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Sunday, December 20, 2015

सारंगी के पर्याय पण्डित रामनारायण : SWARGOSHTHI – 249 : SARANGI AND PANDIT RAMNARAYAN





स्वरगोष्ठी – 249 में आज

संगीत के शिखर पर – 10 : पण्डित रामनारायण

संगीत के सौ रंग बिखेरती पण्डित रामनारायण की सारंगी



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की दसवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की दसवीं कड़ी में हम आपको मानव-कण्ठ के सर्वाधिक निकट तंत्रवाद्य सारंगी और इस वाद्य कुशल वादक पण्डित रामनारायण के बारे में चर्चा कर रहे हैं। आपको हम यह भी अवगत कराना चाहते हैं कि 25 दिसम्बर को पण्डित रामनारायण जी का 89वाँ जन्मदिन है। इस अवसर पर हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में पण्डित जी का सारंगी पर बजाया राग मारवा का आलाप और राग दरबारी में एक आकर्षक गत प्रस्तुत करेंगे। पण्डित रामनारायण आरम्भिक दशकों में फिल्म संगीत से भी जुड़े थे। आज के अंक में हम आपको 1953 की फिल्म ‘हमदर्द’ का एक गीत सुनवाएँगे, जिसमें पण्डित जी की सारंगी का वादन किया गया था। इस फिल्मी गीत में आपको राग जोगिया और राग बहार का स्पर्श मिलेगा।


ज-तंत्र वाद्यों में वर्तमान भारतीय वाद्य सारंगी, सर्वाधिक प्राचीन है। शास्त्रीय मंचों पर प्रचलित सारंगी, विविध रूपों और विविध नामों से लोक संगीत से भी जुड़ी है। प्राचीन ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि लंका के राजा रावण का यह सर्वप्रिय वाद्य था। ऐसी मान्यता है कि रावण ने ही इस वाद्य का आविष्कार किया था। इसी कारण इसका एक प्राचीन नाम ‘रावण हत्था’ का उल्लेख भी मिलता है। आज के अंक में हम सारंगी और इस वाद्य के अप्रतिम वादक पण्डित रामनारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। सारंगी एक ऐसा वाद्य है जो मानव कण्ठ के सर्वाधिक निकट है। एक कुशल सारंगी वादक गले की शत-प्रतिशत विशेषताओं को अपने वाद्य पर बजा सकता है। सम्भवतः इसीलिए इस वाद्य को ‘सौ-रंगी’ अर्थात सारंगी कहा गया। 25 दिसम्बर, 1927 को उदयपुर, राजस्थान के एक सांगीतिक परिवार में एक ऐसे प्रतिभावान बालक का जन्म हुआ, जिसे आज हम सब विख्यात सारंगी वादक पण्डित रामनारायण के रूप में जानते हैं। भारतीय संगीत जगत में इस महान संगीतज्ञ का योगदान कभी भी भुलाया नहीं जा सकता। आज के अंक में हम उनके इस योगदान पर चर्चा करेंगे। फरवरी, 1994 में उत्तर प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के अभिलेखागार के लिए मुझे पण्डित रामनारायण जी से एक लम्बे साक्षात्कार का सुअवसर मिला था। उस बातचीत के कुछ अंश हम आपके लिए इस अंक में भी प्रस्तुत करेंगे, किन्तु उससे पहले आपको सुनवाते हैं, पण्डित रामनारायण का बजाया उनका सर्वप्रिय राग मारवा में मनमोहक आलाप।


राग मारवा : सारंगी पर आलाप : पण्डित रामनारायण




पण्डित रामनारायण के प्रपितामह, दानजी वियावत उदयपुर महाराणा के दरबारी गायक थे। पितामह हरिलाल वियावत भी उच्चकोटि के गायक थे, जबकि पिता नाथूजी वियावत ने दिलरुबा वाद्य को अपनाया। छः वर्ष की आयु में रामनारायण जी के हाथ एक सारंगी लगी और इसी वाद्य पर पिता की देख-रेख में अभ्यास आरम्भ हो गया। 10 वर्ष की आयु में उन्होने उस्ताद अल्लाबंदे और उस्ताद जाकिरुद्दीन डागर से ध्रुवपद की शिक्षा ग्रहण की। इसके साथ ही जयपुर के सुविख्यात सारंगी वादक उस्ताद महबूब खाँ से भी मार्गदर्शन प्राप्त किया। 1944 में रामनारायण जी की नियुक्ति सारंगी संगतिकार के रूप रेडियो लाहौर में हुई, जहाँ तत्कालीन जाने-माने गायक-वादकों के साथ उन्होने सारंगी की संगति कर कम आयु में ही ख्याति अर्जित की। 1947 में देश विभाजन के समय उन्हें लाहौर से दिल्ली केन्द्र पर स्थानान्तरित किया गया। अब तक रामनारायण के सारंगी वादन में इतनी परिपक्वता आ गई कि तत्कालीन सारंगी वादकों में उनकी एक अलग शैली के रूप में पहचानी जाने लगी। इसके बावजूद उनका मन इस बात से हमेशा खिन्न रहा करता था कि संगीत के मंच पर संगतिकारों को वह दर्जा नहीं मिलता था, जिसके वो हकदार थे। मुख्य गायक कलाकारों के साथ, इसी बात पर प्रायः नोक-झोंक हो जाती थी। उनका मानना था कि संगतिकारों को भी प्रदर्शन के दौरान अपनी बात कहने का अवसर मिलना चाहिए। 1956 में पण्डित रामनारायण ने मुम्बई के एक संगीत समारोह में एकल सारंगी वादन किया। संगीत-प्रेमियों के लिए यह एक दुर्लभ क्षण था। किसी शास्त्रीय मंच पर पहली बार सदियों से संगति वाद्य के रूप में प्रचलित सारंगी को स्वतंत्र वादन का सम्मान प्राप्त हुआ था। इस दिन संगीत के सुनहरे पृष्ठों पर पण्डित रामनारायन का नाम सारंगी को प्रतिष्ठित करने में दर्ज़ हो चुका था। आइए यहाँ थोड़ा रुक कर सुनते हैं, पण्डित रामनारायण जी का सारंगी पर बजाया राग दरबारी में एक मनमोहक गत।


राग दरबारी : सारंगी पर गत का वादन : पण्डित रामनारायण




सारंगी वादन की अपनी एक अलग शैली विकसित करते हुए पण्डित रामनारायण का मन स्वतंत्र सारंगी वादन के लिए बेचैन होने लगा। रेडियो की नौकरी में रहते हुए उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो पा रही थी, अतः 1949 में उन्होने रेडियो की नौकरी छोड़ कर मुम्बई (तत्कालीन बम्बई) पहुँच गये। मुम्बई में स्वयं को स्थापित करने की लालसा ने उन्हें फिल्म-जगत में पहुँचा दिया। उस दौर के फिल्म संगीतकारों ने पण्डित रामनारायण को सर-आँखों पर बिठाया। सारंगी के सुरों से सजी उनकी कुछ प्रमुख फिल्में हैं- हमदर्द 1953, अदालत 1958, मुगल-ए-आजम 1960, गंगा जमुना 1961, कश्मीर की कली 1964, मिलन और नूरजहाँ 1967। संगीतकार ओ.पी. नैयर के तो वे सर्वप्रिय रहे। हमदर्द, अदालत, गंगा जमुना और मिलन फिल्म में तो उन्होने कई गीतों की धुनें भी बनाई। अब हम आपको उनके फिल्मी गीतों में से चुन कर हमने फिल्म ‘हमदर्द’ का एक राग आधारित गीत लिया है। इस गीत के चार अन्तरे हैं। पहला अन्तरा राग गौड़ सारंग, दूसरा अन्तरा राग गौड़ मल्हार, तीसरा अन्तरा राग जोगिया और चौथा अन्तरा राग बहार के सुरों में निबद्ध है। अब हम आपको गीत का तीसरा और चौथा अन्तरा सुनवा रहे हैं। फिल्म के संगीत निर्देशक हैं अनिल विश्वास और गायक हैं, मन्ना डे और लता मंगेशकर। आइए सुनते हैं, राग जोगिया और राग बहार के स्वरो से सुसज्जित यह गीत।


राग जोगिया और बहार : ‘पी बिन सब सूना...’ और ‘आई मधु ऋतु...’ : मन्ना डे और लता मंगेशकर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 249वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको फिल्म में शामिल की गई एक ठुमरी रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इस संगीतांश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 250 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) के विजेता का सम्मान मिलेगा। साथ ही पहेली के वार्षिक विजेताओं की घोषणा ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में की जाएगी।



1 – इस गीतांश में आपको किस राग की अनुभूति हो रही है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 – यह किस गायिका की आवाज़ है? उनका नाम बताइए।

आप इन तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 26 दिसम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का हल भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 251वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ के 247वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रघुनाथ सेठ की बाँसुरी वादन का एक अंश सुनवाया था और आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्न का उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – शुद्ध सारंग, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- वाद्य – बाँसुरी

इस बार की पहेली के सही उत्तर देने वाले प्रतिभागियों में एक नये प्रतिभागी शामिल हुए हैं। यह नये प्रतिभागी हैं, पनवेल, महाराष्ट्र के शिरीष ओक। शिरीष जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है। पहेली का सही उत्तर देने वाले हमारे अन्य विजेता हैं, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, चेरीहिल (एन.जे.) से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ के आज के अंक में हमने आपसे सारंगी के अप्रतिम साधक पण्डित रामनारायन के व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में कुछ चर्चा की। अगले अंक में एक अन्य विधा के शिखर पर प्रतिष्ठित व्यक्तित्व पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला को हमारे अनेक पाठकों ने पसन्द किया है। हम उन सबके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों की अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फरमार्इशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। आप भी यदि कोई सुझाव देना चाहते हैं तो आपका स्वागत है। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   




Sunday, September 16, 2012

संगीत वाद्य परिचय श्रृंखला : पं. श्रीकुमार मिश्र से बातचीत


स्वरगोष्ठी – ८८ में आज
संगीत के सौ रंग बिखेरती सारंगी

‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ, मैं कृष्णमोहन मिश्र एक बार पुनः आपकी गोष्ठी में उपस्थित हूँ और आप सब संगीत-प्रेमियों का स्वागत करता हूँ। मित्रों, यह ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ का सौभाग्य रहा है कि इसे आरम्भ से ही संगीत-साधकों, संगीत-शिक्षकों और संगीत-प्रेमियों का मार्गदर्शन प्राप्त होता रहा। हमारे एक ऐसे ही मार्गदर्शक हैं जाने-माने इसराज और मयूर वीणा वादक और शिक्षक पं. श्रीकुमार मिश्र। पिछले दिनों उनकी कक्षा में मैं आकस्मिक रूप से जब पहुँचा तो आश्चर्यचकित रह गया। लगभग अप्रचलित इन गज-वाद्यों को सीखने के लिए कुल ९ विद्यार्थी उस कक्षा में उपस्थित थे, जिनमें ५ बालिकाएँ थीं। श्रीकुमार जी इन बच्चों को एक सरल सी तान का अभ्यास करा रहे थे। मैंने संगीत के उन विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों की सराहना की और श्रीकुमार जी से गज-तंत्र वाद्यों के बारे में ‘स्वरगोष्ठी’ के लिए कुछ बातचीत करने का अनुरोध किया, जिसे उन्होने सहर्ष स्वीकार कर लिया। आज के अंक में हम इस बातचीत के सम्पादित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, ‘स्वरगोष्ठी’ के समस्त पाठकों-श्रोताओं की ओर से आपका हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। आज हम आपसे गज से बजने वाले वाद्यों के विषय में कुछ बातचीत करना चाहते हैं।

श्रीकुमार मिश्र : मेरा अहोभाग्य, जो ‘स्वरगोष्ठी’ के गुणी पाठकों से संवाद का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। मुझे अपने गुरुओं से जो प्राप्त हुआ और स्वाध्याय से जो कुछ भी अर्जित किया, उसे आपके साथ बाँटने में अत्यधिक प्रसन्नता होगी।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, आज आपसे हम संगीत के ऐसे तंत्रवाद्यों पर चर्चा करना चाहते हैं जिन्हें गज (Bow) से बजाया जाता है।

श्रीकुमार मिश्र : वर्तमान भारतीय संगीत में गज से बजने वाले जितने भी तंत्रवाद्य प्रचलित हैं, उनमें सबसे प्राचीन वाद्य सारंगी है। अन्य तंत्रवाद्यों की भाँति गज-तंत्र वाद्यों में भी वैदिक काल से लेकर वर्तमान तक अनेक परिवर्तन-संशोधन होते रहे। वैदिक काल के तंत्रवाद्यों के नाम ‘हिरण्यकेशी सूत्र’ में मिलता है। इस सूत्र के आधार पर ताल्लुक वीणा, काण्ड वीणा, चिच्छोरा, आलापु वीणा, कपिशीर्ष वीणा आदि के स्वरूप की कल्पना की जा सकती है। इसी प्रकार रामायणकाल के तंत्रवाद्यों के बारे में बाल्मीकि कृत ‘रामायण’ के एक प्रसंग में रावण के संगीत कक्ष में विपंची, मत्त कोकिला, वीणा, आदि वाद्यों का उल्लेख किया गया है। एक धारणा तो यह भी है कि रावणहत्था नामक तंत्रवाद्य वर्तमान सारंगी का प्राचीन रूप था, किन्तु इस धारणा की पुष्टि मैं अब तक किसी ग्रन्थ से नहीं कर पाया हूँ। हाँ, प्रोफेसर लालमणि मिश्र ने अपनी पुस्तक में यह उल्लेख अवश्य किया है कि सारंगी का ही एक प्राचीन रूप श्रीलंका में लोकवाद्य के रूप में प्रचलित था। कालान्तर में यही वाद्य राजस्थान पहुँचा और यहाँ इसका नामकरण ‘रावणहत्था’ हुआ। राजस्थान के लोक संगीत में आज भी सारंगी के अनेक प्रकार मिलते हैं। इन्हीं में एक प्रकार है ‘सिन्धी सारंगी’, जिसे लंगा जाति के लोक कलाकार आज बहुतायत में प्रयोग करते हैं। इसमें मुख्य चार तारों में दो लोहे के और दो ताँत के होते हैं। इसके अलावा सात झारा के और १७ तरब के तार होते हैं।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, हमारे पास सिन्धी सारंगी की एक रिकार्डिंग है, जिसे हबीब खाँ लंगा ने बजाया है। सारंगी के अन्य लोकरूपों की चर्चा को हम जारी रखेंगे, परन्तु पहले सिन्धी सारंगी का वादन सुनते हैं।

सिन्धी सारंगी : वादक – हबीब खाँ लंगा



कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, लोक संगीत में प्रचलित सारंगी के कुछ अन्य प्रकारों के बारे में भी हमारे पाठकों को बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : संरचना के अनुसार लोक संगीत में अनेक प्रकार की सारंगी का प्रयोग किया जाता है। राजस्थान की लंगा जाति के लोक कलाकार सिन्धी सारंगी के अलावा एक और प्रकार की सारंगी का प्रयोग करते हैं, जिसे गुजराती सारंगी कहा जाता है। इसमें चार मुख्य और आठ सहायक तार होते हैं। इसे रोहिदा नामक लकड़ी से बनाया जाता है। इसी प्रकार उत्तर भारत में भिक्षाटन कर जीवन-यापन करने वाले जोगियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली सारंगी ‘जोगिया सारंगी’ कहलाती है। यह तून की लकड़ी द्वारा निर्मित छोटी सारंगी होती है, जिसके तुम्बे पर खाल मढ़ी होती है। इसमें ताँत के तीन तार होते हैं। इसी प्रकार निहालदे के जोगियों द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली सारंगी ‘धानी सारंगी’ कहलाती है। इसका तुम्बा सपाट होता है और इसमें मुख्य चार तारों में दो लोहे के और दो ताँत के तार होते हैं। इस प्रकार की सारंगी में आठ सहायक तार भी होते हैं। लोक सारंगी का ही एक विकसित रूप है, जिसे ‘अलाबु सारंगी’ नाम से पुकारा जाता है। जैसलमेर के मांगनियार जाति के लोक कलाकार इस सारंगी का प्रयोग करते हैं। सारंगी का ही एक प्रचलित लोक स्वरूप है जिसे ‘नेपाली सारंगी’ कहा जाता है। इसकी खोखली कुंडी या तुम्बे का निचला आधा हिस्सा चमड़े से मढ़ा होता है और आधा हिस्सा खुला होता है।

कृष्णमोहन : सारंगी के लोक और शास्त्रीय स्वरूप की चर्चा को हम जारी रखेंगे, परन्तु यहाँ थोड़ा विराम लेकर अपने पाठकों-श्रोताओं को नेपाली सारंगी का एक उदाहरण सुनवाते है।

नेपाली सारंगी : वादक – जंगबहादुर गन्धर्व



कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, सारंगी का वर्तमान शास्त्रीय स्वरूप भी तो परम्परागत रूप से ही विकसित हुआ है। हम चाहेंगे कि हमारे पाठको-श्रोताओं को इस वाद्य की कुछ असाधारण विशेषताओं और वादन शैली के बारे में बताएँ।

श्रीकुमार मिश्र : सारंगी एक ऐसा वाद्य है, जो मानव-कण्ठ की अनुकृति करने में सक्षम है। अपने इस गुण के कारण सारंगी रागदारी संगीत के गायक कलाकारों की संगति के लिए सर्वप्रिय वाद्य बना रहा। गायक कलाकारों की आवश्यकतानुसार समय-समय पर सारंगी की बनावट में परिवर्तन होते रहे। मध्यकाल में चार मुख्य तारों की बड़ी सारंगी का प्रयोग किया जाता था। इसे चारगा की सारंगी कहा जाता था। इस सारंगी के पहले तार को ज़ील, दूसरे को डेवढ़, तीसरे को खरज और चौथे तार को लरज़ कहते हैं। प्राचीन काल के गायकों में मन्द्र और अतिमन्द्र गायन का चलन था। ऐसे में सारंगी के चौथे तार की उपयोगिता थी। परन्तु धीरे-धीरे मन्द्र और अतिमन्द्र स्वरों में गायन का चलन कम होता गया और आधुनिक सारंगी से चौथा तार हट गया। अधिकतर आधुनिक सारंगी में अब तीन मुख्य तारों का ही प्रयोग होता है।

कृष्णमोहन : शास्त्रीय वाद्य के रूप में सारंगी वाद्य का अधिकतर प्रयोग संगति वाद्य के रूप में हुआ है, किन्तु विगत कुछ दशक से सारंगी के स्वतंत्र वादन का चलन भी बढ़ा है। इस प्रश्न का उत्तर भी आपसे अपेक्षित है, किन्तु उससे पहले हम अपने संगीत-प्रेमी श्रोताओ को स्वतंत्र सारंगी वादन का एक उदाहरण सुनवाते हैं। युवा सारंगी वादक कमाल साबरी प्रस्तुत कर रहे हैं, राग रामकली। तबला संगति की है उस्ताद शफ़ात अहमद खाँ।

राग रामकली : स्वतंत्र सारंगी वादन : वादक – उस्ताद कमाल साबरी



श्रीकुमार मिश्र : आपने बिलकुल ठीक कहा, सारंगी के तंत्रों से उत्पन्न नाद, मानव के कण्ठ-नाद से मेल खाने के कारण इस वाद्य का प्रयोग संगति वाद्य के रूप में अधिक हुआ है। परन्तु पिछले ५०-६० वर्षों में कुछ सृजनशील सारंगी वादकों ने इसे स्वतंत्र स्वर वाद्य के रूप में भी बजाया है। जिन कलाकारों ने स्वतंत्र वादन के रूप में सारंगी को अपनाया, उन्हें अपनी स्वयं की वादन शैली भी रचनी पड़ी। इसका मुख्य कारण था कि इसे संगति वाद्य ही माना जाता था। इन कलाकारों ने अपनी स्वयं की गढ़ी गई वादन शैली के अनुकूल सारंगी वाद्य में थोड़े फेर-बदल भी किये। स्वतंत्र सारंगी वादन के क्षेत्र में पं. रामनारायण, उस्ताद साबरी खाँ और उनके सुपुत्र कमाल खाँ, वाराणसी के पं. गोपाल मिश्र, पं. हनुमानप्रसाद मिश्र, पं. बैजनाथ मिश्र, उस्ताद सुलेमान खाँ, उस्ताद सुल्तान खाँ, उस्ताद ज़हीर खाँ आदि कई ऐसे सारंगी वादक हैं जिन्होने संगति के साथ-साथ स्वतंत्र वादन के क्षेत्र में भी भरपूर ख्याति आर्जित की है।

कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, आपने पण्डित रामनारायन जी का नाम लिया और अब हम अपने पाठकों-श्रोताओं को उन्हीं की बजाई सारंगी सुनवाने जा रहे हैं। नीचे दिये गए प्लेयर को क्लिक कीजिए और सुनिए, पण्डित रामनारायन की बजाई राग पीलू की ठुमरी-

ठुमरी राग पीलू : स्वतंत्र सारंगी वादन : वादक – पण्डित रामनारायण



कृष्णमोहन : श्रीकुमार जी, इस ठुमरी के साथ ही हम सारंगी के बारे में जानकारी देने के लिए ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से आपका आभार व्यक्त करते हैं और अनुरोध करते हैं कि ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में भी आप हमारे बीच आएँगे और गज-तंत्र श्रेणी के कुछ और वाद्यों की चर्चा करेंगे।

श्रीकुमार मिश्र : ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ और ‘स्वरगोष्ठी’ के सभी संचालकों को धन्यवाद कि आपने संगीत प्रेमियों के इस मंच से मुझे जुडने का अवसर दिया। सभी पाठको-श्रोताओं को मेरा अभिवादन।
आज की पहेली

आज की ‘संगीत-पहेली’ में हम आपको एक गज-तंत्र-वाद्य पर प्रस्तुत एक राग-रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ९०वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।



१_ संगीत की यह रचना किस राग में निबद्ध है?

२_ ताल की पहचान कीजिए और हमे ताल का नाम भी बताइए।


आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के ९०वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं। हमसे सीधे सम्पर्क के लिए swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेज सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के ८६वें अंक की पहेली में हमने आपको विदुषी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में एक द्रुत खयाल की रचना सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर राग ‘कलावती’ और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर ताल ‘एकताल’ है। दोनों प्रश्नों के सही उत्तर लखनऊ के प्रकाश गोविन्द, जबलपुर की क्षिति तिवारी और मीरजापुर, उत्तर प्रदेश के डॉ. पी.के. त्रिपाठी। तीनों प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।

झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक में हमने एक बार पुनः पण्डित श्रीकुमार मिश्र को आमंत्रित किया है। इस अंक में हम उनसे गज-तंत्र श्रेणी के कुछ ऐसे वाद्यों के विषय में चर्चा करेंगे जिनमें परदे होते हैं। अगले रविवार को प्रातः ९-३० पर आयोजित आपकी अपनी इस गोष्ठी में आप हमारे सहभागी बनिए। हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।

कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, December 25, 2011

सुर संगम में आज- संगीत के सौ रंग बिखेरती पण्डित रामनारायण की सारंगी

गज-तंत्र वाद्यों में वर्तमान भारतीय वाद्य सारंगी, सर्वाधिक प्राचीन है। शास्त्रीय मंचों पर प्रचलित सारंगी, विविध रूपों और विविध नामों से लोक संगीत से भी जुड़ी है। प्राचीन ग्रन्थों में यह उल्लेख मिलता है कि लंका के राजा रावण का यह सर्वप्रिय वाद्य था। ऐसी मान्यता है कि रावण ने ही इस वाद्य का आविष्कार किया था। इसी कारण इसका एक प्राचीन नाम ‘रावण हत्था’ का उल्लेख भी मिलता है। आज के अंक में हम सारंगी और इस वाद्य के अप्रतिम वादक पण्डित रामनारायण के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा करेंगे।

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