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शनिवार, 16 मार्च 2013

स्वाधीनता संग्राम और फिल्मी गीत (भाग – 2)


विशेष अंक : भाग 2


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में फिल्म संगीत की भूमिका 



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! मित्रों, पिछले शनिवार से हमने 'सिने पहेली' के स्थान पर एक विशेष श्रृंखला 'भारत के स्वाधीनता संग्राम में फ़िल्म-संगीत की भूमिका' आरम्भ की है। पिछले सप्ताह हमने इस विशेष श्रृंखला का प्रथम भाग प्रस्तुत किया था। आज प्रस्तुत है, इस श्रृंखला का दूसरा भाग।


गतांक से आगे...

तिमिर बरन
30 के दशक के आख़िरी साल, यानी 1939 में, बहुत से देशभक्ति गीत फ़िल्मों में सुनाई पड़े हैं। इस वर्ष ‘वनराज पिक्चर्स, बम्बई’ की एम. उदवाडिया निर्देशित फ़िल्म अई थी ‘वतन के लिए’। इस फ़िल्म के लिए पराधीन भारत के लोगों में देशभक्ति के जस्बे को जगाने के लिए मुन्शी दिल ने दो देशभक्ति गीत लिखे; पहला “ईतहाद करो, ईतहाद करो, तुम हिन्द के रहने वालों” और दूसरा “भारत के रहने वालों, कुछ होश तो संभालो, ये आशियाँ हमारा”। इन दोनों गीतों को गुलशन सूफ़ी और बृजमाला ने गाया था। उधर 'न्यू थिएटर्स' के संगीतकार तिमिर बरन के करीयर की सबसे बड़ी उपलब्धि 1939 में उनकी कम्पोज़ की हुई ‘वन्देमातरम’ रही। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस इस गीत के लिए एक ऐसी धुन चाहते थे जो समूहगान के रूप में गाई जाए और जिससे जोश पैदा हो मातृभूमि के लिए मर-मिटने की। तिमिर बरन ने राग दुर्गा में नेताजी की मनोकामना को पूरा किया और जब नेताजी ने अपनी ‘आज़ाद हिन्द फ़ौज’ का निर्माण किया तो सिंगापुर रेडियो से ‘वन्देमातरम’ के इसी संस्करण को बजवाया।

खेमचन्द प्रकाश
40 के दशक के आते-आते देशभक्ति विचारधारा वाली फ़िल्मों की संख्या में भी निरन्तर वृद्धि होती गई। सन 1940 की बात करें तो ‘रणजीत मूवीटोन’ के बैनर तले निर्मित ‘आज का हिन्दुस्तान’ में दीनानाथ मधोक के लिखे और खेमचन्द प्रकाश (सहायक: बन्ने ख़ाँ) द्वारा स्वरबद्ध गीतों में ईश्वरलाल और साथियों का गाया एक देशभक्ति गीत था “चरखा चलाओ बहनों, कातो ये कच्चे धागे, धागे ये कह रहे हैं…”। इस गीत में गांधीवादी स्वदेशी विचारधारा साफ़ झलकती है। ‘ई. पी. कंगा प्रोडक्शन्स’ की वेशभूषा प्रधान फ़िल्म ‘आज़ादी-ए-वतन’ के संगीतकार का पता तो नहीं चल सका, पर मुन्शी दिल का लिखा इस फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत था “सर करो वतन पे क़ुरबान, मुल्क के सारे नौजवान सर करो क़ुरबान”। यह फ़िल्म दरसल विदेशी भाषा के किसी फ़िल्म को डब कर के बनाई गई थी। ‘रेक्स पिक्चर्स’ की फ़िल्म ‘देशभक्त’ भी इसी श्रेणी की फ़िल्म थी जिसके संगीतकार थे वसन्त कुमार नायडू तथा गीतकार थे वाहिद क़ुरैशी और शेफ़्ता। पर इस फ़िल्म के गीतों की सूची में कोई देशभक्ति गीत की जानकारी नहीं मिल पाई है। वसन्त कुमार नायडू का संगीत ‘चन्द्रा आर्ट प्रोडक्शन्स’ की फ़िल्म ‘जंग-ए-आज़ादी’ में भी गूंजा था और इस फ़िल्म में वाहिद क़ुरैशी का लिखा देशभक्ति गीत था “वीरों, वीरों, हो जाओ क़ुरबान, अपनी इज़्ज़त ग़ैरत का हम लें दुश्मन से बदला”। ‘मोहन पिक्चर्स’ के बैनर तले निर्मित और अनिल कुमार और अमीरबाई कर्नाटकी के अभिनय से सजी फ़िल्म ‘हमारा देश’ में गीतकार मुन्शी नायाब ने एक देशभक्ति गीत लिखा था “हम देश के हैं परवाने मस्ताने दीवाने, आज़ादी के अफ़साने…”। फ़िल्म में संगीत था भगतराम बातिश का। ‘वाडिआ मूवीटोन’ की फ़िल्म ‘हिन्द का लाल’ में मधुलाल दामोदर मास्टर का संगीत था, जिसमें ज्ञान के लिखे देशभक्ति गीत “भारत की पत राखो भगवन्त, भारत की पत राखो” और “मुबारक़ हो, मुबारक़ हो, ये हिन्द का लाल मुबारक़ हो” शामिल थे। “मुबारक हो” गीत अहमद दिलावर का गाया हुआ था। वाडिआ की ही फ़िल्म ‘जय स्वदेश’ में भी मधुलाल का ही संगीत था, और जिसमें ज्ञान ने एक बार फिर एक देशभक्ति गीत लिखा “जय स्वदेश, जय जय स्वदेश, हम भारत के गुण गायेंगे”। सरदार मन्सूर, अहमद दिलावर और साथियों के गाये इस गीत के अलावा वाहिद क़ुरैशी का लिखा एक और देशभक्ति गीत भी था इस फ़िल्म में। वत्सला कुमठेकर और अहमद दिलावर का गाया यह गीत था “भारत पे काले बादल छाए रहेंगे कब तक”। भीष्मदेव चटर्जी के संगीत में ‘फ़िल्म कॉर्पोरेशन ऑफ़ इण्डिया, कलकत्ता’ की 1940 में फ़िल्म आई ‘हिन्दुस्तान हमारा’ जिसमें आरज़ू लखनवी का लिखा एक देश भक्ति गीत था “हिन्दोस्तां के हम हैं हिन्दोस्तां हमारा, है ये ज़मीं हमारी है आसमां हमारा”। कुछ-कुछ इसी शैली में 1944 की फ़िल्म ‘पहले आप’ में एक गीत था “हिन्दोस्तां के हम हैं और हिन्दोस्तां हमारा, हिन्दू मुस्लिम दोनों की आँखों का तारा”। ‘हिन्दुस्तान हमारा’ में भी स्वदेशी विचारधारा का एक गीत था “चर्खा चल के काम बनाए, चर्खा आए ग़रीबी जाए, निकले चर्खे से जब तार...”। इसी साल संगीतकार ख़ान मस्ताना के संगीत में ‘मिनर्वा’ की फ़िल्म ‘वसीयत’ प्रदर्शित हुई जिसमें मस्ताना के अलावा शीला और प्रमिला ने गीत गाए। फ़िल्म में अब्दुल वकील के लिखे हुए गीत थे। शीला और साथियों का गाया हुआ एक देशभक्ति गीत भी था – “हिन्दमाता की तुम्हीं सन्तान हो, नौजवानों तुम वतन की शान हो”। 1941 में ‘सिरको प्रोडक्शन्स’ की गुंजल निर्देशित फ़िल्म ‘तुलसी’ में हरिश्चन्द्र बाली का संगीत था और गीत पंडित फ़ानी ने लिखे। इसमें एक देशभक्ति गीत था “स्वर्ग है भारत देश हमारा”, जो “जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरियसी” के विचार को व्यक्त करता है। देशप्रेम से ओत-प्रोत इन सभी फ़िल्मों और इन फ़िल्मों में शामिल देशभक्ति गीतों ने स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीयता की भावना को जगाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। ‘तुलसी’ के बाद 1942 में ‘सिरको प्रोडक्शन्स’ ने फिर एक बार हरिश्चन्द्र बाली को संगीतकार लेकर ‘अपना घर’ फ़िल्म बनाई। शान्ता आप्टे, चन्द्रमोहन, माया बनर्जी अभिनीत इस फ़िल्म के सभी गीत शान्ता आप्टे ने गाये। पंडित नरोत्तम व्यास गीतकार थे। फ़िल्म देशभक्ति मिज़ाज का था, जिसका शीर्षक गीत था “अपना घर, अपना घर, अपना देश है अपना घर”। बरसों बाद राज कपूर की फ़िल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ के एक मशहूर देशभक्ति गीत में कुछ-कुछ इसी भाव को व्यक्त करती पंक्ति “लाख लुभाये महल पराये, अपना घर फिर अपना घर है” सुनाई पड़ी।

अमीरबाई कर्नाटकी
1943 के आते-आते “अंग्रेज़ों, भारत छोड़ो” के नारे देश की गली-गली में गूंजने लगे। पिछले साल शुरू हुए ‘भारत छोड़ों आंदोलन’ ने स्वाधीनता संग्राम को एक नया मोड़ दे दिया था। फ़िल्मों में भी आज़ादी का जुनून बढ़ता दिखाई दिया। ऐसे में इस वर्ष ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म आई ‘क़िस्मत’ जिसने अब तक के सभी फ़िल्मों के रेकॉर्ड तोड़ दिए। कलकत्ते के ‘चित्र प्लाज़ा’ थिएटर में यह फ़िल्म लगातार साढ़े तीन साल तक चली और बॉक्स ऑफ़िस के सारे रेकॉर्ड तोड़ दिए, और ‘किस्मत’ के इस रेकॉर्ड को आगे चलकर 70 के दशक में फ़िल्म ‘शोले’ ने तोड़ा। ‘क़िस्मत’ अनिल बिस्वास की ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की सब से कामयाब फ़िल्म थी। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत एक देशभक्ति गीत था अमीरबाई और साथियों का गाया हुआ - “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनियावालों हिन्दुस्तान हमारा है”। इस गीत ने स्वाधीनता-संग्राम की अग्नि को ऐसी हवा दी कि इसकी लपटें बहुत उपर तक उठीं और बहुत दूर तक इन लपटों ने राष्ट्रीयता की रोशनी बिखेरी। गीत का रिदम और ऑरकेस्ट्रेशन भी ऐसा ‘मार्च-पास्ट’ क़िस्म का था कि सुनते ही मन जोश से भर जाए! एक तरफ़ अनिल बिस्वास, जो ख़ुद एक कट्टर देशभक्त थे और जो फ़िल्मी दुनिया में आने से पहले चार बार जेल भी जा चुके थे, तो दूसरी तरफ़ इस गीत के गीतकार कवि प्रदीप, जिनकी झनझनाती राष्ट्रवादी कविताएँ लहू में उर्जा पैदा कर देती; इस देशभक्त गीतकार-संगीतकार की जोड़ी से उत्पन्न होने की वजह से ही शायद यह देशभक्ति गीत अमर हो गया। साथ ही ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान इसके आने से इस गीत का प्रकोप और ज़्यादा बढ़ गया। 

गीतकार प्रदीप
उस वक़्त देश की राजनैतिक अवस्था अच्छी नहीं थी क्योंकि उस समय के सभी बड़े नेता जेल में थे। गीतकार प्रदीप ने बहुत ही चतुराई से इस गीत को लिखा जिससे कि अंग्रेज़ों को यह लगे कि यह गीत ‘ऐक्सिस पावर्स’ (Axis powers – Germany, Italy, Japan etc) के ख़िलाफ़ लिखा गया है, पर भारतीयों को इस गीत का असली अर्थ समझने में तनिक भी असुविधा नहीं हुई। ऐसा कहा जाता है कि यह गीत इतना ज़्यादा लोकप्रिय हो गया था कि थिएटर में दर्शकों की माँग पर इस गीत को बार-बार रीवाइण्ड करके दिखाया जाता। और यह हाल पूरे देश भर के सिनेमाघरों का था। भले इस गीत को ‘ऐक्सिस पावर्स’ के विरुद्ध दिखा कर सेन्सर बोर्ड से पास करवा लिया गया था, पर जल्दी ही ब्रिटिश सरकार को गीत का अर्थ समझ में आ गया और कवि प्रदीप के नाम गिरफ़्तारी का वारण्ट जारी कर दिया गया। यह ख़बर सुनते ही प्रदीप भूमिगत हो गए। इस तरह से “आज हिमालय की छोटी से...” गीत हमारे स्वाधीनता संग्राम के इतिहास का एक अभिन्न अंग बन गया। आइए, चलते-चलते इस चर्चित गीत को अमीरबाई कर्नाटकी और साथियों के स्वर में सुनते हैं।


फिल्म किस्मत : ‘आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है...’ : अमीरबाई कर्नाटकी व साथी

 


आपको हमारा यह विशेष अंक कैसा लगा, हमे अवश्य लिखिए। आपका प्रिय साप्ताहिक स्तम्भ ‘सिने-पहेली’ बहुत जल्द नई साज-धज के साथ पुनः आरम्भ होगा। आज के इस विशेष अंक के बारे में आप अपने विचार हमे radioplaybackindia@live.com के पते पर अवश्य अवगत कराएँ। 

गुरुवार, 24 जनवरी 2013

गणतन्त्र दिवस पर विशेष : ‘बॉम्बे टॉकीज़’, ‘क़िस्मत’ और अनिल विश्वास


भारतीय सिनेमा के सौ साल –33 
स्मृतियों का झरोखा  : गणतन्त्र दिवस पर विशेष

‘दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिन्दुस्तान हमारा है...’


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों का झरोखा’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का हार्दिक स्वागत है। आज माह का चौथा गुरुवार है और आज से प्रत्येक माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को हम ‘स्मृतियों का झरोखा’ के अन्तर्गत ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल के सदस्य सुजॉय चटर्जी की प्रकाशित पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ से किसी रोचक प्रसंग का उल्लेख किया करेंगे। आज के अंक में हम ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की फ़िल्म ‘क़िस्मत’ की निर्माण-प्रक्रिया और उसकी सफलता के बारे में कुछ विस्मृत यादों को ताजा कर रहे हैं।


बॉम्बे टॉकीज़’ की दूसरी फ़िल्म ‘क़िस्मत’ तो एक ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई। अशोक कुमार और मुमताज़ शान्ति अभिनीत इस फ़िल्म ने बॉक्स ऑफ़िस के पहले के सारे रेकॉर्ड्स तोड़ दिए। पूरे देश में कई जगहों पर जुबिलियाँ मनाने के अलावा कलकत्ते के ‘चित्र प्लाज़ा’ थिएटर में यह फ़िल्म लगातार 196 हफ़्ते (तीन साल) तक नियमित रूप से चली। इस रेकॉर्ड को आगे चलकर रमेश सिप्पी की फ़िल्म ‘शोले’ ने तोड़ा। ‘क़िस्मत’ एक ट्रेण्डसेटर फ़िल्म थी क्योंकि इसमें बचपन में दो भाइयों के बिछड़ जाने और बाद में मिल जाने वाले फ़ॉरमूले को आज़माया गया था। फ़िल्म की सफलता ने इस विषय को काफ़ी लोकप्रिय बनाया और फ़िल्मकारों ने इस फ़ॉरमूले को बार-बार आज़माया।

‘क़िस्मत’ अनिल बिस्वास की ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की सबसे कामयाब फ़िल्म थी। पार्श्वगायन की तकनीक अब विकसित हो चली थी और अनिल बिस्वास को अशोक कुमार के गायन में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी, इसीलिए इस फ़िल्म में अरूण कुमार ने उनका शत-प्रतिशत पार्श्वगायन किया (इससे पहले अरूण कुमार एक-आध गीत ही गाया करते थे, जबकि बाक़ी गीत अशोक कुमार ख़ुद गाते थे)। मुमताज़ शान्ति की आवाज़ बनीं अमीरबाई कर्नाटकी। फ़िल्म का सर्वाधिक लोकप्रिय गीत एक देशभक्ति गीत था अमीरबाई और साथियों का गाया हुआ - “आज हिमालय की चोटी से फिर हमने ललकारा है, दूर हटो ऐ दुनियावालों हिन्दुस्तान हमारा है...”। इस गीत ने स्वाधीनता-संग्राम की अग्नि में घी का काम किया। गीत का रिदम और ऑरकेस्ट्रेशन भी ऐसा ‘मार्च-पास्ट’ क़िस्म का था कि सुनते ही मन जोश से भर जाए। एक तरफ़ अनिल बिस्वास, जो ख़ुद एक कट्टर देशभक्त थे और जो फ़िल्मी दुनिया में आने से पहले चार बार जेल भी जा चुके थे, तो दूसरी तरफ़ इस गीत के गीतकार कवि प्रदीप, जिनकी झनझनाती राष्ट्रवादी कविताएँ लहू में उर्जा पैदा कर देती। इस देशभक्त गीतकार-संगीतकार की जोड़ी से उत्पन्न होने की वजह से ही शायद यह देशभक्ति गीत अमर हो गया। दो दिन बाद हम सब अपना राष्ट्रीय पर्व, गणतंत्र दिवस मनाएँगे। इस उपलक्ष्य में आइए सुनते है, यही चर्चित गीत। 

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘आज हिमालय की चोटी से...’ : अमीरबाई कर्नाटकी और साथी



अमीरबाई का गाया फ़िल्म का एक अन्य हिट गीत था “ऐ दिल यह बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा, घर घर में दीवाली है मेरे घर में अन्धेरा”। उन्हीं का गाया “अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया, भगवान किनारे पे लगा दे मेरी नैया...” भी फ़िल्म की एक लोकप्रिय रचना थी। केवल इन तीन गीतों से ही ‘क़िस्मत’ के गीत-संगीत की चर्चा समाप्त नहीं हो जाती। एक और गीत जिसने चारों तरफ़ लोकप्रियता के परचम लहरा दिए थे, वह थी कालजयी लोरी “धीरे-धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल न मचा...”। इस गीत के दो वर्ज़न थे – पहला अमीरबाई का गाया एकल गीत जबकि दूसरे में मुख्य आवाज़ अरूण कुमार की थी और अमीरबाई गीत ने आख़िर में अपनी आवाज़ मिलाई थी। कहते हैं कि इस गीत के ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर अरूण कुमार के बदले अशोक कुमार की ही आवाज़ थी और अनिल बिस्वास ने मज़ाक में कहा था कि शायद यही एक ऐसा गीत है जिसे अशोक कुमार ने सुर में गाया है। जो भी है, हक़ीक़त यही है कि यह लोरी फ़िल्म-संगीत के इतिहास की एक सदाबहार लोरी है जिसकी चर्चा लोग आज भी करते हैं।

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘धीरे धीरे आ रे बादल...’ : अरुण कुमार और अमीरबाई कर्नाटकी



‘क़िस्मत’ का शीर्षक गीत भी अमीरबाई और अरूण कुमार का गाया हुआ था, जिसके बोल थे “हम ऐसी क़िस्मत को क्या करें हाय, ये जो एक दिन हँसाए, एक दिन रुलाए”। अरूण कुमार ने एकल आवाज़ में “तेरे दुख के दिन फिरेंगे, ले दुआ मेरी लिए जा...” गीत गाया था। इस फ़िल्म का एक और बेहद सुंदर और लोकप्रिय गीत रहा “पपीहा रे, मेरे पिया से कहियो जाए...” जिसे पारुल घोष ने गाया था। यह गीत पारुल घोष का गाया सबसे लोकप्रिय गीत सिद्ध हुआ। इस गीत का असर कैसा रहा होगा, इसका अंदाज़ा हम इस बात से लगा सकते हैं कि लता मंगेशकर ने अपनी ‘श्रद्धांजलि’ एल्बम में पारुल घोष को श्रद्धांजलि स्वरूप उनके इसी गीत को गाया था और पारुल घोष को याद करते हुए लता जी ने कहा था, “पारुल घोष, जानेमाने संगीतकार अनिल बिस्वास जी की बहन, और प्रसिद्ध बाँसुरी वादक पण्डित पन्नालाल घोष की पत्नी थीं। फ़िल्म गायिका होने के बावजूद वो घर संसार सम्भालने वाली गृहणी भी थीं। उनके जाने के बाद महसूस हुआ कि वक़्त की गर्दिश ने हमसे कैस-कैसे फ़नकार छीन लिए।” जब मैंने पारुल घोष की परपोती श्रुति मुर्देश्वर कार्तिक से इस गीत के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने बताया, “इस गीत के साथ तो न जाने कितनी स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं। जब मैं बहुत छोटी थी, तब सब से पहला पहला गीत जो मैंने सीखा था, वह यही गीत था। और जब भी कोई मुझे गीत गाने को कहता, मैं यही गीत गाती रहती। और आज तक यह मेरा पसंदीदा गीत रहा है”

फिल्म ‘किस्मत’ : ‘पपीहा रे, मेरे पिया से कहियो जाए...’ : पारुल घोष



हिमांशु राय की मृत्यु के बाद से ही ‘बॉम्बे टॉकीज़’ विवादों और परेशानियों से घिर गया था। सरस्वती देवी, जिन्हें हिमांशु राय की वजह से वहाँ जगह मिली थी, के लिए भी वहाँ काम करना मुश्किल हो गया। उपर से रामचन्द्र पाल, पन्नालाल घोष और अनिल बिस्वास जैसे संगीतकार वहाँ शामिल हो चुके थे। ऐसे में सरस्वती ने वहाँ से इस्तीफ़ा देना ही बेहतर समझा। उनकी प्रतिष्ठा और उनका अनुभव इतना था कि ‘मिनर्वा मूवीटोन’ के सोहराब मोदी ने उन्हें अपनी कम्पनी में काम करने के लिए आमन्त्रित किया। इस तरह से ‘बॉम्बे टॉकीज़’ की कुल 20 फ़िल्मों में संगीत देने के बाद सरस्वती देवी इस कम्पनी से अलग हो गईं और आने वाले वर्षों में ‘मिनर्वा मूवीटोन’ की कुछ 6 फ़िल्मों में संगीत दिया।

‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भ ‘स्मृतियों का झरोखा’ के अन्तर्गत आज हमने सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ के कुछ पृष्ठ उद्धरित किये हैं। आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों का झरोखा’ के आगामी अंक में आपके लिए हम इस पुस्तक के कुछ और रोचक पृष्ठ लेकर उपस्थित होंगे। सुजॉय चटर्जी की पुस्तक ‘कारवाँ सिने-संगीत का’ प्राप्त करने के लिए तथा अपनी प्रतिक्रिया और सुझाव हमें भेजने के लिए radioplaybackindia@live.com पर अपना सन्देश भेजें।  

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

बुधवार, 15 अगस्त 2012

स्वाधीनता दिवस विशेषांक : भारतीय सिनेमा के सौ साल – 10


फ़िल्मों में प्रारम्भिक दौर के देशभक्ति गीत 

'रुकना तेरा काम नहीं चलना तेरी शान, चल चल रे नौजवान...'


हिन्दी फ़िल्मों में देशभक्ति गीतों का होना कोई नई बात नहीं है। 50 और 60 के दशकों में मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे और महेन्द्र कपूर के गाये देशभक्तिपूर्ण फ़िल्मी गीतों ने अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की थी। परन्तु देशभक्ति के गीतों का यह सिलसिला शुरू हो चुका था, बोलती फ़िल्मों के पहले दौर से ही। ब्रिटिश शासन की लाख पाबन्दियों के बावजूद देशभक्त फ़िल्मकारों ने समय-समय पर देशभक्तिपूर्ण गीतों के माध्यम से जनजागरण उत्पन्न करने के प्रयास किये और हमारे स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज 66वें स्वाधीनता दिवस पर आइए 30 के दशक में बनने वाले फिल्मों के देशभक्तिपूर्ण गीतों पर एक दृष्टिपात करते हें, जिन्हें आज हम पूरी तरह से भूल चुके हैं।आज का यह अंक स्वतन्त्रता दिवस विशेषांक है, इसीलिए आज के अंक में हम मूक फिल्मों की चर्चा नहीं कर रहे हैं। आगामी अंक से यह चर्चा पूर्ववत की जाएगी।


1930 के दशक के आते-आते पराधीनता की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ, देश आज़ादी के लिए ज़ोर-शोर से संघर्ष करने लगा। राष्ट्रीयता और देश-प्रेम की भावनाओं को जगाने के लिए फ़िल्म और गीत-संगीत मुख्य भूमिकाएँ निभा सकती थीं। परन्तु ब्रिटिश सरकार ने इस तरफ़ भी अपना शिकंजा कसा और समय-समय पर ऐसी फ़िल्मों और गीतों पर पाबंदियाँ लगाई जो देश की जनता को ग़ुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए प्रोत्साहित करती थीं। फिर भी कई बार फ़िल्मों में इस तरह के कुछ गीत ज़रूर सुनाई पड़े। 1934 में अजन्ता सिनेटोन ने मुंशी प्रेमचंद की कथा पर आधारित फिल्म ‘मजदूर’ का निर्माण किया था, जिसे तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था। राष्ट्रवादी फिल्मों के इतिहास में यह फिल्म प्रथम स्थान पर अंकित है। 1935 में संगीतकार नागरदास नायक ने 'भारतलक्ष्मी पिक्चर्स' की फ़िल्म 'बलिदान' में "जागो जागो भारतवासी..." गीत स्वरबद्ध किया था। इस गीत के बाद इसी वर्ष नागरदास की ही धुन पर पण्डित सुदर्शन का लिखा हुआ एक और देशभक्ति-भाव से ओत-प्रोत गीत आया "भारत की दीन दशा का तुम्हें भारतवालों, कुछ ध्यान नहीं...", फ़िल्म थी 'कुँवारी या विधवा'। इन दोनो गीतों के गायकों का पता नहीं चल सका है। चंदूलाल शाह निर्देशित 'देशवासी' भी इसी वर्ष आई पर इसके संगीतकार/गीतकार की जानकारी उपलब्ध नहीं है, हाँ इतना ज़रूर बताया जा सकता है कि इस फ़िल्म में भी एक देशभक्ति गीत था "सेवा ख़ुशी से
संगीतकार, गायक और अभिनेता मास्टर मोहम्मद  
करो देश की रे जीवन हो जाए फूलबगिया..."। 'वाडिया मूवीटोन' की 1935 की फ़िल्मों में 'देश-दीपक' उल्लेखनीय है, जिसमें संगीत दिया था मास्टर मोहम्मद ने और गीत लिखे थे जोसेफ़ डेविड ने। सरदार मन्सूर की आवाज़ में फ़िल्म का एक देशभक्ति गीत "हमको है जाँ से प्यारा, प्यारा वतन हमारा, हम बागबाँ हैं इसके..." लोकप्रिय हुआ था। इन बोलों को पढ़ कर इसकी "सारे जहाँ से अच्छा" गीत के साथ समानता मिलती है। 1936 में 'वाडिया मूवीटोन' की ही एक फ़िल्म आई 'जय भारत', जिसमें सरदार मंसूर और प्यारू क़व्वाल के अलावा मास्टर मोहम्मद ने भी कुछ गीत गाये थे। मास्टर मोहम्मद का गाया इसमें एक देशभक्ति गीत था "हम वतन के वतन हमारा, भारतमाता जय जय जय..."। आइए अब हम आपको फिल्म ‘जय भारत’ का यह दुर्लभ गीत सुनवाते है, जिसे मास्टर मोहम्मद और साथियों ने स्वर दिया है।

फिल्म – जय भारत : "हम वतन के वतन हमारा...” : मास्टर मोहम्मद और साथी


व्ही. शान्ताराम 
मास्टर मोहम्मद ने 1936 में बनी एक कम चर्चित फिल्म ‘लुटेरी ललना’ में सरिता और साथियों की आवाज़ में “झण्डा ऊँचा रहे हमारा...” गीत स्वरबद्ध किया था। मास्टर मोहम्मद ने इस दौर की फिल्मों में न केवल राष्ट्रवादी विचारों से युक्त गीतों पर बल दिया था, बल्कि तत्कालीन राजनीति में पनप रही हिन्दू-मुस्लिम अलगाववादी प्रवृत्तियों अपने गीतों के माध्यम से नकारते हुए परस्पर एकता को रेखांकित करने में अपनी भूमिका निभाई। फिल्मों के माध्यम से राष्ट्रीय विचारधारा को पुष्ट करने में व्ही. शान्ताराम का नाम शीर्ष फ़िल्मकारों में लिया जाता है। उनकी फिल्मों के कथानक और गीतों में समाज-सुधार के साथ-साथ राष्ट्रीय स्वाभिमान का भाव भी उपस्थित रहता था। 1937 में बनी उनकी द्विभाषी फिल्म ‘दुनिया न माने’ (हिन्दी) और ‘कंकु’ (मराठी) महिलाओं की शिक्षा, बेमेल विवाह और विधवा समस्या को रेखांकित किया गया था। इस फिल्म के एक गीत- “भारत शोभा में है सबसे आला...” में भारत-भूमि का गौरवशाली वर्णन किया गया है। फिल्म के संगीतकार थे केशव राव भोले और इसे स्वर दिया है फिल्म की एक बाल कलाकार बासन्ती ने। लीजिए आप भी सुनिए यह गीत।

फिल्म – दुनिया न माने : “भारत शोभा में है सबसे आला...” : बासन्ती


कवि प्रदीप 
1939 में 'बॉम्बे टॉकीज़' की फ़िल्म 'कंगन' में प्रदीप ने गीत भी लिखे और तीन गीत भी गाए। यह वह दौर था जब द्वितीय विश्वयुद्ध रफ़्तार पकड़ रहा था। 1सितम्बर, 1939 को जर्मनी ने पोलैण्ड पर आक्रमण कर दिया, चारों तरफ़ राजनैतिक अस्थिरता बढ़ने लगी। इधर हमारे देश में भी स्वाधीनता के लिए सरगर्मियाँ तेज़ होने लगीं थीं। ऐसे में फ़िल्म 'कंगन' में प्रदीप ने लिखा "राधा राधा प्यारी राधा, किसने हम आज़ाद परिंदों को बन्धन में बाँधा..."। गीतकार प्रदीप आरंभ से राष्ट्रीय विचारधारा के पोषक थे। अपनी उग्र कविताओं के लिए वे विदेशी सत्ता के आँखों की किरकिरी बने हुए थे। ब्रिटिश राज में राष्ट्रीय भावों के गीत लिखने और उसका प्रचार करने पर सज़ा मिलती थी, ऐसे में प्रदीप ने कितनी चतुराई से इस गीत में राष्ट्रीयता के विचार भरे हैं। अशोक कुमार और लीला चिटनिस ने इस गीत को गाया था। स्वतन्त्रता दिवस के पावन पर्व पर आइए यह अर्थपूर्ण गीत भी सुनते चलें।

फिल्म – कंगन : "राधा प्यारी किसने हम आज़ाद परिंदों को बन्धन में बाँधा..." : अशोक कुमार और लीला चिटनीस



1939 में ही 'सागर मूवीटोन' की एक फ़िल्म आई 'कॉमरेड्स' जिसमें संगीत था अनिल विश्वास का। सुरेन्द्र, माया बनर्जी, हरीश और ज्योति अभिनीत इस फ़िल्म में सरहदी और कन्हैयालाल के साथ-साथ आह सीतापुरी ने भी कुछ गीत लिखे थे। फ़िल्म में एक देशभक्तिपूर्ण गीत "कर दे तू बलिदान बावरे..." स्वयं अनिल विश्वास ने ही गाया था। 1939 की ही स्टण्ट फ़िल्म 'पंजाब मेल' में नाडिया, सरिता देवी, शाहज़ादी, जॉन कावस आदि कलाकार थे। पण्डित 'ज्ञान' के लिखे गीतों को सरिता, सरदार मन्सूर और मोहम्मद ने स्वर दिया। फ़िल्म में दो देशभक्ति गीत थे- "इस खादी में देश आज़ादी, दो कौड़ी में बेड़ा पार..." (सरिता, मोहम्मद, साथी) और "क़ैद में आए नन्ददुलारे, दुलारे भारत के रखवारे..." (सरिता, सरदार मन्सूर)। संगीतकार एस.पी. राणे का संगीत इस दशक के आरम्भिक वर्षों में ख़ूब गूँजा था। 1939 में उनकी धुनों से सजी एक ही फ़िल्म आई 'इन्द्र मूवीटोन' की 'इम्पीरियल मेल' (संगीतकार प्रेम कुमार के साथ)। सफ़दर मिर्ज़ा के लिखे इस फ़िल्म के गीत आज विस्मृत हो चुके हैं, पर इस फ़िल्म में एक देशभक्ति गीत था- "सुनो सुनो हे भाई, भारतमाता की दुहाई, ग़ैरों की ग़ुलामी करते…"।

देशभक्तिपूर्ण गीतों के संदर्भ में 1939 में प्रदर्शित 'वतन के लिए' फ़िल्म के दो गीतों का उल्लेख आवश्यक है। 'वनराज पिक्चर्स' के बैनर तले निर्मित इस फ़िल्म ने पराधीन भारत के लोगों में देशभक्ति के जज़्वे को जगाने के लिए दो गीत दिए; पहला "इतहाद करो, इतहाद करो, तुम हिन्द के रहने वालों..." और दूसरा "भारत के रहने वालों, कुछ होश तो संभालो, ये आशियाँ हमारा..."। इन दोनों गीतों को गुलशन सूफ़ी और बृजमाला ने गाया था। उधर 'न्यू थिएटर्स' के संगीतकार तिमिर बरन के कैरियर की सबसे बड़ी उपलब्धि 1939 में उनकी संगीतबद्ध की हुई 'वन्देमातरम' रही। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस इस गीत के लिए एक ऐसी धुन चाहते थे जो समूहगान के रूप में गायी जाए और जिससे जोश पैदा हो, मातृभूमि के लिए मर-मिटने की। तिमिर बरन ने राग दुर्गा के स्वरों का आधार लेकर नेताजी की मनोकामना को पूरा किया और जब नेताजी ने अपनी 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का निर्माण किया तो सिंगापुर रेडियो से 'वन्देमातरम' के इसी संस्करण को प्रसारित कराया। 1939 के अन्तिम दौर में अशोक कुमार और लीला चिटनीस के अभिनय और गायन से सजी एक और फिल्म आई थी- ‘बन्धन’। इस फिल्म के एक गीत- “चल चल रे नौजवान...” ने उस समय के सभी कीर्तिमानों को ध्वस्त कर दिया था। सरस्वती देवी के संगीत से सजे इस गीत को फिल्म के कई प्रसंगों में इस्तेमाल किया गया था। अब हम आपको इस गीत के दो संस्करण सुनवाते है। पहले संस्करण में अशोक कुमार और लीला चिटनीस की और दूसरे में बाल कलाकार सुरेश की आवाज़ें हैं।

फिल्म – बन्धन : “चल चल रे नौजवान...” : अशोक कुमार और लीला चिटनीस



फिल्म – बन्धन : “चल चल रे नौजवान...” : बाल कलाकार सुरेश

आगे चलकर नए दौर में बहुत से देशभक्ति गीत बने हैं, पर आज़ादी-पूर्व फ़िल्मी देशभक्ति गीतों का ख़ास महत्व इसलिए बन जाता है क्योंकि उस समय देश पराधीन था। एक तरफ़ जनसाधारण में राष्ट्रीयता के विचार जगाने थे और दूसरी तरफ़ ब्रिटिश शासन के प्रतिबन्ध का भय था। फिल्म संगीत के माध्यम से स्वतन्त्रता संग्राम का अलख जगाने में फ़िल्मकारों ने जो सराहनीय योगदान दिया है, आज इस अंक के माध्यम से हम उनकी स्मृतियों को सादर नमन करते हैं।

आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमें अवश्य लिखिएगा। आपकी प्रतिक्रिया, सुझाव और समालोचना से हम इस स्तम्भ को और भी सुरुचिपूर्ण रूप प्रदान कर सकते हैं। ‘स्मृतियों के झरोखे से : भारतीय सिनेमा के सौ साल’ के आगामी अंक में बारी है- ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ की। अगला गुरुवार मास का पाँचवाँ गुरुवार होगा और इस सप्ताह हम प्रस्तुत करेंगे एक गैरप्रतियोगी संस्मरण। यदि आपने ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के लिए अभी तक अपना संस्मरण नहीं भेजा है तो हमें तत्काल radioplaybackindia@live.com पर मेल करें।


आलेख : सुजॉय चटर्जी

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

बुधवार, 25 जनवरी 2012

"ऐ मेरे वतन के लोगों" - इस कालजयी देशभक्ति गीत को न गा पाने का मलाल आशा भोसले को आज भी है


कालजयी देशभक्ति गीत "ऐ मेरे वतन के लोगों" के साथ केवल पंडित नेहरू की यादें ही नहीं जुड़ी हुई हैं, बल्कि इस गीत के बनने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। आज गणतन्त्र दिवस की पूर्वसंध्या पर इसी गीत से जुड़ी कहानियाँ सुजॉय चटर्जी के साथ 'एक गीत सौ कहानियाँ' की चौथी कड़ी में...


एक गीत सौ कहानियाँ # 4

देशभक्ति गीतों की बात चलती है तो कुछ गीत ऐसे हैं जो सबसे पहले याद आ जाते हैं, चाहे वो फ़िल्मी हों या ग़ैर-फ़िल्मी। लता मंगेशकर की आवाज़ में एक ऐसी ही कालजयी रचना है "ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी, जो शहीद हुए हैं उनकी ज़रा करो क़ुर्बानी"। कवि प्रदीप के लिखे और सी. रामचन्द्र द्वारा स्वरबद्ध इस गीत को जब भी सुनें, रोंगटे खड़े हुए बिना नहीं रहते, आँखें नम हुए बिना नहीं रहतीं, हमारे वीर शहीदों के आगे नतमस्तक हुए बिना हम नहीं रह पाते। इस गीत को १९६२ के भारत-चीन युद्ध के शहीदों को समर्पित किया गया था। कहते हैं कि रेज़ांग् ला के प्रथम युद्ध में १३ - कुमाऊं रेजिमेण्ट, सी-कंपनी के आख़िरी मोर्चे में परमवीर मेजर शैतान सिंह भाटी के दुस्साहस और बलिदान से प्रभावित होकर कवि प्रदीप नें इस गीत की रचना की थी। २६ जनवरी १९६३ के दिन नई दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित गणतन्त्र दिवस समारोह में गायिका लता मंगेशकर नें इस गीत को पहली बार प्रस्तुत कर मौजूद जनता को मन्त्रमुग्ध कर दिया था। गीत का ऐसा असर हुआ था कि वहाँ पर मौजूद जनता बिल्कुल शान्त, हर एक की आँखें नम, यहाँ तक कि पण्डित नेहरू गीत के समाप्त होने पर मंच में आकर अपनी आँखें पोंछते हुए लता से कहा, "बेटी, तूने मुझे रुला दिया"। उसी समारोह में इस गीत की एक प्रति (साउण्डट्रैक स्पूल) पं नेहरू को भेंट में दी गई थी। प्रसिद्ध फ़िल्म पत्रिका 'स्क्रीन' में प्रकाशित लेख में इस गीत के बारे में लिखा गया था - "The lyrics of the song not only reflected Kavi Pradeep's sentiments but his nationalistic thinking of the country at large. With singer Lata Mangeshkar and composer C Ramchandra, he brought tears to every eye including Nehru's."

सुनने में आता है कि इस गीत से जुड़े हर कलाकार - गायक-वृंद, म्युज़िशियन्स, संगीतकार, रेकॉर्डिंग् स्टुडियो, साउण्ड रेकॉर्डिस्ट - सभी ने इस गीत से मिलने वाली रॉयल्टी का एक-एक अंश 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करवा दी थी। जहाँ इस गीत के लिए गायिका लता मंगेशकर नें अपार शोहरत हासिल की, कवि प्रदीप की तरफ़ लोगों का ध्यान कम ही गया। वैसे कवि प्रदीप को इस गीत के रॉयल्टी संबंधी कई ऑफ़र मिले, पर इस सच्चे देशभक्त नें इस गीत से कभी पैसा कमाना नहीं चाहा। यह तो उनकी एक श्रद्धांजली थी इस देश के वीर सपूतों के नाम, फिर इस गीत के लिए पैसे कैसे ले सकते थे? अत: उन्होंने इस गीत से मिलने वाली पूरी रॉयल्टी 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करने के लिए Saregama HMV को लिखित निर्देश दिया। पर अफ़सोस की बात कि इस कंपनी नें रॉयल्टी की इस राशि को 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में कभी जमा नहीं करवाया। बरसों बरस बाद, २५ अगस्त २००५ के दिन, बॉम्बे हाइ कोर्ट नें HMV को सख़्त निर्देश दिया १० लाख रुपये ऐरीयर के रूप में 'वार विडोज़ फ़ण्ड' में जमा करने का। उधर लता मंगेशकर नें आज से कुछ ही वर्ष पहले एक कॉन्सर्ट में सार्वजनिक रूप से कवि प्रदीप का इस गीत के लिए आभार प्रकट किया, और उन्होंने भी यह कबूल किया कि जिस गीत नें उन्हें अपार शोहरत दिलाई, उसके गीतकार को नज़रन्दाज़ कर दिया गया। कवि प्रदीप का सम्मान करते हुए लता जी नें उन्हें १ लाख रुपये की राशी प्रदान की। उस समय के प्रधानमन्त्री श्री अटल बिहारी वाजपयी नें भी कवि प्रदीप को मुंबई के मलाड में आयोजित एक कार्यक्रम में सम्मानित किया।

अब आते हैं इस गीत के बनने की कहानी पर जो विवादों से घिरी रही। उन दिनों किसी मनमुटाव या व्यक्तिगत कारणों से लता मंगेशकर और सी. रामचन्द्र साथ में काम नहीं कर रहे थे। ऐसे में जब कवि प्रदीप नें "ऐ मेरे वतन..." की रचना की और सी. रामचन्द्र को सुनाया, तो अन्ना नें इस गीत का रिहर्सल आशा भोसले से करवानी शुरु कर दी। प्रदीप को इस बात का पता नहीं था। अब यहाँ से इस कहानी के दो रुख़ सुनने में आते हैं। पहली धारणा यह है कि जब कवि प्रदीप को पता चला कि अन्ना गाने का रिहर्सल आशा से करवा रहे हैं, तब उन्होंने यह साफ़ कह दिया कि वो यह गाना तभी देंगे अगर लता गायेंगी तो (यह बात लता नें साक्षात्कार में भी बताया है)। और दूसरी धारणा यह कहती है कि जब लता को पता चला कि दिल्ली में पंडित नेहरू के सामने गाये जाने वाले गीत को आशा गा रही है, तो सी. रामचन्द्र से अपनी अन-बन को भुला कर प्रदीप के ज़रिये उन्हें ख़बर भिजवाया कि इस गीत को वो गाना चाहती हैं। और क्योंकि प्रदीप भी यही चाहते थे और अन्ना भी मन ही मन लता को ही पसन्द करते थे, इस तरह से लता इस गीत से जुड़ गईं। अब इन दोनों धारणाओं को एक कर दिया जाये तो निश्कर्ष यही निकलता है कि लता के लिए "ऐ मेरे वतन..." का मार्ग खुलने लगा। क्योंकि आशा को इस गीत का ऑफ़र दिया जा चुका था और वो इसका रिहर्सल भी कर रही थीं, प्रदीप और अन्ना नें यह तय किया कि इसे लता और आशा, दोनों की युगल आवाज़ों में प्रस्तुत किया जाए। लेकिन रहस्यमय तरीक़े से आशा का पत्ता साफ़ कर दिया गया और यह गीत लता का एकल गीत बन गया। आशा को दरकिनार करने के पीछे किसका हाथ था, यह जाने बिना यहाँ टिप्पणी करना सही नहीं, पर समझदारों के लिए इसका अनुमान लगाना कोई बड़ी बात नहीं। जो भी हुआ आशा के साथ, अच्छा नहीं हुआ। यह आशा भोसले की महानता ही कहेंगे कि उन्होंने इस गीत को न गा पाने का मलाल अपने दिल में दबाये तो रखा पर कभी किसी के ख़िलाफ़ उंगली भी नहीं उठाई। पारिवारिक कारणों से वो मंगेशकर परिवार से अलग-थलग तो हो ही चुकी थीं, इस घटना के बाद आशा अपनी बड़ी बहन से और भी ज़्यादा दूर चली गईं।

"ऐ मेरे वतन के लोगों" के बनने की कहानी जितनी विवादास्पद रही, आगे चलकर भी विवाद ख़त्म नहीं हुआ। ७० के दशक में बम्बई के ब्रेबोर्ण स्टेडियम में आयोजित एक शो में लता मंगेशकर इस गीत को गाने वाली थीं। उन्हें और इस गीत की भूमिका देने के लिए मंच पर मौजूद थे दिलीप कुमार। अपनी ड्रामाई अंदाज़ में उन्होंणे इस गीत के बारे में बताना शुरु किया। हालाँकि यह गीत किसी तारूफ़ का मोहताज नहीं, फिर भी दिलीप साहब नें इस गीत के बनने की कहानी, कवि प्रदीप के बारे में, पंडित नेहरू के रोने के बारे में बताया जहाँ वो ख़ुद भी मौजूद थे १९६३ के उस जलसे में। उन्होंने इस गीत के बारे में सबकुछ बताया सिवाय इसके संगीतकार सी. रामचन्द्र के बारे में। दिलीप कुमार की परिचित कूटनीति का यह एक उदाहरण था। बैकस्टेज पर जब वो आये तो वहाँ सी. रामचन्द्र खड़े थे और उन्होंने ग़ुस्से से पूछा कि उन्होंने उनका नाम क्यों नहीं लिया? दिलीप कुमार अपनी मासूमियत बरक़रार रखते हुए कहा कि उन्हें यह मालूम ही नहीं था कि अन्ना नें इस गीत की धुन बनाई है। अन्ना नें कहा, "झूठ मत बोलो यूसुफ़! तुम्हे अच्छी तरह पता है कि मैंने इस गीत को कम्पोज़ किया है। तुम्हे ज़रूर उस औरत (लता) नें कहा होगा!" दिलीप कुमार का जवाब था, "कोई भी दिलीप कुमार को टर्म्स डिक्टेट नहीं कर सकता"। अन्ना का तुरन्त जवाब था, "वो दिन गए यूसुफ़। एक समय था जब सी. रामचन्द्र को भी टर्म्स डिक्टेट करने की हिमाकत कोई नहीं कर सकता था। अब दोनों को ही डिक्टेट करते हैं।"

चाहे इस गीत के साथ कितनी भी विवाद, कितने भी मनमुटाव जुड़े रहे हों, सच्चाई यही है कि यह भारत के सर्वश्रेष्ठ १० देशभक्ति गीतों में एक है, और आज भी इसे सुनते हैं तो कलेजा चीर के रख देता है।


"ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत को सुनने के लिए नीचे प्लेयर में क्लिक करें...



तो दोस्तों, आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में बस इतना ही, अगले सप्ताह फिर किसी गीत से जुड़ी बातें लेकर मैं फिर उपस्थित हो‍ऊंगा, आपको यह स्तंभ कैसा लग रहा है, ज़रूर बताइएगा टिप्पणी में, और अगर किसी ख़ास गीत की तरफ़ हमारा ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं तो हमें ज़रूर सूचित कीजिएगा। अब अनुमति दीजिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को, फिर मुलाक़ात होगी अगले सप्ताह, नमस्कार!

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

झंकारो झंकारो झंकारो अग्निवीणा....कवि प्रदीप के शब्दों से निकलती आग

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 725/2011/165



भारत नें हमेशा अमन और सदभाव का राह चुनी है। हमनें कभी किसी को नहीं ललकारा। हज़ारों सालों का हमारा इतिहास गवाह है कि हमनें किसी पर पहले वार नहीं किया। जंग लड़ना हमारी फ़ितरत नहीं। ख़ून बहाना हमारा धर्म नहीं। लेकिन जब दुश्मनों नें हमारी इस धरती को अपवित्र करने की कोशिश की है, हम पर ज़ुल्म करने की कोशिश की है, तो हमने भी अपनी मर्यादा और सम्मान की रक्षा की है। न चाहते हुए भी बंसी के बदले बंदूक थामे हैं हम प्रेम-पुजारियों नें। अंग्रेज़ी सरकार नें 200 वर्ष तक इस देश पर राज किया। 1857 से ब्रिटिश राज के ख़िलाफ़ आवाज़ उठनी शुरु हुई थी, और 90 वर्ष की कड़ी तपस्या और असंख्य बलिदानों के बाद 1947 में ब्रिटिश राज से इस देश को मुक्ति मिली।



भारत के स्वाधीनता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में एक महत्वपूर्ण नाम है नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का। उनके वीरता की कहानियाँ हम जानते हैं, और उन पर एकाधिक फ़िल्में भी बन चुकी हैं। ऐसी ही एक फ़िल्म आई थी 'नेताजी सुभाषचन्द्र बोस' और इस फ़िल्म में एक जोश पैदा कर देने वाला गीत था हेमन्त कुमार, सबिता चौधरी और साथियों की आवाज़ों में। सलिल चौधरी के संगीत में इसके गीतकार थे कवि प्रदीप। कवि प्रदीप की कलम से निकले कई ओजस्वी गीत। उन्होने न केवल गहरे अर्थपूर्ण गीत लिखे,बल्कि अनेक गीतों को दक्षता के साथ गायन भी किया। फ़िल्म 'जागृति' का "आओ बच्चों तुम्हें दिखायें" हमेशा इस देश की महान संस्कृति और इस देश के वीरों की शौर्यगाथा सुनाता रहेगा। 'नेताजी सुभाषचन्द्र बोस' फ़िल्म के जिस गीत को आज की कड़ी के लिए हमनें चुना है, उसके बोल हैं "झंकारो झंकारो झननन झंकारो, झंकारो अग्निवीणा,आज़ाद होके बंधुओं जियो, ये जीना क्या जीना"।



जहाँ भारतीय कांग्रेस कमेटी स्वाधीनता को अध्याय दर अध्याय के रूप में चाहते थे, जबकि नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को स्वतंत्रता के लिए ब्रिटिश सरकार की कोई शर्त मंज़ूर नहीं था। फिर भगत सिंह का शहीद होना और कांग्रेस नेताओं का भगत सिंह की ज़िंदगी को न बचा सकने की व्यर्थता नें नेताजी को इतना क्रोधित कर दिया कि उन्होंने 'गांधी-इरविन पैक्ट' के ख़िलाफ़ आंदोलन छेड़ दिया। नेताजी को गिरफ़्तार कर लिया गया और भारत से भी निकाला गया। इस देश-निकाले को अमान्य करते हुए नेताजी देश वापस आये और फिर से गिरफ़्तार हुए। नेताजी दो बार 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' के प्रेसिडेण्ट भी चुने गए,पर महात्मा गांधी के विचारधारा से एकमत न हो पाने की वजह से उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा। कांग्रेस से मिलकर उन्होंने कांग्रेस को सीधी चुनौती दे दी। उनका यह मानना था कि सत्याग्रह से कभी स्वतंत्रता हासिल नहीं हो सकती। नेताजी नें अपनी पार्टी 'ऑल इण्डिया फ़ॉरवार्ड ब्लॉक' का गठन किया और ब्रिटिश राज से सीधा टक्कर ले लिया। ब्रिटिश सरकार को दाँतों तले चने चबवाया और 11 बार गिरफ़्तार हुए। कई बार अंग्रेज़ों की आँखों में धूल झोंक कर वो फ़रार भी हो गए थे। देशवासियों के लिए उनका एक ही पैग़ाम और निवेदन था - "तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा"। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान वो सोवियत यूनियन, नाज़ी जर्मनी और इम्पीरियल जापान का दौरा किया और भारत की आज़ादी के लिए उनसे गठबंधन की गुज़ारिश की। जापान की मदद से उन्होंने ''आज़ाद हिंद फ़ौज' का गठन किया जिसके जंगबाज़ बनें भारतीय युद्ध-बंदी, ब्रिटिश मलय और सिंगापुर के प्लैण्टेशन वर्कर्स। बर्मा से होते हुए अपनी फ़ौज को लेकर उन्होने इम्फाल के रास्ते भारत में प्रवेश किया पर असफल हुए। कहा जाता है कि ताइवान में 18 अगस्त 1945 में एक प्लेन-क्रैश में उनकी मृत्यु हो गई, लेकिन इसमें भी घोर संशय है। आइए आज 18 अगस्त को हम नेताजी को श्रद्धा सुमन अर्पित करें और सुनें उन्हीं पर बनी फ़िल्म का यह जोशीला गीत।



फिल्म – नेताजी सुभाषचन्द्र बोस : 'झंकारो झंकारो झननन अग्निवीणा....' गीतकार – प्रदीप





और अब एक विशेष सूचना:

२८ सितंबर स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर का जनमदिवस है। पिछले दो सालों की तरह इस साल भी हम उन पर 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक शृंखला समर्पित करने जा रहे हैं। और इस बार हमने सोचा है कि इसमें हम आप ही की पसंद का कोई लता नंबर प्ले करेंगे। तो फिर देर किस बात की, जल्द से जल्द अपना फ़ेवरीट लता नंबर और लता जी के लिए उदगार और शुभकामनाएँ हमें oig@hindyugm.com के पते पर लिख भेजिये। प्रथम १० ईमेल भेजने वालों की फ़रमाइश उस शृंखला में पूरी की जाएगी।



और अब वक्त है आपके संगीत ज्ञान को परखने की. अगले गीत को पहचानने के लिए हम आपको देंगें ३ सूत्र जिनके आधार पर आपको सही जवाब देना है-



सूत्र १ - एक और अमर स्वतंत्रता सेनानी के जीवन पर है ये फिल्म भी.

सूत्र २ - गीतकार और संगीतकार एक ही व्यक्ति थे.

सूत्र ३ - गीत के एक अंतरे में देश के विभिन्न प्रान्तों का जिक्र है.



अब बताएं -

किस दिन इस अमर शहीद को अंग्रेज सरकार ने फांसी की सजा सुनाई थी (मुक़दमे की अंतिम तारीख़ आपको बतानी है)- ३ अंक

किस क्रांतिकारी की जीवनी से प्रेरित था ये अमर शहीद - ३ अंक

गीतकार बताएं - २ अंक



सभी जवाब आ जाने की स्तिथि में भी जो श्रोता प्रस्तुत गीत पर अपने इनपुट्स रखेंगें उन्हें १ अंक दिया जायेगा, ताकि आने वाली कड़ियों के लिए उनके पास मौके सुरक्षित रहें. आप चाहें तो प्रस्तुत गीत से जुड़ा अपना कोई संस्मरण भी पेश कर सकते हैं.



पिछली पहेली का परिणाम -

लगता है कल की पहेली काफी मुश्किल रही सबके लिए, फिर भी अमित और क्षिति जी को बधाई सही जवाब के लिए.



खोज व आलेख- कृष्ण मोहन मिश्र






इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

शनिवार, 22 जनवरी 2011

ई मेल के बहाने यादों के खजाने (२६)- प्रदीप चटर्जी नाम से कोई गीतकार नहीं -हरमंदिर सिंह 'हमराज़'

नमस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड शनिवार विशेष' में एक बार फिर आप सभी का हम स्वागत करते हैं। इस साप्ताहिक स्तंभ में हम साधारणतः 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने' पेश किया करते हैं। कई बार यादों के ख़ज़ानें तो नहीं शामिल हो पाते, लेकिन जो भी पेश होता है वो ईमेल के बहाने से ही होता है। हर बार की तरह इस बार भी हम आप सभी से गुज़ारिश करते हैं कि इस शीर्षक को सार्थक करने के लिए आप अपने जीवन से जुड़ी किसी यादगार घटना या संस्मरण हमारे साथ बांटिये जिसे हम इस मंच के माध्यम से पूरी दुनिया के साथ बांट सके। ईमेल भेजने के लिए हमारा आइ.डी है oig@hindyugm.com।

दोस्तों, इसमें कोई शक़ नहीं कि इंटरनेट ने तथ्य तकनीकी और दूरसंचार के क्षेत्र में क्रांति ला दी है, और ऐसी क्रांति आई है, ऐसा बदलाव लाया है कि अब इंटरनेट के बिना सब काम काज जैसे ठप्प सा हो जाता है। लेकिन जिस तरह से हर अच्छे चीज़ के साथ कुछ बुरी चीज़ें भी समा जाती हैं, ऐसा ही कुछ इंटरनेट के साथ भी है। जी नहीं, हम अश्लील वेबसाइटों की बात नहीं कर रहे; हम तो बात कर रहे हैं ग़लत जानकारियों की जो इंटरनेट पर अपलोड होते रहते हैं। दरअसल बात यह है कि इंटरनेट पर हर कोई अपना तथ्य अपलोड कर सकता है, अपने ब्लॊग या वेबसाइट या किसी सोशल नेटवर्किंग् साइट के ज़रिए। ऐसे में किसी भी दी जा रही जानकारी की सत्यता पर प्रश्न-चिन्ह लग जाता है। अब कैसे हर बात पर यकीन करें कि जो बात हम किसी वेबसाइट पर पढ़ रहे हैं, वह सच भी है या नहीं! तभी तो 'रिसर्च-पेपर्स' या डाक्टरेट की थीसिस में इंटरनेट से प्राप्त तथ्यों का रेफ़रेन्स मान्य नहीं होता। हम भी 'ओल्ड इज़ गोल्ड' का आलेख लिखते वक़्त जब इंटरनेट पर शोध करते हैं किसी गीत या फ़िल्म पर, तब हमें भी कुछ गड़बड़ी वाले तथ्य नज़र आ जाते हैं, और ऐसा नहीं है कि हम ख़ुद कभी ग़लतियाँ नहीं करते, हमसे भी कई बार जाने-अंजाने ग़लतियाँ हो जाती हैं, और वही बात हम पर भी लागू हो जाती है।

दोस्तों, पिछले दिनों 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर चितलकर रामचन्द्र पर केन्द्रित लघु शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' आयोजित की गई थी, जिसमें फ़िल्म 'पैग़ाम' का गीत शामिल हुआ था, जिसके बोल थे "दौलत ने पसीने को आज लात है मारी", जिसके गीतकार का नाम हमने बताया था कवि प्रदीप। अब क्योंकि कुछ वेबसाइटों पर इस फ़िल्म के गीतकार का नाम प्रदीप चटर्जी दिया गया है, तो हमारे कुछ मित्रों ने भी पहेली का जवाब देते वक़्त प्रदीप चटर्जी का नाम लिखा, जिस वजह से काफ़ी संशय पैदा हो गया गीतकार के नाम का। हम भी यकीन के साथ नहीं कर पाये कि क्या कवि प्रदीप और प्रदीप चटर्जी एक ही इंसान हैं या दो अलग। इंटरनेट पर काफ़ी खोजबीन करने के बाद भी जब मेरे हाथ कुछ ठोस ना लगा, तो मैंने सोचा कि क्यों ना उस इंसान से मदद माँगी जाये जिन्होंने अपनी पूरी ज़िंदगी हिंदी फ़िल्म गीत कोष तैयार करने में लगा दी है! जी हाँ, ठीक समझे आप, मैं हरमंदिर सिंह 'हमराज़' साहब की ही बात कर रहा हूँ। उन्होंने १९३१ से लेकर शायद १९९० तक के सभी फ़िल्मों के सभी गीतों को 'गीत-कोष' के रूप में प्रकाशित किया है और दशकों से 'लिस्नर्स बुलेटिन' नामक पत्रिका भी चला रहे हैं कानपुर से। तो मैंने जब हमराज़ जी को ईमेल भेजकर जानना चाहा कि आख़िर कवि प्रदीप और प्रदीप चटर्जी का क्या माजरा है और 'नास्तिक' और 'पैग़ाम' जैसी फ़िल्मों के गीतकार कौन हैं, तो उन्होंने तुरंत मेरे ईमेल का जवाब देते हुए कुछ ऐसा लिखा ---

"प्रदीप चटर्जी के नाम से कोई गीतकार १९३१ से लेकर अब तक इस फ़िल्म इण्डस्ट्री में नहीं हुए हैं। वो कवि प्रदीप ही थे, दादा साहब फाल्के सम्मानित, जिन्होंने 'नास्तिक' और 'पैग़ाम' में गीत लिखे हैं। यहाँ हर कोई आज़ाद है इंटरनेट पर लोगों को गुमराह करने के लिए। लखनऊ में एक डॊ. डी. सी. अवस्थी रहते हैं जिन्हें कवि प्रदीप पर शोध करने के लिए डाक्टरेट की डिग्री दी गई है।"

तो दोस्तों, आशा है आप सभी का संशय अब दूर हो गया होगा, प्रदीप चटर्जी नामक कोई गीतकार नहीं है, प्रदीप के नाम से जितने भी गीत आते हैं, वो सब कवि प्रदीप के ही लिखे हुए हैं, जिनका जन्म मध्य प्रदेश में हुआ है और जो बंगाली तो बिल्कुल नहीं हैं, इसलिए चटर्जी होने का सवाल ही नहीं। हाँ, आपकी जानकारी के लिए यह बता दूँ कि पंडित प्रदीप चटर्जी एक शास्त्रीय गायक ज़रूर हैं और यूट्युब में आप उनका गायन सुन सकते हैं। ख़ैर, अब आपको एक गीत सुनवाने की बारी है। कवि प्रदीप का लिखा एक ऐसा गीत आज सुनिए जिसे आप ने बहुत दिनों से नहीं सुना होगा, ऐसा हम दावा करते हैं। क्योंकि कवि प्रदीप का उल्लेख सी. रामचन्द्र पर केन्द्रित शृंखला में आयी है, इसलिए आज जिस गीत को हमने चुना है, उसे कवि प्रदीप ने लिखा और सी. रामचन्द्र ने ही स्वरबद्ध किया है। यह साल १९६० की फ़िल्म 'आँचल' का गीत है जिसे आशा भोसले, सुमन कल्याणपुर और सखियों ने गाया है। "नाचे रे राधा", यह एक नृत्य गीत है, बड़ा ही मीठा गाना है, हमें उम्मीद है कि गीत सुनते वक़्त आपके क़दम भी थिरक उठेगे, मचल उठेंगे। गीत की एक और खासियत है कि इसके दो वर्ज़न हैं, दोनों में वही आवाज़ें हैं लेकिन बोल अलग हैं। आइए ये दोनों वर्ज़न सुना जाये एक एक करके। गीत का संगीत संयोजन भी कमाल का है, बेहद सुरीला है। 'आँचल' वसंत जोगलेकर निर्देशित फ़िल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे अशोक कुमार, नंदा, निरुपा रॊय और ललिता पवार। नंदा को इस फ़िल्म के लिए फ़िल्मफ़ेयर के सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था और ललिता पवार भी इसी पुरस्कार के लिए नामांकित हुई थीं।

गीत - नाचे रे राधा -१ (आँचल)


गीत - नाचे रे राधा -२ (आँचल)


तो दोस्तों, ये था इस हफ़्ते का 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने', आपको यह गीत सुनकर कैसा लगा ज़रूर बताइएगा, और हमें ईमेल ज़रुर कीजिएगा अपने सुझावों और अपने जीवन की किसी यादगार घटना के साथ, oig@hindyugm.com के पते पर।

मंगलवार, 11 जनवरी 2011

दौलत ने पसीने को आज लात मारी है.....बगावती तेवर चितलकर के स्वर और सुरों का

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 568/2010/268

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार! 'कितना हसीं है मौसम', सी. रामचन्द्र को सपर्पित इस लघु शृंखला में आज हम चितलकर और साथियों का गाया एक जोश भरा गीत सुनेंगे। इस गीत के बारे में बताने से पहले आपको याद दिला दें कि कल की कड़ी में हम ज़िक्र कर रहे थे लता मंगेशकर और सी. रामचन्द्र के बीच के अनबन के बारे में। हमने कुछ कही सुनी बातें तो जानी, सी. रामचन्द्र का राजु भारतन को दिए इंटरव्यु के बारे में भी जाना; लेकिन इस चर्चा को तब तक पूरी नहीं मानी जा सकती जब तक हम लता जी से इसके बारे में ना पूछ लें। और हमारे इस काम को अंजाम दिया अमीन सायानी साहब ने जिन्होंने लता जी से इसके बारे में पूछा और लता जी ने विस्तार से बताया। लीजिए पेश है उस इंटरव्यु का वही अंश, यह प्रस्तुत हुआ था 'सरगम के सितारों की महफ़िल' रेडियो प्रोग्राम में।

अमीन सायानी: सी. रामचन्द्र से क्या बात हो गई, कैसे अनबन हो गई, क्यों हो गई, और ना होती तो कितना अच्छा होता?

लता मंगेशकर: (हँसते हुए) नहीं, अगर आप ऐसे सोचें तो मेरा दुश्मन कोई नहीं है, ना ही मैं किसी की दुश्मन हूँ। पर इतने सारे म्युज़िक डिरेक्टर्स के साथ जब हम काम करते हैं, इतने लोग मिलते हैं रोज़, तो कहीं ना कहीं छोटी मोटी बात हो ही जाती है। उनके साथ क्या हुआ था कि एक रेकॊर्डिंस्ट थे जो मेरे पीठ पीछे कुछ बात करते थे, मुझे मालूम हुआ था और वो जिसने मुझे बताया था वो अदमी मुझे बहुत ज़्यादा प्यार करता था, कहता था 'मैं सुन नहीं सकता हूँ लता जी कि वो आपके बारे में बात ऐसी ऐसी करते हैं'। और मेरी रेकॊर्डिंग् थी सी. रामचन्द्र की जो उसी स्टुडिओ में थी। मैंने अन्ना को कहा कि 'अन्ना, मैं इस रेकॊर्डिस्ट के पास रेकॊर्डिंग् नहीं करूँगी, क्योंकि यह मेरे लिए बहुत ख़राब बात करता है, जब मैं गाऊँगी मेरा मन नहीं लगेगा यहाँ और मैं जब गाती हूँ मेरे दिमाग को अच्छा लगना चाहिए, सुकून मिलना चाहिए कि भई जो गाना मैं गा रही हूँ, अच्छा लग रहा है, तभी गाना अच्छा बन सकता है'। उनको पता नहीं क्या हुआ, उन्होंने कहा कि 'लता, तुम अगर नहीं गाओगी तो मैं अपने दोस्त को भी नहीं छोड़ सकता हूँ, मैं तुम्हारी जगह किसी और को लाऊँगा'।

अमीन: अरे!!!

लता: मैंने कहा 'बिल्कुल आप ला सकते हैं, किसी को भी ले आइए'। और मैंने वो काम छोड़ा, पर मेरा उनका झगड़ा ऐसा नहीं हुआ। मैंने वो गाना, मतलब रिहर्सल किया हुआ, मैं छोड़ के चली गई और उन्होंने फिर किसी और से वह गाना लिया, और वह मराठी गाना था, मराठी पिक्चर का था। तो वो गाना होने के बाद, उस समय उनके पास काम भी बहुत कम था, और फिर बाद में मेरी उनकी बात नहीं हुई, मुलाक़ात नहीं हुई, कुछ नहीं। और फिर अगर उनका मेरा इतना झगड़ा होता तो फिर वो फिर मेरे पास दोबारा आए "ऐ मेरे वतन के लोगों" के लिए।

अमीन: हाँ, बिल्कुल बिल्कुल बिल्कुल!

लता: तो झगड़ा तो था ही नहीं। और "ऐ मेरे वतन के लोगों" के लिए वो मेरे घर में आये बुलाने के लिए, वो और प्रदीप जी, दोनों ने आकर कहा कि 'यह गाना तुमको गाना ही पड़ेगा'। मैंने कहा 'मैं गाऊँगी नहीं, मेरी तबीयत ठीक नहीं, मुझे आप यह मत कीजिए, मुझे रिहर्सल करना पड़ेगा, दिल्ली जाना पड़ेगा'। मैंने कहा कि 'दिल्ली जाना भी मुझे इतना पसंद नहीं इस वक़्त'। पर उस गाने के लिए प्रदीप जी ने बहुत ज़ोर लगाया। प्रदीप जी ने कहा कि 'लता, अगर तुम यह गाना नहीं गाओगी तो फिर मैं यह गाना दूँगा ही नहीं'। तो उनका दिल नहीं तोड़ सकी मैं। मैंने कहा 'अच्छी बात है, मैं गाती हूँ', और उनके घर जाकर मैंने रिहर्सल वगेरह किए और मैंने वह गाना गाया।

और इस अमर गीत ने लता जी और चितलकर साहब के बीच के अनबन को मिटाया। चलिए अब वापस आते हैं आज बजने वाले गीत की तरफ़। अभी उपर "ऐ मेरे वतन के लोगों" का ज़िक्र हुआ तो याद आया कि एक फ़िल्म थी 'पैग़ाम' जिसमें भी देशभक्ति और समाजोद्धार के विषयों पर बनें गीत हैं जिन्हें प्रदीप ने लिखे थे और सी. रामचन्द्र ने स्वरबद्ध किए थे। आइए आज इस फ़िल्म से चितलकर और साथियों का गाया एक गीत सुनते हैं, "दौलत ने पसीने को आज लात है मारी, हरगिज़ ना रूकेगी अब हरताल हमारी"। 'पैग़ाम' १९५९ की फ़िल्म थी जिसका एस.एस.वासन ने 'जेमिनि पिक्चर्स' के बैनर तले निर्माण व निर्देशन किया था। दिलीप कुमार, राज कुमार और वैजयंतीमाला अभिनीत इस फ़िल्म के संवाद लिखे थे रामानंद सागर ने, जिसके लिए उन्हें उस साल के फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से नवाज़ा गया था। आज के प्रस्तुत गीत की बात करें तो मिल मज़दूरों और उनके हरतालों को लेकर इस गीत को बनाया गया है। तो लीजिए प्रस्तुत है फ़िल्म 'पैग़ाम' में चितलकर और साथियों की आवाज़ें।



क्या आप जानते हैं...
कि शुरु शुरु में "ऐ मेरे वतन के लोगों" गीत का रिहर्सल आशा भोसले से करवाया गया था, लेकिन बाद में गीत लता से गवाया गया, इसका आशा भोसले को हमेशा मलाल रहा।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 09/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -आसान है न ?

सवाल १ - गीतकार बताएं - १ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म की नायिका बताएं - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह अमित जी आपने शरद जी बहुत बढ़िया टक्कर दी है इस बार...दीपा, प्रदीप दुआ और हिन्दुस्तानी (कृपया अपना सही नाम बताएं) के आने से नए योद्धाओं की जबरदस्त जंग देखने को मिल रही है....जहाँ तक गीतकार का सवाल है, कवि प्रदीप ही परदीप चट्टर्जी के नाम से कहीं कहीं नज़र आये हैं....क्या प्रदीप चट्टर्जी नाम के कोई अन्य गीतकार हैं ? मेरा (सजीव) और सुजॉय का मानना है कि नास्तिक व नया फिल्मों के गीत कवि प्रदीप जी के लिखे हुए है....इस बारे में आप लोग यदि पक्की जानकारी रखते हैं तो हमें बताएं....बहुत से श्रोताओं का मार्गदर्शन होगा

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

रविवार, 9 जनवरी 2011

कारी कारी कारी अंधियारी सी रात.....सावन की रिमझिम जैसी ठडक है अन्ना के संगीत में भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 566/2010/266

मस्कार! 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की एक नई सप्ताह के साथ हम हाज़िर हैं दोस्तों। फ़िल्म संगीत के सुनहरे दौर के गीतों को सुनने और उनके बारे में जानने का सिलसिला जारी है। इन दिनों हम करीब से जान रहे हैं सी. रामचन्द्र को जिनके स्वरबद्ध और गाये हुए गानें हम शामिल कर रहे हैं उन पर केन्द्रित शृंखला 'कितना हसीं है मौसम' में। दोस्तों, युं तो सी. रामचन्द्र ने ज़्यादातर युगल गानें लता जी के साथ ही गाये थे, लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया कि जब उन दोनों के बीच अनबन हो गई और लता जी ने उनके लिए गाना बंद कर दिया। इसके बारे में विस्तार से हम कल की कड़ी में चर्चा करेंगे, आज बस इतना कहते हैं कि लता का विकल्प आशा बनीं और ५० के दशक के आख़िर के कुछ सालों में अन्नासाहब ने आशा भोसले से कई गीत गवाये। तो आइए आज उन चंद सालों में सी. रामचन्द्र और आशा भोसले के संगम से उत्पन्न गीतों की बात करें। इन फ़िल्मों में जो नाम सब से उपर आता है, वह है १९५८ की फ़िल्म 'नवरंग'। आज इसी फ़िल्म से एक गीत आपको सुनवाने जा रहे हैं। वैसे इस फ़िल्म के दो गीत हम आपको सुनवा चुके हैं - "तू छुपी है कहाँ" (आशा-मन्ना) और "आधा है चन्द्रमा" (आशा-महेन्द्र)। लेकिन आज हम सुनेंगे आशा और चितलकर यानी सी. रामचन्द्र की आवाज़ों में एक बड़ा ही अद्भुत गीत "कारी कारी कारी अंधियारी सी रात"। इस गीत में चितलकर काव्य शैली में बोल गाते हैं, और उसके बाद आशा शास्त्रीय संगीत पर उन्हीं बोलों को गा उठती हैं और एक अलग ही समा सा बंध जाता है। सावन पर बहुत सारे, ढेर सारे फ़िल्मी गीत बनें हैं, लेकिन अगर उत्कृष्ट गीतों को इस लम्बी फ़ेहरिस्त से छाँटा जाये तो इस गीत को निश्चित रूप से उसमें स्थान मिलेगा। इस गीत से सी. रामचन्द्र के ना केवल संगीतकार के रूप में महानता का पता चलता है, बल्कि एक बेहतरीन और प्रतिभाशाली गायक होने का भी आभास दिलाता है। भरत व्यास के काव्यात्मक शब्दों ने गीत की सुंदरता में चार चांद लगा दिया है, और आशा भोसले की आवाज़ तो सोने पे सुहागा का काम करती है। गीत के संगीत संयोजन में अन्य साज़ों के बीच में शहनाई भी सुनाई देती है जिसे रामलाल ने बजाया था। जी हाँ, वही रामलाल जो 'सेहरा' और 'गीत गाया पत्थरों ने' जैसी फ़िल्मों में संगीत दिया था।

हम बात कर रहे थे चितलकर और आशा भोसले के गाये गीतों की। 'नवरंग' के गीतों का लेखक पंकज राग ने अपनी किताब 'धुनों की यात्रा' में जिन शब्दों में वर्णन किया है, वो इस प्रकार है - "नवरंग के लोकप्रिय गीतों में आशा और महेन्द्र का वर्चस्व रहा। पर मालकौंस पर आधारित "आधा है चन्द्रमा" और "तू छुपी है कहाँ" जैसे हिट गीतों हों, अभिनेत्री संध्या की शैली के अनुरूप अनूठे इठलाते अंदाज़ में गाया "आ दिल से दिल मिला ले" या प्रणय को एक पवित्र भाव से प्रस्तुत करता "तुम मेरे मैं तेरी" हों, सौंदर्य का एक कोमल संगीतात्मक वर्णन करता "श्यामल श्यामल वरण" हो, कवि-सम्मेलन की शैली का "कविराजा कविता के मत कान मरोड़ो" या पहाड़ी के सुरों को लेकर बनाये गये होली गीत "जा रे हट नटखट" का आह्लाद हो, लोकप्रियता के बावजूद इन गीतों की शैली सी. रामचन्द्र वाली कम और वी. शांताराम के प्रभाववाली अधिक लगती है।" ठीक ही तो कहा है पंकज जी ने, भले ही ये गानें चले हों, लेकिन इनमें निस्संदेह वो बात नहीं आई जो लता के लिए बनाये उनके गीतों में आते थे। १९५९ की फ़िल्म 'पैगाम' में भी आशा की आवाज़ थी और १९६० में 'आँचल' में आशा-महेन्द्र का गाया "गा रही है ज़िंदगी" और सुमन ने लता की शैली में "सांवरिया रे अपनी मीरा को भूल ना जाना" गाया, लेकिन ये तमाम गानें ज़्यादा चले नहीं। १९६० में ही आशा और चितलकर ने फ़िल्म 'सरहद' में "नाचो घूम घूम घूम के" गाया जो पश्चिमी रिदम पर था। इसी फ़िल्म में आशा और साथियों का गाया "आजा रे लागे न मोरा जिया" में सी. रामचन्द्र का विशिष्ट प्रभाव कम ही नज़र आया। प्रभु दयाल निर्देशित १९६१ की फ़िल्म 'अमर रहे यह प्यार' में आशा की गाई "मेरे अंधेरे घर में चाँद कोई छाया" की सफलता भी सीमित ही रही। १९६१ में ही लता और सी. रामचन्द्र का एक बार फिर साथ हुआ शांताराम की ही फ़िल्म 'स्त्री' में। तो आइए अब आज का गीत सुना जाये। आशा भोसले और चितलकर रामचंद्र की आवाज़ में फ़िल्म 'नवरंग' की यह सुंदर रचना।



क्या आप जानते हैं...
कि सी. रामचन्द्र अपनी धुनों के नोटेशन्स एक पॊकेट डायरी में लिखा करते थे। एक दिन वह डायरी फोकेट्मार हो गई और उन्हें बहुत नुकसान हुआ। इस क़िस्से का ज़िक्र गायिका ललिता देवूलकर से करते वक़्त वो रो पड़े थे।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली 07/शृंखला 07
गीत का ये हिस्सा सुनें-


अतिरिक्त सूत्र -इतना सुनने के बाद गीत पहचानना मुश्किल नहीं.

सवाल १ - गीतकार बताएं - २ अंक
सवाल २ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक
सवाल ३ - आवाज़ पहचाने - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
वाह अमित जी, बहुत बधाई....दीपा जी और हिन्दुस्तानी जी को भी सही जवाब की बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

सोमवार, 15 नवंबर 2010

हम लाये हैं तूफानों के किश्ती निकाल के.....कवि प्रदीप का ये सन्देश जो आज भी मन से राष्ट्र प्रेम जगा जाता है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 527/2010/227

दोस्तों कल था १४ नवंबर, देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु का जन्मदिवस। नेहरु जी का बच्चों के प्रति अत्यधिक लगाव हुआ करता था। बच्चों के लिए उन्होंने बहुत सारा कार्य भी किया। इसी वजह से आज का यह दिन देश भर में 'बाल दिवस' के रूप में मनाया जाता है। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों, नमस्कार। 'दिल की कलम से', इस शुंखला में आज हम लेकर आए हैं एक ऐसे कवि की बातें जो एक कवि होने साथ साथ एक उत्कृष्ट गीतकार और गायक भी थे, जिनकी लेखनी और गायकी में झलकता है उनका अपने देश के प्रति प्रेम और देशवासियों में जागरुक्ता लाने की शक्ति। जी हाँ, आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में ज़िक्र कवि प्रदीप का। कवि प्रदीप का जन्म १९१५ में मध्य प्रदेश के उज्जैन के बाधनगर में हुआ था। उनका पूरा नाम था रामचन्द्र नारायणजी द्विवेदी। उनकी शिक्षा अलाहाबाद में हुई और वहीं उन्होंने कविताएँ लिखनी शुरु की। गर्मियों की छुट्टियों मे वे मित्रों के घर जाया करते थे। ऐसी ही एक छुट्टी में वे बम्बई आये और उनकी मुलाक़ात हो गई बॊम्बे टॊकीज़ के हिमांशु राय से। उनकी लेखनी से प्रभावित होकर उन्होंने कवि प्रदीप को १९३९ में फ़िल्म 'कंगन' के गानें लिखने का मौका दे दिया। यही प्रदीप की पहली फ़िल्म थी बतौर गीतकार और गायक। उनकी लोकप्रिय गीतों वाली फ़िल्म थी १९४० में बनी फ़िल्म 'बंधन', जिसका एक गीत "चल चल रे नौजवान" तो आज भी उतना ही लोकप्रिय है। इस फ़िल्म के बाद उन्हें काम की कमी नहीं हुई। 'कंगन', 'झूला', 'नया संसार', 'क़िस्मत' जैसी फ़िल्में एक के बाद एक आती चली गईं। कवि प्रदीप को उनकी योगदान के लिए सम्मानित किया गया था 'दादा साहब फाल्के' पुरस्कार से। उन्होंने करीब १५०० गानें लिखे जो ज़्यादातर देश भक्ति और ईश्वर भक्ति रस में ओत-प्रोत हैं। ब्रॊण्काइटिस से आक्रान्त होकर वे चुप-चाप चले गए हमसे बहुत दूर, जैसे कह रहे हों अपनी ही दिल की बात इस गीत में, कि "चल अकेला चल अकेला चल अकेला, तेरा मेला पीछे छूटा राही चल अकेला"।

कवि प्रदीप के दिल में देश भक्ति की प्रबल भावना थी जो आज भी हमारे दिलों को जागृत करती है देशभक्ति के भावों से। कल नेहरु जी का जन्मदिन भी था तो उन्हें याद करते हुए मैं यहाँ पर यह बताना अत्यंत आवश्यक है कि जब सन् १९६२ में देश बहुत ही नाज़ुक दौर से गुज़र थी, तब २९ जनवरी १९६३ को लाल क़िले की प्राचीर पर जब लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप की वह अमर रचना "अए मेरे वतन के लोगों" प्रस्तुत कीं तो पंडित नेहरु की आँखें आँसूओं से भर गए थे। प्रदीप के गीतों में खनकती हिंदी की मिठास तो है ही, उसके साथ है देशभक्ति, ईश्वर भक्ति और आंचलिक सहजता के सारे गुण। उनके लिखे देश भति गीत आज जन गीत बन गए हैं जो आज भी हमारे दिल में देश भक्ति की मशाल प्रज्वलित करते हैं। अपने देश की युवा पीढ़ी के लिए उनका यही संदेश है कि "हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्भल के"। आइए पंडित जवाहरलाल नेहरु और कवि प्रदीप को एक साथ श्रद्धा सुमन अर्पित करें फ़िल्म 'जागृति' के इस गीत के ज़रिए। मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ और हेमन्त कुमार का संगीत। फ़िल्म की जानकारी हम पहले ही आपको दे चुके हैं "साबरमती के संत" गीत के आलेख में, और प्रदीप जी से एक मुलाक़ात के बारे में राज सिंह जी ने हमें बताया था 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ाने में', जिसमें हमने इसी फ़िल्म का "आओ बच्चों तुम्हे दिखाएँ" गीत सुनवाया था। तो आइए सुनते हैं यह गीत जो है आज की युवा पीढ़ी के नाम।



क्या आप जानते हैं...
कि "हम लाये हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के" 'जागृति' फ़िल्म का ना केवल अंतिम गीत है, बल्कि इसी गीत के साथ फ़िल्म का भी समापन होता है।

दोस्तों अब पहेली है आपके संगीत ज्ञान की कड़ी परीक्षा, आपने करना ये है कि नीचे दी गयी धुन को सुनना है और अंदाज़ा लगाना है उस अगले गीत का. गीत पहचान लेंगें तो आपके लिए नीचे दिए सवाल भी कुछ मुश्किल नहीं रहेंगें. नियम वही हैं कि एक आई डी से आप केवल एक प्रश्न का ही जवाब दे पायेंगें. हर १० अंकों की शृंखला का एक विजेता होगा, और जो १००० वें एपिसोड तक सबसे अधिक श्रृंखलाओं में विजय हासिल करेगा वो ही अंतिम महा विजेता माना जायेगा. और हाँ इस बार इस महाविजेता का पुरस्कार नकद राशि में होगा ....कितने ?....इसे रहस्य रहने दीजिए अभी के लिए :)

पहेली ०८ /शृंखला ०३
एक शुरूआती झलक सुनिए इस गीत की-


अतिरिक्त सूत्र - संगीतकार जयदेव ने रचा है ये अद्भुत गीत.

सवाल १ - छायावादी युग की एक सशक्त कलम से निकला है ये गीत, किस की है ये रचना, नाम बताएं- २ अंक
सवाल २ - गायिका बताएं - १ अंक
सवाल ३ - फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी ७ अंकों पर है पर अभी भी श्याम कान्त जी से पीछे हैं जो १० अंकों पर हैं. अल्पना जी ने खाता खोला है १ अंक से बधाई. राज जी और अवध जी आभार

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


इन्टरनेट पर अब तक की सबसे लंबी और सबसे सफल ये शृंखला पार कर चुकी है ५०० एपिसोडों लंबा सफर. इस सफर के कुछ यादगार पड़ावों को जानिये इस फ्लेशबैक एपिसोड में. हम ओल्ड इस गोल्ड के इस अनुभव को प्रिंट और ऑडियो फॉर्मेट में बदलकर अधिक से अधिक श्रोताओं तक पहुंचाना चाहते हैं. इस अभियान में आप रचनात्मक और आर्थिक सहयोग देकर हमारी मदद कर सकते हैं. पुराने, सुमधुर, गोल्ड गीतों के वो साथी जो इस मुहीम में हमारा साथ देना चाहें हमें oig@hindyugm.com पर संपर्क कर सकते हैं या कॉल करें 09871123997 (सजीव सारथी) या 09878034427 (सुजॉय चटर्जी) को

मंगलवार, 14 सितंबर 2010

कुछ शर्माते हुए और कुछ सहम सहम....सुनिए लता की आवाज़ में ये मासूमियत से भरी अभिव्यक्ति

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 483/2010/183

'लता के दुर्लभ दस' शृंखला की तीसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। १९४८ की दो फ़िल्मों - 'हीर रांझा' और 'मेरी कहानी' - के गानें सुनने के बाद आइए अब हम क़दम रखते हैं १९४९ के साल में। १९४९ का साल भी क्या साल था साहब! 'अंदाज़', 'बड़ी बहन', 'बरसात', 'बाज़ार', 'एक थी लड़की', 'दुलारी', 'लाहोर', 'महल', 'पतंगा', और 'सिपहिया' जैसी फ़िल्मों में गीत गा कर लता मंगेशकर यकायक फ़िल्म संगीत के आकाश का एक चमकता हुआ सितारा बन गईं। इन नामचीन फ़िल्मों की चमक धमक के पीछे कुछ ऐसी फ़िल्में भी बनीं इस साल जिसमें भी लता जी ने गीत गाए, लेकिन अफ़सोस कि उन फ़िल्मों के गानें ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुए और वो आज भूले बिसरे और दुर्लभ गीतों में शुमार होता है। ऐसी ही एक फ़िल्म थी 'गर्ल्स स्कूल'। लोकमान्य प्रिडक्शन्स के बैनर तले बनी इस फ़िल्म के निर्देशक थे अमीय चक्रबर्ती। फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सोहन, गीता बाली, शशिकला, मंगला, सज्जन, राम सिंह और वशिष्ठ प्रमुख। फ़िल्म का संगीत तैयार किया अनिल बिस्वास और सी. रामचन्द्र ने मिल कर। गीत लिखे कवि प्रदीप ने। १९४९ में अनिल दा ने लता से सुरैया और देव आनंद अभिनीत फ़िल्म 'जीत' में गीत गवाए जिसमें मुरकियों भरा "हँस ले गा ले ओ चाँद" बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस फ़िल्म में भी अनिल दा अकेले नहीं थे, उनके साथ श्यामबाबू पाठक का भी संगीत था। 'गर्ल्स स्कूल' में सी. रामचन्द्र के चुलबुले और थिरकन भरे गीतों के बीच भी अनिल बिस्वास के "कमसिन प्यार भरे" अंदाज़ में स्वरबद्ध और लता का ही गाया हुआ "कुछ शर्माते हुए और कुछ सहम सहम, नए रास्ते पे हमने रखा है क़दम" अपना अलग मुक़ाम रखता है। यह गीत भी लोकप्रिय हुआ था उस ज़माने में। लेकिन आज इस गीत को लोग बिलकुल ही भुला बैठे हैं। पहले प्यार की अनुभूति पर असंख्य गीत बनें हैं, लेकिन इस जौनर में इस दुर्लभ गीत को सुनने का आनंद ही कुछ और है।

३० और ४० के दशकों में बहुत सारे गायक गायिकाएँ फ़िल्म जगत में काम कर रहे थे। सब की आवाज़ें एक साथ गूंजा करती थीं। लेकिन ५० के दशक के आते आते एक ज़माना ऐसा भी आया कि जब बस गिनती भर की आवाज़ें ही राज करने लगीं इंडस्ट्री पर। मशहूर रेडियो ब्रॊडकास्टर अमीन सायानी साहब ने जब इसी बात का ज़िक्र अनिल बिस्वास से उनके किसी भेंट के दौरान किया, तो पता है अनिल दा ने लता जी का उदाहरण देते हुए क्या कहा था? "किसी से मैंने पूछा था 'क्या बात है तुम लोगों को, देखो मैं सुनता हूँ टीवी के उपर, बहुत ख़ूबसूरत आवाज़ें आ रही हैं आजकल, दो तीन आवाज़ें मुझे बहुत पसंद आई'। मैंने कहा कि क्या वजह है कि लोगों को चान्स नहीं देते हो? कहते हैं 'समय किसके पास है साहब! वो तो लता दीदी आती हैं और रिहर्सल विहर्सल कुछ नहीं करतीं हैं और गाना वहीं सुन लेती हैं और रेकॊर्ड हो जाता है, सबकुछ ठीक हो जाता है।' तो रिहर्सल देने के लिए इन लोगों (नए ज़माने के संगीतकारों) के पास समय नहीं है। और हमारे साथ तो ऐसी बात हुई थी कि लता दीदी ने ही, उनके पास भी समय हुआ करता था रिहर्सल देने के लिए और एक गाना शायद आपको याद होगा फ़िल्म 'हमदर्द' का, "ॠतु आए ऋतु जाए", १५ दिन बैठके लता दीदी और मन्ना दादा ने उसको प्रैक्टिस किया था।" दोस्तों, जिस तरह से मुकेश की आवाज़ से सहगल साहब के असर को हटाने का श्रेय अनिल दा को जाता है, इसी श्रेय के वो एक बार फिर से हक़दार बनें जब उन्होंने लता की आवाज़ से नूरजहाँ के अंदाज़ को बाहर किया। लता जी के शुरुआती करीयर में कई महत्वपूर्ण सुझावों और पार्श्व गायन की बारिकियों को सिखाने में अनिल दा का बहुत बड़ा हाथ था। यह बात और है कि जब लता जी ने सन् १९६७ में अपनी पसंदीदा १० गानों की फ़ेहरिस्त जारी की, तो उसमें अनिल दा का कोई भी गीत शामिल नहीं हुआ। ख़ैर, अब इन सब बातों का क्या फ़ायदा। फ़ायदा तो है बस इन सुरीले गीतों को सुनने का जो बने हैं लता जी और अनिल दा के संगम से। सुनते हैं प्यार की दुनिया में पहले क़दम की दास्तान लता जी की कमसिन आवाज़ में।



क्या आप जानते हैं...
कि 'गर्ल्स स्कूल' के लिए ही अनिल बिस्वास ने पहली बार लता को रेकॊर्ड किया था - "तुम्हीं कहो मेरा मन क्यों रहे उदास" के लिए - भले ही यह फ़िल्म 'अनोखा प्यार', 'गजरे' आदि के बाद रिलीज़ हुई हो।

विशेष सूचना:

लता जी के जनमदिन के उपलक्ष्य पर इस शृंखला के अलावा २५ सितंबर शनिवार को 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में होगा लता मंगेशकर विशेष। इस लता विशेषांक में आप लता जी को दे सकते हैं जनमदिन की शुभकामनाएँ बस एक ईमेल के बहाने। लता जी के प्रति अपने उदगार, या उनके गाए आपके पसंदीदा १० गीत, या फिर उनके गाए किसी गीत से जुड़ी आपकी कोई ख़ास याद, या उनके लिए आपकी शुभकामनाएँ, इनमें से जो भी आप चाहें एक ईमेल में लिख कर हमें २० सितंबर से पहले oig@hindyugm.com के पते पर भेज दें। हमें आपके ईमेल का इंतज़ार रहेगा।


अजय देशपांडे जी ने लता जी के दुर्लभ गीतों को संगृहीत करने के उद्देश्य से एक वेब साईट का निर्माण किया है, जरूर देखिये यहाँ.

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. फ़िल्म के शीर्षक में दो शब्द है जिसमें दूसरा शब्द वह है जो शीर्षक है उस फ़िल्म का जिसके एक गीत में टाइ लगाने की बात की गई है। फ़िल्म का नाम बताएँ। ३ अंक।
२. फ़िल्म के संगीतकार हैं फ़िल्म जगत की पहली लोकप्रिय संगीतकार जोड़ी। बताइए इस संगीतकार जोड़ी का नाम। २ अंक।
३. अगर संगीतकार का नाम आप समझ गए हों तो गीतकार के नाम का अंदाज़ा लगाना भी कोई मुश्किल काम नहीं क्योंकि उस दौर में इस गीतकार-संगीतकार जोड़ी साथ साथ बहुत सारी फ़िल्मों में काम किया था। बताइए गीतकार का नाम। २ अंक।
४. गीत का एक अंतरा शुरु होता है इन शब्दों से - "तू फ़ाइल लेके चला"। मुखड़ा बताएँ। ३ अंक।

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी और पवन जी बहुत सही....इतना दुर्लभ गीत आपने पहचान लिया, बहुत बढ़िया, किश जी, आपकी पड़ोसन की अब कोई खैर खबर है या नहीं...? प्रतिभा जी आपको भी बधाई...अवध जी अगली बार सही

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

शनिवार, 8 मई 2010

क्रांतिकारी कवि प्रदीप ने फ़िल्मी गीतों को दी आकाश सी ऊंचाई, रचकर एक से एक कालजयी गीत

ओल्ड इस गोल्ड /रिवाइवल # १८

'ओल्ड इज़ गोल्ड रिवाइवल' में हमारे आज के गीत के गीतकार एक ऐसे शख़्स हैं जिनकी लेखनी और गायकी में झलकता है उनका अपने देश के प्रति प्रेम और देशवासियों में जागरूक्ता लाने की शक्ति। कवि प्रदीप, जिन्होने असंख्य देश भक्ति के गीत और कविताएँ लिखे, जिन्हे पढ़कर देश प्रेम से जैसे ख़ून गरम हो उठता है। पराधीन भरत में भी आज़ादी पर ऐसे ऐसे गीत और कविताएँ लिखे कि उन्हे कई बार अंडरग्राउंड होना पड़ा। आज हम आपको सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'जागृति' का वह मशहूर देश भक्ति गीत "आओ बच्चों तुम्हे दिखाएँ झांखी हिंदुस्तान की", जो उन्होने ही गाया था और यह गीत पिक्चराइज़ हुआ था अभि भट्टाचार्य और बच्चों पर। इस फ़िल्म के संगीतकार थे हेमंत कुमार। क्योंकि बात देश भक्ति की चल रही है और संगीतकार हैं हेमन्त कुमार, इसलिए आज हम रुख़ करते हैं हेमन्त दा द्वारा प्रस्तुत किए गए सन् १९७२ के उस 'जयमाला' कार्यक्रम की ओर, जो उन्होने 'बांगलादेश वार' के ठीक बाद प्रस्तुत किया था विविध भारती पर। हमारे वीर फ़ौजी भाइयों से मुख़ातिब उन्होने कहा था - "फ़ौजी भाइयों, विजय का सेहरा सदा आप के सर पर रहे। अन्याय का मुक़ाबला ना करना बहुत बड़ा पाप है। १४ रोज़ के इस जंग को जीत कर, दुश्मनों का मुक़ाबला कर आप ने जो विजय हासिल की है, उसकी तारीफ़ में कुछ कहने के लिए मेरे पास अल्फ़ाज़ नहीं है। दुनिया के इतिहास में जब भी इस लड़ाई का ज़िक्र आयेगा, आप लोगों का नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जायेगा। आप ने अपने जान की बाज़ी लगाकर हमारे पड़ोसी मुल्क बांगलादेश के लोगों को उनका 'शोनार बांगला' (सोने का बांगला) उन्हे लौटा कर हमारे देश का नाम बहुत ऊँचा कर दिया है। न्याय और शांति के लिए हमारा देश हमेशा लड़ता रहेगा। मेरी पहली फ़िल्म की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। बंकिम चन्द्र चट्टॊपाध्याय का 'आनंदमठ' और उन्ही के कलम से निकला यह गीत, जिसके सहारे हम लोगों ने ना जाने कितनी लड़ाइयाँ लड़ी, वंदे मातरम।"

ओल्ड इस गोल्ड एक ऐसी शृंखला जिसने अंतरजाल पर ४०० शानदार एपिसोड पूरे कर एक नया रिकॉर्ड बनाया. हिंदी फिल्मों के ये सदाबहार ओल्ड गोल्ड नगमें जब भी रेडियो/ टेलीविज़न या फिर ओल्ड इस गोल्ड जैसे मंचों से आपके कानों तक पहुँचते हैं तो इनका जादू आपके दिलो जेहन पर चढ कर बोलने लगता है. आपका भी मन कर उठता है न कुछ गुनगुनाने को ?, कुछ लोग बाथरूम तक सीमित रह जाते हैं तो कुछ माईक उठा कर गाने की हिम्मत जुटा लेते हैं, गुजरे दिनों के उन महान फनकारों की कलात्मक ऊर्जा को स्वरांजली दे रहे हैं, आज के युग के कुछ अमेच्युर तो कुछ सधे हुए कलाकार. तो सुनिए आज का कवर संस्करण

गीत - आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ...
कवर गायन - डाक्टर पारसमणी आचार्य, नंदिता, एन वी कृष्णन, प्रदीप सोमसुन्दरन, शारदा और आज़म खान




ये कवर संस्करण आपको कैसा लगा ? अपनी राय टिप्पणियों के माध्यम से हम तक और इस युवा कलाकार तक अवश्य पहुंचाएं


डाक्टर पारसमणी आचार्य
मैं पारसमणी राजकोट गुजरात से हूँ, पापा पुलिस में थे और बहुत से वाध्य बजा लेते थे, उनमें से सितार मेरा पसंदीदा था. माँ भी HMV और AIR के लिए क्षेत्रीय भाषा में पार्श्वगायन करती थी, रेडियो पर मेरा गायन काफी छोटी उम्र से शुरू हो गया था. मैं खुशकिस्मत हूँ कि उस्ताद सुलतान खान साहब, बेगम अख्तर, रफ़ी साहब और पंडित रवि शंकर जी जैसे दिग्गजों को मैंने करीब से देखा और उनका आशीर्वाद पाया. गायन मेरा शौक तब भी था और अब भी है, रफ़ी साहब, लता मंगेशकर, सहगल साहब, बड़े गुलाम अली खान साहब और आशा भोसले मेरी सबसे पसंदीदा हैं


विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड के ४०० शानदार एपिसोड आप सब के सहयोग और निरंतर मिलती प्रेरणा से संभव हुए. इस लंबे सफर में कुछ साथी व्यस्तता के चलते कभी साथ नहीं चल पाए तो कुछ हमसे जुड़े बहुत आगे चलकर. इन दिनों हम इन्हीं बीते ४०० एपिसोडों के कुछ चर्चित अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं इस रीवायिवल सीरीस में, ताकि आप सब जो किन्हीं कारणों वश इस आयोजन के कुछ अंश मिस कर गए वो इस मिनी केप्सूल में उनका आनंद उठा सकें. नयी कड़ियों के साथ हम जल्द ही वापस लौटेंगें

शनिवार, 13 फ़रवरी 2010

मेरा बुलबुल सो रहा है शोर तू न मचा...कवि प्रदीप और अनिल दा का रचा एक अनमोल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 344/2010/44

१९४३। इस वर्ष ने ३ प्रमुख फ़िल्में देखी - क़िस्मत, तानसेन, और शकुंतला। 'तानसेन' रणजीत मूवीटोन की फ़िल्म थी जिसमें संगीतकार खेमचंद प्रकाश ने सहगल और ख़ुर्शीद से कुछ ऐसे गानें गवाए कि फ़िल्म तो सुपर डुपर हिट साबित हुआ ही, खेमचंद जी और सहगल साहब के करीयर का एक बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म भी साबित हुआ। प्रभात से निकल कर और अपनी निजी बैनर 'राजकमल कलामंदिर' की स्थापना कर वी. शांताराम ने इस साल बनाई फ़िल्म 'शकुंतला', जिसके गीत संगीत ने भी काफ़ी धूम मचाया। संगीतकार वसंत देसाई की इसी फ़िल्म से सही अर्थ में करीयर शुरु हुआ था। और १९४३ में बॊम्बे टॊकीज़ की सफलतम फ़िल्म आई 'क़िस्मत'। 'क़िस्मत' को लिखा व निर्देशित किया था ज्ञान मुखर्जी ने। हिमांशु राय की मृत्यु के बाद बॊम्बे टॊकीज़ में राजनीति चल पड़ी थी। देवीका रानी और शशधर मुखर्जी के बीच चल रही उत्तराधिकार की लड़ाई के बीच ही यह फ़िल्म बनी। अशोक कुमार और मुम्ताज़ शांति अभिनीत इस फ़िल्म ने बॊक्स ऒफ़िस के सारे रिकार्ड्स तोड़ दिए। देश भर में कई कई जुबिलीज़ मनाने के अलावा यह फ़िल्म कलकत्ता के 'चित्र प्लाज़ा' थिएटर में लगातार १९६ हफ़्तों (३ साल) तक प्रदर्शित होती रही। इस रिकार्ड को तोड़ा था रमेश सिप्पी की फ़िल्म 'शोले' ने। 'क़िस्मत' एक ट्रेंडसेटर फ़िल्म रही क्योंकि इस फ़िल्म में बचपन में बिछड़ने और अंत में फिर मिल जाने की कहानी थी। संगीत की दृष्टि से 'क़िस्मत' अनिल बिस्वास की बॊम्बे टॊकीज़ में सब से उल्लेखनीय फ़िल्म रही। धीरे धीरे पार्श्वगायन की तकनीक को संगीतकार अपनाने लगे थे, और अच्छे गायक गायिकाएँ इस क्षेत्र में क़दम रख रहे थे। ऐसे में संगीतकार भी गीतों में नए प्रयोग ला रहे थे। इस फ़िल्म के तमाम गीत गली गली गूंजने लगे थे। ख़ास कर कवि प्रदीप के लिखे "दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है" ने तो जैसे पराधीन भारत के लोगों के रग रग में वतन परस्ती के जस्बे का संचार कर दिया था। इसी फ़िल्म में एक नर्मो नाज़ुक लोरी भी थी जिसे शायद आज भी फ़िल्म संगीत के सर्वश्रेष्ठ लोरियों में गिना जाता है! "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है, शोरगुल ना मचा"। कवि प्रदीप की गीत रचना, अनिल दा का संगीत। इसी गीत को हमने चुना है १९४३ का प्रतिनिधित्व करने के लिए।

फ़िल्म 'क़िस्मत' के गीतों की बात करें तो उन दिनों अमीरबाई कर्नाटकी अनिल दा की पहली पसंद हुआ करती थीं। फ़िल्म के कुल ८ गीतों में से ६ गीतों में ही अमीरबाई की आवाज़ शामिल थी। उपर ज़िक्र किए गए दो गीतों के अलावा इस फ़िल्म में अमीरबाई ने दो दुख भरे गीत गाए - "ऐ दिल यह बता हमने बिगाड़ा है क्या तेरा, घर घर में दिवाली है मेरे घर में अंधेरा", और "अब तेरे सिवा कौन मेरा कृष्ण कन्हैया"। जहाँ तक आज के प्रस्तुत गीत का सवाल है, इसके दो वर्ज़न है, एक में अमीरबाई के साथ आवाज़ है अशोक कुमार की, और दूसरे में अरुण कुमार की। दरसल अरुण कुमार अशोक कुमार के मौसेरे भाई थे जो अच्छा भी गाते थे और जिनकी आवाज़ अशोक कुमार से कुछ कुछ मिलती थी। इसलिए बॊम्बे टॊकीज़ के कुछ फ़िल्मों में अशोक कुमार का प्लेबैक उन्होने किया था। लेकिन इस गीत को दोनों से ही अलग अलग गवाया गया और दोनों वर्ज़न ही उपलब्ध हैं। आज हम आपको इस गीत के दोनों वर्ज़न सुनवाएँगे। कहा जाता है कि अनिल बिस्वास ने मज़ाक मज़ाक में कहा था कि यही एकमात्र ऐसा गीत है जिसे अशोक कुमार ने सुर में गाया था। यह भी कहा जाता है कि अनिल दा अशोक कुमार के गायन से कुछ ज़्यादा संतुष्ट नहीं होते थे, इसलिए वो अरुण कुमार से ही उनके गानें गवाने में विश्वास रखते थे। इस फ़िल्म में अरुण कुमार ने अमीरबाई के साथ एक और युगल गीत गाया था जो फ़िल्म का शीर्षक गीत भी था, "हम ऐसी क़िस्मत को क्या करें हाए, ये जो एक दिन हँसाए एक दिन रुलाए"। अरुण कुमार का गाया "तेरे दुख के दिन फिरेंगे ले दुआ मेरी लिए जा" भी एक दार्शनिक गीत है इस फ़िल्म का। अनिल दा की बहन और गायिका पारुल घोष का "पपीहा रे मेरे पिया से कहियो जाए" शास्त्रीय रंग में ढला हुआ इसी फ़िल्म का एक सुरीला नग़मा था। इससे पहले कि आज का गीत आप सुनें, उस दौर का दादामुनि अशोक कुमार ने सन्‍ १९६८ में विविध भारती पर किस तरह से वर्णन किया था, आइए जानें उन्ही के कहे हुए शब्दों में। "दरअसल जब मैं फ़िल्मों में आया था सन् १९३४-३५ के आसपास, उस समय गायक अभिनेता सहगल ज़िंदा थे। उन्होने फ़िल्मी गानों को एक शक्ल दी और मेरा ख़याल है उनकी वजह से फ़िल्मों में गानों को एक महत्वपूर्ण जगह मिली। आज उन्ही की बुनियाद पर यहाँ की फ़िल्में बनाई जाती हैं, यानी बॊक्स ऒफ़िस सक्सेस के लिए गानों को सब से ऊंची जगह दी जाती है। मेरे वक़्त में प्लेबैक के तकनीक की तैयारियां हो रही थी। तलत, रफ़ी, मुकेश फ़िल्मी दुनिया में आए नहीं थे, लता तो पैदा भी नहीं हुई होगी। अभिनेताओं को गाना पड़ता था चाहे उनके गले में सुर हो या नहीं। इसलिए ज़्यादातर गानें सीधे सीधे और सरल बंदिश में बनाए जाते थे ताक़ी हम जैसे गानेवाले आसानी से गा सके। मैं अपनी पुरानी फ़िल्मों से कुछ मुखड़े सुना सकता हूँ, (गाते हुए) "मैं बन की चिड़िया बन के बन बन बोलूँ रे", "चल चल रे नौजवान", "चली रे चली रे मेरी नाव चली रे", "धीरे धीरे आ रे बादल धीरे धीरे आ, मेरा बुलबुल सो रहा है...", "पीर पीर क्या करता रे तेरी पीर ना जाने कोई"। ये पहले पहले बॊम्बे टॊकीज़ के गीतों में "रे" का इस्तेमाल बहुत किया जाता था।" तो आइए दोस्तों, अब इस गीत को सुनें, पहले अशोक कुमार और अमीरबाई की आवाज़ों में, और फिर अरुण कुमार और अमीरबाई की आवाज़ों में।



दूसरा संस्करण


चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम रोज आपको देंगें ४ पंक्तियाँ और हर पंक्ति में कोई एक शब्द होगा जो होगा आपका सूत्र. यानी कुल चार शब्द आपको मिलेंगें जो अगले गीत के किसी एक अंतरे में इस्तेमाल हुए होंगें, जो शब्द बोल्ड दिख रहे हैं वो आपके सूत्र हैं बाकी शब्द बची हुई पंक्तियों में से चुनकर आपने पहेली सुलझानी है, और बूझना है वो अगला गीत. साथ ही जवाब देना है उन सवालों का जो नीचे दिए गए हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

देख रही तेरा रस्ता कब से
अब तो आजा बेदर्दी सैयां,
रो रो अखियाँ तरसे संगदिल,
मन से पडूं मैं तेरे पैयां..

1. बताईये इस गीत की पहली पंक्ति कौन सी है - सही जवाब को मिलेंगें ३ अंक.
2. ये फिल्म इस बेहद कामियाब संगीतकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण रही, हम किस संगीतकार की बात कर रहे हैं- सही जवाब के होंगें २ अंक.
3. इस गीत की गायिका का नाम बताएं जिसका हाल के सालों में एक रीमिक्स संस्करण भी आया-सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.
4. इस गीत के गीतकार उस दौर के सफल गीतकारों में थे उनका नाम बताएं- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
पहेली में नए प्रयोगों के चलते खूब मज़ा आ रहा है. रोहित जी अब तक ७ अंकों के साथ आगे चल रहे हैं, शरद जी हैं ५ अंकों पर, इंदु जी नाराज़ हो गयी क्या ? अरे व्यस्तता के चलते आपका स्वागत नहीं कर पाए, वैसे स्वागत तो मेहमानों का होता है न, आप तो ओल्ड इस गोल्ड की सरताज सदस्या ठहरीं. वैसे पहेली के सुझावों के लिए हम शरद जी का धन्येवाद देते हैं. ताज्जब इस बात का है कि सही गीत पता लग जाने के बाद भी कोई अन्य सवालों के जवाब लेकर हाज़िर नहीं हो रहा. शायद इस शृंखला के मुश्किल गीतों के कारण ऐसा हो...अवध जी हमें मेल किया और सभी सवालों के जवाब दे डाले. नियमानुसार एक से अधिक सही जवाब देने पर कोई अंक नहीं दिए जाने हैं, पर अवध जी का जवाब अन्य लोगों तक नहीं पहुंचा और उनका कंप्यूटर खराब होने के करण हो सकता है उन्हें नियमों की सही जानकारी न हो, तो इस पहली गलती को नज़र अंदाज़ कर हम उन्हें २ अंक देते हैं, ताकि उनका भी खाता खुले...सभी विजेताओं को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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