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Saturday, August 9, 2014

स्वतंत्रता दिवस के इस सप्ताह में पढ़िये कुछ गीतकारों के संदेश हमारे फ़ौजी जवानों के नाम



स्मृतियों के स्वर - 07

स्वतंत्रता दिवस सप्ताह में विशेष

'उन सरहदों की बात कभी नहीं करता जो दिलों में पैदा हो जाती हैं...'




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों के साक्षात्कार प्रस्तुत किये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ, हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर, जिसमें हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। अगस्त महीने का यह सप्ताह हमारे लिये बहुत मायने रखता है क्योंकि इस सप्ताह में है भारत का स्वतंत्रता दिवस। इसलिए आज के 'स्मृतियों के स्वर' में पढ़िये कुछ सन्देश हमारे फ़िल्मी गीतकारों की ओर से देश के वीर जवानों के नाम जो तैनात हैं सरहदों पर, दूर-दराज़ के इलाकों में।



सूत्र : विविध भारती

कार्य्रक्रम : 'विशेष जयमाला' के अलग-अलग कार्यक्रमों से संकलित




पण्डित नरेन्द्र शर्मा

भारतीय गणतन्त्र के वीर रक्षक, प्रहरी, अपने सैनिकों को सादर नमस्कार! आप के मनोरंजन के लिए 'जयमाला' में गूँथे हुए कुछ गीत-पुष्प आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैं एक कवि, वीर सैनिकों से अपने आप को सम्बोधित कर रहा हूँ, और यह बोध प्राप्त कर रहा हूँ मन ही मन कि हम सब चाहे कवि हों, चाहे श्रमिक हों, चाहे कृषक हों, चाहे मनीषी हों, चाहे शिल्पी हों, हम सब एक हैं, हमारा देश एक है, इस देश का संविधान एक है। और हम सब पर इस बात की ज़िम्मेदारी है कि हम सब की एक निधि है, उसके हम अच्छे प्रतिनिधि बन सके। तो आपसे हम प्रेरणा ग्रहण करते हैं इस निधि के अच्छे प्रतिनिधि बनने के लिए। तो आपको सब से पहले जो गीत सुनवाना चाहता हूँ, उस गीत में इस महान देश की प्रीति की रीति का वर्णन किया गया है।


फिल्म - पूरब और पश्चिम : 'है प्रीत जहाँ की रीत सदा...' : महेन्द्र कपूर : कल्याण जी, आनन्द जी : इन्दीवर 





जाँनिसार अख़्तर (1974)

फ़ौजी भाइयों, आप जो इस मुल्क और क़ौम के बाग़बाँ हैं, जो देश की सरहदों की हिफ़ाज़त और निगरानी करते हैं, हमारी माताओं, बहनों और बेटियों की इस्मत के मुहाफ़िज़ हैं, हमारे लिए दुश्मनों के हमलों का सामना करते हैं, एक कड़ी और आज़माइशी ज़िन्दगी बसर करते हैं, मैं यह चन्द गीत जो आपको सुनाने जा रहा हूँ, इस ग़रज़ से है कि ज़िहानी और रूहानी ख़ुशी से आपके चन्द लम्हे भर सके। ये गीत मुख़्तलिब फ़िल्मों से लिए गये हैं। हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री अपनी कमज़ोरियों के बावजूद बड़ी अहम सड़क है, हम गीतनिगार दूसरों के जज़्बात की तर्जुमानी करते हैं। ये गीत फ़िल्म की ज़रूरत के लिहाज़ से लिखे जाते हैं, फिर भी ये मुख़्तलिब इंसान के जज़्बात का बयान होते हैं। मैं सबसे पहले जो गीत आपको सुना रहा हूँ यह मैंने एक फ़िल्म 'हमारी कहानी' के लिए कहा है, यह देश के मुतालिक है और आपके हमारे हौसलों की नुमाइन्दगी करता है, मौसिक़ी सी. अर्जुन की है। सुनिये यह गीत।



फिल्म - हमारी कहानी : 'देश हमारा एक है...' : मोहम्मद रफी और साथी : सी. अर्जुन : जाँनिसार अख्तर 





प्रेम धवन

मेरे फ़ौजी भाइयों, आप सब को मेरा नमस्कार! आज मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है इस प्रोग्राम में आपके लिए कुछ गीत पेश करते हुए। बहुत दूर से 'विविध भारती' के ज़रिये आप से मुलाक़ात हो रही है। आप लोग कैसी परिस्थितियों में रहते हैं, मैंने पर्सोनली नज़दीकी से देखा है जब हम लोग इंडो-पाक और इंडो-चाइनीज़ वार के समय आपकी सेवा में गये थे। इंडो-पाक वार के समय मैं सुनिल दत्त और नरगिस जी के साथ गया था। जब लदाख की राजधानी लेह पर पहुँचने के लिए हम मिलिटरी हेलिकॉप्टर पर बैठे तो देखा कि पिछले हिस्से में राशन की बोरियाँ और भेड़-बकरियाँ लदी हुई हैं। फिर भेड़-बकरियों को पैराशूट की मदद से उतारा जा रहा था। नरगिस जी के भाई अनवर हुसैन ने कहा कि शायद हमें भी भेड़-बकरियों की तरह पैराशूट में बांधकर उतार देंगे। जब हम लेह पहुँचे तो हमें यह बताया गया कि काफ़ी ऊँचाई पे होने की वजह से ऑक्सीज़न लेवल काफ़ी लो है, इसलिए हम जो भी करे आहिस्ता-आहिस्ता करे नहीं तो सर चकरा जायेगा। जब हमारा प्रोग्राम शुरू हुआ तो शहनाई वादक ने ऐसी तान उपर को लगाई कि तान उपर की उपर ही रह गई। हम लोगों ने ज़्यादातर छोटे-छोटे स्किट्स किए जो इन जवानों को सबसे ज़्यादा पसन्द आये। आइये अब एक गीत सुनते हैं फ़िल्म 'काबुलीवाला' से, "ऐ मेरे प्यारे वतन, तुझपे दिल क़ुर्बान..."।

फिल्म काबुलीवाला : 'ऐ मेरे प्यारे वतन तुझपे दिल कुर्बान...' : मन्ना डे : सलिल चौधरी : प्रेम धवन 





एम. जी. हशमत 

मेरे प्यारे फ़ौजी भाइयों, आप लोग उम्र में शायद मुझसे काफ़ी छोटे होंगे पर आप बहुत बड़ा काम कर रहे हैं, एक अज़ीम काम कर रहे हैं। अपने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करना बड़ा काम नहीं तो फिर क्या है? वैसे देखा जाये तो हर आदमी एक फ़ौजी है। अपनी ज़िन्दगी की लड़ाई लड़ता रहता है आदमी। पर फ़ौजी भाइयों, आपकी लड़ाई को देख कर हम आपके सामने सर झुका कर आपको सलाम करते हैं। मैंने 'फ़ौजी' फ़िल्म में आप लोगों पर एक गीत लिखा था - "फ़ौजी रब का है दूसरा नाम", जो मैं समझता हूँ कि बिल्कुल सच बात है।

फिल्म फौजी : फौजी रब दा ऐ दूजा नाम...' : मोहम्मद रफी, मन्ना डे, मीनू पुरुषोत्तम और साथी : सोनिक - ओमी : एम.जी. हशमत  





गुलशन बावरा

 
फ़ौजी भाइयों, आपको गुल्शन बावरा का नमस्कार कुबूल हो। कहते हैं तलवार का और कलम का सदियों पुराना रिश्ता है। जब जब आप लोग मैदान-ए-जंग से जीत का झंडा लहराते हुए आते हैं, तब मेरे जैसे तुच्छ गीतकार के कलम से भी निकल आता है...




फिल्म उपकार : 'मेरे देश की धरती...' महेन्द्र कपूर और साथी : कल्याण जी, आनन्द जी : गुलशन बावरा 





कैफ़ी आज़मी (1988)


प्यारे फ़ौजी भाइयों, पूरे मुल्क की तरफ़ से मैं आपका शुक्रगुज़ार हूँ। आपका शुक्रिया इसलिए कि हम भारत में कोई भी त्योहार सिर्फ़ इसलिए मना सकते हैं और अपने घरों में सिर्फ़ इसलिए चादर तान के सो सकते हैं कि मुल्क की सरहदों पर आप जागते रहते हैं। हमारी आँखों में आप ही की नींदें हैं। इस ख़ुशी के मौके पर मैंने आप सब के लिए फ़िल्मी गीतों की एक 'जयमाला' गूँथी है, चाहता हूँ कि आप उसे कुबूल करें और हमारी मोहब्बत की निशानी समझ के उसको अपने गलों में डाल लें। मैं और मेरे हमकलम साथी फ़िल्मों के लिए गाने लिखते हैं, वो ऐसे सिपाही हैं जिनके हर हथियार छीन लिए जाते हैं, हाथ बाँध दिये जाते हैं, फिर उनको मैदान में उतारा जाता है। इन जकड़बन्दियों में अगर कभी कोई ऐसा गीत हो जाये जिसमें फेरियाँ भी हो और कोई पैग़ाम भी तो उसको दोहराते हुए किसी नग़मानिगार को शर्म आने की ज़रूरत नहीं। इस 'जयमाला' में पहला गीत मैंने ऐसा ही गूंथा है। बोल मेरे हैं, धुन एस. डी. बर्मन साहब की, और आवाज़ मन्ना डे की है। गीत सुनिये, "न तेल और न बाती, न काबू हवा पर, दीये क्यों जलाये चला जा रहा है..."।


फिल्म एक के बाद एक : 'न तेल और न बाती न काबू हवा पर दिये क्यों जलाए चला जा रहा है...' मन्ना डे : सचिनदेव बर्मन : कैफी आज़मी  





मजरूह सुल्तानपुरी (1985)

भाइयों, वैसे तो हम जानते हैं कि तोप के गोले से खेलना आप के लिए एक मामूली अमल है, आप तो जाँबाज़ वीर सिपाही हैं जिन्हे कोई ग़म छू ही नहीं सकता, लेकिन आप इंसान भी तो हैं, आप के दिल में भी जज्वे हैं, कभी कोई तो वक़्त आया होगा जब आप उदास होते होंगे, दुखी होते होंगे, तो यह उदासी बड़ा वक़्ती हो। मैंने और लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल ने और मरहूम रफ़ी ने मिल के काम की बात बतानी चाही है इस गीत में। अगर ऐसा कोई वक़्त हो तो इसे याद रखियेगा, इसमें काम की बातें हैं।

फिल्म दोस्ती : 'राही मनवा दुख की चिन्ता क्यों सताती है...' : मोहम्मद रफी : लक्ष्मीकान्त, प्यारेलाल : मजरूह सुल्तानपुरी





गुलज़ार

फ़ौजी भाइयों, आदाब! बहुत दिन बाद फिर आप की महफ़िल में शामिल हो रहा हूँ। इससे पहले जब भी आपके पास आया तो कोई ना कोई नई तरकीब लेकर, कोई न कोई नई आग़ाश लेकर गानो की, जिसमें मैंने कई तरह के गाने आप को सुनाये, जैसे रेल की पटरी पर चलते हुए गाने सुनाये थे एक बार, वो तमाम गाने जिनमें रेल की पटरी की आवाज़ भी सुनाई देती है। और एक बार आम आदमी के मसलों पर गाने आपको सुनाये जो लक्ष्मण के कार्टूनों जैसे लगते हैं। लेकिन मज़ाक के पीछे कहीं बहुत गहरे, बहुत संजीदे दर्द भरे हुए हैं इन गानो में। बच्चों के साथ गाये गाने भी आपको सुनाये, खेलते कूदते हुए गाने, लोरियाँ सुनाई आपको, और बहुत से दोस्तों की चिट्ठियाँ जब आयी, चाहनेवालों की चिट्ठियाँ आयी जिनमें शिकायतें भी, गिले भी, शिकवे भी, उनमें एक बात बहुत से दोस्तों ने कही कि हर बार आप कुछ मज़ाक करके, हँस-हँसाकर रेडियो से चले जाते हैं, जितनी बार आप आते हैं, हर बार हम आप से कुछ संजीदा बातें सुनना चाहते हैं, कि संजीदा सिचुएशनों पर आप कैसे लिखते हैं, क्या लिखते हैं, और हाँ, यह किसी ने नहीं कहा कि क्यों लिखते हैं? फ़ौजी भाइयों, आप तो वतन की सरहदों पर बैठे हैं, और मैं आपको बहलाते हुए आपके परिवारों को भी बहलाने की कोशिश करता रहता हूँ। हाँ, उन सरहदों की बात कभी नहीं करता जो दिलों में पैदा हो जाती हैं' कभी जुड़ती हुई, कभी टूटती हुई, कभी बनती हुई, गुम होती हुई सरहदें, या सिर्फ़ हदें। इस तरह के रिश्ते सभी के ज़िन्दगी से गुज़रते हैं, वो ज़िन्दगी जिसे एक सुबह एक मोड़ पर देखा था तो कहा था कि हाथ मिला ऐ ज़िन्दगी, आँख मिला कर बात कर।

फिल्म - हिप हिप हुर्रे : 'एक सुबह एक मोड पर...' : वनराज भाटिया : गुलजार 





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ज़रूरी सूचना:: उपर्युक्त लेख 'विविध भारती' के कार्यक्रम का अंश है। इसके सभी अधिकार 'विविध भारती' के पास सुरक्षित हैं। किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा इस प्रस्तुति का इस्तेमाल व्यावसायिक रूप में करना कॉपीराइट कानून के ख़िलाफ़ होगा, जिसके लिए 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' ज़िम्मेदार नहीं होगा।



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, April 21, 2013

ऋतु आधारित राग हैं इस रागमाला गीत में



स्वरगोष्ठी – 117 में आज

रागों के रंग रागमाला गीत के संग – 4


‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री मन के मीत न आए...’



‘स्वरगोष्ठी’ के एक नये अंक के साथ मैं, कृष्णमोहन मिश्र अपने संगीत-प्रेमी पाठकों-श्रोताओं के बीच एक बार पुनः उपस्थित हूँ। आज के अंक में हम एक बार फिर लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ की अगली कड़ी प्रस्तुत कर रहे हैं। श्रृंखला के पिछले दो अंकों में हमने जो गीत शामिल किये थे, उनमे रागों के क्रम प्रहर के क्रमानुसार थे। परन्तु आज के रागमाला गीत में रागों का क्रम बदलते मौसम के अनुसार है। इस गीत में ग्रीष्म ऋतु का राग गौड़ सारंग, वर्षा ऋतु का राग गौड़ मल्हार, पतझड़ का राग जोगिया और बसन्त ऋतु का राग बहार क्रमशः शामिल किया गया है। रागमाला का यह गीत हमने 1953 प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ से लिया है। फिल्म के संगीतकार हैं, अनिल विश्वास और इसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने गाया है। 



अनिल विश्वास और लता मंगेशकर 
‘रागमाला’ संगीत का वह प्रकार होता है, जिसमे किसी गीत में एक से अधिक रागों का प्रयोग हो और सभी राग स्वतंत्र रूप से रचना में उपस्थित हों। रागमाला गीतों में रागों का संयोजन प्रायः प्रहर के क्रम में, ऋतु के क्रम में अथवा थाट के क्रम में किया जाता है। आज के अंक में प्रस्तुत किया जाने वाला गीत 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘हमदर्द’ से लिया गया है और ऋतु के रागों के क्रम में है। गीत में चार अन्तरे हैं, जिन्हें संगीतकार अनिल विश्वास ने चार अलग-अलग रागों में निबद्ध किया था। इस फिल्म और इसके गीतों के बारे में फिल्म संगीत के प्रख्यात शोधकर्त्ता पंकज राग ने अपनी पुस्तक ‘धुनों की यात्रा’ में लिखा है- “फिल्म ‘हमदर्द’ (1953) तो शास्त्रीय संगीत आधारित कम्पोज़ीशन के लिए हिन्दी फिल्म संगीत के इतिहास में अमर हो चुकी है। स्वयं अनिल विश्वास की ही प्रोडक्शन (निर्मात्री- आशालता विश्वास) के बैनर तले बनी इस फिल्म में ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री...’ (मन्ना डे, लता) एक बेहतरीन रागमाला थी, जिसमें खयाल अंग का प्रयोग था और गौड़ सारंग, गौड़ मल्हार, जोगिया और बहार पर आधारित लाजवाब टुकड़े थे। कम्पोज़ीशन और गायकी के इतने सुन्दर उदाहरण फिल्म संगीत में कम ही मिलते हैं”। संगीतकार अनिल विश्वास ने इस रागमाला गीत के लिए मन्ना डे और लता मंगेशकर को चुना था।

मन्ना डे 
अनिल विश्वास मन्ना डे की प्रतिभा से बहुत अच्छी तरह परिचित थे। उन्होने इस गीत के चारो अन्तरों को चार अलग-अलग रागों में खयाल अंग में संगीतबद्ध किया था। उन दिनों यह चलन था कि पक्के रागों पर आधारित गीतों को गाने के लिए संगीत जगत के सिद्ध गायकों से फिल्मों में गीत गवाया जाता था। परन्तु अनिल विश्वास ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने पुरुष स्वर के लिए मन्ना डे को और नारी स्वर के लिए लता मंगेशकर पर भरोसा किया और फिल्म संगीत जगत का यह कालजयी गीत तैयार हुआ। एक बार अनिल विश्वास ने इस गीत की रचना प्रक्रिया के बारे में अपने एक साक्षात्कार में कहा था- “आजकल गायक कलाकारों के पास रिहर्सल का समय नहीं होता, मगर फिल्म ‘हमदर्द’ के इस गीत को रिकार्ड करने से पहले मन्ना डे और लता ने लगातार 15 दिनों तक इस गीत का रिहर्सल किया था”। एक अन्य साक्षात्कार में मन्ना डे ने बताया था- “इस गीत को रिकार्ड करने में 6-7 घण्टे का समय लगा था। हम सब बुरी तरह थक गए थे, लेकिन रिकार्डिंग के बाद गाना सुन कर अनिल दा खुशी के मारे सचमुच नाचने लगे। उन्हें नाचते देख कर लगा कि वो हमारी मेहनत से सन्तुष्ट थे”

फिल्म 'हमदर्द' के इस गीत के प्रसंग में अभिनेता शेखर एक अन्ध-गायक की भूमिका में हैं, जो नायिका निम्मी को संगीत की शिक्षा दे रहे हैं। गीत के पहले भाग के बोल हैं- ‘ऋतु आए ऋतु जाए सखी री, मन के मीत न आए...’। गीत के इस अन्तरे में ग्रीष्म ऋतु की दोपहरी का परिवेश चित्रित है और ऐसे परिवेश के चित्रण के लिए सर्वाधिक उपयुक्त राग गौड़ सारंग ही है। अनिल विश्वास ने गीत का दूसरा अन्तरा राग गौड़ मल्हार में निबद्ध किया था, जिसके बोल हैं- ‘बरखा ऋतु बैरी हमार...’। प्रचण्ड गर्मी के बाद जब वर्षा की बूँदें भूमि की तपिश को शान्त करने का प्रयत्न करती हैं, तब विरही मन और भी व्याकुल हो जाता है। गीत के इस भाग के शब्द भी परिवेश के अनुकूल रचे गए हैं। सुविधा की दृष्टि गीत के चारो अन्तरों को दो भाग में हमने बाँट दिया है। लीजिए गीत के प्रथम दो अन्तरे सुनिए।


रागमाला गीत : फिल्म हमदर्द : राग गौड़ सारंग और गौड़ मल्हार : मन्ना डे और लता मंगेशकर


गीतकार प्रेम धवन 
फिल्म ‘हमदर्द’ के इस रागमाला गीत के तीसरे अन्तरे में पतझड़ के परिवेश में नायिका के विरह भाव का चित्रण है। इस अन्तरे को संगीतकार अनिल विश्वास ने राग जोगिया में बाँधा है। इस अन्तरे के बोल हैं- 'पी बिन सूना री...'। गीत का चौथा और अन्तिम अन्तरा उल्लासपूर्ण परिवेश का चित्रण करता है। इसे राग बसन्त बहार के स्वर दिये गए हैं, जिसके बोल हैं- ‘आई मधु ऋतु बसन्त बहार रे...’। गीत के चारो अन्तरों को मन्ना डे और लता मंगेशकर ने रागानुकूल स्वरों की शुद्धता बनाए रखते हुए इस अनूठे गीत को भावपूर्ण ढंग से तीनताल में गाया है। गीतकार प्रेम धवन हैं। इस गीत को ऐतिहासिक बनाने में वाद्य संगीत के श्रेष्ठतम कलाकारों का योगदान भी रहा। गीत में सुप्रसिद्ध बाँसुरी वादक पन्नालाल घोष और सारंगी वादक पण्डित रामनारायण ने संगति की थी। रिकार्डिंग पूरी हो जाने के बाद जाने-माने सितार-वादक उस्ताद विलायत खाँ ने टिप्पणी की थी- ‘फिल्म संगीत जगत में आज एक श्रेष्ठतम गीत रिकार्ड हुआ है'। स्वयं मन्ना डे भी इस गीत को अपने श्रेष्ठ गीतों की श्रेणी में शीर्ष पर मानते हैं। आइए हम प्रेम धवन के लिखे, अनिल विश्वास द्वारा संगीतबद्ध किये तथा मन्ना डे व लता मंगेशकर के स्वरों में 'हमदर्द' फिल्म के इस 'रागमाला' गीत का तीसरा और चौथा अन्तरा सुनते हैं-


रागमाला गीत : फिल्म हमदर्द : राग जोगिया और बहार : मन्ना डे और लता मंगेशकर


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 117वीं संगीत पहेली में हम आपको आधी शताब्दी पूर्व के एक फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 120वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

2 – गीत के संगीतकार का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 119वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 115वें अंक में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म 'गोदान' से पार्श्वगायक मुकेश की आवाज़ में पारम्परिक चैती की धुन पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- संगीत शैली चैती और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- संगीतकार पण्डित रविशंकर। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर बैंगलुरु के पंकज मुकेश, जबलपुर की क्षिति तिवारी, लखनऊ के प्रकाश गोविन्द और जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों के रंग रागमाला गीत के संग’ को हम एक बार फिर विराम देंगे और उसके स्थान पर एक विशेष अंक प्रस्तुत करेंगे। दरअसल इस माह एक क्षेत्रीय भाषा की फिल्म अपने प्रदर्शन की आधी शताब्दी पूर्ण कर चुकी है। इस अवसर पर हम अपने एक अतिथि लेखक और युवा फिल्म पत्रकार रविराज पटेल का शोधपरक् आलेख प्रस्तुत करेंगे। आप भी हमारे आगामी अंकों के लिए भारतीय शास्त्रीय, लोक अथवा फिल्म संगीत से जुड़े नये विषयों, रागों और अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी। 

 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र


Sunday, August 21, 2011

ए वतन ए वतन हमको तेरी कसम....प्रेम धवन ने दी बलिदानियों के जज़्बात को जुबाँ

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 726/2011/166



शृंखला ‘वतन के तराने’ की छठी कड़ी में आपका पुनः स्वागत है। इस श्रृंखला के गीतों के माध्यम से हम उन बलिदानियों का पुण्य स्मरण कर रहे हैं, जिन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष में अपने प्राणों की आहुतियाँ दी। जिनके त्याग, तप और बलिदान के कारण ही हम उन्मुक्त हवा में साँस ले पा रहे हैं। आज जो गीत हम आपके लिए प्रस्तुत करने जा रहे हैं, वह भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के एक ऐसे महानायक से सम्बन्धित है, जिसे नाम के स्थान पर दी गई ‘शहीद-ए-आजम’ की उपाधि से अधिक पहचाना जाता है। जी हाँ, आपका अनुमान बिलकुल ठीक है, हम अमर बलिदानी भगत सिंह की स्मृति को आज स्वरांजलि अर्पित करेंगे।



भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अमर बलिदानी भगत सिंह का जन्म एक देशभक्त परिवार में 28सितम्बर, 1907 को ग्राम बंगा, ज़िला लायलपुर (अब पाकिस्तान में) हुआ था। उनके पूर्वज महाराजा रणजीत सिंह की सेना के योद्धा थे। भगत सिंह के दो चाचा स्वर्ण सिंह व अजीत सिंह तथा पिता किशन सिंह ने अपना पूरा जीवन अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ने में लगा दिया। ऐसी पारिवारिक पृष्ठभूमि से निकले भगतसिंह के हृदय में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष करने की भावना को और अधिक सबल बना दिया। 13अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में जनरल डायर ने भीषण नरसंहार किया था। तब भगत सिंह मात्र 12 वर्ष के थे। घर पर बिना किसी को बताए भगत सिंह लाहौर से अमृतसर के जलियाँवाला पहुँच गए और एक शीशी में वहाँ की रक्तरंजित मिट्टी लेकर लौटे। उन्होने वह शीशी अपनी बहन को दिखाया और उस पर फूल चढ़ा कर बलिदानियों को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसी प्रकार 1921 में जब वे नौवीं कक्षा में थे, अंग्रेजों के विरुद्ध आन्दोलन आरम्भ हुआ। ऐसे में भला भगत सिंह कहाँ पीछे रहते। अपने साथियों की एक टोली बना कर विदेशी कपड़ों की होली जलाने में जुट गए। इसी बीच 5फरवरी, 1922 को उत्तर प्रदेश के चौरीचौरा में प्रदर्शनकारियों ने एक थानेदार और 21 सिपाहियों को थाने में बन्दकर आग लगा दिया। इस घटना ने भगत सिंह को हिंसा और अहिंसा मार्ग के अलावा एक ऐसे मार्ग पर चलने का संकेत दिया, जिसपर चलकर जन-चेतना जागृत करते हुए आत्मोत्सर्ग के लिए सदा तत्पर रहने का आग्रह था।



आगे चल कर भगत सिंह ने इसी मार्ग का अनुसरण किया और 17दिसम्बर, 1928 के दिन लाला लाजपत राय के हत्यारे सहायक पुलिस अधीक्षक सांडर्सको उसके अत्याचार की सजा दी। इस काण्ड में उनका साथ अमर बलिदानी राजगुरु ने दिया था। क्रान्तिकारियों के जीवन-चरित्र का अध्ययन करते समय भगत सिंह को फ्रांसीसी क्रान्तिकारी बेलाँ का चरित्र खूब भाया था। संसद में बम विस्फोट कर अपने सिद्धांतों को जन-जन तक पहुंचाने और स्वतंत्रता-प्राप्ति के लिए जनचेतना जगाने की अनूठी योजना की प्रेरणा भगत सिंह को बेलाँ से ही मिली थी। बिना किसी को हताहत किये संसद में बम फेक कर स्वयं को बन्दी बनवा लेने की इस योजना में भगत सिंह का साथ बटुकेश्वर दत्त ने दिया। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार उन्होने जोरदार आवाज़ के साथ विस्फोट किया और स्वयं को गिरफ्तार करा दिया। हुआ वही जो होना था। 7मई, 1929 से जेल में ही अदालत का आयोजन कर सुनवाई आरम्भ हुई। सुनवाई के दौरान भगत सिंह ने ब्रिटिश सरकार और उनकी नीतियों की खूब धज्जियाँ उड़ाईं।



अन्ततः 7अक्तूबर, 1930 को मुकदमे का नाटक पूरा हुआ और साण्डर्स हत्याकाण्ड में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की सजा सुना दी गई। तीनों क्रान्तिवीर अपना कार्य कर चुके थे। 23मार्च, 1931 का दिन, उस दिन भगत सिंह अपनी आयु के मात्र 23वर्ष, 5मास और 26 दिन पूरे किये थे। इतनी कम आयु के बावजूद उन्होने उस साम्राज्य की चूलें हिला दीं, जिनके राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था।



आज हम आपको जो गीत सुनवाने जा रहे हैं वह इन्हीं तीनों बलिदानियों, विशेष रूप से अमर बलिदानी भगत सिंह के जीवन-दर्शन पर आधारित फिल्म‘शहीद’ से लिया गया है। इस फिल्म के गीतकार और संगीतकार, दोनों का दायित्व प्रेम धवन ने ही निभाया था। फिल्मांकन की दृष्टि से आज का गीत इसलिए महत्वपूर्ण है कि यह गीत भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को जेल की कोठरी से फाँसी-स्थल तक ले जाने के दौरान फिल्माया गया था। मोहम्मद रफी और साथियों के स्वरों में आइए सुनते हैं, यह प्रेरक गीत और हँसते-हँसते फाँसी का फन्दा चूमने वाले क्रान्तिवीरों को भाव-भीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।







और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - पहले स्वतन्त्रता संग्राम का नायक था ये वीर, जिसने आने वाले समय में देश में जाग्रति भरी.

सूत्र २ - आवाज़ है रफ़ी साहब की.

सूत्र ३ - एक अंतरे का पहला शब्द है - "हिमाला" .



अब बताएं -

संगीतकार बताएं - ३ अंक

फिल्म का नाम बताएं - २ अंक

गीतकार बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

अमित जी को एक बार फिर बधाई



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Sunday, June 12, 2011

चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक...प्रेम धवन ने लिखा इस फ़साने को, स्वर दिया लता ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 676/2011/116

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! आज रविवार की शाम इस स्तंभ में एक नई सप्ताह के साथ हम हाज़िर हैं। आजकल इसमें जो शृंखला चल रही है, उसमें हम आपको केवल गीत ही नहीं, बल्कि कहानियाँ भी सुनवा रहे हैं। 'एक था गुल और एक थी बुलबुल' शृंखला आधारित है उन गीतों पर जिनमें कही गई है किस्से-कहानियाँ। पाँच कहानियाँ हम पिछले हफ़्ते सुन चुके हैं, और आज से अगले पाँच अंकों में हम सुनने जा रहे हैं पाँच और दिलचस्प कहानियाँ। किदार शर्मा, मुंशी अज़ीज़, कमर जलालाबादी, हसरत जयपुरी और मजरूह सुल्तानपुरी के बाद आज बारी है प्रेम धवन साहब की। धवन साहब नें आज के गीत के रूप में जो कहानी लिखी है, उसमें एक राजा है, एक रानी है, एक घोड़ा है, और एक डायन जादूगरनी भी है। किसी फ़िल्म की ही तरह यह कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। इस कहानी को आगे हम बताने वाले हैं, लेकिन उससे पहले आपको यह बता दें कि इस कहानी के सभी किरदारों को फ़िल्म की नायिका मीना कुमारी ही अभिनय के द्वारा दर्शाती है। जैसे जैसे कहानी आगे बढ़ती है, मीना जी भी अपनी बॉडी-लैंगुएज से, अपने एक्स्प्रेशन से, अपने बालों से, और तमाम चीज़ों से हर किरदार को जीवन्त कर देती हैं। और कहानी जैसे जी उठती है। बाल-कलाकार के रूप में बेहद मशहूर हनी ईरानी इस फ़िल्म में मीना कुमारी के बेटे का रोल निभाती है, और इस गीत में कहानी भी उसी को सुनाया जा रहा है। गीत के उस हिस्से में जब मीना कुमारी अपने पति की रक्षा हेतु ईश्वर से प्रार्थना करती है, हनी भी भक्ति-भावना से आगे-पीछे डोल डोल कर ईश्वर से प्रार्थना करती है। बहुत ही क्युट लगती है, और मीना कुमारी भी उसे देख हँस देती हैं।

उधर लता जी नें भी इस गीत में जान फूंकी हैं। कहानी के हर किरदार के लिये अलग एक्स्प्रेशन लाकर विविधता से भर दिया है गीत को। संगीतकार रवि के संगीत का भी जवाब नहीं। १९५५ में बच्चों वाली ही एक फ़िल्म 'वचन' में उन्होंने "चंदा मामा दूर के" गीत रच कर प्रसिद्धी हासिल की थी। अरे अरे अरे, देखिये, इन सब बातों के बीच मैं यह कहना तो भूल ही गया कि आज हम गीत कौन सा सुनने जा रहे हैं। आज हम लाये हैं १९५९ की फ़िल्म 'चिराग कहाँ रोशनी कहाँ' से "चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक"। इस गीत में शामिल कहानी यह रही -

बहुत दिनों की बात है,
एक था राजा एक थी रानी,
राजा-रानी के घर में था राजकुमार एक प्यारा,
एक के दिल का टुकड़ा था वो,
एक की आँख का तारा।

एक दिन राजा का मन चाहा,
चल कर करें शिकार,
निकल पड़ा वो होकर
एक नन्हे घोड़े पे सवार।

और मालूम है वो क्या कहता जा रहा था?
चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक,
रुकने का तू नाम न लेना,
चलना तेरा काम।

चलते चलते उसके आगे आया एक पहाड़,
राजा मन ही मन घबराया,
कैसे होगा पार।
इतने में एक पंछी बोला
अपने पंख उतार,
पंख बने हैं ये हिम्मत के,
ले और होजा पार।
पंख लगा कर घोड़े को राजा ने एड़ लगायी,
देने लगी हवाओं में फिर ये आवाज़ सुनाई,
चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक।

ले कर राजा को एक बन में,
आया नीला घोड़ा,
देख के एक चंचल हिरणी को,
उसके पीछे दौड़ा।
लेकिन पास जो पहुँचा तो
देखो क़िस्मत की करनी,
रूप में उस चंचल हिरणी के
निकली जादूगरनी।
पलट के जादूगरनी ने
जादू का तीर जो छोड़ा,
तोता बन कर रह गया राजा
पत्थर बन कर घोड़ा।
फिर राजा कैसे कहता,
चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक।

इधर महल में राह देखते
व्याकुल हो गई रानी,
राजकुमार के कोमल मुख पर
भी छायी वीरानी।
तब ईश्वर से दोनों ने
रो रो कर करी पुकार,
दे दे हमें हमारा राजा
जग के पालनहार रे,
ओ जग के पालनहार रे।

सुन कर उनकी बिनती
दूर गगन में ज्वाला भड़की,
जादूगरनी के सर पर एक ज़ोर की बिजली कड़की।
तोते से फिर निकला राजा,
और पत्थर से घोड़ा,
राजमहल की ओर वो पूरा ज़ोर लगाकर दौड़ा।
और बोला
चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक।

देख के राजा को आते
रानी फूली न समायी,
राजमहल के द्वार पे झटपट
दौड़ी दौड़ी आयी।
राजा आया राजा आया
बोला राजकुमार,
अपने हाथों से रानी ने जाकर खोला द्वार।




क्या आप जानते हैं...
कि देवेन्द्र गोयल नें रवि को 'वचन' में पहला मौका दिया था, और इस पचास के दशक में गोयल साहब की कई फ़िल्मों में रवि का संगीत था, जैसे कि 'अलबेली', 'एक साल', 'चिराग कहाँ रोशनी कहाँ', और 'नई राहें'।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 7/शृंखला 18
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - बेहद आसान .
सवाल १ - किस बच्चे ने प्रमुख गायक का साथ दिया है - ३ अंक
सवाल २ - गीतकार कौन हैं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी टिपण्णी बहुत कुछ कह गयी है, बहरहाल हमने आवाज़ पर अब तक न किसी खास फनकार का फेवर किया है न किसी खास श्रोता का. ये एक परंपरा है जिसे मैंने खुद और मेरे सभी साथियों ने हमेशा संभाला है. शायद यही वजह है कि आवाज़ आज इस हद तक लोकप्रिय है. दरअसल जब ओल्ड इस गोल्ड शुरू किया था तो इसका समय ६ से ७ के बीच रखा गया था, ताकि सुविधा अनुसार पोस्ट हो सके. बाद में जब पहेली के लिए प्रतियोगिता बढ़ गयी तो समय ठीक ६.३० का कर दिया गया, शरद जी जो सबसे पुराने श्रोता हैं इस तथ्य से वाकिफ हैं. अमित जी ने जब हमसे गुजारिश कि तो हमने उनको भी यही सलाह दी कि वो इसे सबके सामने रखे यदि किसी को आपत्ति न हो तो हम इसे ६-७ के बीच कभी प्रसारित कर सकते हैं. खैर...हमें लगता है कि आपत्ति है जिसे शायद खुल कर अभिव्यक्त नहीं किया गया. इसलिए आज से हम समय वापस ६.३० का ही कर रहे हैं. अनजाना जी पिछली कड़ी में समय के बदलाव के लिए हम माफ़ी चाहते हैं, पर कुछ निर्णय हमने लिए हैं -
कड़ी २ की पहेली विवादस्पद थी, मगर हमने पहली को जिन विश्वसनीय सूत्रों पर रख कर परखा है हमें लगता है कि हमें उसी पर अपने परिणाम भी मापने होंगें, लिहाजा इस पहेली के परिणाम को हम यथावत रखते हुए अनजाना जी के ३ अंक बरकरार रखेंगें.
पहली ६ में समय का बदलाव हुआ था पर हमने यही विश्वास किया था कि अनजाना जी इससे वाकिफ हो गए होंगें, लिहाजा अमित जी जिनका जवाब सबसे पहले आया ३ अंकों के हकदार हैं.
इस शृंखला में मुकाबला इन्हीं दो धुरंधरों का है हम बता दें कि अनजाना जी १२ और अमित जी १० अंकों पर हैं.

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, March 21, 2011

चंदा रे जा रे जा रे....मुस्लिम समाज में महिलाओं की निर्भीक आवाज़ बनकर उभरी इस्मत चुगताई को आज आवाज़ सलाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 617/2010/317

हिंदी सिनेमा के कुछ सशक्त महिला कलाकारों को सलाम करती 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की लघु शृंखला 'कोमल है कमज़ोर नहीं' की सातवीं कड़ी में आप सभी का फिर एक बार स्वागत है। आज हम जिस प्रतिभा से आपका परिचय करवा रहे हैं, वो एक उर्दू की जानीमानी लेखिका तो हैं ही, साथ ही फ़िल्म जगत को एक कहानीकार, पटकथा व संवाद लेखिका, निर्मात्री व निर्देशिका के रूप में अपना परिचय देनेवाली इस फनकारा का नाम है इस्मत चुगताई। १५ अगस्त १९१५ को उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मीं और जोधपुर राजस्थान में पलीं इस्मत जी के पिता एक सिविल सर्वैण्ट थे। ६ भाई और ४ बहनों के विशाल परिवार में इस्मत नौवीं संतान थीं। इस्मत की बड़ी बहनों का उनकी बचपन में ही शादी हो जाने की वजह से इस्मत का बचपन अपने भाइयों के साथ गुज़रा। और शायद यही वजह थी इस्मत के अंदर पनपने वाले खुलेपन की और इसी ने उनके लेखन में बहुत ज़्यादा प्रभाव डाला। इस्मत के युवावस्था में ही उनका भाई मिर्ज़ा अज़ीम बेग चुगताई एक स्थापित लेखक बन चुके थे, और वो ही उनके पहले गुरु बनें। १९३६ में स्नातक की पढ़ाई करते हुए इस्मत चुगताई लखनऊ में आयोजित 'प्रोग्रेसिव राइटर्स ऐसोसिएशन' की पहली सभा मे शरीक हुईं। बी.ए. करने के बाद इस्मत ने बी.टी की पढ़ाई की, और बी.ए और बी.टी, दोनों डिग्रियाँ अर्जित करने वाली भारत की पहली मुस्लिम महिला बन गईं। और इसी दौरान वो छुपा छुपा कर लिखने लगीं, क्योंकि उनके इस लेखन का उनकी रूढ़ीवादी मुस्लिम परिवार ने घोर विरोध किया। तमाम मुसीबतों और कठिनाइयों का सामना करते हुए इस्मत चुगताई नें अपना लेखन कार्य जारी रखा और इस देश की आनेवाली लेखिकाओं के लिए राह आसान बनाई। और इसीलिए 'कोमल है कमज़ोर नहीं' शृंखला सलाम करती है इस्मत चुगताई जैसी सशक्त लेखिका को।

जैसा कि हमनें कहा कि इस्मत चुगताई को बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ा है, आइए इस ओर थोड़ा नज़र डालें। उनकी बहुत सारी लेखों का दक्षिण एशिया में घोर विरोध किया क्योंकि उन सब में मुस्लिम समाज में लाये जाने वाली ज़रूरी बदलावों की बात की गई थी, यहाँ तक कि इस्लामिक उग्रवाद पर भी वार किया था उन्होंने। मुस्लिम महिलाओं की नक़ाबपोशी (परदा) के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाकर उन्होंने मुस्लिम समाज में तूफ़ान उठा दिया था। वर्तमान में मुस्लिम देशों में इस्मत चुगताई की बहुत सी किताबों पर प्रतिबंध है। इस्मत चुगताई के हिंदी सिनेमा में योगदान की अगर बात करें तो उन्होंने इस राह में पदार्पण किया था १९४८ की फ़िल्म 'ज़िद्दी' में, जिसकी उन्होंने कहानी लिखी थी। उसके बाद १९५० में 'फ़रेब' का उन्होंने निर्देशन किया। १९५८ की फ़िल्म 'सोने की चिड़िया' का न केवल उन्होंने निर्माण किया, बल्कि पटकथा भी ख़ुद लिखीं। १९६८ की फ़िल्म 'जवाब आयेगा' को निर्देशित कर १९७३ की मशहूर कलात्मक फ़िल्म 'गरम हवा' की कहानी लिखीं। १९७५ की वृत्तचित्र 'माइ ड्रीम्स' का उन्होंने निर्देशन किया और १९७८ की फ़िल्म 'जुनून' में संवाद लिखे और अभिनय भी किया। २४ अक्तुबर १९९१ को इस्मत चुगताई का बम्बई में निधन हो गया। मुस्लिम होते हुए भी उन्हें कब्र में समाधि नहीं दी गई, बल्कि उनके ख़्वाहिशानुसार उनका अंतिम संस्कार चंदनवाड़ी क्रिमेटोरियम में किया गया। इस छोटे से लेख में इस्मत चुगताई जैसी विशाल प्रतिभा को पूरी तरह से हम समेट नहीं सकते, फिर कभी मौका मिला तो उनके शख्सियत की कुछ और बातें आपको बताएँगे। फ़िल्हाल आइए सुनते हैं फ़िल्म 'ज़िद्दी' से लता मंगेशकर का गाया "चंदा रे, जा रे जा रे"। खेमचंद प्रकाश का संगीत था इस फ़िल्म में और गीतकार थे प्रेम धवन, जिनकी यह पहली पहली फ़िल्म थी। दरअसल निर्देशक शाहीद लतीफ़ और इस्मत चुगताई ही प्रेम धवन साहब को ले गये थे अशोक कुमार और देविका रानी के पास और गीतकार के लिए उनका नाम सुझाया। प्रेम धवन साहब के लिए आज का प्रस्तुत गीत बहुत मायने रखता था, तभी तो विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में कुछ इस तरह से उन्होंने इसके बारे में कहा था - "मैं अपनी ग्रैजुएशन पूरी कर इप्टा से जुड़ गया, कम्युनिस्ट के ख़यालात थे मुझमें। पंजाब में मैं इसका फ़ाउण्डर मेम्बर था। मैंने एक ट्रूप बनाया पंडित रविशंकर और सचिन शंकर के साथ मिल कर और हम पंजाबी में कार्यक्रम पेश करने लगे पूरे देश में घूम घूम कर, और अपनी संस्था इप्टा के लिए चंदा इकट्ठा करते ज़रूरतमंद लोगों की सेवा के लिए। पर १९४७ में दंगे शुरु हो गए और हमारे टूर भी बंद हो गए। चंदा कलेक्ट करना भी बंद हो गया। हमनें फ़ैसला किया कि थिएटर को बंद कर दिया जाए। थिएटर बंद होने के बाद फ़िल्मवालों ने बुलाया। मेरी पहली फ़िल्म थी 'बॊम्बे टाकीज़' की 'ज़िद्दी'। उसमें एक गीत था "चंदा रे, जा रे जा रे", जिसे लता ने गाया था। उस समय लता भी नई नई थी। यह 'महल' के पहले की बात है। यह गीत मेरे करीयर का एक लैण्डमार्क गीत था और लता का भी। इस कॊण्ट्रैक्ट के ख़त्म होने के बाद मैंने अनिल बिस्वास के लिए कई फ़िल्मों में गानें लिखे जैसे 'लाजवाब', 'तरना' वगेरह।" तो आइए दोस्तों, इस्मत चुगताई को सलाम करते हुए सुनें उनकी लिखी कहानी पर बनी फ़िल्म 'ज़िद्दी' का यह गीत।



क्या आप जानते हैं...
कि इस्मत चुगताई के जीवन पर लिखे किताबों में उल्लेखनीय दो किताबें हैं सुक्रीता पाल कुमार लिखित 'Ismat: Her Life, Her Times' तथा मंजुला नेगी लिखित 'Ismat Chughtai, A Fearless Voice'

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 08/शृंखला 12
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - एक आवाज़ है येसुदास की.

सवाल १ - हम चर्चा करेंगें इस गीत की फिल्म की निर्देशिका की, कौन हैं ये - २ अंक
सवाल २ - गीतकार भी एक जानी मानी लेखिका हैं, नाम बताएं - ३ अंक
सवाल ३ - कौन हैं सहगायिका - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
एक बार फिर अंजाना जी बाज़ी मार गए....कमाल हैं आप दोनों...वाकई :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Monday, October 4, 2010

मेरा रंग दे बसंती चोला....जब गीतकार-संगीतकार प्रेम धवन मिले अमर शहीद भगत सिंह की माँ से तब जन्मा ये कालजयी गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 497/2010/197

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अंतर्गत इन दिनों आप सुन और पढ़ रहे हैं नव रसों पर आधारित फ़िल्मी गीतों की लघु शृंखला 'रस माधुरी'। आज बारी है वीर रस की। वीर रस, यानी कि वीरता और आत्मविश्वास का भाव जो हर इंसान में होना अत्यधिक आवश्यक है। प्राचीन काल में राजा महाराजाओं, सेनापतियों और सैनिकों को वीर की उपाधि दी जाती थी जो युद्ध भी अगर लड़ते थे तो पूरे नियमों को ध्यान में रखते हुए। पीठ पीछे वार करने में कोई वीरता नहीं है, बल्कि उसे कायर कहते हैं। वीरता के रस अपने में उत्पन्न करने के लिए इंसान को धैर्य और प्रशिक्षण की ज़रूरत है। आत्मविश्वास को बढ़ाना होगा अपने अंदर। वीर रस का एक महत्वपूर्ण पक्ष है प्रतियोगिता का, जो बहुत ज़रूरी है अपने काबिलियत को बढ़ाने के लिए। लेकिन हार या जीत को अगर हम बहुत ज़्यादा व्यक्तिगत रूप से लेंगे तो फिर मुश्किल ही होगी। वीर रस की वजह से इंसान स्वाधीन होना चाहेगा, उसे किसी का डर नहीं होगा, और वह बढ़ निकलेगा अपने आप को बंधनों से आज़ाद कराने के लिए। भारत ने हमेशा अमन और सदभाव का राह चुना है। हमने कभी किसी को नहीं ललकारा। हज़ारों सालों का हमारा इतिहास गवाह है कि हमने किसी पर कभी पहले वार नहीं किया। जंग लड़ना हमारी फ़ितरत नहीं। ख़ून बहाना हमारा धर्म नहीं और ना ही हम इसे वीरता समझते हैं। वीरता होती है अपने साथ साथ दूसरों की रक्षा करने में। लेकिन जब जब दुश्मनों ने हमारी इस धरती को अपवित्र करने की कोशिश की है, हम पर ज़ुल्म करने की कोशिश की है, तो हमने भी अपनी मर्यादा और सम्मान की रक्षा की है। ना चाहते हुए भी बंसी के बदले बंदूक थामे हैं हम प्रेम पुजारियों ने।

"मातृभूमि के लिए जो करता अपने रक्त का दान, उसका जीवन देवतूल्य है उसका जन्म महान।" स्वर्ग से महान अपनी इस मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणो की आहुति देने वाले शहीदों को समर्पित है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आज का यह एपिसोड। वीर रस पर आधारित जिस गीत को हमने इस कड़ी के लिए चुना है वह गीत हमें याद दिलाता है तीन ऐसे शहीदों की जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जो योगदान दिया, उनके नाम इस देश के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जा चुका है। ये तीन अमर शहीद हैं सरदार भगत सिंह, शिवराम राजगुरु और सुखदेव। २३ मार्च १९३१ के दिन ये फाँसी पर चढ़ कर शहीद हो गए और इस देश के स्वाधीनता के लिए अमर बलिदान दे गए। १९६५ में मनोज कुमार ने जब शहीद-ए-आज़म भगत सिंह और उनके साथियों के बलिदान पर अपनी कालजयी फ़िल्म 'शहीद' बनाई तो भगत सिंह के किरदार में ख़ुद मोर्चा सम्भाला, राजगुरु बनें आनंद कुमार और सुखदेव की भूमिका में थे प्रेम चोपड़ा। चन्द्रशेखर आज़ाद की भूमिका अदा की मनमोहन ने। भगत सिंह की माँ का रोल निभाया कामिनी कौशल ने। दोस्तों, जब यह फ़िल्म बन रही थी, तब भगत सिंह की माँ जीवित थीं। इसलिए मनोज कुमार अपनी पूरी टीम के साथ भगत सिंह के गाँव जा पहुँचे, उस बूढ़ी माँ से मिले और भगत सिंह के जीवन से जुड़ी बहुत सी बातें मालूम की जिन्हें वापस आकर उन्होंने इस फ़िल्म में उतारा। भगत सिंह की माँ से मुलाक़ात करने वाले इस टीम का एक सदस्य इस फ़िल्म के गीतकार-संगीतकार प्रेम धवन भी थे, जिन्होंने इस संस्मरण का उल्लेख अपने 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में किया था। पेश है वही अंश। "यह मेरी ख़ुशनसीबी है कि शहीद भगत सिंह की माँ से मिलने का इत्तेफ़ाक़ हुआ। हम उस गाँव में गए थे जहाँ भगत सिंह की माँ रहती थीं। उनसे हम लोग मिले और भगत सिंह के जीवन से जुड़ी कई बातें उन्होंने हमे बताईं। उनकी एक बात जो मेरे दिल को छू गई, वह यह था कि फाँसी से एक दिन पहले वो अपने बेटे से मिलने जब जेल गईं तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। तब भगत सिंह ने उनसे कहा कि 'माँ, मत रो, अगर तुम रोयोगी तो कोई भी माँ अपने बेटे को क़ुर्बानी की राह पर नहीं भेज पाएगी'। इसी बात से प्रेरित होकर मैंने इस फ़िल्म में यह गीत लिखा "तू ना रोना के तू है भगत सिंह की माँ, मर के भी तेरा लाल मरेगा नहीं, घोड़ी चढ़के तो लाते हैं दुल्हन सभी, हंसकर हर कोई फाँसी चढ़ेगा नहीं"। इसी फ़िल्म का मेरा लिखा एक और गीत है जो बहुत मशहूर हुआ था "मेरा रंग दे बसंती चोला"। बसंती रंग क़ुर्बानी का रंग होता है। ऐ माँ, तू मेरा चोला बसंती रंग में रंग दे, मुझे क़ुर्बान होने जाना है इस देश की ख़ातिर, बस यही एक अरमान है मेरा, तू रंग दे बसंती चोला" तो लीजिए दोस्तों, मुकेश, महेन्द्र कपूर और राजेन्द्र मेहता की आवाज़ों में प्रेम धवन का लिखा व स्वरबद्ध किया १९६५ की फ़िल्म 'शहीद' का यह देश भक्ति गीत सुनिए और सलाम कीजिए उन सभी शहीदों को जिनकी क़ुर्बानियों की वजह से हम आज़ाद हिंदुस्तान में जनम ले सके हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही भगत सिंह को उनकी जयंती पर कृतज्ञ राष्ट्र ने श्रद्धाजन्ली दी थी, वहीं पिछले हफ्ते ही गायक मेहन्द्र कपूर की दूसरी पुनातिथि भी थी. आईये इस गीत में बहाने हम उन्हें भी आज याद करें.



क्या आप जानते हैं...
कि "मेरा रंग दे बसंती चोला" गीत राग भैरवी पर आधारित है जब कि इसी फ़िल्म का एक और देश-भक्ति गीत "सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है" को प्रेम धवन ने राग दरबारी काबड़ में स्वरबद्ध किया था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. युं तो यह गीत रौद्र रस पर आधारित है लेकिन जिस वस्तु के माध्यम से ग़ुस्सा प्रकट किया जा रहा है, वह एक बहुत ही नाज़ुक सी चीज़ है। इस युगल गीत के गायक का नाम बताएँ। ४ अंक।
२. इस फ़िल्म में ७० के दशक की एक सुपरहिट नायक-नायिका की जोड़ी है और ठीक वैसे ही एक सफल गीतकार-संगीतकार की जोड़ी भी। फ़िल्म का नाम बताएँ। १ अंक।
३. पहले अंतरे में "ख़ूबसूरत शिकायत" शब्द आते हैं। मुखड़ा पहचानिए। २ अंक।
४. फ़िल्म के निर्देशक बताएँ। ३ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
इस बार नए प्रतिभागी ने सबको पीछे छोड़ा, वैसे इस गीत को पहचानना मुश्किल भी नहीं था, आज का गीत पहचाने तो मानें :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, February 24, 2010

तेरा ख़याल दिल को सताए तो क्या करें...तलत साहब को उनकी जयंती पर ढेरों सलाम

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 355/2010/55

ज २४ फ़रवरी है, फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध पार्श्व गायक तलत महमूद साहब का जनमदिवस। उन्ही को समर्पित 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की ख़ास पेशकर इन दिनों आप सुन रहे हैं 'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़'। दोस्तों, इस शृंखला में हमने दस ऐसे लाजवाब ग़ज़लों को चुना है जिन्हे दस अलग अलग शायर-संगीतकार जोड़ियों ने रचे हैं। अब तक हमने साहिर - सचिन, मजरूह - जमाल सेन, नक्श ल्यायलपुरी - स्नेहल, और शेवन रिज़्वी - धनीराम/ख़य्याम की रचनाएँ सुनवाए हैं। आज एक और नायाब जोड़ी की ग़ज़ल पेश-ए-ख़िदमत है। यह जोड़ी है प्रेम धवन और पंडित गोबिन्दराम की। लेकिन आज की ग़ज़ल का ज़िक्र अभी थोड़ी देर में हम करेंगे, उससे पहले आपको हम बताना चाहेंगे कि किस तरह से तलत महमूद साहब ने अपना पहला फ़िल्मी गीत रिकार्ड करवाया था। तलत महमूद जब बम्बई में जमने लगे थे तब एक अफ़वाह फैल गई कि वो गाते वक़्त नर्वस हो जाते हैं। उनके गले की लरजिश को नर्वसनेस का नाम दिया गया। इससे उनके करीयर पर विपरीत असर हुआ। तब संगीतकार अनिल बिस्वास ने यह बताया कि उनके गले की यह कम्पन ही उनकी आवाज़ की खासियत है। जब तलत महमूद ने कोशिश कर के बिना कम्पन के गीत गाना शुरु किया तो अनिल दा उनसे बेहद नाराज़ हो गए, और कहा कि मुझे तुम्हारे गले की वह लरजिश ही चाहिए और उसी लरजिश की वजह से मैंने तुम्हे अपना गाना दिया है। इससे तलत साहब का हौसला बढ़ा और अनिल दा के संगीत निर्देशन में फ़िल्म 'आरज़ू' के लिए उनका पहला फ़िल्मी गीत "अए दिल मुझे ऐसी जगह ले चल" रिकार्ड हुआ। उसके बाद तलत साहब ने पीछे मुड़कर दुबारा नहीं देखा और एक के बाद एक बेहतरीन गीत और ग़ज़लें गाते चले गए, और उनके गाए इन बेमिसाल मोतियों की फ़ेहरैस्त लम्बी, और लम्बी होती चली गई।

अब आते हैं हम आज की ग़ज़ल पर। जैसा कि हमने बताया, आज की ग़ज़ल के शायर हैं प्रेम धवन और मौसीक़ार हैं पंडित गोबिन्दराम। फ़िल्म 'नक़ाब' की यह ग़ज़ल है "तेरा ख़याल दिल को सताए तो क्या करें"। पंडित गोबिन्दराम फ़िल्म संगीत के दूसरी पीढ़ी के संगीतकार थे, जिन्होने बहुत सारी फ़िल्मों में संगीत दिया है। सन् १९३७ में फ़िल्म 'जीवन ज्योति' से अपनी पारी की आग़ाज़ करने वाले गोबिन्दराम ने आरम्भिक फ़िल्मों (ख़ूनी जादूगर, हिम्मत, आबरू, पगली, सहारा, सलमा) से ही अपना सिक्का जमा लिय था। संगीत और लोकप्रियता की दृष्टि से फ़िल्म 'दो दिल' ('४७) गोबिन्दराम की सफल फ़िल्मों में अन्यतम है। रीदम और लयकारी पंडित जी के संगीत के ख़ास पहलू हैं। कोरल एफ़ेक्ट्स का उन्होने बड़े सृजनात्मक अंदाज़ में इस्तेमाल दिखाया है। यह जो आज की हमारी फ़िल्म है 'नक़ाब', यही गोबिन्दराम की अंतिम महत्वपूर्ण फ़िल्म थी। मधुबाला और शम्मी कपूर अभिनीत लेखराज भाकरी की १९५५ की इस फ़िल्म में गोबिन्दराम ने लता से कई सुंदर गीत गवाए जैसे कि "ऐ दिल की लगी कुछ तू ही बता", "मेरे सनम तुझे मेरी क़सम", "हम तेरी सितम का कभी शिकवा ना करेंगे" आदि। लता-रफ़ी का गाया "कब तक उठाएँ और ये ग़म इंतज़ार का" भी एक लोकप्रिय रचना है। पर इस फ़िल्म का सब से मक़बूल गीत है तलत साहब का गाया हुआ आज की प्रस्तुत ग़ज़ल। आइए दोस्तों, पंडित गोबिन्दराम, प्रेम धवव और तलत महमूद को अपनी श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए यह ग़ज़ल सुनें, जिसके तीन शेर कुछ इस तरह से हैं -

तेरा ख़याल दिल को सताए तो क्या करें,
दम भर हमें क़रार ना आए तो क्या करें।

जब चांद आए तारों की महफ़िल झूम के,
दिल बार बार तुझको बुलाए तो क्या करें।

कटती नहीं है रात अब तेरे फ़िराक़ में,
हम दिलजलॊं को नींद ना आए तो क्या करें।



क्या आप जानते हैं...
कि जब के. आसिफ़ ने 'मुग़ल-ए-आज़' फ़िल्म की योजना बनाई थी तो संगीतकार के रूप में पहले पंडित गोबिन्दराम को ही चुना था। लेकिन उस समय यह फ़िल्म नहीं बन सकी। बाद में जब इस फ़िल्म को नए सिरे से शुरु किया गया तब तक गोबिन्दराम फ़िल्म जगत को छोड़ चुके थे।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

1. मतले में ये दो शब्द हैं - "जिदगी" और "अँधेरी", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. खान मस्ताना के नाम से गाने वाले गायक हैं इस गीत के संगीतकार, किस नाम से उन्हें क्रेडिट दिया गया है- ३ अंक.
3. फिल्म के नायक थे भारत भूषण, नायिका का नाम बताएं- २ अंक.
4. इस गज़ल के शायर कौन हैं - सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह वाह मज़ा आया, शरद जी आपके हैं २७ अंक अब तक, इंदु जी पीछे हैं १२ अंकों पर और अवध जी उनके ठीक पीछे, देखें पहले कौन शतक बनाता है

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, August 16, 2009

छोडो कल की बातें कल की बात पुरानी....जय विज्ञान है युवा हिन्दुस्तान का नया नारा

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 173

स्वतंत्रता दिवस के उपलक्ष पर तिरंगे के तीन रगों से रंगे तीन गानें आप इन दिनों सुन रहे हैं बैक टू बैक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल पर। कल गेरुआ रंग यानी कि वीर रस पर आधारित गीत आप ने सुना, आज का रंग है सफ़ेद, यानी कि शांति, अमन, भाईचारे और प्रगति की बातें। दोस्तों, जब देश भक्ति गीतों की बात आती है तो हम ने अक्सर यह देखा है कि गीतकार ज़्यादातर हमारे इतिहास में से चुन चुन कर देश भक्ति के उदाहरण खोज लाते हैं और हमारे देश की गौरव गाथा का बखान करते हैं। बहुत कम ही गीत ऐसे हैं जिनमें देश के नवनिर्माण, प्रगति और देश के भविष्य के विकास की ओर झाँका गया हो। जैसा कि हमने कहा कि हमारा आज का रंग है सफ़ेद, यानी कि शांति का। और देश में शांत वातावरण तब ही पैदा हो सकते हैं जब हर एक देशवासी को दो वक़्त की रोटी नसीब हो, पहनने के लिए कपड़े नसीब हो, घर नसीब हो। इन सब का सीधा ताल्लुख़ देश के विकास और प्रगति पर निर्भर करता है। ऐसे ही विचारों को गीत के शक्ल में पिरोया है गीतकार प्रेम धवन ने फ़िल्म 'हम हिंदुस्तानी' के उस मशहूर गीत में जिसे आज हम आप के लिए लेकर आये हैं। मुकेश और साथियों की आवाज़ों में और उषा खन्ना के संगीत निर्देशन में वह गीत है "छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी, नए दौर में लिखेंगे मिलकर नयी कहानी, हम हिंदुस्तानी"। इस गीत में धवन जी ने साफ़ शब्दों में कहा है कि पुरानी बातों पर ज़्यादा ध्यान न देकर मेहनत को ही अपना इमान बनायें।

एस. मुखर्जी निर्मित व राम मुखर्जी निर्देशित १९६० की इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सुनिल दत्त, जय मुखर्जी और आशा पारेख। फ़िल्म में उषा खन्ना का संगीत कामयाब रहा। अब आ जाइए गीतकार प्रेम धवन पर। धवन साहब देश भक्ति गीतों के बहुत अच्छे गीतकार रहे हैं। आप को शायद मनोज कुमार की फ़िल्म 'शहीद' याद हो जो शहीद भगत सिंह पर बनी थी। इस फ़िल्म में प्रेम धवन ने गानें लिखे और संगीत भी दिया था। देश भक्ति फ़िल्मों में 'शहीद' एक बहुत ही महत्वपूर्ण नाम है। इस फ़िल्म से संबंधित कुछ बातें प्रेम धवन जी ने विविध भारती के 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में कहे थे, जिन्हे पढ़ कर आप की आँखें नम हो जायेंगी। "मेरे फ़ौजी भा‍इयों, शहीद भगत सिंह के जीवन पर आधारित एक फ़िल्म मनोज कुमार ने बनायी थी, मैने उसमें गीत लिखे और संगीत भी दिया था। यह मेरी ख़ुशनसीबी है कि भगत सिंह की माँ से मिलने का इत्तेफ़ाक़ हुआ। हम लोग उस गाँव में गए जहाँ भगत सिंह की माँ रहती थीं। उनसे हम लोग मिले और भगत सिंह के जीवन से जुड़ी कई बातें उन्होने हमें बतायीं। उनकी एक बात जो मेरे दिल को छू गयी, वह यह था कि फाँसी से एक दिन पहले वो अपने बेटे से मिलने जब जेल गयीं तो उनकी आँखों में आँसू आ गए। तब भगत सिंह ने उनसे कहा कि 'माँ, मत रो, अगर तुम रोयोगी तो कोई माँ अपने बेटे को क़ुर्बानी की राह पर नहीं भेज पाएगी'। इसी बात से प्रेरीत हो कर मैने इस फ़िल्म 'शहीद' में यह गीत लिखा "तू न रोना के तू है भगत सिंह की माँ, मर के भी तेरा लाल मरेगा नहीं, घोड़ी चढ़ के तो लाते हैं दुल्हन सभी, हँस कर हर कोई फाँसी चढ़ेगा नहीं"।" दोस्तों, इन बातों को लिखते हुए मेरे रोंगटे खड़े हो गये हैं, आँखें भी बोझल हो रही हैं, अब और ज़्यादा लिखा नहीं जा रहा। सुनिए आज का गीत फ़िल्म 'हम हिंदुस्तानी' का। कुछ 'रिकार्ड्स' पर यह गीत ६:३० मिनट का है तो कुछ 'रिकार्ड्स' पर ३:३० मिनट का। हम आप के लिए पूरे साढ़े ६ मिनट वाला वर्ज़न ढ़ूंढ लाए हैं। इस गीत के बोलों की जितनी तारीफ़ की जाए कम ही होगी। मुझे निम्नलिखित अंतरा सब से ज़्यादा अच्छा लगता है, आप भी ज़रूर बताइयेगा कि आप को इस गीत का कौन सा अंतरा सब से ज़्यादा भाता है।

"दाग़ ग़ुलामी का धोया है जान लुटाके,
दीप जलाये हैं ये कितने दीप बुझाके,
ली है आज़ादी तो फिर इस आज़ादी को,
रखना होगा हर दुश्मन से आज बचाके,
नया ख़ून है नयी उमंगें अब है नयी जवानी,
हम हिंदुस्तानी, हम हिंदुस्तानी"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल के गीत का थीम है -"जय किसान".
2. इस अमर गीत के गीतकार ने इसी वर्ष हमसे विदा कहा है.
3. एक अंतरे में तिरेंगे के रंगों को देशभक्तों के नामों से जोड़ा गया है.

पिछली पहेली का परिणाम -
दीपाली जी सही जवाब. अब आप भी पराग जी के बराबर १२ अंकों पर आ गयी हैं...बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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