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बुधवार, 23 मार्च 2016

होली के रंग रंगा राग काफी


रेडियो प्लेबैक की पूरी टीम अपने पाठकों और श्रोताओं को संप्रेषित कर रही है होली की ढेर सारी मंगल कामनाएँ...रंगों भरे इस त्यौहार में आपके जीवन में भी खुशियों के नए रंग आये यही हमारी प्रार्थना है. हिंदी फिल्मों में राग काफी पर आधारित बहुत से होली गीत बने हैं, आईये आज सुनें हमारे स्तंभकार कृष्णमोहन मिश्रा और आवाज़ की धनी संज्ञा टंडन के साथ इसी राग पर एक चर्चा, जिसमें जाहिर है शामिल है एक गीत होली का भी
 

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

राग काफी गाने-बजाने का परिवेश

  

स्वरगोष्ठी – 156 में आज

फाल्गुन के रंग राग काफी के संग


‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली तीन कड़ियों से हम आपसे बसन्त ऋतु के संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। इसके उपरान्त रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से हो के रस-रंग को अभिव्यक्त करने के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। आज के अंक में हम पहले इस राग में एक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे, जिसे परवीन सुल्ताना ने स्वर दिया है। इसके साथ ही डॉ. कमला शंकर का गिटार पर बजाया राग काफी की ठुमरी भी सुनेगे। आज की तीसरी प्रस्तुति डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा है।  


राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन मास में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

आज की पहली प्रस्तुति राग काफी की ठुमरी है। यह ठुमरी विख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना ने प्रस्तुत किया है। खयाल, ठुमरी और भजन गायन में सिद्ध विदुषी परवीन सुल्ताना का जन्म 14 जुलाई, 1950 असम के नौगांव जिलान्तर्गत डाकापट्टी नामक स्थान पर एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता इकरामुल मजीद और दादा मोहम्मद नजीब खाँ से प्राप्त हुई। बाद में 1973 से कोलकाता के सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से उन्हें संगीत का विधिवत मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। पटियाला घराने के गायक उस्ताद दिलशाद खाँ से भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सीखने का अवसर मिला। आगे चल इन्हीं दिलशाद खाँ से उनका विवाह भी हुआ। परवीन सुल्ताना ने पहली मंच-प्रस्तुति 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में दी थी। 1965 से ही उनके ग्रामोफोन रेकार्ड बनने लगे थे। उन्होने कई फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया है। फिल्म दो बूँद पानी, पाकीजा, कुदरत और गदर के गाये गीत अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे। 1976 में मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाजा गया। 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ में गाये गीत के लिए परवीन जी को श्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1986 में उन्हें तानसेन सम्मान और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। इस वर्ष (2014) उन्हें ‘पद्मभूषण’सम्मान प्राप्त हुआ है। परवीन जी के गायन में उनकी तानें तीनों सप्तकों में फर्राटेदार चलती हैं। आइए इनकी आवाज़ में सुनते हैं राग मिश्र काफी की कृष्ण की छेड़छाड़ से युक्त, श्रृंगार रस प्रधान एक मोहक ठुमरी।


ठुमरी मिश्र काफी : ‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’ : विदुषी परवीन सुल्ताना




अभी आपने राग काफी की ठुमरी का रसास्वादन किया। गायन में स्वर संयोजन के साथ ही गीत के शब्द भी रस उत्पत्ति में सहयोगी होते है। किन्तु वाद्य संगीत में शब्द नहीं होते। राग काफी श्रृंगार रस के परिवेश को रचने में पूर्ण समर्थ है, इसे प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए अब हम आपको राग मिश्र काफी की ठुमरी का वादन सुनवाते हैं, वह भी पाश्चात्य संगीत वाद्य हवाइयन गिटार पर। दरअसल आज का पाश्चात्य हवाइयन गिटार प्राचीन भारतीय तंत्रवाद्य विचित्र वीणा का परिवर्तित रूप है। पिछले कुछ दशकों से कई भारतीय संगीतज्ञों ने गिटार में संशोधन कर उसे भारतीय संगीत के अनुकूल बनाया है। सुपरिचित संगीत विदुषी डॉ. कमला शंकर ने भारतीय संगीत के रागों के अनुकूल गिटार वाद्य में कुछ संशोधन किए हैं। कमला जी का गिटार बिना जोड़ की लकड़ी का बना हुआ है। इसमें स्वर और चिकारी के चार-चार तार तथा तरब के बारह तार लगे हैं। डॉ. कमला शंकर का जन्म 1966 में तमिलनाडु के तंजौर नामक जनपद में हुआ था। संगीत की पहली गुरु स्वयं इनकी माँ थीं। बाद में वाराणसी के पण्डित छन्नूलाल मिश्र से खयाल और ठुमरी की शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध सितारवादक विमलेन्दु मुखर्जी से कमला जी ने तंत्रवाद्य की बारीकियाँ सीखी। कमला जी हैं पहली महिला कलाकार हैं जिन्हें भारतीय संगीत के सन्दर्भ में पीएच डी की उपाधि मिली है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और विचित्र वीणा वादक डॉ. गोपाल शंकर मिश्र के निर्देशन में उन्होने अपना शोधकार्य किया। गिटार वादन के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ की आज की कड़ी में हम उनका गिटार पर बजाया राग मिश्र काफी की ठुमरी प्रस्तुत कर रहे हैं।


ठुमरी मिश्र काफी : गिटार वादन : डॉ. कमला शंकर




भारतीय उपशास्त्रीय संगीत की एक शैली है, टप्पा। अब हम आपको राग काफी का एक टप्पा सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, पूरब अंग की सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. सोमा घोष। बनारस (वाराणसी) में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुम्बई में रह रही सोमा एक समय के महान फिल्मकार नवेन्दु घोष की पुत्रवधू है। संगीत की दुनिया में भी सोमा प्राचीन वाद्यों को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए संघर्षरत है। उन्हें आज जो प्रतिष्ठा मिली है, उसके लिए वह डॉ. राजेश्वर आचार्य से मिली प्रेरणा को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है, जिन्होने सोमा जी को नौकरी न करने का सुझाव दिया था। विश्वविख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने सोमा जी की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपनी दत्तक पुत्री बना लिया था। वर्ष 2001 के एक सांगीतिक आयोजन में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने सोमा जी का गायन सुना और बड़े प्रभावित हुए। तभी उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ जुगलबन्दी करोगी। सोमा जी को बतौर बेटी अपनाने के पहले उन्होंने अपने पूरे परिवार को बताया और सबकी अनुमति ली। इसके बाद ही उन्होंने इसकी घोषणा की। खाँ साहब ने सोमा जी को अपनी कला विरासत का उत्तराधिकारी भी बनाया था। सोमा जी ने संगीत की शिक्षा सेनिया घराने के पण्डित नारायण चक्रवर्ती और बनारस घराने की विदुषी बागेश्वरी देवी जी से ली। वर्ष 2002 में मुंबई के एक समारोह में सोमा जी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की ऐतिहासिक जुगलबन्दी हुई थी। उस आयोजन में अमिताभ बच्चन जी सपत्नीक टिकट लेकर आए थे। नौशाद साहब पहली पंक्ति के श्रोताओं में बैठे थे। सोमा जी ने खयाल गायकी को बिलकुल नई दिशा दी है और ठुमरी, होरी जैसी विधाओं को तो नई पीढ़ी के लिए नए ढंग से लोकप्रिय बनाया है। लीजिए, अब आप डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा सुनिए और स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश की सार्थक अनुभूति कीजिए। इसके साथ ही मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


टप्पा राग काफी : ‘वीरा दे जानियाँ रबी...’ : डॉ. सोमा घोष





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 156वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह संगीत की कौन सी शैली है? इस संगीत शैली का नाम बताइए।

2 – इस प्रस्तुति-अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और उनका नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 158वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 154वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित लालमणि मिश्र द्वारा प्रस्तुत तंत्रवाद्य पर एक रचना का अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- विचित्र वीणा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त बहार। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा जारी है। अगले अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 
 

बुधवार, 17 जुलाई 2013

राग मेघ मल्हार की फुहार में भीगे फ़िल्मी गीत

राग मेघ मल्हार पर आधारित फ़िल्मी गीत 
स्क्रिप्ट : कृष्णमोहन मिश्र 
स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टंडन 



बुधवार, 10 जुलाई 2013

राग किरवाणी पर आधारित बेहद सुरीले फ़िल्मी गीत

राग किरवाणी पर आधारित फ़िल्मी गीत 
स्क्रिप्ट : कृष्णमोहन मिश्र 
स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टंडन

बुधवार, 5 जून 2013

बुधवार, 29 मई 2013

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

बुधवार, 13 मार्च 2013

बुधवार, 27 फ़रवरी 2013

राग बहार- एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट 

राग बसंत बहार 


स्वर एवं प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 


स्क्रिप्ट - कृष्णमोहन मिश्र 




शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

सिने-पहेली में आज : ऋतु के अनुकूल गीतों को पहचानिए



प्रसारण तिथि – फरवरी 23, 2013
सिने-पहेली – 60 में आज 

ऋतु के अनुकूल गीतों को पहचानिए और सुलझाइये पहेलियाँ


'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों और श्रोताओं को आज कृष्णमोहन मिश्र का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, सुजॉय चटर्जी की व्यस्तता के कारण सिने-पहेली का यह अंक प्रस्तुत करने का दायित्व मुझ पर आ गया है। इन दिनों शीत ऋतु अपनी प्रभुता को समेटने लगा है और ग्रीष्म ऋतु आगमन की आहट देने लगा है। ऋतु परिवर्तन का यह काल बहुत सुहाना होता है। इसे ही बसन्त ॠतु कहा जाता है। इसी ऋतु को ऋतुराज के विशेषण से अलंकृत भी किया जाता है। आजकल परिवेश में मन्द-मन्द बयार, चारों ओर फूलों की छटा, पंछियों का कलरव व्याप्त है। आज की 'सिने-पहेली' को हमने ऐसे ही परिवेश को चित्रित करते कुछ गीतों से सुवासित करने का प्रयास किया है।

आज की पहेली : ऋतु प्रधान गीतों को पहचानिए

आज की पहेली में हम आपको निम्नलिखित दस फिल्मी गीतों के अंश सुनवाते हैं। प्रत्येक गीतांश के साथ क्रमशः गीत से सम्बन्धित प्रश्न पूछे गए हैं। आपको क्रमानुसार इन प्रश्नों के उत्तर देने हैं। आइए शुरू करते हैं गीतांश और उनसे सम्बन्धित प्रश्नों का सिलसिला।

प्रश्न 1- इस गीतांश को सुनिए और गीत को पहचान कर बताइए कि यह गीत किस अभिनेता / अभिनेत्री पर फिल्माया गया है?




प्रश्न 2- इसे सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस फिल्म से लिया गया है?




प्रश्न 3- इस गीत के अन्तराल संगीत (इंटरल्यूड) सुन कर गीत पहचानिए और गीतकार का नाम बताइए।




प्रश्न 4- इस गीत के संगीतकार को पहचानिए और उनका नाम बताइए।





प्रश्न 5- गीत का जितना हिस्सा आपको सुनवाया जा रहा है, केवल उतना हिस्सा किस राग पर आधारित है?





प्रश्न 6- इस आरम्भिक संगीत को सुन कर गीत पहचानिए और पूरे गीत में जिन दो तालों का प्रयोग हुआ है, उनके नाम लिखिए।





प्रश्न 7- यह एक फिल्मी गीत का आरम्भिक संगीत है। इसे सुन कर आपको फिल्म का नाम बूझना है।




प्रश्न 8- यह एक श्वेत-श्याम फिल्म के गीत का आरम्भिक संगीत अंश है, इसे सुन कर गीत का अनुमान लगाइए और संगीतकार का नाम बताइए।




प्रश्न 9- यह भी श्वेत-श्याम युग की एक फिल्म के बेहद लोकप्रिय गीत का अंश है, इसे सुन का आपको इस गीत के गायक कलाकारों के नाम बताने हैं।




प्रश्न 10- गीत के अंश को सुन कर आपने गायक कलाकार को तो पहचान लिया होगा। परन्तु हम आपसे गायक का नहीं बल्कि गीतकार का नाम पूछ रहे है। क्या आप वह नाम बताएँगे?




यदि आप इन पहेलियों को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाऊनलोड कर लें:
जवाब भेजने का तरीका

उपर पूछे गए सवालों के क्रमानुसार जवाब एक ही ई-मेल में टाइप करके cine.paheli@yahoo.com के पते पर भेजें। 'टिप्पणी' में जवाब कतई न लिखें, वो मान्य नहीं होंगे। ईमेल के सब्जेक्ट लाइन में "Cine Paheli # 60" अवश्य लिखें, और अंत में अपना नाम व स्थान लिखें। आपका ईमेल हमें बृहस्पतिवार 28 फ़रवरी शाम 5 बजे तक अवश्य मिल जाने चाहिए। इसके बाद प्राप्त होने वाली प्रविष्टियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

पिछली पहेली का हल



चित्र में दिये गए दस फूलों के नाम इस प्रकार है :-

गुलाब, रजनीगंधा, केतकी, बनफूल, कमल, गेंदा, जूही, चम्‍पा, सूरजमुखी, चमेली


गीत 1. आ लग जा गले दिलरुबा.....कहां रूठ के चली ओ गुलाब की कलि, तेरे कदमो मे दिल है मेरा......( फिल्‍म - दस लाख)  (शाब्दिक उल्लेख - गुलाब)

गीत 2. रजनीगंधा फूल तुम्‍हारे, महके यूं ही जीवन में......( फिल्‍म - रजनीगंधा )  (शाब्दिक उल्लेख - रजनीगंधा)

गीत 3. केतकी गुलाब जूही, चंपक बनफूले .....( फिल्‍म - बसन्‍त बहार)  (शाब्दिक उल्लेख - केतकी)

गीत 4. मैं जहां चला जाऊँ, बहार चली आऐ......महक जाए राहों की धूल, मैं बनफूल, बन का फूल ( फिल्‍म - बनफूल )  (शाब्दिक उल्लेख - बनफूल)

गीत 5. कमल के फूल जैसा, बदन तेरा चिकना चिकना.....( फिल्‍म - दो आंखें ) (शाब्दिक उल्लेख - कमल)

गीत 6. सैंया छेड देवे, ननद चुटकी लेवे, ससुराल गेंदा फूल......( फिल्‍म - दिल्‍ली-6)   (शाब्दिक उल्लेख - गेंदा)

गीत 7. जूही की कली मेरी लाडली, नाजों की पली मेरी लाडली......( फिल्‍म - दिल एक मंदिर)   (शाब्दिक उल्लेख - जूही)

गीत 8. चम्‍पा खिली डार, पलक झूले प्‍यार, मिलन ऋतु आई सजनियां.....( फिल्‍म - फैसला )  (शाब्दिक उल्लेख - चम्‍पा)
गीत 9. सूरजमुखी मुखडा तेरा, चमका दे तूं जीवन मेरा......( फिल्‍म - कलाकार )  (शाब्दिक उल्लेख - सूरजमुखी)

गीत 10. लेई लो चम्‍पा, चमेली, गुलाब लेई लो......( फिल्‍म - सोने के हाथ )  (शाब्दिक उल्लेख - चमेली)


पिछली पहेली का परिणाम

इस बार 'सिने पहेली' में कुल 6 प्रतियोगियों ने भाग लिया। सबसे पहले १००% सही जवाब भेज कर इस सप्ताह सरताज प्रतियोगी बने हैं बीकानेर के श्री विजय कुमार व्यास। बहुत बहुत बधाई आपको। आइए अब नज़र डालते हैं इस सेगमेण्ट के अब तक के सम्मिलित स्कोरकार्ड पर।




नये प्रतियोगियों का आह्वान 
नये प्रतियोगी, जो इस मज़ेदार खेल से जुड़ना चाहते हैं, उनके लिए हम यह बता दें कि अभी भी देर नहीं हुई है। इस प्रतियोगिता के नियम कुछ ऐसे हैं कि किसी भी समय जुड़ने वाले प्रतियोगी के लिए भी पूरा-पूरा मौका है महाविजेता बनने का। अगले सप्ताह से नया सेगमेण्ट शुरू हो रहा है, इसलिए नये खिलाड़ियों का आज हम एक बार फिर आह्वान करते हैं। अपने मित्रों, दफ़्तर के साथी, और रिश्तेदारों को 'सिने पहेली' के बारे में बताएँ और इसमें भाग लेने का परामर्श दें। नियमित रूप से इस प्रतियोगिता में भाग लेकर महाविजेता बनने पर आपके नाम हो सकता है 5000 रुपये का नगद इनाम।


कैसे बना जाए 'सिने पहेली महाविजेता’
1. सिने पहेली प्रतियोगिता में होंगे कुल 100 एपिसोड्स। इन 100 एपिसोड्स को 10 सेगमेण्ट्स में बाँटा गया है। अर्थात्, हर सेगमेण्ट में होंगे 10 एपिसोड्स।


2. प्रत्येक सेगमेण्ट में प्रत्येक खिलाड़ी के 10 एपिसोड्स के अंक जुड़े जायेंगे, और सर्वाधिक अंक पाने वाले तीन खिलाड़ियों को सेगमेण्ट विजेताओं के रूप में चुन लिया जाएगा।


3. इन तीन विजेताओं के नाम दर्ज हो जायेंगे 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में। सेगमेण्ट में प्रथम स्थान पाने वाले को 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में 3 अंक, द्वितीय स्थान पाने वाले को 2 अंक, और तृतीय स्थान पाने वाले को 1 अंक दिया जायेगा। पाँचवें सेगमेण्ट की समाप्ति तक 'महाविजेता स्कोरकार्ड' यह रहा...




4. 10 सेगमेण्ट पूरे होने पर 'महाविजेता स्कोरकार्ड' में दर्ज खिलाड़ियों में सर्वोच्च पाँच खिलाड़ियों में होगा एक ही एपिसोड का एक महा-मुकाबला, यानी 'सिने पहेली' का फ़ाइनल मैच। इसमें पूछे जायेंगे कुछ बेहद मुश्किल सवाल, और इसी फ़ाइनल मैच के आधार पर घोषित होगा 'सिने पहेली महाविजेता' का नाम। महाविजेता को पुरस्कार स्वरूप नकद 5000 रुपये दिए जायेंगे, तथा द्वितीय व तृतीय स्थान पाने वालों को दिए जायेंगे सांत्वना पुरस्कार।

'सिने पहेली' को और भी ज़्यादा मज़ेदार बनाने के लिए अगर आपके पास भी कोई सुझाव है तो 'सिने पहेली' के ईमेल आइडी पर अवश्य लिखें। आप सब भाग लेते रहिए, इस प्रतियोगिता का आनन्द लेते रहिए, क्योंकि महाविजेता बनने की लड़ाई अभी बहुत लम्बी है। आज के एपिसोड से जुड़ने वाले प्रतियोगियों के लिए भी 100% सम्भावना है महाविजेता बनने का। इसलिए मन लगाकर और नियमित रूप से (बिना किसी एपिसोड को मिस किए) सुलझाते रहिए हमारी सिने-पहेली, करते रहिए यह सिने मंथन, आज के लिए मुझे अनुमति दीजिए, अगले सप्ताह फिर मुलाक़ात होगी, नमस्कार।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

राग बसंत बहार - एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट 

राग बसंत और बसंत बहार 

स्वर एवं प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 

स्क्रिप्ट - कृष्णमोहन मिश्र 



गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

राग चारुकेशी - एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट 

राग चारुकेशी 

स्वर एवं प्रस्तुति : संज्ञा टंडन 

स्क्रिप्ट - कृष्णमोहन मिश्र  


बुधवार, 23 जनवरी 2013

राग छायानट - एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट 

राग छायानट 
एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ


स्क्रिप्ट - कृष्णमोहन मिश्र
स्वर एवं संयोजन - संज्ञा टंडन 

रविवार, 9 दिसंबर 2012

'स्वरगोष्ठी' में ठुमरी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’



स्वरगोष्ठी-९९ में आज
फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – १०

विरहिणी नायिका की व्यथा : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’



‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित आपका यह प्रिय स्तम्भ दो सप्ताह बाद दो वर्ष पूरे करने जा रहा है। आगामी २३ और ३० दिसम्बर को हम आपके लिए दो विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। वर्ष के अन्तिम रविवार के अंक में हम इस वर्ष की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे। आपके लिए कुछ और सूचनाएँ है, जिन्हें हम समय-समय पर आपको देते रहेंगे। आइए, अब आरम्भ करते हैं, आज का अंक। आपको स्मरण ही होगा कि इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं राग भैरवी अथवा सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा। 


‘स्वरगोष्ठी’ के ९९वें अंक में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का एक बार पुनः हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, शास्त्रीय, उप-शास्त्रीय और लोक संगीत पर केन्द्रित आपका यह प्रिय स्तम्भ दो सप्ताह बाद दो वर्ष पूरे करने जा रहा है। आगामी २३ और ३० दिसम्बर को हम आपके लिए दो विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। वर्ष के अन्तिम रविवार के अंक में हम इस वर्ष की पहेली के विजेताओं के नामों की घोषणा भी करेंगे। आपके लिए कुछ और सूचनाएँ है, जिन्हें हम समय-समय पर आपको देते रहेंगे। आइए, अब आरम्भ करते हैं, आज का अंक। आपको स्मरण ही होगा कि इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ जारी है। इस श्रृंखला की दसवीं कड़ी में आज हम आपके लिए लेकर आए हैं राग भैरवी अथवा सिन्धु भैरवी की विख्यात ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के विविध प्रयोगों पर एक चर्चा।

हमारी आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली, इसे उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों के योगदान से। उन्होने इस ठुमरी को अपना स्वर देकर कालजयी बना दिया। उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ का जन्म १९०२ में पराधीन भारत के पंजाब के कसूर में हुआ था जो अब पाक़िस्तान में है। उनके पिता अली बक्श ख़ान तत्कालीन पश्चिम पंजाब प्रान्त के एक संगीत परिवार से सम्बन्धित थे और ख़ुद भी एक जाने-माने गायक थे। बड़े ग़ुलाम अली जब ७ वर्ष के थे, तभी उन्होंने अपने चाचा काले खाँ से सारंगी वादन और गायन सीखना शुरु किया। काले ख़ाँ साहब के निधन के बाद बड़े ग़ुलाम अली अपने पिता से संगीत सीखते रहे। बड़े ग़ुलाम अली ने अपनी स्वर-यात्रा का आरम्भ सारंगी वादक के रूप में किया और कलकत्ता में आयोजित उनकी पहली संगीत-सभा में उन्हें लोकप्रियता मिली। ली। बाद में उन्होने अपनी गायन प्रतिभा से भी संगीत-प्रेमियों को प्रभावित किया। उनके गले की मिठास, गायकी का अंदाज़, हरकतें, सबकुछ मिलाकर उन्हें शीर्ष स्थान पर बिठा दिया। आइए, आज सबसे पहले उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में सुनते हैं आज की ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’। 


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ

 

श्रृंगार रस के विरह भाव को उकेरने में पूर्ण समर्थ इस ठुमरी को सुविख्यात गायिका पद्मा तलवलकर ने भी गाया है। २८ फरवरी, १९४८ को मुम्बई में जन्मीं पद्मा जी की संगीत-शिक्षा जयपुर, अतरौली घराने की प्राप्त हुई है, किन्तु उनके गायन में ग्वालियर और किराना गायकी की विशेषताएँ भी परिलक्षित होती हैं। उनका विवाह जाने-माने तबला-वादक पण्डित सुरेश तलवलकर से हुआ। इस संगीतज्ञ दम्पति की सन्तानें- पुत्र सत्यजीत और पुत्री सावनी, दोनों ही तबला-वादन में कुशल हैं। संगीत-शिक्षा के दौरान पद्मा जी को ‘भूलाभाई मेमोरियल ट्रस्ट’ की ओर से पाँच वर्ष तक छात्रवृत्ति प्राप्त हुई थी। बाद में उन्हें ‘नेशनल सेण्टर फॉर पर्फ़ोर्मिंग आर्ट्स’ द्वारा दो वर्ष के लिए फ़ेलोशिप भी मिली थी। उन्हें वर्ष २००४ में पण्डित जसराज गौरव पुरस्कार, २००९ में श्रीमती वत्सलाबाई भीमसेन जोशी पुरस्कार तथा २०१० में राजहंस प्रतिष्ठान पुरस्कार से अलंकृत किया गया। इन्हीं प्रतिभावान गायिका के स्वरों में अब आप भैरवी की इस ठुमरी का आनन्द लीजिए-


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : विदुषी पद्मा तलवलकर




आज हमारी चर्चा में जो ठुमरी है, उसे अनेक गायक-गायिकाओं ने अलग-अलग ढंग से गाया है। वर्तमान में भारतीय संगीत की हर शैली पर समान रूप से अधिकार रखने वाले संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती ने भी अनेक अवसरों पर इस ठुमरी को प्रस्तुत किया है। उनके स्वरों में ढल कर इस ठुमरी का एक अलग रंग निखरता है। आज के अंक में हम उनकी आवाज़ में भी यह ठुमरी सुनवा रहे हैं। अजय जी को पटियाला, कसूर घराने की संगीत-शिक्षा उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के सुपुत्र उस्ताद मुनव्वर अली खाँ से प्राप्त हुई है। इससे पूर्व अजय जी की प्रारम्भिक शिक्षा उनके पिता पं. अजीत चक्रवर्ती से, बाद में कालीदास वैरागी और पं. ज्ञानप्रकाश घोष से प्राप्त हुई। पण्डित अजय चक्रवर्ती पहले ऐसे संगीत-साधक हैं, जिन्हें पाकिस्तान आमंत्रित किया गया और उन्हें राष्ट्रपति सम्मान से नवाजा गया था। एक संगीत-सभा में इस ठुमरी की प्रस्तुति के दौरान पण्डित अजय चक्रवर्ती ने वर्तमान गजल गायकी, राग भैरवी के विभिन्न रूप तथा पटियाला घराने की गायकी के बारे में कुछ चर्चा की है। संगीत के विद्यार्थियों के लिए यह प्रस्तुति लाभकारी होगी। आइए, सुनते है, पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में भैरवी की यही ठुमरी। 


ठुमरी भैरवी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : पण्डित अजय चक्रवर्ती



वर्ष १९७७ वासु चटर्जी की फिल्म ‘स्वामी’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म के संगीतकार राजेश रोशन थे। उन्होने फिल्म के एक प्रसंग में भैरवी की इस पारम्परिक ठुमरी का उपयोग किया था। परन्तु ठुमरी के इस फिल्मी स्वरूप में भैरवी के अलावा बीच-बीच में कुछ अन्य रागों- जोगिया, पीलू आदि की अनुभूति भी होती है। सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक येसुदास ने इस ठुमरी को बड़े नर्म और भावपूर्ण अंदाज में गाया है। राजेश रोशन के पिता, संगीतकार रोशन ने अपने समय की फिल्मों में पारम्परिक खयाल, ठुमरी आदि का भरपूर उपयोग किया था। फिल्म ‘स्वामी’ में इस ठुमरी को शामिल करने की प्रेरणा राजेश को सम्भवतः अपने पिता से मिली हो। ठुमरी- ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ के इस फिल्मी रूप का आनन्द आप भी लीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

फिल्म – स्वामी : ‘का करूँ सजनी आए न बालम...’ : येसुदास



आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ पर आज की संगीत पहेली में एक बार फिर हम आपको एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली के सौवें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही वर्ष २०१२ की पाँचों श्रृंखलाओं में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रथम तीन विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से पुरस्कृत भी किया जाएगा।



१ - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?
२ – इस पारम्परिक ठुमरी को आठवें दशक की एक फिल्म में भी शामिल किया गया था। उस फिल्म के संगीतकार कौन थे?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के १०१वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता 


 
‘स्वरगोष्ठी’ के ९७वें अंक में हमने आपको सुप्रसिद्ध गायिका इकबाल बानो के स्वर में ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग पीलू और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग देस। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से बधाई।

झरोखा अगले अंक का



 मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के आगामी अंक सौवाँ अंक होगा और यह हमारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ का समापन अंक भी होगा। इस अंक में हम आपके लिए श्रृंगार रस की अत्यन्त मोहक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे। जनवरी, २०१३ से हम आपके सुझावों और फरमाइशों के आधार पर आपके प्रिय कार्यक्रमों में बदलाव कर रहे हैं। आप अपने सुझाव १५ दिसम्बर तक अवश्य भेज दें। अगले अंक में रविवार को प्रातः ९-३० बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल-26


भूली-बिसरी यादें 


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष श्रृंखला, ‘स्मृतियों के झरोखे से’ के एक नये अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आपके बीच उपस्थित हूँ और आपका हार्दिक स्वागत करता हूँ। आज मास का पहला गुरुवार है और इस दिन हम आपके लिए मूक और सवाक फिल्मों की कुछ रोचक दास्तान लेकर आते हैं। आज के अंक में हम आपसे 1918 में बनी कुछ मूक फिल्मों तथा सवाक फिल्मों के अन्तर्गत 1943 में बनी फिल्म 'हमारी बात' पर चर्चा करेंगे। 

यादें मूक फिल्मों की : चार भागों में बनी फिल्म ‘श्रीराम वनवास’ 

फिल्म 'श्रीकृष्ण जन्म' का दृश्य
स श्रृंखला के पिछले अंक में हम आपसे मूक फिल्मों से जुड़े 1970 तक के कुछ प्रमुख प्रसंगों का जिक्र कर चुके हैं। आज हम उससे आगे के कुछ प्रसंगों पर चर्चा करेंगे। 1917 में जहाँ पाँच मूक फिल्मों का निर्माण और प्रदर्शन हुआ था वहीं 1918 में आठ फिल्में प्रदर्शित की गई। इन आठ फिल्मों में से ‘दाता कर्ण’, ‘प्रोफेसर राममूर्ति ऑन स्क्रीन’ और ‘नल दमयन्ती’ का निर्माण तत्कालीन कलकत्ता में हुआ था। इनमें फिल्म ‘नल दमयन्ती’ एक बेहद सफल फिल्म सिद्ध हुई। इसका निर्माण मादन थियेटर कम्पनी ने किया था। फिल्म में पेसेन्स कूपर, के. अदजानिया, ई.डी. लिगुओरो, डी. सरकार, अल्वर्टिना आदि ने अभिनय किया था। तत्कालीन बम्बई की पाटनकर कम्पनी ने इस वर्ष एक अनूठा ‘श्रीराम वनवास’ कथानक पर धारावाहिक रूप से चार भागों में क्रमशः फिल्म का निर्माण किया और क्रमशः उनका प्रदर्शन किया। आज एक ही कथानक या चरित्र पर एक से अधिक फिल्मों का निर्माण प्रचलन में है। इसकी बुनियाद 1918 की इस फिल्म ने ही स्थापित की थी। इस वर्ष पाटनकर की एक और फिल्म आई- ‘किंग श्रीयाल उर्फ कटोरा भर खून’। दादा फालके ने भी इस वर्ष ‘श्रीकृष्ण जन्म’ नामक फिल्म का निर्माण किया था। नासिक में बनी इस फिल्म में मन्दाकिनी, नीलकण्ठ, डी.डी. दबके, पुरुषोत्तम वैद्य भागीरथी बाई आदि ने अभिनय किया था। बम्बई में भी ‘श्रीकृष्ण भगवान’ शीर्षक से एक और फिल्म का निर्माण भी हुआ था।

इसी वर्ष अर्थात 1918 में तत्कालीन सरकार ने ‘इण्डियन सिनेमेट्रोग्राफ ऐक्ट 1918’ पारित किया। यह ऐक्ट देश में निर्मित फिल्मों को लाइसेन्स देने और निर्माण के बाद सेंसर करने के लिए बनाया गया था।

सवाक युग के धरोहर : फिल्म ‘हमारी बात’ से शुरू हुआ गीतकार नरेन्द्र शर्मा का फिल्मी सफर

फिल्म 'हमारी बात'
वाक फिल्मों के धरोहर के अन्तर्गत आज हम आपसे चर्चा करेंगे 1943 के फ़िल्म-संगीत की, अनिल बिस्वास की, पण्डित नरेन्द्र शर्मा की, पारुल घोष की और ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की। इस कम्पनी की दो फ़िल्में इस वर्ष प्रदर्शित हुईं – ‘हमारी बात’ और ‘क़िस्मत’। अब तक ‘नेशनल स्टूडिओज़’ से अनुबन्धित होने के कारण अनिल बिस्वास का ‘बॉम्बे टॉकीज़’ में संगीत देने के बावजूद नाम सामने नहीं आ पा रहा था। पर ‘हमारी बात’ से औपचारिक रूप से बिस्वास ‘बॉम्बे टॉकीज़’ के संगीतकार बन गए, और इन दोनों ही फ़िल्मों में उन्होंने ऐसा संगीत दिया कि ये इस कम्पनी की सबसे कामयाब फ़िल्में सिद्ध हुईं। देविका रानी और जयराज अभिनीत ‘हमारी बात’ में देविका रानी बतौर अभिनेत्री अन्तिम बार पर्दे पर नज़र आईं। पारुल घोष का गाया ‘मैं उनकी बन जाऊँ रे, पल पल पन्थ निहारूँ, नैनन दीप जलाऊँ...’ फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत था। पारुल घोष को इस गीत ने एक सशक्त पार्श्वगायिका के रूप में स्थापित कर दिया। उनके गाये फ़िल्म के अन्य एकल गीतों में ‘वह दिल में घर किए थे, और दिल ने भी न जाना...’, ‘सूखी बगिया हुई हरी, घनश्याम बदरिया छाई रे...’ और ‘ऐ बादे सबा, इठलाती न आ, मेरा गुंचाए दिल तो सूख गया...’ शामिल थे। अपने बड़े भाई और फ़िल्म के संगीतकार अनिल बिस्वास के साथ भी पारुल ने एक गीत गाया था ‘इंसान क्या जो ठोकरें नसीब की न खा सके...’। सुरैया, जिन्होंने फ़िल्म में अभिनय किया, अरूण कुमार के साथ कुछ गीत भी गाये, जैसे कि ‘जीवन-जमुना पार, मिलेंगे जीवन-जमुना पार...’, ‘साकी की निगाहें शराब हैं, मेरे दिल में मुहब्बत के ख़्वाब हैं...’, ‘करवटें बदल रहा है आज सब जहान...’ और ‘बिस्तर बिछा दिया है तेरे दर के सामने...’। इस
अनिल बिस्वास
अन्तिम गीत के गीतकार थे वली साहब, जबकि फ़िल्म के अन्य सभी गीत लिखे नवोदित गीतकार नरेन्द्र शर्मा ने। पण्डित शर्मा की यह पहली फ़िल्म थी। उनकी पुत्री लावण्या शाह इण्टरनेट पर सक्रिय हैं और अपने पिता से सम्बन्धित कई लेख अपने ब्लॉगों पर पोस्ट करती रहती हैं जिनसे पण्डित शर्मा के व्यक्तित्व और उपलब्धियों के बारे में विस्तारपूर्वक जाना जा सकता है। पण्डित शर्मा एक गीतकार होने के अलावा एक दार्शनिक, भाषाविद और आयुर्देव के ज्ञाता भी थे। सही मायने में वो एक ‘पण्डित’ की हैसियत रखते थे।
लावण्या जी से हुई मेरी (सुजॉय चटर्जी) बातचीत के दौरान उन्होने बताया था कि 'चित्रलेखा' के मशहूर उपन्यासकार भगवतीचरण वर्मा, नरेन्द्र शर्मा को अपने संग बम्बई ले आये थे। कारण था, फिल्म निर्माण संस्था ‘बॉम्बे टॉकीज़’ नायिका देविका रानी के पास आ गयी थी, जब उनके पति हिमांशु राय का देहान्त हो गया और देविका रानी को अच्छे गीतकार, पटकथा लेख़क, कलाकार, सभी की जरूरत हुई। भगवती बाबू को, गीतकार नरेन्द्र शर्मा को ‘बॉम्बे टॉकीज़’ में काम करने के लिए ले आने का आदेश हुआ था और नरेन्द्र शर्मा के जीवन की कहानी का अगला अध्याय यहीं से आगे बढ़ा। पण्डित जी का लिखा पहला गीत पारुल घोष की आवाज़ में १९४३ की फ़िल्म 'हमारी बात' का, ‘मैं उनकी बन जाऊँ रे...’ बहुत लोकप्रिय हुआ था। आगे बढ़ने से पहले पण्डित नरेन्द्र शर्मा का पहला गीत अब हम आपको भी सुनवाते हैं-

फिल्म हमारी बात : ‘मैं उनकी बन जाऊँ रे...’ : स्वर पारुल घोष : गीतकार पण्डित नरेन्द्र शर्मा

पारुल घोष
बातचीत के दौरान लावण्या जी ने यह भी बतलाया था कि फिल्म 'हमारी बात' के लिए गीत लिखने के लिए जब पापा को बम्बई बुलाया गया तो उन्होने आते समय ट्रेन में ही फिल्म का पहला गीत 'ऐ बादे सबा, इठलाती न आ...' लिख लिया था। इस गीत में उन्होने हिन्दी और उर्दू के शब्दों को इस इरादे से मिलाया था कि उन दिनों हिन्दी फिल्मों में ऐसा ही चलन था। फिल्म ‘हमारी बात’ में पण्डित नरेन्द्र शर्मा के ट्रेन में लिखे इस गीत को संगीतकार अनिल बिस्वास जी ने स्वरबद्ध किया और गायिका पारुल घोष ने गाया। लीजिए, यह गीत आप भी सुनिए-

फिल्म हमारी बात : 'ऐ बादे सबा, इठलाती न आ...' : स्वर पारुल घोष : गीतकार पण्डित नरेन्द्र शर्मा


पण्डित नरेन्द्र शर्मा 
पण्डित नरेन्द्र शर्मा का 'बॉम्बे टॉकीज़' के साथ जुड़ना मात्र संयोग नहीं था। दरअसल उस समय गीतकार प्रदीप ‘बॉम्बे टॉकीज़’ से सम्बद्ध थे। ‘कंगन’, ‘बन्धन’ और ‘नया संसार’ फिल्मों से उन्होंने बम्बई की फिल्मी दुनिया में चमत्कारिक ख्याति अर्जित कर ली थी, लेकिन इस बीच वह ‘बॉम्बे टॉकीज़’ में काम करने वाले एक गुट के साथ अलग हो गए थे। इस गुट ने ‘फिल्मिस्तान’ नामक एक नई संस्था स्थापित कर ली थी। इन लोगों का कम्पनी से हट जाने के कारण देविका रानी को अधिक चिन्ता नहीं थी, किन्तु, अभिनेता अशोक कुमार और गीतकार प्रदीप जी के हट जाने से वह बहुत चिन्तित थीं। कम्पनी के तत्कालीन डायरेक्टर श्री धरम्सी ने अशोक कुमार की कमी युसूफ ख़ान नामक एक नवयुवक को लाकर पूरी कर दी। यूसुफ का नया नाम, "दिलीप कुमार" रखा गया, (यह नाम भी पण्डित नरेन्द्र शर्मा ने ही सुझाया था)। एक और नाम 'जहाँगीर' भी चुना गया था पर नरेन्द्र जी ने कहा था कि यूसुफ, दिलीप कुमार नाम (ज्योतिष के हिसाब से) बहुत फलेगा और आज सारी दुनिया इस नाम को पहचानती है। किन्तु प्रदीप जी की टक्कर के गीतकार के अभाव से श्रीमती राय बहुत परेशान थीं। इसलिए उन्होंने भगवतीचरण वर्मा से यह आग्रह किया था एक नये अच्छी हिन्दी जानने वाले गीतकार को खोज लाने का। भगवती बाबू ही नरेन्द्र शर्मा को इलाहाबाद से बम्बई लाए थे। इस तरह से पण्डित नरेन्द्र ‘बॉम्बे टॉकीज़’ में शामिल हुए।

‘बॉम्बे टॉकीज़’ की देविका रानी और जयराज अभिनीत फिल्म ‘हमारी बात’ में अभिनेत्री और गायिका सुरैया ने भी अभिनय किया था और अरुण कुमार मुखर्जी के साथ गीत भी गाये थे। इसी फिल्म का एक युगल गीत भी प्रस्तुत है, जिसे पण्डित नरेन्द्र शर्मा ने लिखा और अनिल बिस्वास ने संगीतबद्ध किया था। स्वर, सुरैया और अरुण कुमार के हैं।

फिल्म हमारी बात : 'करवटें बदल रहा है आज सब जहान...' : स्वर सुरैया और अरुण कुमार


इसी गीत के साथ इस अंक को हम यहीं विराम देते हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में आपके लिए हम एक रोचक संस्मरण लेकर उपस्थित होंगे। आप अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें radioplaybackindia@live.com पर भेजें।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 




बुधवार, 28 नवंबर 2012

राग जौनपुरी और बातें बीन की - एक चर्चा संज्ञा टंडन के साथ

प्लेबैक इंडिया ब्रोडकास्ट 21 

नमस्कार दोस्तों, आज के इस साप्ताहिक ब्रोडकास्ट में हम आपके लिए लाये हैं राग जौनपुरी की चर्चा और बातें बीन की. प्रस्तुति है आपकी प्रिय होस्ट संज्ञा टंडन की, स्क्रिप्ट है कृष्णमोहन मिश्र की.



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