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Saturday, August 29, 2009

दोस्त दोस्त न रहा प्यार प्यार न रहा...पर मुकेश का आवाज़ न बदली न बदले उनके चाहने वाले

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 186

मुकेश के पसंदीदा गीतों में घूम फिर कर राज कपूर की फ़िल्मों के गानें शामिल होना कोई अचरज की बात नहीं है। राज साहब ने दिए भी तो हैं एक से एक बेहतर गीत मुकेश को गाने के लिए। शैलेन्द्र, हसरत जयपुरी और शंकर जयकिशन ने ये तमाम कालजयी गीतों की रचना की है। कल आप ने सुने थे राम गांगुली की बनाई धुन पर राज कपूर की पहली निर्मित व निर्देशित फ़िल्म 'आग' का गीत। इस फ़िल्म के बाद राज कपूर ने अपनी नई टीम बनायी थी और उपर्युक्त नाम उस टीम में शामिल हुए थे। इस टीम के नाम आज जो गीत हम कर रहे हैं वह है सन् १९६४ की फ़िल्म 'संगम' का। 'संगम' राज कपूर की फ़िल्मोग्राफ़ी का एक ज़रूरी नाम है, जिसने सफलता के कई झंडे गाढ़े। जहाँ तक फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार की बात है, इस फ़िल्म की नायिका वैजयंतीमाला को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला और राजेन्द्र कुमार को सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का पुरस्कार। राज कपूर को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार नहीं मिल पाया क्योंकि वह पुरस्कार उस साल दिया गया था दिलीप कुमार को फ़िल्म 'लीडर' के लिए। दोस्तों, फ़िल्म 'संगम' का एक गीत जो राजेन्द्र कुमार पर फ़िल्माया गया था, हम ने आप को रफ़ी साहब पर केन्द्रित लघु शृंखला 'दस चेहरे और एक आवाज़' के तहत सुनवाया था। आज सुनिए राज कपूर पर फ़िल्माया और मुकेश जी की आवाज़ में "दोस्त दोस्त ना रहा, प्यार प्यार ना रहा, ज़िंदगी हमें तेरा ऐतबार ना रहा"।

मुकेश का गाया और शैलेन्द्र का लिखा यह गीत एक कल्ट सोंग है जिसे प्यार में धोखा खानेवाले हर आशिक़ ने अपने दिल में गुनगुनाया होगा। आज भी कभी कभी मज़ाक में दोस्तों की टोली अपने किसी साथी के अपने महबूबा से ब्रेक-अप हो जाने पर उसे छेड़ते हुए यह गीत गा उठते हैं। इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है इस गीत के असर का, इस गीत की लोकप्रियता का। गीत फ़िल्म में जिस सिचुयशन पर लिखा गया है, वह हमारी फ़िल्मों में बिल्कुल आम बात रही है। लेकिन महान गीतकार, संगीतकार और गायक वो हैं जो इस आम सिचुयशन को किसी असरदार गीत से बेहद ख़ास बना देते हैं। इसमें कोई शक़ नहीं कि ऐसे सिचुयशन पर अगर पुरअसर गीत न लिखे जायें, तो उसका परिणाम फ़िल्म के निर्माता के लिए बहुत अच्छा नहीं भी हो सकता है। गीतों में वह ताक़त होती है जो कहानी को और भी ज़्यादा सशक्त कर दे, लोगों को नायक या नायिका के चरित्र में, उनके मनोभाव और जज़्बातों में और गहराई से डूब जाने को मजबूर कर दे। शैलेन्द्र, शंकर जयकिशन और मुकेश ने यही काम कर दिखाया था इस गीत में। प्यार में चोट खाए हुए नायक का पार्टी में पियानो पर बैठकर नायिका पर इल्ज़ाम पे इल्ज़ाम लगाए जाना और वो भी ऐसे कि सिर्फ़ नायिका को ही समझ में आए, यह हम ने दशकों से बहुत सारे फ़िल्मों में देखा है। यहाँ 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर ही हम ने कम से कम इस तरह का एक गीत सुनवाया है फ़िल्म 'गैम्बलर' का "दिल आज शायर है, ग़म आज नग़मा है"। इस तरह के गीतों की फ़ेहरिस्त लिखने बैठूँ तो बात बड़ी लम्बी हो जाएगी, इसलिए और ज़्यादा कुछ न कहते हुए सुनिए बेवफ़ाई का वह फ़ल्सफ़ा, जो मुकेश को था बेहद प्रिय। और आप से यह गुज़ारिश है कि नीचे टिप्पणी में ऐसे कुछ गीतों को लिस्ट डाउन करें जिनमें है पियानो, पार्टी, और प्यार में ठोकर खाया हुआ नायक जो अपने गीत के ज़रिए नायिका पर शब्दों से वार पे वार किए जा रहा हो। देखते हैं आप कितने ऐसे गीत ढ़ूंढ पाते हैं। तो सुनिए यह गीत और मुझे आज के लिए दीजिए इजाज़त, फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया तो!



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. इस सुपरहिट में मुकेश का ये गीत अपने आप में एक मिसाल है.
२. ऋत्विक घटक ने इस फिल्म की रोचक कहानी लिखी थी और संवाद थे राजेंद्र सिंह बेदी के.
३. दूसरे अंतरे की पहली पंक्ति में शब्द है -"गोरी".

पिछली पहेली का परिणाम -
गलतियाँ इंसान से ही होती है, और एक गलती हमसे भी हुई, पाबला जी सही थे और पूर्वी जी आप भी. त्रुटी सुधार के लिए धन्येवाद...पाबला जी आप कुट्टी मत होईये :). रोहित जी ने गीत सही पहचान लिए थे और अंक भी उन्हें दिए जा चुके है, अब दी हुई चीज़ वापस लेना ठीक नहीं हा हा हा...अब कल की पहेली की बात, दरअसल ये गीत इतने मशहूर हैं कि ज़रा सा सीधा हिंट मिलते ही आप सब धुरंधर पहचान लेंगे, और हमें मज़ा तब आता है जब आपके दिमाग तो थोडी कसरत करनी पड़े, इसलिए ज़रा घुमा फिरा कर सूत्र देते हैं. अब दिशा जी ने आखिरकार गीत पहचान ही लिया है. दिलीप जी आपकी मेहनत व्यर्थ नहीं जायेगी :). चलिए अब चलते चलते दिशा जी को बधाई, अब स्कोर ये है कि दिशा जी, पूर्वी जी, रोहित जी और पराग जी सब से सब १७ अंकों पर हैं. वाह क्या मुकाबला है...

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Tuesday, July 28, 2009

ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ न होना....राजेंद्र कुमार की दरख्वास्त रफी साहब की आवाज़ में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 154

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के तहत इन दिनों आप सुन रहें हैं लघु शृंखला 'दस चेहरे एक आवाज़ - मोहम्मद रफ़ी'। अब तक जिन चेहरों से आपका परिचय हुआ है, वो हैं शम्मी कपूर, दिलीप कुमार और सुनिल दत्त। आज का चेहरा भी बहुत ख़ास है क्योंकि इनके भी ज़्यादातर गानें रफ़ी साहब ने ही गाये हैं। इस चेहरे को हम सब जुबिली कुमार, यानी कि राजेन्द्र कुमार के नाम से जानते हैं। रफ़ी साहब और राजेन्द्र कुमार की जोड़ी की अगर बात करें तो जो जो प्रमुख फ़िल्में ज़हन में आती हैं, उनके नाम हैं धूल का फूल, मेरे महबूब, आरज़ू, सूरज, गंवार, दिल एक मंदिर, और आयी मिलन की बेला। लेकिन एक और फ़िल्म ऐसी है जिसमें मुख्य नायक राज कपूर थे, और सह नायक रहे राजेन्द्र कुमार। ज़ाहिर सी बात है कि फ़िल्म के ज़्यादातर गानें मुकेश ने ही गाये होंगे, लेकिन उस फ़िल्म में दो गानें ऐसे थे जो राजेन्द्र कुमार पर फ़िल्माये जाने थे। उनमें से एक गीत तो लता-मुकेश-महेन्द्र कपूर का गाया हुआ था जिसमें राजेन्द्र साहब का प्लेबैक किया महेन्द्र कपूर ने, और दूसरा जो गीत था वह रफ़ी साहब की एकल आवाज़ में था। जी हाँ, यहाँ फ़िल्म 'संगम' की ही बात चल रही है। रफ़ी साहब के गाये इस अकेले गीत ने वो शोहरत हासिल की कि जो शायद फ़िल्म के दूसरे सभी गीतों को बराबर का टक्कर दे दे। इसमें कोई शक़ नहीं कि रफ़ी साहब के गाये इस गीत ने फ़िल्म में राजेन्द्र कुमार के किरदार को और भी ज़्यादा लोकप्रिय बनाया और किरदार को और ज़्यादा सशक्त किया। "ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर के तुम नाराज़ न होना, कि तुम मेरी ज़िंदगी हो, कि तुम मेरी बंदगी हो"। राजेन्द्र कुमार और रफ़ी साहब की जोड़ी के तमाम हिट गीतों में से यही गीत हम आज लेकर आये हैं ख़ास आप के लिए। अगर बहुत दिनों से आप ने यह गीत नहीं सुन रखा था, तो आज इस गीत को सुनकर तमाम पुरानी यादें आपकी ताज़ा हो गयी होंगी, ऐसा हमारा ख़याल है।

'संगम' फ़िल्म इतनी चर्चित रही है कि इस फ़िल्म के बारे में नया कुछ बताने को हमारे पास नहीं है। बस प्रस्तुत गीत के बारे में यह ज़रूर कहूँगा कि प्रेम पत्र लिखने पर जितने भी गानें बने हैं, उनमें यह गीत एक अहम स्थान रखता है। रोमांटिक गानें लिखने में हसरत जयपुरी साहब का कोई सानी नहीं था, इस गीत के ज़रिये उन्होने इस बात को फिर एक बार प्रमाणित किया है। गीत का मुखड़ा और अंतरे जितने ख़ूबसूरत हैं, उतना ही ख़ूबसूरत है गीत के शुरुवाती बोल - "मेहरबाँ लिखूँ, हसीना लिखूँ, या दिलरुबा लिखूँ, हैरान हूँ कि आप को इस ख़त में क्या लिखूँ"! हसरत साहब ने इस गीत में अपने आप को इस क़दर डूबो दिया है कि सुनकर ऐसा लगता है कि उन्होने इसे अपनी महबूबा के लिए ही लिखा हो! इससे बेहतर प्रेम-पत्र शायद ही किसी ने आज तक लिखा होगा! और रफ़ी साहब तो रफ़ी साहब, क्या समर्पण और अदायगी इस गीत में उन्होने दिखाई है, के सुन कर प्रेम-पत्र लिखने वाले के लिए दिल में हमदर्दी पैदा हो जाये! शंकर जयकिशन का संगीत भी उतना ही असरदार था इस गीत में। कुल मिलाकर यह गीत इन सभी कलाकारों के संगीत सफ़र का एक महत्वपूर्ण पड़ाव बन कर रह गया। और आज हम उसी पड़ाव से गुज़र रहे हैं, तो सुनिये फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर का यह सुनहरा नग़मा। और हाँ, आप को यह भी बता दें कि इस फ़िल्म के लिये राजेन्द्र कुमार को उस साल के फ़िल्म-फ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेता का पुरस्कार मिला था।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. एक सदाबहार ग़ज़ल रफी साहब की आवाज़ में.
2. कलाकार हैं -"राज कुमार".
3. मुखड़े में शब्द है -"कुदरत".

सुनिए/ सुनाईये अपनी पसंद दुनिया को आवाज़ के संग -
गीतों से हमारे रिश्ते गहरे हैं, गीत हमारे संग हंसते हैं, रोते हैं, सुख दुःख के सब मौसम इन्हीं गीतों में बसते हैं. क्या कभी आपके साथ ऐसा नहीं होता कि किसी गीत को सुन याद आ जाए कोई भूला साथी, कुछ बीती बातें, कुछ खट्टे मीठे किस्से, या कोई ख़ास पल फिर से जिन्दा हो जाए आपकी यादों में. बाँटिये हम सब के साथ उन सुरीले पलों की यादों को. आप टिपण्णी के माध्यम से अपनी पसंद के गीत और उससे जुडी अपनी किसी ख़ास याद का ब्यौरा (कम से कम ५० शब्दों में) हम सब के साथ बाँट सकते हैं वैसे बेहतर होगा यदि आप अपने आलेख और गीत की फरमाईश को hindyugm@gmail.com पर भेजें. चुने हुए आलेख और गीत आपके नाम से प्रसारित होंगें हर माह के पहले और तीसरे रविवार को "रविवार सुबह की कॉफी" शृंखला के तहत. आलेख हिंदी या फिर रोमन में टंकित होने चाहिए. हिंदी में लिखना बेहद सरल है मदद के लिए यहाँ जाएँ. अधिक जानकारी ये लिए ये आलेख पढें.


पिछली पहेली का परिणाम -
स्वप्न जी आप बस दो जवाब दूर हैं हमारी दूसरी विजेता बनने से. एक बार स्वप्न जी विजेता बन जाए उसके बाद हमें लगता है कि पराग जी और दिशा जी में जम कर टक्कर होने वाली है. रोहित जी हौंसला अफजाई के लिए धन्येवाद. शरद जी आपकी पैरोडी पढ़कर तो मज़ा आ गया. दरअसल जैसा कि उपर सुजॉय ने लिखा भी है, प्रेम पत्र हम सभी ने लिखा होगा कभी न कभी. लिखने के बाद जो सोच सबसे पहले जेहन में आती है उसे ये गीत बहुत सुंदर अभिव्यक्ति देता है. शायद ही कोई होगा जिसे ये गीत पसंद न हो.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Wednesday, May 27, 2009

शहर के दुकानदारों को जावेद अख्तर की सलाह - एल्बम संगम से नुसरत साहब की आवाज़ में

बात एक एल्बम की # 07

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - "संगम" - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर

आलेख प्रस्तुतीकरण - सजीव सारथी


जैसा कि आप जानते हैं हमारे इस महीने के फीचर्ड एल्बम में दो फनकारों ने अपना योगदान दिया है. नुसरत साहब के बारे में हम पिछले दो अंकों में बात कर ही चुके हैं. आज कुछ चर्चा करते हैं अल्बम "संगम" के गीतकार जावेद अख्तर साहब की. जावेद अख्तर एक बेहद कामियाब पठकथा लेखक और गीतकार होने के साथ साथ साहित्य जगत में भी बतौर एक कवि और शायर अच्छा खासा रुतबा रखते हैं. और क्यों न हों, शायरी तो कई पीढियों से उनके खून में दौड़ रही है. वे गीतकार/ शायर जानिसार अख्तर और साफिया अख्तर के बेटे हैं, और अपने दौर के रससिद्ध शायर मुज़्तर खैराबादी जावेद के दादा हैं. उनकी परदादी सयिदुन निसा "हिरमां" उन्नीसवी सदी की जानी मानी उर्दू कवियित्री रही हैं और उन्हीं के खानदान में और पीछे लौटें तो अल्लामा फजले हक का भी नाम आता है, अल्लामा ग़ालिब के करीबी दोस्त थे और "दीवाने ग़ालिब" का संपादन उन्हीं के हाथों हुआ है, जनाब जावेद साहब के सगड़दादा थे.

पर इतना सब होने के बावजूद जावेद का बचपन विस्थापितों सा बीता. नन्हीं उम्र में ही माँ का आंचल सर से उठ गया और लखनऊ में कुछ समय अपने नाना नानी के घर बिताने के बाद उन्हें अलीगढ अपने खाला के घर भेज दिया गया जहाँ के स्कूल में उनकी शुरूआती पढाई हुई. लड़कपन से उनका रुझान फ़िल्मी गानों में, शेरो-शायरी में अधिक था. हमउम्र लड़कों के बजाये बड़े और समझदार बच्चों में उनकी दोस्ती अधिक थी. वालिद ने दूसरी शादी कर ली और कुछ दिन भोपाल में अपनी सौतेली माँ के घर रहने के बाद भोपाल शहर में उनका जीवन दोस्तों के भरोसे हो गया. यहीं कॉलेज की पढाई पूरी की, और जिन्दगी के नए सबक भी सीखे. ४ अक्टूबर १९६४ को जावेद ने मुंबई शहर में कदम रखा. ६ दिन बाद ही पिता का घर छोड़ना पड़ा और फिर शुरू हुई संघर्ष की एक लम्बी दास्ताँ. जेब में फ़क़त 27 नए पैसे थे पर जिंदगी का ये "लडाका" खुश था कि कभी 28 नए पैसे भी जेब में आ गए तो दुनिया की मात हो जायेगी.

५ मुश्किल सालों के थका देने वाला संघर्ष भी जावेद का सर नहीं झुका पाया. उन्हें यकीन था कि कुछ होगा, कुछ जरूर होगा, वो युहीं मर जाने के लिए पैदा नहीं हुए हैं. इस दौरान उनकी कला उनका हुनर कुछ और मंझ गया. शायद यही वजह थी कि जब कमियाबी बरसी तो कुछ यूँ जम कर बरसी कि चमकीले दिनों और जगमगाती रातों की एक सुनहरी दास्तान बन गयी. एक के बाद एक लगातार बारह हिट फिल्में, पुरस्कार, तारीफें.....जैसे जिंदगी भी एक सिल्वर स्क्रीन पर चलता हुआ ख्वाब बन गयी, पर हर ख्वाब की तरह इसे भी तो एक दिन टूटना ही था. जब टूटा तो टुकडों में बिखर गयी जिंदगी. कुछ असफल फिल्में, हनी (पत्नी) से अलग होना पड़ा, सलीम के साथ लेखनी की जोड़ी भी टूट गयी. जावेद शराब के आदी हो गए.

१९७६ में जब जानिसार अख्तर खुदा को प्यारे हुए तो अपनी आखिरी किताब औटोग्राफ कर जावेद को दे गए जिस पर लिखा था -"जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे". ये बुलावा था अपने बागी और नाराज़ बेटे के लिए एक शायर पिता का, एक सन्देश था छुपा हुआ कि लौट चलो अब अपनी जड़ों को. शायरी से रिश्ता तो पैदाइशी था ही, दिलचस्पी भी हमेशा थी, 1979 में पहली बार शेर लिखते हैं जावेद और सुलह कर लेते हैं अपनी विरासत और मरहूम वालिद से.यहाँ साथ मिलता है मशहूर शायर कैफी आज़मी की बेटी शबाना का और जन्म होता है एक नए रिश्ते का. फिल्मों में उनकी शायरी सराही गयी, "साथ साथ" के खूबसूरत गीतों में. "सागर", "मिस्टर इंडिया", के बाद "तेजाब" में उनके लिखे गीतों को बेहद लोकप्रियता मिली, फिर आई "१९४२- अ लव स्टोरी" जिसके गीतों ने उन्हें इंडस्ट्री में स्थापित कर दिया जिसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड कर नहीं देखा. आज उनका बेटा फरहान और बेटी जोया दोनों ही फिल्म निर्देशन में हैं, ये भी एक विडम्बना है कि जावेद हमेशा से ही किसी फिल्म का निर्देशन करना चाहते थे, पर कभी साहस न कर पाए. पर अपने बच्चों की सफलता में उनका योगदान अमूल्य है. शबाना आज़मी कितनी सफल अभिनेत्री हैं ये बताने की ज़रूरत नहीं है, फरहान और जोया की वालिदा हनी ईरानी भी एक स्थापित पठकथा लेखिका हैं.

अनेकों फिल्म फेयर, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार और सम्मान पाने वाले जावेद अपने संघर्ष के मुश्किल दिनों को याद कर अपनी पुस्तक "तरकश" में एक जगह लिखते हैं - "उन दिनों मैं कमाल स्टूडियो (अब नटराज स्टूडियो) के एक कमरे में रहता था, यहाँ मीना कुमारी के फिल्म "पाकीजा" में इस्तेमाल होने वाले कपडे आदि अलमारियों में भरे थे. एक दिन मैं अलमारी का खाना खोलता हूँ तो पड़े मिलते हैं -मीना कुमारी के जीते हुए तीन फिल्म फेयर अवार्ड्स भी. मैं उन्हें झाड़ पोंछकर अलग रख देता हूँ, मैंने जिंदगी में पहली बार किसी फिल्म अवार्ड को छुआ है. रोज रात को कमरा अन्दर से बंद कर वो ट्राफी अपने हाथ में लेकर आईने के सामने खडा होता हूँ और सोचता हूँ कि जब ये ट्राफी मुझे मिलेगी तो तालियों से गूंजते हुए हॉल में बैठे दर्शकों की तरफ मैं किस तरह मुस्कराऊंगा और कैसे हाथ हिलाऊंगा...". जावेद साहब की कविताओं, नज्मों, ग़ज़लों का का बहुत सा संकलन गैर फ़िल्मी संगीत की दुनिया में भी उपलब्ध है. उनकी पुस्तक तरकश खुद उनकी अपनी आवाज़ में ऑडियो फॉर्मेट में उपलब्ध है. जगजीत से उनकी बहुत सी ग़ज़लों और नज्मों को अपनी आवाज़ दी है, शंकर महादेवन, अलका याग्निक, आदि फनकारों ने उनके साथ टीम अप कर बहुत सी कामियाब एल्बम की हैं. नुसरत साहब की पहली पसंद भी वही थे. तो चलिए लौटते हैं अपनी फीचर्ड एल्बम "संगम" की तरफ. तीन रचनाएँ आप अब तक सुन चुके हैं....आज सुनिए तीन और शानदार ग़ज़ल/गीत इसी नायाब एल्बम से.

शहर के दुकानदारों....(उन्दा शायरी और रूहानी आवाज़ का जादूई मेल)


जिस्म दमकता (एक अनूठा प्रयोग है इस ग़ज़ल में, सुनिए समझ जायेंगे..)


और अंत में सुनिए ये लाजवाब गीत "मैं और मेरी आवारगी"


एल्बम "संगम" अन्य गीत यहाँ सुनें -

आफरीन आफरीन...
आपसे मिलके हम...
अब क्या सोचें...



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की.यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


Tuesday, May 12, 2009

वाइस ऑफ़ हेवन - कोई बोले राम-राम, कोई खुदाए........नुसरत फ़तेह अली खान.

बात एक एल्बम की # 06

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - "संगम" - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर

आलेख प्रस्तुतीकरण - नीरज गुरु "बादल"

आज फिर नुसरत जी पर लिखने बैठा हूँ, समझ नहीं आता है कि क्या करूँ जो इस शख्स का नशा मुझ पर से उतर जाए. इनका हर सुर खुमारी का वो आलम लेकर आता है कि बस आँखें बंद हो जाती हैं, शरीर के कस-बल ढीले पड़ जाते हैं और एक गहरी ध्यान-मुद्रा में चला जाता हूँ. फिर लगता है कि कोई भी मुझे छेड़े नहीं. पर यह दुनिया है बाबा.....वो मुझे नहीं छोड़ती और यह नुसरत साहब मुझसे नहीं छूटते हैं. आज यही कशमकश मैं आपके साथ बाँटने निकला हूँ.

आज जिस नुसरत साहब को हम जानते हैं, उन्हें पाकिस्तानी मौसिकी का रत्न कहा जाता है, बात बड़ी लगती है-सही भी लगती है, पर मेरी नज़र में उन्हें विश्व-संगीत की अमूल्य धरोहर कहा जाए तो कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी. सूफियाना गायन ऐसा है कि कोई भी उसका दीवाना हो जाए, पर यह दीवानगी पैदा करने के लिए ही उस खुदा ने नुसरत जी को हमारे बीच भेजा था. उन्होंने क़व्वाली के ज़रिये, इस सूफियाना अंदाज़ को, जो इस भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ हिस्सों में ही मक़बूल था, दुनिया भर को दीवाना बनाने का काम किया है. उनकी क़व्वाली गायन का अंदाज़ ऐसा कि सुनने वाला तो नशे में खो ही जाता है, और जो उन्हें सामने गाता हुआ देखता है, तो यह नशा उसके साथ ता-उम्र के लिए ही ठहर जाता है. फिर आप लाख कोशिशे कर लें, नशा न उतरता है - न कहीं जाता है.

आम तौर पर क़व्वाली के बारे में माना जाता है कि यह सूफी संतों की मज़ारों पर गायी जाने वाली भक्ति गायन की एक विधा है, जिसका एक सीमित दायरा है. इसका एक खास तबका है और असर भी वहीँ तक सीमित है. यह ठीक भी है और एक हद तक सही भी था, पर १९३१ में फिल्मों के आगमन ने क़व्वाली की शक्ल ही बदल दी, अब क़व्वाली खुदा-ए-आलम, खुदा-ए-इश्क से बाहर आकर और भी नए मायने लिए अपने एक खास तबके से आगे निकल कर अन्य लोगों की भी हो गई. नए साज, नए उपकरण, नया माहौल, नए प्रयोगों ने क़व्वाली की दशा-दिशा ही बदल दी.

उसी दौर में एक शख्स ने बड़े चुपचाप अपना परिचय दिया, नुसरत फतह अली खान, पहले तो अपने पिता की शागिर्दी की फिर पिता के बाद अपने चचा उस्ताद मुबारक अली खान की शागिर्दी की, पहली बार मंच चचा ने ही दिया, पर १९७१ में चचा उस्ताद मुबारक अली खान की म्रत्यु के बाद जब नुसरत जी ने अपनी क़व्वाली पार्टी बनाई तो जैसे क़व्वाली के एक नए युग की शुरुआत हुई. इस पार्टी का नाम रखा गया,"नुसरत फ़तेह अली खान-मुजाहिद मुबारक अली खान एंड पार्टी".मुजाहिद उनके चचा के सुपुत्र. इस पार्टी ने अपना पहला कार्यक्रम, रेडियो पाकिस्तान के वार्षिक संगीत समारोह,"जश्न-ए-बहारा" के लिए दिया और क़व्वाली अपने घर से निकलकर दुनिया को अपना बनाने के लिए चल पड़ी.

बाद में ८० के दशक में बर्मिंघम-इंग्लैंड की कम्पनी -ओरियंटल स्टार ऐजेंसी ने नुसरत जी को साइन किया तो जैसे उनके लिए दुनिया के दरवाज़े खुल गए या और भी बेहतर कहूँ तो कह सकता हूँ कि उन्होंने अपने दरवाज़े दुनिया में संगीत के दीवानों के लिए खोल दिए. पीटर ग्रेबियल के "द लास्ट टेम्पटेशन ऑफ़ क्राइस्ट" ने उन्हें पश्चिम के घर-घर तक पहुंचा दिया. उसके बाद तो जैसे ख्याल-ध्रुपद में रचे-बसे सुरों की बरसात ही शुरू हो गई हो,"रियल वर्ल्ड","मस्त-मस्त","स्टार राईस","द प्रेयर सायकल"......और फिर आप गिनते जाइये-गुनगुनाते जाइये. गिनिस बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकार्ड के मुताबिक उनके क़व्वाली पर १२५ एल्बम हैं, इनमें उनके इस दुनिया-ए-फानी से रूखसती के बाद जारी एल्बम शामिल नहीं हैं. आप नशे का अन्दाज़ा लगा सकते हैं.

हिंदी फिल्मों में उन्होंने,"और प्यार हो गया",जिसमें वह खुद रूबरू थें,"कच्चे धागे", और विशेषकर "धड़कन" जिसकी क़व्वाली में "...धड़कन-धड़कन-धड़कन" का आरोह-अवरोह आप अपनी रूह तक महसूस कर सकते हैं. एक बेहद सतही फिल्म में इतना उच्च कोटी का गायन, संगीत रसिज्ञों को चौका देता है. दरअसल यही है नुसरत जी का कमाल. उन्होंने अपनी गायकी पर - क़व्वाली पर ढेरों प्रयोग किये, दुनिया के हर साज़ और मौसिकी के हर रंग को उन्होंने अपने लिए इस्तेमाल किया,पर कभी भी उसके चलते किसी भी कमतरी से कोई समझौता नहीं किया. इस फिल्म का यह गायन इसका सर्वश्रेष्ठ उदहारण है. तब जब उन्हें कोई "बाब मेर्लो ऑफ़ पाकिस्तान" या "एल्विस ऑफ़ ईस्ट" कहाता है तो मुझे बड़ा दुःख होता है.नुसरत जी, नुसरत जी हैं, उन्हें वही रहने दो, तुलना ज़रूरी है क्या?

हाँ,जब कोई उन्हें "वाइस ऑफ़ हेवन" कहता है तो बड़ा ही सुखद लगता है. खुदा की इस आवाज़ को और क्या कहेगें आप. एक लम्बी सूची है, उनके सुर-स्वर से सजी रचनाओं की. सोचता हूँ इस पर बात करूँ या उस पर बात करूँ. सब एक से बढ़कर एक धुनें हैं, राग हैं, ख्याल है, ध्रुपद हैं, उर्दू है, पंजाबी है, कहीं-कहीं अरबी-फ़ारसी भी है, दुनिया भर की लोक धुनों पर किये गए प्रयोग हैं, परम्परा और आधुनिक वाद्यों का संगम है, कई बार लगता है कि अरे, ऐसा भी है. सुनते-सुनते मुहँ से बेसाख्ता निकल पड़ता है तो सिर्फ एक ही लफ्ज़ - वाह. अगर आपने नुसरत जी के पापुलर एल्बम ही सुने हैं तो मेरी गुजारिश है कि और भी ढूंढे इस महान गायक की गायकी को और अपना जीवन धन्य बना लें, आखिर यह आवाज़ है जन्नत की-उस परवरदिगार की, जिसे कहा गया है -"वाइस ऑफ़ हेवन".

चलिए लौटते हैं हमारे फीचर्ड एल्बम की तरफ जहाँ नुसरत साहब का साथ दे रहे हैं गीतकार जावेद अख्तर. इसी "संगम" का रचा "आफरीन आफरीन" हम सुन चुके हैं, आज सुनिए दो और शानदार ग़ज़लें -

अब क्या सोचें क्या होना है....(इस ग़ज़ल में नुसरत साहब ने एक ऐसा माहौल रचा है जो आज की अनिश्चिताओं से भरी दुनिया में निर्णय लेने वाले हर शख्स के मन में पैदा होती है. ये गायिकी बेमिसाल है)



और अब सुनिए इसके ठीक विपरीत प्यार के उस पहले दौर की दास्ताँ इस गीत में -
आप से मिलके हम कुछ बदल से गए....



आने वाले सप्ताह में बातें करेंगे इस एल्बम के दूसरे फनकार जावेद अख्तर साहब की और सुनेंगें कुछ और रचनाएँ इसी एल्बम से. तब तक के लिए इजाज़त.


"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार नीरज गुरु. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


Tuesday, May 5, 2009

आफ़रीन आफ़रीन...कौन न कह उठे नुसरत साहब की आवाज़ और जावेद साहब को बोलों को सुन...

बात एक एल्बम की # 05

फीचर्ड आर्टिस्ट ऑफ़ दा मंथ - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर.
फीचर्ड एल्बम ऑफ़ दा मंथ - "संगम" - नुसरत फतह अली खान और जावेद अख्तर



उन दिनों मैं राजस्थान की यात्रा पर था, जहाँ एक बस में मैंने उसके घटिया ऑडियो सिस्टम में खड़खड़ के बीच, "आफरीन-आफरीन.." सुना था. ज़्यादा समझ में नहीं आया पर धुन कहीं अन्दर जाकर समां गई- वहीँ गूँजती रही. फिर जब उदयपुर की एक म्यूजिक शाप पर फिर उसी धुन को सुना जो अबकी बार कहीं ज़्यादा बेहतर थी तो एक नशा-सा छा गया. यह आवाज़ थी जनाब नुसरत फतह अली भुट्टो साहब की. क्या शख्सियत, आवाज़ में क्या रवानगी, क्या खनकपन, क्या लहरिया, क्या सुरूर और क्या अंदाज़ गायकी का, जैसे खुदा खुद ज़मी पर उतर आया हो.

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि जब नुसरत साहब गाते होगें, खुदा भी वहीँ-कहीं आस-पास ही रहता होगा, उन्हें सुनता हुआ मदहोश-सा. धन्य हैं वो लोग, जो उस समय वहां मौजूद रहें होगें. उनकी आवाज़-उनका अंदाज़, उनका वो हाथों को हिलाना, चेहरे पर संजीदगी, संगीत का उम्दा प्रयोग, यह सब जैसे आध्यात्म की नुमाइंदगी करते मालूम देते हैं. दुनिया ने उन्हें देर से पहचाना, पर जब पहचाना तो दुनिया भर में उनके दीवानों की कमी भी नहीं रहीं. १९९३ में शिकागो के विंटर फेस्टिवल में वो शाम आज भी लोगो को याद हैं जहाँ नुसरत जी ने पहली बार राक-कंसर्ट के बीच अपनी क़व्वाली का जो रंग जमाया,लोग झूम उठे-नाच उठे, उस 20 मिनिट की प्रस्तुति का जादू ता-उम्र के लिए अमेरिका में छा गया. वहीं उन्होंने पीटर ग्रेबियल के साथ उनकी फिल्म्स को अपनी आवाज़ दी और उनके साथ अपना अल्बम "शहंशाह" भी निकाला. नुसरत साहब की विशेषता थी पूर्व और पश्चिम के संगीत का संगम करके उसे सूफियाना अंदाज़ में पेश करना. क़व्वाली को उन्होंने एक नया मुकाम दिया. संगीत की सभी शैलियों को आजमाते हुए भी उन्होंने सूफियाना अंदाज़ नहीं छोडा और न ही कोई छेड़-छाड़ की खुद से. दुनिया यूँ ही उनकी दीवानी नहीं है. क़व्वाली के तो वे बे-ताज बादशाह थे.

कव्वालों के घराने में 13 अक्तूबर 1948 को पंजाब के फैसलाबाद में जन्मे नुसरत फतह अली को उनके पिता उस्ताद फतह अली खां साहब जो स्वयं बहुत मशहूर और मार्रुफ़ कव्वाल थे, ने अपने बेटे को इस क्षेत्र में आने से रोका था और खानदान की 600 सालों से चली आ रही परम्परा को तोड़ना चाहा था पर खुदा को कुछ और ही मंजूर था, लगता था जैसे खुदा ने इस खानदान पर 600 सालों की मेहरबानियों का सिला दिया हो, पिता को मानना पड़ा कि नुसरत की आवाज़ उस परवरदिगार का दिया तोहफा ही है और वो फिर नुसरत को रोक नहीं पाए और आज इतिहास हमारे सामने है.

जब नुसरत जी गुरु नानक की वाणी,"कोई कहे राम-राम,कोई खुदाए...."को अपनी आवाज़ देते हैं तो तो सुनने वाला मदहोशी में डूब जाता है. ऐसा निराला अंदाज़, दुनिया भर में जो लोग पंजाबी-उर्दू और क़व्वाली नहीं भी समझ पाते थें, पर उनकी आवाज़ और अंदाज़ के दीवानें थें. उन्हीं दीवानों में से एक -"गुडी", जो स्वयं एक मशहूर कम्पोजर और निर्माता रहे हैं, ने नुसरत जी को समझने के लिए अनुवादक का सहारा लिया और इस गायक को समझा. फिर दोनों दीवानों ने मिलकर एक अल्बम."डब क़व्वाली" के नाम से भी निकाला. गुडी ने नुसरत साहब के काम को दुनिया भर में फैलाया.गुडी बड़ी विनम्रता से कहते हैं,"यह उनके लिए बड़े भावनात्मक पल रहे हैं." इसी अल्बम में "बैठे-बैठे,कैसे-कैसे...." सुनिए,शुरुआती ३० सेकेण्ड ही काफी हैं, नशे में डूब जाने के लिए. पूर्व और पश्चिम में के आलौकिक फ्यूजन में भी उन्होंने अपना पंजाबीपन और सूफियाना अंदाज़ नहीं छोडा और फ्यूजन को एक नई परिभाषा दी. उन्होंने सभी सीमाओं से परे जाकर गायन किया. खाने के बेहद शौकीन नुसरत जी ने सिर्फ इस मामले में अपने डाक्टरों की कभी नहीं सुनी. जी भरकर गाया और जी भरकर खाया. महान सूफी संत और कवि रूमी की कविता को नुसरतनुमा अंदाज़ में क़व्वाली की शक्ल में सुनना, दावे से कहता हूँ कि बयां को लफ्ज़ नहीं मिलेगें. जिबरिश करने को जी चाहेगा. नुसरत और रूमी, मानो दो रूह मिलकर एक हो गई हों. बस आप सुनते चले जाएँ और कहीं खोते चले जाए.

मैं लिखता चला जाऊं और आप इस गायक को सुनते चले जाएँ और सब सुध-बुध खो बैठे, ऐसा हो सकता है.सुनिए,"मेरा पिया घर आया....","पिया रे-पिया रे.....","सानु एक पल चैन...","तेरे बिन.....","प्यार नहीं करना...." "साया भी जब साथ छोड़ जाये....","साँसों की माला पे...."और न जाने ऐसे कितने गीत हैं, ग़ज़ल हैं, कव्वालियाँ है, दुनिया भर का संगीत खुद में समेटे हुए, इस गायक को यदि नहीं सुना हो सुनने निकलिए, हिंदी फिल्मों से, पंजाबी संगीत से, सूफी संगीत से, फ्यूजन से कहीं भी चले जाइए, यह गायक, नुसरत फतह अली भुट्टो, आपको मिल जायेगा, आपको मदहोश करने के लिए-आपको अध्यात्मिक शांति दिलाने के लिए.....हर जगह -हर रूप में मौजूद है नुसरत साहब. इन्हें आप किसी भी नामी म्यूजिक -शाप में "वर्ल्ड-म्यूजिक" की श्रेणी में ही पायेगें. 16 अगस्त १९९७ को जब नुसरत साहब ने दुनिया-ए-फानी को अलविदा कहा, विश्व-संगीत में एक गहरा शोक छा गया. पश्चिम ने शोक में डूबकर कहा, पाकिस्तान ने दुनिया को जो अनमोल रत्न दिया था, आज हम उसे खो बैठे हैं और उनके पूर्व वालों की जैसे सिसकियाँ ही नहीं टूट रहीं हो, उन्हें लगा जैसे उनके बीच से खुदा की आवाज़ ही चली गई है.

नुसरत साहब पर और बातें होंगीं पर फिलहाल बढ़ते हैं इस माह के फीचर्ड अल्बम की तरफ. अपने पाकिस्तानी अल्बम्स से भारत में धूम मचाने के बाद नुसरत साहब को जब बॉलीवुड में फिल्म का न्योता मिला तो उन्होंने शायर के मामले में अपनी पसंद साफ़ कर दी कि वो काम करेंगें तो सिर्फ जावेद अख्तर साहब के साथ. इसी जोड़ी ने एक बहतरीन अल्बम में भी एक साथ काम किया, जिसे शीर्षक दिया गया - "संगम", दो मुल्कों के दो बड़े फनकारों का संगम और क्या आश्चर्य जो इस अल्बम का एक एक गीत अपने आप में एक मिसाल बन जाये तो...

तो चलिए शुरुआत करते हैं "संगम" के सबसे हिट गीत "अफरीन अफरीन" से. क्या बोल लिखे हैं जावेद साहब ने और अपनी धुन और गायिकी से नुसरत साहब ने इस गीत को ऐसी रवानगी दी है कि गीत ख़तम होने का बाद भी इसका नशा नहीं टूटता. "आफरीन-आफरीन" सूफी कलाम में एक बड़ा मुकाम रखती है. इसे ऑडियो में सुनना एक आध्यात्मिक अनुभव से गुजरना होता है तो विजुअल में देखना एक आलौकिक अनुभव से गुजरना होता है. एक ही तर्ज़ के दो अनुभव, लिखने को शब्द नहीं मिलते हैं, कहने को कुछ बचता नहीं है. तो बस सुनते हैं हमारी फीचर्ड एल्बम संगम से ये पहला तराना -



साप्ताहिक आलेख - नीरज गुरु "बादल"



"बात एक एल्बम की" एक साप्ताहिक श्रृंखला है जहाँ हम पूरे महीने बात करेंगे किसी एक ख़ास एल्बम की, एक एक कर सुनेंगे उस एल्बम के सभी गीत और जिक्र करेंगे उस एल्बम से जुड़े फनकार/फनकारों की. इस स्तम्भ को आप तक ला रहे हैं युवा स्तंभकार नीरज गुरु. यदि आप भी किसी ख़ास एल्बम या कलाकार को यहाँ देखना सुनना चाहते हैं तो हमें लिखिए.


Tuesday, December 16, 2008

तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा...

ग्रेट शो मैन राज कपूर की जयंती पर विशेष


१४ दिसम्बर को हमने गीतकार शैलेन्द्र को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया था. गौरतलब ये है कि फ़िल्म जगत में उनके "मेंटर" कहे जाने वाले राज कपूर साहब की जयंती भी इसी दिन पड़ती है. पृथ्वी राज कपूर के एक्टर निर्माता और निर्देशक बेटे रणबीर राज कपूर को फ़िल्म जगत में "ग्रेट शो मैन" के नाम से भी जाना जाता है. हिन्दी फिल्मों के लिए उनका योगदान अमूल्य है. १९४८ में बतौर अदाकार शुरुआत करने वाले राज कपूर ने मात्र २४ साल की उम्र में मशहूर आर के स्टूडियो की स्थापना की और पहली फ़िल्म बनाई "आग" जिसमें अभिनय भी किया. फ़िल्म की नायिका थी अदाकारा नर्गिस. हालाँकि ये फ़िल्म असफल रही पर नायक के तौर पर उनके काम की तारीफ हुई. नर्गिस के साथ उनकी जोड़ी को प्रसिद्दि मिली १९४९ में आई महबूब खान की फ़िल्म "अंदाज़" से. निर्माता निर्देशक और अदाकार की तिहरी भूमिका में फ़िल्म "बरसात" को मिली जबरदस्त कमियाबी के बाद राज कपूर ने फ़िल्म जगत को एक से बढ़कर एक फिल्में दी और कमियाबी की अनोखी मिसालें कायम की. आईये आज उन्हें याद करें उनकी चंद फिल्मों का जिक्र कर.

शुरुआत करते हैं राज साहब की अमर कृति "आवारा" से. ये वो फ़िल्म है जिसने राज कपूर को देश विदेश में एक बड़े कलाकार के रूप में स्थापित किया. भारत में बेहद कामियाब हुई इस लाजवाब फ़िल्म को एशिया और रूस में भी जबरदस्त सराहना मिली. राज साहब की अपनी एक टीम हुआ करती थी जिन पर वो भरोसा करते थे. आर के स्टूडियो में बनी इस पहली फ़िल्म में भी सभी उनके चहेते साथी थे. अभिनेत्री नर्गिस थी जोडीदार तो संगीत का जिम्मा था शंकर जयकिशन शैलेन्द्र और हसरत की टीम पर, आवाजें थी मुकेश (राज कपूर) और लता (नर्गिस) की. इस फ़िल्म में ही पहली बार राज कपूर चैपलिन के भेष में दिखाई दिए थे. हालाँकि ये एक छोटा सा तोहफा था राज का अपने प्रिये अभिनेता के लिए (श्री ४२० में ये अधिक मुखर था),पर सिने प्रेमी इस लघु भूमिका को नही भूले. राज कपूर के प्रशंसकों को ये जानकर खुशी होगी ये परिधान आज भी आर के स्टूडियो ने जतन से सहेज कर रखा हुआ है. राज कपूर और नर्गिस कभी न बिछड़ने वाले प्रेमी युगल के रूप में परदे पर आए और छा गए. फ़िल्म का एक एक गीत एक शाहकार बना था. शीर्षक गीत 'आवारा हूँ' और 'दम भर जो उधर मुंह फेरे ..." के आलावा एक ९ मिनट का स्वप्न दृश्य गीत अपने बहतरीन सेट सज्जा के लिए आज भी जाना जाता है. घुमावदार सीढियों और उड़ते बादलों के बीच (स्वर्ग) में लय पर थिरकरी अप्सराएँ और सब से उपर की सीढ़ी पर खड़ी नायिका गा रही है "तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा ..." नायक काली टी शर्ट और पैंट पहने कहीं नर्क जैसी जगह में तड़प रहा है "ये नही ये नहीं जिन्दगी...." चारों तरफ़ आग है नाचते अस्थि पिंजर और शैतानी मुखौटों से मुक्त हो कर अंत में वह बादलों से निकलता है और ध्वनि होती है "ओम् नम शिवाय..." की. ब्रह्म विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति है सीढियों की शुरुआत में नायिका नीचे उतरती है और नायक को ऊपर स्वर्ग की तरफ़ ले चलती है गाती हुई "घर आया मेरा परदेसी...". घुमावदार सीढ़ियों से नायिका के पीछे चलता नायक अंत में नटराज की मूर्ति के आगे पहंचता है. जहाँ से एक नई सड़क चलती है, यहीं खलनायक एक चाकू लिए प्रकट होता है. नायक नायिका का नाम पुकारता है पर जब तक नायिका उस तक पहुंचें नायक एक बार फ़िर गर्त में गिर कर ख़ाक हो जाता है. ये स्वप्न दृश्य एक "विसुअल ट्रीट" है अवश्य देखें -



१९६४ में आई "संगम" राज की पहली रंगीन फ़िल्म थी और पहली ऐसी फ़िल्म जो उन्होंने विदेश में शूट की. दरअसल इसी फ़िल्म ने विदेश में शूट करने का ट्रेंड शुरू किया था. बाद में तो लगभग हर फ़िल्म में एक गीत स्विट्जरलैंड में शूट करना लाजमी हो गया चाहे उसका कहानी से कुछ लेना देना हो या नही. साधारण सी प्रेम त्रिकोण कहानी में भी उनका निर्देशन फ़िल्म की जान था. हालाँकि फ़िल्म कुछ जरुरत से ज्यादी लम्बी थी पर राज साहब हमेशा ही बड़े कैनवास के फिल्मकार थे. राज की हर फ़िल्म की तरह इस फ़िल्म के गीतों ने भी धूम मचायी. "बोल राधा बोल", "बुड्डा मिल गया", "ये मेरा प्रेम पत्र" जैसे लाजवाब गीतों के अलावा एक गीत और था "दोस्त दोस्त न रहा...". जिस खूबसूरती से राज ने इस गीत को फिल्माया फ़िल्म का एक एक किरदार और उसके मन के भावों जिस तरीके परदे पर उभारा गया इस गीत में, वो हिन्दी फ़िल्म क्राफ्ट में राज की दक्षता का जीवंत उदाहरण है.

कुछ साल और आगे बढ़ते हैं. शानदार अभिनय से सजी "तीसरी कसम" और उनकी बेहद महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की नकामियाबी ने राज को बहुत बड़ा सदमा दिया. उन्होंने फैसला किया की अब वो अभिनय नही करेंगे. चुनांचे उन्होंने परदे पर उतरा अपने मंझले बेटे ऋषि कपूर को. ऋषि इससे पहले "मेरा नाम जोकर" राज के बचपन की भूमिका निभा चुके थे. साथ ही एक नई नायिका दी उन्होंने फ़िल्म जगत को डिम्पल कपाडिया के रूप में. दोनों ही कलाकार अपनी "टीनएज" अवस्था में थे जब ये फ़िल्म शुरू की. "बॉबी" को हम राज की पहली शो मैन सरीखी फ़िल्म मान सकते हैं जहाँ उन्होंने फ़िल्म को कामियाब बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाए और फ़िल्म को एक "लार्जर देन लाइफ" प्रस्तुति दी. के ऐ अब्बास की लिखी इस प्रेम कहानी में राज ने सब कुछ दिया दर्शकों को. सुखद अंत दिया कहानी को ताकि खतरा कम रहे असफलता का. सुपर हिट संगीत और नए परिधानों में सजा धजा एक प्रेमी युगल जिसने एक पूरी पीढी को प्रेरित किया दीवारों को तोड़ कर प्रेम करने के लिए. ऋषि कपूर अगले २० सालों तक कमोबेश इसी रोमांटिक इमेज में जीये. फ़िल्म का एक दृश्य विशेष ध्यान आकर्षित करता है. युवा नायक नायिका से मिलने उसके घर जाता है. पकौडे बना रही नायिका जब दरवाज़ा खोलती है तो अनजाने में हाथ में लगा आटा अपने बालों में लगा बैठती है. कहते हैं कि जब राज पहली बार नर्गिस के घर गए थे तब कुछ ऐसा ही हुआ था. नायक का नायिका से पूछना "मुझसे दोस्ती करोगी" एक ऐसा संवाद था जिसने आने वाली पीढी के फिल्मकारों को एक लड़का और लड़की की दोस्ती और प्रेम जैसे विषय पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया. सूरज बड़जात्या की "मैंने प्यार किया" और करण जौहर की "कुछ कुछ होता है" जैसी फिल्में इसका उदाहरण है. राज साहब की ८४ वीं जयंती पर उन्हें आवाज़ का सलाम.

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