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मंगलवार, 11 अगस्त 2009

खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला.....गुलाम अली की मार्फ़त पूछ रहे हैं आनंद बख्शी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #३७

दिशा जी की पसंद की दूसरी गज़ल लेकर आज हाज़िर हैं हम। आज के अंक में जो गज़ल हम आप सबको सुनवाने जा रहे हैं वह वास्तव में तो एक फिल्म से ली हुई है लेकिन हमारे आज के फ़नकार ने इस गज़ल को मंच से इतनी बार पेश किया है कि लोग अब इसे गैर-फ़िल्मी गज़ल मानने लगे हैं। इस गज़ल की गुत्थी इतनी उलझी हुई है कि एकबारगी तो हमें भरोसा हीं नहीं हुआ कि इसे माननीय अनु मलिक साहब ने संगीतबद्ध किया होगा। फिर हमने अंतर्जाल की खाक छान दी ताकि हमें वास्तविक संगीतकार की जानकारी मिल जाए। ज्यादातर जगहों पर अनु मलिक का हीं नाम था ,लेकिन कुछ लोग अब भी यह दावा करते हैं कि इसे गुलाम अली(हमारे आज के फ़नकार) ने खुद हीं संगीतबद्ध किया है। वैसे हमारी खोज को तब विराम मिला जब गुलाम अली साहब का एक साक्षात्कार हमारे हाथ लगा। उन्होंने उस साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि इस गज़ल में संगीत अनु मलिक का हीं है। स्क्रीन इंडिया के एक इंटरव्यू में उनसे जब यह पूछा गया कि अनु मलिक का कहना है कि महेश भट्ट की फ़िल्म "आवारगी" की एक गज़ल "चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना बैठा" को उन्होंने हीं कम्पोज़ किया है। क्या आप भी यह मानते हैं? तो इस पर गुलाम अली साहब ने दो टूक शब्दों में यह जवाब दिया कि "हाँ यह उनकी हीं ओरिजिनल कम्पोजिशन थी। मैने बस उनके लिए हीं नहीं बल्कि नदीम-श्रवण के लिए भी बेवफ़ा फ़िल्म की एक गज़ल को अपनी आवाज़ दी है। ये उनकी अपनी धुने हैं। दिल मानता तो नहीं, लेकिन जब गुलाम अली साहब ने खुद हीं ऐसा कहा है तो सारी अटकलें यहीं समाप्त हो जाती हैं। तो आप सब अब तक यह समझ हीं गए होंगे कि हमारी आज की गज़ल कौन-सी है और इसे किसने अपनी आवाज़ से सजाया है। इस गज़ल के साथ एक और शख्स का नाम जुड़ा है। वैसे तो हिंदी फ़िल्मों में इनसे बड़ा गीतकार आज तक कोई नहीं हुआ लेकिन गज़लों के मामले में इनका हाथ कुछ तंग है। इस हाल में अगर आपको यह पता चले कि आज की गज़ल इन्हीं की लिखी हुई है तो एक सुखद आश्चर्य होता है। तो चलिए जानकारियों का सफ़र शुरू करते हैं गुलाम अली के साथ।

यह तो सबको पता है कि गुलाम अली साहब ने अपने शुरूआती दिनों में रेडियो लाहौर में गायकी की थी। उन्हीं पुराने दिनों को याद करते हुए बीबीसी हिंदी सेवा के विशेष कार्यक्रम "एक मुलाकात" में गुलाम अली साहब कहते हैं: असल में वही दिन थे, जिन्होंने मुझे यहाँ तक पहुँचाया. अब से तकरीबन 50 साल पहले की बात थी, तब मैं 14 साल का था. मैं रेडियो में ऑडीशन देने गया था. वहाँ निदेशक आगा बशीर साहब थे और उनके बगल में अय्यूब रमानी साहब थे. ऑडीशन के दौरान जब लाल बत्ती जली तो मैं घबरा सा गया था. हालाँकि रियाज़ करते रहने के कारण गाने में मुझे झिझक नहीं थी. मैने आ..आ.. ही कहा था उन्होंने कहा कि बस, बस......मुझे बहुत दुख हुआ कि मैं तो इन्हें सुनाने आया था और इन्होंने सुना ही नहीं. बाद में अय्यूब साहब ने मुझसे पूछा कि तुम उदास क्यों हो. मैंने कहा कि आपने तो मुझे सुना ही नहीं. उन्होंने क़ाग़ज दिखाते हुए कहा कि घबराते क्यों हो, बशीर साहब ने 'गुड' नहीं 'एक्सीलेंट' लिखा है. पाँच महीने में ही मेरा नाम लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया. पाकिस्तान में ही नहीं हिंदुस्तान में भी मुझे लोग सुनते थे. इसके अलावा उनसे जब पूछा गया कि क्या बड़े गुलाम अली खां साहब ने भी यह कहा था कि तुम मेरा नाम रौशन करोगे तो उनका जवाब कुछ यूँ था: जब मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली साहब से मुझे सिखाने की गुजारिश की तो उन्होंने कहा कि मेरी शागिर्दी क्यों करते हो, मैं तो यहाँ रहता नहीं. फिर मेरे वालिद ने बड़े ग़ुलाम अली के दोस्तों बग़ैरह से सिफ़ारिशें करवाईं और जोर देकर कहा कि आप ही इसे सिखाएं. उन्होंने मुझे कुछ सुनाने के लिए कहा. मैने उन्हीं की ठुमरी 'सैंया बोलो तनिक मुँह से रहियो न जाए....' वो हंसने लगे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और प्यार किया और कहा कि कल आपकी शागिर्दी होगी. सच्ची बात ये है कि ऐसे उस्ताद की शागिर्दी होना मुक़द्दर की बात है. गुलाम अली साहब के अनुसार उनके जीवन और गाने में कोई फ़र्क नहीं है। वे अपने जीवन को अपनी गायकी से अलग करके नहीं देख सकते। उन्हीं के शब्दों में: मेरा तो जीवन और गाना एक ही है. यानी गाना जीवन है और जीवन गाना. मेरे लिए ये आपस में जुड़े हैं. मैं ख़ाली भी होता हूँ तो दिमाग़ में हर समय संगीत ही चलता रहता है. बस मेरा ज़ोर क्लासिकल पर रहता है. जिसे शास्त्रीय संगीत की जानकारी नहीं होगी वो आगे नहीं बढ़ सकता. मेरा तो ये कहना है कि जब भी गाया जाए कुछ हटकर गाया जाए. बस इसी तरह लफ़्जों को सोचते रहते हैं. गुलाम अली से जुड़ी और भी कई सारी मज़ेदार बातें हैं,लेकिन वे सब फिर कभी। अभी आनंद बख्शी साहब (जी हाँ यह गज़ल उन्हीं की लिखी हुई है...चौंक गए ना!) की ओर रूख करते हैं।

आनंद बख्शी साहब एक ऐसे शख्स हैं, जिनके गीतों को सुनकर न जाने कितनी पीढियाँ (हमारी पीढी और हमसे एक सोपान पहले की पीढी तो निस्संदेह)जवान हुई हैं। भले हीं इस दौरान हम में से कई लोगों ने उन्हें भुला दिया हो लेकिन उनके गीतों को भुलाना आसान नहीं। हम जैसे भूले-भटकों को राह दिखाने के लिए हीं "विनय प्रजापति" जी आनंद बख्शी साहब पर एक ब्लाग चला रहे हैं। मौका मिले तो एक बार आप भी चक्कर लगा के आ जाईयेगा। वैसे आनंद बख्शी के जीवन के बारे में कई लोगों ने बहुत कुछ लिखा है, लेकिन चूँकि हमें कुछ अलग करने की आदत है, इसलिए हम उनके सुपुत्र "राकेश आनंद बख्शी" की कही कुछ बातें लेकर यहाँ हाज़िर हुए हैं। ये बातें उन्होंने "सुपर मैग्जीन" के साथ इंटरव्यू में कहीं थी। मेरे पिताजी ने १९५७ से २००२ के बीच ८०० से भी ज्यादा फिल्मों के लिए ३५०० से भी ज्यादा गाने लिखे हैं। इतना होने के बावजूद जब भी वो कोई नया गाना लिखने बैठते तो उन्हें हर बार यह लगता था कि कहीं इस बार वे असफ़ल न हो जाएँ। इस डर के बावजूद वे सफ़ल हुए और इसका एकमात्र कारण यह था कि हर बार वे ग्राउंड ज़ीरो से शुरूआत करते थे। उन्हें अपनी सफ़लता पर तनिक भी दंभ न था। उन्होंने मुझे सिखाया कि "खुद पर संदेह होना या फिर आत्म-विश्वास की कमी आम चीजें हैं। इनसे कभी भी विचलित नहीं होना चाहिए, बल्कि ये सारी चीजें हीं हमें ताकत देती हैं।" उनका मानना था कि "हिट फ़िल्म बनाना या हिट स्क्रिप्ट लिखना बड़ी बात नहीं है। हिट और फ्लाप तो आते जाते रहते हैं, हमें इन पर ज्यादा सोच-विचार नहीं करना चाहिए। जो चीज मायने रखती है वह यह है कि इनके बाद या इनके दौरान आपका औरों के साथ कैसा बर्ताव रहा है, आप खुद किस तरह के इंसान बन गए हैं या बन रहे हैं और आपने कैसे दोस्त बनाए हैं।" मेरे पिताजी ने अपने डर पर काबू पाने के लिए कुछ पंक्तियाँ लिखीं थीं जिनका इस्तेमाल सुभाष घई साहब ने अपनी एक फ़िल्म में भी किया है। उस कविता या कहिए उस गीत का मुखड़ा इस तरह था:

मैं कोई बर्फ़ नहीं जो पिघल जाऊँगा,
मैं कोई हर्फ़ नहीं जो बदल जाऊँगा,
मैं तो जादू हूँ, मैं जादू हूँ, चल जाऊँगा।


कहते हैं कि आनंद बख्शी ने जब "आपकी कसम" के लिए "ज़िंदगी के सफ़र में गुजर जाते हैं जो मकाम वो फिर नहीं आते" लिखा था तो जावेद अख्तर साहब उनके घर तक चले गए थे और उनसे उनकी कलम की माँग कर दी थी। आनंद बख्शी साहब ने कहा कि आपको अपनी कलम देकर यूँ तो मैं बहुत खुश होऊँगा लेकिन क्या करूँ मुझे यह कलम किशोर कुमार ने गिफ़्ट में दी है। आनंद बख्शी साहब नए फ़नकारों को बहुत प्रोत्साहित करते थे। सुखविंदर सिंह उन्हें याद करते हुए कहते हैं कि "चूँकि मैं खुद एक संगीतकार हूँ इसलिए जब मैं दूसरों के लिए गाता हूँ तो अपना इनपुट दिए बिना रहा नहीं जाता और इसलिए गाना दिल से नहीं कर पाता। बख्शी साहब ने एक बार मुझे कहा था कि जब तुम स्टुडियो में एक गायक की हैसियत से आओ तो अपने अंदर बैठे संगीतकार को घर छोड़कर हीं आना और तब से मैं उनकी इस बात को फौलो कर रहा हूँ। और अब मुझे कोई दिक्कत नहीं आती।" तो ऐसे गुणी थे हमारे आनंद बख्शी साहब। उन्हें याद करते हुए चलिए हम अब सुनते हैं आज की गज़ल। मुलाहजा फ़रमाईयेगा:

चमकते चाँद को टूटा हुआ तारा बना डाला
मेरी आवारगी ने मुझको आवारा बना डाला

बड़ा दिलकश बड़ा रंगीन है ये शहर कहते हैं
यहाँ पर हैं हजारों घर घरों में लोग रहते हैं
मुझे इस शहर ने गलियों का बंजारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मैं इस दुनिया को अक्सर देखकर हैरान होता हूँ
न मुझसे बन सका छोटा सा घर दिन रात रोता हूँ
ख़ुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना डाला

चमकते चाँद को…

मेरे मालिक मेरा दिल क्यों तड़पता है सुलगता है
तेरी मर्ज़ी तेरी मर्ज़ी पे किसका ज़ोर चलता है
किसी को गुल किसी को तूने अंगारा बना डाला

चमकते चाँद को…

यही आग़ाज़ था मेरा यही अंजाम होना था
मुझे बरबाद होना था मुझे नाकाम होना था
मुझे तक़दीर ने तक़दीर का मारा बना डाला




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की. एक शेर हम आपकी नज़र रखेंगे. उस शेर में कोई एक शब्द गायब होगा जिसके नीचे एक रिक्त स्थान बना होगा. हम आपको चार विकल्प देंगे आपने बताना है कि उन चारों में से सही शब्द कौन सा है. साथ ही पेश करना होगा एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली -

मुद्दत के बाद उस ने जो की ___ की निगाह,
जी खुश तो हो गया मगर आंसू निकल पड़े..


आपके विकल्प हैं -
a) करम, b) लुत्फ़, c) मेहर, d) ख़ुशी

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -
पिछली महफिल का सही शब्द था "ज़ब्त" और शेर कुछ यूं था -

ज़ब्त लाजिम है मगर दुःख है क़यामत का फ़राज़,
जालिम अब के भी न रोयेगा तू तो मर जायेगा...

फ़राज़ साहब के इस शेर को सबसे पहले पकड़ा कुलदीप जी ने। उन्होंने इस शब्द पर दो शेर भी पेश किए जिनके शायर के बारे में उन्हें जानकारी नही थी। ये रहे दो शेर:

मुझे अपने ज़ब्त पे नाज़ था सरे बज्म ये क्या हुआ
मेरी आंख कैसे छलक गयी मुझे रंज है ये बुरा हुआ

जनून को ज़ब्त सीखा लूं तो फिर चले जाना
में अपनेआप को संभाल लूं तो फिर चले जाना

इन दो शेरों के साथ-साथ उन्होंने परवीन शाकिर, हफ़िज जौनपुरी, मोहसिन नकवी,शकील बदायूंनी, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, शेरो भोपाली, शहजाद अहमद और इब्राहीम जौक़ के भी शेर पेश किए। अब चूँकि सारे शेर यहाँ हाज़िर नहीं किए जा सकते, इसलिए ज़ौक साहब के इस शेर के साथ कुलदीप जी की टिप्पणियों को इज़्ज़त बख्शते हैं। वैसे भी कुलदीप जी ने इस बार वही शेर पेश किए जिसमें "ज़ब्त" शब्द की आमद थी। बहादुर शाह ज़फ़र के दरबार की शोभा बढाने वाले ज़ौक साहब का शेर कुछ यूँ है:

ना करता ज़ब्त मैं गिरिया तो ऐ "जौक" इक घडी भर में
कटोरे की तरह घड़ियाल के गर्क आसमान होता

शामिख साहब कोई बात नहीं...देर आयद दुरूस्त आयद। जनाब असदुल्लाह खान ग़ालिब के इस शेर के साथ आपने जबरदस्त वापसी की है:

ऐ दिले-ना-आकिबतअंदेश ज़ब्त-ए-शौक़ कर
कौन ला सकता है ताबे-जल्वा-ए-दीदार-ए-दोस्त

फ़िराक़ साहब की पूरी गज़ल वैसे तो हमें खूब भायी लेकिन क्या करें पूरी गज़ल यहाँ पेश नहीं कर सकते इसलिए इसी शेर के साथ काम चला लेते हैं:

ख़बर है तुझको ऐ ज़ब्त-ए-मुहब्बत
तेरे हाथों में लुटता जा रहा हूँ

रचना जी, यह क्या, क्या कह रही हैं आप। हमारी इस महफ़िल में आने वाला कोई भी शख्स बड़ा या छोटा नहीं है। हम सब तो गज़लों के मुरीद हैं और इस नाते गज़ल-भाई या गज़ल-बहन हुए। तो फिर भाई-बहनों में क्या ऊँच-नीच। आप इसी तरह अपने शेरों के साथ हमारी महफ़िल की शोभा बढाते रहिए:

सारे गम जब्त करलूं एक सहारा तो दिया होता
चल पड़ता तेरी रह में एक इशारा तो दिया होता

दर्पण जी, अब क्या कहें हम.....चूँकि आप गुलज़ार साहब के बहुत बड़े फ़ैन हैं इसलिए इस नाते तो हमारे दोस्त हुए। फिर आपको चैलेंज क्यों देना। हम तो यह चाहेंगे कि आप गुलज़ार साहब के बारे में अपना कुछ अनुभव लिख कर आवाज़ को hindyugm@gmail.com पर मेल कर दें। वह क्या है कि इस रविवार को हम गुलज़ार साहब पर एक आलेख पेश करने वाले हैं, उनका जन्मदिन जो आ रहा है। आशा करते हैं कि आपकी इंट्री ज़रूर आएगी।

मनु जी, यह क्या.. आप आएँ और दर्पण जी को पहचान कर चल दिए। आपके शेर कहाँ गए?

मंजु जी, आपकी पंक्तियाँ भी खूबसूरत हैं:

दिल की बज्म में तेरी वफा का राज था .
जब्त कर लिया राज तूने
दिया बेवफा का साथ था

सुमित जी, आप देर हो गए, कोई बात नहीं, आए तो सही। यह रहा आपका शेर:

कमाल ऐ जब्त ऐ मोहब्बत इसी को कहते है,
तमाम उम्र जबान पर न उनका नाम आये।

हमारे कुछ उस्ताद महफ़िल में दिखे हीं नहीं जैसे अदा जी, दिशा जी, पूजा जी, नीलम जी। वहीं शरद जी आए तो लेकिन उन्होंने कोई शेर पेश नहीं किया। आखिर ऐसी नाराज़गी क्यों। उम्मीद करते हैं कि इस बार आप सब टिप्पणी करने में कोई कोताही नहीं बरतेंगे।

चलिए इतनी सारी बातों के बाद आप लोगों को अलविदा कहने का वक्त आ गया है। अगली महफ़िल तक के लिए खुदा हाफ़िज़!
प्रस्तुति - विश्व दीपक तन्हा



ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर मंगलवार और शुक्रवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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