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Thursday, November 6, 2008

मेरी आवाज़ ही पहचान है.... पार्श्व गायक भूपेंद्र

इनसे मिलिए (1)- भूपेन्द्र

आज से हम आवाज़ पर एक नई शृंखला शुरू कर रहे हैं. विविध भारती से प्रसारित हुए कुछ अनमोल साक्षात्कारों को हम यहाँ टेक्स्ट और ऑडियो फॉर्मेट में पुनर्प्रस्तुत कर रहे हैं. इस काम में हमारी सहायता कर रहे हैं सुजोय चट्टर्जी. पहली कड़ी के रूप में आज हम AIR विविध भारती की रेणू बंसल द्वारा लिया गया पार्श्व गायक भूपेंद्र का ये साक्षात्कार यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं. साथ में हैं भूपेंद्र के गाये कुछ बेहद यादगार गीत जो कार्यक्रम के दौरान सुनवाये गए.

कलाकार: भूपेंद्र (पार्श्व गायक)
साक्षात्कारकर्ता : रेणु बंसल (विविध भारती AIR)

रेणु बंसल : दोस्तों, पार्श्व गायन की दुनिया में यूँ तो बहुत सी आवाज़ें सुनाई देते हैं, लेकिन एक आवाज़ सबसे अलग सुनाई पड़ती है,यूँ लगता है जैसे बहुत अलसाई सी हो और मीठी खुमारी से भारी हो.जैसे जैसे वो आवाज़ तान लेती है, यूँ लगता है कोई दोशीजा अंगडाई ले रही हो. यह वो आवाज़ है जो कभी हमारा हाथ पकड़ के बचपन की गलियों में,कभी गाँवों की मेडों पर दूर किसी राह पर ले जाती है जहाँ यादों के साथ साथ ज़िंदगी के कितने ही रंगों के खूबसूरत अहसासों से होकर हम गुज़रते हैं.कभी इन्होने खुद ही कहा था...

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मेरी आवाज़ ही पहचान है गर याद रहे (किनारा)
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रेणु बंसल : याद आया आपको? आज हम रु-ब-रु हो रहे हैं इनसे मिलिए 'प्रोग्राम' के तहत पार्श्व गायक भूपेंद्र से. भूपेंद्र-जी, आप का विविध भारती के 'स्टूडियो' में स्वागत है, नमस्कार!

भूपेंद : नमस्कार, बहुत बहुत शुक्रिया

रेणु बंसल : आप दिल्ली के रहनेवाले हैं, और दिल्ली से आप के कदम जब मुंबई की तरफ बढ़े तो वो फिल्मी दुनिया के लिए ही बढ़े थे क्या?

भूपेंद : मैं बॉम्बे तो फिल्मी दुनिया के लिए ही आया था, ज़ाती तौर पर मुझे बॉम्बे आने का कुछ शौक नहीं था. लेकिन मुझे कुछ अच्छे लोगों ने यहाँ आने के लिए कहा था और मुझे उन्होने 'प्रॉमिस' किया था कि 'हम अगर आप के लिए कोई गाना बनाएँगे तो आप आकर गाएँगे क्या?' तो मैने कहा कि 'मैं ज़रूर गाऊँगा'. तो ऐसे ही मदन साहब ने मुझे पूछा था दिल्ली में,मरहूम मदन मोहन साहब ने और चेतन आनंद साहब ने. उनकी फिल्म हक़ीक़त बन रही थी तो शायद उनको कोई नयी आवाज़ चाहिए थी.तो उनके कहने पर मैं 'फिल्म इंडस्ट्री' में गाने के लिए ही आया था.

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होके मजबूर मुझे उसने बुलाया होगा (हक़ीक़त)
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रेणु बंसल : लेकिन हक़ीक़त यह भी है कि फिल्म हक़ीक़त में आप ने एक 'रोल' भी किया था और एक 'रोल' आप ने आखरी खत में भी किया था.

भूपेंद : (हँसते हुए) यह बहुत एक अजीब सी बात है की जिस चीज़ के बारे में नहीं सोचा था वो थी 'एक्टिंग'. कि मैं कभी फिल्मों में 'एक्टिंग' करूँ, यह बात मेरे दिमाग़ में कभी आती नहीं थी. तो मैं तो गाने के लिए आया था, पता नहीं चेतन साहब को मुझमें क्या नज़र आया, मेरा गाना जो मैने गाया था मेरे उपर ही 'पिक्चाराईस' करके और बहुत लोगों से तालियाँ बज़वाई थी कि,और यह भी, बड़ी बात मैं बोलना नहीं चाहता हूँ कि, यह भी 'अनाउन्स' किया था कि 'i am going to make another singing sahgal in the film industry'. तो तब मैं ज़रा कुछ और दिमाग़ का होता था,
मैने सोचा की ऐसी बात आदमी बोलते रहते हैं, 'एक्टिंग' मुझे पसंद नहीं थी,actually 'एक्टिंग' मुझे शुरू से ही कुछ लगाव नहीं था. आप ने अगर हक़ीक़त 'पिक्चर' देखी होगी तो आपने देखा होगा की मैं 'पिक्चर' में से 'सडेनली' गायब हो जाता हूँ,क्यूंकि उसके बाद मैं बॉम्बे से दिल्ली भाग आया, मैं उसके बाद बॉम्बे आया ही नहीं. मुझे ज़बरदस्ती 'एक्टिंग' करनी पड़ती अगर मैं आता तो. 'एक्टिंग' मुझे नहीं करनी थी. ऐसे मुझसे आखरी खत में भी गाना गवाकर मुझपर 'पिक्चारईस' कर ली.

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हुज़ूर इस कदर भी न (फ़िल्म मासूम)
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रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, आपने जिन गानो का ज़िक्र किया, वो बेशक इतने सुरीले इतने मीठे हैं कि आज भी तन्हाई में 'होंट' करते हैं. पर्दे के पीछे जब आप चले गये, पार्श्व गायन जब आप ने अपना लिया, तो पार्श्व गायन में ग़ज़लों का दामन आप ने किस तरह थामा?

भूपेंद्र : अच्छा सवाल है क्यूंकि मुझे पहली बार किसी ने पूछा है, जब मैने फिल्मों में 'प्लेबॅक' शुरू किया था तो उस समय मेरे 'फवरेट प्लेबॅक सिंगर्स' थे, मोहमद रफ़ी साहब थे, तलत महमूद साहब थे, किशोर दादा थे, मन्ना डे साहब हैं,इनको
दिमाग़ में छोड्के मुझे और कुछ, दूसरा गाना जमता ही नहीं था. तो मेरे दिमाग़ में एक बात थी की यह लोग बहुत ही ज़बरदस्त 'सिंगर्स' हैं, दिमाग़ में क्या यह तो सही बात थी और बहुत ज़बरदस्त लोग थे और हैं भी, तो इनसे अच्छा मैं नहीं गा पाऊंगा यह मैं सोचता रहता था, कि 'This is one thing i will never able to do'. तो गाना भी मेरा चलता रहा, मैं थोड़ा 'गिटार' भी बजाता था उस वक़्त, 'स्पॅनिश गिटार', तो उसमें भी मैने 'फिल्म इंडस्ट्री' में काफ़ी नाम कमाया, तो मैं क्या हुआ कि मैं 'साइड बाइ साइड' में 'गिटार' भी बजाता था, कोई गाने के लिए बुलाता था तो वहाँ भी चला जाता था, तो ऐसा करते करते 'ऑलमोस्ट 15' साल गुज़र गये, तब मेरी मिताली से मुलाक़ात हुई, 'she was already singing on the stage', ग़ज़ल गाती थी, 1983-84 में 'we got married', शादी हो गयी. मैं 'स्टेज' के सख्त खिलाफ था, मुझे 'स्टेज' में गाने से बड़ी तकलीफ़ होती थी. यह उन दिनों की बात है जब मैं ग़ज़लें 'कंपोज़' करता था और अपने लिए या अपने दोस्तों के लिए ही करता था, खुद ही हम घर में बैठ्के गाते थे. लेकिन 83-84 में 'i was convinced', जैसे किशोर दादा मुझसे कहा करते थे की ''स्टेज' पे गाया कर', मेरी ठोडी पकड्कर कहा करते थे जैसे छोटे बच्चे को कहते हैं, ''स्टेज' पे गाया कर, गाएगा नहीं तो 'पॉपुलर' कैसे होगा!' तो उस वक़्त मैं समझता नहीं था उनकी बात. बाद में 'when i started singing ghazal on the stage', क्यूंकि फिल्मी गानो का मेरा 'स्टेज' पे इतना लंबा चौड़ा 'प्रोग्राम' नहीं हो सकता था, इसलिए मैं जो ग़ज़लें गाता था या 'कंपोज़' करता था, या जो भी 'रेकॉर्ड' हुए थे, 'i statred singing those ghazals on the stage and believe me I felt for it'. मुझे इतना अच्छा लगा कि 'इन्स्टेंट' जो एक 'रेकग्निशन' मिलती है 'ऑडियेन्स' से, और इतने दिनों से जो लोग कहते थे कि 'भूपेंद्र को 'स्टेज' पे ले आइए', मिताली से कहते थे, मेरे दोस्तों से कहते थे, तो 83-84-85 में मेरा जो झुकाव था वो फिल्मों से, गीतों से निकलकर ग़ज़लों में और 'स्टेज' की तरफ चला गया, और काफ़ी 'रेकॉर्ड्स' बनाए मैने, जो काफ़ी बिकते हैं, लोग याद करते हैं अभी भी.

रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, गायन की दुनिया में आपकी एक अलग पहचान है,इसके पीछे कौन सी प्रेरणा है?

भूपेंद्र : प्रेरणा तो शायद कुदरत ही है, मैं तो यह मानता हूँ कि भले मैने कम गाने गाए हैं 'फिल्म इंडस्ट्री' में, लेकिन जितने भी गाए हैं वो लोगों को बहुत पसंद हैं और बहुत 'पॉपुलर' हैं, और आज भी जब मैं और मिताली ग़ज़लों के 'प्रोग्राम' में जाते हैं, तो 'believe me' कि आज भी उन गानो की दो दो बार फरमाशें आती हैं. 'रीज़न' शायद यह हो सकता है की मेरी आवाज़ में शायद मेरा अपनापन है, मैने आवाज़ में किसी की 'कॉपी' नहीं की, मेरा अपना 'स्टाइल' है, मुझे कुदरत ने जो आवाज़ बख्शी है, जो 'रिवॉर्ड' मुझे दिया है, मैं उसी को आगे इस्तेमाल कर रहा हूँ, मैं इसमें कोई बनावट नहीं किया. मैं किसी और की आवाज़ को नहीं अपनाया, मेरी अपनी ही 'स्टाइल' है, मेरा अपना ही आवाज़ है, शायद इसलिए मैं थोड़ा सा अलग लगता हूँ.

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एक अकेला इस शहर में (घरौंदा)
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रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, कुछ साल पहले बाज़ार में जैसे ग़ज़लों का एक 'बूम' सा आ गया था, अचानक बहुत सारे लोग बहुत सारी चीज़ें गा रहे थे और ग़ज़लें ही ग़ज़लें चारों तरफ से सुनाई देती थी. ग़ज़ल आजकल खामोश क्यूँ है?

भूपेंद्र : हमारे मुल्क में बहुत से 'चेंजस' आ रहे हैं, और वो 'चेंजस' हमारी जो 'कल्चर', जो सभ्यता है, उससे थोड़े से हटके हैं. तो 'रेकॉर्डिंग कंपनीज़' शायद यह सोचते हैं कि गजल्स के 'रेकॉर्ड्स' शायद नहीं बिके, और इसलिए वो ज़्यादा 'प्रमोट' करते हैं यह 'पोप म्यूज़िक अल्बम्स', और यही 'रीज़न' है कि फिल्मी ग़ज़लें या ऐसी फिल्में जिनमें कुछ 'ऑथेंटिक' ग़ज़लें हो सकते हैं वो आपको ज़्यादा नज़र नहीं आ रही है. यही कारण 'फिल्ममेकर्स' की तरफ से भी है, उनकी भी यह ज़िम्मेदारी होनी चाहिए थी की हमारी 'कल्चर' को ज़िंदा रखें. मैं यह सोचता हूँ की 'फिल्म डाइरेक्टर्स', 'एक्टर्स', 'म्यूज़िक डाइरेक्टर्स', 'आर्टिस्ट्स' लोग, इनके उपर भी एक ज़िम्मेदारी होती है, एक 'मोरल ऑब्लिगेशन' इनके उपर होती है, एक 'मोरल' ज़िम्मेदारी होती है, क्यूंकि अगर भगवान ने इनको 'आर्ट' दिया है तो इसको अच्छे 'साइड' में इस्तेमाल करें,उसको 'मिसयूज़' ना करे, 'आर्ट' के नाम पे कुछ ग़लत बात ना करे, जो कि लोगों को बहकाये, जो कि लोगों को ग़लत रास्ते पे डाले, जो कि आज लोग थोड़ा सा नाम और पैसा कमाने के लिए थोडी सी 'कॉंट्रोवर्सी क्रियेट' कर ली, और नाम कमा लिया, पैसे कमा लिए, किताब लिख डाली, तो यह बड़े सस्ते ढंग हैं अपने आप को 'पॉपुलर' करने के, तो अपने ही 'कल्चर' से हम बहुत दूर जा रहे हैं, जिसका मुझे सख्त अफ़सोस है और मैं उम्मीद करता हूँ कि बहुत जल्द लोगों को कुछ समझ आए कि अपनी 'कल्चर' को ज़िंदा रखने की कोशिश की जाए, यह उनके हाथ में यह ज़िम्मा है, बहुत बड़े बड़े 'फिल्म प्रोड्यूसर्स', बहुत बड़े बड़े 'म्यूज़िक डाइरेक्टर्स', 'फिल्म डाइरेक्टर्स', यह उनके हाथ में है के वो हिन्दुस्तान के 'कल्चर' को इससे ज़्यादा ना गिराएँ, और बच्चों को कुछ अच्छी बातें सीखाएँ, क्यूंकि यही बच्चे बड़े होकर क्या करेंगे? जो आज देख रहे हैं यह तो नहीं करेंगे, इससे सौ गुना ज़्यादा ही होगा ना! तो यह 'रीज़न' है कि फिल्मों में ग़ज़लें आजकल कम सुनाई डे रहे हैं, लेकिन सुननेवाले हैं, हम लोग 'प्रोग्राम्स' में जाते हैं तो सुननेवाले वो ही हैं

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कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता (आहिस्ता आहिस्ता)
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रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, हर चीज़ का एक दौर आता है, समय गतिशील है,आता है और निकल जाता है. हम उम्मीद करते हैं की संगीत का जो सुनहरा दौर जो देखा है लोगों ने, उम्मीद करते हैं कि वो फिर आये और आनेवाली पीढ़ी उस दौर को दोहराए.

भूपेंद्र : मैं आप के साथ प्रार्थना करूँगा कि जो आप सोच रही हैं काश ऐसा हो, काश कुछ लोगों को इतनी समझ आए कि इस बात पर गौर करे कि हमारी आनेवाली पीढियों को हिन्दुस्तानी ही रहने दे,क्यूंकि जो हम देंगे वोही 'कमिंग जेनरेशन' उसको 'ग्रास्प' करेगी. उनको कुछ अच्छी चीज़ देंगे तो वो कुछ अच्छी चीज़ सीखेंगे,और कुछ खराब चीज़ देंगे तो वो खराब ही सीखेंगे.

रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, आइए यहाँ से एक बार फिर मुड जाते हैं कविताओं और शायरी की तरफ. कविता लिखने का या शायरी पढने का एक तरीका होता है, एक नियम होता है, यानी कविता लिखने या शायरी लिखने में 'मीटर' का ध्यान रखा जाता है. और आप ने कई गीत ऐसे गाए हैं जिनमें 'मीटर' का ध्यान नहीं रहा,यानी ऐसे 'एक्सपेरिमेंट' कह सकते हैं जैसे फिल्म मौसम का एक गीत है, ऐसे 'एक्सपेरिमेंट' को आप क्या कहेंगे?

भूपेंद्र : उसको 'ब्लैक वर्स' कहते हैं, 'ब्लैक वर्स' यानी जिसका 'मीटर' नहीं होता है, जैसे आप मुझसे बात कर रही हैं, जैसे हम आपस में बात करते हैं, 'इट्स कॉल्ड ब्लॅक वर्स', 'आक्च्युयली ब्लैक वर्स' गयी नहीं जाती, उसको गाना मुश्किल होता है, उसको 'मीटर' पे ले जाना मुश्किल होता है, लेकिन फिर भी मैं आप से कहना चाहता हूँ कि मैने इसमें 'एक्सपेरिमेंट' किया था, मैने एक 'रेकॉर्ड' बनाया था, वो जो शायर था उसका नाम था, और उसमें जीतने भी 6
के 6 ग़ज़लें थी वो 'ब्लॅक वर्स' थी. तो मैं इस 'एक्सपेरिमेंट' को बहुत 'चॅलेंज' से लेता हूँ. यह काम ज़रा, 'you got to do something different, you know'. मौसम का जो गाना है, 'बिगिनिंग' का जो शेर है की "दिल ढूंढता है फिर वही फ़ुर्सत के रात दिन", उसके बाद गुलज़ार साहब ने कितनी ही शायरी 'ब्लॅक वर्स टाइप' की लिखी
है, 'and i enjoy singing it always'.

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दिल ढूंढता है फ़िर वही फुर्सत के रात दिन (फ़िल्म-मौसम)
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रेणु बंसल : भूपेंद्र-जी, हर वो गीत या हर वो ग़ज़ल जो आप की आवाज़ से सज़ा है, आप के बच्चे के समान है, यह पूछना तो गुस्ताखी होगी कि आप को अपना कौन सा बच्चा सबसे ज़्यादा अच्छा लगता है.

भूपेंद्र : यह बात तो सही है कि जो भी 'कॉंपोज़िशन' करता हूँ, वो अपने बच्चे की तरह ही होती है, लेकिन फिर लोग जो हैं आगे वो बच्चों को अलग अलग कर देते हैं, किसी को कुछ पसंद आता है,किसी को कुछ पसंद आता है, तो मैं जितनी भी 'कॉंपोज़िशन' करता हूँ, जो मैं और मिताली बनाते हैं, उनमें कुछ ना कुछ सबके लिए रखते हैं, जो कि महफ़िल में, अभी संजीदा ग़ज़लें तो लोग नहीं सुनते, हालाँकि संजीदा ग़ज़लें गाना और संजीदा 'कॉंपोज़िशन' गाना मेरा 'सब्जेक्ट' है 'you know i love to sing it', लेकिन फिर कुछ 'रोमॅंटिक' ग़ज़लें, कुछ छेड-छाड़ के गीत, या कुछ शराब के गीत यह सब कुछ गाने पड़ते हैं, सो आप मुझे पूछे तो मैं जितनी भी 'कॉमपोज़िशन्स' करता हूँ, 'i love them i like them'.

रेणु बंसल : ज़िंदगी में ऐसी कोई ख्वाहिश जो अभी तक पूरी ना हुई हो?

भूपेंद्र : बस और अच्छा गा सकूँ, और लोगों की खिदमत कर सकूँ, और अच्छा गाता रहूँ!

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बीती न बितायी रैना (फ़िल्म-परिचय)
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प्रस्तुति - सुजोय चट्टर्जी

दो गीत जो हमें उपलब्ध नही हो पायें "रुत जवां जवां" फ़िल्म आखिरी ख़त का और "जिंदगी है कि बदलता मौसम" फ़िल्म एक नया रिश्ता का जिनके स्थान पर हमने आपको क्रमशा "हुज़ूर इस कदर" और "बीती न बिताई रैना" सुनवाये. मूल गीत यदि किसी श्रोता के पास उपलब्ध हों तो हमें भेजें. हमें इंतज़ार रहेगा.


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