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रविवार, 24 जुलाई 2011

सुर संगम में आज - सगीत शिरोमणि कुमार गन्धर्व

सुर संगम - 30 - पंडित कुमार गंधर्व

वे अपने गायन में छोटे-छोटे व सशक्त टुकड़ों व तानों के प्रयोग के लिए जाने जाते थे परंतु कैंसर से जूझने के कारण उनकी गायकी में काफ़ी प्रभाव पड़ा

"मोतिया गुलाबे मरवो... आँगना में आछो सोहायो
गेरा गेराई चमेली... फुलाई सुगंधा मोहायो..."


उपरोक्त पंक्तियाँ हैं एक महान शास्त्रीय गायक की रचना के| एक ऐसा नाम जिसे शास्त्रीय भजन गायन में सर्वोत्तम माना गया है, कुछ लोगों का मानना है कि वे लोक संगीत व भजन के सर्वोत्तम गायक थे तो कुछ का मानना है कि उनकी सबसे बहतरीन रचनाएँ हैं उनके द्वारा रचित राग जिन्हें वे ६ से भी अधिक प्रकार के ले व तानों को मिश्रित कर प्रस्तुत करते थे| मैं बात करा रहा हूँ महान शास्त्रीय संगीतज्ञ पंडित कुमार गंधर्व की जिन्हें इस अंक के माध्यम से सुर-संगम दे रहा है श्रद्धांजलि|

कुमार गंधर्व का जन्म बेलगाम, कर्नाटक के पास 'सुलेभवि' नामक स्थान में ८ अप्रैल १९२४ को हुआ, माता-पिता ने नाम रखा ' शिवपुत्र सिद्दरामय्या कोमकलीमठ'| उन्होंने संगीत की शिक्षा उन दिनों जाने-माने संगीताचार्य प्रो. बी. आर. देवधर से ली| बाल्यकाल से ही संगीत में असाधारण प्रतिभा दिखाने के कारण उन्हें 'कुमार गंधर्व' शीर्षक दिया गया - भारतीय पुराणों में गंधर्व को संगीत का देवता माना गया है| उन्होंने १९४७ में भानुमति कांस से विवाह किया तथा देवास, मध्य प्रदेश चले गये| कुछ समय पश्चात वे बीमार रहने लगे तथा टीबी की चिकित्सा शुरू की गयी| चिकित्सा का कोई असर न होने पर उन्हें पुनः जाँचा गया और उनमें फेफड़े का कैंसर पाया गया| कुमार अपने परिवार के अनुनय पर सर्जरी के लिए मान गये जबकि उन्हें भली-भाँति बता दिया गया था की संभवत: सर्जरी के बाद वे कभी न गा सकेंगे| सर्जरी के बाद उनके एक प्रशंसक उनसे मिलने आए जो एक चिकित्सक भी थे| जाँचने पर उन्होंने पाया कि कुमार के सर्जरी के घाव भर चुके हैं तथा उन्हें गायन प्रारंभ करने की सलाह दी| प्रशंसक डाक्टर की चिकित्सा व आश्वासन तथा पत्नी भानुमति की सेवा से पंडित गंधर्व स्वस्थ हो उठे तथा उन्होंने गायन पुनः प्रारंभ किया| तो ये थी बातें पंडित गंधर्व के व्यक्तिगत जीवन की, उनके बारे में और जानने से पहले लीजिए आपको सुनाते हैं उनके द्वारा प्रस्तुत राग नंद में यह सुंदर बंदिश|

राजन अब तो आजा रे - बंदिश(राग नंद)


स्वस्थ होने के पश्चात कुमारजी ने अपनी पहली प्रस्तुति दी वर्ष १९५३ में| इससे पहले वे अपने गायन में छोटे-छोटे व सशक्त टुकड़ों व तानों के प्रयोग के लिए जाने जाते थे परंतु कैंसर से जूझने के कारण उनकी गायकी में काफ़ी प्रभाव पड़ा, वे उस समय के दिग्गज जैसे पं. भिमसेन जोशी की भाँति उन ऊँचाईयो को तो न छू सके परंतु अपने लिए एक अलग स्थान अवश्य बना पाए| शास्त्रीय गायन के साथ-साथ उन्होंने कई और भी प्रकार के संगीत जैसे निर्गुणी भजन तथा लोक गीतों में अपना कौशल दिखाया जिनमें वे अलग अलग रागों की मिश्रित कर, कभी धीमी तो कभी तीव्र तानों का प्रयोग कर एक अद्भुत सुंदरता ले आते थे| आइए सुनें उनके द्वारा प्रस्तुत ऐसे ही एक निर्गुणी भजन को जिसे उन्होंने गाया है राग भैरवी पर, भजन के बोल हैं - "भोला मन जाने अमर मेरी काया..."|

भोला मन जाने अमर मेरी काया - भजन (राग भैरवी)


पंडित गंधर्व का गायन विवादास्पद भी रहा| विशेष रूप से उनकी विलंबित गायकी की कई दिग्गजों ने, जिनमें उनके गुरु प्रो. देवधर भे शामिल थे, ने निंदा की| १९६१ में उनकी पत्नी भानुमति का निधन हो गया, उनसे कुमार को एक पुत्र हुआ| इसके पश्चात उन्होंने देवधर की ही एक और छात्रा वसुंधरा श्रीखंडे के साथ विवाह किया जिनके साथ आयेज चलकर उन्होंने भजन जोड़ी बनाई| कुमारजी को वर्ष १९९० में पद्म-भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया| दुर्भाग्यपूर्ण, १२ जनवरी ११९२ को ६७ वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया परंतु पंडित जी अपने पीछे छोड़ गये अपनी रचनाओं की एक बहुमूल्य विरासत| आइए उन्हें नमन करते हुए तथा इस अंक को यहीं विराम देते हुए सुने उनके द्वारा गाए इस वर्षा गीत को इस वीडियो के माध्यम से|
वर्षा गीत


और अब बारी है इस कड़ी की पहेली की जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से अधिक अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

पहेली: यह पारंपरिक लोक संगीत शैली उत्तर-प्रदेश में वर्षा ऋतु के समय गायी जाती है|

पिछ्ली पहेली का परिणाम: अमित जी को बधाई| क्षिति जी कहाँ ग़ायब हैं???

अब समय आ चला है आज के 'सुर-संगम' के अंक को यहीं पर विराम देने का। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई होगी। हमें बताइये कि किस प्रकार हम इस स्तंभ को और रोचक बना सकते हैं!आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। शाम ६:३० बजे कृष्णमोहन जी के साथ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

प्रस्तुति - सुमित चक्रवर्ती


आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

रविवार, 17 अप्रैल 2011

सुर संगम में आज - सात सुरों को जसरंगी किया पंडित जसराज ने

सुर संगम - 16 - पंडित जसराज
१४ वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे।

मस्कार! सुर-संगम के इस साप्ताहिक स्तंभ में मैं, सुमित चक्रवर्ती आपका स्वागत करता हूँ। हमारे देश में शास्त्रीय संगीत कला सदियों से चली आ रही है। इस कला को न केवल मनोरंजन का, अपितु ईश्वर से जुड़ने का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत माना गया है। आज हम सुर-संगम में ऐसे हि एक विशिष्ट शास्त्रीय गायक के बारे में जानेंगे जिनकी आवाज़ मानो सुनने वालों को सीधा उस परमेश्वर से जाकर जोड़ती है। एक ऐसी आवाज़ जिन्होंने मात्र ३ वर्ष की अल्पायु में कठोर वास्तविकताओं की इस ठंडी दुनिया में अपने दिवंगत पिता से विरासत के रूप में मिले केवल सात स्वरों के साथ कदम रखा, आज वही सात स्वर उनकी प्रतिभा का इन्द्रधनुष बन विश्व-जगत में उन्हें विख्यात कर चले हैं। जी हाँ! मैं बात कर रहा हूँ हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत शैली के समकालीन दिग्गज, संगीत मार्तांड पंडित जसराज जी की। आईये पंडित जसराज के बारे में और जानने से पहले सुनें उनकी आवाज़ में यह गणेश वंदना।

गणेश वन्दना - पं० जसराज


पंडित जसराज क जन्म २८ जनवरी १९३० को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे ४ पीढ़ियों तक हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पंडित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। जैसा कि आपने पहले पढ़ा कि पं० जसराज को संगीत की प्राथमिक शिक्षा अपने पिता से ही मिली परन्तु जब वे मात्र ३ वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। पंडित मोतीराम जी का देहांत उसी दिन हुआ जिस दिन उन्हें हैदराबाद और बेरार के आखिरी निज़ाम उस्मान अलि खाँ बहादुर के दरबार में राज संगीतज्ञ घोषित किया जाना था। उनके बाद परिवार के लालन-पालन का भार संभाला उनके बडे़ सुपुत्र अर्थात् पं० जसराज के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पं० मणिराम जी ने। इन्हीं की छत्रछाया में पं० जसराज ने संगीत शिक्षा को आगे बढ़ाया तथा तबला वादन सीखा। मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परंतु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी क्षुद्र माना जाता था तथा १४ वर्ष की किशोरावस्था में इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में विशारद प्राप्त नहीं कर लेते, अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवंत सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामि वल्लभदास जी से संगीत विशारद प्राप्त किया। बचपन से ही आदर्शों के पक्के पंडित जसराज के पक्के सुरों की चर्चा आगे बढ़ाने से पहले लीजिये सुनें उनके द्वारा प्रस्तुत राग गुर्जरी तोड़ी।

राग गुर्जरी तोड़ी - पं० जसराज


पं० जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की 'ख़याल' शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामि महाराज के सानिध्य में 'हवेली संगीत' पर व्यापक अनुसंधान कर कई नवीन बंदिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन शैली पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पंडित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। तो क्यों न जुगलबन्दी के इस रूप को भी सुना जाए पंडित जी के ही दो शागिर्दों विदुषी डॉ० अश्विनि भिड़े-देशपाण्डे और पं० संजीव अभ्यंकर की आवाज़ों में? डॉ० देशपाण्डे इस जुगलबन्दी में राग ललित गा रही हैं जबकि पं० अभ्यंकर गा रहे हैं राग पुर्ये-धनश्री।

जसरंगी जुगलबन्दी - डॉ० अश्विनि भिड़े-देशपाण्डे एवं पं० संजीव अभ्यंकर


और अब बारी इस कड़ी की पहेली का जिसका आपको देना होगा उत्तर तीन दिनों के अंदर इसी प्रस्तुति की टिप्पणी में। प्रत्येक सही उत्तर के आपको मिलेंगे ५ अंक। 'सुर-संगम' की ५०-वीं कड़ी तक जिस श्रोता-पाठक के हो जायेंगे सब से ज़्यादा अंक, उन्हें मिलेगा एक ख़ास सम्मान हमारी ओर से।

सुनिए और पहचानिए कि यह कौन सा भारतीय वाद्‍य यंत्र है? इसपर आधारित होगा हमारा आगामी अंक।



पिछ्ली पहेली का परिणाम: इस बार एक नयी श्रोता व पाठिका श्रीमति क्षिति तिवारी जी बाज़ी ले गईं हैं। आपको मिलते हैं ५ अंक, हार्दिक बधाई!

लीजिए हम आ पहुँचे हैं आज के सुर-संगम के इस अंक की समप्ति पर, आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आई। आप अपने विचार व सुझाव हमें लिख भेजिए oig@hindyugm.com के ई-मेल पते पर। आगामी रविवार की सुबह हम पुनः उपस्थित होंगे एक नई रोचक कड़ी लेकर, तब तक के लिए अपने साथी सुमित चक्रवर्ती को आज्ञा दीजिए| और हाँ! शाम ६:३० बजे हमारे 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के प्यारे साथी सुजॉय चटर्जी के साथ पधारना न भूलिएगा, नमस्कार!

खोज व आलेख- सुमित चक्रवर्ती



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

रविवार, 30 जनवरी 2011

सुर संगम में आज -भारतीय संगीताकाश का एक जगमगाता नक्षत्र अस्त हुआ -पंडित भीमसेन जोशी को आवाज़ की श्रद्धांजली

सुर संगम - 05

भारतीय संगीत की विविध विधाओं - ध्रुवपद, ख़याल, तराना, भजन, अभंग आदि प्रस्तुतियों के माध्यम से सात दशकों तक उन्होंने संगीत प्रेमियों को स्वर-सम्मोहन में बाँधे रखा. भीमसेन जोशी की खरज भरी आवाज का वैशिष्ट्य जादुई रहा है। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बदल देते थे, वह अनुभव करने की चीज है। 'तान' को वे अपनी चेरी बनाकर अपने कंठ में नचाते रहे।


भारतीय संगीत-नभ के जगमगाते नक्षत्र, नादब्रह्म के अनन्य उपासक पण्डित भीमसेन गुरुराज जोशी का पार्थिव शरीर पञ्चतत्त्व में विलीन हो गया. अब उन्हें प्रत्यक्ष तो सुना नहीं जा सकता, हाँ, उनके स्वर सदियों तक अन्तरिक्ष में गूँजते रहेंगे. जिन्होंने पण्डित जी को प्रत्यक्ष सुना, उन्हें नादब्रह्म के प्रभाव का दिव्य अनुभव हुआ. भारतीय संगीत की विविध विधाओं - ध्रुवपद, ख़याल, तराना, भजन, अभंग आदि प्रस्तुतियों के माध्यम से सात दशकों तक उन्होंने संगीत प्रेमियों को स्वर-सम्मोहन में बाँधे रखा. भीमसेन जोशी की खरज भरी आवाज का वैशिष्ट्य जादुई रहा है। बन्दिश को वे जिस माधुर्य के साथ बदल देते थे, वह अनुभव करने की चीज है। 'तान' को वे अपनी चेरी बनाकर अपने कंठ में नचाते रहे।

सादे पहनावे, रहन-सहन और स्वभाव वाले भीमसेन जी को अपने बारे में कहने में हमेशा संकोच रहा। यह मेरा सौभाग्य ही है कि मुझे भीमसेनजी को लखनऊ, दिल्ली, ग्वालियर, आदि नगरों में आयोजित लगभग १०-१२ संगीत-सभाओं में प्रत्यक्ष सुनने का अवसर मिला. लगभग २५-२६ वर्ष पहले लखनऊ के भातखंडे संगीत महाविद्यालय (वर्तमान में विश्वविद्यालय) की ओर से तीन-दिवसीय भातखंडे जयन्ती समारोह में पण्डितजी आमंत्रित किये गए थे. संगीत सभा के उपरान्त 'अमृत प्रभात' दैनिक समाचार पत्र (उन दिनों इसी पत्र में मैं लिखा करता था) के लिए पण्डितजी का साक्षात्कार लेने का दुस्साहस कर बैठा. प्रस्तुति के तुरन्त बाद मैं डरते-डरते ग्रीन रूम की ओर भागा और भयभीत - कातर स्वर में उन्हें अपना मन्तव्य बताया. गायन के बाद, थकावट के बावजूद सहज भाव से उन्होंने कहा- 'पूछिए, क्या पूछना चाहते हैं?' एक विद्वान शस्त्रीय गायक को अपने सामने पाकर मेरी सिट्टी-पिट्टी पहले से ही गुम थी. उस हालत में मैंने पण्डितजी से क्या प्रश्न किया था, वह मुझे आज तक स्मरण नहीं. परन्तु उस प्रश्न का जादुई असर यह हुआ कि अगले दिन सुबह उन्होंने मुझे महाविद्यालय के छात्रावास परिसर (पण्डितजी वहीँ ठहरे थे) में बुला लिया. अगले दिन लगभग सवा घण्टे की बातचीत में पण्डितजी ने अपनी गायकी की विशेषताओं पर कम और अपने यायावरी अतीत पर अधिक चर्चा की. बचपन में अपने तैराकी के शौक के बारे में विस्तार से बताया, किन्तु अपनी संगीत साधना और विशेषताओं के सवाल को बड़ी सफाई से दूसरी ओर मोड़ देते थे. उस समय मुझे प्रतीत हुआ कि उन्होंने मुझ जैसे संगीत-अज्ञानी के कारण ऐसा किया. कुछ वर्ष पश्चात् ग्वालियर में पण्डितजी के एक शिष्य ने मुझे बताया कि वे आत्म-प्रचार से सदा दूर रहते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि पण्डितजी अपनी गायकी और उपलब्धियों पर बात करने में सदैव संकोची रहे.

भीमसेनजी के विषय में अन्य सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार उन्होंने बचपन में उस्ताद अब्दुल करीम खां साहब का एक रिकार्ड सुना. यह राग झिंझोटी में एक ठुमरी थी, जिसके बोल थे- 'पिया बिन नाहीं आवत चैन ....'. १९३३ में ११ वर्ष कि आयु वह घर से निकल पड़े, सदगुरु की खोज में. घर से निकल कर किशोर भीमसेन पहले बीजापुर, फिर पुणे पहुँचे. पुणे के बाद ग्वालियर गए, जहाँ महाराजा ग्वालियर द्वारा संचालित माधव संगीत विद्यालय में प्रसिद्ध सरोद वादक उस्ताद हाफ़िज़ अली खां से मिले और संगीत की बारीकियाँ सीखीं. अपनी यायावरी वृत्ति के कारण अगले तीन वर्षों तक वह दिल्ली, कोलकाता, लखनऊ, रामपुर आदि स्थानों पर भ्रमण करते रहे. अन्ततः उनके पिता ने जालन्धर में उन्हें खोज निकाला. वापस धारवाड़ लौट कर भीमसेनजी ने १९३६ से धारवाड़ के पण्डित रामचन्द्र गणेश कुन्दगोलकर (सवाई गन्धर्व) से विधिवत संगीत शिक्षा ग्रहण करना आरम्भ किया. इसी अवधि में सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल ने भी सवाई गन्धर्व से संगीत शिक्षा ग्रहण की. १९४३ में भीमसेनजी मुम्बई रेडिओ में बतौर गायक कलाकार के रूप में नियुक्त हो गए. १९४४ में कन्नड़ और हिन्दी में उनके गाये भजनों का पहला रिकार्ड HMV ने जारी किया. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. आइए आगे बढ़ने से पहले पंडितजी का गाया राग यमन-कल्याण सुना जाए।

गायन: राग यमनकल्याण (पंडित भीमसेन जोशी)


पण्डित भीमसेन जोशी ने जहाँ एक ओर अपनी विशिष्ट शैली विकसित करके किराना घराने को समृद्ध किया, वहीँ दूसरी ओर अन्य घरानों की विशिष्टताओं को भी अपने गायन में समाहित किया। उन्होंने राग कलाश्री और ललित भटियार जैसे नए रागों की रचना भी की। उन्हें खयाल गायन के साथ-साथ ठुमरी, भजन और अभंग गायन में भी महारत हासिल थी। यहाँ पर उनकी आवाज़ में इस भैरवी भजन को सुनने की तीव्र इच्छा हो रही है....

भजन: जो भजे हरि को सदा (पंडित भीमसेन जोशी)


भीमसेनजी ने कई फिल्मों में भी अपने कंठ-स्वर का योगदान किया हैI १९८४ में निर्मित, अमोल पालेकर द्वारा निर्देशित फिल्म 'अनकही' में पण्डितजी ने एक भक्तिपरक गीत गाया था- 'ठुमक ठुमक पग कुमत कुञ्ज मग, चपल चरण हरि आये ....'I इस फिल्म के संगीतकार जयदेव थे. फिल्म के इस गीत को १९८५ में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के लिए वर्ष का सर्वश्रेष्ठ गीत (पुरुष स्वर) के रूप में पुरस्कृत किया गया थाI इससे पूर्व १९५६ में पण्डितजी ने फिल्म 'बसन्त बहार' में पार्श्व गायक मन्ना डे के साथ एक गीत गाया था- 'केतकी गुलाब जूही चम्पक वन फूले ....'. शंकर जयकिशन के संगीत निर्देशन में फिल्म के शीर्षक के अनुरूप यह गीत राग 'बसन्त बहार' पर आधारित है. इस गीत की एक रोचक कथा मन्ना डे ने दूरदर्शन के एक साक्षात्कार में बताया था. श्री डे के अनुसार जब उन्हें यह बताया गया कि यह गीत उन्हें पण्डित भीमसेन जोशी के साथ गाना और कथानक की माँग के अनुसार उन्हें पण्डितजी से बेहतर गाकर राज-दरबार की प्रशंसा अर्जित करनी है तो वह बहुत डर गए. वह बोले- 'कहाँ पण्डितजी, कहाँ मैं?' 'परन्तु रिहर्सल में उनके मार्गदर्शन के कारण ही मैं वह गाना गा सका. आइए इस गीत का हम भी यहाँ पर आनंद लें। गीतकार शैलेन्द्र की यह रचना है।

गीत: केतकी गुलाब जूही चंपक बनफूले (फ़िल्म: बसंत बहार)


आज पंडित भीमसेन जोशी हमारे बीच मौजूद नहीं। लेकिन उनकी दिव्य आवाज़ दुनिया कि फ़िज़ाओं में इस तरह से प्रतिध्वनित हो रही है कि जिसकी अनुगूंज युगों युगों तक सुनाई देती रहेगी और संगीतरसिकों को अपना अमृत पान कराती रहेगी। स्वरगीय पंडित भीमसेन जोशी को हम दे रहे हैं भीगी पलकों से अपनी भावभीनी श्रद्धांजली।

शोध और आलेख: कृष्णमोहन मिश्र, लखनऊ

प्रस्तुति-सुजॉय चटर्जी



आवाज़ की कोशिश है कि हम इस माध्यम से न सिर्फ नए कलाकारों को एक विश्वव्यापी मंच प्रदान करें बल्कि संगीत की हर विधा पर जानकारियों को समेटें और सहेजें ताकि आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी हमारे संगीत धरोहरों के बारे में अधिक जान पायें. "ओल्ड इस गोल्ड" के जरिये फिल्म संगीत और "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" के माध्यम से गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया से जानकारियाँ बटोरने के बाद अब शास्त्रीय संगीत के कुछ सूक्ष्म पक्षों को एक तार में पिरोने की एक कोशिश है शृंखला "सुर संगम". होस्ट हैं एक बार फिर आपके प्रिय सुजॉय जी.

बुधवार, 29 जुलाई 2009

लोग उन्हें "गाने वाली" कहकर चिढ़ाते थे, धीरे धीरे ये उनका उपनाम हो गया....

दुनिया में कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो अपनी अमिट छाप छोड़ जाते हैं, जिनके जाने के बाद भी उनकी मधुर स्मृतियाँ हमें प्रेरित करती हैं. सपने देखने और उन्हें पूरा करने का हौसला देती हैं. इसी श्रेणी में एक नाम और दर्ज हुआ है, वो है शास्त्रीय संगीत की मल्लिका गंगूबाई का. गीता में कहा है कि 'शरीर मरता है आत्मा नही'. गंगूबाई शास्त्रीय संगीत की आत्मा हैं. आज वो नहीं रहीं लेकिन उनकी संगीत शैली आत्मा के रुप में हमारे बीच विराजमान है.

यूँ तो आज गंगूबाई संगीत के शिखर पर विराजित थीं लेकिन उस शिखर तक पहुँचने का रास्ता उन्होंने बहुत ही कठिनाईयों से तय किया था. गंगूबाई का जन्म १९१३ में धारवाड़ में हुआ था. देवदासी कुल में जन्म लेने वाली गंगूबाई ने छुटपन से संगीत की शिक्षा लेनी शुरु कर दी थी. अक्सर उन्हें जातीय टिप्पणी का सामना करना पड़ता और उनकी गायन कला को लेकर लोग मजाक बनाया करते थे. उस समय गायन को अच्छा नहीं माना जाता था, इसलिए लोग उन्हें 'गाने वाली' कहकर चिढ़ाते थे. धीरे-धीरे यह उनका उपनाम हो गया.

गंगूबाई कर्नाटक के दूरस्थ इलाके हंगल में रहती थीं. इसी से उनकी पहचान बनी और उनके नाम के साथ गाँव का नाम हंगल जुड़ गया. गंगूबाई हंगल की माँ कर्नाटक शैली की गायिका थीं लेकिन गंगूबाई ने हिन्दुस्तानी शैली का गायन सीखने का फैसला किया. अपने गुरु सवाई गंधर्व से हिन्दुस्तानी शास्त्रीय गायन सीखने के लिये गंगूबाई कुडगोल जाया करती थीं. गंगूबाई ने कई बाधाओं को पार कर शास्त्रीय संगीत को एक मुकाम तक पहुँचाया. गंगूबाई ने गुरु-शिष्य परम्परा को बरकरार रखा. उन्होंने अपने गुरु सवाई गंधर्व की शिक्षाओं के बारे में एक बार कहा था कि -'मेरे गुरु जी ने मुझे सिखाया है कि जिस तरह एक कंजूस अपने पैसों के साथ व्यवहार करता है उसी तरह सुर का इस्तेमाल करो ताकि श्रोता राग की हर बारीकी को समझ सके'.

गंगूबाई ने भारत रत्न से सम्मानित पंडित भीमसेन जोशी जी के साथ संगीत शिक्षा ली थी. किराना घराने की परम्परा को बरकरार रखने वाली गंगूबाई ने कभी भी इससे जुड़ी शैली की शुद्धता के साथ समझौता नहीं किया. गंगूबाई को 'भैरव, असावरी, तोड़ी, भीमपलासी, पुरिया, धनश्री, मारवा, केदार और चन्द्रकौंस' रागों की गायिकी के लिये अधिक सम्मान मिला. उनका कहना था कि 'मैं रागों को धीरे-धीरे आगे बढ़ाने की हिमायती हूँ, इससे श्रोता की उत्सुकता बनी रहती है और उसमें अगले चरण को जानने की इच्छा बढ़ती है'. एक बार फ़िल्म मेकर विजया मूले से बात करते हुए गंगूबाई ने कहा था कि 'पुरुष संगीतकार अगर मुसलमान हो तो उस्ताद कहलाने लगता है, हिन्दु हो तो पंडित हो जाता है, लेकिन केसरबाई, हीराबाई और मो्गाबाई जैसी गायिकायें बाई ही रह जाती हैं उनके व्यक्तित्व में जीवन से और स्त्री होने से मिले दुखों की झलक साफ नजर आती थी. उनकी आवाज में दर्द था लेकिन उसे भी उन्होंने मधुरता से सजाया. ईश्वर के प्रति श्रद्धा होने के कारण गंगूबाई ने भक्ति संगीत को भी नई ऊँचाईयों तक पहुँचाया.

गंगूबाई एक महान गायिका थीं. उन्हें पद्म विभूषण, तानसेन पुरुस्कार, संगीत नृत्य अकादमी पुरुस्कार और संगीत नाटक अकादमी जैसे पुरुस्कारों से नवाजा गया. गंगूबाई हंगल ने हर तरह का वक्त देखा था. गंगूबाई को नौ प्रधानमंत्रियों और पाँच राष्ट्रपतियों द्वार सम्मान प्राप्त हुआ जो अपने आप में एक उपलब्धि है. उन्होंने भारत में दो सौ से अधिक स्कूलों मे भारतीय शास्त्रीय संगीत को बढ़ावा देने के लिये कार्यक्रम किये साथ ही देश के बाहर भी भारतीय शास्त्रीय संगीत को पहुँचाया.

यह सच है कि पद्म भूषण गंगूबाई हंगल नहीं रहीं लेकिन उनकी आँखे आज भी दुनिया देखेंगी. गंगूबाई हंगल अपनी आँखे दान कर गयीं हैं. कहते हैं कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति कभी नहीं मरता है उसकी उपस्थिति उसके अनगिनत महान कार्यों से दुनिया में रहती है. गंगूबाई हंगल भी अपने संगीत और आँखों द्वारा इस दुनिया में रहेंगी. गंगूबाई हंगल एक ऐसी गायिका थीं जिन्होने अपने शास्त्रीय गायन में कभी कोई मिलावट नहीं की. उन्होंने अपना रास्ता खुद बनाया. ऐसी महान शास्त्रीय गायिका को हम श्रद्धाजंली देते हैं और सुनते हैं उनकी आवाज़ में आज राग दुर्गा, प्ले का बटन दबाईये, ऑंखें बंद कीजिये और महसूस कीजिये आवाज़ के इस तिलस्मी अहसास को-



आलेख - दीपाली तिवारी "दिशा"

सोमवार, 10 नवंबर 2008

अच्छा कलाकार एक प्रकार का चोर होता है

भारत रत्न पंडित भीमसेन जोशी पर विशेष
"I accept this honour on behalf of all Hindustani vocalists who have dedicated their life to music" ये कथन थे पंडित भीमसेन जोशी जी के जब उन्हें उनके बेटे श्रीनिवास जोशी ने फ़ोन कर बताया कि भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान "भारत रत्न" के लिए चुना है. पिछले ७ दशकों से भारतीय संगीत को समृद्ध कर रहे शास्त्रीय गायन में किवदंती बन चुके पंडितजी को यह सम्मान देकर दरअसल भारत सरकार ने संगीत का ही सम्मान किया है, यह मात्र पुरस्कार नही, करोड़ों संगीत प्रेमियों का प्रेम है, जिन्हें पंडित जी ने अपनी गायकी से भाव विभोर किया है. उस्ताद अब्दुल करीम खान साहब के शिष्य रहे सवाई गन्धर्व ने जो पंडित जी के गुरु रहे, अब्दुल वहीद खान साहब के साथ मिलकर जिस "किराना घराने" की नींव डाली, उसे पंडित जी ने पहचान दी. १९ वर्ष की आयु में अपनी पहली प्रस्तुति देने वाले भीम सेन जोशी जी संगीत का एक लंबा सफर तय किया. हम अपने आवाज़ के श्रोताओं के लिए लाये हैं भारती अचरेकर द्वारा लिया गया उनका एक दुर्लभ इंटरव्यू जिसमें पंडित जी ने अपने इसी सफर के कुछ अनछुए पहलू खोले...

(सुनने के लिए नीचे के प्लेयर पर क्लिक करें)



गदक, कर्नाटक में ४ फरवरी १९२२ में जन्में पंडित जी ने यूँ तो इस सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से पहले भी पदम् श्री, पदमभूषण, पदमविभूषण और कर्नाटक रत्न जैसे बड़े सम्मान पायें हैं पर सच तो ये है कि उनका कद हर सम्मान से बढकर है. बचपन में बेहद शरारती रहे पंडितजी के बारे में उनकी गुरु माँ गोदा बाई याद करती है "वो बचपन में गदक के वीरनारायण मन्दिर के "गोपुरम" पर चढ़ जाया करते थे, आज वो संगीत के उच्चतम शिखर पर हैं"

क्या कुछ और कहने की जरुरत है...सुनते है पंडित जी की गायकी के कुछ भिन्न भिन्न रूप -

ऐ री माई शुभ मंगल गाओ री...



संगीतकार ऐ आर रहमान के निर्देशन में उनका गाया "जन गण मन" सुनना भी है एक अनुभव -



फ़िल्म "बसंत बहार" में उन्होंने गाया ये गीत, जिसमें नायक की आवाज़ है मन्ना डे की. कहा जाता है कि मन्ना डे को जब ज्ञात हुआ कि उन्हें पंडितजी के साथ गाना है तो वो डर कर शहर छोड़ कर ही भाग गए...शायद ये उनका अपना अंदाज़ था पंडित जी जैसे बड़े कलकार का सम्मान करने का...क्योंकि कम तो वो भी नही थे...दो बड़े कलाकारों की इस जुगलबंदी का आनंद लें इस मशहूर गीत "केतकी गुलाब जूही...." को सुनकर.



पंडित जी को आवाज़ परिवार के सभी संगीत प्रेमियों की तरफ़ से हार्दिक बधाईयाँ.


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