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Saturday, July 1, 2017

चित्रकथा - 25: हिन्दी फ़िल्म संगीत में गायिका सबिता चौधरी का योगदान

अंक - 25

गायिका सबिता चौधरी को श्रद्धांजलि


"मन ना मोरे सता, देख मोहे बता..." 





सबिता चौधरी (1945 - 2017)


29 जून 2017 को जानी-मानी गायिका सबिता चौधरी का 72 वर्ष की आयु में निधन हो गया। बांग्ला फ़िल्मी व ग़ैर-फ़िल्मी गीतों की मशहूर गायिका सबिता जी ने कई हिन्दी फ़िल्मों के लिए भी पार्श्वगायन किया है। सुप्रसिद्ध संगीतकार सलिल चौधरी की पत्नी सबिता चौधरी का संगीत के धरोहर को समृद्ध करने में उल्लेखनीय योगदान रहा। आइए आज याद करें उन हिन्दी फ़िल्मी गीतों को जिनमें सबिता जी की आवाज़ शामिल हैे। आज के ’चित्रकथा’ का यह अंक समर्पित है स्वर्गीया सबिता चौधरी की पुण्य स्मृति को।



ल मुसलाधार बारिश हो रही थी। घर के बरामदे में बैठ कर बारिश को निहारता हुआ कुछ उदास सा हो गया था। एक कविता की पंक्तियाँ याद आ रही थीं - "उसकी हवा सारी ख़ुशी उड़ा ले गई, आज बारिश मुझे उदास कर गई। क्यों पता नहीं मेरा दिल दुखा गई, लगा ऐसे जैसे रोया हो बहुत, आसमाँ मेरी तरह, नहीं समझ आया क्या हुआ, बस मेरी आँख नम कर गई...।" और तभी बगल में बज रहे रेडियो पर सबिता चौधरी के स्वर्गवास की ख़बर सुनाई पड़ी। बारिश की रफ़्तार और तेज़ पकड़ रही थी। दूर किसी पेड़ से एक भीगा परिन्दा आसमान में उड़ गया, कुछ समय तक नज़र आया और फिर कहीं बारिश में, बादलों में खो गया। वापस मेरा ध्यान बज रहे रेडियो पर आया। अचानक ख़याल आया कि सबिता जी का गाया आख़िरी हिन्दी फ़िल्मी गीत शायद 1995 की फ़िल्म ’मेरा दामाद’ में था जिसे उन्होंने शैलेन्द्र सिंह, अमित कुमार और अनुराधा पौडवाल के साथ मिल कर गाया था। 90 के दशक में यह गीत रेडियो पर कई बार सुनने को मिला है। और संयोग की बात देखिए कि यह गीत भी बारिश का ही गीत है। फ़र्क़ सिर्फ़ इस बात का है कि यह एक ख़ुशनुमा गीत है - "घिर घिर बरसे आज गगन से ये कैसे बादल, आए मतवाले मतवाले प्यार के ये पल..."।

सबिता चौधरी सलिल चौधरी की दूसरी पत्नी थीं। विवाह से पहले उनका नाम था सबिता बनर्जी। हिन्दी फ़िल्मों में पार्श्वगायन की जहाँ तक बात है, पहली बार सबिता जी ने संगीतकार नाशाद (शौकत दहल्वी) के निर्देशन में 1954 की फ़िल्म ’दरवाज़ा’ में चार गीत गाए। फ़िल्म में उस दौर की एक और उभरती गायिका सुमन कल्याणपुर के भी कई गीत थे। दो गीतों में इन दोनों की आवाज़ें शामिल हैं। सबिता बनर्जी की आवाज़ में मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी ग़ज़ल "कोई किसलिए मेरी महफ़िल में आए, बूझी शमा हूँ मैं कोई किसलिए जलाए" को क्या ख़ूब गाया था उन्होंने! इस ग़ज़ल का शुरुआती शेर है "ना किसी की आँख का नूर हूँ, ना किसी के दिल का क़रार हूँ..." जिसे मुज़तर ख़ैराबादी (जाँ निसार अख़्तर के पिता) ने लिखा था और जिसे ग़लतफ़हमी वश बहादुर शाह ज़फ़र का कहा जाता रहा है। ख़ैर, इस ग़ज़ल के अलावा सबिता बनर्जी का गाया फ़िल्म का एक और एकल गीत था "दिल धड़का आँखें शरमाईं देख के जलवा प्यार का, अरमानों ने ली अंगड़ाई आया मौसम प्यार का"। ग़मज़दा ग़ज़ल और ख़ुशनुमा नग़मा, इन दोनों को गा कर उन्होंने साबित किया कि उनकी आवाज़ हर अंदाज़ को बयाँ करने के क़ाबिल है। इसी फ़िल्म में उनके साथ सुमन कल्याणपुर और कमला की आवाज़ों में दो सहेलियों वाले मस्ती भरे गीत थे - "ओ देखो देखो चाँद है निकला प्यारा प्यारा, धिन धिनक धिन दारा रा" और "A B C D E F भी ना जाने हम, करे गिटपिट बलम..."। इसी साल संगीतकार रॉबिन बनर्जी के संगीत में फ़िल्म आई ’अफ़्रीका’ जिसमें कुमार शर्मा बनवासी ने गीत लिखे। कम बजट की इस फ़िल्म के गीतों के लिए नई आवाज़ों को चुना गया। और ये गायिकाएँ थीं मुबारक बेगम, मनोरमा और सबिता बनर्जी। सबिता जी की आवाज़ में फ़िल्म का एकमात्र गीत था "आई हो बहार जी, मुझको तुझसे प्यार जी..."। फिर 1955 की एक फ़िल्म ’लुटेरा’ के एक फ़ीमेल डुएट के लिए सी. रामचन्द्र ने सबिता बनर्जी को आशा भोसले के साथ गवाया। यह एक माँ-बेटे का गीत है जिसमें आशा भोसले माँ की भूमिका में और सबिता चौधरी बेटे की भूमिका में गा रही हैं। सबिता जी ने बच्चे के अंदाज़ में कितना सुन्दर गाया है!

40 के दशक के अन्तिम दो वर्षों में, देश विभाजन के बाद, लता मंगेशकर पार्श्वगायिकाओं में सबसे उज्वल नक्षत्र बन कर उभरने लगीं और 50 के दशक के शुरु से ही आलम ऐसा हुआ कि हर एक प्रोड्युसर, डिस्ट्रिब्युटर और संगीतकार उन्हीं से अपनी फ़िल्मों में गवाना चाहते थे। इसका नतीजा यह हुआ कि अन्य गायिकाओं को मुख्यत: कम बजट की फ़िल्मों (जिन्हें हम बी और सी ग्रेड फ़िल्में कहते हैं) में ही गाने के मौके मिलते थे। सुमन कल्याणपुर, मुबारक बेगम, सुधा मल्होत्रा, कमल बारोट जैसी गायिकाओं की ही तरह सबिता बनर्जी को भी कम बजट की फ़िल्मों के संगीतकारों के लिए गाने के ही मौके मिलते रहे। 1956 में सबिता बनर्जी ने कम से कम पाँच फ़िल्मों में पार्श्वगायन किया पाँच अलग-अलग संगीतकारों के लिए - सनमुख बाबू (ललकार), कमल मित्र (यहूदी की बेटी), धनीराम (आँख का नशा), विनोद (मक्खी चूस) और बी. एन. बाली (बाग़ी सरदार)। इन फ़िल्मों की तरफ़ भले लोगों का ज़्यादा ध्यान न गया हो, लेकिन इनमें सबिता बनर्जी ने कई सुरीले नग़में गाए जो आज विस्मृत और दुर्लभ हो चुके हैं। ’ललकार’ फ़िल्म में सबिता चौधरी और महेन्द्र कपूर का गाया एक क़व्वालीनुमा नग़मा है "ओ बेदर्दी जाने के ना कर बहाने, मन की नगरिया से जाओ तो जाने"। ’यहूदी की बेटी’ में "रात आई दुल्हन बनके" और लक्ष्मी शंकर के साथ गाया हुआ "तू शमा और हम परवाने" जैसे गीत थे। ’आँख का नशा’ सबिता बनर्जी के करीअर का एक महत्वपूर्ण फ़िल्म थी क्योंकि यह वह पहली हिन्दी फ़िल्म थी जिसके लगभग सभी गीत उन्होंने ही गाए। इस फ़िल्म के तमाम गीतों में जो गीत सबसे ज़्यादा लोकप्रिय हुआ था, वह है "ऐ दिल ऐ दिल ऐ दिल हम तो हुए रुसवा, हाय सर-ए-महफ़िल"। इसी फ़िल्म के युगल गीतों में उनका साथ दिया था एस. बलबीर ने। बलबीर के साथ ’मक्खी चूस’ फ़िल्म के एक गीत में फिर एक बार सबिता बनर्जी ने आवाज़ मिलाई। यह गीत है "दिल धड़के आँख फड़के" जो एक पाश्चात्य शैली का क्लब या पार्टी डान्स क़िस्म का गीत है। ’बाग़ी सरदार’ में भी एक एकल गीत के अलावा भूषण के साथ उनकी गायी एक बड़ी ही ख़ूबसूरत ग़ज़ल थी "तेरे दिल से दिल टकरा गया, दो जहाँ की ख़ुशियाँ मिल गई, तेरा हाथ हाथ में आ गया, मेरे दिल की कलियाँ खिल गईं"। 1957 में पहली बार सबिता बनर्जी को मोहम्मद रफ़ी के साथ डुएट गाने का मौका मिला संगीतकार विनोद के निर्देशन में फ़िल्म ’गरमा गरम’ में। डी. एन. मधोक का लिखा यह एक हास्य गीत था "रखना दिल में दिल की बात, ना कटेंगे दिन ना कटेगी रात"। रफ़ी साहब के मस्ती भरे अंदाज़ के साथ क़दम से क़दम मिला कर सबिता जी ने इस गीत को एक ख़ूबसूरत अंजाम दिया था।

संगीतकार सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में सबिता चौधरी ने पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत गाया 1958 की कालजयी फ़िल्म ’मधुमती’ में। यह बड़े अफ़सोस की बात है कि इस फ़िल्म के तमाम लोकप्रिय गीतों के अलावा तीन गीत ऐसे थे जिनकी कभी चर्चा नहीं हुई या बहुत कम हुई। पहला गीत है मुबारक बेगम की आवाज़ में "हम हाल-ए-दिल सुनायेंगे सुनिये के ना सुनिये", दूसरा गीत है द्विजेन मुखर्जी की आवाज़ में "तन जले मन जलता रहे" और तीसरा गीत है आशा भोसले, सबिता चौधरी और ग़ुलाम मोहम्मद की आवाज़ में एक बड़ी ही दुर्लभ रचना "कंचा ले कंची लई लाग्यो" जो पहाड़ी धुनों पर आधारित रचना है। कुछ लोगों का कहना है कि यह गीत फ़िल्म में नहीं है, बस इसका शुरुआती संगीत के नृत्य के दृश्य में बजता है। ग़ौर तलब बात यह भी है कि इसी गीत में सबिता जी के नाम के साथ "चौधरी" लगा। ’मधुमती’ जैसी एक-ग्रेड फ़िल्म में गाने के बावजूद सबिता चौधरी को फिर एक बार कम बजट फ़िल्मों की तरफ़ ही रुख़ करना पड़ा और इसी साल ’राइफ़ल गर्ल’ और ’सुहाग’ जैसी फ़िल्मों में गीत गाए जिनके संगीतकार थे हरबंस और टी. जी. लिंगप्पा। दोनों ही फ़िल्मों में अतिरिक्त अभिनेत्री के लिए उन्होंने पार्श्वगायन किया और ये फ़िल्में भी नहीं चली। बुलो सी. रानी के संगीत में 1959 की फ़िल्म ’टिन टिन टिन’ में उन्होंने गाया "बाग़ों में फूलों की बहार आई, लेके जवानी का ख़ुमार आई"। इस गीत की ख़ास बात यह है कि यह आनन्द बक्शी के लिखे शुरुआती गीतों में से एक है और आगे चल कर उन्होंने बाग़ों में बहार आने को लेकर दो और गीत लिखे - "बाग़ों में बहार आई, होठों पे पुकार आई" (मोम की गुड़िया) और "बाग़ों में बहार है" (आराधना)। ये दो गीत तो बड़े मकबूल हुए पर सबिता चौधरी का गाया गीत अनसुना ही रह गया फ़िल्म के पिट जाने की वजह से। पौराणिक और ऐतिहासिक फ़िल्मों में संगीत देने में माहिर एस. एन. त्रिपाठी ने भी 1959-60 की दो फ़िल्मों में सबिता जी से गीत गवाए। ये फ़िल्में थीं ’पक्षीराज’ और ’वीर दुर्गादास’। ’पक्षीराज’ का गीत आशा भोसले के साथ गाया हुआ एक युगल गीत है। ’वीर दुर्गादास’ में भरत व्यास की लिखी लोरी "मत रो मत रो जननी के लाल" एक बेहद सुरीली रचना है जो परदे पर निरुपा रॉय पर फ़िल्माया गया था।


1960 में सबिता चौधरी को फिर एक बार सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में फ़िल्म ’हनीमून’ में एक गीत गाने का मौका मिला। शैलेन्द्र का लिखा यह मचलता खिलखिलाता हुआ गीत है "तुम जो मिले तो खिला है गुलाब मेरे दिल का, पिया तुम तोड़ न देना ये ख़्वाब मेरे दिल का"। इसी साल रॉबिन बनर्जी के संगीत में बच्चों की फ़िल्म बनी थी ’मासूम’। इस फ़िल्म में हेमन्त कुमार के संगीत में बस एक गीत था जिसे उन्हीं की बेटी रानु मुखर्जी ने गाया था - "नानी तेरी मोरनी को मोर ले गई"। इस सर्वाधिक लोकप्रिय गीत के अलावा इस फ़िल्म का एक और गीत गुदगुदाने वाला था "तू प्रेम नगर का साधु" जिसे रफ़ी साहब और सबिता जी ने गाया था। यह एक पैरोडी गीत था जिसमें उस दौर के हिट गीतों की पैरोडी शामिल की गई थी। आपको याद होगा कि इससे पहले सबिता और रफ़ी का गाया एकमात्र युगल गीत भी हास्य रस का ही था। 1961 की दो फ़िल्मों में सलिल दा के संगीत में सबिता जी ने गीत गाए। ’सपने सुहाने’ में एक से एक सुमधुर गीत थे जिनमें लता, मन्ना, द्विजेन मुखर्जी और सबिता चौधरी की आवाज़ें थीं। सबिता जी की आवाज़ में शैलेन्द्र के लिखे "चाँद कभी था बाहों में, फूल बिछे थे राहों में, अब तो वो सपने गए बिखर, डूब गए हम आहों में" गीत को सुन कर सचमुच यह विचार मन में उठता है कि सबिता जी को बड़ी फ़िल्मों में कुछ और गीत गाने के अवसर क्यों नहीं प्राप्त हुए! सलिल दा ने ही उनसे अधिक क्यों नहीं गवाया! इसी फ़िल्म में द्विजेन मुखर्जी के साथ गाया उनका एक युगल गीत है "नज़र से मिल गई नज़र, और पल में दिल हुआ तेरा" जो उस दौर के लोकप्रिय रोमान्टिक गीतों की शैली में रचा गया था। 1961 की दूसरी फ़िल्म थी ’उसने कहा था’ जो फ़िल्म इतिहास में एक यादगार फ़िल्म है। इसमें मख़दूम मोहिउद्दीन की एक रचना को सलिल दा ने कम्पोज़ किया था - "जाने वाले सिपाही से पूछो वो कहाँ जा रहा है"। गीत मूलत: मन्ना डे की आवाज़ में है, लेकिन हर अन्तरे के बाद आने वाले मुखड़े में सबिता चौधरी मुखड़े को ऊँची पट्टी पर गाती हैं। गीत का संगीत संयोजन, कोरस की शैली और सबिता चौधरी द्वारा केवल एक लाइन गाना हमें ’जिस देश में गंगा बहती है’ के "आ अब लौट चलें" गीत की याद दिला जाता है।

1961 की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही ’काबुलीवाला’। एक मार्मिक कहानी पर बनी इस फ़िल्म में सलिल चौधरी का संगीत था। फ़िल्म में एक्वल चार गीत थे। यूं तो "ऐ मेरे प्यारे वतन" और "गंगा आए कहाँ से" गीत ज़्यादा लोकप्रिय हुए, लेकिन फ़िल्म के शीर्षक गीत की भी अपनी अलग पहचान है। रानु मुखर्जी, सबिता बनर्जी, उषा मंगेशकर और हेमन्त कुमार का गाया यह गीत बच्चों वाले फ़िल्मी गीतों में एक ख़ास मुकाम रखता है। 1961 से 1965 के बीच सबिता चौधरी ने कई फ़िल्मों में गीत गाए जैसे कि सादत ख़ान के संगीत में फ़िल्म ’अरब का सितारा’, कृष्ण कमल के संगीत में ’डाकू मनसूर’, धनीराम के संगीत में ’बाजे घुंघरू’, एस. किशन के संगीत में ’प्राइवेट डिटेक्टिव’, रॉबिन बनर्जी के संगीत में ’टारज़न ऐन्ड डेलिला’, तथा रॉय फ़्रैंक के संगीत में ’चोर दरवाज़ा’ और ’गोगोला’ में। 1966 की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म थी ’नेताजी सुभाषचन्द्र बोस’ जिसमें सलिल चौधरी का संगीत था। इस फ़िल्म में कवि प्रदीप का लिखा हेमन्त कुमार और सबिता चौधरी का गाया एक बहुत ही सुन्दर देशभक्ति गीत है "जन्मभूमि माँ, मैं यहाँ तू वहाँ, तुझसे दूर जा रहा मैं जाने कहाँ"। गीत मूलत: हेमन्त दा की आवाज़ में है, सबिता जी ने आलाप गाए हैं जिनसे गीत की सुन्दरता को चार चाँद लगा है। 70 के दशक के आते-आते सबिता चौधरी ने हिन्दी फ़िल्मों के लिए गाना कम दिया। बाहर के संगीतकारों के लिए गाना उन्होंने बिल्कुल ही बन्द कर दिया। केवल सलिल दा के लिए वो इक्का-दुक्का गाने लगीं। फ़िल्मी गीतों का चलन बदल रहा था, लता और आशा लोकप्रियता के शिखर पर थे। ऐसे में हर तीसरी गायिका गुमनामी में खोए चली जा रही थीं। फिर भी जब भी कभी सलिल दा के निर्देशन में कुछ अच्छा गाने का अवसर आया, सबिता चौधरी ने अपने चाहने वालों को निराश नहीं किया। 

1972 में सलिल दा के संगीत निर्देशन में फ़िल्म ’अनोखा दान’ में किशोर कुमार के साथ सबिता चौधरी को एक गीत गाने का मौका मिला। यूं तो फ़िल्म के अन्य गीत लता जी की आवाज़ में थे, इस गीत में केवल सरगम गाने के लिए एक गायिका की आवश्यक्ता थी जिसे सलिल दा ने सबिता जी से गवाया। यह गीत है "आई घिर घिर सावन की काली काली घटाएँ, झूम झूम चली भीगी भीगी हवाएँ"। गीत सुन्दर है पर अफ़सोस इस बात का है कि कई गीतों में सबिता जी को बस आलाप, सरगम या फिर केवल एक पंक्ति गाने के लिए लिया गया है। इसी साल सलिल दा के ही संगीत में एक फ़िल्म आई ’अनोखा मिलन’। इस फ़िल्म में सबिता चौधरी का एक एकल गीत था "मन ना मोरे सता, देख मोहे बता, पिया गए कहाँ कोई जाने ना"; यह गीत असमीया बिहु गीत शैली पर आधारित है। बड़ा ही ख़ूबसूरत गीत और बड़े सुन्दर अंदाज़ में सबिता जी ने इसे गाया है। 1972 की सलिल दा के संगीत से सजी एक और उल्लेखनीय फ़िल्म थी ’अन्नदाता’ जिसके गीत बहुत मकबूल हुए थे। इसमें मन्ना डे और सबिता चौधरी का गाया योगेश का लिखा गीत था "यहाँ अब क्या रहना, किसी से क्या कहना" जिसे फ़िल्म की कहानी में एक पार्श्वगीत के रूप में प्रयोग किया गया है। इसी फ़िल्म में एक गीत सबिता चौधरी ने किशोर कुमार के साथ भी गाया था। सलिल दा के ही बांग्ला गीत "चम्पाबती कोन्या" का यह हिन्दी संस्करण है जिसका मुखड़ा है "ओ मेरी प्राण सजनी चम्पावती आजा..."। गीत का अधिकांश किशोर और साथियों ने गाया है, केवल एक अन्तरे में सबिता जी ने चन्द शब्द गाए हैं। 1977 की फ़िल्म ’मीनू’ में एक बार फिर योगेश - सलिल चौधरी की रचना को गाने का मौका सबिता जी को मिला। रानु मुखर्जी के साथ गाया यह गीत है "हम हैं फ़ूटपाथी, फ़ूटपाथ हमारा साथी"। यह गीत फ़िल्म का कमचर्चित गीत है जबकि "तेरी गलियों में हम आए" गीत को मकबूलियत मिली थी। 1979 की फ़िल्म ’जीना यहाँ’ में सलिल-योगेश ने सबिता जी से गवाया "यही है तो मेरे ख़्वाबों का जहाँ, ये सजी धरती, ये खुला खुला आसमाँ, कितना मधुर लगे जीना यहाँ"। शबाना आज़मी पर फ़िल्माया यह गीत कम सुना गया लेकिन कितनी सुन्दर रचना है यह। गीत के हर ज़र्रे में सलिल दा का स्टाइल महसूस किया जा सकता है। 1980 में एक फ़िल्म बनी थी ’चेम्मीन लहरें’ जिसमें फिर एक बार सलिल - योगेश के गीत थे। यह दरसल 1965 की मलयालम फ़िल्म ’चेम्मीन’ का हिन्दी संस्करण है। इसमें एक गीत था सुरेश वाडकर, हरिहरन, अन्तरा चौधरी और सबिता चौधरी की आवाज़ों में "सुन मतवारे पवन झोंका चला बसन्ती..."। गीत की धुन सलिल दा की ही फ़िल्म ’चंदा और बिजली’ के आशा भोसले के गाए मशहूर गीत "बाग़ में कली खिली बगिया महकी..." की धुन पर आधारित है। इस गीत के बाद पन्द्रह साल तक सबिता जी ने किसी हिन्दी फ़िल्म के लिए गीत नहीं गाया और 1995 में आख़िरी बार सलिल दा के ही संगीत में फ़िल्म ’मेरा दामाद’ का वह गीत गाया "घिर घिर बरसे आज गगन से..." जिसका उल्लेख हमने शुरु में ही किया था।

इस तरह से 1954 से लेकर 1995 तक सबिता चौधरी ने हिन्दी फ़िल्म संगीत जगत को कई सुरीले गीत दिए जो अब फ़िल्म संगीत के इस विशाल ख़ज़ाने में अनमोल मोतियों की तरह हैं। उनके गाए हिन्दी फ़िल्मी गीत बहुत ज़्यादा सुने नहीं गए, लेकिन उनके हर एक गीत को हम जब जब सुनते हैं, तो ऐसा लगता है कि जैसे ये अलग हट कर हैं। एक ख़ास पहचान रही सबिता चौधरी की आवाज़ की जो उन्हें अन्य गयिकाओं से अलग करती हैं। आज सबिता जी हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके गाए गुज़रे ज़माने के ये अनमोल नग़में सदा हमारे कानों और दिलों में मिश्री घोलते रहेंगे। ’रेडियो प्लेबैक इंडिया’ की तरफ़ से स्वर्गीया सबिता चौधरी को विनम्र श्रद्धांजलि!



आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Monday, June 7, 2010

"ज़रा मुरली बजा दे मेरे श्याम रे" - सबिता बनर्जी की आवाज़ में एक भूला बिसरा भजन

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 411/2010/111

मस्कार दोस्तों! बेहद ख़ुशी और जोश के साथ हम फिर एक बार आप सभी का 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल में हार्दिक स्वागत करते हैं। पिछले डेढ़ महीने से आप हर शाम 'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' का आनंद ले रहे थे, और हमें पूरी उम्मीद है और आप के टिप्पणियों से भी साफ़ ज़ाहिर है कि आपने इस विशेष प्रस्तुति को भी हाथों हाथ ग्रहण किया है। चलिए आज से हम वापस लौट रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के अपने उसी पुराने स्वरूप में और फिर से एक बार गुज़रे ज़माने के अनमोल नग़मों के उसी कारवाँ को आगे बढ़ाते हैं। अब तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की कुल ४१० कड़ियाँ प्रस्तुत हो चुकी हैं, आज ४११-वीं कड़ी से यह सिलसिला हम आगे बढ़ा रहे हैं। तो दोस्तों, इस नई पारी की शुरुआत कुछ ख़ास अंदाज़ से होनी चाहिए, क्यों है न! इसीलिए हमने सोचा कि क्यों ना दस ऐसे गानों से इस पारी की शुरुआत की जाए जो बेहद दुर्लभ हों! ये वो गानें हों जिन्हे आप में से बहुतों ने कभी सुनी ही नहीं होगी और अगर सुनी भी हैं तो उनकी यादें अब तक बहुत ही धुंधली हो गई होंगी। पिछले डेढ़ महीने में हमने यहाँ वहाँ से, जाने कहाँ कहाँ से इन दस दुर्लभ गीतों को प्राप्त किया है जिन्हे इस ख़ास लघु शृंखला में पिरो कर हम आज से आप तक पहुँचा रहे हैं। तो प्रस्तुत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर नई लघु शृंखला 'दुर्लभ दस'। शुरुआत ईश्वर वंदना के साथ; जी हाँ, एक भक्ति रचना से इस शृंखला का आग़ाज़ कर रहे हैं। ये है फ़िल्म 'बाजे घुंगरू' से सबिता बनर्जी की गाई हुई भजन "ज़रा मुरली बजा दे मेरे श्याम रे, पड़ूँ बार बार तोरी प‍इयाँ रे"। ये वो ही सबिता बनर्जी हैं जो आगे चलकर संगीतकार सलिल चौधरी की धर्मपत्नी बनीं और सबिता बनर्जी से बनीं सबिता चौधरी। युं तो इन्होने बंगला में ही ज़्यादा गीत गाए हैं, लेकिन हिंदी फ़िल्मों के लिए भी समय समय पर कई बार अपनी आवाज़ दी है।

'बाजे घुंगरू' १९६२ की फ़िल्म थी जिसका निर्माण किया था राम राज फ़िल्म्स ने। फ़िल्म को निर्देशित किया एस. श्रीवास्तव ने और इसके मुख्य कलाकार थे मनहर देसाई और नलिनी चोनकर। फ़िल्म में संगीत था धनीराम प्रेम का। प्रस्तुत भजन गीतकार शिवराज श्रीवास्तव का लिखा हुआ है। आपको यह भी बता दें कि इस फ़िल्म का शीर्षक गीत सबिता बनर्जी ने मोहम्मद रफ़ी और सीता के साथ मिलकर गाया था, जिसके बोल थे "बाजे घुंगरू छन छन छन"। संगीतकार धनीराम को शास्त्रीय संगीत को लुभावने रूप में ढालने की अपनी विशेषज्ञता प्रदर्शित करने का मौका इसी फ़िल्म में मिला। ख़ास कर आज की यह प्रस्तुत भजन, जिसमें सितार के टुकड़ों का इतनी मधुरता के साथ इस्तेमाल किया गया है कि भक्ति रस जैसे भजन के बोलों में ही नहीं बल्कि इसकी हर एक धुन में समा गई है। ६० के दशक का यह दौर धनीराम के संगीत सफ़र का आख़िरी दौर था। १९६२ में 'बाजे घुंगरू' के अलावा उन्होने फ़िल्म 'मेरी बहन' में भी संगीत दिया। फिर वर्षों उपेक्षित रहने के बाद उन्हे मिला १९६७ की फ़िल्म 'आवारा लड़की' में फिर एक बार शास्त्रीय शैली पर आधारित गानें बनाने का मौका। बहुत ही अफ़सोस की बात है कि इसके बाद धनीराम को किसी निर्माता ने मौका नहीं दिया। जैसे कि पंकज राग अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में लिखते हैं कि "यह विचार स्वयमेव ही आता है कि यदि कुछ निर्माताओं ने अपने 'बी' या 'सी' ग्रेड की सामाजिक फ़िल्मों में ही धनीराम को और अवसर दिया होता तो हमें शास्त्रीयता और सुगमता के बेहतरीन मिश्रण की पता नहीं कितनी और रसभरी रचनाएँ सुनने को मिल सकती थीं।" तो आइए दोस्तों, 'दुर्लभ दस' लघु शृंखला के पहले अंक में सुनते हैं शिवराज श्रीवास्तव का लिखा, धनीराम का संगीतबद्ध किया और सबिता बनर्जी का गाया फ़िल्म 'बाजे घुंगरू' से यह भजन।



क्या आप जानते हैं...
कि फ़िल्मों में संगीतकार बनने से पहले धनीराम ने लाहौर में कई फ़िल्मों में गायक के रूप में अपनी क़िस्मत आज़माई थी, जैसे कि फ़िल्म 'धमकी' (१९४५) और 'झुमके' (१९४६)।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. इस धार्मिक गीत के गायक मुख्य रूप से एक संगीतकार हैं, लेकिन उन्होने इस फ़िल्म में संगीत नहीं दिया है। ये वो शख़्स हैं जिनके दोनों बेटे मशहूर संगीतकार जोड़ी के रूप में फ़िल्म जगत में छाए। तो फिर इस गीत के गायक का नाम बताएँ। ४ अंक।

२. इस गीत के संगीतकार धार्मिक और पौराणिक फ़िल्मों के संगीतकार के रूप में जाने जाते हैं, और महत्वपूर्ण बात यह कि इनके संगीत से सजे एक धार्मिक फ़िल्म का एक गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हुआ कि उसे उस साल का सर्वश्रेष्ठ गीत करार दिया गया था। संगीतकार का नाम बताएँ। २ अंक।

३. यह फ़िल्म १९५३ की फ़िल्म है और फ़िल्म के शीर्षक में शक्ति की देवी का नाम छुपा है। फ़िल्म का नाम बताएँ। ३ अंक।

४. इस पूरे गीत में उसी देवी के चमत्कारों का वर्णन हुआ है जिनके नाम से फ़िल्म का शीर्षक है। गीत के बोल बताएँ। २ अंक।

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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