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Monday, November 25, 2013

भरत व्यास और वंसत देसाई की अनूठी जुगलबंदी

1959 में बनी सफल फिल्म थी गूँज उठी शहनाई, जिसके निर्देशक थे विजय भट्ट. भरत व्यास के गीतों को शानदार संगीत से संवारा वसंत देसाई ने. इस फिल्म का हर गीत आज भी श्रोताओं के जेहन में एकदम ताज़ा है. आईये खरा सोना गीत के अंतर्गत आज रचेता टंडन के साथ सुनते हैं इसी फिल्म का ये यादगार युगल गीत.

स्क्रिप्ट - सुजॉय चट्टर्जी

स्वर - रचेता टंडन 

प्रस्तुति - संज्ञा टंडन 

Monday, May 18, 2009

अखियाँ भूल गयी हैं सोना....सोने सा चमकता है ये गीत आज ५० सालों के बाद भी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 84

ज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में एक बहुत ही ख़ुशनुमा, चुलबुला सा, गुदगुदाने वाला गीत लेकर हम हाज़िर हुए हैं। दोस्तों, हमारी फ़िल्मों में कुछ 'सिचुएशन' ऐसे होते हैं जो बड़े ही जाने पहचाने से होते हैं और जो सालों से चले आ रहे हैं। लेकिन पुराने होते हुए भी ये 'सिचुएशन' आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जितने कि उस ज़माने में हुआ करते थे। ऐसी ही एक 'सिचुएशन' हमारी फ़िल्मों में हुआ करती है कि जिसमें सखियाँ नायिका को उसके नायक और उसकी प्रेम कहानी को लेकर छेड़ती हैं और नायिका पहले तो इन्कार करती हैं लेकिन आख़िर में मान जाती हैं लाज भरी अखियाँ लिए। 'सिचुएशन' तो हमने आपको बता दी, हम बारी है 'लोकेशन' की। तो ऐसे 'सिचुएशन' के लिए गाँव के पनघट से बेहतर और कौन सा 'लोकेशन' हो सकता है भला! फ़िल्म 'गूँज उठी शहनाई' में भी एक ऐसा ही गीत था। यह फ़िल्म आज से पूरे ५० साल पहले, यानी कि १९५९ में आयी थी, लेकिन आज के दौर में भी यह गीत उतना ही आनंददायक है कि जितना उस समय था। गीता दत्त, लता मंगेशकर और सखियों की आवाज़ों में यह गीत बना है आज के 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की शान। गीतकार भरत व्यास और संगीतकार वसंत देसाई की यह रचना है।

फ़िल्म 'गूँज उठी शहनाई' का एक गीत हमने आपको पहले भी सुनवाया है और इस फ़िल्म से संबन्धित कुछ जानकारियाँ भी दी हैं हमने। इस फ़िल्म के ज़्यादातर गीत लताजी और रफ़ी साहब ने गाये। लेकिन प्रस्तुत गीत में मुख्य आवाज़ गीता दत्त की है जो नायिका की सहेली का पार्श्वगायन करती हैं। मुखड़ा और दो अंतरे में गीताजी और साथियों की आवाज़ें सुनने को मिलती हैं, लेकिन दूसरा अंतरा लताजी का है जिसमें नायिका अपने मन की बात बताती हैं अपनी सखियों को। अपने दिलकश गीत संगीत की वजह से यह फ़िल्म अपने ज़माने की बेहद मशहूर फ़िल्म रही है, और फ़िल्म के हर एक गीत ने इतिहास क़ायम किया है। इस गीत का संगीत संयोजन भी बड़ा निराला है। इसमें शामिल किए गए संगीत के 'पीसेस' इतने अलग हैं, इतने ज़्यादा 'प्रामिनेन्ट' हैं कि ये धुनें इस गीत की पहचान बन गये हैं। विविध भारती पर रविवार दोपहर को प्रसारित होनेवाली 'जयमाला गोल्ड' कार्यक्रम का शीर्षक संगीत भी इसी गीत से लिया गया था। सच में, ये धुनें इसी के क़ाबिल हैं। आज भी इस गीत की धुनें हमें गुदगुदाती है, दिल में एक अजीब मुस्कान जगाती है, कुछ पल के लिए ही सही लेकिन इस तनाव भरी ज़िन्दगी में थोड़ा सा सुकून ज़रूर दे जाता है यह गीत। तो लीजिए आप भी इस सुकून और मुस्कुराहट का अनुभव कीजिए इस थिरकते हुए गीत को सुनकर, "अखियाँ भूल गयीं हैं देखो सोना..."।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. रोशन साहब की अंतिम फिल्म का यादगार गीत.
२. मुकेश की आवाज़ में इन्दीवर की रचना.
३. मुखड़े में शब्द है -"जल".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम-
पराग जी ने बाज़ी मारी है आज. मनु जी और रचना जी आपको भी बधाई...एक दम सही जवाब....गीत का आनंद लें.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Wednesday, March 25, 2009

तेरे सुर और मेरे गीत...दोनों मिलकर बनेगी प्रीत...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 33

सुर संगीतकार का क्षेत्र है तो गीत गीतकार का. एक अच्छा सुरीला गीत बनने के लिए सुर और गीत, यानी कि संगीतकार और गीतकार का आपस में तालमेल होना बेहद ज़रूरी है, वरना गीत तो किसी तरह से बन जायेगा लेकिन शायद उसमें आत्मा का संचार ना हो सकेगा. शायद इसी वजह से फिल्म संगीत जगत में कई संगीतकार और गीतकारों ने अपनी अपनी जोडियाँ बनाई जिनका आपस में ताल-मेल 'फिट' बैठ्ता था, जैसे कि नौशाद और शक़ील, शंकर जयकिशन और हसरत शैलेन्द्र, गुलज़ार और आर डी बर्मन, वगैरह. ऐसी ही एक जोड़ी थी गीतकार भारत व्यास और संगीतकार वसंत देसाई की. इस जोडी ने भी कई मधुर से मधुर संगीत रचनाएँ हमें दी हैं जिनमें शामिल है फिल्म "गूँज उठी शहनाई". इस फिल्म का एक सुरीला नग्मा आज गूँज रहा है 'ओल्ड इस गोल्ड' में.

फिल्म निर्माता और निर्देशक विजय भट्ट ने एक बार किसी संगीत सम्मेलन में उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान का शहनाई वादन सुन लिया था. वो उनसे और उनकी कला से इतने प्रभावित हुए कि वो न केवल अपनी अगली फिल्म का नाम रखा 'गूँज उठी शहनाई', बल्कि फिल्म की कहानी भी एक शहनाई वादक के जीवन पर आधारित थी. और क्या आप जानते हैं दोस्तों कि कहानी और फिल्म में जान डालने के लिए विजय भट्ट ने उस्ताद बिस्मिल्लाह ख़ान से ही निवेदन किया कि फिल्म में वही शहनाई बजाएँ. ख़ान साहब ने न केवल पूरी फिल्म में शहनाई बजाई बल्कि इस फिल्म का एक गीत खुद स्वरबद्ध भी किया, और वो गीत है "दिल का खिलौना हाय टूट गया". लेकिन यह गीत हम आप को फिर कभी सुनवाएँगे, आज सुनिए लता मंगेशकर का ही गाया एक दूसरा गीत इस फिल्म का. गूँज उठी शहनाई 1959 की फिल्म थी जिसमें मुख्य कलाकार थे राजेन्द्र कुमार, अमीता और अनिता गुहा. तो पेश है राग बिहाग पर आधारित फिल्म संगीत के सुनहरे दौर का एक सुनहरा नग्मा - "तेरे सुर और मेरे गीत".



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. जब घडी की दोनों सुईयां मिलती है इस वक़्त को जो अंग्रेजी में कहा जाता है वही है फिल्म का नाम.
२. ओपी नय्यर का संगीतबद्ध गीत है मादक आवाज़ है गीत दत्त की.
३. मुखडा शुरू होता है "अरे" शब्द से.

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी लौटे हैं शतक के साथ बहुत बहुत बधाई. पारुल, मनु और दिलीप जी के लिए वैसे ये कोई मुश्किल नहीं था, जैसा कि मनु जी ने बताया कि ये गाना उनका "अलार्म" भी है, आप सब को इस प्यारे से गीत की बधाई. महेंद्र मिश्र जी आपका स्वागत, और आचार्य जी आपकी देरी भी सर आँखों पर.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




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