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Saturday, January 3, 2015

"तुझे देखा तो यह जाना सनम..." - 1000 सप्ताह पूर्ति पर DDLJ के इस गीत से जुड़ी कुछ बातें


एक गीत सौ कहानियाँ - 49
 

तुझे देखा तो यह जाना सनम...’




'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के मंच पर प्रकाशित और प्रसारित होने वाले साप्ताहिक स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ' के सभी श्रोता-पाठकों को नये वर्ष 2015 की पहली कड़ी में सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़ी दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 49वीं कड़ी में आज जानिये 1995 की फ़िल्म 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ के गीत "तुझे देखा तो यह जाना सनम..." के बारे में। इस फ़िल्म ने पिछले दिनों 1000 सप्ताह पूरे किये हैं, मुम्बई के ’मराठा मन्दिर’ सिनेमाघर में।



हिन्दी सिनेमा के इतिहास के सुनहरे पन्नों में जिन फ़िल्मों का शुमार होता है, उनमें से एक हैं ’दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे’, जिसे हम और आप प्यार से DDLJ कह कर बुलाते हैं। 1995 में प्रदर्शित इस फ़िल्म ने आज 1000 सप्ताह पूरे कर लिए हैं मुम्बई के ’मराठा मन्दिर’ सिनेमा घर में। पिछले 19 वर्षों से यह फ़िल्म लगातार हर रोज़ प्रदर्शित होती चली आई है इस थिएटर में जो अपने आप में एक रेकॉर्ड है। इस फ़िल्म की हर बात निराली है, हर पहलू सुपरहिट है, और उनमें संगीत भी एक ख़ास महत्व है। यूँ तो यश चोपड़ा की फ़िल्मों का संगीत हमेशा से ही सर चढ़ कर बोलता रहा है, पर DDLJ के गीतों ने तो लोकप्रियता की सारी हदें पार कर दी है। फ़िल्म के सातों गीत सूपर-डूपर हिट और एक से बढ़ कर एक। इनमें से कौन सा गीत उपर है और कौन सा नीचे, यह तय पाना आसान काम नहीं है। भले ही फ़िल्म के संगीतकार जतिन-ललित के लिए यह फ़िल्म किसी वरदान से कम नहीं थी, पर दुर्भाग्यवश उस साल का फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड ए. आर. रहमान की झोली में चला गया फ़िल्म ’रंगीला’ के लिए। DDLJ के अलावा अन्य नामांकन थे ’अकेले हम अकेले तुम’, ’राजा’ और ’करण अर्जुन’। पर जतिन-ललित को DDLJ के लिए लोगों का इतना ज़्यादा प्यार मिला कि जो हर पुरस्कार से बढ़ कर था। और हाल ही में BBC Asia ने एक मतदान करवाया जिसमें लोगों से सर्वश्रेष्ठ हिन्दी म्युज़िकल फ़िल्म के लिए अपना मत व्यक्त करने को कहा गया। इस मतदान के आख़िरी चरण में कुल 40 फ़िल्मों का चयन हुआ जिनमें ’मुग़ल-ए-आज़म’, ’तीसरी मंज़िल’, ’गाइड’, ’दिलवाले दुल्हनिआ ले जायेंगे’, ’कुछ कुछ होता है’ आदि फ़िल्में थीं, और जिस फ़िल्म को सर्वश्रेष्ठ म्युज़िकल फ़िल्म का ख़िताब मिला, वह फ़िल्म थी ’दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे।

यश चोपड़ा DDLJ से पहले की फ़िल्मों में संगीतकार शिव-हरि से संगीत तैयार करवा रहे थे। ’सिलसिला’, ’फ़ासले’, ’विजय’, ’लम्हे’, ’चाँदनी’ और ’डर’ जैसी फ़िल्मों में इनके संगीत थे। इन तमाम फ़िल्मों में या तो लोक धुनों पर आधारित गीतों की गुंजाइश थी या फिर इन फ़िल्मों के नायक-नायिका थोड़े से उम्रदराज़ थे, यानी कि थोड़े से वयस्क। लेकिन DDLJ की कहानी बिल्कुल अलग थी। इसमें नायक-नायिका बिल्कुल जवान, और यूरोप में पले बढ़े हैं; ऐसे में फ़िल्म का गीत-संगीत भी उसी अंदाज़ का होना चाहिए, इस बात को ध्यान में रखते हुए यश चोपड़ा ने संगीतकार जतिन-ललित को साइन करने का फ़ैसला किया। मेलडी में विश्वास रखने वाले यश जी जतिन-ललित के संगीत को सुन चुके थे और उस समय जतिन-ललित की जुबान पर मेलडियस संगीत चारों ओर धूम मचा रही थी। ’यारा दिलदारा’, ’जो जीता वही सिकन्दर’, ’खिलाड़ी’, ’राजू बन गया जेन्टलमैन’, और ’कभी हाँ कभी ना’ जैसी फ़िल्मों में सुपरहिट संगीत देकर जतिन-ललित शीर्ष के संगीतकारों की श्रेणी में जा बैठे थे। पर जब ’यशराज फ़िल्म्स’ की तरफ़ से उन्हें DDLJ में संगीत देने का मौका मिला तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा, जिसके दो मुख्य कारण थे। एक तो यह कि यश चोपड़ा की फ़िल्म में संगीत देना ही अपने आप में एक अहम सम्मान है, और दूसरा यह कि इस फ़िल्म में उन्हें लता मंगेशकर के साथ काम करने का मौका मिलेगा (लता जी के साथ जतिन-ललित की यह पहली फ़िल्म थी)। जतिन-ललित ने अपने एक इन्टरव्यू में यह कहा है कि इस फ़िल्म के गीतों को बनाते समय उन्होंने यह सोचा भी नहीं था कि ये गानें इतने ज़्यादा लोकप्रिय हो जायेंगे। फ़िल्म के सभी के सभी गीत कैसे इतने अच्छे बन गए यह उन्हें भी नहीं पता। ललित पंडित ने कहा है कि इस फ़िल्म के गीतों को पहले लिखा गया है और उसके बाद उनकी धुनें बनी हैं। गीतों के इन्टरल्यूड म्यूज़िक को रिचार्ड मित्र, अरेंजर बाबुल और ललित पंडित ने बनाया था।

और अब आते हैं "तुझे देखा तो यह जाना सनम..." पर। फ़िल्मी गीतों के इतिहास के सर्वश्रेष्ठ रोमान्टिक गीतों की सूची जब बनायी जाएगी तब उसमें इस गीत का ज़िक्र ज़रूर आएगा। गीतकार आनन्द बक्शी के सीधे-सच्चे शब्द लोगों के दिल में ऐसे उतर गए कि पिछले 19 सालों से निरन्तर सुनते रहने के बावजूद इस गीत से ऊबे नहीं। बक्शी साहब को इसी गीत के लिए उस साल सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला था। इससे पहले आनद बक्शी को केवल दो बार यह पुरस्कार मिला था - "आदमी मुसाफ़िर है" (अपनापन) और "तेरे मेरे बीच में" (एक दूजे के लिए) गीतों के लिए। DDLJ के लिए शाहरुख़ ख़ान के लिए उदित नारायण की आवाज़ तय हुई थी और अधिकांश गीतों में उदित की ही आवाज़ सुनाई दी है। पर दो गीत ऐसे हैं जिनमें अभिजीत और कुमार सानू की आवाज़ें हैं। "ज़रा सा झूम लूँ मैं" की मादकता को देखते हुए अभिजीत की आवाज़ ली गई, पर "तुझे देखा तो यह जाना सनम" के लिए उदित नारायण के स्थान पर कुमार सानू की आवाज़ को चुनने का निर्णय आश्चर्यपूर्ण है। दरसल बात ऐसी हुई कि इस गीत की शुरुआत "तुझे" शब्द से होती है और उदित नारायण का उच्चारण कुछ ऐसा है कि "झ" वाले शब्द कुछ-कुछ "ज्‍ह" जैसी सुनाई देती है (शायद उनके नेपाली होने की वजह से)। और क्योंकि शुरुआती मुखड़ा बिना किसी साज़ के शुरू होता है, ऐसे में उदित की आवाज़ में "तुझे" शब्द का उच्चारण ठीक ना होने की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया कि गीत को कुमार सानू से गवा लिया जाए। वैसे उदित नारायण को "मेहन्दी लगाके रखना" गीत के लिए सर्वश्रेष्ठ गायक का फ़िल्मफ़ेअर पुरस्कार ज़रूर मिला था। अब बात इस गीत के फ़िल्मांकन की। गीत फ़िल्माया गया था पीले सरसों के खेतों में। पर फ़िल्मांकन में कन्टिन्यूइटी की गड़बड़ी ज़रूर देखी जा सकती है। गीत शुरू होने से ठीक पहले सिमरन (काजोल) हरे घाँस वाले खेत में खड़ी हैं, पर अगले ही शॉट में वो पीले फूलों के खेत से दौड़ने लग पड़ती हैं। ख़ैर, जो हिट है, वही फ़िट है। "तुझे देखा" से सम्बन्धित एक अन्तिम जानकारी यह भी है कि 1998 की फ़िल्म ’प्यार तो होना ही था’ में जतिन-ललित ने लगभग इसी धुन पर कम्पोज़ किया था "अजनबी मुझको इतना बता दिल मेरा क्यों परेशान है" जिसे आशा भोसले और उदित नारायण ने गाया था और एक बार फिर काजोल पर ही फ़िल्माया गया था। पर इस गीत को वह ख्याति नहीं मिली जो ख्याति "तुझे देखा..." को मिली। लीजिए, अब आप वही चर्चित गीत सुनिए।

फिल्म - दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे : 'तुझे देखा तो ये जाना सनम...' : कुमार सानू और लता मंगेशकर : 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तम्भ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र

Thursday, June 2, 2011

रूठ के हमसे कभी जब चले जाओगे तुम....हर किसी के जीवन को कभी न कभी छुआ होगा मजरूह के इस गीत ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 670/2011/110

"मेरे पीछे ये तो मोहाल है कि ज़माना गर्म-ए-सफ़र न हो, कि नहीं मेरा कोई नक़्श-ए-पाँव जो चिराग़-ए-राह-गुज़र न हो", मजरूह साहब के लेखनी की विविधता ऐसी है कि आने वाली तमाम पीढ़ियाँ उनके लेखनी से प्रभावित होती रहेंगी। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में इन दिनों मजरूह सुल्तानपुरी के गीतों का जो कारवाँ चला जा रहा था, वह कारवाँ आज की कड़ी में जाकर कुछ समय के लिये पड़ाव डाल रहा है। '...और कारवाँ बनता गया' शृंखला की आज है दसवीं और अंतिम कड़ी। १९४६ में 'शाहजहाँ' से जो कारवाँ चल पड़ा था, वह आकर रुका था १९९९ में फ़िल्म 'जानम समझा करो' पे आकर। राहुल देव बर्मन वाले अंक में हमनें ज़िक्र किया था उन फ़िल्मों का जिनमें नासिर हुसैन, मजरूह सुल्तानपुरी और राहुल देव बर्मन की तिकड़ी का संगम था। पंचम को अलग रखें तो नासिर साहब के साथ मजरूह साहब नें पंचम के आने से पहले 'फिर वही दिल लाया हूँ' तथा पंचम के बाद आनंद-मिलिंद के साथ 'क़यामत से क़यामत तक', जतीन-ललित के साथ 'जो जीता वही सिकंदर' और अनु मलिक के साथ 'अकेले हम अकेले तुम' में काम किया। और सिर्फ़ काम ही नहीं किया, अपने हुनर का लोहा भी मनवाया कि ४० के दशक में पारी की शुरुआत करने वाले गीतकार ९० के दशक के आख़िर में भी उतने ही सक्रीय व सफल हैं और गीतों का स्तर भी उतना ही ऊँचा है। तो इस शृंखला को समाप्त करते हुए आज की कड़ी के लिये हमने चुना है १९९२ की फ़िल्म 'जो जीता वही सिकंदर' से जतिन की आवाज़ में "रूठ के हमसे कभी जब चले जाओगे तुम, यह न सोचा था कभी इतने याद आओगे तुम"। भले ही ९० के दशक के गीतों से हम परहेज़ करते हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में, लेकिन कभी कभी इस रवायत को तोड़ने को जी चाहता है। गीत अगर सचमुच अच्छा है तो सिर्फ़ दशक का ठप्पा लगा कर उसे नज़रंदाज़ तो नहीं किया जा सकता न!

"रूठ के हमसे कभी जब चले जाओगे तुम", भाई-भाई के संबंध को लेकर इस गीत से बेहतर गीत मैंने तो आज तक नहीं सुना! इस गीत को सही तरीके से अनुभव वही कर सकता है जिसका कोई भाई है। फ़िल्म में आमिर ख़ान का बड़ा भाई एक दुर्घटना के बाद अस्पताल में ज़िंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है, ऐसे में यह गीत पार्श्व में बज उठता है और आमिर ख़ान अपने बड़े भाई के साथ गुज़ारे बचपन के दिनों को याद करते हैं। आमिर ख़ान के बचपन का रोल पता है किसने निभाया था? जी हाँ, उनके भांजे इमरान ख़ान नें, जो आज के दौर के नायक हैं। मजरूह साहब नें इस गीत में ऐसे बोल लिखे हैं कि गीत को सुनते हुए आँखें भर आती हैं। "मैं तो ना चला था दो क़दम भी तुम बिन, फिर भी मेरा बचपन यही समझा हर दिन, छोड़ के मुझे भला अब कहाँ जाओगे तुम, यह न सोचा था कभी इतने याद आओगे तुम"। और २४ मई २००० को नीमोनिआ से ग्रस्त होकर मजरूह साहब भी इस संसार से रूठ कर हमेशा हमेशा के लिये चले गये, और पीछे छोड़ गये अपने हज़ारों गीतों का सुरीला कारवाँ। आज उनको समर्पित इस शृंखला को समाप्त करते हुए मुझे उनके लिखे जिस गीत के बोल बार बार याद आ रहे हैं, वो हैं....

"जब हम ना होंगे, जब हमारी ख़ाक पे तुम रुकोगे चलते चलते,
अश्क़ों से भीगी चांदनी में एक सदा सी सुनोगे चलते चलते,
वहीं पे कहीं हम तुमसे मिलेंगे, बनके कली, बन के सबा, बाग़-ए-वफ़ा में,
रहें ना रहें हम...
"।

मजरूह साहब, आप चाहें शारीरिक तौर से हमारे बीच मौजूद न हों, लेकिन आपका फ़न, आपकी कला, आपके गीतों के ज़रिये अमर हो गया है, जो युगों युगों तक दुनिया की फ़िज़ाओं में आप के मौजूद होने का निरंतर आभास कराते रहेंगे। मजरूह सुल्पानपुरी की सुरीली स्मृति को 'हिंद-युग्म - आवाज़' परिवार का विनम्र नमन। अगले सप्ताह एक नई शृंखला लेकर हम पुन: उपस्थित होंगे, और शनिवार को विशेषांक में आपसे फिर मुलाक़ात होगी, तब तक के लिये 'ओल्ड इज़ गोल्ड' से हमें अनुमति दीजिये, नमस्कार!



क्या आप जानते हैं...
कि 'जानम समझा करो' में जब मजरूह साहब के लिखे "लव हुआ", "आइ वास मेड टू लव यू बेबी क्या ख़याल है बोल" और "जानम समझा करो" जैसे गीतों की समालोचना हुई तो उन्होंने कहा था - "These are certainly not objectionable. They only sound like that way because of the English words. I will always maintain that "aati kya khandala" is a 'be-huda' song because the mukhda is like an indecent proposal, and the degenerate element among the youth have got a new weapon in their armour for harassing women"।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 9/शृंखला 17
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र - सहगल साहब की आवाज़ में था ये मशहूर गीत.
सवाल १ - गीतकार बताएं - ३ अंक
सवाल २ - संगीतकार बताएं - २ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अमित जी और अनजाना जी एच्छिक रूप से प्रतियोगिता से दूर रहे तो हमें मिला एक नया विजेता अविनाश जी के रूप में जिन्हें सबसे जबरदस्त टक्कर मिली क्षिति जी और प्रतीक जी से. अविनाश जी को हमारी ढेरो बधाईयां, अमित और अनजाना जी अब नयी शृंखला के बारे में क्या योजना है ?

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

Thursday, February 12, 2009

मिलिए उभरती हुई पार्श्व गायिका तरन्नुम मालिक से


लगभग एक महीने पहले आवाज़ पर हमने एक नए गीत "एक धक्का दो..." का विश्वव्यापी उदघाटन किया था, जिसे जबरदस्त सराहना मिली थी. उभरते हुए निर्देशक/गीतकार अभिषेक भोला (जिनकी आने वाली फ़िल्म "कॉफी" को हिंद युग्म मीडिया सहयोग प्रदान करने जा रहा है) ने इस गीत के बोल लिखे थे, धुन और आवाज़ थी, फ़िल्म इंडस्ट्री में तेज़ी से कमियाबी की सीढियां चढ़ती गायिका तरन्नुम मालिक की. इस गीत का विडियो भी बेहद चर्चित हुआ था जिसे ख़ुद अभिषेक ने निर्देशित किया था. आज हम आपकी मुलाकात इस गीत की गायिका तरन्नुम मालिक से करवा रहे हैं. मात्र २१ वर्षीया इस युवा गायिका ने बहुत कम समय में ही इंडस्ट्री के बड़े नामों को अपनी प्रतिभा से प्रभावित किया है. इससे पहले कि हम बातचीत शुरू करें, संगीतकार शंकर एहसान और लॉय के निर्देशन में उनका गाया फ़िल्म "जोंनी गद्दार" का ये दमदार गीत सुनिए -



दिल्ली में जन्मी तरन्नुम को संगीत विरासत में मिला, उनके पिता रमेश मालिक ने बचपन से ही उनके हुनर को पहचाना और उनके दिशा निर्देश में में तरन्नुम ने पार्श्व गायन को अपना कैरिअर चुना. निरंतर रियाज़ और स्टेज कार्यक्रमों ने उन्हें इस काबिल बना दिया कि अनु मालिक (शादी न.०१), मोंटी शर्मा (अपने), आनंद राज आनंद (चाहत एक नशा और नहले पे देहला), जतिन पंडित, और शंकर एहसान लॉय (जोंनी गद्दार और हाई स्कूल म्युझिकल २) जैसे बड़े संगीतकार ने न सिर्फ़ उन्हें ब्रेक दिया, बल्कि देश विदेश में हुए अपने संगीत आयोजनों में शिरकत का मौका भी दिया. कविता कृष्णमूर्ती, अनुराधा पौडवाल, नरेंदर चंचल, और स्वर्गीय महेन्दर कपूर जैसे गायकों का आशीर्वाद उन्हें मिला है. आई मिलें तरन्नुम से -

हिंद युग्म - तरन्नुम स्वागत है आपका हिंद युग्म आवाज़ पर, आपका गाना "एक धक्का दो..." ने लोगों को नींद से जगाने का काम किया है, जिसने भी सुना है पसंद किया है....कैसा लग रहा है आपको ?

तरन्नुम- मैं और मेरे टीम के साथी बहुत खुश है जो आप लोगो ने इस गाने को इतना पसंद किया सराहा और मैं ये कहना चाहूँगीं हम सब की मेहनत आख़िर रंग लायी. अभी तक जहाँ जहाँ गाना प्रसारित हुआ है वहाँ कुछ इंसान भी अगर दिन में एक बार राष्ट्र के लिए सोच लें तो हमारा गीत बनाने का उद्देश्य पूरा हो जायेगा.... और किसी प्रयास की सराहना मिलने पर खुशी तो होती ही है...

हिंद युग्म - इस गाने की मेकिंग के बारे में कुछ बताईये ?

तरन्नुम - गाने की मेकिंग के बारे में तो आप जानते ही हैं... अभिषेक ने एक एस एम् एस किया मैंने उसको धुन में गाकर सुना दिया... फ़िर एक एक करके सब लोग जुड़ते गए... ब्रिन्जी ने प्रोग्रम्मिंग का जिम्मा लिया और जुबीन ने अपने स्टूडियो में रिकॉर्ड करने की अनुमति... फ़िर संगीतकार ललित सेन जी ने मिक्सिंग और री-रिकॉर्डिंग की... फ़िर ऍफ़ एम् में लोगों से मिले तो उनको गाना प्रसारित करने के लिए इस पर किसी कम्पनी की मुहर चाहिए थी... एक कंपनी में गये तो उनको वीडियो चाहिए था... इसलिए और मित्र जुड़े और विडियो भी बन गया...

हिंद युग्म - बहुत बड़ी टीम है इस गाने में किसने और कैसे इतना सब manage हो पाया ?

तरन्नुम- यह सब केवल इसलिए सम्भव हो पाया क्योंकि देश की वर्तमान स्थिति को देखते हुए सबमें रोष है... और सब चाहते थे की कुछ किया जाए... और इस गीत के माध्यम से सबने अपने अपने तरीके से अपनी भावनाएं व्यक्त की...

हिंद युग्म - आप अपने अब तक के संगीत सफर के बारे में कुछ बताईये ?

तरन्नुम - जब छोटी थी तो शौक के तौर पर गाती थी... मेरे पिता जी की पृष्ठभूमि ग्वालियर घराना की रही है इसलिए उनको लगा कि मैं इस क्षेत्र में कुछ कर सकती हूँ.. उन्होंने मुझे सिखाना शुरू किया फ़िर सिंह बंधू मेरे गुरु रहे और तब कई बड़ी हस्तियों के साथ गाने का अवसर मिला... जब गुरु जी और मेरे पिता को लगा की गायन में कुछ परिपक्वता आ गई है.. तो हम दिल्ली से मुंबई आ गए... यहाँ भी मैं सुरेश वाडेकर जी से सीखती रही... और पहली बार मुझे आनंद राज आनंद जी के साथ हिन्दी फ़िल्म "चाहत एक नशा" फ़िल्म में गाने का अवसर प्राप्त हुआ... फ़िर रविंदर जैन जी से भी सीखना जारी रहा और साथ साथ रिकॉर्डिंग भी... उसके बाद... धीरे धीरे मुझे कुछ बड़ी फिल्में भी मिलने लगी.. जिनमें से "अपने", "जोनी गद्दार", "हाई स्कूल म्युझिकल २", "धूम धडाका" और "नहले पे दहला" प्रमुख हैं... फिलहाल और ज्यादा सीखने और, और अच्छा गाने में प्रयास रत हूँ...

हिंद युग्म - फ़िल्म जगत में किसे आप अपना रोल मॉडल मानती हैं ?

तरन्नुम - मैं उन सभी लोगों को अपना रोल मॉडल मानती हूँ जिस जिस ने संगीत की साधना की है चाहे हो मेरे कलीग हों या फिर नामी संगीतकार.

हिंद युग्म - हिंद युग्म और आवाज़ से जुड़ कर आपको कैसा लगा ?

तरन्नुम - मुझे हिन्दयुग्म से जुड़े कुछ समय ही हुआ है लेकिन जिस उद्देश्य से इसकी स्थापना हुयी है और जिस तरह से उनकी पूर्ति के प्रयास किए जा रहे है इसका एक हिस्सा बनकर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है...

हिंद युग्म - ARR को गोल्डन ग्लोब मिला है आने वाले समय में आप भारतीय संगीत किस उंचाईयों पर देख रही हैं ?

तरन्नुम- मैं मानती हूँ कि आजकल हम भारतीय विदेशी अवार्ड जैसे ऑस्कर, ग्रेम्मी, गोल्डन ग्लोब पर ज्यादा ही केंद्रित होते जा रहे हैं... जबकि भारतीय संगीत अवार्ड श्रेणी से कहीं ज्यादा उपर है... कलाकार के लिए अवार्ड एक कोम्प्लिमेंट होता है... और यह अच्छी बात है की रहमान जी को विश्व स्तर पर मिला... इस से पहले भारतीय मूल की नोरा जॉन्स और आशा जी को भी इस स्तर पर सराहना मिल चुकी है...

हिंद युग्म - हमने अपनी साईट के माध्यम से बहुत से नए फनकारों को एक मंच दिया है क्या आपने किसी को सुना हैं इनमें से ?

तरन्नुम - मुझे हिन्दयुग्म से जुड़े थोड़ा समय ही हुआ है इसलिए मैं सभी गीत तो नहीं सुन सकी लेकिन अब जब भी ऑनलाइन होती हूँ तो जरूर सुनती हूँ... कुछ गाने हर लिहाज से बहुत ही अच्छे हैं और सुनने लायक तो सभी हैं...

हिंद युग्म - चलिए संगीत से इतर कुछ अपनी व्यक्तिगत पसंद /नापसंद बताईये ?

तरन्नुम - संगीत के अलावा मुझे सामान्य नृत्य, पालतू जीव पसंद हैं और नापसंद तो मुझे कुछ भी नहीं....

हिंद युग्म - किन संगीत कारों के साथ काम करना सपना है तरन्नुम का. ?

तरन्नुम- मेरा सपना हमेशा से ही रहमानजी के साथ कम करने का है जो मैं आशा करती हूँ जल्द पूरा होगा...

हिंद युग्म - ईश्वर करे आपका हर सपना सच हो, आपको एक उज्जवल भविष्य की शुभकामनायें और जाते जाते हमारे श्रोताओं के लिए क्या कहना चाहेंगी आप ?

तरन्नुम - आपका बहुत बहुत धन्यवाद मैं श्रेताओ को यही कहूँगी कि सीखना बनने से अधिक महत्व रखता है और कला के किसी भी क्षेत्र में सीखने का अंत नहीं है... इसलिए जहाँ से जो भी सार्थक सीखने को मिले हमें सीख लेना चाहिए...

चलते चलते देखते जाईये लाइव परफोर्म करती तरन्नुम की ये झलक. -



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