मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

असंतुष्ट (बोलती कहानियाँ सीज़न 1) पॉडकास्ट # 8

रेडियो प्लेबैक इंडिया के साप्ताहिक स्तम्भ 'बोलती कहानियाँ' के अंतर्गत हम आपको सुनवाते हैं हिन्दी की नई, पुरानी, अनजान, प्रसिद्ध, मौलिक और अनूदित, यानि के हर प्रकार की कहानियाँ। बोलती कहानियाँ (सीज़न 1) केे पॉडकास्ट # 8 में आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं अनुराग शर्मा की एक लघुकथा "असंतुष्ट", अनुराग शर्मा ही के स्वर में।



मरेंगे हम किताबों में वरक होंगे कफ़न अपना
किसी ने न हमें जाना न पहचाना सुखन अपना
~ अनुराग शर्मा

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

पब्लिसिटी है, अखबार में फ़ोटो छपाने को किया है।
(अनुराग शर्मा की "असंतुष्ट" से एक अंश)



यूट्यूब पर सुनिये
एंकर पर सुनिये
गूगल पॉडकास्ट पर सुनिये

कहानी "असंतुष्ट" का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 20 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिकों, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया boltikahaniyan.rpi@gmail.com पर सम्पर्क करें।

Season 1; Podcast #8, Asantusht: Anurag Sharma/2021/8. Voice: Anurag Sharma

सोमवार, 12 अप्रैल 2021

स्वरगोष्ठी – 509: "पुरवा सुहानी आयी रे ..." : राग - तिलंग :: SWARGOSHTHI – 509 : RAG - TILANG

             



स्वरगोष्ठी – 509 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 13 

"आत्मा और परमात्मा मिले जहाँ, यही है वो स्थान...", तिलंग के सुरों  से होती है "पुरवा सुहानी आयी रे" की शुरुआत




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी,  साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।
उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की बारह कड़ियों में राग आसावरी, कोमल ऋषभ आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन), शुद्ध कल्याण, जोगिया, काफ़ी, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, देश/देस और देस मल्हार पर आधारित देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की तेरहवीं कड़ी, जिसमें हम सुनवा रहे हैं राग तिलंग और भैरवी पर आधारित एक फ़िल्मी देशभक्ति गीत फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम' से - "पुरवा सुहानी आयी रे..."। साथ ही राग तिलंग की एक ठुमरी, इन्दुबाला देवी की आवाज़ में। 


हिन्दी
  फ़िल्मी देशभक्ति गीतों पर कोई भी चर्चा फ़िल्मकार मनोज कुमार की फ़िल्मों के देशभक्ति गीतों के बग़ैर अधूरी है। फ़िल्मी देशभक्ति गीतों के ख़ज़ाने को समृद्ध करने में मनोज कुमार की भूमिका सराहनीय है। ’शहीद’, ’उपकार’, ’पूरब और पश्चिम’, ’क्रान्ति’, ’क्लर्क’, ’देशवासी’ जैसी फ़िल्मों में एक से बढ़ कर एक देशभक्ति गीत हमें सुनने को मिले हैं। आज के इस अंक के लिए फ़िल्म ’पूरब और पश्चिम’ के एक बेहद ख़ूबसूरत गीत को हमने चुना है। इस गीत की सबसे ख़ास बात यह है कि शुरुआती पंक्तियों के अलावा पूरे गीत में कहीं भी देश भक्ति या राष्ट्रीयता से सम्बन्धित शब्द सुनने को नहीं मिलते। पर बावजूद इसके, समूचे गीत में भारतीयता का चित्रण स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है। फ़िल्मांकन में भी देश के उत्तर से लेकर दक्षिण और पूरब से लेकर पश्चिम तक के विशिष्ट पर्यटन स्थलों के दृश्य दिखाये जाते हैं। विभिन्न प्रसंगों और संदर्भों के सांकेतिक उल्लेखों से यह गीत महज़ एक नृत्य गीत ना रह कर एक संदेशात्मक राष्ट्रीय उत्सव गीत बन पड़ा है। गीतकार संतोष आनन्द मनोज कुमार की कई फ़िल्मों में एक से एक सुन्दर गीत लिखे हैं और यह गीत भी उन्हीं में से एक है। कल्याणजी-आनन्दजी के संगीत में रिदम और ठेकों को ख़ास जगह हमेशा मिली है और यह गीत कोई व्यतिक्रम नहीं। लता मंगेशकर, महेन्द्र कपूर, मनहर और साथियों द्वारा गाया यह गीत फ़िल्माया गया है मनोज कुमार, विनोद खन्ना और भारती पर। मनहर ने विनोद खन्ना का पार्श्वगायन किया है। दृश्य में सायरा बानो भी नज़र आती हैं।

"पुरवा सुहानी आयी रे" गीत के शुरू में मुखड़े से पहले कुछ पंक्तियाँ गायी जाती हैं बिना ताल के।

"कहीं ना ऐसी सुबह देखी जैसे बालक की मुस्कान
लाख दूर कहीं मन्दिर हल्की सी मुरली की तान
गुरुबानी गुरुद्वारे में तो मस्जिद से उठती अज़ान
आत्मा परमात्मा मिले जहाँ, यही है वो स्थान"

उपर्युक्त पंक्तियों के गायन में राग तिलंग की स्पष्ट छाया का अनुभव किया जा सकता है। तिलंग के आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध निषाद, किन्तु अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। ये सारी विशेषताएँ प्रस्तुत गीत की इन शुरुआती पंक्तियों में भी मौजूद है। इसके बाद समूह स्वरों में लोक नृत्य आधारित पंक्ति "ढोली ढोल बजाणा, ताल से ताल मिलाना..." गीत के रिदम को सेट करती है और फिर मुखड़ा शुरू होता है "पुरवा सुहानी आयी रे, पुरवा"। इस पंक्ति में राग भैरवी की हल्की छाया मिलती है। विविध भारती के ’उजाले उनकी यादों के’ कार्यक्रम में संगीतकार आनन्दजी से बातचीत के दौरान "पुरवा सुहानी आयी रे" गीत को बजाने से पहले आनन्दजी ने विविध भारती के ’लोक संगीत’ का हवाला देते हुए इस गीत के संगीत से जुड़ी महत्वपूर्ण बात बतायी जो यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं -

"लोक संगीत', इस प्रोग्राम को मैं बहुत सुनता रहा हूँ। यहाँ पे मादल क्यों बज रहा है, यहाँ पे यह क्यों बज रहा है, वो चीज़ें मुझपे बहुत हावी होती रही हैं, क्योंकि शुरू से मेरी यह जिज्ञासा रही है कि यह ऐसा क्यों है? कि यहाँ मादल क्यों बजाई जाती है? हिमाचल में अगर गाना हो रहा है तो फ़ास्ट गाना नहीं होगा क्योंकि ऊपर high altitude पे साँस नहीं मिलती, तो वहाँ पे आपको स्लो ही नंबर देना पड़ेगा। अगर पंजाब है तो वहाँ plateau है तो आप धनधनाके, खुल के डांस कर सकते हैं। सौराष्ट्र में आप जाएँगे तो वहाँ पे कृष्ण, उषा, जो लेके आए थे, वो आपको मिलेगा, वहाँ का डांडिया एक अलग होता है, यहाँ पे ये अलग होता है, तो ये सारी चीज़ें अगर आप सीखते जाएँ, सीखने का आनंद भी आता है, और इन चीज़ों को काम में डालते हैं तो काम आसान भी हो जाता है।"
 




गीत : “पुरवा सुहानी आयी रे...” , फ़िल्म : पूरब और  पश्चिम, गायक: लता मंगेशकर, महेन्द्र कपूर, मनहर, साथी 


राग तिलंग को खमाज थाट के अन्तर्गत माना जाता है। इस राग में ऋषभ और धैवत वर्जित होता है। राग की जाति औड़व-औड़व होती है। अर्थात इसके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में शुद्ध निषाद, किन्तु अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग तिलंग के गायन-वादन का उपयुक्त समय रात्रि का दूसरा प्रहर माना जाता है। यद्यपि राग तिलंग में ऋषभ स्वर वर्जित होता है, फिर भी राग के सौन्दर्य-वृद्धि के लिए कभी-कभी तार सप्तक के अवरोह में ऋषभ स्वर का प्रयोग कर लिया जाता है। यह श्रृंगार रस प्रधान, चंचल प्रकृति का राग होता है, अतः इसमें छोटा खयाल, ठुमरी और सुगम संगीत की रचनाएँ अधिक मिलती हैं। यह पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग तिलंग में अधिकतर ठुमरी गायी जाती है। एक शताब्दी से भी पहले व्यावसायिक गायिकाओं द्वारा गायी गई ठुमरियों का स्वरूप कैसा होता था, इसका अनुभव कराने के लिए अब हम आपको पिछली शताब्दी की गायिका इन्दुबाला देवी के स्वर में राग तिलंग की एक ठुमरी सुनवाते है। भारत में ग्रामोफोन रिकार्ड के निर्माण का आरम्भ 1902 से हुआ था। सबसे पहले ग्रामोफोन रिकार्ड में उस समय की मशहूर गायिका गौहर जान की आवाज़ थी। संगीत की रिकार्डिंग के प्रारम्भिक दौर में ग्रामोफोन कम्पनी को बड़ी कठिनाई से गायिकाएँ उपलब्ध हो पातीं थीं। प्रारम्भ में व्यावसायिक गायिकाएँ ठुमरी, दादरा, कजरी, होरी, चैती आदि रिकार्ड कराती थीं। 1902 से गौहर जान ने जो सिलसिला आरम्भ किया था, 1910 तक लगभग 500 व्यावसायिक गायिकाओं ने अपनी आवाज़ रिकार्ड कराई। इन्हीं में एक गायिका इन्दुबाला देवी भी थीं। आइए अब हम इन्हीं की आवाज़ में राग तिलंग की ठुमरी सुनते हैं। ठुमरी के बोल हैं, -“तुम काहे को नेहा लगाए...”। आप यह ठुमरी सुनिए।



ठुमरी : तुम काहे को नेहा लगाये...”, राग : तिलंग, गायक : इन्दुबाला देवी 



अपनी बात

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह के साथ “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट के लिंक को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें soojoi_india@yahoo.co.in अथवा sajeevsarathie@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


कृष्णमोहन मिश्र जी की पुण्य स्मृति को समर्पित
विशेष सलाहकार : शिलाद चटर्जी
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
स्वरगोष्ठी – 509: "पुरवा सुहानी आयी रे ..." : राग - तिलंग :: SWARGOSHTHI – 509 : RAG - TILANG



रविवार, 4 अप्रैल 2021

स्वरगोष्ठी – 508: "चलो झूमते सर से बांधे कफ़न ..." : राग - कोमल ऋषभ आसावरी :: SWARGOSHTHI – 508 : RAG - KOMAL RISHABH ASAVARI

            



स्वरगोष्ठी – 508 में आज 

देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग – 12 

"चलो झूमते सर से बांधे कफ़न...", कोमल ऋषभ आसावरी के सुरों  के द्वारा सैनिकों का उत्साहवर्धन




“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के मंच पर मैं सुजॉय चटर्जी,  साथी सलाहकर शिलाद चटर्जी के साथ, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।
उन्नीसवीं सदी में देशभक्ति गीतों के लिखने-गाने का रिवाज हमारे देश में काफ़ी ज़ोर पकड़ चुका था। पराधीनता की बेड़ियों में जकड़ा देश गीतों, कविताओं, लेखों के माध्यम से जनता में राष्ट्रीयता की भावना जगाने का काम करने लगा। जहाँ एक तरफ़ कवियों और शाइरों ने देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत रचनाएँ लिखे, वहीं उन कविताओं और गीतों को अर्थपूर्ण संगीत में ढाल कर हमारे संगीतकारों ने उन्हें और भी अधिक प्रभावशाली बनाया। ये देशभक्ति की धुनें ऐसी हैं कि जो कभी हमें जोश से भर देती हैं तो कभी इनके करुण स्वर हमारी आँखें नम कर जाते हैं। कभी ये हमारा सर गर्व से ऊँचा कर देते हैं तो कभी इन्हें सुनते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इन देशभक्ति की रचनाओं में बहुत सी रचनाएँ ऐसी हैं जो शास्त्रीय रागों पर आधारित हैं। और इन्हीं रागाधारित देशभक्ति रचनाओं से सुसज्जित है ’स्वरगोष्ठी’ की वर्तमान श्रृंखला ’देशभक्ति गीतों में शास्त्रीय राग’। अब तक प्रकाशित इस श्रृंखला की दस कड़ियों में राग आसावरी, गुजरी तोड़ी, पहाड़ी, भैरवी, मियाँ की मल्हार, कल्याण (यमन), शुद्ध कल्याण, जोगिया, काफ़ी, भूपाली, दरबारी कान्हड़ा, देश/देस और देस मल्हार पर आधारित देशभक्ति गीतों की चर्चा की गई हैं। आज प्रस्तुत है इस श्रृंखला की बारहवीं कड़ी, जिसमें हम सुनवा रहे हैं राग कोमल ऋषभ आसावरी पर आधारित एक फ़िल्मी देशभक्ति गीत। मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा और चित्रगुप्त द्वारा संगीतबद्ध फ़िल्म ’काबली ख़ान' का गीत "चलो झूमते सर से बांधे कफ़न..." की चर्चा के साथ-साथ इसी राग की एक विशुद्ध रचना पंडित वेंकटेश कुमार की आवाज़ में। 


हेलेन
 को हम फ़िल्मों में जिस रूप में और जिन किरदारों में देखने में अभ्यस्त हैं, उस रूप और उन किरदारों से बिलकुल अलग वो नज़र आयीं 1963 की फ़िल्म ’काबली ख़ान’ में। इस फ़िल्म में उन पर एक देशभक्ति गीत फ़िल्माया गया था - "चलो झूमते सर से बांधे कफ़न, लहू माँगती है ज़मीन-ए-वतन"। लता मंगेशकर और साथियों के गाये मजरूह-चित्रगुप्त के रचे इस गीत में सिपाहियों का उत्साहवर्धन किया जा रहा है अपने देश पर मर मिटने के लिए। फ़िल्म में इस गीत का सिचुएशन कुछ ऐसा है कि एक सभा में जमा हुए सिपाहियों का हौसला-अफ़ज़ाई कर रही हैं हेलेन। दृश्य में अभिनेता जयन्त और अजीत भी नज़र आते हैं। तानाशाह जयन्त अपनी जनता पर अत्याचार करते हैं जिस वजह से धीरे-धीरे जनता उनके ख़िलाफ़ विद्रोह करने की ठान लेती है। इस दृश्य में जो सिपाही हैं, वे सब जयन्त के वफ़ादार हैं; बस हेलेन और अजीत ही उनमें विद्रोही हैं, जो भेस बदल कर सेना में घुस गए हैं। गीत के दौरान गीत के बोलों और सिपाहियों के जस्बे को देख कर जयन्त का मन उलझ जाता है, उसे समझ नहीं आता कि आख़िर ये सब क्या चल रहा है! मजरूह सुल्तानपुरी ने बड़े सुन्दर शब्द पिरोये हैं इस गीत में जो सुनने वालों के दिलों में देशभक्ति का जस्बा पैदा कर देता है। जिस प्रकार झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने ग्रेज़ों को ललकारते हुए अपने देशभक्त सैनिकों का उत्साहवर्धन किया था, ऐसा ही कुछ भाव इस गीत में भी है।

संगीतकार चित्रगुप्त ने प्रस्तुत गीत में एक अनोखा प्रयोग किया है। गीत के सुरों में राग कोमल ऋषभ आसावरी की छाया है, पर जो ताल है, वह पश्चिमी वाल्ट्ज़ रिदम की शैली का है। यानी कि सुरों में भारतीय शास्त्रीय संगीत की छाया और ताल में पाश्चात्य रिदम। वैसे वाल्ट्ज़ रिदम का प्रयोग चित्रगुप्त ने कई बार किया है। 1952 की फ़िल्म ’Sindbad The Sailor' में मोहम्मद रफ़ी और शमशाद बेगम का गाया गीत "अदा से झूमते हुए, दिलों को चूमते हुए" और 1968 की फ़िल्म ’वासना’ के प्रसिद्ध गीत "ये पर्बतों के दाएरे, ये शाम का धुआं" में वाल्टज़ का सुन्दर प्रयोग उन्होंने किया था। फ़िल्म ’ऊँचे लोग’ के मशहूर गीत "जाग दिल-ए-दीवाना, रुत जागी वस्ल-ए-यार की" में भी वायलिन पर वाल्ट्ज़ क़िस्म का रिदम उन्होंने डाला था। 1962 की फ़िल्म ’बेज़ुबान’ के "दीवाने तुम दीवाने हम" में तबला और वाल्ट्ज़ का बारी-बारी से कमाल का प्रयोग चित्रगुप्त ने किया। 1959 की फ़िल्म ’डाका’ में रफ़ी साहब और गीता दत्त के गाये हास्य गीत "दिल फाँसे, दे के झाँसे" में भी वाल्ट्ज़ का अद्भुत प्रयोग सुनने को मिलता है। चर्चा कोमल ऋषभ आसावरी राग की करने से पहले आइए फ़िल्म ’काबली ख़ान’ के इस सुन्दर देशभक्ति गीत को सुन लिया जाए।
 



गीत : “चलो झूमते सर से बांधे कफ़न...” , फ़िल्म : काबली ख़ान, गायक: लता मंगेशकर, साथी 


आसावरी थाट का जनक अथवा आश्रय राग आसावरी ही कहलाता है। राग आसावरी के आरोह में पाँच स्वर और अवरोह में सात स्वरों का उपयोग किया जाता है। अर्थात यह औडव-सम्पूर्ण जाति का राग है। इस राग के आरोह में सा, रे, म, प, ध(कोमल), सां तथा अवरोह में; सां,नि(कोमल),ध(कोमल),म, प, ध(कोमल), म, प, ग(कोमल), रे, सा, स्वरों का प्रयोग किया जाता है। जब कोई संगीतज्ञ इस राग में शुद्ध ऋषभ के स्थान पर कोमल ऋषभ प्रयोग करते हैं तो इसे राग कोमल ऋषभ आसावरी कहा जाता है। कोमल ऋषभ आसावरी के आरोह में ग और नि वर्जित होता है, और आरोह और अवरोह में केवल कोमल रे का प्रयोग किया जाता है। मुख्य स्वरों को गाते समय हम जिन अन्य स्वरों को छूते हुए गुज़रते हैं, या जिनको बहुत हल्के से छू कर आगे बढ़ जाते हैं, यानी जब हम आगे अथवा पीछे के स्वर को स्पर्श मात्र करें तो स्पर्श किए गए स्वर को कण स्वर कहते हैं। कोमल ऋषभ आसावरी में कण-स्वर (स्पर्श स्वर) के रूप में आरोह में ’ध’ का कण ’नि’ से एवं अवरोह में ’ग’ का ’रे’ से और ’रे’ का ’ग’ से होता है। इस राग को गाने का उचित समय दिन का प्रथम प्रहर है। इस राग को शुद्ध रूप में अनुभव करने के लिए हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं पंडित वेंकटेश कुमार का गायन। उनके साथ गायन और तानपुरे पर संगत किया है शिवराज पाटिल और रमेश कोलकुण्डा ने। तबले पर संगति की है भरत कामत ने, और हारमोनियम पर हैं अजय जोगलेकर।



ख़याल : प्रभु मेरो... सकल जगत को...”, राग : कोमल ऋषभ आसावरी, गायक : पंडित वेंकटेश कुमार 



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