रविवार, 30 अगस्त 2020

राग शुद्ध सारंग : SWARGOSHTHI – 477 : RAG SHUDDH SARANG





स्वरगोष्ठी – 477 में आज

काफी थाट के राग – 21 : राग शुद्ध सारंग

कौशिकी चक्रवर्ती से राग शुद्ध सारंग में एक रागदारी रचना और तलत महमूद व आशा भोसले से फिल्मी गीत सुनिए






Vidushi Kaushiki Chakraborty 

Talat Mehmood 
 रेडियो प्लेबैक इण्डिया के साप्ताहिक स्तम्भ स्वरगोष्ठी के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की इक्कीसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट, स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के संगीत पारिजात और राग विबोध नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की इक्कीसवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग शुद्ध सारंग का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-षाड़व जाति के राग शुद्ध सारंग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीत विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में राग शुद्ध सारंग में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस राग के स्वरों का फिल्मी गीतों में भी उपयोग किया गया है। राग शुद्ध सारंग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म "चाँदी की दीवार" से साहिर लुधियानवी का लिखा और एन. दत्ता का स्वरबद्ध किया एक गीत "लागे तोसे नैन..." सुनवा रहे हैं, जिसे तलत महमूद और आशा भोसले ने स्वर दिया है।


राग शुद्ध सारंग काफी थाट का राग माना जाता है। कुछ विद्वान इस राग को कल्याण थाट का मानते हैं। यह औड़व-षाड़व जाति का राग है; अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में छः स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह में गान्धार और धैवत और अवरोह में केवल गान्धार स्वर वर्जित होता है। इस राग में दोनों मध्यम स्वर के साथ शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग के आरोह में तीव्र मध्यम और अवरोह में शुद्ध मध्यम का प्रयोग किया जाता है। कभी-कभी दोनों मध्यम स्वरों का एकसाथ भी प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग के गायन अथवा वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय मध्याह्न काल अथवा दिन का दूसरा प्रहर होता है। स्वयं राग के नाम से स्पष्ट है कि यह सारंग का एक प्रकार है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे और राजा नवाब अली तथा उनके अनुयायी इस राग आरोह और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग नहीं करते और जो विद्वान प्रयोग करते भी हैं तो अवरोह में बहुत कम प्रयोग करते हैं। यह गम्भीर प्रकृति का राग है। इसका चलन विशेषकर मन्द्र और मध्य सप्तक में ही किया जाता है। अब हम आपको विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में राग शुद्ध सारंग की एक शास्त्रीय रचना पटियाला गायकी की परम्परा में सुनवा रहे हैं। 

राग शुद्ध सारंग : "दरश बिन लागे दुखन जिया..." : विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती 


आशा भोसले 

प्राचीनकाल में राग सारंग का अर्थ शुद्ध सारंग समझा जाता था, किन्तु आजकल राग सारंग से वृन्दावनी सारंग समझा जाता है। इसराग के थाट के विषय में भी विद्वानों में मतभेद है। संगीत कार्यालय, हाथरस द्वारा प्रकाशित और वसन्त द्वारा लिखित पुस्तक "रागकोष" और फिल्मी गीतों में राग तत्व विषय पर शोधकर्ता और संगीत विषयक पुस्तक "सुर संवादिनी" के लेखक श्री कन्हैयालाल पाण्डेय के अनुसार राग शुद्ध सारंग काफी थाट का राग है; जबकि श्री हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव की पुस्तक "राग परिचय" के चौथे भाग में इस राग को कल्याण थाट का माना गया है। राग शुद्ध सारंग और श्याम कल्याण बहुत कुछ मिलते-जुलते हैं। उत्तरांग दोनों रागों का एक ही है। राग श्याम कल्याण के पूर्वांग में गान्धार स्वर दोनों रागों को एक दूसरे से अलग कर देते हैं। अब हम आपके लिए राग शुद्ध सारंग पर आधारित एक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। यह गीत हमने वर्ष 1964 में प्रदर्शित फिल्म "चाँदी की दीवार" से लिया है। गीतकार साहिर लुधियानवी और संगीत निर्देशक एन. दत्ता हैं। इस युगलगीत में तलत महमूद और आशा भोसले के स्वर हैं। यह गीत तीनताल में निबद्ध है। 

राग शुद्ध सारंग : "लागे तोसे नैन..." : तलत महमूद और आशा भोसले : फिल्म - चाँदी की दीवार 




संगीत पहेली 

"स्वरगोष्ठी" के 477वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1969 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात 480वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें इस वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस मशहूर पार्श्वगायिका के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 5 सितम्बर, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 479 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 475वें अंक में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म "रानी रुपमती" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की गई थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - मध्यमाद सारंग अथवा मधुमाद सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – मुकेश। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया और शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 

अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की इक्कीसवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग शुद्ध सारंग का परिचय प्राप्त किया। कुछ विद्वान इस राग को कल्याण थाट का राग भी मानते हैं। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए पटियाला गायकी में दक्ष विदुषी कौशिकी चक्रवर्ती के स्वरों में राग सुद्ध सारंग की एक रचना प्रस्तुत की। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1964 में प्रदर्शित फिल्म "चाँदी की दीवार" से एन. दत्ता का संगीतबद्ध किया एक गीत "लागे तोसे नैन..."। गीत के स्वर तलत महमूद और आशा भोसले के हैं। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

Radio playback india 
Raga Shudh Sarang: SWARGOSHTHI - 477: RAG SHUDDH SARANG: August 30, 2020 



मंगलवार, 25 अगस्त 2020

ऑडियो: सम्वेदनाएँ (कन्हैयालाल पाण्डेय)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने कन्हैयालाल पाण्डेय के स्वर में उन्हीं की कहानी रानी माँ का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं कन्हैयालाल पाण्डेय की लघुकथा "सम्वेदनाएँ", जिसे स्वर दिया है, कन्हैयालाल पाण्डेय ने।

इस रचना का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 51 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कन्हैयालाल पाण्डेय
4 नवम्बर, 1954 को हरदोई में जन्म। भारतीय रेल यातायात सेवा (सेवानिवृत्त)। हिन्दी में छह साहित्यिक तथा दो संगीत पुस्तकों का लेखन। साहित्य व संगीत के क्षेत्र में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

"वे तो प्रेम का अनुपम भण्डार थीं।"
(कन्हैयालाल पाण्डेय की "सम्वेदनाएँ" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
सम्वेदनाएँ mp3

#Sixteenth Story: Samvedanaaen; Author: Kanhayalal Pandey; Voice: Kanhayalal Pandey; Hindi Audio Book/2020/16.

रविवार, 23 अगस्त 2020

राग मध्यमाद सारंग : SWARGOSHTHI – 476 : RAG MADHYAMAD SARANG : पण्डित जसराज को श्रद्धांजलि


अष्टछाप गायकी के संवाहक पण्डित जसराज को "रेडियो प्लेबैक इण्डिया" की भावभीनी श्रद्धांजलि 




स्वरगोष्ठी – 476 में आज 

काफी थाट के राग – 20 : राग मध्यमाद सारंग 

पण्डित जसराज से राग मध्यमाद सारंग में एक रागदारी संगीत की रचना और मुकेश से फिल्म का गीत सुनिए 





स्मृतशेष पण्डित जसराज

मुकेश 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की बीसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का भरे हुए हृदय से स्वागत करता हूँ। आज का यह अंक भारतीय संगीत के मूर्धन्य सितारे पण्डित जसराज की स्मृतियों को समर्पित है। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की उन्नीसवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग मध्यमाद सारंग अथवा मधुमाद सारंग का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग मध्यमाद सारंग अथवा मधुमाद सारंग का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वरों में राग मध्यमाद सारंग में निबद्ध भक्तकवि और संगीतज्ञ पं. परमानन्द दास रचित एक पद के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। इस राग के स्वरों का फिल्मी गीतों में भी काफी उपयोग किया गया है। राग मध्यमाद सारंग के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का भी हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म "रानी रूपमती" से भरत व्यास का लिखा और एस.एन. त्रिपाठी का स्वरबद्ध किया एक गीत "आ लौट के आ जा मेरे मीत..." सुनवा रहे हैं, जिसे मुकेश ने स्वर दिया है। 



राग मध्यमाद सारंग अथवा मधुमाद सारंग काफी थाट का राग माना जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वर वर्जित होता है। राग में निषाद स्वर कोमल और शेष लगने वाले स्वर शुद्ध होते हैं। मध्यमाद सारंग के आरोह में सा, रे, म, प, नि(कोमल), और सां तथा अवरोह में सां, नि(कोमल), प, म, रे और सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। आरोह और अवरोह में लगने वाले स्वरों की संख्या पाँच होने से यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है। राग का वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। इसरग के गायन अथवा वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का दूसरा प्रहर माना जाता है। इसके नाम से ज्ञात होता है कि यह राग सारंग का एक प्रकार है। इसमें कोमल निषाद व पंचम और पंचम व ऋषभ स्वर की संगति राग वाचक है। ऋषभ पर न्यास करते समय इस राग में वृन्दावनी सारंग की छाया आती है, इसलिए बीच-बीच में कोमल निषाद का आरोहात्मक प्रयोग किया जाता है। यह राग मेघ से भी काफी मिलता जुलता राग है। अन्तर इतना ही है कि राग मध्यमाद सारंग, सारंग अंग से और राग मेघ, मल्हार अंग से गाया जाता है। यह वृन्दावनी सारंग का छायालग राग भी कहलाता है। कुछ विद्वान इस राग को खमाज थाट का जन्य राग मानते हैं। "राग परिचय" ग्रन्थ के लेखक हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव इस राग को खमाज थाट का किन्तु संगीत कार्यालय, हाथरस से प्रकाशित वसन्त की पुस्तक "रागकोष" तथा कन्हैयालाल पाण्डेय की पुस्तक "सुर संवादिनी" में राग मध्यमाद सारंग को काफी थाट का राग माना गया है। गत सोमवार, 18 अगस्त 2020 को कृष्ण-भक्त जसराज 90 वर्ष की आयु में स्वर्गारोहण कर गए। उन्हें श्रीकृष्ण के चरणों में निश्चित रूप से स्थान मिलेगा। अब आप अपने युग के सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज के स्वर में ब्रज के भक्तकवि और संगीतज्ञ परमानन्द दास रचित श्रीराधाजी के पलना का एक पद राग मध्यमाद सारंग में निबद्ध एक रचना सुनिए, जिसके बोल हैं; "रसिकनी श्रीराधा पलना झूलै..."। 

राग मध्यमाद सारंग : "रसिकनी श्रीराधा पलना झूलै..." : पण्डित जसराज 


राग मध्यमाद सारंग अथवा मधुमाद सारंग पर आधारित एक फिल्मी गीत अब हम प्रस्तुत कर रहे हैं। इस फिल्म का प्रदर्शन 1959 में हुआ था। फिल्म के निर्देशन एस.एन. (श्रीनाथ) त्रिपाठी थे। इन्हीं त्रिपाठी जी ने ही फिल्म के गीतों का संगीत निर्देशन भी किया था। साथ ही फिल्म की पटकथा और संवाद के लिए भी वही उत्तदायी हैं। फिल्म के कथानक के अनुसार रूपमती मालवा के अन्तिम स्वाधीन अफगान सुलतान बाजबहादुर की प्रेयसी थी। बाजबहादुर और रूपमती के प्रेम कथानक को लेकर 1599 ईस्वी में अहमद-उल-उमरी ने फारसी में एक प्रेम काव्य कि रचना कि थी और मुगल काल के अनेकानेक सुप्रसिद्ध चित्रकारों ने उनकी घटनाओं पर कई भावपूर्ण सुन्दर चित्र बनाए थे। परन्तु इस इतिहासप्रसिद्ध प्रेमिका की जीवनी का कोई भी प्रामाणिक विवरण प्राप्य नहीं है। प्राप्य ऐतिहासिक आधारग्रन्थों में तद्विपयक उल्लेख अस्पष्ट या परस्पर विरोधी हैं। रूपमती को सारंगपुर की ब्राह्मण लिखा गया है। परन्तु नर्मदा घाटी में प्रचलित आख्यानों के अनुसार रूपमती धरमपुरी या टाण्डापुर की राजपूत कन्या थी, इनका मकबरा अवश्य ही सारंगपुर, मालवा में एक तालाब के बीच में बना हुआ है। यह तो सर्वस्वीकृत है कि रूपमती अपार सुन्दरी थी और वह गायन व वादन कला में अत्यन्त निपुण थी। बाजबहादुर स्वयं संगीत में निपुण था और गायकी कला में उस्ताद था। यह तो सर्वस्वीकृत है कि रूपमती अपार सुन्दरी थी; उसकी स्वरलहरी बहुत मधुर थी और वह गायन और वादन में पूर्ण निष्णात थी। बाजबहादुर भी संगीत में निपुण था और गायन में उस्ताद था। इन्हीं गुणों के कारण वह रूपमती कि ओर आकर्षित हुआ था और उनमें परस्पर अगाध प्रेम हो गया। उस समय मालवा में संगीत बहुत ही बढ़ी-चढ़ी थी; और अब तो बाजबहादुर और रूपमती दोनों ही उसकी उन्नति तथा साधना में ऐसे लीन हो गए कि जब अकबर के सेनानायक आदम खाँ के नेतृत्व में मुगल सेनाएँ मालवा पर चढ़ आई और सारंगपुर के पास तक जा पहुँची तभी उन्हें उनका पता लगा। अन्त में सन्‌ 1561 में सारंगपुर युद्ध में पराजित होकर बाजबहादुर को भागना पड़ा। तब रूपमती आदम खाँ कि बन्दिनी बनी। उसके रूप और संगीत से मुग्ध आदम खाँ ने जब रूपमती को अपनी प्रेयसी बनाना चाहा तब रूपमती ने विष खाकर बाजबहादुर के नाम पर जान दे दी और अपनी प्रेमकहानी को अमर कर दिया। रूपमती द्वारा रचित अनेक गीत और पद्य जनसाधारण में तब से प्रचलित हैं तथा अब तक मालवा के कई भागों में लोकगीतों   के रूप में गाए जाते हैं। फिल्म "रानी रूपमती" में रूपमती की भूमिका निरूपा राय ने और बाज बहादुर की भूमिका भारत भूषण ने निभाई थी। फिल्म का यह गीत मुकेश के स्वर में है जिसे परदे पर बाजबहादुर पर फिल्माया गया है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म "रानी रूपमती" के गीतकार भरत व्यास और संगीतकार एस.एन. त्रिपाठी हैं। इस गीत को त्रिपाठी जी ने राग मध्यमाद सारंग, कहरवा ताल में निबद्ध किया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग म्ध्यमाद सारंग : "आ लौट के आ जा मेरे मीत..." : मुकेश : फिल्म - रानी रूपमती 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 476वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1964 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात 480वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का स्पर्श है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किन युगल पार्श्वगायकों के स्वर है? 

आपसे अपेक्षा की जाती है कि आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 29 अगस्त, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 478 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 474वें अंक में हमने आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म "हम दोनों" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - धानी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की बीसवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग मध्यमाद अथवा मधुमाद सारंग का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ स्मृतिशेष पण्डित जसराज के स्वरों में राग मध्यमाद सारंग में अष्टछाप गायकी की एक शास्त्रीय रचना के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराया। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म "रानी रूपमती" से एस.एन. त्रिपाठी का संगीतबद्ध किया एक गीत "आ लौट के आ जा मेरे मीत..." प्रस्तुत किया। गीत के स्वर मुकेश के हैं। 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया
 राग मध्यमाद सारंग : SWARGOSHTHI – 476 : RAG MADHYAMAD SARANG : 23 अगस्त, 2020 





मंगलवार, 18 अगस्त 2020

ऑडियो: रानी माँ (कन्हैयालाल पाण्डेय)

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछली बार आपने शीतल माहेश्वरी के स्वर में साधना वैद की कहानी बोझ का पॉडकास्ट सुना था। आवाज़ की ओर से आज हम लेकर आये हैं कन्हैयालाल पाण्डेय की लघुकथा "रानी माँ", जिसे स्वर दिया है, कन्हैयालाल पाण्डेय ने।

इस रचना का कुल प्रसारण समय 3 मिनट 42 सेकण्ड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानी, उपन्यास, नाटक, धारावाहिक, प्रहसन, झलकी, एकांकी, या लघुकथा को स्वर देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

कन्हैयालाल पाण्डेय
4 नवम्बर, 1954 को हरदोई में जन्म। भारतीय रेल यातायात सेवा (सेवानिवृत्त)। हिन्दी में छह साहित्यिक तथा दो संगीत पुस्तकों का लेखन। साहित्य व संगीत के क्षेत्र में अनेक पुरस्कारों से सम्मानित

हर सप्ताह यहीं पर सुनिए एक नयी कहानी

सासु माँ कहतीं, "दुलहिन से पूछ लो।"
(कन्हैयालाल पाण्डेय की "रानी माँ" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.
(प्लेयर पर एक बार क्लिक करें, कंट्रोल सक्रिय करें फ़िर 'प्ले' पर क्लिक करें।)


यदि आप इस पॉडकास्ट को नहीं सुन पा रहे हैं तो नीचे दिये गये लिंक से डाउनलोड कर लें:
रानी माँ mp3

#Fifteenth Story: Raani Maan; Author: Kanhayalal Pandey; Voice: Kanhayalal Pandey; Hindi Audio Book/2020/15.

रविवार, 16 अगस्त 2020

राग धानी : SWARGOSHTHI – 475 : RAG DHANI







स्वरगोष्ठी – 475 में आज 

काफी थाट के राग – 19 : राग धानी 

पण्डित जीतेन्द्र अभिषेकी से राग धानी में एक शास्त्रीय रचना और लता मंगेशकर से फिल्म का गीत सुनिए 







जितेन्द्र अभिषेकी 


लता मंगेशकर 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की उन्नीसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की उन्नीसवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग धानी का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए औड़व-औड़व जाति के राग धानी का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जीतेन्द्र अभिषेकी के स्वरों में धानी की एक रचना के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। इस राग के स्वरों का फिल्मी गीतों में काफी उपयोग किया गया है। राग धानी के स्वरों पर आधारित एक फिल्मी गीत का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म "हम दोनो" से साहिर लुधियानवी का लिखा और जयदेव का स्वरबद्ध किया एक गीत "प्रभु तेरो नाम जो ध्याए फल पाए..." सुनवा रहे हैं, जिसे लता मंगेशकर ने स्वर दिया है। 



राग धानी को काफी थाट का जन्य राग माना जाता है। इस राग में गान्धार और निषाद स्वर कोमल रूप में प्रयोग किया जाता है। राग में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है। राग धानी औड़व-औड़व जाति का राग होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह के स्वर हैं; सा, ग(कोमल), म, प, नि(कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर है; सां, नि(कोमल), प, म, ग(कोमल), सा। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। राग के गायन अथवा वादन का सर्वाधिक उपयुक्त समय दिन का तीसरा प्रहर माना जाता है। कुछ विद्वानों के मतानुसार राग धानी सार्वकालिक राग है। अब हम आपको सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित जीतेन्द्र अभिषेकी से राग धानी, द्रुत तीनताल में निबद्ध एक शास्त्रीय रचना सुनवा रहे हैं। 

राग धानी : तराना युक्त द्रुत तीनताल की रचना : पण्डित जीतेन्द्र अभिषेकी 


औड़व-औड़व जाति के राग धानी में कई फिल्मी गीत को आधार दिया जा चुका है। आज हम आपको साहिर लुधियानवी का लिखा, जयदेव का संगीतबद्ध किया, 1961 में प्रदर्शित फिल्म "हम दोनों" से राग धानी पर आधारित गीत; "प्रभु तेरो नाम जो ध्याये फल पाए..." प्रस्तुत कर रहे हैं। इस फिल्म और गीत के विषय में फिल्म संगीत के सुप्रसिद्ध इतिहासकार और मेरे सहयोगी सुजॉय चटर्जी लिखते है; 

"फ़िल्म ’हम दोनो’ में दो भजन हैं – “अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम” और “प्रभु तेरो नाम”। “अल्लाह तेरो नाम” भजन अगर गम्भीर, स्थिर और शान्त प्रकृति का है, तो “प्रभु तेरो नाम” में भावनाओं की तीव्रता है। मुखड़े के बोलों से दोनो भजन एक जैसा लग सकता है, पर सुनने पर पता चलता है कि जयदेव जी ने दोनों के संगीत को एक दूसरे से किस प्रकार अलग रखा है। “प्रभु तेरो नाम” में जयदेव जी ने सुरों की जो जटिल गुंथाई की है, वो हर संगीतकार के बस की बात नहीं है। "जीवन धन मिल जाए, मिल जाए”, इस पंक्ति में जब लता जी दूसरी बार “मिल जाए” गाती हैं, उसके गाने के तरीके को सुन कर ही अंदज़ा लग जाता है कि जयदेव जी किस स्तर के संगीतकार रहे हैं। अगर किसी ने यह फ़िल्म नहीं देख रखी हो तो गीत की पंक्तियों के बीच में होने वाली शोर को सुन कर उन्हें यह ग़लतफ़हमी हो सकती है कि रिकॉर्डिंग् में कोई गड़बड़ी हुई होगी, पर हक़ीक़त में उन दृश्यों में आकाश में उड़ते युद्ध विमानों को दिखाया जाता है और ये उसी का शोर है।" 

गीतकार और संगीतकार के इसी दल ने 1963 में प्रदर्शित फिल्म "मुझे जीने दो" में राग धानी पर ही आधारित गीत; "रात भी है कुछ भीगी भीगी..." तैयार किया था। इसके अलावा शंकर जयकिशन का स्वरबद्ध किया 1969 में प्रदर्शित फिल्म "प्रिंस" का गीत; "बदन पे सितारे लपेटे हुए..." और सरदार मालिक का स्वरबद्ध किया 1963 में प्रदर्शित फिल्म "बचपन" का गीत; "तेरे हम ओ सनम..." भी राग धानी पर आधारित हैं। अब आप फिल्म "हम दोनों" से राग धानी में निबद्ध गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 

राग धानी : "प्रभु तेरो नाम..." : लता मंगेशकर : फिल्म - हम दोनों 




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 475वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1959 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात 480वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा। 





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है? 

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए। 

3 – इस गीत में किस विख्यात पार्श्वगायक के स्वर है? 

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 22 अगस्त, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 477 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। 


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 473वें अंक में हमने आपको 1979 में प्रदर्शित फिल्म "मीरा" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - मीरा मल्हार (श्री कन्हैयालाल पाण्डेय के अनुसार मियाँ मल्हार), दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – वाणी जयराम। 

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। इस सप्ताह एक दुःखद सूचना है। हमारी नियमित पाठक और नियमित रूप से पहेली का उत्तर देने वाली हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी एक दुर्घटना में घायल हो गईं हैं। उनकी हैदराबाद के एक चिकित्सालय में उपचार जारी है। हम ईश्वर से उनके शीघ्र स्वास्थ्यलाभ की प्रार्थना करते हैं। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं। 


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ। 


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की उन्नीसवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग धानी का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जितेन्द्र अभिषेकी के स्वरों में राग मीरा मल्हार की एक शास्त्रीय रचना के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराया। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1961 में प्रदर्शित फिल्म "हम दोनों" से जयदेव का संगीतबद्ध किया एक गीत "प्रभु तेरो नाम..." प्रस्तुत किया। गीत के स्वर लता मंगेशकर के हैं। 

आपके प्रिय स्तम्भ "स्वरगोष्ठी" के सम्पादक और प्रस्तुतकर्त्ता से गत सप्ताह आकाशवाणी और दूरदर्शन, लखनऊ में स्क्रिप्ट राइटर और प्रस्तुतकर्त्ता के रूप में कार्य कर चुकी तथा दूरदर्शन मुख्यालय से उपनिदेशक के रूप में सेवानिवृत्त सुश्री नीलम चतुर्वेदी ने बातचीत की थी। इसमें 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' और सम्पादन कार्य के बारे में बातचीत की है। कृपया इसे सुनें और अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएँ। इस लिंक को क्लिक करके आप इसे सुन सकते हैं। 

 

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे। 

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग धानी : SWARGOSHTHI – 475 : RAG DHANI : 16 अगस्त, 2020 




रविवार, 9 अगस्त 2020

राग मीरा अथवा मीराबाई की मल्हार : SWARGOSHTHI – 474 : RAG MIRA OR MIRABAI KI MALHAR





स्वरगोष्ठी – 474 में आज

काफी थाट के राग – 18 : राग मीरा अथवा मीराबाई की मल्हार

पण्डित अजय चक्रवर्ती से राग मीरा मल्हार में एक रचना और वाणी जयराम से फिल्म का गीत सुनिए




पण्डित अजय चक्रवर्ती 
वाणी जयराम 
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की अठारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की अठारहवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग मीरा अथवा मीराबाई की मल्हार का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए सम्पूर्ण जाति के राग मीरा अथवा मीराबाई की मल्हार का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग मीरा अथवा मीराबाई की मल्हार की एक रचना के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। इस राग के स्वरों का फिल्मी गीतों में बहुत कम उपयोग किया गया है। राग मीरा अथवा मीराबाई की मल्हार के स्वरों में एक फिल्मी गीत के रूप में प्रयोग का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1979 में प्रदर्शित फिल्म "मीरा" से पण्डित रविशंकर का स्वरबद्ध किया एक गीत "मैं बादल देख डरी..." सुनवा रहे हैं, जिसे वाणी जयराम ने स्वर दिया है।



राग मीरा मल्हार या मीराबाई की मल्हार काफी थाट का जन्य राग माना जाता है। आज की कड़ी में हम मल्हार अंग के राग मीराबाई की मल्हार के स्वरों से अनुगूँजित कुछ संगीत रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इनका नामकरण भक्ति संगीत के विदुषी मीराबाई के नाम पर हुआ है। राग मीराबाई की मल्हार, मल्हार अंग का राग है। यह माना जाता है कि इस राग की रचना सुप्रसिद्ध भक्त कवयित्री मीराबाई ने की थी। यह काफी थाट का सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इस राग के आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। राग मीरा मल्हार में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के दोनों रूप (शुद्ध और कोमल) प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज प्रयोग किये जाते हैं। राग मीरा अथवा मीराबाई की मल्हार और पिछली कड़ी में वर्णित राग रामदासी मल्हार में थाट, जाति, वादी और संवादी स्वर समान होते हैं। आरोह और अवरोह के स्वर भी लगभग समान होते हैं। केवल कोमल धैवत स्वर का अन्तर होता है। राग रामदासी मल्हार में केवल शुद्ध धैवत का प्रयोग होता है, जबकि राग मीरा मल्हार में दोनों धैवत का प्रयोग किया जाता है। आमतौर पर राग मीरा मल्हार के गायन या वादन का उपयुक्त समय मध्यरात्रि होता है; किन्तु वर्षा ऋतु में इसे किसी भी समय गाया या बजाया जा सकता है। राग के शास्त्रीय स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम सुप्रसिद्ध संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वर में राग मीराबाई की मल्हार, तीनताल में निबद्ध एक रचना सुनवा रहे हैं।

राग मीरा अथवा मीराबाई की मल्हार : "जगज्जननी माता चण्डी..." : पण्डित अजय चक्रवर्ती


राग के नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि इनका नामकरण भक्ति संगीत की विदुषी मीराबाई के नाम पर हुआ है। उपलब्ध ग्रन्थों के अनुसार राग मीराबाई की मल्हार, काफी थाट का मल्हार अंग का राग है। आमतौर पर राग मीरा मल्हार का गायन अथवा वादन का समय मध्यरात्रि माना जाता है; किन्तु वर्षा ऋतु में इसे किसी भी समय गाया या बजाया जा सकता है। राग के फिल्मी स्वरूप का अनुभव कराने के लिए अब हम आपको 1979 में प्रदर्शित गुलज़ार की फिल्म "मीरा" से मीराबाई का ही एक पद सुनवा रहे हैं। यह गीत ही नहीं, बल्कि इस राग की संरचना भी स्वयं भक्त कवयित्री मीराबाई की है। फिल्म ‘मीरा’ के संगीत पर मैं अपने प्रिय मित्र और फिल्म संगीत के सुपरिचित मित्र और फिल्म संगीत के इतिहासकार सुजॉय चटर्जी के आलेख का एक अंश उद्धृत कर रहा हूँ।

गीतकार गुलज़ार को मीरा के जीवन पर एक फिल्म बनाने का प्रस्ताव मिला। मीराबाई की मुख्य भूमिका में अभिनेत्री हेमामालिनी का और संगीत निर्देशन के लिए लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का चुनाव पहले ही हो चुका था। फ़िल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो जाने के बाद गुलज़ार ने सिटिंग रखी फ़िल्म के संगीतकार लक्ष्मी-प्यारे के साथ। मीराबाई के बेसुमार पदों में से अन्त में कुल 12 भजन छाँट लिए गये जो फ़िल्म में रखे जाने थे। फ़िल्म के निर्माता ने व्यावसायिक पत्रिकाओं में विज्ञापन प्रकाशित कर दिया; 'आज की मीरा' (लता मंगेशकर) मुहूर्त शॉट में क्लैप करेंगी। गुलज़ार ने पहला भजन "मेरे तो गिरधर गोपाल..." को सबसे पहले फिल्माने की तैयारी भी कर ली थी। लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने भजन कम्पोज़ किया और लता जी से सम्पर्क किया रेकॉर्डिंग के लिए। लक्ष्मी-प्यारे जानते थे कि लता जी इंकार नहीं करेंगी। पर उनके सर पे बिजली आ गिरी जब लता जी ने इसे गाने से इन्कार कर दिया। लता जी के अनुसार अभी हाल ही में उन्होंने अपने भाई हृदयनाथ मंगेशकर के लिए मीरा भजनों का एक ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम रेकॉर्ड किया है, इसलिए दोबारा किसी कमर्शियल फ़िल्म के लिए वही भजन नहीं गा सकती। लता जी किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहती थीं। मसला इतना नाज़ुक था कि ना तो गुलज़ार लता जी से इस पर बहस कर सकते थे और लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल का तो सवाल ही नहीं था। लता जी के ना कहने पर लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल ने भी संगीत देने से मना कर दिया। उन्हे लगा कि कहीं लता जी उनसे नाराज़ हो गईं और भविष्य में उनके गीत गाने से मना कर देंगी तो वो बरबाद हो जायेंगे। ख़ैर, लता जी के पीछे हट जाने के बाद गुलज़ार ने आशा भोसले से अनुरोध किया। पर आशा जी ने भी यह कहते हुए मना कर दिया कि 'जहाँ देवता ने पाँव रखे हों, वहाँ फिर मनुष्य पाँव नहीं रखते'। अब 'मीरा' की टीम डर गई। न लता है, न आशा, न एल.पी.। गुलज़ार अगर चाहते तो पंचम को संगीतकार बनने के लिए अनुरोध कर सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। लता और आशा के गुलज़ार को मना करने पर पंचम वैसे ही शर्मिन्दा थे, गुलज़ार उन्हें और ज़्यादा शर्मिन्दा नहीं करना चाहते थे। और इस तरह से लता, आशा, एल.पी, पंचम, ये दिग्गज इस फ़िल्म से बहुत दूर हो गये। गुलज़ार ने हार नहीं मानी और सोचने लगे कि ऐसा कौन संगीतकार है जो अपने संगीत के दम पर लता और आशा के बिना भी फ़िल्म के गीतों को सही न्याय और स्तर दिला सकता है; और तभी उन्हें पण्डित रविशंकर का नाम याद आया। पण्डित जी उस समय न्यूयॉर्क में थे। उनसे फोन पर सम्पर्क करने पर उन्होंने बताया कि वो सितम्बर या अक्तूबर में भारत आएँगे और आने के बाद स्क्रिप्ट पढ़ कर अपना फ़ैसला सुनायेंगे। वह जून का महीना था और गुलज़ार इतने दिनों तक इन्तज़ार नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने अमरीका का टिकट कटवाया और पहुँच गये पण्डित जी के पास। यह गुलज़ार साहब की पहली अमरीका यात्रा थी। पण्डित जी को स्क्रिप्ट पसन्द आई, पर उस पर काम वो सितम्बर से ही शुरू कर पायेंगे, ऐसा उन्होंने कहा। लेकिन गुलज़ार साहब के फिर से अनुरोध करने पर वो अमरीका में रहते हुए ही धुनों पर काम करने को तैयार हो गये। अभी भी पण्डित जी को थोड़ी सी हिचकिचाहट थी क्योंकि उन्होंने भी लता मंगेशकर वाले विवाद की चर्चा सुनी थी। संयोग से जब गुलज़ार पण्डित जी से मिलने अमरीका गये, उन दिनों लता जी भी वहीं थीं। गुलज़ार साहब और पण्डित जी ने लता जी को फ़ोन किया और उन्हें सब कुछ बताया तो लता जी ने उनसे कहा कि उन्हें फ़िल्म 'मीरा' के बनने से कोई परेशानी नहीं है, बस वो ख़ुद इसमें शामिल नहीं होना चाहती। अब इसके बाद पण्डित जी के सामने अगला सवाल था कि कौन सी गायिका इन भजनों को गाने वाली हैं? गुलज़ार के मन में वाणी जयराम का नाम था, पर वो पण्डित जी से यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे थे, यह सोच कर कि वो कैसे रिऐक्ट करेंगे वाणी जयराम का नाम सुन कर। इसलिए गुलज़ार साहब ने ही पण्डित जी से गायिका चुनने को कहा। और पण्डित जी का जवाब था, "वाणी जयराम कैसी रहेगी?"

पण्डित रविशंकर ने, "बाला मैं बैरागन हो‍ऊँगी..." को सबसे पहले कम्पोज़ किया। गुलजार साहब के अनुसार यह इस फिल्म का सबसे बेहतरीन भजन है। कहते हैं कि "एरी मैं तो प्रेम दीवानी..." कम्पोज़ करते समय पण्डित जी ने कहा था; जो ट्यून रोशन साहब ने बनायी है 'नौबहार' में, वह दिमाग़ से नहीं जाती। लेकिन मैं अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करूँगा कि कुछ अलग हट कर बनाऊँ। पर जिस भजन के लिए वाणी जयराम को पुरस्कार मिला था वह था; "मेरे तो गिरधर गोपाल..."। सितम्बर में भारत वापस आने के बाद पण्डित जी ने 'मीरा' के सभी 12 भजन एक के बाद एक 9 दिनों के अन्दर वाणी जयराम कि आवाज़ में रेकॉर्ड कर लिए। पण्डित जी ने सुबह 9 से रात 9 बजे तक काम करते हुए पूरे अनुशासन के साथ कार्य को समय पर सम्पन्न किया। एक दिन ऐसा हुआ कि पण्डित जी बहुत ही थके हुए से दिख रहे थे। गुलज़ार साहब के पूछने पर उन्होंने बताया कि अगले दिन वो दोपहर 2 बजे से काम शुरू करेंगे। यह कह कर वो निकल गये। अगले दिन पण्डित जी 2 बजे आये, बिल्कुल तरो-ताज़ा दिख रहे थे। जब गुलज़ार साहब ने उनसे इस बात का जिक्र किया तो पण्डित जी ने कहा कि अब वो बहुत ज़्यादा बेहतर महसूस कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने लगातार 8 घंटे अपना सितार बजाया है; सुबह 4 बजे से बैठ कर। पहले वो इसलिए थके हुए से लग रहे थे क्योंकि कई दिनों से उन्हे अपने सितार को छूने का मौका नहीं मिल पाया था। इस तरह से 'मीरा' के गानें बने। आइए, अब हम आपको इसी फिल्म का एक गीत (मीराबाई का पद) सुनवाते हैं, जिसे कुछ विद्वानों के अनुसार राग मीराबाई कि मल्हार में पिरोया गया है और वाणी जयराम ने स्वर दिया है। "हिन्दी सिने राग इन्साक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय (कन्हैयालाल पाण्डेय) ने इस गीत को राग मियाँ कि मल्हार पर आधारित माना है। संगीत पण्डित रविशंकर का है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग मीरा अथवा मीराबाई की मल्हार : "बादल देख डरी..." : वाणी जयराम : फिल्म - मीरा




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 474वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1961 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात 480वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग का आधार है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस विख्यात पार्श्वगायिका के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से कम से कम किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 15 अगस्त, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 476 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 472वें अंक में हमने आपको 1976 में प्रदर्शित फिल्म "शक" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – दादरा तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – आशा भोसले

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद

मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की अठारहवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग मीरा मल्हार का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित अजय चक्रवर्ती के स्वरों में राग मीरा मल्हार की एक खयाल रचना के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराया। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1979 में प्रदर्शित फिल्म "मीरा" से पण्डित रविशंकर का स्वरबद्ध किया एक गीत "मैं बादल देख डरी..." प्रस्तुत किया। गीत के स्वर वाणी जयराम के हैं।

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग मीरा अथवा मीराबाई की मल्हार : SWARGOSHTHI – 474 : RAG MIRA OR MIRABAI KI MALHAR : 9 अगस्त, 2020




रविवार, 2 अगस्त 2020

राग जयन्ती मल्हार : SWARGOSHTHI – 473 : RAG JAYANTI MALHAR






स्वरगोष्ठी – 473 में आज

काफी थाट के राग – 17 : राग जयन्त अथवा जयन्ती मल्हार

पण्डित विनायक राव पटवर्धन से राग जयन्ती मल्हार में खयाल और आशा भोसले से फिल्मी गीत सुनिए




पण्डित विनायक राव पटवर्धन 
आशा  भोसले
“रेडियो प्लेबैक इण्डिया” के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला “काफी थाट के राग” की सत्रहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। भारतीय संगीत के अन्तर्गत आने वाले रागों का वर्गीकरण करने के लिए मेल अथवा थाट व्यवस्था है। भारतीय संगीत में सात शुद्ध, चार कोमल और एक तीव्र अर्थात कुल बारह स्वरों का प्रयोग होता है। एक राग की रचना के लिए इन बारह स्वरों में से कम से कम पाँच का होना आवश्यक होता है। संगीत में थाट रागों के वर्गीकरण की पद्धति है। सप्तक के बारह में से मुख्य सात स्वरों के क्रमानुसार उस समुदाय को थाट कहते हैं, जिससे राग उत्पन्न होते हों। थाट को मेल भी कहा जाता है। दक्षिण भारतीय संगीत पद्धति में 72 मेल प्रचलित हैं, जबकि उत्तर भारतीय संगीत पद्धति में 10 थाट का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रचलन पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी ने प्रारम्भ किया था। वर्तमान समय में रागों के वर्गीकरण के लिए यही पद्धति प्रचलित है। भातखण्डे जी द्वारा प्रचलित ये दस थाट हैं; कल्याण, बिलावल, खमाज, भैरव, पूर्वी, मारवा, काफी, आसावरी, तोड़ी और भैरवी। इन सभी प्रचलित और अप्रचलित रागों को इन्हीं दस थाट के अन्तर्गत सम्मिलित किया गया है। भारतीय संगीत में थाट स्वरों के उस समूह को कहते हैं जिससे रागों का वर्गीकरण किया जा सकता है। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में 'राग तरंगिणी’ ग्रन्थ के लेखक लोचन कवि ने रागों के वर्गीकरण की परम्परागत 'ग्राम और मूर्छना प्रणाली’ का परिमार्जन कर मेल अथवा थाट प्रणाली की स्थापना की। लोचन कवि के अनुसार उस समय सोलह हज़ार राग प्रचलित थे। इनमें 36 मुख्य राग थे। सत्रहवीं शताब्दी में थाट के अन्तर्गत रागों का वर्गीकरण प्रचलित हो चुका था। थाट प्रणाली का उल्लेख सत्रहवीं शताब्दी के ‘संगीत पारिजात’ और ‘राग विबोध’ नामक ग्रन्थों में भी किया गया है। लोचन द्वारा प्रतिपादित थाट प्रणाली का प्रयोग लगभग तीन सौ वर्षों तक होता रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम और बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशकों में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे ने भारतीय संगीत के बिखरे सूत्रों को न केवल संकलित किया बल्कि संगीत के कई सिद्धान्तों का परिमार्जन भी किया। भातखण्डे जी द्वारा निर्धारित दस थाट में से सातवाँ थाट काफी है। इस श्रृंखला में हम काफी थाट के रागों पर क्रमशः चर्चा कर रहे हैं। प्रत्येक थाट का एक आश्रय अथवा जनक राग होता है और शेष जन्य राग कहलाते हैं। आपके लिए इस श्रृंखला में हम काफी थाट के जनक और जन्य रागों पर चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की सत्रहवीं कड़ी में आज हमने काफी थाट के राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार का चयन किया है। श्रृंखला की इस कड़ी में आज हम आपके लिए वक्र सम्पूर्ण जाति के राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार का परिचय प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही स्वनामधन्य संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन के स्वरों में राग जयन्ती मल्हार की एक खयाल रचना के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन करा रहे हैं। इस राग के स्वरों का फिल्मी गीतों में बहुत कम उपयोग किया गया है। राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार के स्वरों में एक फिल्मी गीत के रूप में प्रयोग का हमने चयन किया है। आज की कड़ी में हम आपको 1976 में प्रदर्शित फिल्म "शक" से वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया एक गीत "मेहा बरसने लगा है आज की रात...", पार्श्वगायिका आशा भोसले के स्वर में सुनवा रहे हैं।



राग जयन्त मल्हार अथवा जयन्ती मल्हार के बारे में पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे जी के ग्रन्थ "क्रमिक पुस्तक मालिका" में कोई विवरण नहीं मिलता। आपके लिए हमने इस राग का विवरण हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव की पुस्तक "राग परिचय" के चौथे भाग से लिया है। यह काफी थाट का राग माना जाता है। इसमें दोनों गान्धार और दोनों निषाद का प्रयोग होता है। इसका वादी ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। राग के आरोह के स्वर हैं; सा, म रे प, म प नि (कोमल) ध नि सां, तथा अवरोह के स्वर हैं; सां ध नि (कोमल) म प, प म ग रे ग (कोमल) रे सा, निसा, ध नि (कोमल) रे, सा। इसराज और मयूरवीणा के सुप्रसिद्ध वादक और संगीतज्ञ पण्डित श्रीकुमार मिश्र के अनुसार राग जयन्त मल्हार अथवा जयन्ती मल्हार दो रागों; जयजयवन्ती और मल्हार का सुन्दर मिश्रण है। पूर्वांग में जयजयवन्ती का करुण व विनयपूर्ण भक्तिभाव परिलक्षित होता है, जबकि उत्तरांग में मियाँ की मल्हार, वर्षा के तरल भावों के साथ समर्पित, पुकारयुक्त व आनन्द से परिपूर्ण भावों का सृजन करने में सक्षम होता है। इस राग में मध्यलय की रचनाएँ अच्छी लगती हैं। आपको सुनवाने के लिए हमने राग जयन्त मल्हार की एक प्राचीन किन्तु मोहक बन्दिश का चयन किया है। अपने समय के बहुआयामी संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन ने इस रचना को स्वर दिया है। पण्डित पटवर्धन ने न केवल रागदारी संगीत के क्षेत्र में, बल्कि सवाक फिल्मों के प्रारम्भिक दौर में अपना अनमोल योगदान किया था। लीजिए, राग जयन्त मल्हार की तीनताल में निबद्ध यह बन्दिश आप सुनिए।

राग जयन्त मल्हार : "ऋतु आई सावन की..." : पण्डित विनायक राव पटवर्धन


वर्षा ऋतु में गाने और बजाने वाले रागों में जयन्त मल्हार अथवा जयन्ती मल्हार एक कम प्रचलित राग है। राग के नाम से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि यह राग जयजयवन्ती और मल्हार अंग के मेल से बनता है। वैसे राग जयजयवन्ती स्वतंत्र रूप से भी वर्षा ऋतु के परिवेश को रचने में समर्थ है। परन्तु जब राग जयजयवन्ती के साथ मल्हार अंग का मेल हो जाता है तब इस राग से अनुभूति और अधिक मुखर हो जाती है। आज हम राग जयन्त मल्हार पर आधारित एक मोहक फिल्मी गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। यह गीत 1976 में प्रदर्शित फिल्म ‘शक’ से लिया गया है। विकास देसाई और अरुणा राजे द्वारा निर्देशित इस फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे। बसन्त देसाई ने मल्हार अंग के रागों पर आधारित सर्वाधिक गीतों की रचना की थी। इस श्रृंखला में बसन्त देसाई द्वारा संगीतबद्ध किया यह दूसरा गीत है। ‘शक’ जिस दौर की फिल्म है, उस अवधि में बसन्त देसाई का रुझान फिल्म संगीत से हट कर शिक्षण संस्थाओं में संगीत के प्रचार-प्रसार की ओर अधिक हो गया था। फिल्म संगीत की प्रवृत्ति बदल रही थी। परन्तु बसन्त देसाई ने बदले हुए दौर में भी अपने संगीत में रागों का आधार नहीं छोड़ा। फिल्म ‘शक’ उनकी अन्तिम फिल्म साबित हुई। फिल्म के प्रदर्शित होने से पहले ही एक लिफ्ट दुर्घटना में उनका असामयिक निधन हो गया। राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार के स्वरों पर आधारित फिल्म ‘शक’ का जो गीत हम सुनवाने जा रहे हैं, उसके गीतकार हैं गुलज़ार और इस गीत को स्वर दिया है आशा भोसले ने। "हिन्दी सिने राग इन्साक्लोपीडिया" के लेखक के.एल. पाण्डेय (कन्हैयालाल पाण्डेय) ने भी इस गीत को स्पष्ट रूप से राग जयन्ती मल्हार पर आधारित गीत माना है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग जयन्ती मल्हार : "मेहा बरसने लगा है..." : आशा भोसले : फिल्म - शक




संगीत पहेली

"स्वरगोष्ठी" के 473वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1979 में प्रदर्शित एक फिल्म के राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के सही उत्तर देना आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। श्रृंखला के तीसरे सत्र अर्थात 480वें अंक की पहेली का उत्तर प्राप्त होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे उन्हें वर्ष के तृतीय सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 - इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia9@gmail.com पर ही शनिवार 8 अगस्त, 2020 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। फेसबुक पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेताओं के नाम हम उनके शहर/ग्राम, प्रदेश और देश के नाम के साथ “स्वरगोष्ठी” के अंक संख्या 475 में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत, संगीत या कलाकार के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के सही उत्तर और विजेता

“स्वरगोष्ठी” के 471वें अंक में हमने आपको 1967 में प्रदर्शित फिल्म "रामराज्य" के एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से कम से कम दो सही उत्तरों की अपेक्षा की थी। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग - सूर मल्हार दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – तीनताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – लता मंगेशकर

‘स्वरगोष्ठी’ की इस पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे विजेता हैं; वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, अहमदाबाद, गुजरात से मुकेश लाडिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों में से प्रत्येक को दो-दो अंक मिलते हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आप सभी को हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ईमेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नए प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक उत्तर भी ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


संवाद


मित्रों, इन दिनों हम सब भारतवासी, प्रत्येक नागरिक को कोरोना वायरस से मुक्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब हम काफी हद तक हम सफल भी हुए हैं। परन्तु अभी भी हमें पर्याप्त सतर्कता बरतनी है। विश्वास कीजिए, हमारे इस सतर्कता अभियान से कोरोना वायरस पराजित होगा। आप सब से अनुरोध है कि प्रत्येक स्थिति में चिकित्सकीय और शासकीय निर्देशों का पालन करें और अपने घर में सुरक्षित रहें। इस बीच शास्त्रीय संगीत का श्रवण करें और अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक व्याधियों से स्वयं को मुक्त रखें। विद्वानों ने इसे “नाद योग पद्धति” कहा है। “स्वरगोष्ठी” की नई-पुरानी श्रृंखलाएँ सुने और पढ़ें। साथ ही अपनी प्रतिक्रिया से हमें अवगत भी कराएँ।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी हमारी नई श्रृंखला “काफी थाट के राग” की सत्रहवीं कड़ी में आज आपने काफी थाट के जन्य राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार का परिचय प्राप्त किया। राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित विनायक राव पटवर्धन के स्वरों में राग जयन्ती अथवा जयन्त मल्हार की एक खयाल रचना के माध्यम से राग के शास्त्रीय स्वरूप का दर्शन कराया। इसके साथ ही “स्वरगोष्ठी” की परम्परा के अनुसार आज की कड़ी में हमने आपको 1976 में प्रदर्शित फिल्म "शक" से वसन्त देसाई का स्वरबद्ध किया एक गीत "मेहा बरसने लगा है आज की रात..." प्रस्तुत किया। गीत के स्वर आशा भोसले के हैं।

कुछ तकनीकी समस्या के कारण हम अपने फेसबुक के मित्र समूह पर “स्वरगोष्ठी” का लिंक साझा नहीं कर पा रहे हैं। सभी संगीत अनुरागियों से अनुरोध है कि हमारी वेबसाइट http://radioplaybackindia.com अथवा http://radioplaybackindia.blogspot.com पर क्लिक करके हमारे सभी साप्ताहिक स्तम्भों का अवलोकन करते रहें। “स्वरगोष्ठी” के वेब पेज के दाहिनी ओर निर्धारित स्थान पर अपना ई-मेल आईडी अंकित कर आप हमारे सभी पोस्ट को नियमित रूप से अपने ई-मेल पर प्राप्त कर सकते है। “स्वरगोष्ठी” की पिछली कड़ियों के बारे में हमें अनेक पाठकों की प्रतिक्रिया लगातार मिल रही है। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेंगे। आज के इस अंक अथवा श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia9@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः सात बजे “स्वरगोष्ठी” के इसी मंच पर हम एक बार फिर संगीत के सभी अनुरागियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 
राग जयन्ती मल्हार : SWARGOSHTHI – 473 : RAG JAYANTI MALHAR : 2 अगस्त, 2020



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