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Friday, April 3, 2009

रामराज्य बापू का सपना, इस धरती पर लाओ राम

रामनवमी पर सुनिए अमीर खुसरो, कबीर, तुलसी और राकू को

वैष्णव हिन्दू हर वर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को अपने भगवान श्रीराम के जन्मदिवस का त्योहार मनाते हैं। वर्ष २००९ में यह तिथि ३ अप्रैल को आयी है, इस दिवस पर रामनवमी नाम का त्यौहार मनाया जाता है। पुराण-कथाओं के अनुसार श्री राम को विष्णु का सातवाँ अवतार माना जाता हैं। मान्यता है कि तीनों लोकों में धर्म की स्थापना के लिए ब्रह्म, विष्णु और महेश (शिव) नामक तीन तंत्र हैं और इनके काउँटरपार्टों की भी संकल्पना की गई है।

रामनवमी का त्योहार इस बात की याद दिलाता है कि मनुष्य को धर्म में आस्था कभी नहीं छोड़नी चाहिए। अधर्म कितना भी अपना अंधकार फैला ले, भगवान देर ही सही अभय प्रकाश लेकर ज़रूर अवतरित होते हैं। रामायण की कथा में महर्षि वाल्मिकी लिखते हैं कि अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्‍नियाँ होने के बावज़ूद उन्हें कोई पुत्र नहीं था। दशरथ को अपने राजवंश के खत्म होने का डर था। शंका से ग्रस्त राजा दशरथ को वशिष्ठ ऋषि ने आशा का छोर न छोड़ने की सलाह दी और पुत्र-प्राप्ति के लिए यज्ञ करने का रास्ता दिखलाया। पुत्र-कामेष्टि यज्ञ के अनुष्ठान के फलस्वरूप दशरथ को ४ पुत्रों का प्रसाद मिला था, जिसमें सबसे पहले भगवान विष्णु ने राम के रूप में कौशल्या के गर्भ में अवतार लिया था।
प्रतीक रूप में इस त्योहार को मनाने का एक उद्देश्य यह भी है कि मनुष्य को अधर्म के खिलाफ जंग ज़ारी रखनी चाहिए, क्योंकि ईश्वर के यहाँ देर है, अंधेर नहीं है।

सुन लो मेरी मेरे रघुराई
लगादो पार नैइया मेरे रघुराई
भव-सागर को पार करा दो
सुन लो मेरी दुहाई
लगादो...............................
जन्म मरन का बंधन टूटे
छुट जाए आवा जाई
लगादो ............................
तेरे दरस को नैना तरसे
तुझसे लौ जो लगाई
लगादो ............................
आँख पड़ा है लोभ का परदा
देता कुछ न दिखाई
लगादो ..........................
वचन की खातिर वन को चल गए
रघुकुल रीत निभाई
लगादो पार....................

-रचना श्रीवास्तव
महाकाव्य रामायण के तुलसी-संस्करण 'राम चरित मानस' के राम भारत के जन-जन में बसे हैं। राम भारत का इतना प्रभावशाली व्यक्तित्व है कि इसने भारत के भूत और वर्तमान दोनों को बराबर रूप में प्रभावित किया है। राम चरित मानस के बराबर साहित्य की कोई और कृति दुनिया में कहीं भी इस तरह से लोगों की रूह में नहीं समा सकी।

शोखी-ए-हिन्दू ब बीं, कुदिन बबुर्द अज खास ओ आम,
राम-ए-मन हरगिज़ न शुद हर चंद गुफ्तम राम राम।
-------अमीर खुसरो,
(हर आम और खास जान ले कि राम हिंद के शोख, शानदार शख्सियत हैं। राम मेरे मन में हैं और हरगिज़ न अलग होंगे, जब भी बोलूँगा राम राम बोलूँगा।)

क्रांतिकारी कवि कबीर ने भी राम को तरह-तरह के प्रतीकों में इस्तमाल किया। एक दोहा देखें

राम मिले निर्भय भय ,रही न दूजी आस
जाई सामना शब्द में राम नाम विस्वास
..........संत कबीर दास

तुलसीदास ने कहा-

नीलाम्बुजं श्यामलकोमलांगम्, सीतासमारोपितवामभागम्।
पाणौमहासायकचारुचापम्, नमामिरामम् रघुवंशनाथम्।।


नमामि रामम्
लेकिन हम बात करने जा रहे हैं एक ख़ास गीत की जिसमें महात्मा गाँधी का रामराज्य के सपने को याद किया गया है। इस गीत के संकल्पनाकर्ता राजकुमार सिंह 'राकू' अपने श्रीराम से कृपा करने की गुहार लगा रहे हैं। कह रहे हैं कि 'रामराज्य बापू का सपना, इस धरती पर लाओ राम'। सुनें-


(हमेशा सुनने के लिए डाऊनलोड करें)
इस गीत में शुरू में अमीर खुसरों के बोल हैं। उसके बाद कबीरदास के, फिर तुलसीदास के और शेष गीत राकू ने खुद लिखा है।

राकू
राकू ने इस गीत को 'नाममि रामम्' नाम दिया है। राकू कहते हैं-
" 'नमामि रामम्' एक विनम्र आदरांजलि है हमारी अमर धरोहर श्री राम कों जो वस्तुतः किसी भी धर्म, भाषा, क्षेत्र से परे हैं। अमीर खुसरो, कबीर और संत तुलसीदास जैसे महान कवियों ने हमारी इस सांस्कृतिक पहचान के प्रति अगाध श्रद्धा, प्रेम और सम्मान व्यक्त किया है।'नमामि रामम्'संगीत के माध्यम से उसी मान,निष्ठा और श्रद्धा को समर्पित अभिव्यक्ति है।"

इस गीत के एल्बम का लोकार्पण गांधी निर्वाण के दिन (३० जनवरी २००८ को) बापू के साबरमती आश्रम में, आश्रम के मुख्य ट्रस्टी ललित भाई मोदी के हाथों संपन्न हुआ था। जिसमें देश-विदेश से आये बहुत सारे महानुभाओं ने हिस्सा लिया और प्रार्थना सभा के बाद चर्चा भी की।

मुख्य बात जो कही गयी कि इस गीत में ' रामराज्य' लाने की कही गयी है और वह 'रामराज्य' बापू के ही रामराज्य की परिकल्पना है।

बापू के 'रामराज्य' की परिकल्पना
राष्ट्रपिता बापू के संघर्ष का लक्ष्य था 'रामराज्य', जिसकी शुरूआत 'अन्त्योदय' से होनी थी यानी समाज के सबसे पिछडे की सेवा सर्वप्रथम, का वादा था। इसी क्रम से सम्पूर्ण समाज के सम्पूर्ण उदय का दर्शन था ' सर्वोदय'।

गीत की टीम
प्रार्थना- अमीर खुसरो, संत कबीर और संत तुलसी दास
निवेदन और गीत- राजकुमार सिंह 'राकू'
संगीत- विवेक अस्थाना एवं राकू

गायक- राजा हसन तथा सुमेधा [२००७ के सा रा गा मा के अंतिम चरण के विजेता]
प्रोग्रामिंग तथा डिजाइन- न्रिपंशु शेखर
रिकॉर्डिस्ट- साहिल खान
वाद्य:
सितार-
उमाशंकर शुक्ल, बांसुरी- विजय ताम्बे, हारमोनियम- फिरोज़ खान
रिदम- मकबूल खान व ताल वाद्य- शेखर
कोरस(साथी गायक)- नीलेश ब्रह्मभट्ट, संगम उपाध्याय, हिमांशु भट्ट, शोभा सामंत, सुगन्धा लाड, संजय कुमार
रिकॉर्डिंग- आर्यन्स स्टूडियो (मुंबई)

अमीर खुसरो (१२५३-१३२५)- एक संक्षिप्त परिचय
कवी, संगीतज्ञ, इतिहासकार, बहुभाषा शास्त्री और इन सब से बढ़ एक सूफी संगीत वाहक, जिसने शांति, सद्‍भाव, भाईचारा और सर्वधर्म समभाव को बताया और जिया। फारसी, तुर्की, अरबी और संस्कृत के विद्वान जिसने हिंदी-उर्दू (जिसे वे 'हिंदवी' कहते थे) में ही रचनाएँ नहीं की बल्कि हिंदी की बोलियों ब्रज और अवधी वगैरह में भी गीत लिखे। फारसी में लिखा उनका विशाल भंडार भी है। ' हिंदवी' के पहले कवी जिन्होंने न इस भाषा को गढ़ा बल्कि हजारों गीतों, दोहों, पहेलियों, कह्मुकर्नियों आदि हर विधा में लिखा और गाया भी। उसमें समाई मानवीय करुणा से सबका मन जीता और अस्सीम सम्मान और प्यार पाया।
बहुत ही आला संगीत प्रेमी जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रतिमान गढ़े, जो आज तक निरंतर बने हुए हैं। उन्होंने पखावज से तबले का इज़ाद किया और वीणा को सितार का रूप दिया। महान सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया के प्रिय शिष्य रहे। जिन्होंने उनके भीतर समग्र मानवता के लिए एक गहरी सोच, करुणा, स्नेह और प्रेम भर दिया। यही 'खुसरो' को उस उच्चता पर प्रतिष्ठित करता है जिसकी अगली कड़ियाँ कबीर, सूर, तुलसी, नानक, मीरा, नामदेव, रैदास आदि उच्च संतों में प्रतिध्वनित होती हैं। यही भारत के इस महानतम पुत्र की उच्चता का पड़ाव है। ' खुसरो' खुद को 'तुतिये हिंद' यानी हिंद का तोता कहते थे, जो मीठा बोलता है.............. ' राम-राम' बोलता है। महान कवि ग़ालिब ने ये पूछे जाने पर की उनकी शायरी में इतनी मिठास कैसे? लिखा...........

" ग़ालिब मेरे कलाम में क्यूं कर मजह न हो,
पीता हूँ धो के खुसरावो शीरीं सुखन के पाँव।"


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