साहिब मेरा एक है"..:

साहिब मेरा एक है, दूजा कहा न जाय ।
दूजा साहिब जो कहूं, साहिब खडा रसाय ॥

माली आवत देख के, कलियां करें पुकार ।
फूल फूल चुन लिये, काल हमारी बार ॥

____ गयी चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह ।
जिनको कछु न चहिये, वो ही शाहनशाह ॥

एक प्रीत सूं जो मिले, ताको मिलिये धाय ।
अन्तर राखे जो मिले, तासे मिले बलाय ॥

सब धरती कागद करूं, लेखन सब बनराय ।
सात समुंद्र कि मस करूं, गुरु गुन लिखा न जाय ॥

अब गुरु दिल मे देखया, गावण को कछु नाहि ।
कबीरा जब हम गांवते, तब जाना गुरु नाहि ॥

मैं लागा उस एक से, एक भया सब माहि ।
सब मेरा मैं सबन का, तेहां दूसरा नाहि ॥

जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द ।
तब मरहू कब पाहूं, पूरण परमानन्द ॥

सब बन तो चन्दन नहीं, सूर्य है का दल(?) नाहि ।
सब समुंद्र मोती नहीं, यूं सौ भूं जग माहि ॥

जब हम जग में पग धरयो, सब हसें हम रोये ।
कबीरा अब ऐसी कर चलो, पाछे हंसीं न होये ॥

अवगुण किये तो बहु किये, करत न मानी हार ।
भांवें बन्दा बख्शे, भांवें गर्दन मार ॥

साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि ।
धन का भूखा जो फिरे, सो तो साधू नाहि ॥

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

करता था तो क्यों रहा, अब काहे पछताय ।
बोवे पेड बबूल का, आम कहां से खाय ॥

साहिब सूं सब होत है, बन्दे ते कछु नाहि ।
राइ से परबत करे, परबत राइ मांहि ॥

ज्यूं तिल मांही तेल है, ज्यूं चकमक में आग ।
तेरा सांई तुझमें बसे, जाग सके तो जाग ॥




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो दोहे हमने पेश किए हैं, उसके एक दोहे की एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उन दोहों को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "पिया" और मिसरे कुछ यूँ थे-

सती बिचारी सत किया, काँटों सेज बिछाय ।
ले सूती पिया आपना, चहुं दिस अगन लगाय ॥

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

पिया रे, पिया रे , पिया रे, पिया रे,
तेरे बिन लागे नहीँ मोरा जिया रे ।

मंजु जी, आपने शब्द पहचानने में गलती कर दी, इसलिए हम आपके शेर (दोहे) को यहाँ पेश नहीं कर सकते। अगली बार से ध्यान दीजिएगा।

पिछली महफ़िल की शुरूआत सजीव जी की प्रेरणादायक टिप्पणी से हुई। बंधुवर धन्यवाद आपका! आपके बाद महफ़िल को रंगीन करने आए शरद जी। शरद जी ने न सिर्फ़ सही शब्द की पहचान की बल्कि उस पर एक शेर भी कहा। यह क्या, आपसे हमें स्वरचित शेर की उम्मीद रहती है, आपने तो नुसरत साहब के एक गाने की दो पंक्तियों से हीं काम चला लिया। आगे से ऐसा नहीं चलेगा। समझे ना? :) आपने एक गलती की तरफ़ हमारा ध्यान दिलाया, इसके लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। हमने आज की महफ़िल में उस गलती को ठीक कर लिया है। अवध जी, शायद "दोहावली" हीं कहा जाना चाहिए। मैं और भी एक-दो जगह से पता करता हूँ, उसके बाद आगे से इसी शब्द का प्रयोग करूँगा। बहुत-बहुत धन्यवाद। मंजु जी, हाँ पिछली बार मैंने "अहसास" पर सारे शेर जमा तो कर दिये थे, लेकिन जल्दीबाजी में "आँगन" को हटाना भूल गया। दर-असल "आँगन" पिछली से पिछली महफ़िल का गुमशुदा शब्द था। आपको यकीन दिलाता हूँ कि आगे से ऐसा नहीं होगा। कुलदीप जी, महफ़िल को और महफ़िल में पेश की गई रचना को पसंद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। बस लगे हाथों आप "पिया" पर कोई शेर भी कह देते तो खुशी चौगुनी हो जाती। खैर, इस बार से कोशिश कीजिएगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, March 9, 2011

मन लागो यार फ़क़ीरी में: कबीर की साखियों की सखी बनकर आई हैं आबिदा परवीन, अगुवाई है गुलज़ार की

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१११

सूफ़ियों का कलाम गाते-गाते आबिदा परवीन खुद सूफ़ी हो गईं। इनकी आवाज़ अब इबादत की आवाज़ लगती है। मौला को पुकारती हैं तो लगता है कि हाँ इनकी आवाज़ ज़रूर उस तक पहुँचती होगी। वो सुनता होगा.. सिदक़ सदाक़त की आवाज़।

माला कहे है काठ की तू क्यों फेरे मोहे,
मन का मणका फेर दे, तुरत मिला दूँ तोहे।


आबिदा कबीर की मार्फ़त पुकारती हैं उसे, हम आबिदा की मार्फ़त उसे बुला लेते हैं।

मन लागो यार फ़क़ीरी में...

एक तो करैला उस पर से नीम चढा... इसी तर्ज़ पर अगर कहा जाए "एक तो शहद ऊपर से गुड़ चढा" तो यह विशेषण, यह मुहावरा आज के गीत पर सटीक बैठेगा। सच कहूँ तो सटीक नहीं बैठेगा बल्कि थोड़ा पीछे रह जाएगा, क्योंकि यहाँ गुड़ चढे शहद के ऊपर शक्कर के कुछ टुकड़े भी हैं। कबीर की साखियाँ अपने आप में हीं इस दुनिया से दूर किसी और शय्यारे से आई हुई सी लगती है, फिर अगर उन साखियों पर आबिदा की आवाज़ के गहने चढ जाएँ तो हर साखी में कही गई दुनिया को सही से समझने और सही से समझकर जीने का सीख देने वाली बातों का असर कई गुणा बढ जाएगा। वही हुआ है यहाँ... लेकिन यह जादू यही तक नहीं थमा। इससे पहले की आबिदा अपनी आवाज़ का सम्मोहन डालना शुरू करतीं, उस सम्मोहन को और पुख्ता बनाने के लिए गुलज़ार साहब अपनी पुरकशिश शख्सियत के साथ आबिदा की अगुवाई करने आ पहुँचते हैं। "रांझा-रांझा करदी नी" कहते हुए जब गुलज़ार की आवाज़ हमारे कानों तक पहुँचती है तो पहले हीं मालूम हो जाता है कि अगले १०-१५ मिनट तक हमें कुछ और नहीं सूझने वाला। यकीन मानिए, मेरी तो यही हालत थी और मैं पक्के दावे के साथ कह सकता हूँ कि "गुलज़ार प्रजेन्ट्स कबीर बाई आबिदा" के गानों/साखियों/दोहों को सुनते वक़्त आप एक ट्रान्स में चले जाएँगे.. डूब जाएँगे भक्ति के इस दरिया में।

कबीर दास... एक ऐसा इंसान जो जितना जाना-पहचाना है, उतना हीं अनजाना भी है। उसे आप जितना समझते हैं, उससे ज्यादा वह अनबुझा है। उसे बूझने की कईयों ने कोशिश की, कई पहुँचे भी उसके आस-पास, लेकिन कभी वह रेगिस्तान की मरीचिका की तरह दूर निकल गया तो कभी खुर्शीद की तरह इतना चमका कि झुलसने के डर से लोग पीछे की ओर खिसक गए। वह क्या था? हिन्दू.. मुसलमान.. ब्राह्मण.. शूद्र... सूफ़ी.. साधु... कोई सही से नहीं कह सकता। असल में वह सब कुछ था और कुछ भी नहीं। वह किसी भी पंथ के खिलाफ़ था और इस बात के भी खिलाफ़ था कि उसकी कही बातें कहीं कोई पंथ न बन जाए। वह फ़क्कड़ था.. मस्तमौला.. इसलिए बनी बनाई हर चीज़ को बिगड़ने का एक साधन मानता था। वह अस्वीकार करना जानता था.. बस अस्वीकार..

"हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास" पुस्तक में "बच्चन सिंह" कहते हैं:

कबीर दास को कोई भी मत स्वीकार्य नहीं है जो मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद उत्पन्न करता है। उन्हें कोई भी अनुष्ठान या साधना मंजूर नहीं है जो बुद्धि-विरूद्ध है। उन्हें कोई भी शास्त्र मान्य नहीं है जो आत्मज्ञान को कुंठित करता है। वेद-कितेब भ्रमोत्पादक हैं अत: अस्वीकार्य हैं। तीर्थ, व्रत, पूजा, नमाज, रोजा गुमराह करते हैं इसलिए अग्राह्य हैं। पंडित-पांडे, काजी-मुल्ला उन धर्मों के ठेकेदार हैं जो धर्म नहं हैं। अत: घृणास्पद हैं।

वे वैष्णवों को अपना संगी मानते हैं, किंतु विष्णु को चौदह भुवनों का चौधरी कहकर मजाक उड़ाते हैं। शाक्तों से उन्हें घृणा है - "साकत काली कामरी"। हिन्दू-तुर्क दोनों झूठे हैं। वे अकरदी, सकरदी सूफी पर हँसते हुए उसे अपना वचन मानने का उपदेश देते हैं। गोरखनाथ उनके श्रद्धेय हैं पर गोरखपंथी उपहास्य। "चुंडित-मुंडित" श्रावकों और श्रमणों के लिए उनके यहाँ जगह नहीं है। तात्पर्य यह कि वे अपने समय के समस्त मतों को खारिज कर देते हैं। उनसे बड़ा मूर्ति-भंजक (आइकनोक्लास्ट) इतिहास में दूसरा नहीं है।

यह कहना कि वे समाज-सुधारक थे, गलत है। यह कहना कि वे धर्म-सुधारक थे, और भी गलत है। यदि सुधारक थे तो रैडिकल-सुधारक। वे धर्म के माध्यम से समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहते थे। वे कोई भी पंथ खड़ा करने के पक्षपाती नहीं थे। वे ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते थे जिसमें न कोई हिन्दू हो न मुसलमान, न पूजा हो न नमाज, न पंडित हो न मुल्ला, सिर्फ़ इंसान हो।

वे निर्गुण धारा के प्रवर्तक थे। पर उनका निर्गुणपंथ सूफ़ियों के निर्गुणवाद से किंचित भिन्न था। कबीर का ब्रह्म न वेद-वर्णित ईश्वर है, न कुरान-वर्णित ख़ुदा। वह इन दोनों से न्यारा है। वह निर्गुण की लीकबद्धता से अलग है। निर्गुण सम्बन्धी सारी शास्त्रोक्त शब्दावली ग्रहण करते हुए भी वह शास्त्रेतर हो जाता है। यदि उनका निर्गुण शास्त्रोक्त निर्गुण हीं होता तो उससे निम्न वर्ग का कैसे काम चलता?

सामंती समाज की जड़ता को तोड़ने का जितना काम अकेले कबीर ने किया उतना अन्य संतों और सगुणमार्गियों ने मिलकर भी नहीं किया। उनकी चोटों की मार से, जातिवाद के संरक्षक पंडित और मौलवी समान रूप से दु:खी हैं। वे सबसे अधिक आधुनिक और सबसे अधिक प्रासंगिक हैं।

कबीरदास आज भी कितने प्रासंगिक हैं, इसे समझना हो तो गुलज़ार की "मेरे यार जुलाहे" से बड़ा कोई उदाहरण नहीं होगा। टूटते रिश्ते की कसक और उसे जोड़ने में अपनी मजबूरी को दर्शाने के लिए गुलज़ार सीधे-सीधे कबीर को याद करते हैं और कहते हैं कि "मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे".. भला कौन होगा जो कबीर से यह तरकीब न जानना चाहेगा.. आखिर अलादीन का कौन-सा वह चिराग था जो कबीरदास के हाथ लग गया था, जिससे वह सीधे-सीधे ऊपरवाले से जुड़ जाते थे.. जिससे वह सीधे-सीधे धरती के इंसानों से जुड़ जाते थे, जुड़ जाते हैं।

हम आगे की कड़ियों में कबीरदास से इसी तरकीब को जानने की कोशिश जारी रखेंगे। तबतक संगीत की शरण में चलते हैं और डूब जाते हैं बेग़म आबिदा परवीन की स्वरलहरियों में। चलिए.. चलिए.. बढिए भी.. देखिए तो गुलज़ार साहब किस शिद्दत से हम सबको बुला रहे हैं। झूमकर कहिए "मन लागो यार फ़क़ीरी में"

मन लागो यार फ़क़ीरी में!

कबीरा रेख सिन्दूर, उर काजर दिया न जाय ।
नैनन प्रीतम रम रहा, दूजा कहां समाय ॥

प्रीत जो लागी भुल गयि, पीठ गयि मन मांहि ।
रोम रोम पियु पियु कहे, मुख की सिरधा नांहि ॥

मन लागो यार फ़क़ीरी में,
बुरा भला सबको सुन लीजो, कर गुजरान गरीबी में ।

सती बिचारी सत किया, काँटों सेज बिछाय ।
ले सूती _____ आपना, चहुं दिस अगन लगाय ॥

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय ।
बलिहारी गुरू आपणे, गोविन्द दियो बताय ॥

मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा ।
तेरा तुझ को सौंप दे, क्या लागे है मेरा ॥

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नांहि ।
जब अन्धियारा मिट गया, दीपक देर कमांहि ॥

रूखा सूखा खाय के, ठन्डा पानी पियो ।
देख परायी चोपड़ी मत ललचावे जियो ॥

साधू कहावत कठिन है, लम्बा पेड़ खुजूर ।
चढे तो चाखे प्रेम रस, गिरे तो चकना-चूर ॥

मन लागो यार फ़क़ीरी में,
आखिर ये तन खाक़ मिलेगा, क्यूं फ़िरता मगरूरी में ॥

लिखा लिखी की है नहीं, देखा देखी बात ।
दुल्हा-दुल्हन मिल गये, फ़ीकी पड़ी बारात ॥

जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय ।
नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावे सोय ॥

हद हद जाये हर कोइ, अन-हद जाये न कोय ।
हद अन-हद के बीच में, रहा कबीरा सोय ॥

माला कहे है काठ की तू क्यूं फेरे मोहे ।
मन का मणका फेर दे, सो तुरत मिला दूं तोहे ॥

जागन में सोतिन करे, साधन में लौ लाय ।
सूरत डार लागी रहे, तार टूट नहीं जाये ॥

पाहन पूजे हरि/अल्लाह मिले, तो मैं पूजूं पहाड़ ।
ताते या चक्की भली, पीस खाये संसार ॥

कबीरा सो धन संचिये, जो आगे को होइ ।
सीस चढाये गांठड़ी, जात न देखा कोइ ॥

हरि से ते हरि-जन बड़े, समझ देख मन मांहि ।
कहे कबीर जब हरि दिखे, सो हरि हरि-जन मांहि ॥

मन लागो यार फ़क़ीरी में,
कहे कबीर सुनो भई साधू, साहिब मिले सुबूरी में ।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल/नज़्म हमने पेश की है, उसके एक शेर/उसकी एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल/नज़्म को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आँगन" और मिसरे कुछ यूँ थे-

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, अहसास कम होगा

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

या मेरे जहन से यादो के दिये गुल कर दो,
मेरे एहसास की दुनिया को मिटा दो हमदम.
रात तारे नही अँगारे लिये आती है,
इन बरसते हुए शोलो को बुझा दो हमदम...

जिस कलम से जिंदगी को लिखा,
उस अहसास की रोशनाई भी तेरी - मंजु जी

मर मर के जी रहा हूँ और क्या करूँ
ज़ख्मों को सी रहा हूँ और क्या करू
तेरा एहसास जो पड़ा है खाली जाम की तरह
अश्क भर भर के पी रहा हूँ और क्या करूँ - अवनींद्र जी

तेरे होने का एहसास शेष रहा,
"मैं" का न तनिक अवशेष रहा. - पूजा जी

पिछली महफ़िल की शुरूआत सुजॉय जी की टिप्पणी से हुई। सातों बार बोले बंसी सुनकर मज़ा तो आना हीं था क्योंकि हमें यह गाना और इसके पीछे की कहानी आपकी वज़ह से हीं मयस्सर हो पाई थी। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। सुमित जी, आपने सही शब्द की पहचान की और उसपर शेर कहे, इसलिए आपको "शान-ए-महफ़िल" घोषित किया जाता है। शायर का नाम तो मुझे भी नहीं मालूम। पता करने की कोशिश कर रहा हूँ। सजीव जी, ज़रूर कभी हम भी ऐसा कुछ करेंगे। अभी तो अपनी बस शुरुआत है। कुहू जी, मुझसे ज्यादा शुक्रिया के हक़दार सुजॉय जी और सजीव जी हैं, लेकिन मैं अपनी मेहनत को भी कम नहीं आंकता। इसलिए आपका धन्यवाद स्वीकार करता हूँ। ऐसे हीं आते रहिएगा महफ़िल में। मंजु जी एवं पूजा जी, आप दोनों के स्वरचित शेर काफ़ी उम्दा हैं। बधाई स्वीकारें! इंदु जी, मैं आपके भावनाओं और पसंद की कद्र करता हूँ। मुझे संगीत की कोई खासी समझ नहीं, मैं तो बस गीत के बोलों से प्रभावित होकर गीत की तरफ़ आकर्षित होता हूँ। इसलिए अगर किसी गाने से गुलज़ार साब का नाम जुड़ा है तो वह गाना ऐसे हीं मेरे लिए मास्टरपीस बन जाता है। अवनींद जी, महफ़िलें कद्रदानों से सजती हैं और जब तक हमारी महफ़िल के पास आप जैसा कद्रदान है, मुझे नहीं लगता हमें चिंता करने की ज़रूरत है। बाकी हाँ, टिप्पणियाँ कम तो हुई हैं और इसका कारण यह हो सकता है कि महफ़िल भी इन दिनों नियमित नहीं हो पाई। मैं आगे से कोशिश करूँगा कि गायब कम हीं होऊँ :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, February 9, 2011

"सातों बार बोले बंसी" और "जाने दो मुझे जाने दो" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११०

बाद मुद्दत के फिर मिली हो तुम,
ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम,
ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है..

अभी कुछ दिनों पहले हीं भरी-पूरी फिल्मफेयर की ट्रॉफ़ी स्वीकार करते समय गुलज़ार साहब ने जब ये पंक्तियाँ कहीं तो उनकी आँखों में गज़ब का एक आत्म-विश्वास था, लहजे में पिछले ४८ सालों की मेहनत की मणियाँ पिरोई हुई-सी मालूम होती थीं और बालपन वैसा हीं जैसे किसी पाँचवे दर्ज़े के बच्चे को सबसे सुंदर लिखने या सबसे सुंदर कहने के लिए "इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स" से नवाज़ा गया हो। उजले कपड़ों में देवदूत-से सजते और जँचते गुलज़ार साहब ने अपनी उम्र का तकाज़ा देते हुए नए-नवेलों को खुद पर गुमान करने का मौका यह कह कर दे दिया कि "अच्छा लगता है, आपके साथ-साथ यहाँ तक चला आया हूँ।" अब उम्र बढ गई है तो नज़्म भी पुरानी होंगी साथ-साथ, लेकिन "दिल तो बच्चा है जी", इसलिए हर दौर में वही "छुटभैया" दिल हर बार कुछ नया लेकर हाज़िर हो जाता है। यूँ तो यह दिल गुलज़ार साहब का है, लेकिन इसकी कारगुजारियों का दोष अपने मत्थे नहीं लेते हुए, गुलज़ार साहब "विशाल" पर सारा दोष मथ देते हैं और कहते हैं कि "इस नवजवान के कारण हीं मैं अपनी नज़्मों को जवान रख पाता हूँ।" अब इसे गुलज़ार साहब का बड़प्पन कहें या छुटपन.. लेकिन जो भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि लगभग पचास सालों से चल रही इनकी लेखनी अब भी दवात से लबालब है.. अब भी दिल पर वही सुंदर-से "हस्ताक्षर" रचती रहती है.. वही गोल-गोल अक्षर.. गोल-गोल अंडा, मास्टर-जी का डंडा, बकड़ी की पूँछ, मास्टर-जी की मूँछ... और लो बन गया "क".. ऐसे हीं प्यारे-प्यारे तरीकों से और कल्पना की उड़ानों के सहारे गुलज़ार साहब हमारे बीच की हीं कोई चीज हमें सौंप जाते हैं, जिसका तब तक हमें पता हीं नहीं होता। ८ सितम्बर १९८७ को भी यही बात हुई थी। उस दिन जब गुलज़ार साहब ने हमें "दिल" का अड्डा बताया, तभी हमें मालूम हुआ कि यह नामुराद कोई और नहीं "हमारा पड़ोसी है", यह ऐसा पड़ोसी है जो "हमारे ग़म उठा लेता है, लेकिन हमारे ग़मों को दूर नहीं करता" तभी तो गुलज़ार साहब कहते हैं:

हाँ मेरे ग़म तो उठा लेता है, ग़मख्वार नहीं,
दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..


("ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम..." यह सुनकर आपको नहीं लगता कि शायर ने किसी खास के लिए ये अल्फ़ाज़ कहे हैं। अलग बात है कि फिल्मफेयर की बलैक-लेडी पर भी ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं, लेकिन पवन झा जी की मानें तो गुलज़ार साहब ने कुछ सालों पहले "एक खास" के लिए यह नज़्म लिखी थी.. वह खास कौन है? यह पूछने की ज़रूरत भी है क्या? :) )

हाँ तो हम गुलज़ार साहब और "दिल पड़ोसी है" की बातें कर रहे थे। इस एलबम के एक-एक गीत को गुलज़ार साहब ने इतनी शिद्दत से लिखा है (वैसे ये हर गीत को उतनी हीं मेहनत, शिद्दत और हसरत से रचते हैं) कि मुझसे अपनी पसंद के एक या दो गाने चुनते नहीं बन रहे। "कोयले से हीरे को ढूँढ निकाला जा सकता है, लेकिन जहाँ हीरे हीं हीरे हो वहाँ पारखी का सर घूम न जाए तो कहना।" वैसे मैं अपने आप को पारखी नहीं मानता लेकिन हीरों के बीच बैठा तो ज़रूर हूँ।.... शायद एक-एक हीरा परखता चलूँ तो कुछ काम बने। अब ज़रा इसे देखिए:

चाँद पेड़ों पे था,
और मैं गिरजे में थी,
तूने लब छू लिए,
जब मैं सजदे में थी,
कैसे भूलूँगी मैं, वो घड़ी गश की थी,
ना तेरे बस की थी, ना मेरे बस की थी..
(रात क्रिसमस की थी)

या फिर इसे:

माँझी रे माँझी, रमैया माँझी,
मोइनी नदी के उस पार जाना है,
उस पार आया है जोगी,
जोगी सुना है बड़ा सयाना है..

शाम ढले तो पानी पे चलके पार जाता है,
रात की ओट में छुपके रसिया मोहे बुलाता है,
सोना सोना, जोगी ने मेरा
जाने कहाँ से नाम जाना है..
(माँझी रे माँझी)

यहाँ पर माँझी और मोइनी नदी के बहाने "माया-मोह" की दुनिया के उस पार बसे "अलौकिक" संसार की बात बड़े हीं खूबसूरत और सूफ़ियाना तरीके से गुलज़ार साहब ने कह दी है। ऐसी हीं और भी कई सारी नज़्में हैं इस एलबम में जिसमें गुलज़ार, पंचम और आशा की तिकड़ी की तूती गूँज-गूँज कर बोलती है। जिस तरह हमने पिछली कड़ी में खुद इन दिग्गजों से हीं इनकी पसंद-नापसंद और गानों के बनने की कहानी सुनी थी, उसी तरह आज भी क्यों न वह बागडोर इन्हीं को सौंप दी जाए। (साभार: सजीव जी एवं सुजॉय जी)

आशा: "सातों बार बोले बंसी"

पंचम: इसके बारे में गुलज़ार, तुम बताओ।

गुलज़ार: "सातों बार बोले बंसी, एक हीं बार बोले ना.. तन की लागी सारी बोले, मन की लागी खोले ना".. ये गाने में खास बात ये है कि बांसुरी को "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: कैसे?

गुलज़ार: जितनी फूंक तन पे लगती है, उतनी हीं बार बोलती है लेकिन अंदर की बात नहीं बताती। उसके सुर सात हैं, सातों बोलते हैं, जो चुप रहती है जिस बात पे, वो नहीं बोलती।

आशा: वाह!

गुलज़ार: उसमें खूबसूरत बात ये है कि उसको "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए। किस तरह से वो उठके कृष्णा के मुँह लगती है, मुँह लगी हुई है, मुँह चढी हुई है, और वो सारी बातें कहती है, एक जो उसका अपनापन है, वो चुप है, वो नहीं बोलती, उन सात सुरों के अलावा। उसके सारी "इलस्ट्रेशन" जितनी है, वो बाँसुरी के साथ "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: ये गाने में थोड़ा लयकारी भी किया था, सरगम भी किए थे, बड़ा अच्छा था।

आशा: और उसमें बाँसुरी साथ में बोल रही है, और आवाज़ भी आ रही है, तो समझ में नहीं आ रहा कि बाँसुरी बोल रही है कि राधा बोल रही है।

गुलज़ार: हाँ, वही, उसमें "परसोनिफ़िकेशन" है सारी की सारी। फूंक पे बोलती है और वो फूंक पे हीं बोलती है बाँसुरी।

अब चूँकि गुलज़ार साहब ने इस गाने को बड़ी हीं बारीकी से समझा दिया है, इसलिए मुझे नहीं लगता है मुझे कुछ और कहने की ज़रुरत पड़ेगी। तो चलिए पढते और सुनते हैं यह गाना:

सातों बार बोले बंसी,
एक ही बार बोले ना,
तन की लागी सारी बोले,
मन की लागी खोले ना..

चुपके सुर में भेद छुपाये,
फूँक-फूँक बतलाये,
तन की सीधी मन की घुन्नी,
पच्चीस पेंचे खाए,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..

प्रीत की पीड़ा जाने मुई,
छाती छेद पड़े,
उठ-उठ के फिर मुँह लगती है,
कान्हा संग लड़े,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..




नियम से तो हमें बस एक हीं गाने तक अपनी महफ़िल को सीमित रखना चाहिए था, लेकिन बात जब इस "स्वर्णिम" तिकड़ी की हो रही हो तो एक से किसका मन भरता है! यूँ भी हम जितना इनके गाने सुनेंगे, उतना हीं हमें संगीत की बारीकियाँ जानने को मिलेंगी। पंचम दा की यही तो खासियत रही थी कि वे संगीत को बस "ट्रेडिशनल" एवं "कन्वेशनल" वाद्य-यंत्रों तक घेरकर नहीं रखते थे, बल्कि "बोल" के हिसाब से उसमे "रेलगाड़ी की सीटी", "मुर्गे की बाँग", "जहाज का हॉर्न" तक डाल देते थे। तभी तो सुनने वाला इनके संगीत की ओर खुद-ब-खुद खींचा चला आता था। जहाँ तक आशा ताई की बात है, तो इनके जैसा "रेंज" शायद हीं किसी गायिका के पास होगा। ये जितने आराम से "दिल चीज़ क्या है" गाती हैं, उतनी हीं सहूलियत से "दम मारो दम" को भी निभा जाती हैं। अब जहाँ ये तीनों अलग-अलग इतने करामाती हैं तो फिर साथ आ जाने पर "क़यामत" तो आनी हीं है। आशा जी "दिल पड़ोसी है" को अपना सर्वश्रेष्ठ एलबम मानती है.. तभी तो गुलज़ार साहब को उनके जन्मदिवस पर बधाई-संदेश भी इसी के रंग में रंगकर भेज डालती हैं: "भाई जन्म-दिन मुबारक। पंचम, आप और मैं खंडाला में, दिल पड़ोसी है के दिन, मैं जिंदगी में कभी नहीं भूलूंगी।" हम भी इस तिकड़ी को कभी नहीं भूलेंगे। इसी वादे और दावे के साथ चलिए अगली बातचीत और अगले गाने का लुत्फ़ उठाते हैं:

आशा(गाती हैं): "जेते दाओ आमाए डेको ना... "

गुलज़ार: वाह!

पंचम: ये तो आप बंगाली में गा रही हैं.. "प्रोग्राम" का हिन्दी गानों का है।

आशा: हिन्दी हो, पंजाबी हो, चाहे टिम्बकटु की ज़बान हो, गाना सुर जहाँ अच्छे, मतलब जहाँ अच्छा, वो गाना अच्छा होता है।

गुलज़ार: सच में आशा जी, मैंने इसके कई बंगाली गाने चुराए हैं।

आशा: अच्छा?

गुलज़ार: हाँ, बहुत बार। ये पूजा के लिए जो गाने करते हैं, तो मैं पास बैठे हुए, कई बार धुन बहुत अच्छी लगी, जैसे एक, उसके पूरे बंगाली के बोल मुझे याद नहीं, और गौरी दा "फ़ेमस पोयट फ़्रॉम बंगाल"

आशा: गौरी शंकर मजुमदार

गुलज़ार: जी हाँ, और इनके बोल चल रहे थे पूजा के गाने के "आस्थे आमार देरी होबे"

पंचम: आ हा हा

गुलज़ार: उसपे वो गाना लिखा था उस ट्युन पर.. "तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं"

पंचम: ये उसी का गाना?

गुलज़ार: हाँ, आँधी में। और ये भी उसी तरह का गाना इनका, जिसपे आप अभी गा रहीं थीं, "जेते दाव आमाय"

आशा: "दिल पड़ोसी है" में.. (गाती हैं) "जाने दो मुझे जाने दो"।

और ये रहे उस गाने के बोल:

जाने दो मुझे जाने दो
रंजिशें या गिले, वफ़ा के सिले
जो गये जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, _______ कम होगा
गहरी ख़राशों की गहरी निशानियाँ हैं
चेहरे के नीचे कितनी सारी कहानियाँ हैं
माज़ी के सिलसिले, जा चुके जाने दो
ना आ आ..

उम्मीद-ओ-शौक़ सारे लौटा रही हूँ मैं,
रुसवाई थोड़ी-सी ले जा रही हूँ मैं
बासी दिलासों की शब तो गुज़ार आये
आँखों से गर्द सारी रोके उतार आये
आँखों के बुलबुले बह गये, जाने दो
ना आ आ..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल/नज़्म हमने पेश की है, उसके एक शेर/उसकी एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल/नज़्म को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आँगन" और मिसरे कुछ यूँ थे-

ओस धुले मुख पोछे सारे
आँगन लेप गई उजियारे

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

आँगन में चहकें गौरैयाँ छत पर बैठा काग
जाड़ों की धूप सलोनी उस पर तेरा ये राग. - शन्नो जी

जिस आँगन में सजन संग हुए फेरे ,
अपनों का सुहाना मंजर याद आए रे - मंजु जी

कोई हँसता है तो तुमसा लगता है
दिल धड़कता है तो तुमसा लगता है
किसी सुबह मेरे आंगन मैं ओस से भीगा
कोई जब फूल खिलता है तो तुमसा लगता है - अवनींद्र जी

बहुत याद आती है
आँगन में लेटी हुई ,
कहानी सुनाती हुई वो मेरी
अम्मा (दादी ) - नीलम जी

डॉक्टर साहब महफ़िल की शुरूआत आपकी टिप्पणी से हुई, मेरे लिए इससे बड़ी बात क्या होगी। आपने सही कहा कि पंचम के गुजरने के बाद अकेले पड़े गुलज़ार के लिए विशाल भारद्वाज राहत की साँस की तरह आए हैं। वैसे बीच-बीच में "भूपिंदर" भी ऑक्सीजन की झलक दिखाते रहते हैं। लेकिन गुलज़ार तो गुलज़ार हैं। इन्हें कहीं एक छोटी-सी चिनगी भी दिख गई तो ये उसे आग में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। इसलिए हमें फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम तो बस उन पढते और लिखते जाएँगे, बस आप ऐसे हीं हमारा हौसला-आफ़ज़ाई करते रहें। शन्नो जी, घर छोड़कर कहाँ जाएँगीं आप.. आखिरकार लौटकर तो यहीं आना है :) सुजॉय जी, लीजिए हमने आज आपकी फ़रमाईश पूरी कर दी.. आप भी क्या याद करेंगे! मंजु जी, अवनींद्र जी एवं नीलम जी, आपकी स्वरचित पंक्तियों ने महफ़िल के सूनेपन को समाप्त करने में हमारी सहायता की। इसके लिए हम आपके तह-ए-दिल से आभारी हैं। पूजा जी, दिलीप जी से हमारा परिचय कराने के लिए आपका धन्यवाद! लेकिन यह क्या.. शेर किधर हैं? अगली बार ध्यान रखिएगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Tuesday, February 8, 2011

पिया न रहे मन-बसिया..रंगरेज से दर्द-ए-दिल बयां कर रहे हैं "तनु वेड्स मनु" के संगीतकार कृष्णा ,गीतकार राजशेखर

Taaza Sur Taal (TST) - 05/2011 - TANU WEDS MANU

"तनु वेड्स मनु".. यह नाम सुनकर आपके मन में कोई भी उत्सुकता उतरती नहीं होगी, इसका मुझे पक्का यकीन है। मेरा भी यही हाल था। एक बेनाम-सी फिल्म, अजीबो-गरीब नाम और अजीबो-गरीब जोड़ी मुख्य-पात्रों की। "माधवन" और "कंगना".. मैं अपने सपने में भी इस जोड़ी की कल्पना नहीं कर सकता था..। लेकिन एक दिन अचानक इस फिल्म की कुछ झलकियाँ यू-ट्युब पर देखने को मिलीं. हल्की-सी उत्सुकता जागी और जैसे-जैसे दृश्य बढते गए, मैं इस "बेढब"-सी अजबनी दुनिया से जुड़ता चला गया। झलकियाँ का ओझल होना था और मैं यह जान चुका था कि यह फिल्म बिन देखे हीं नकार देने लायक नहीं है। कुछ तो अलग है इसमें और इन्हीं दृश्यों के बीच जब "कदी साडी गली पुल (भुल) के भी आया करो" के बीट्स ढोलक पर कूदने लगे तो जैसे मेरे कानों ने पायल बाँध लिये और ये दो नटखट उचकने लगे अपनी-अपनी जगहों पर। फिर तो मुझे समझ आ चुका था कि ऐंड़ी पर खड़े होकर मुझे इस फिल्म के गानों की बाट जोहनी होगी। फिर भी मन में एक संशय तो ज़रूर था कि "कदी साडी गली".. ये गाना तो पुराना है और जब एक पुराने गाने के सहारे फिल्म का प्रचार-प्रसार किया जा रहा है तो मुमकिन है कि "ओरिजनल गानों" में कोई दम न हो। लेकिन मैं दुआ कर रहा था कि मेरा शक़ गलत निकले और मेरी दुआ बहुत हद तक कामयाब हुई, इसकी मुझे बेहद खुशी है।

लेम्बर हुसैनपुरी के गाए "कदी साडी गली" में अजब का नशा है। ढोल के बजते हीं पाँव खुद-ब-खुद थिरकने लगते हैं। फिल्म में आने से पहले यह गाना जिस मुकाम पर था, आर०डी०बी० ने रीमिक्स करके उस मुकाम को कुछ और ऊपर कर दिया है। पंजाबी भांगड़ों की तो वैसे हीं धूम और धुन गजब की होती है, लेकिन कई मर्तबा एक तरह के हीं बीट्स इस्तेमाल होने के कारण मज़ा जाता रहता है। अच्छी बात यह है कि इस गाने में नयापन है। बस यही उम्मीद करता हूँ कि यह गाना फिल्म के कथानक को आगे बढाने में मदद करेगा और ठूंसा हुआ-सा नहीं दिखेगा।

फिल्म का पहला गाना हीं आर०डी०बी० का? लेकिन आर०डी०बी० तो बस एक हिप-हॉप या डांस-मस्ती गाने के लिए फिल्म में लाए जाते हैं यानि कि हर फिल्म में इनका बस एक हीं गाना होता है। "तब तो कोई न कोई दूसरा संगीतकार हीं इस फिल्म की नैया को अपने गानों के पतवार और चप्पु के सहारे पार लगाएगा और अगर गाने अच्छे करने हैं तो निर्देशक(आनंद एल राय) कोई जाने-माने संगीतकार को हीं यह बागडोर सौपेंगे ताकि बुरे गानों के कारण फिल्म की लुटिया न डूब जाए..." यही सोच रहे हैं ना आप? अमूमन हर किसी की यही सोच होती है। कोई भी नए संगीतकारों पर एकबारगी भरोसा नहीं कर पाता.. और अगर कोई फिल्म किसी निर्देशक की पहली फिल्म हो तब तो हर एक सुलझे इंसान की यही सलाह होती है कि भाई फिल्म में लगा पैसा निकालना हो तो रिस्क मत लो, सेफ़ खेलो और किसी नामी संगीतकार से गाने तैयार करवा लो ताकि फिल्म भले पिट जाए लेकिन गाने हिट हो जाएँ।

यहीं पर आपसे चूक हो गई। हाँ, लेकिन आनंद साहब ने कोई चूक नहीं की। इन्होंने न सिर्फ़ खुद कुछ नया करने का बीड़ा उठाया, बल्कि अपने साथ-साथ गीत और संगीत में भी नए मोहरे सजाकर पूरी की पूरी बाजी हीं रोमांचक कर दी। नया गीतकार, नया संगीतकार.. चलेंगे तो सब साथ, ढलेंगे तो सब साथ, लेकिन इस बात की तो खुशी होगी कि "फिल्म इंडस्ट्री" के दबाव के आगे झुकना नहीं पड़ा, जो दिल में आया वही किया। तो आईये हम सब स्वागत करते हैं संगीतकार "कृष्णा" (Krsna) एवं गीतकार "राजशेखर" का।

ये कृष्णा कौन हैं, ये राजशेखर पहले किधर थे, इन प्रश्नों का जवाब तो हम ढूँढ नहीं पाये, लेकिन इतना यकीन है कि इन दोनों की यह पहली हिन्दी-फिल्म है। और पहली हीं फिल्म में दोनों ने अपनी छाप छोड़ने की पूरी कोशिश की है।

चलिए तो इस जोड़ी के पहले गीत की बात करते हैं। "ओ रंगरेज मेरे"... इस गीत के बोल बड़े हीं खूबसूरत है। उर्दू और देसी शब्दों के इस्तेमाल से राजशेखर ने एक सूफ़ियाना माहौल तैयार किया है।

रंगरेज तूने अफ़ीम क्या है खा ली,
जो मुझसे तू है पूछे कि कौन-सा रंग?
रंगों का कारोबार है तेरा,
ये तू हीं तो जाने कि कौन-सा रंग?
मेरा बालम रंग, मेरा साजन रंग,
मेरा कातिक रंग, मेरा अगहन रंग,
मेरा फ़ागुन रंग, मेरा सावन रंग..

हद रंग दे, अनहद भी रंग दे,
मंदिर, मस्जिद, मयकद रंग..

आजा हर वसलत रंग दे,
जो आ न सके तो फ़ुरक़त रंग दे..

ऐ रंगरेज मेरे...
ये कौन-से पानी में तूने कौन-सा रंग घोला है?


"मेरे आठों पहर मनभावन रंग दे"- रंगरेज से ब़ड़ी हीं मीठी गुहार लगाई है हमारे आशिक़ ने। अब यहाँ पर रंगरेज खुदा है या फिर इश्क़ के पैरहन रंगने वाली प्रेमिका.. इसका खुलासा तो दिल की दराज़ें खोलकर हीं किया जा सकता है, लेकिन जो भी हो सबसे बड़ा रंगरेज तो खुदा हीं है और खुदा से इस तरह जुड़ने को हीं "निर्गुण" कहते हैं (हिन्दी फिल्मों में निर्गुण का सबसे बड़ा उदाहरण "लागा चुनरी में दाग" है)। जब आशिक़ यह कहता है कि "मेरा क़ातिल तू, मेरा मुंसिफ़ तू" तो चचा ग़ालिब का यह शेर याद आ जाता है:

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क, जीने और मरने का,
उसी को देखकर जीते हैं, जिस काफ़िर पर दम निकले!


इस रंगरेज के पास "कृष्णा" दो बार गए हैं एक बार अपनी हीं आवाज़ के साथ तो दूसरी बार "वडाली बंधुओं" की मंडली के साथ। यूँ तो वडाली बंधुओं (पुरनचंद वडाली एवं प्यारेलाल वडाली) पर खुदा की मेहर है (इसलिए इनकी आवाज़ों से सजी हुई हरेक नज़्म दिल को सुकून पहुँचाती है और यहाँ भी इन दोनों ने वही समां बाँधा है), लेकिन इस बार कृष्णा पर भी उस ऊपर वाले ने अपनी रहमत तारी कर दी है। दोनों हीं गाने अपनी जगह पर कमाल के बने हैं। धुन एक हीं है, इसलिए ज्यादा कुछ फ़र्क की उम्मीद भी नहीं थी। लेकिन जहाँ पर वडाली बंधु हों, वहाँ नयापन खुद-ब-खुद आ जाता है, इसलिए कृष्णा को यही कोशिश करनी थी कि वे पूरी तरह से कमजोर न पड़ जाएँ... ऐसा नहीं हुआ, यह सबके लिए अच्छी खबर है!

मोहित चौहान! यह नाम लिख देने/सुन लेने के बाद मन में किसी पहाड़ी वादी की परछाईयाँ उभर आती है और दिखने लगता है एक शख्स जो हाथ में गिटार और आँख में प्रेयसी के ख्वाब लिए पत्तों और गुंचों के बीच से चला जा जा रहा है। पहाड़ों का ठेठ अंदाज़ उसकी आवाज़ में खुलकर नज़र आता है और यही कारण है कि हर संगीतकार मोहित चौहान से "प्यार के दो मीठे बोल" गुनगुनाने की दरख्वास्त कर बैठता है। "कितने दफ़े दिल ने कहा, दिल की सुनी कितने दफ़े" (यूँ हीं).. बोल बड़े हीं सीधे और साधारण हैं, लेकिन मोहित की आवाज़ ने इस गाने में जान डाल दी है।

"पिया न रहे मन बसिया" - रूप कुमार राठौड़ साहब को मैने पहले हज़ारों बार सुना है, लेकिन आज तक इनकी आवाज़ इस तरह की पहले कभी नहीं लगी थी, जैसी कि इस गाने में है। इनकी आवाज़ यहाँ पहचान में हीं नहीं आती। मैंने तो कई जगहों पर "शफ़कत अमानत अली" का नाम लिखा पाया था (और मैं मान भी बैठा था) , लेकिन आठ-दस विश्वस्त सूत्रों और ब्लॉगों के चक्कर लगाने के बाद मुझे यकीन करना पड़ा कि ये अपने रूप साहब हीं हैं। अपनी नई आवाज़ में वही पुराना जादू बिखेरने में ये यहाँ भी कामयाब हुए हैं। ज़रा इस गाने के बोलो पर गौर करें:

पल न कटे अब सखी रे पिया बिन,
नीम-सा कड़वा लागे दिन,
हाय! नीम-सा कड़वा लागे अब दिन,
उस पे ये चंदा हाय.. चंदा भी बना सखी सौतन कि
चंदा भी बना हाय.. सखी सौतन कि
कीसो रात मोरी अमावसिया...
मन बसंत को पतझड़ कर वो
ले गयो, ले गयो, ले गयो... रंग-रसिया


पहले फिल्म के लिहाज से राजशेखर ने बेहतरीन पंक्तियाँ गढी हैं। जहाँ इस गाने में "मन-बसिया" और "रंग-रसिया" की बात हो रही है, वहीं अगले गाने "मन्नु भैया" में "करोलबाग की गलियों", "केसर", "यमुना" और "शर्मा जी" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके इन्होंने गाने में चार-चाँद लगा दिए हैं। नाम से हीं ज़ाहिर है कि "मन्नु भैया" की टाँग खींची जा रही है और इस खेल में सबसे आगे हैं "सुनिधि चौहान" और उनका तबले और ढोलक (मज़ाक वाले) पर संगत दे रहे हैं नीलाद्री देबनाथ, उज्जैनी मुखर्जी, राखी चाँद और विवेक नायक

अंबिया, इलायची, दालचीनी और केसर,
सुखाएगी तन्नु करोलबाग की छत पर,
तब मन्नु भैया का करिहैं..

जब दिल्ली के मिक्सर में घुट जावे कानपुर की भंग,
जब दिल्ली के ऊपर चढ जावे कानपुर का रंग,
जब क़ुतुब से भी ऊपर जावे, कानपुर की पतंग,
तब मन्नु भैया का करिहैं..


मुझे तो यह गाना बेहद पसंद आया। इस गाने में जहाँ एक तरफ़ मस्ती है, मज़ाक है, वहीं दूसरी तरफ़ शब्दों और ध्वनियों की अच्छी धमाचौकड़ी भी है। ऐसे गाने अमूमन "पुरूष-स्वर" (मेल-व्याएस) में तैयार किए जाते है, लेकिन यहाँ कृष्णा की दाद देनी होगी जो इन्होंने सुनिधि को ये गाना सौंपा और वाह! सुनिधि ने दिल खुश कर दित्ता यार ;)

फिल्म का अंतिम गाना है मिका की आवाज़ में "जुगनी"। यह गाना दूसरे "जुगनी" गानों की तरह हीं है, इसलिए कुछ अलग-सा नहीं लगा मुझे। हाँ, मिका पा जी की मेहनत झलकती है और इसमें दो राय नहीं है कि इस गाने के लिए इनसे अच्छा कोई दूसरा गायक नहीं हो सकता था, लेकिन संगीत (संगीतकार) ने इनका साथ नहीं दिया। "बीट्स" प्रेडिक्टेबल हैं.. इसलिए मज़ा रह-रहकर किरकिरा हो जाता है। मुझे किसी भी दिन (any day) "ओए लकी लकी ओए" का "जुगनी" इस "जुगनी" से ज्यादा पसंद आएगा। क्या करें! स्वाद-स्वाद की बात है :)

तो इस तरह से "तनु वेड्स मनु" के संगीत ने गुमनाम से नामचीन का सफ़र आखिरकार तय कर हीं लिया (है)।

आज की समीक्षा आपको कैसी लगी, ज़रूर बताईयेगा। चलिए तो इस बातचीत को यहीं विराम देते हैं। अगले हफ़्ते फिर मुलाकात होगी। नमस्कार!

आवाज़ रेटिंग - 7/10

सुनने लायक गीत - रंगरेज, पिया न रहे, मन्नु भैया, साडी गली

एक और बात: इस फिल्म के सारे गाने(प्रिव्यु मात्र) आप कृष्णा के ओफ़िसियल वेबसाईट पर सुन सकते हैं यहाँ:
http://krsnamusic.com/news/tanu-weds-manu-piya-sung-by-roop-kumar-rathod-or-shafqat-amanat-ali/




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

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