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Wednesday, May 11, 2011

भला हुआ मेरी मटकी फूटी.. ज़िन्दगी से छूटने की ख़ुशी मना रहे हैं कबीर... साथ हैं गुलज़ार और आबिदा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११३

सूफ़ियों-संतों के यहां मौत का तसव्वुर बडे खूबसूरत रूप लेता है| कभी नैहर छूट जाता है, कभी चोला बदल लेता है| जो मरता है ऊंचा ही उठता है, तरह तरह से अंत-आनन्द की बात करते हैं| कबीर के यहां, ये खयाल कुछ और करवटें भी लेता है, एक बे-तकल्लुफ़ी है मौत से, जो जिन्दगी से कहीं भी नहीं|

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे ।
एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रोदुंगी तोहे ॥


माटी का शरीर, माटी का बर्तन, नेकी कर भला कर, भर बरतन मे पाप पुण्य और सर पे ले|

आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे"..:

भला हुआ मेरी मटकी फूटी रे ।
मैं तो पनिया भरन से छूटी रे ॥

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा ना मिलिया कोय ।
जो दिल खोजा आपणा, तो मुझसा बुरा ना कोय ॥

ये तो घर है प्रेम का, खाला का घर नांहि ।
सीस उतारे भुँई धरे, तब बैठे घर मांहि ॥

हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को हुशारी क्या ।
रहे आज़ाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ॥

कहना था सो कह दिया, अब कछु कहा ना जाये ।
एक गया सो जा रहा, दरिया लहर समाये ॥

लाली मेरे लाल की, जित देखूं तित लाल ।
लाली देखन मैं गयी, मैं भी हो गयी लाल ॥

हँस हँस कुन्त ना पाया, जिन पाया तिन रोये ।
हाँसि खेले पिया मिले, कौन _____ होये ॥

जाको राखे साईंयाँ, मार सके ना कोये ।
बाल न बांकाँ कर सके, जो जग बैरी होये ॥

प्रेम न भाजी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय ।
राजा-प्रजा जोही रूचें, शीश देई ले जाय ॥

कबीरा भाठी कलाल की, बहूतक बैठे आई ।
सिर सौंपें सोई पीवै, नहीं तो पिया ना जाये ॥

सुखिया सब संसार है, खाये और सोये ।
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोये ॥

जो कछु सो तुम किया, मैं कछु किया नांहि ।
कहां कहीं जो मैं किया, तुम ही थे मुझ मांहि ॥

अन-राते सुख सोवणा, राते नींद ना आये ।
ज्यूं जल छूटे माछरी, तडफत नैन बहाये ॥

जिनको साँई रंग दिया, कभी ना होये कुरंग ।
दिन दिन वाणी आफ़री, चढे सवाया रंग ॥

ऊंचे पानी ना टिके, नीचे ही ठहराय ।
नीचे होये सो भरि पिये, ऊँचा प्यासा जाय ॥

आठ पहर चौंसठ घडी, मेरे और ना कोये ।
नैना मांहि तू बसे, नींद को ठौर ना होये ॥

सब रगे तान्त रबाब, तन्त दिल बजावे नित ।
आवे न कोइ सुन सके, के साँई के चित ॥

कबीरा बैद्य बुलाया, पकड के देखी बांहि ।
बैद्य न वेधन जानी, फिर भी करे जे मांहि ॥

यार बुलावे भाव सूं, मोपे गया ना जाय ।
दुल्हन मैली पियु उजला, लाग सकूं ना पाय ॥




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो दोहे हमने पेश किए हैं, उसके एक दोहे की एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उन दोहों को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "चाह" और मिसरे कुछ यूँ थे-

चाह गयी चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह ।
जिनको कछु न चहिये, वो ही शाहनशाह ॥

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

चाहे गीता बांचिये या पढ़िए कुरआन
मेरी तेरी प्रीत है हर पुस्तक का ज्ञान - निदा फाजली .. वैसे इसमें चाल शब्द नहीं है, बल्कि चाहे है... इसलिए इस शेर को सही नहीं माना जा सकता..

चाह मेरे भारत की ,विश्व कप जाए जीत,
हर एक करे प्रार्थना , क्रिकेट से है प्रीत - मंजु जी आपकी चाह पूरी हो गयी, खुश हैं न ? :)

चाह होती है तो राह होती नहीं
हर ख्वाहिश कभी पूरी होती नहीं
जिंदगी जीने का ढूँढती है सबब
हर कली खिलके फूल होती नहीं. - शन्नो जी

कभी हम में तुम में भी चाह थी , कभी हम से तुम से भी राह थी
कभी हम भी तुम भी थे आशना तुम्हे याद हो के न याद हो - मोमिन खां मोमिन

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, March 30, 2011

साहिब मेरा एक है.. अपने गुरू, अपने साई, अपने साहिब को याद कर रही है कबीर, आबिदा परवीन और गुलज़ार की तिकड़ी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११२

शे इकहरे ही अच्छे होते हैं। सब कहते हैं दोहरे नशे अच्छे नहीं। एक नशे पर दूसरा नशा न चढाओ, पर क्या है कि एक कबीर उस पर आबिदा परवीन। सुर सरूर हो जाते हैं और सरूर देह की मिट्टी पार करके रूह मे समा जाता है।

सोइ मेरा एक तो, और न दूजा कोये ।
जो साहिब दूजा कहे, दूजा कुल का होये ॥


कबीर तो दो कहने पे नाराज़ हो गये, वो दूजा कुल का होये !

गुलज़ार साहब के लिए यह नशा दोहरा होगा, लेकिन हम जानते हैं कि यह नशा उससे भी बढकर है, यह तिहरा से किसी भी मायने में कम नहीं। आबिदा कबीर को गा रही हैं तो उनकी आवाज़ के सहारे कबीर की जीती-जागती मूरत हमारे सामने उभर आती है, इस कमाल के लिए आबिदा की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। लेकिन आबिदा गाना शुरू करें उससे पहले सबा के झोंके की तरह गुलज़ार की महकती आवाज़ माहौल को ताज़ातरीन कर जाती है, इधर-उधर की सारी बातें फौरन हीं उड़न-छू हो जाती है और सुनने वाला कान को आले से उतारकर दिल के कागज़ पर पिन कर लेता है और सुनता रहता है दिल से.. फिर किसे खबर कि वह कहाँ है, फिर किसे परवाह कि जग कहाँ है! ऐसा नशा है इस तिकड़ी में कि रूह पूरी की पूरी डूब जाए, मदमाती रहे और जिस्म जम जाए वहीं का वहीं!!

कबीरा खड़ा बजार में, सब की चाहे खैर।
ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर।।


कबीर... कबीर ऐसा नाम है, जिसे सुनते हीं दिल सूफ़ियाना हो जाता है। जैसे सूफ़ियों के हर कलाम में उस ऊपर वाले का ज़िक्र होता है, उसी तरह कबीर अपने गुरू, अपने साईं, अपने साहिब का ज़िक्र किसी न किसी बहाने अपने दोहों में ले हीं आते हैं। गुरू के प्रति कबीर का यह प्रेम अनुपम है। कबीर अपने गुरू की बहुत कदर करते थे। एक शिष्य के लिए गुरू का क्या महत्व होता है, यह बताने के लिए कबीर ने इतना तक कह दिया कि:

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥


गुरू का माहात्म्य जानना हो तो कोई कबीर से पूछे:

सब धरती कागद करूं, लेखन सब बनराय ।
सात समुंद्र कि मस करूं, गुरु गुन लिखा न जाय ॥


कबीर का अपने गुरू के प्रति प्रेम और लगाव का बखान आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपनी पुस्तक "हिन्दी साहित्य का इतिहास" में कुछ यूँ किया है:

कहते हैं, काशी में स्वामी रामानंद का एक भक्त ब्राह्मण था, जिसकी किसी विधवा कन्या को स्वामी जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद भूल से दे दिया। फल यह हुआ कि उसे एक बालक उत्पना हुआ जिसे वह लहरतारा के ताल के पास फेंक आयी। अली या नीरू नाम का जुलाहा उस बालक को अपने घर उठा लाया और पालने लगा। यही बालक आगे चलकर कबीरदास हुआ। कबीर का जन्मकाल जेठ सुदी पूर्णिमा, सोमवार विक्रम संवत १४५६ माना जाता है। कहते हैं कि आरंभ से हीं कबीर में हिंदू भाव से भक्ति करने की प्रवृत्ति लक्षित होती थी जिसे उसे पालने वाल माता-पिता न दबा सके। वे "राम-राम" जपा करते थे और कभी-कभी माथे पर तिलक भी लगा लेते थे। इससे सिद्ध होता है कि उस समय स्वामी रामानंद का प्रभाव खूब बढ रहा था। अत: कबीर पर भी भक्ति का यह संस्कार बाल्यावस्था से ही यदि पड़ने लगा हो तो कोई आश्चर्य नहीं।

रामानंद जी के माहात्म्य को सुनकर कबीर के हृदय में शिष्य होने की लालसा जगी होगी। ऐसा प्रसिद्ध है कि एक दिन वे एक पहर रात रहते हुए उप्त (पंचगंगा) घाट की सीढियों पर जा पड़े जहाँ से रामानंद जी स्नान करने के लिए उतरा करते थे। स्नान को जाते समय अंधेरे में रामानंद जी का पैर कबीर के ऊपर पड़ गया। रामानंद जी बोल उठे, ’राम-राम कह’। कबीर ने इसी को गुरूमंत्र मान लिया और वे अपने को गुरू रामानंद जी का शिष्य कहने लगे।

आरंभ से हीं कबीर हिंदू भाव की उपासना की ओर आकर्षित हो रहे थे। अत: उन दिनों जब कि रामानंद जी की बड़ी धूम थी, अवश्य वे उनके सत्संग में भी सम्मिलित होते रहे होंगे। रामानुज की शिष्य परंपरा में होते हुए भी रामानंद जी भक्ति का एक अलग उदार मार्ग निकाल रहे थे जिसमे जाति-पाँति का भेद और खानपान का आचार दूर कर दिया गया था। अत: इसमें कोई संदेह नहीं कि कबीर को ’राम-राम’ नाम रामानंद जी से हीं प्राप्त हुआ। पर आगे चलकर कबीर के ’राम’ रामानंद के ’राम’ से भिन्न हो गए। अत: कबीर को वैष्णव संप्रदाय के अंतर्गत नहीं ले सकते। कबीर ने दूर-दूर तक देशाटन किया, हठयोगियों तथा सूफ़ी मुसलमान फकीरों का भी सत्संग किया। अत: उनकी प्रवृत्ति निर्गुण उपासना की ओर दृढ हुई। फल यह हुआ कि कबीर के राम धनुर्धर साकार राम नहीं रह गये, वे ब्रह्म के पर्याय हुए -

दशरथ सुत तिहुँ लोक बखाना।
राम नाम का मरम है आना॥


सारांश यह है कि जो ब्रह्म हिंदुओं की विचारपद्धति में ज्ञान मार्ग का एक निरूपण था उसी को कबीर ने सूफ़ियों के ढर्रे पर उपासना का हीं विषय नहीं, प्रेम का भी विषय बनाया और उसकी प्राप्ति के लिए हठयोगियों की साधना का समर्थन किया। इस प्रकार उन्होंने भारतीय ब्रह्मवाद के साथ सूफ़ियों के भावात्मक रहस्यवाद, हठयोगियों के साधनात्मत रहस्यवाद और वैष्णवों के अहिंसावाद तथा प्रपत्तिवाद का मेल करके अपना पंथ खड़ा किया। उनकी बानी में ये सब अवयव लक्षित होते हैं।

गुरू गोविंद दोऊ खड़े काकै लागूं पाय,
बलिहारी गुरू आपने गोविंद दियो बताय।


गुरू को गोविंद के आगे खड़े करने वाले संत कबीर ने गुरू के बारे में और क्या-क्या कहा है, यह जानने के लिए चलिए आबिदा परवीन की मनमोहक आवाज़ की ओर रूख करते हैं। और हाँ, आईये हम भी साथ-साथ गुनगुनाएँ "साहिब मेरा एक है"..:

साहिब मेरा एक है, दूजा कहा न जाय ।
दूजा साहिब जो कहूं, साहिब खडा रसाय ॥

माली आवत देख के, कलियां करें पुकार ।
फूल फूल चुन लिये, काल हमारी बार ॥

____ गयी चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह ।
जिनको कछु न चहिये, वो ही शाहनशाह ॥

एक प्रीत सूं जो मिले, ताको मिलिये धाय ।
अन्तर राखे जो मिले, तासे मिले बलाय ॥

सब धरती कागद करूं, लेखन सब बनराय ।
सात समुंद्र कि मस करूं, गुरु गुन लिखा न जाय ॥

अब गुरु दिल मे देखया, गावण को कछु नाहि ।
कबीरा जब हम गांवते, तब जाना गुरु नाहि ॥

मैं लागा उस एक से, एक भया सब माहि ।
सब मेरा मैं सबन का, तेहां दूसरा नाहि ॥

जा मरने से जग डरे, मेरे मन आनन्द ।
तब मरहू कब पाहूं, पूरण परमानन्द ॥

सब बन तो चन्दन नहीं, सूर्य है का दल(?) नाहि ।
सब समुंद्र मोती नहीं, यूं सौ भूं जग माहि ॥

जब हम जग में पग धरयो, सब हसें हम रोये ।
कबीरा अब ऐसी कर चलो, पाछे हंसीं न होये ॥

अवगुण किये तो बहु किये, करत न मानी हार ।
भांवें बन्दा बख्शे, भांवें गर्दन मार ॥

साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाहि ।
धन का भूखा जो फिरे, सो तो साधू नाहि ॥

कबीरा ते नर अन्ध हैं, गुरु को कहते और ।
हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर ॥

करता था तो क्यों रहा, अब काहे पछताय ।
बोवे पेड बबूल का, आम कहां से खाय ॥

साहिब सूं सब होत है, बन्दे ते कछु नाहि ।
राइ से परबत करे, परबत राइ मांहि ॥

ज्यूं तिल मांही तेल है, ज्यूं चकमक में आग ।
तेरा सांई तुझमें बसे, जाग सके तो जाग ॥




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो दोहे हमने पेश किए हैं, उसके एक दोहे की एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उन दोहों को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "पिया" और मिसरे कुछ यूँ थे-

सती बिचारी सत किया, काँटों सेज बिछाय ।
ले सूती पिया आपना, चहुं दिस अगन लगाय ॥

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

पिया रे, पिया रे , पिया रे, पिया रे,
तेरे बिन लागे नहीँ मोरा जिया रे ।

मंजु जी, आपने शब्द पहचानने में गलती कर दी, इसलिए हम आपके शेर (दोहे) को यहाँ पेश नहीं कर सकते। अगली बार से ध्यान दीजिएगा।

पिछली महफ़िल की शुरूआत सजीव जी की प्रेरणादायक टिप्पणी से हुई। बंधुवर धन्यवाद आपका! आपके बाद महफ़िल को रंगीन करने आए शरद जी। शरद जी ने न सिर्फ़ सही शब्द की पहचान की बल्कि उस पर एक शेर भी कहा। यह क्या, आपसे हमें स्वरचित शेर की उम्मीद रहती है, आपने तो नुसरत साहब के एक गाने की दो पंक्तियों से हीं काम चला लिया। आगे से ऐसा नहीं चलेगा। समझे ना? :) आपने एक गलती की तरफ़ हमारा ध्यान दिलाया, इसके लिए आपका तह-ए-दिल से आभार। हमने आज की महफ़िल में उस गलती को ठीक कर लिया है। अवध जी, शायद "दोहावली" हीं कहा जाना चाहिए। मैं और भी एक-दो जगह से पता करता हूँ, उसके बाद आगे से इसी शब्द का प्रयोग करूँगा। बहुत-बहुत धन्यवाद। मंजु जी, हाँ पिछली बार मैंने "अहसास" पर सारे शेर जमा तो कर दिये थे, लेकिन जल्दीबाजी में "आँगन" को हटाना भूल गया। दर-असल "आँगन" पिछली से पिछली महफ़िल का गुमशुदा शब्द था। आपको यकीन दिलाता हूँ कि आगे से ऐसा नहीं होगा। कुलदीप जी, महफ़िल को और महफ़िल में पेश की गई रचना को पसंद करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया। बस लगे हाथों आप "पिया" पर कोई शेर भी कह देते तो खुशी चौगुनी हो जाती। खैर, इस बार से कोशिश कीजिएगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, March 9, 2011

मन लागो यार फ़क़ीरी में: कबीर की साखियों की सखी बनकर आई हैं आबिदा परवीन, अगुवाई है गुलज़ार की

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१११

सूफ़ियों का कलाम गाते-गाते आबिदा परवीन खुद सूफ़ी हो गईं। इनकी आवाज़ अब इबादत की आवाज़ लगती है। मौला को पुकारती हैं तो लगता है कि हाँ इनकी आवाज़ ज़रूर उस तक पहुँचती होगी। वो सुनता होगा.. सिदक़ सदाक़त की आवाज़।

माला कहे है काठ की तू क्यों फेरे मोहे,
मन का मणका फेर दे, तुरत मिला दूँ तोहे।


आबिदा कबीर की मार्फ़त पुकारती हैं उसे, हम आबिदा की मार्फ़त उसे बुला लेते हैं।

मन लागो यार फ़क़ीरी में...

एक तो करैला उस पर से नीम चढा... इसी तर्ज़ पर अगर कहा जाए "एक तो शहद ऊपर से गुड़ चढा" तो यह विशेषण, यह मुहावरा आज के गीत पर सटीक बैठेगा। सच कहूँ तो सटीक नहीं बैठेगा बल्कि थोड़ा पीछे रह जाएगा, क्योंकि यहाँ गुड़ चढे शहद के ऊपर शक्कर के कुछ टुकड़े भी हैं। कबीर की साखियाँ अपने आप में हीं इस दुनिया से दूर किसी और शय्यारे से आई हुई सी लगती है, फिर अगर उन साखियों पर आबिदा की आवाज़ के गहने चढ जाएँ तो हर साखी में कही गई दुनिया को सही से समझने और सही से समझकर जीने का सीख देने वाली बातों का असर कई गुणा बढ जाएगा। वही हुआ है यहाँ... लेकिन यह जादू यही तक नहीं थमा। इससे पहले की आबिदा अपनी आवाज़ का सम्मोहन डालना शुरू करतीं, उस सम्मोहन को और पुख्ता बनाने के लिए गुलज़ार साहब अपनी पुरकशिश शख्सियत के साथ आबिदा की अगुवाई करने आ पहुँचते हैं। "रांझा-रांझा करदी नी" कहते हुए जब गुलज़ार की आवाज़ हमारे कानों तक पहुँचती है तो पहले हीं मालूम हो जाता है कि अगले १०-१५ मिनट तक हमें कुछ और नहीं सूझने वाला। यकीन मानिए, मेरी तो यही हालत थी और मैं पक्के दावे के साथ कह सकता हूँ कि "गुलज़ार प्रजेन्ट्स कबीर बाई आबिदा" के गानों/साखियों/दोहों को सुनते वक़्त आप एक ट्रान्स में चले जाएँगे.. डूब जाएँगे भक्ति के इस दरिया में।

कबीर दास... एक ऐसा इंसान जो जितना जाना-पहचाना है, उतना हीं अनजाना भी है। उसे आप जितना समझते हैं, उससे ज्यादा वह अनबुझा है। उसे बूझने की कईयों ने कोशिश की, कई पहुँचे भी उसके आस-पास, लेकिन कभी वह रेगिस्तान की मरीचिका की तरह दूर निकल गया तो कभी खुर्शीद की तरह इतना चमका कि झुलसने के डर से लोग पीछे की ओर खिसक गए। वह क्या था? हिन्दू.. मुसलमान.. ब्राह्मण.. शूद्र... सूफ़ी.. साधु... कोई सही से नहीं कह सकता। असल में वह सब कुछ था और कुछ भी नहीं। वह किसी भी पंथ के खिलाफ़ था और इस बात के भी खिलाफ़ था कि उसकी कही बातें कहीं कोई पंथ न बन जाए। वह फ़क्कड़ था.. मस्तमौला.. इसलिए बनी बनाई हर चीज़ को बिगड़ने का एक साधन मानता था। वह अस्वीकार करना जानता था.. बस अस्वीकार..

"हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास" पुस्तक में "बच्चन सिंह" कहते हैं:

कबीर दास को कोई भी मत स्वीकार्य नहीं है जो मनुष्य-मनुष्य के बीच भेद उत्पन्न करता है। उन्हें कोई भी अनुष्ठान या साधना मंजूर नहीं है जो बुद्धि-विरूद्ध है। उन्हें कोई भी शास्त्र मान्य नहीं है जो आत्मज्ञान को कुंठित करता है। वेद-कितेब भ्रमोत्पादक हैं अत: अस्वीकार्य हैं। तीर्थ, व्रत, पूजा, नमाज, रोजा गुमराह करते हैं इसलिए अग्राह्य हैं। पंडित-पांडे, काजी-मुल्ला उन धर्मों के ठेकेदार हैं जो धर्म नहं हैं। अत: घृणास्पद हैं।

वे वैष्णवों को अपना संगी मानते हैं, किंतु विष्णु को चौदह भुवनों का चौधरी कहकर मजाक उड़ाते हैं। शाक्तों से उन्हें घृणा है - "साकत काली कामरी"। हिन्दू-तुर्क दोनों झूठे हैं। वे अकरदी, सकरदी सूफी पर हँसते हुए उसे अपना वचन मानने का उपदेश देते हैं। गोरखनाथ उनके श्रद्धेय हैं पर गोरखपंथी उपहास्य। "चुंडित-मुंडित" श्रावकों और श्रमणों के लिए उनके यहाँ जगह नहीं है। तात्पर्य यह कि वे अपने समय के समस्त मतों को खारिज कर देते हैं। उनसे बड़ा मूर्ति-भंजक (आइकनोक्लास्ट) इतिहास में दूसरा नहीं है।

यह कहना कि वे समाज-सुधारक थे, गलत है। यह कहना कि वे धर्म-सुधारक थे, और भी गलत है। यदि सुधारक थे तो रैडिकल-सुधारक। वे धर्म के माध्यम से समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना चाहते थे। वे कोई भी पंथ खड़ा करने के पक्षपाती नहीं थे। वे ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते थे जिसमें न कोई हिन्दू हो न मुसलमान, न पूजा हो न नमाज, न पंडित हो न मुल्ला, सिर्फ़ इंसान हो।

वे निर्गुण धारा के प्रवर्तक थे। पर उनका निर्गुणपंथ सूफ़ियों के निर्गुणवाद से किंचित भिन्न था। कबीर का ब्रह्म न वेद-वर्णित ईश्वर है, न कुरान-वर्णित ख़ुदा। वह इन दोनों से न्यारा है। वह निर्गुण की लीकबद्धता से अलग है। निर्गुण सम्बन्धी सारी शास्त्रोक्त शब्दावली ग्रहण करते हुए भी वह शास्त्रेतर हो जाता है। यदि उनका निर्गुण शास्त्रोक्त निर्गुण हीं होता तो उससे निम्न वर्ग का कैसे काम चलता?

सामंती समाज की जड़ता को तोड़ने का जितना काम अकेले कबीर ने किया उतना अन्य संतों और सगुणमार्गियों ने मिलकर भी नहीं किया। उनकी चोटों की मार से, जातिवाद के संरक्षक पंडित और मौलवी समान रूप से दु:खी हैं। वे सबसे अधिक आधुनिक और सबसे अधिक प्रासंगिक हैं।

कबीरदास आज भी कितने प्रासंगिक हैं, इसे समझना हो तो गुलज़ार की "मेरे यार जुलाहे" से बड़ा कोई उदाहरण नहीं होगा। टूटते रिश्ते की कसक और उसे जोड़ने में अपनी मजबूरी को दर्शाने के लिए गुलज़ार सीधे-सीधे कबीर को याद करते हैं और कहते हैं कि "मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे".. भला कौन होगा जो कबीर से यह तरकीब न जानना चाहेगा.. आखिर अलादीन का कौन-सा वह चिराग था जो कबीरदास के हाथ लग गया था, जिससे वह सीधे-सीधे ऊपरवाले से जुड़ जाते थे.. जिससे वह सीधे-सीधे धरती के इंसानों से जुड़ जाते थे, जुड़ जाते हैं।

हम आगे की कड़ियों में कबीरदास से इसी तरकीब को जानने की कोशिश जारी रखेंगे। तबतक संगीत की शरण में चलते हैं और डूब जाते हैं बेग़म आबिदा परवीन की स्वरलहरियों में। चलिए.. चलिए.. बढिए भी.. देखिए तो गुलज़ार साहब किस शिद्दत से हम सबको बुला रहे हैं। झूमकर कहिए "मन लागो यार फ़क़ीरी में"

मन लागो यार फ़क़ीरी में!

कबीरा रेख सिन्दूर, उर काजर दिया न जाय ।
नैनन प्रीतम रम रहा, दूजा कहां समाय ॥

प्रीत जो लागी भुल गयि, पीठ गयि मन मांहि ।
रोम रोम पियु पियु कहे, मुख की सिरधा नांहि ॥

मन लागो यार फ़क़ीरी में,
बुरा भला सबको सुन लीजो, कर गुजरान गरीबी में ।

सती बिचारी सत किया, काँटों सेज बिछाय ।
ले सूती _____ आपना, चहुं दिस अगन लगाय ॥

गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय ।
बलिहारी गुरू आपणे, गोविन्द दियो बताय ॥

मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा ।
तेरा तुझ को सौंप दे, क्या लागे है मेरा ॥

जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नांहि ।
जब अन्धियारा मिट गया, दीपक देर कमांहि ॥

रूखा सूखा खाय के, ठन्डा पानी पियो ।
देख परायी चोपड़ी मत ललचावे जियो ॥

साधू कहावत कठिन है, लम्बा पेड़ खुजूर ।
चढे तो चाखे प्रेम रस, गिरे तो चकना-चूर ॥

मन लागो यार फ़क़ीरी में,
आखिर ये तन खाक़ मिलेगा, क्यूं फ़िरता मगरूरी में ॥

लिखा लिखी की है नहीं, देखा देखी बात ।
दुल्हा-दुल्हन मिल गये, फ़ीकी पड़ी बारात ॥

जब लग नाता जगत का, तब लग भक्ति न होय ।
नाता तोड़े हरि भजे, भगत कहावे सोय ॥

हद हद जाये हर कोइ, अन-हद जाये न कोय ।
हद अन-हद के बीच में, रहा कबीरा सोय ॥

माला कहे है काठ की तू क्यूं फेरे मोहे ।
मन का मणका फेर दे, सो तुरत मिला दूं तोहे ॥

जागन में सोतिन करे, साधन में लौ लाय ।
सूरत डार लागी रहे, तार टूट नहीं जाये ॥

पाहन पूजे हरि/अल्लाह मिले, तो मैं पूजूं पहाड़ ।
ताते या चक्की भली, पीस खाये संसार ॥

कबीरा सो धन संचिये, जो आगे को होइ ।
सीस चढाये गांठड़ी, जात न देखा कोइ ॥

हरि से ते हरि-जन बड़े, समझ देख मन मांहि ।
कहे कबीर जब हरि दिखे, सो हरि हरि-जन मांहि ॥

मन लागो यार फ़क़ीरी में,
कहे कबीर सुनो भई साधू, साहिब मिले सुबूरी में ।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल/नज़्म हमने पेश की है, उसके एक शेर/उसकी एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल/नज़्म को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आँगन" और मिसरे कुछ यूँ थे-

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, अहसास कम होगा

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

या मेरे जहन से यादो के दिये गुल कर दो,
मेरे एहसास की दुनिया को मिटा दो हमदम.
रात तारे नही अँगारे लिये आती है,
इन बरसते हुए शोलो को बुझा दो हमदम...

जिस कलम से जिंदगी को लिखा,
उस अहसास की रोशनाई भी तेरी - मंजु जी

मर मर के जी रहा हूँ और क्या करूँ
ज़ख्मों को सी रहा हूँ और क्या करू
तेरा एहसास जो पड़ा है खाली जाम की तरह
अश्क भर भर के पी रहा हूँ और क्या करूँ - अवनींद्र जी

तेरे होने का एहसास शेष रहा,
"मैं" का न तनिक अवशेष रहा. - पूजा जी

पिछली महफ़िल की शुरूआत सुजॉय जी की टिप्पणी से हुई। सातों बार बोले बंसी सुनकर मज़ा तो आना हीं था क्योंकि हमें यह गाना और इसके पीछे की कहानी आपकी वज़ह से हीं मयस्सर हो पाई थी। आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। सुमित जी, आपने सही शब्द की पहचान की और उसपर शेर कहे, इसलिए आपको "शान-ए-महफ़िल" घोषित किया जाता है। शायर का नाम तो मुझे भी नहीं मालूम। पता करने की कोशिश कर रहा हूँ। सजीव जी, ज़रूर कभी हम भी ऐसा कुछ करेंगे। अभी तो अपनी बस शुरुआत है। कुहू जी, मुझसे ज्यादा शुक्रिया के हक़दार सुजॉय जी और सजीव जी हैं, लेकिन मैं अपनी मेहनत को भी कम नहीं आंकता। इसलिए आपका धन्यवाद स्वीकार करता हूँ। ऐसे हीं आते रहिएगा महफ़िल में। मंजु जी एवं पूजा जी, आप दोनों के स्वरचित शेर काफ़ी उम्दा हैं। बधाई स्वीकारें! इंदु जी, मैं आपके भावनाओं और पसंद की कद्र करता हूँ। मुझे संगीत की कोई खासी समझ नहीं, मैं तो बस गीत के बोलों से प्रभावित होकर गीत की तरफ़ आकर्षित होता हूँ। इसलिए अगर किसी गाने से गुलज़ार साब का नाम जुड़ा है तो वह गाना ऐसे हीं मेरे लिए मास्टरपीस बन जाता है। अवनींद जी, महफ़िलें कद्रदानों से सजती हैं और जब तक हमारी महफ़िल के पास आप जैसा कद्रदान है, मुझे नहीं लगता हमें चिंता करने की ज़रूरत है। बाकी हाँ, टिप्पणियाँ कम तो हुई हैं और इसका कारण यह हो सकता है कि महफ़िल भी इन दिनों नियमित नहीं हो पाई। मैं आगे से कोशिश करूँगा कि गायब कम हीं होऊँ :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, August 11, 2010

जाने न जाने गुल हीं न जाने, बाग तो सारा जाने है.. "मीर" के एकतरफ़ा प्यार की कसक औ’ हरिहरण की आवाज़

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९६

ढ़ते फिरेंगे गलियों में इन रेख़्तों को लोग,
मुद्दत रहेंगी याद ये बातें हमारियां।

जाने का नहीं शोर सुख़न का मिरे हरगिज़,
ता-हश्र जहाँ में मिरा दीवान रहेगा।

ये दो शेर मिर्ज़ा ग़ालिब के गुरू (ग़ालिब ने इनसे ग़ज़लों की शिक्षा नहीं ली, बल्कि इन्हें अपने मन से गुरू माना) मीर के हैं। मीर के बारे में हर दौर में हर शायर ने कुछ न कुछ कहा है और अपने शेर के मार्फ़त यह ज़रूर दर्शा दिया है कि चाहे कितना भी लिख लो, लेकिन मीर जैसा अंदाज़ हासिल नहीं हो सकता। ग़ालिब और नासिख के शेर तो हमने पहले हीं आपको पढा दिए थे (ग़ालिब को समर्पित महफ़िलों में), आज चलिए ग़ालिब के समकालीन इब्राहिम ज़ौक़ का यह शेर आपको सुनवाते हैं, जो उन्होंने मीर को नज़र करके लिखा था:

न हुआ पर न हुआ ‘मीर’ का अंदाज़ नसीब।
‘जौक़’ यारों ने बहुत ज़ोर ग़ज़ल में मारा।।

हसरत मोहानी साहब कहाँ पीछे रहने वाले थे। उन्होंने भी वही दुहराया जो पहले मीर ने कहा और बाद में बाकी शायरों ने:

शेर मेरे भी हैं पुर-दर्द वलेकिन ‘हसरत’।
‘मीर’ का शैवाए-गुफ़्तार कहां से लाऊं।।

ग़ज़ल कहने की जो बुनियादी जरूरत है, वह है "हर तरह की भावनाओं विशेषकर दु:ख की संवेदना"। जब तलक आप कथ्य को खुद महसूस नहीं करते, तब तलक लिखा गया हरेक लफ़्ज़ बेमानी है। मीर इसी कला के मर्मज्ञ थे, सबसे बड़े मर्मज्ञ। इस बात को उन्होंने खुद भी अपने शेर में कहा है:

मुझको शायर न कहो ‘मीर’ कि साहब मैंने।
दर्दों-ग़म जमा किये कितने तो दीवान किया।।

मीर का दीवान जितना उनके ग़म का संग्रह था, उतना हीं जमाने के ग़म का -

दरहमी हाल की है सारे मिरा दीवां में,
सैर कर तू भी यह मजमूआ परीशानी का।

अपनी पुस्तक "हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास" में "बच्चन सिंह" जी मीर के बारे में लिखते हैं:

मीर का पूरा नाम मीर तक़ी मीर था। मीर ने फ़ारसी में अपनी आत्मकथा लिखी है, जिसका अनुवाद "ज़िक्रे मीर" के नाम से हो चुका है। ज़िक्रे मीर के हिसाब से उनका जन्म १७२५ में अकबराबाद (आगरा) में हुआ था। लेकिन और घटनाओं के समय उन्होंने अपनी जो उम्र बताई है उससे हिसाब लगाने पर उनकी जन्म-तिथि ११३७ हि.या १७२४ ई. निकलती है। (प्रकाश पंडित की पुस्तक "मीर और उनकी शायरी" में भी इस बात का उल्लेख है) मीर के पिता प्रसिद्ध सूफ़ी फ़कीर थे। उनका प्रभाव मीर की रचनाओं पर देखा जा सकता है। दिल्ली को उजड़ती देखकर वे लखनऊ चले आए। नवाब आसफ़ुद्दौला ने उनका स्वागत किया और तीन सौ रूपये की मासिक वृत्ति बाँध दी। नवाब से उनकी पटरी नहीं बैठी। उन्होंने दरबार में जाना छोड़ दिया। फिर भी नवाब ने उनकी वृत्ति नहीं बंद की। १८१० में मीर का देहांत हो गया।

मीर पर वली की शायरी का प्रभाव है - जबान, ग़ज़ल की ज़मीन और भावों में दोनों में थोड़ा-बहुत सादृश्य है। पर दोनों में एक बुनियादी अंतर है। वली के इश्क़ में प्रेमिका की अराधना है तो मीर के इश्क़ पर सूफ़ियों के इश्क़-हक़ीक़ी का भी रंग है और वह रोजमर्रा की समस्याओं में नीर-क्षीर की तरह घुलमिल गया है। मीर की शायरी में जीवन के जितने विविध आयाम मिलेंगे उतने उस काल के किसी अन्य कवि में नहीं दिखाई पड़ते।

दिल्ली मीर का अपना शहर था। लखनऊ में रहते हुए भी वे दिल्ली को कभी नहीं भूले। दिल्ली छोड़ने का दर्द उन्हें सालता रहा। लखनऊ से उन्हें बेहद नफ़रत थी। भले हीं वे लखनऊ के पैसे पर पल रहे थे, फिर भी लखनऊ उन्हें चुगदों (उल्लुओं) से भरा हुआ और आदमियत से खाली लग रहा था। लखनऊ के कवियों की इश्क़िया शायरी में वह दर्द न था, जो छटपटाहट पैदा कर सके। लखनऊ के लोकप्रिय शायर "जुर्रत" को मीर चुम्मा-चाटी का शायर कहा करते थे।

मीर विचारधारा में कबीर के निकट हैं तो भाषा की मिठास में सूर के। जिस तरह कबीर कहते थे कि "लाली मेरे लाल की जित देखूँ तित लाल", उसी तरह मीर का कहना है - "उसे देखूँ जिधर करूँ निगाह, वही एक सूरत हज़ारों जगह।" दैरो-हरम की चिंता उन्हें नहीं है। मीर उससे ऊपर उठकर प्रेमधर्म और हृदयधर्म का समर्थन करते हैं-

दैरो-हरम से गुजरे, अब दिल है घर हमारा,
है ख़त्म इस आवले पर सैरो-सफ़र हमारा।


हिन्दी के सूफ़ी कवि भी इतने असांप्रदायिक नहीं थे, जितने मीर थे। इस अर्थ में मीर जायसी और कुतबन के आगे थे। वे लोग इस्लाम के घेरे को नहीं तोड़ सके थे, जबकि मीर ने उसे तोड़ दिया था। पंडों-पुरोहितों, मुल्ला-इमामों में उनकी आस्था नहीं थी, पर मुसलमां होने में थी। शेखों-इमामों की तो उन्होंने वह गत बनाई है कि उन्हें देखकर फ़रिश्तों के भी होश उड़ जाएँ -

फिर ’मीर’ आज मस्जिद-ए-जामें में थे इमाम,
दाग़-ए-शराब धोते थे कल जानमाज़ का।
(जानमाज़ - जिस कपड़े पर नमाज़ पढी जाती है)

सौन्दर्य-वर्णन मीर के यहाँ भी मिलेगा, किन्तु इस सावधानी के साथ कि "कुछ इश्क़-ओ-हवस में फ़र्क़ भी कर-

क्या तन-ए-नाज़ुक है, जां को भी हसद जिस तन प’ है,
क्या बदन का रंग है, तह जिसकी पैराहन प’ है।

मीर की भाषा में फ़ारसी के शब्द कम नहीं हैं, पर उनकी शायरी का लहजा, शैली, लय, सुर भारतीय है। उनकी कविता का पूरा माहौल कहीं से भी ईरानी नहीं है।

मीर ग़ज़लों के बादशाह थे। उनकी दो हज़ार से अधिक ग़ज़लें छह दीवानों में संगृहीत हैं। "कुल्लियात-ए-मीर" में अनेक मस्नवियाँ, क़सीदे, वासोख़्त, मर्सिये आदि शामिल हैं। उनकी शायरी के कुछ नमूने निम्नलिखित हैं:-

इब्तिदा-ए-इश्क है रोता है क्या
आगे आगे देखिये होता है क्या

इश्क़ इक "मीर" भारी पत्थर है
कब दिल-ए-नातवां से उठता है

हम ख़ुदा के कभी क़ायल तो न थे
उनको देखा तो ख़ुदा याद आ गया

सख़्त काफ़िर था जिसने पहले "मीर"
मज़हब-ए-इश्क़ इख़्तियार किया


आधुनिक उर्दू कविता के प्रमुख नाम और उर्दू साहित्य के इतिहास 'आब-ए-हयात' के लेखक मोहम्मद हुसैन आज़ाद ने ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी 'मीर' के बारे में दर्ज़ किया है- "क़द्रदानों ने उनके कलाम को जौहर और मोतियों की निगाहों से देखा और नाम को फूलों की महक बना कर उड़ाया. हिन्दुस्तान में यह बात उन्हीं को नसीब हुई है कि मुसाफ़िर,ग़ज़लों को तोहफ़े के तौर पर शहर से शहर में ले जाते थे"। जिनकी शायरी मुसाफ़िर शहर-दर-शहर दिल में लेकर घूमते हैं, हमारी खुश-किस्मती है कि हमारी महफ़िल को आज उनकी खिदमत करने का मौका हासिल हुआ है। कई महीनों से हमारे दिल में यह बात खटक रही थी कि भाई ग़ालिब पर दस महफ़िलें हो गईं और मीर पर एक भी नहीं। तो चलिए आज वह खटक भी दूर हो गई, इसी को कहते हैं "देर आयद दुरूस्त आयद"। इतनी बातों के बाद लगे हाथ अब आज की ग़ज़ल भी सुन लेते हैं। आज की ग़ज़ल मेरे हिसाब से मीर की सबसे मक़बूल गज़ल है और मेरे दिल के सबसे करीब भी। "जाने न जाने गुल हीं न जाने, बाग तो सारा जाने है।" एकतरफ़ा प्यार की कसक इससे बढिया तरीके से व्यक्त नहीं की जा सकती। मीर के लफ़्ज़ों में छुपी कसक को ग़ज़ल गायिकी को एक अलग हीं अंदाज़ देने वाले "हरिहरण" ने बखूबी पेश किया है। यूँ तो इस ग़ज़ल को कई गुलूकारों ने अपनी आवाज़ दी है, लेकिन हरिहरण का "क्लासिकल टच" और किसी की गायकी में नहीं है। पूरे ९ मिनट की यह ग़ज़ल मेरे इस दावे की पुख्ता सुबूत है:

पत्ता-पत्ता बूटा-बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने, बाग़ तो सारा जाने है

मेहर-ओ-वफ़ा-ओ-लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तन्ज़-ओ-कनाया रम्ज़-ओ-इशारा जाने है

चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है

आशिक़ तो मुर्दा है हमेशा जी उठता है देखे उसे
यार के आ जाने को यकायक ____ दो बारा जाने है

तशना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ीकश
दमदार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "दामन" और शेर कुछ यूँ था-

आँखों से लहू टपका दामन में बहार आई
मैं और मेरी तन्हाई...

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

मेरे अश्रु भरे मन की खातिर
वो फैला दे दामन तो जी लूं (अवनींद्र जी)

दामन छुड़ा के अपना वो पूछ्ते हैं मुझसे
जब ये न थाम पाए थामोगे हाथ कैसे ? (शरद जी)

इन लम्हों के दामन में पाकीजा से रिश्ते हैं
कोई कलमा मुहब्बत का दोहराते फ़रिश्ते हैं (जावेद अख्तर)

दामन में आंसू थे, या रुस्वाईयां थी
ये किस्मत थी या वो बे- वफ़ाइयाँ थी (नीलम जी)

फूलों से बढियां कांटे हैं ,
जो दामन थाम लेते हैं. (मंजु जी)

फूल खिले है गुलशन गुलशन,
लेकिन अपना अपना दामन (जिगर मुरादाबादी)

रात के दामन में शमा जब जलती है
हवा आके उससे लिपट के मचलती है (शन्नो जी)

छोड़ कर तेरे प्यार का दामन यह बता दे के हम किधर जाएँ
हमको डर है के तेरी बाहों में हम सिमट कर ना आज मर जाएँ. (रजा मेहदी अली खान)

आपको मुबारक हों ज़माने की सारी खुशियाँ
हर गम जिंदगी का हमारे दामन में भर दो . (शन्नो जी)

पिछली महफ़िल की शान बने अवनीद्र जी। हुज़ूर, आप की अदा हमें बेहद पसंद आई। एक शब्द पर पूरी की पूरी ग़ज़ल कह देना आसान नहीं। हम आपके हुनर को सलाम को करते हैं। आपके बाद महफ़िल को अपने स्वरचित शेर से शरद जी ने रंगीन किया। शरद जी, आपने तो बड़ा हीं गूढ प्रश्न पूछा है। अगर आशिक़ एक दामन नहीं थाम सकता तो हाथ क्या खाक थामेगा! उम्मीद करता हूँ कि कोई सच्चा आशिक़ इसका जवाब देगा। शरद जी के बाद नीलम जी की बारी थी। इस बार तो आपने दिल खोलकर महफ़िल की ज़र्रानवाज़ी की। आपने अपने शेरों के साथ जानेमाने शायरों के भी शेर शामिल किए। और एक शेर में जब आप शायर का नाम भूल गए तो अवध जी ने वह कमी भी पूरी कर दी। आप दोनों की लख़नवी बातचीत हमें खूब भाई। अब आप दोनों मिलकर मीर से निपटें, जिन्हें लख़नऊ में बस उल्लू हीं नज़र आते थे :) अवध जी, प्रकाश पंडित जी की पुस्तकों से मैं जो भी जानकारी हासिल कर पाता हूँ, वे सब अंतर्जाल पर उपलब्ध हैं। मेरे पास उनकी बस एक कि़ताब है "मज़ाज और उनकी शायरी"। अगर और भी कुछ मालूम हुआ, तो आपको ज़रूर इत्तला करूँगा। मंजु जी, इस बार तो छोटे बहर के एक शेर से आपने बड़ी बाज़ी मार ली है। यही सोच रहा हूँ कि फूल और काँटों का यह अंतर मेरे लिए अब तक अनजाना कैसे था? सुमित जी, आपको "फूल खिले हैं.." वाले शेर के शायर का नाम पता न था, इसका मतलब यही हुआ कि आप "जिगर मुरादाबादी" वाली महफ़िल से नदारद थे :) शन्नो जी, ये हुई ना बात। इसी तरह खुलकर शेरों का मज़ा लेती रहें और लफ़्ज़ों की बौछार से हमें भी भिंगोती रहें।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, October 9, 2009

मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे...कबीर से बुनकरी सिखना चाहते हैं गुलज़ार और भुपि

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #५२

की महफ़िल कुछ खास है। सबब तो समझ हीं गए होंगे। नहीं समझे?... अरे भाई, भुपि(भुपिन्दर सिंह) और गुलज़ार साहब की जोड़ी पहली बार आज महफ़िल में नज़र आने जा रही है। अब जहाँ गुलज़ार का नाम हो, वहाँ सारे बने बनाए ढर्रे नेस्तनाबूत हो जाते हैं। और इसी कारण से हम भी आज अपने ढर्रे से बाहर आकर महफ़िल-ए-गज़ल को गुलज़ार साहब की कविताओं के सुपूर्द करने जा रहे हैं। उम्मीद करते हैं कि हमारा यह बदलाव आपको अटपटा नहीं लगेगा। तो शुरू करते हैं कविताओं का दौर... उससे पहले एक विशेष सूचना: हमें सीमा जी की पसंद की गज़लों की फ़ेहरिश्त मिल गई है और हम इस सोमवार को उन्हीं की पसंद की एक गज़ल सुनवाने जा रहे हैं। शामिख साहब ने २-३ दिनों की मोहलत माँगी है, हमें कोई ऐतराज नहीं है...लेकिन जितना जल्द आप यह काम करेंगे, हमें उतनी हीं ज्यादा सुहूलियत हासिल होगी। शरद जी, कृपया फूर्त्ति दिखाएँ, आप तो पहले भी इस प्रक्रिया से गुजर चुकें हैं।

भारतीय ज्ञानपीठ की मासिक साहित्यिक पत्रिका नया ज्ञानोदय के पिछले अंक(जून २००८) में गुलज़ार साहब की कलम ने पांच शहरों की तस्वीरें उकेरी हैं, कविताओं के माध्यम से शहरों के चरित्र को पेश किया है..

प्रस्तुत हैं शहरनामे के कुछ अंश..
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बम्बई

बड़ी लम्‍बी-सी मछली की तरह लेटी हुई पानी में ये नगरी
कि सर पानी में और पाँव जमीं पर हैं
समन्‍दर छोड़ती है, न समन्‍दर में उतरती है
ये नगरी बम्‍बई की...
जुराबें लम्‍बे-लम्‍बे साह‍िलों की, पिंडलियों तक खींच रक्‍खी है
समन्‍दर खेलता रहता है पैरों से लिपट कर
हमेशा छींकता है, शाम होती है तो 'टाईड' में।

यहीं देखा है साहिल पर
समन्‍दर ओक में भर के
'जोशान्‍दे' की तरह हर रोज पी जाता है सूरज को
बड़ा तन्‍दरुस्‍त रहता है
कभी दुबला नहीं होता!
कभी लगता है ये कोई तिलिस्‍मी-सा जजीरा है
जजीरा बम्‍बई का...

किसी गिरगिट की चमड़ी से बना है आसमाँ इसका
जो वादों की तरह रंगत बदलता है
'कसीनो' में रखे रोले (Roulette) की सूरत चलता रहता है!
कभी इस शहर की गर्दिश नहीं रुकती
बसे 'बियेरिंग' लगे हैं
किसी 'एक्‍सेल' पे रक्‍खा है।

तिलिस्‍मी शहर के मंजर अजब है
अकेले रात को निकलो, सिया साटिन की सड़कों पर
तिलिस्‍मी चेहरे ऊपर जगमगाते 'होर्डिंग' पर झूलते हैं
सितारे झाँकते हैं, नीचे सड़कों पर
वहाँ चढ़ने के जीने ढूँढने पड़ते हैं
पातालों में गुम होकर।

यहाँ जीना भी जादू है...
यहाँ पर ख्‍वाब भी टाँगों पे चलते है
उमंगें फूटती हैं, जिस तरह पानी में रक्‍खे मूंग के दाने
चटखते है तो जीभें उगने लगती हैं
यहाँ दिल खर्च हो जाते हैं अक्‍सर...कुछ नहीं बचता
सभी चाटे हुए पत्‍तल हवा में उड़ते रहते हैं
समन्‍दर रात को जब आँख बन्‍द करता है, ये नगरी
पहन कर सारे जेवर आसमाँ पर अक्‍स अपना देखा करती है

कभी सिन्‍दबाद भी आया तो होगा इस जजीरे पर
ये आधी पानी और आधी जमीं पर जिन्‍दा मछली
देखकर हैराँ हुआ होगा!!

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मद्रास (चेन्नई)

शहर ये बुजुर्ग लगता है
फ़ैलने लगा है अब
जैसे बूढ़े लोगों का पेट बढ़ने लगता है

ज़बां के ज़ायके वही
लिबास के सलीके भी....
.....

ख़ुशकी बढ़ गयी है जिस्म पर, ’कावेरी’ सूखी रहती है

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कोलकता

कभी देखा है बिल्डिंग में,
किसी सीढ़ी के नीचे
जहां मीटर लगे रहते हैं बिजली के
पुराने जंग आलूदा...
खुले ढक्कन के नीचे पान खाये मैले दांतों की तरह
कुछ फ़्यूज़ रक्खे हैं
...
बेहया बदमाश लड़के की तरह वो
खिलखिला के हंसता रहता है!

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दिल्ली - पुरानी दिल्ली की दोपहर

सन्‍नाटों में लिपटी वो दोपहर कहां अब
धूप में आधी रात का सन्‍नाटा रहता था।

लू से झुलसी दिल्‍ली की दोपहर में अक्‍सर...
‘चारपाई’ बुनने वाला जब,
घंटा घर वाले नुक्‍कड़ से, कान पे रख के हाथ,
इस हांक लगाता था- ‘चार... पई... बनवा लो...!’
ख़सख़स की टट्यों में सोये लोग अंदाज़ा कर लेते थे... डेढ़ बजा है!
दो बजते-बजते जामुन वाला गुज़रेगा
‘जामुन... ठंडे... काले... जामुन...!’
टोकरी में बड़ के पत्तों पर पानी छिड़क के रखता था
बंद कमरों में...
बच्‍चे कानी आंख से लेटे लेटे मां को देखते थे,
वो करवट लेकर सो जाती थी

तीन बजे तक लू का सन्‍नाटा रहता था
चार बजे तक ‘लंगरी सोटा’ पीसने लगता था ठंडाई
चार बजे के पास पास ही ‘हापड़ के पापड़!’ आते थे
‘लो... हापड़... के... पापड़...’
लू की कन्‍नी टूटने पर छिड़काव होता था
आंगन और दुकानों पर!

बर्फ़ की सिल पर सजने लगती थीं गंडेरियां
केवड़ा छिड़का जाता था
और छतों पर बिस्‍तर लग जाते थे जब
ठंडे ठंडे आसमान पर...
तारे छटकने लगते थे!

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न्यूयार्क

तुम्हारे शहर में ए दोस्त
क्यूं कर च्युंटियों के घर नहीं हैं
कहीं भी चीटियां नहीं देखी मैने

अगरचे फ़र्श पे चीनी भी डाली
पर कोइ चीटीं नज़र नहीं आयी
हमारे गांव के घर में तो आटा डालते हैं, गर
कोइ क़तार उनकी नज़र आये

तुम्हारे शहर में गरचे..
बहुत सब्ज़ा है, कितने खूबसूरत पेड़ हैं
पौधे हैं, फूलों से भरे हैं

कोई भंवरा मगर देखा नहीं भंवराये उन पर

मेरा गांव बहुत पिछड़ा हुआ है
मेरे आंगन के बरगद पर
सुबह कितनी तरह के पंछी आते हैं
वे नालायक, वहीं खाते हैं दाना
और वहीं पर बीट करते हैं

तुम्हारे शहर में लेकिन
हर इक बिल्डिंग, इमारत खूबसूरत है, बुलन्द है
बहुत ही खूबसूरत लोग मिलते हैं

मगर ए दोस्त जाने क्यों..
सभी तन्हा से लगते हैं
तुम्हारे शहर में कुछ रोज़ रह लूं
तो बड़ा सुनसान लगता है..

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तो कैसी लगी आपको ये कविताएँ? अच्छी हीं लगी होंगी, इसमें किसी शक की गुंजाईश नहीं है। तो इन कविताओं के बाद अगर हम सीधे आज की नज़्म की ओर रूख कर लें तो महफ़िल-ए-गज़ल का उद्देश्य सफ़ल नहीं होगा। हमारी यही कोशिश रहती है कि हम फ़नकारों की ज़िंदगी के कुछ अनछुए हिस्से आपके सम्मुख प्रस्तुत करते रहें। तो उसी लहज़े में पेश हैं गुलज़ार साहब के बारे में खुद उनके और उनके साथ काम कर चुके या कर रहे फ़नकारों के ख्याल (सौजन्य:बी०बी०सी०) जब मैंने पहला गाना लिखा, उस वक़्त मैं बहुत इच्छुक नहीं था. बस एक के बाद दूसरा कदम लिया. फिर मैं शामिल हो गया बिमल रॉय के साथ असिस्टेंट के तौर पर. उन्हीं के यहां 'प्रेम पत्र' बन रही थी. उसमें मैंने सावन की रातों में ऐसा भी होता है’ लिखा. फिर 'काबुलीवाला' बन रही थी. उसमें मैंने लिखा - गंगा आए कहां से गंगा जाए कहां से – बस यही करते करते में फ़िल्म इंडस्ट्री में शामिल हो गया। शायरी का शौक़ था शेर कहने का शौक था. शायरी अच्छी लगती है. जैसे अंग्रेज़ी में कहते हैं – इट इज़ फर्स्ट लव. शायरी मेरा पहला इश्क़ है.

"क्या नुस्ख़ा है किसी गानें को हिट करने का"- इस प्रश्न के जवाब में गुलज़ार साहब ने कहा "मुझे यूं लगता है और बड़ी निजी-सी राय है ये मेरी. इसे अगर जांच-भाल के भी देखें...कि जो किसी गाने के पॉपुलर होने का सबसे अहम अंग है - वो मेरे ख़याल में धुन है. उसके बाद फिर दूसरी चीज़ें आतीं हैं – आवाज़ भी शामिल हो जाती है औऱ अल्फ़ाज़ भी शामिल हो जाते हैं. लेकिन मूलत धुन बहुत अहम है."

गुलज़ार निर्देशित 'अंगूर' की अभिनेत्री मौसमी चटर्जी बताती हैं कि "गुलज़ार एक बेहतरीन गीतकार हैं। मुझे उनका 'ख़ामोशी' के लिए लिखा गाना "प्यार को प्यार ही रहने दो" बेहद पसंद है। गुलज़ार मेरी सास को उर्दू सिखाते थे और उनसे बांग्ला सीखते थे।

गुलज़ार के साथ 'बंटी और बबली', 'झूम बराबर झूम' फ़िल्में करने वाले शंकर महादेवन ने बीबीसी को बताया- कजरारे कंपोज़ करने के बाद हम गुलज़ार साहब से मिले. उन्होंने गाना सुनने के बाद कहा कि उन्हें इसमें ख़तरा दिख रहा है. मैंने पूछा – क्या? उन्होंने कहा कि इस गाने के बहुत बड़ा हिट होने का ख़तरा है. जो उन्होंने कहा वो एकदम सही हुआ.’ महादेवन कहते हैं कि गुलज़ार से मिलना एक सुखद अनुभव है और उनके साथ काम करना का तजुर्बा ज़िंदगी भर उनके साथ रहेगा
गुलज़ार साहब के बारे में जितना भी लिखा जाए कम है। कभी मौका मिलेगा(और मिलेगा हीं) तो हम उनके बारे में और भी बातें करेंगे। अभी बस इतना हीं...

अब वक्त है आज की नज़्म का लुत्फ़ उठाने का। यूँ तो यह नज़्म बड़ी हीं सीधी मालूम पड़ती है, जिसमें गुलज़ार साहब एक जुलाहे से वह तरकीब सीखना चाहते हैं, जिससे वो भी टूटे हुए रिश्तों को बुन सकें। लेकिन अगर आप गौर करेंगे तो महसूस होगा कि गुलज़ार किसी साधारण-से जुलाहे से बात नहीं कर रहे, बल्कि "कबीर" से मुखातिब हैं। वही कबीर जिन्होंने परमात्मा से अपना रिश्ता जोड़ लिया है। है ना बड़ी अजीब-सी बात? आप खुद देखिए:

मुझको भी तरकीब सिखा दे यार जुलाहे!

अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते
जब कोई तागा टूट गया या ख़तम हुआ
फिर से बाँध के
और सिरा कोई जोड़ के उसमें
आगे बुनने लगते हो

तेरे उस ताने में लेकिन
इक भी गाँठ गिरह बुनकर की
देख नहीं सकता है कोई

मैंने तो इक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
साफ़ नज़र आती हैं
मेरे यार जुलाहे




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

शीशागर बैठे रहे ज़िक्र-ए-___ लेकर
और हम टूट गये काँच के प्यालों की तरह


आपके विकल्प हैं -
a) सनम, b) इलाही, c) मसीहा, d) खुदा

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "गुनाह" और शेर कुछ यूं था -

इक फ़ुर्सते-गुनाह मिली, वो भी चार दिन
देखे हैं हमने हौसले परवरदिगार के...

"फ़ैज़" साहब के इस शेर को सबसे पहले सही पहचानकर बाजी मारी सीमा जी ने। उसके बाद आपने कुछ शेर भी पेश किए:

इसे गुनाह कहें या कहें सवाब का काम
नदी को सौंप दिया प्यास ने सराब का काम (शहरयार)

अब ना माँगेंगे ज़िन्दगी या रब
ये गुनाह हम ने एक बार किया (गुलज़ार)

दिल में किसी के राह किये जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किये जा रहा हूँ मैं (जिगर मुरादाबादी)

सीमा जी के बाद महफ़िल को खुशगवार किया शरद जी और शन्नो जी। ये रहे आप दोनों के स्वरचित शेर(क्रम से):

तेरी जिस पर निगाह होती है
उसे जीने की चाह होती है
दिल दुखा कर किसी को हासिल हो
कामयाबी गुनाह होती है।

निगाह भर के उन्हें देखने का गुनाह कर बैठे
सरे आम ज़माने ने फिर मचाई फजीहत ऐसी।

वैसे आप दोनों ने एक काम कमाल का किया है, अपने-अपने शेर में "निगाह" का इस्तेमाल करके आपने ५०-५० का गेम खेल लिया...मतलब कि या निगाह हो या गुनाह जवाब तो सही रहेगा :)

इनके बाद महफ़िल में नज़र आए शामिख साहब। महफ़िल की शम्मा बुझने तक आपने महफ़िल को आबाद रखा। ये रहे आपके पेश किए हुए शेर:

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है,
मां बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है (मुनव्वर राणा)

चलना अगर गुनाह है अपने उसूल पर
सारी उमर सज़ाओं का ही सिल सिला चले (अनाम)

उम्र जिन की गुनाह में गुज़री
उन के दामन से दाग़ ग़ाइब है (राजेन्द्र रहबर)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Friday, April 3, 2009

रामराज्य बापू का सपना, इस धरती पर लाओ राम

रामनवमी पर सुनिए अमीर खुसरो, कबीर, तुलसी और राकू को

वैष्णव हिन्दू हर वर्ष चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को अपने भगवान श्रीराम के जन्मदिवस का त्योहार मनाते हैं। वर्ष २००९ में यह तिथि ३ अप्रैल को आयी है, इस दिवस पर रामनवमी नाम का त्यौहार मनाया जाता है। पुराण-कथाओं के अनुसार श्री राम को विष्णु का सातवाँ अवतार माना जाता हैं। मान्यता है कि तीनों लोकों में धर्म की स्थापना के लिए ब्रह्म, विष्णु और महेश (शिव) नामक तीन तंत्र हैं और इनके काउँटरपार्टों की भी संकल्पना की गई है।

रामनवमी का त्योहार इस बात की याद दिलाता है कि मनुष्य को धर्म में आस्था कभी नहीं छोड़नी चाहिए। अधर्म कितना भी अपना अंधकार फैला ले, भगवान देर ही सही अभय प्रकाश लेकर ज़रूर अवतरित होते हैं। रामायण की कथा में महर्षि वाल्मिकी लिखते हैं कि अयोध्या के राजा दशरथ की तीन पत्‍नियाँ होने के बावज़ूद उन्हें कोई पुत्र नहीं था। दशरथ को अपने राजवंश के खत्म होने का डर था। शंका से ग्रस्त राजा दशरथ को वशिष्ठ ऋषि ने आशा का छोर न छोड़ने की सलाह दी और पुत्र-प्राप्ति के लिए यज्ञ करने का रास्ता दिखलाया। पुत्र-कामेष्टि यज्ञ के अनुष्ठान के फलस्वरूप दशरथ को ४ पुत्रों का प्रसाद मिला था, जिसमें सबसे पहले भगवान विष्णु ने राम के रूप में कौशल्या के गर्भ में अवतार लिया था।
प्रतीक रूप में इस त्योहार को मनाने का एक उद्देश्य यह भी है कि मनुष्य को अधर्म के खिलाफ जंग ज़ारी रखनी चाहिए, क्योंकि ईश्वर के यहाँ देर है, अंधेर नहीं है।

सुन लो मेरी मेरे रघुराई
लगादो पार नैइया मेरे रघुराई
भव-सागर को पार करा दो
सुन लो मेरी दुहाई
लगादो...............................
जन्म मरन का बंधन टूटे
छुट जाए आवा जाई
लगादो ............................
तेरे दरस को नैना तरसे
तुझसे लौ जो लगाई
लगादो ............................
आँख पड़ा है लोभ का परदा
देता कुछ न दिखाई
लगादो ..........................
वचन की खातिर वन को चल गए
रघुकुल रीत निभाई
लगादो पार....................

-रचना श्रीवास्तव
महाकाव्य रामायण के तुलसी-संस्करण 'राम चरित मानस' के राम भारत के जन-जन में बसे हैं। राम भारत का इतना प्रभावशाली व्यक्तित्व है कि इसने भारत के भूत और वर्तमान दोनों को बराबर रूप में प्रभावित किया है। राम चरित मानस के बराबर साहित्य की कोई और कृति दुनिया में कहीं भी इस तरह से लोगों की रूह में नहीं समा सकी।

शोखी-ए-हिन्दू ब बीं, कुदिन बबुर्द अज खास ओ आम,
राम-ए-मन हरगिज़ न शुद हर चंद गुफ्तम राम राम।
-------अमीर खुसरो,
(हर आम और खास जान ले कि राम हिंद के शोख, शानदार शख्सियत हैं। राम मेरे मन में हैं और हरगिज़ न अलग होंगे, जब भी बोलूँगा राम राम बोलूँगा।)

क्रांतिकारी कवि कबीर ने भी राम को तरह-तरह के प्रतीकों में इस्तमाल किया। एक दोहा देखें

राम मिले निर्भय भय ,रही न दूजी आस
जाई सामना शब्द में राम नाम विस्वास
..........संत कबीर दास

तुलसीदास ने कहा-

नीलाम्बुजं श्यामलकोमलांगम्, सीतासमारोपितवामभागम्।
पाणौमहासायकचारुचापम्, नमामिरामम् रघुवंशनाथम्।।


नमामि रामम्
लेकिन हम बात करने जा रहे हैं एक ख़ास गीत की जिसमें महात्मा गाँधी का रामराज्य के सपने को याद किया गया है। इस गीत के संकल्पनाकर्ता राजकुमार सिंह 'राकू' अपने श्रीराम से कृपा करने की गुहार लगा रहे हैं। कह रहे हैं कि 'रामराज्य बापू का सपना, इस धरती पर लाओ राम'। सुनें-


(हमेशा सुनने के लिए डाऊनलोड करें)
इस गीत में शुरू में अमीर खुसरों के बोल हैं। उसके बाद कबीरदास के, फिर तुलसीदास के और शेष गीत राकू ने खुद लिखा है।

राकू
राकू ने इस गीत को 'नाममि रामम्' नाम दिया है। राकू कहते हैं-
" 'नमामि रामम्' एक विनम्र आदरांजलि है हमारी अमर धरोहर श्री राम कों जो वस्तुतः किसी भी धर्म, भाषा, क्षेत्र से परे हैं। अमीर खुसरो, कबीर और संत तुलसीदास जैसे महान कवियों ने हमारी इस सांस्कृतिक पहचान के प्रति अगाध श्रद्धा, प्रेम और सम्मान व्यक्त किया है।'नमामि रामम्'संगीत के माध्यम से उसी मान,निष्ठा और श्रद्धा को समर्पित अभिव्यक्ति है।"

इस गीत के एल्बम का लोकार्पण गांधी निर्वाण के दिन (३० जनवरी २००८ को) बापू के साबरमती आश्रम में, आश्रम के मुख्य ट्रस्टी ललित भाई मोदी के हाथों संपन्न हुआ था। जिसमें देश-विदेश से आये बहुत सारे महानुभाओं ने हिस्सा लिया और प्रार्थना सभा के बाद चर्चा भी की।

मुख्य बात जो कही गयी कि इस गीत में ' रामराज्य' लाने की कही गयी है और वह 'रामराज्य' बापू के ही रामराज्य की परिकल्पना है।

बापू के 'रामराज्य' की परिकल्पना
राष्ट्रपिता बापू के संघर्ष का लक्ष्य था 'रामराज्य', जिसकी शुरूआत 'अन्त्योदय' से होनी थी यानी समाज के सबसे पिछडे की सेवा सर्वप्रथम, का वादा था। इसी क्रम से सम्पूर्ण समाज के सम्पूर्ण उदय का दर्शन था ' सर्वोदय'।

गीत की टीम
प्रार्थना- अमीर खुसरो, संत कबीर और संत तुलसी दास
निवेदन और गीत- राजकुमार सिंह 'राकू'
संगीत- विवेक अस्थाना एवं राकू

गायक- राजा हसन तथा सुमेधा [२००७ के सा रा गा मा के अंतिम चरण के विजेता]
प्रोग्रामिंग तथा डिजाइन- न्रिपंशु शेखर
रिकॉर्डिस्ट- साहिल खान
वाद्य:
सितार-
उमाशंकर शुक्ल, बांसुरी- विजय ताम्बे, हारमोनियम- फिरोज़ खान
रिदम- मकबूल खान व ताल वाद्य- शेखर
कोरस(साथी गायक)- नीलेश ब्रह्मभट्ट, संगम उपाध्याय, हिमांशु भट्ट, शोभा सामंत, सुगन्धा लाड, संजय कुमार
रिकॉर्डिंग- आर्यन्स स्टूडियो (मुंबई)

अमीर खुसरो (१२५३-१३२५)- एक संक्षिप्त परिचय
कवी, संगीतज्ञ, इतिहासकार, बहुभाषा शास्त्री और इन सब से बढ़ एक सूफी संगीत वाहक, जिसने शांति, सद्‍भाव, भाईचारा और सर्वधर्म समभाव को बताया और जिया। फारसी, तुर्की, अरबी और संस्कृत के विद्वान जिसने हिंदी-उर्दू (जिसे वे 'हिंदवी' कहते थे) में ही रचनाएँ नहीं की बल्कि हिंदी की बोलियों ब्रज और अवधी वगैरह में भी गीत लिखे। फारसी में लिखा उनका विशाल भंडार भी है। ' हिंदवी' के पहले कवी जिन्होंने न इस भाषा को गढ़ा बल्कि हजारों गीतों, दोहों, पहेलियों, कह्मुकर्नियों आदि हर विधा में लिखा और गाया भी। उसमें समाई मानवीय करुणा से सबका मन जीता और अस्सीम सम्मान और प्यार पाया।
बहुत ही आला संगीत प्रेमी जिन्होंने हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रतिमान गढ़े, जो आज तक निरंतर बने हुए हैं। उन्होंने पखावज से तबले का इज़ाद किया और वीणा को सितार का रूप दिया। महान सूफी संत हज़रत निजामुद्दीन औलिया के प्रिय शिष्य रहे। जिन्होंने उनके भीतर समग्र मानवता के लिए एक गहरी सोच, करुणा, स्नेह और प्रेम भर दिया। यही 'खुसरो' को उस उच्चता पर प्रतिष्ठित करता है जिसकी अगली कड़ियाँ कबीर, सूर, तुलसी, नानक, मीरा, नामदेव, रैदास आदि उच्च संतों में प्रतिध्वनित होती हैं। यही भारत के इस महानतम पुत्र की उच्चता का पड़ाव है। ' खुसरो' खुद को 'तुतिये हिंद' यानी हिंद का तोता कहते थे, जो मीठा बोलता है.............. ' राम-राम' बोलता है। महान कवि ग़ालिब ने ये पूछे जाने पर की उनकी शायरी में इतनी मिठास कैसे? लिखा...........

" ग़ालिब मेरे कलाम में क्यूं कर मजह न हो,
पीता हूँ धो के खुसरावो शीरीं सुखन के पाँव।"


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