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गुरुवार, 19 जनवरी 2017

चाहा था एक शख़्स को... कहकशाँ-ए-तलबगार में आशा की गुहार

महफ़िल ए कहकशाँ 19


आशा भोंसले और खय्याम 
दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है आशा भोंसले की आवाज़ में एक गज़ल, मौसिकार हैं खय्याम और कलाम है हसन कमाल का |  







मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी

शनिवार, 18 जुलाई 2015

"करोगे याद तो हर बात याद आएगी..." - आज यादें बशर नवाज़ के इस ग़ज़ल की

सभी पाठकों और श्रोताओं को ईद मुबारक



एक गीत सौ कहानियाँ - 63
 

'करोगे याद तो हर बात याद आएगी...' 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 64-वीं कड़ी में आज श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं जानेमाने शायर बशर नवाज़ को उनकी लिखी ग़ज़ल "करोगे याद तो हर बात याद आएगी..." के ज़रिए। बशर नवाज़ का हाल ही में निधन हो गया है। 

त 9 जुलाई 2015 को उर्दू के जानेमाने शायर बशर नवाज़ का महाराष्ट्र के औरंगाबाद में इन्तकाल हो गया है। फ़िल्मे संगीत की दुनिया में 79 वर्षीय बशर नवाज़ को 1982 की फ़िल्म ’बाज़ार’ के लिए लिखी उनकी ग़ज़ल "करोगे याद तो हर बात याद आएगी..." के लिए याद किया जाता रहेगा। इसके अलावा ’लोरी’, ’जाने वफ़ा’ और ’तेरे शार में’ जैसी फ़िल्मों के लिए भी उन्होंने गाने लिखे और उनकी गीतों व ग़ज़लों को आवाज़ देनेवाली आवाज़ों में शामिल हैं लता मंगेशकर, आशा भोसले, मोहम्मद रफ़ी, ग़ुलाम अली, भूपेन्द्र और तलत अज़ीज़। बशर नवाज़ ने कई रेडियो नाटक लिखे और दूरदर्शन के मशहूर धारावाहिक ’अमीर ख़ुसरो' की पटकथा भी लिखी। फ़िल्म और टेलीविज़न की दुनिया के बाहर बशर नवाज़ एक उम्दा शायर और आलोचक भी थे। समकालीन शायर निदा फ़ाज़ली का कहना है कि बशर नवाज़ हमेशा उनके समकालीन शायरों की रचनात्मक आलोचना के लिए जाने जाएँगे। 18 अगस्त 1935 को जन्मे बशर नवाज़ ने अपनी 80 साल की ज़िन्दगी में उर्दू साहित्य को समृद्ध करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके इस योगदान के लिए उन्हें पुलोत्सव सम्मान से समानित किया गया है। साल 2010 में फ़िल्मकार जयप्रसाद देसाई ने ’ख़्वाब ज़िन्दगी और मैं’ शीर्षक से बशर नवाज़ की जीवनी पर एक फ़िल्म का निर्माण किया था। देसाई साहब का कहना है कि "बशर" शब्द का अर्थ है आम आदमी, और बशर नवाज़ वाक़ई आम आदमी के शायर थे जिनकी शयरी में आम आदमी की ज़िन्दगी का संघर्ष झलकता है। बशर नवाज़ बहुत ही नम्र स्वभाव के थे। एक बार तो गेटवे ऑफ़ इण्डिया पर एक कार्यक्रम के दौरान एक अशिक्षित ने उन्हें न पहचानते हुए उनसे उनकी पहचान पूछ ली, जबकि वो उस कार्यक्रम के केन्द्रबिन्दु थे।


और अब यादें "करोगे याद तो..." ग़ज़ल की। फ़िल्म ’बाज़ार’ में संगीतकार थे ख़य्याम। मुस्लिम सब्जेक्ट पर बनने वाली इस फ़िल्म के लिए यह तय हुआ कि इसके गीतों को फ़िल्मी गीतकारों से नहीं बल्कि उर्दू साहित्य के शायरों से लिखवाए जाएँगे। ख़य्याम साहब के शब्दों में, "वो हमारी फ़िल्म आपको याद होगी, बाज़ार! तो उसमें सागर सरहदी साहब हमारे मित्र हैं, दोस्त हैं, तो ऐसा सोचा सागर साहब ने कि ख़य्याम साहब, आजकल का जो संगीत है, उस वक़्त भी, बाज़ार के वक़्त भी, हल्के फुल्के गीत चलते थे। तो उन्होंने कहा कि कुछ अच्छा आला काम किया जाए, अनोखी बात की जाए! तो सोचा गया कि बड़े शायरों का कलाम इस्तेमाल किया जाए फ़िल्म संगीत में। तो मैं दाद दूँगा कि प्रोड्युसर-डिरेक्टर चाहते हैं कि ऊँचा काम, शायद लोगों की समझ में ना आए। लेकिन उन्होंने कहा कि आपने बिल्कुल ठीक सोचा है। तो जैसे मैं आपको बताऊँ कि मीर तक़ी मीर साहब, बहुत बड़े शायर, इतने बड़े कि मिर्ज़ा ग़ालिब साहब ने अपने कलाम में उनका ज़िक्र किया है कि वो बहुत बड़े शायर हैं। तो उनका कलाम हमने इस्तेमाल किया, "दिखाई दिए यूं..."। फिर मिर्ज़ा शौक़, एक मसनबी है ज़हर-ए-इश्क़, बहुत बड़ी है, एक किताब की शक्ल में, तो उसमें से एक गीत की शक्ल में, ज़हर-ए-इश्क़, "देख लो आज हमको जी भर के..."। फिर मख़्दुम मोहिउद्दीन, "फिर छिड़ी रात बात फूलों की...", यह उनकी बहुत मशहूर ग़ज़ल है।" मीर तक़ी मीर और मिर्ज़ा शौक़ 18 और 19 वीं सदी के शायर थे तो मख़्दुम मोहिउद्दीन भी 20-वीं सदी के शुरुआती सालों से ताल्लुक रखते थे। इन शायरों की ग़ज़लों के साथ अगर आज के दौर के किसी शायर की ग़ज़ल का शुमार किया जाए तो मानना पड़ेगा कि इस शायर में ज़रूर कोई बात होगी। फ़िल्म ’बाज़ार’ के चौथे शायर के रूप में चुना गया बशर नवाज़ को और उनकी ग़ज़ल "करोगे याद तो हर बात याद आएगी..." को फ़िल्म के एक सिचुएशन पर ढाल दिया गया। ख़य्याम साहब के शब्दों में, "बहुत मशहूर ग़ज़ल है बशर नवाज़ साहब की, और बहुत अच्छे शायर हैं, आज के शायर हैं, और भूपेन्द्र ने बहुत अच्छे अंदाज़ में गाया है इसे"। फ़िल्म ’बाज़ार’ के रिलीज़ के 13 साल बाद इस ग़ज़ल को एक बार फिर से ’सादगी’ नामक ऐल्बम में शामिल किया गया, जिसमें ख़य्याम साहब के साथ-साथ अन्य कई कम्पोज़र्स की ग़ज़लें शामिल हैं। आज बशर नवाज़ इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर चले गए हैं, पर उनकी याद हमें दिलाती रहेगी यह दिल को छू लेने वाली ग़ज़ल। उनकी कमी उर्दू साहित्य जगत को खलती रहेगी। "गली के मोड़ पे सूना सा कोई दरवाज़ा, तरसती आँखों से रास्ता किसी का देखेगा, निगाह दूर तलक जा के लौट आएगी..."। बशर नवाज़ को श्रद्धासुमन। लीजिए यही ग़ज़ल आप भी सुनिए। 

फिल्म - बाज़ार : 'करोगे याद तो हर बात याद आएगी...' : भूपेन्द्र : संगीत - खय्याम : शायर - बशर नवाज़ 



अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें soojoi_india@yahoo.co.in के पते पर। 


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




शनिवार, 19 जुलाई 2014

"मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों?" वाक़ई कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ हमारे आसपास है...


एक गीत सौ कहानियाँ - 36
 

‘तेरा हिज्र मेरा नसीब है...’



'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारी जिन्दगी से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'। इसकी 36वीं कड़ी में आज जानिये फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' की ग़ज़ल "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." के बारे में



माल अमरोही निर्देशित 1983 की फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह से पिटी पर हेमा मालिनी-धर्मेन्द्र अभिनीत इस फ़िल्म को इसकी पटकथा, संवाद और निर्देशन के लिए आज भी याद किया जाता है और याद किया जाता है इस फ़िल्म के सुमधुर गीतों और ग़ज़लों को भी। ख़य्याम द्वारा स्वरबद्ध फ़िल्म के गीतों को लिखने का कार्यभार जाँनिसार अख़्तर को सौंपा गया था, पर सभी गीत पूरे होने से पहले ही वो चल बसे जिस वजह से फ़िल्म के शेष दो गीत शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली से लिखवाये गये। लता मंगेशकर का गाया "ऐ दिल-ए-नादान..." सर्वाधिक लोकप्रिय गीत रहा इस फ़िल्म का, जो कि ख़य्याम साहब की सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में से एक है और लता जी के पसन्दीदा गीतों में भी इसका शुमार होता है। लता की ही आवाज़ में "जलता है बदन..." भी काफ़ी सुना गया, पर "ख़्वाब बन कर कोई आयेगा..." ज़्यादा चर्चा में नहीं रहा। अन्य दो गीत "हरियाला बन्ना आया रे..." (आशा भोसले, जगजीत कौर) और "ऐ ख़ुदा शुक्र तेरा..." (महेन्द्र कपूर, भूपेन्द्र) भी ज़्यादा ध्यान आकर्षित नहीं कर पाए। पर इस फ़िल्म में दो ग़ज़लें ऐसी थीं जिनमें एक अलग ही बात थी। अलग बात इसलिए कि इनके गायक थे कब्बन मिर्ज़ा जिन्हें उस समय कोई नहीं जानता था और उनकी अलग हट कर आवाज़ ने इन दो ग़ज़लों को एक अलग ही जामा पहनाया। "आई ज़ंजीर की झनकार ख़ुदा ख़ैर करे..." और "तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है..." गाकर कब्बन मिर्ज़ा ने बहुत वाह-वाही लूटी। निदा फ़ाज़ली द्वारा लिखे फ़िल्म के दो गीत थे "हरियाला बन्ना आया रे..." और "तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है..."। 

कब्बन मिर्ज़ा
अब आते हैं कब्बन मिर्ज़ा पर। आख़िर कौन थे ये जनाब? इनकी आवाज़ तो इससे पहले किसी ने नहीं सुनी। और न ही इसके बाद फिर कभी सुनाई दी। कहाँ से आये और कहाँ ग़ायब हो गये पता ही नहीं चला। इन्टरनेट पर इनके बारे में बस यही लिखा गया है कि ये 'विविधभारती' के उद्‍घोषक हुआ करते थे। इसलिए कब्बन मिर्ज़ा के जीवन से जुड़ी और भी कुछ बातें मालूम करने के लिए जब मैंने 'विविधभारती' के वर्तमान लोकप्रिय उद्‍घोषक यूनुस ख़ान का सहारा लिया तो कब्बन साहब के बारे में कुछ और बातें जानने को मिली। कब्‍बन मिर्जा का ताल्‍लुक लखनऊ से था। वो 'विविधभारती' में उदघोषक नहीं बल्कि 'प्रोग्राम असिस्‍टेन्‍ट' थे। और आवाज़ अच्छी होने की वजह से प्रोग्राम भी करते थे। 'संगीत सरिता' से वो शुरूआत से जुड़े रहे थे। मुहर्रम में मर्सिए वग़ैरह गाते थे। 'विविधभारती' में उनका सबसे अहम योगदान रहा 'संगीत सरिता' का शुरूआती स्‍वरूप और उसे लोकप्रियता देना, जिसमें पहले किसी राग के बारे में बताया जाता, फिर उसका चलन, और फिर उस पर आधारित शास्‍त्रीय और फिल्‍मी रचना। ये क्‍लासिकल स्‍वरूप उन्‍हीं ने बनाया। बाद में इसे इंटरव्‍यू बेस्‍ड कर दिया गया। वो अस्‍सी के दशक के दौरान विविधभारती से रिटायर हुए। और फिर मुंबई के उपनगर मुंब्रा में रहते रहे। उनके एक (या शायद दोनों) बेटे सऊदी अरब के एक मशहूर रेडियो स्‍टेशन से जुड़े हैं। इन्टरनेट पर उनका जन्म 1937-38 बताया गया है। उन्हें गले का कैन्सर हो गया था पर उनकी मृत्यु के बारे में ठीक-ठीक कहीं कुछ लिखा नहीं गया है, पर कुछ वेबसाइट में 'Late Kabban Mirza' कह कर उल्लेख है।

ख़य्याम
अब सवाल यह है कि फ़िल्म 'रज़िया सुल्तान' के इन दोनो ग़ज़लों को गाने के लिए कब्बन मिर्ज़ा कैसे चुने गये। 'रज़िया सुल्तान' फ़िल्म दिल्ली की एकमात्र महिला सुल्तान रज़िया सुल्तान (1205-1240) के जीवन पर आधारित थी और इसमें शामिल है उनके ऐबिसिनियन ग़ुलाम जमाल-उद्दीन याकुत (धर्मेन्द्र द्वारा निभाया चरित्र) के साथ प्रेम-सम्बन्ध भी। जमाल एक बहुत बड़ा सिपहसालार है, जो जब भी कभी वक़्त मिलता है, थोड़ा गा लेता है अपनी मस्ती में, पर वो कोई गायक नहीं है। ऐसे किरदार के पार्श्वगायन के लिए कमाल अमरोही ने ख़य्याम के सामने अपनी फ़रमाइश रख दी कि उन्हें ये दो ग़ज़लें किसी ऐसे गायक से गवानी है जो गायक नहीं है पर थोड़ा बहुत गा लेता है। ऐसे में ख़य्याम साहब के लिए बड़ी कठिनाई हो गई कि उन्हें कोई इस तरह का गायक न मिले। अब यह हुआ कि पूरे हिन्दुस्तान से 50 से भी ज़्यादा लोग आये और सब आवाज़ों में यह हुआ कि लगा कि वो सब मंझे हुए गायक हैं। किसी की भी आवाज़ में वह बात नज़र नहीं आयी जिसकी कमाल अमरोही को तलाश थी। ऐसे ही कब्बन मिर्ज़ा भी आये अपनी आवाज़ को आज़माने। ख़य्याम, उनकी पत्नी और गायिका जगजीत कौर और कमाल अमरोही, तीनो ने उन्हें सुना। जब कब्बन मिर्ज़ा से यह पूछा गया कि उन्होंने कहाँ से गायन सीखा, तो उनका जवाब था कि उन्होंने कहीं से नहीं सीखा। किस तरह के गाने आप गा सकते हैं, पूछने पर कब्बन साहब लोकगीत सुनाते चले जा रहे थे। वो तीनों मुश्किल में पड़ गये क्योंकि उनकी ज़रूरत थी एक ऐसे शख्स की जो गायक न हो पर ग़ज़ल गा सके! अत: कब्बन मिर्ज़ा भी रिजेक्ट हो गये। पर अगली सुबह कमाल साहब का ख़य्याम साहब को टेलीफ़ोन आया कि आप फ़्री हैं तो अभी आप तशरीफ़ लायें। नाश्ता उनके साथ हुआ। नाश्ता हुआ तो कमाल साहब कहने लगे कि रात भर मुझे नींद नहीं आई, यह जो आवाज़ है जो हमने कल सुनी कब्बन मिर्ज़ा की, यही वह आवाज़ है जिसकी तलाश मैं कर रहा था। ख़य्याम चौंक कर बोले, "कमाल साहब, लेकिन उनको गाना तो आता नहीं!" तो कमाल अमरोही ने ख़य्याम का हाथ पकड़ कर बोले, "ख़य्याम साहब, आप मेरे केवल मौसीकार ही नहीं हैं, आप तो मेरे दोस्त भी हैं। प्लीज़ आपको मेरे लिए यह करना है, मुझे इन्ही की आवाज़ चाहिये।" फिर क्या था, शुरू हुई कब्बन मिर्ज़ा की संगीत शिक्षा। ख़य्याम साहब ने उन्हे तीन-चार महीने स्वर और ताल का ज्ञान दिलवाया और उसके बाद गाने की रेकॉर्डिंग शुरू हुई। अक्सर यह होता है कि रेकॉर्डिंग के वक़्त म्युज़िक डिरेक्टर रेकॉर्डिंग करवाता है अपने रेकॉर्डिस्ट से, और असिस्टैण्ट जो होते हैं वो ऑरकेस्ट्रा संभालते हैं। पर उस दिन क्योंकि कब्बन मिर्ज़ा नये थे, गा नहीं पा रहे थे, इसलिए ख़य्याम साहब ने जगजीत कौर को भेजा रेकॉर्डिंग पर, असिस्टैण्ट को भी अन्दर भेजा, और ख़ुद कंडक्ट किया। इस तरह से रेकॉर्ड हुआ कब्बन मिर्ज़ा का गाया "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..."।

निदा फ़ाज़ली
शायर और गीतकार निदा फ़ाज़ली के लिए भी यह ग़ज़ल उतनी ही महत्वपूर्ण थी। उन्हीं के शब्दों में - "देखिये, पटना, बिहार, अज़ीमाबाद के एक शायर हुए हैं शाद अज़ीमाबादी। उनकी एक लाइन है कि "मैं ख़ुद आया नहीं, लाया गया हूँ"। जैसा कि मैंने पहले कहा कि चॉयस का इख़्तियार ज़िन्दगी में होता नहीं है। जहाँ आप पैदा हुए, वह आपका परिवार, उस परिवार की जो भाषा वही आपकी भाषा, वह परिवार जिस मोहल्ले में, वही आपका मोहल्ला, वह मोहल्ला जिस नगर में, वह आपका नगर; मेरे साथ भी यही हुआ कि बिना पूछे पैदा कर दिया गया, और मैं ये तमाम बोझ लिए गधे की तरह ज़िन्दगी के सफ़र में घूमता रहा। जब घर छीना गया तो घर की तलाश में पूरे देश में भटकता रहा, यह भी बेवकूफ़ी थी। मालूम पड़ा एक पड़ाव बम्बई आया है, उस ज़माने में धरमवीर भारती एक यहाँ थे, उनके 'धर्मयुग' में लिखना शुरू कर दिया। फिर 'ब्लिट्ज़' में लिखना शुरू कर दिया। एक दिन बेघर एक शख़्स जिसका नाम निदा फ़ाज़ली था, उसके लिए मैसेज रखी हुई थी हर जगह, जहाँ वह काम कर रहा था थोड़ा-थोड़ा, कहीं 'धर्मयुग' में पड़ी हुई है, कहीं 'ब्लिट्ज़' में पड़ी हुई है, कहीं किसी रेडियो स्टेशन में पड़ी हुई है, और उस मैसेज में लिखा हुआ था "मैं आप से मिलना चाहता हूँ, आप मुझसे आ कर मिलिये, मुझे आप से कुछ काम लेना है - कमाल अमरोही"। मैंने सोचा कि मेरा कमाल अमरोही से क्या काम हो सकता है! मैं उनसे मिलने चला गया। कमाल साहब मिले करीब 2 बजे, वो स्टाइलिश आदमी थे कमाल साहब, वो एक लफ़्ज़ अंग्रेज़ी का नहीं बोलते थे, और वो भाषा बोलते थे जो आज से 50 साल पहले अमरोहा में बोली जाती थी। मैं वह भाषा बम्बई आकर भूल गया। मैंने कहा, "कमाल साहब, आदाब अर्ज़ है, मेरा नाम निदा फ़ाज़ली है"। बोले, "तशरीफ़ रखिये, मैंने आपको इसलिए याद फ़रमाया है कि मुझे एक मुकम्मल शायर की ज़रूरत है"। मैंने कहा कि मैं हाज़िर हूँ और इस इज़्ज़त-अफ़ज़ाई के लिए शुक्रिया कि आप मुझे मुकम्मल शायर समझ रहे हैं। बोले, "जी, मुझे आप से कुछ नग़मात तहरीर करवाने है"। मैं कहा कि मैं हाज़िर हूँ साहब, आप बताइये कि कैसा गाना है, क्या लिखना है। बोले कि इससे पहले कि आप गाना लिखें, एक बात मैं जाहिर कर देना चाहता हूँ कि इल्मी शायरी अलग होती है और फ़िल्मी शायरी अलग होती है, और फ़िल्मी शायरी लिखने के लिए आपको मेरी मिज़ाज की शिनाख़्त बहुत ज़रूरी है; जाँ निसार अख़्तर मेरे मिज़ाज को पहचान गये थे, अल्लाह को प्यारे हो गये। मैंने कहा कि मैं यह शर्त तो पूरी नहीं करने वाला, कोशिश करूंगा कि आपके मिज़ाज का कुछ लिखूँ। तो उन्होंने सिचुएशन सुनाई, अपनी ज़ुबान में सुनाई तो थोड़ी देर के लिए मैं भी हिल गया। कहने लगे, "हमारी दास्तान उस मुकाम पर आ गई जहाँ मलिका-ए-आलिआ रज़िया सुल्तान, यानी हेमा मालिनी, सियाहा लिबास में ख़रामा-ख़रामा चली आ रही है, जिसे देख कर हमारा आलेया कासी ख़ैरमक़दम के लिए आगे बढ़ा। मैं थोड़ी देर बैठा रहा, फिर उनके असिस्टैन्ट ने कहा कि इसका मतलब यह है कि हेमा मालिनी सफ़ेद घोड़े पर काले लिबास पहने आ रही हैं, और आलेया कासी यानी कैमरा उनकी तरफ़ मूव हो रहा है। तो मैंने आख़िर के दो गीत उस फ़िल्म के लिए लिखे।" 

"तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." ग़ज़ल में कुछ ऐसी बात है कि जिसे एक बार सुनने के बाद एक और बार सुनने का मन होता है। कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ में एक ऐसा आकर्षण है कि जो सीधे दिल में उतर जाता है। यह उपहास ही है कि ऐसी मोहक आवाज़ के धनी कब्बन मिर्ज़ा गले के कैन्सर से आक्रान्त हो कर इस दुनिया से चल बसे। पर जैसा कि इस ग़ज़ल की दूसरी लाइन में कहा गया है कि "मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है", वैसे ही कब्बन मिर्ज़ा भले इस दुनिया में नहीं हैं, पर उनकी गायी हुई 'रज़िया सुल्तान' की इन दो ग़ज़लों ने उनकी आवाज़ को अमर कर दिया है, जो हमेशा हमारे साथ रहेगी। बस इतनी सी थी यह दास्तान। लीजिए, कब्बन मिर्जा की आवाज़ में वह गाना आप भी सुनिए।

फिल्म - राजिया सुल्तान : "तेरा हिज्र मेरा नसीब है..." : स्वर - कब्बन मिर्ज़ा : संगीत - खय्याम : गीतकार - निदा फाजली  





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

रविवार, 12 सितंबर 2010

काहे को ब्याही बिदेस रे सुन बाबुल मोरे...क्या लता की आवाज़ में सुना है कभी आपने ये गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 481/2010/181

'ओल्ड इज़ गोल्ड' के दोस्तों नमस्कार! लता मंगेशकर एक ऐसा नाम है जो किसी तारीफ़ की मोहताज नहीं। ये वो नाम है जो हम सब की ज़िंदगियों में कुछ इस तरह से घुलमिल गया है कि इसे हम अपने जीवन से अलग नहीं कर सकते। और अगर अलग कर भी दें तो जीवन बड़ा ही नीरस हो जाएगा, कड़वाहट घुल जाएगी। लता जी की आवाज़ इस सदी की आवाज़ है और इस बात में ज़रा सी भी अतिशयोक्ति नहीं। फ़िल्म संगीत के लिए वरदान है उनकी आवाज़ क्योंकि उन जैसी आवाज़ हज़ारों सालों में एक ही बार जन्म लेती है। लता जी के गाए हुए लोकप्रिय गानों की फ़ेहरिस्त बनाने बैठें तो शायद जनवरी से दिसंबर का महीना आ जाएग। युं तो उनके असंख्य लोकप्रिय और हिट गीत हम रोज़ाना सुनते ही रहते हैं, लेकिन उनके गाए बहुत से ऐसे गानें भी हैं जो बेहद दुर्लभ हैं, जो कहीं से भी आज सुनाई नहीं देते, और शायद वक़्त ने भी उन अनमोल गीतों को भुला दिया है। लेकिन जो लता जी के सच्चे भक्त हैं, वो अपनी मेहनत से, अपनी लगन से, और लता जी के प्रति अपने प्यार की वजह से इन भूले बिसरे दुर्लभ गीतों को खोज निकालते रहते हैं। ऐसे ही एक लता भक्त हैं नागपुर के श्री अजय देशपाण्डेय। 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के पुराने दोस्तों को याद होगा कि पिछले साल करीब करीब इसी समय हमने लता जी के दुर्लभ गीतों पर एक शृंखला आयोजित की थी 'मेरी आवाज़ ही पहचान है', जिसके लिए १० दुर्लभ गानें चुन कर हमें भेजे थे अजय जी ने। तो हमने सोचा कि इस साल भी लता जी के जनमदिन के आसपास क्यों ना फिर एक बार कुछ और बेहद दुर्लभ गीतों के ज़रिए लता जी को हैप्पी बर्थडे कहा जाए! इसलिए हम एक बार फिर से अजय जी के शरण में गए और उन्होंने बड़ी ख़ुशी ख़ुशी हमें सहयोग दिया और हमें भेजे लता जी के गाए १० दुर्लभतम गीत। तो लीजिए आज से अगले १० अंकों में सुनिए स्वरसाम्राज्ञी लता मंगेशकर के गाए १० भूले बिसरे और बेहद दुर्लभ गीत 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की नई लघु शृंखला 'लता के दुर्लभ दस' में। दोस्तों, इस शृंखला में हम लता जी की तारीफ़ नहीं करेंगे, क्योंकि यह केवल वक़्त की बरबादी ही होगी। हम बात करेंगे इन भूले बिसरे गीतों की, उन गीतों के फ़िल्मों से जुड़े अन्य कलाकारों की, और कुछ रोचक तथ्यों की। हमने इस शृंखला के लिए जो शोधकार्य किया है अलग अलग सूत्रों से, उम्मीद है ये जानकारियाँ आप के लिए नई होंगी और आप इसका भरपूर आनंद उठाएँगे।

'लता के दुर्लभ दस' शृंखला की पहली कड़ी के लिए हमने जो गीत चुना है, या युं कहें कि अजय देशपाण्डेय जी ने चुना है, वह है सन् १९४८ की फ़िल्म 'हीर रांझा' का। इस फ़िल्म का निर्माण किया था पंजाब फ़िल्म कार्पोरेशन ने और इसका निर्देशन किया था वली साहब ने। ग़ुलाम मोहम्मद, मुमताज़ शांति, अज़ीज़, रूप कमल और मंजु अभिनीत इस फ़िल्म में संगीतकार थे अज़ीज़ ख़ान और शर्माजी-वर्माजी। पंकज राग की किताब 'धुनों की यात्रा' के अनुसार शर्माजी-वर्माजी की जोड़ी के शर्माजी और कोई नहीं बल्कि ख़य्याम ही हैं। अज़ीज़ ख़ान ४० के दशक के कमचर्चित संगीतकारों में से एक थे। १९४६ में बसंत पिक्चर्स की स्टण्ट फ़िल्म 'फ़्लाइंग् प्रिन्स' में उन्होंने संगीत दिया था, पर फ़िल्म नहीं चली। इसी साल रुख़साना पिक्चर्स की फ़िल्म 'पण्डितजी' में भी उनका संगीत था लेकिन एक बार फिर फ़िल्म पिट गई और संगीत भी अनसुना रह गया। अगले साल, यानी १९४७ में अज़ीज़ ख़ान ने 'इंतज़ार के बाद' में संगीत दिया जिसमें उन्होंने ज़ीनत बेग़म से कुछ लोकप्रिय गानें गवाए थे। १९४८ में 'हीर रांझा' में शर्माजी-वर्माजी के साथ उनका संगीत सही मायनों में उत्कृष्ट था। इस फ़िल्म में लता मंगेशकर और जी. एम. दुर्रानी के गाए युगल गीत थे, गीता रॊय और दुर्रानी के भी युगल गीत थे। पर सब से उल्लेखनीय गीत इस फ़िल्म का शायद लता और साथियों की आवाज़ों में ख़ुसरो की पारम्परिक रचना "काहे को ब्याही बिदेस रे सुन बाबुल मोरे" था जिसे आज आप इस महफ़िल में सुनने जा रहे हैं। यह वाक़ई ताज्जुब की बात है कि लता के गाए ४० के दशक के लोकप्रिय गानों में इस गीत का शुमार कभी नहीं हुआ, इस गीत को क्यों नज़रंदाज़ कर दिया गया यह सचमुच आलोचना का विषय है। और मज़े की बात तो यह है कि यही शर्माजी, जो बाद में ख़य्याम के नाम से जाने गए, उन्होंने इसी गीत को तीन दशक बाद अपनी महत्वाकांक्षी फ़िल्म 'उमरावजान' में अपनी पत्नी जगजीत कौर से गवाकर कालजयी कर दिया। लेकिन लता के गाए इस गीत की तरफ़ किसी का भी ध्यान नहीं गया। वैसे इस गीत की जो धुन है, वह उस पारम्परिक उत्तर प्रदेश के लोक धुन से बिलकुल अलग है जिस धुन में आमतौर पर इस विदाई गीत को गाया जाता है। ख़ैर, अज़ीज़ ख़ान की बात करें तो फिर उन्होंने गुलशन सूफ़ी, ज़ेड शरमन और ख़ान मस्ताना के साथ मिल कर १९५२ की फ़िल्म 'ज़माने की हवा' में संगीत तो दिया था, लेकिन फिर एक बार उन्हें नाकामयाबी ही हासिल हुई। तो लीजिए अब सुनते हैं लता जी और साथियों की आवाज़ों में फ़िल्म 'हीर रांझा' का यह विदाई गीत। अगर आज से पहले आप ने इस गीत को एक बार भी सुना हुआ है तो टिप्पणी में ज़रूर लिखिएगा। यह लता जी के दुर्लभतम गीतों में से एक है!



क्या आप जानते हैं...
कि सन् १९३२ में 'हीर रांझा' नाम से एक फ़िल्म बनी थी जो ए. आर. कारदार की पहली निर्देशित बोलती फ़िल्म थी।

विशेष सूचना:

लता जी के जनमदिन के उपलक्ष पर इस शृंखला के अलावा २५ सितंबर शनिवार को 'ईमेल के बहाने यादों के ख़ज़ानें' में होगा लता मंगेशकर विशेष। इस लता विशेषांक में आप लता जी को दे सकते हैं जनमदिन की शुभकामनाएँ बस एक ईमेल के बहाने। लता जी के प्रति अपने उदगार, या उनके गाए आपके पसंदीदा १० गीत, या फिर उनके गाए किसी गीत से जुड़ी आपकी कोई ख़ास याद, या उनके लिए आपकी शुभकामनाएँ, इनमें से जो भी आप चाहें एक ईमेल में लिख कर हमें २० सितंबर से पहले oig@hindyugm.com के पते पर भेज दें। हमें आपके ईमेल का इंतज़ार रहेगा।


अजय देशपांडे जी ने लता जी के दुर्लभ गीतों को संगृहीत करने के उद्देश्य से एक वेब साईट का निर्माण किया है, जरूर देखिये यहाँ.

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. यह उसी गीतकार का लिखा हुआ गीत है जिनके एक अन्य गीत को गा कर १९४९ में लता ने अपनी पहली ज़बरदस्त कामयाबी हासिल की थीं। गीतकार पहचानिए। २ अंक।
२. यह उसी संगीतकार की रचना है जिन्होंने लता से उनका पहला एकल प्लेबैक्ड गीत गवाया था। फ़िल्म का नाम बताएँ। ३ अंक।
३. इस फ़िल्म में सुरेन्द्र और गीता रॊय के ही अधिकतर गानें हैं। १९४८ की इस फ़िल्म के निर्देशक का नाम बताएँ। २ अंक।
४. गीत के मुखड़े में उस शब्द का ज़िक्र है जिस शब्द से लता का १९४९ की एक बेहद मशहूर फ़िल्म का एक गीत शुरु होता है जिसे हसरत जयपुरी ने लिखा था। गीत का मुखड़ा पहचानिए। ४ अंक।


पिछली पहेली का परिणाम -
प्रतिभा जी अवध जी और पवन जी को खास बधाई, सही जवाब के लिए, इंदु जी चूक गयी न आप :)

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

फिर छिड़ी रात बात फूलों की......तलत अज़ीज़ और खय्याम से सुनिए इस गज़ल के बनने की कहानी

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 460/2010/160

ये महकती ग़ज़लें इन दिनों आप सुन रहे हैं 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर लघु शृंखला 'सेहरा में रात फूलों की' के तहत। 'सेहरा में रात फूलों की, जैसा कि आप में से बहुतों को मालूम ही होगा मशहूर शायर मख़्दूम महिउद्दिन की एक मशहूर ग़ज़ल के एक शेर का हिस्सा है, जिसे हमने इस शृंखला के शीर्षक के लिए चुना। क्यों चुना, शायद यह हमें अब बताने की ज़रूरत नहीं। ८० के दशक के संगीत का जो चलन था, उस लिहाज़ से ये ग़ज़लें सेहरा में फूलों भरी रात की तरह ही तो हैं। ख़ैर, आज इस शृंखला की अंतिम कड़ी में मख़्दूम के इसी ग़ज़ल की बारी, जिसे फ़िल्म 'बाज़ार' के लिए स्वरबद्ध किया था ख़य्याम साहब ने। और यह ख़य्याम साहब के संगीत में इस शृंखला की चौथी ग़ज़ल भी है, जैसा कि हमने आप से वादा किया था। फ़िल्म 'बाज़ार' के सभी ग़ज़लें कंटेम्पोररी शायरों की ग़ज़लें हैं। ऐसा कैसे संभव हुआ आइए जान लेते हैं ख़य्याम साहब से जो उन्होने विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम में कहे थे। "वो हमारी फ़िल्म आपको याद होगी, 'बाज़ार'। उसमें ये सागर सरहदी साहब हमारे मित्र हैं, दोस्त हैं, तो ऐसा सोचा सागर साहब ने कि 'ख़य्याम साहब, आजकल का जो संगीत है, उस वक़्त भी, 'बाज़ार' के वक़्त भी, हल्के फुल्के गीत चलते थे। तो उन्होने कहा कि कुछ अच्छा आला काम किया जाए, अनोखी बात की जाए। तो सोचा गया कि बड़े शायरों के कलाम इस्तेमाल किए जाएँ फ़िल्म संगीत में। तो मैं दाद दूँगा कि प्रोड्युसर डिरेक्टर चाहते हैं कि ऊँचा काम हो। हो सकता है कि शायद लोगों की समझ में ना आए। लेकिन उन्होने कहा कि आप ने बिलकुल ठीक सोचा है। तो जैसे मैं आपको बताऊँ कि मीर तक़ी मीर ("दिखाई दिए युं के बेख़ुद किया"), मिर्ज़ा शौक़ ("देख लो आज हमको जी भर के"), बशीर नवाज़ ("करोगे याद तो हर बात याद आएगी"), इन सब को इस्तेमाल किया। फिर मख़्दूम मोहिउद्दिन, "फिर छिड़ी रात बात फूलों की", यह उनकी बहुत मशहूर ग़ज़ल है, और मख़्दूम साहब के बारे में कहूँगा कि बहुत ही रोमांटिक शायर हुए हैं। और हमारे हैदराबाद से ताल्लुख़, और बहुत रेवोल्युशनरी शायर। जी हाँ, बिलकुल, अपने राइटिंग में भी, और अपने किरदार में भी। वो एक रेवोल्युशनरी, वो चाहते थे कि हर आम आदमी को उसका हक़ मिले" तो दोस्तों, इसी ग़ज़ल को आज हम आपको सुनवा रहे हैं जिसे युगल आवाज़ें दी हैं लता जी और मशहूर ग़ज़ल गायक तलत अज़ीज़ ने। फूलों पर लिखी गई ग़ज़लों में मेरे ख़याल से इससे ख़ूबसूरत ग़ज़ल कोई और नहीं।

फ़िल्म 'बाज़ार' की तमाम जानकारियाँ हमने आपको 'दस गीत समानांतर सिनेमा के' शृंखला में दी थी और 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की रवायत है कि यहाँ हर अंक नया होता है, किसी दोहराव की कम से कम अब तक कोई गुंजाइश नहीं हुई है। तो ऐसे में यहाँ आपको इसी ग़ज़ल के बारे में कुछ और बातें बता दी जाए। ये बातें कही है ख़ुद तलत अज़ीज़ साहब ने फ़ौजी जवानों के लिए प्रसारित 'विशेष जयमाला' कार्यक्रम में। "ख़य्याम साहब का नाम तो आपने सुना ही होगा। बहुत ही बड़े संगीतकार हैं। एक बार उन्होने मुझे मुंबई के एक प्राइवेट महफ़िल में गाते हुए सुना और उन्होने कहा कि मैं आपको जल्द से जल्द फ़िल्म में गवाउँगा। मैंने सोचा कि ऐसे ही उन्होने कह दिया होगा, कहाँ मुझे फ़िल्म में गाने देंगे! लेकिन उन्होने मुझे जल्द ही बुलाया और मैंने उनके लिए गाया और वो गीत काफ़ी मक़बूल हुआ। लेकिन अब मैं आपको वो गीत नहीं सुनवाउँगा। मैं आपको अब फ़िल्म 'बाज़ार' का वो डुएट ग़ज़ल सुनवाउँगा जिसे मैंने लता जी के साथ गाया था। मुझे याद है जब मैं इस गाने की रेकॊर्डिंग् के लिए स्टुडियो पहुँचा तो लता जी वहाँ ऒलरेडी पहुँच चुकी थीं। मैं इतना नर्वस हो गया कि पूछिए मत। उनके साथ यह मेरा पहला गीत था। मैंने उनसे कहा कि लता जी, अगर मुझसे कोई ग़लती हो जाए तो माफ़ कर दीजिएगा। लता जी ने कहा कि क्या बात कर रहे हैं, आप तो बहुत अच्छा गाते हैं। मैंने पूछा कि आपने मुझे सुना है, तो वो बोलीं कि हाँ, मैंने आपकी गाई हुई ग़ज़ल सुनी है। तब जाकर मुझमें कॊन्फ़िडेन्स आया और यह ग़ज़ल रेकॊर्ड हुआ।" तो दोस्तों, आपको यह बताते हुए कि इस ग़ज़ल और इस अंक के साथ इस लघु शॄंखला का समापन हो रहा है, आपको यह शृंखला कैसी लगी हमें ज़रूर लिखिएगा oig@hindyugm.com के पते पर। रविवार से एक नई लघु शृंखला के साथ हम फिर से हाज़िर होंगे, तब तक के लिए इजाज़त दीजिए, और आप सुनिए इस महकती हुई फूलों भरी ग़ज़ल को जिसके शेर हम नीचे लिख रहे हैं। चलते चलते शायराना अंदाज़ में यही कहते चलेंगे कि "अब तो जाते हैं मयक़दे से मीर, फिर मिलेंगे गर ख़ुदा लाया तो", ख़ुदा हाफ़िज़!

फिर छिड़ी रात, बात फूलों की,
रात है या बारात फूलों की।

फूल के हार, फूल के गजरे,
शाम फूलों की, रात फूलों की।

आपका साथ, साथ फूलों का,
आपकी बात, बात फूलों की।

फूल खिलते रहेंगे दुनिया में,
रोज़ निकलेगी बात फूलों की।

नज़रें मिलती हैं जाम मिलते हैं,
मिल रही हैं हयात फूलों की।

ये महकती हुई ग़ज़ल मख़्दूम,
जैसे सेहरा में रात फूलों की।



क्या आप जानते हैं...
कि तलत अज़ीज़ के सब से पसंदीदा संगीतकार हैं मदन मोहन। उन्होने यह 'जयमाला' कार्यक्रम ना केवल ये बात बताई बल्कि उनके स्वरबद्ध जिन दो गीतों को उसमें शामिल किया वो थे "वो भूली दास्ताँ लो फिर याद आ गई" (संजोग) और "जो हमने दास्ताँ अपनी सुनाई आप क्यों रोये" (वो कौन थी)।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. जिस गीतकार पर हमारी आगामी शृंखला है उनका जन्मदिन इसी माह में है, नाम बताएं - १ अंक.
२. आजादी से पूर्व घटी एक दुखद एतिहासिक घटना पर है फिल्म का शीर्षक, नाम बताएं- २ अंक.
३. आर डी बर्मन के संगीतबद्ध किये इस गीत में किस गायक की प्रमुख आवाज़ है - २ अंक.
४. मुखड़े में शब्द है "आफताब", इस फिल्म में गीतकार ने पठकथा और संवाद भी लिखे थे, निर्देशक बताएं- ३ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी, शरद जी, प्रतिभा जी और किशोर जी, सभी को बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मंगलवार, 10 अगस्त 2010

तेरा हिज्र मेरा नसीब है... जब कब्बन मिर्ज़ा से गवाया खय्याम साहब और कमाल अमरोही ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 458/2010/158

'रज़िया सुल्तान' कमाल अमरोही की एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी, लेकिन बदक़िस्मती से फ़िल्म असफल रही। हाँ फ़िल्म के गानें बेहद सराहे गए और आज इस फ़िल्म को केवल इसके गीतों और ग़ज़लों की वजह से ही याद किया जाता है। 'सेहरा में रात फूलों की' शृंखला में आज सुनिए हेमा मालिनी व धर्मेन्द्र अभिनीत सन् १९८३ की इसी फ़िल्म से एक ग़ज़ल कब्बन मिर्ज़ा की आवाज़ में। ख़य्याम साहब का संगीत और निदा फ़ाज़ली का क़लाम। दोस्तों, आज मैं ख़ुद कुछ नहीं बोलूँगा, आज बातें होंगी वो जो इस ग़ज़ल के बारे में आपको बताएँगे ख़ुद ख़य्याम और निदा साहब। पहले ख़य्याम साहब को मौका देते हैं। "कमाल अमरोही साहब, उनकी फ़रमाइश थी कि हमारा जो हीरो है, बहुत बड़ा वारियर, सिपह सालार है, वो कभी कभी, जब उसको वक़्त मिलता है, अकेला होता है, तब वो अपनी मस्ती में गाता है। और ये ऐसा है कि वो सिंगर नहीं है। तो बड़ी कठिन बात हो गई कि सिंगर ना मिले कोई। अब ये हुआ कि पूरे हिंदुस्तान से ५० से उपर लोग आए और सब आवाज़ों में ये हुआ कि लगा कि वो सब सिंगर हैं। ऐसे ही कब्बन मिर्ज़ा भी आए। हम सब ने सुना उन्हे। मैं, जगजीत जी, कमाल साहब। फिर उनसे पूछा कि आपने कहाँ सीखा? उन्होने कहा कि मैंने कभी नहीं सीखा। कौन से गानें गा सकते हैं? तो वो सब लोक गीत सुना रहे थे। तो हम लोग मुश्किल में पड़ गए कि भई ये तो बड़ा कठिन काम है! तो हम लोगों ने उन्हे रिजेक्ट कर दिया था। अगले दिन कमाल साहब का टेलीफ़ोन आया कि आप फ़्री हैं तो अभी आप तशरीफ़ लाएँ। नाश्ता उनके साथ हुआ। नाश्ता हुआ तो कहने लगे कि रात भर मुझे नींद नहीं आई। कमाल साहब, क्या हुआ? ये जो आवाज़ है जो हमने कल सुनी कब्बन मिर्ज़ा की, यही वो आवाज़ है। मैंने कहा 'कमाल साहब, लेकिन उनको गाना तो आता नहीं'। तो कहने लगे 'ख़य्याम साहब, आप मेरे केवल मौसीकार ही नहीं हैं, आप तो मेरे दोस्त भी हैं। प्लीज़ आपको मेरे लिए यह करना है, मुझे इन्ही की आवाज़ चाहिए'। तो फिर इनको कुछ ३-४ महीने स्वर और ताल का ज्ञान दिलवाया, और उसके बाद गाने की रेकॊर्डिंग् शुरु हुई। अक्सर हम लोग ये करते हैं कि रेकॊर्डिंग् के वक़्त म्युज़िक डिरेक्टर रेकॊर्डिंग् करवाता है अपने रेकॊर्डिस्ट से। तो ऐसिस्टैण्ट जो होते हैं वो ऒरकेस्ट्रा सम्भालते हैं। तो उस दिन वो नए थे, गा नहीं पा रहे थे, तो मैंने जगजीत जी को यहाँ भेजा, रेकॊर्डिंग में, और ऐस्टैण्ट को बोला अंदर जाओ, और कण्डक्टिंग् मैंने की। युं गाना हुआ ये और इसे आप सुनाइए" (सौजन्य: संगीत सरिता, विविध भारती)। दोस्तों, लेकिन जैसा कि हमने आप से वादा किया था, पहले निदा साहब से भी तो उनके ख़यालात जान लें इस ग़ज़ल से जुड़ी हुई!

"बात दरअसल है कि जब घर से बेघर हो गया तो हर शहर एक सा हो गया। और मैं भटकता रहा। और उस वक़्त मसला, न सियासत था, न तासूत था, ना मुल्की तफ़सीम थी, सिर्फ़ मसला था रोटी की, कपड़ों की, और सर पे छत का। आम हिंदुस्तानी की ज़िंदगी में हर चीज़ बड़ी लेट आती है। मेरे साथ भी यही हुआ। जब मैं यहाँ बम्बई आया, तो ले दे के एक ही काम आता था कि क़लम से लिखना और अख़्बारों में छपवाना। मालूम पड़ा कि उस पीरियड में जगह जगह मैसेज मिलती था कि 'Mr Kamal Amrohi wants to meet Nida Fazli'। तो मैं सोच नहीं पाता था कि कमाल अमरोही, इतने मशहूर डिरेक्टर मुझसे क्यों मिलना चाहते हैं। बहरहाल मैं ज़रूरतमंद था और वो ज़रूरतें पूरी करने वाले डिरेक्टर थे। मैं पहुँच गया और जब पहुँचा तो मालूम पड़ा कि वो खाना खाने के बाद आधा घंटा आराम फ़रमाते हैं। बहरहाल उनके ऐसिस्टैण्ट ने मुझे इंतेज़ार करने को कहा। मैं गया तो ज़ाहिर है कि मैंने कहा कि 'अमरोही साहब, मैं हाज़िर हूँ, मेरा नाम निदा फ़ाज़ली है, आप ने मुझे याद किया'। बोले 'जी, तशरीफ़ रखिए, आप से कुछ नग़मात तहरीर करवाना है'। तो ऐसे नस्तारीख़ ज़बान, जो मैं पढ़ता था किताबो में, बम्बई में आके भूल गया था, तो उनके जुमले से। मैंने कहा मैं हाज़िर हूँ। उन्होने कहा कि एक बात का ख़याल रखिये, कि मुझे मुक़म्मल शायर की ज़रूरत है, लेकिन इस शर्त के साथ कि अदबी शायरी और होती है और फ़िल्मी शायरी और। अदबी शायरी के आपको मेरे मिज़ाज की शिनाख़्त बहुत ज़रूरी है। जाँ निसार अख़्तर मेरे मिज़ाज को पहचान गए थे, अल्लाह को प्यारे हो गए। मैंने कहा मैं यह शर्त पूरी करने वाला नहीं हूँ, लेकिन कोशिश करूँगा कि आपके मिज़ाज के मुताबिक़ गीत लिख सकूँ। मैंने वो ग़ज़ल लिखी थी "तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है"।

तेरा हिज्र ही मेरा नसीब है, तेरा ग़म ही मेरी हयात है,
मुझे तेरी दूरी का ग़म हो क्यों, तू कहीं भी हो मेरे साथ है।

मेरे वास्ते तेरे नाम पर, कोई हर्फ़ आए नहीं नहीं,
मगर मेरे रू-ब-रू तेरी ज़ात है, मेरे रू-ब-रू तेरी ज़ात है।

तेरा वस्ल ऐ मेरी दिलरुबा, नहीं मेरी क़िस्मत तो क्या हुआ,
मेरी महजबीं यही कम है क्या, तेरी हसरतों का तो साथ है।


तेरा इश्क़ मुझ पे है महरबाँ, मेरे दिल को हासिल है दो जहाँ,
मेरी जान-ए-जाँ इसी बात पर, मेरी जान जाए तो बात है।



क्या आप जानते हैं...
कि कब्बन मिर्ज़ा किसी ज़माने में विविध भारती के उद्घोषक हुआ करते थे और उनकी गम्भीर और अनूठी आवाज़ दूसरे उद्घोषकों के मुक़ाबले बिलकुल अलग सुनाई पड़ती थी।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ये संगीतकार भी कल पहली बार तशरीफ लायेगें ओल्ड इस गोल्ड की महफ़िल पर, नाम बताएं - ३ अंक.
२. शायर कौन हैं इस गज़ल के - २ अंक.
३. मुकुल आनंद निर्देशित और डिम्पल कपाडिया अभिनीत इस फिल्म का नाम बताएं - १ अंक.
४. आशा भोसले का साथ किस गायक ने दिया है इस युगल गज़ल में - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी क्या बात है फिर से चूक गए, पर प्रतिभा जी, किशोर जी और नवीन प्रसाद जो शायद पहली बार पधारे हैं पहेली में, सही जवाब दिया है, इंदु जी खता माफ, अंक मिल जायेंगें

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मंगलवार, 3 अगस्त 2010

अहले दिल यूँ भी निभा लेते हैं....नक्श साहब का कलाम और लता की पुरकशिश आवाज़

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 453/2010/153

ख़य्याम साहब एक ऐसे संगीतकार रहे जिन्होने ना केवल अपने संगीत के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया, बल्कि उन्होनें कभी सस्ते बोल वाले गीतों को स्वरबद्ध करना भी नहीं स्वीकारा। नतीजा यह कि ख़य्याम साहब का हर एक गीत उत्कृष्ट है, क्लासिक है। ख़्य्याम साहब ८० के दशक के उन गिने चुने संगीतकारों में से हैं जिन्होने फ़िल्म संगीत के बदलते तेवर के बावजूद अपने स्तर को बनाए रखते हुए एक से एक नायाब गानें हमें दिए। इसलिए आश्चर्य की बात बिलकुल नहीं है कि हमारी इस शृंखला में कुल १० ग़ज़लों में से ४ ग़ज़लें ख़य्याम साहब की कॊम्पोज़ की हुई हैं। इन चार ग़ज़लों में से एक ग़ज़ल फ़िल्म 'उमरावजान' से कल आपने सुनी, आज दूसरी ग़ज़ल की बारी। और इस बार आवाज़ आशा जी की बड़ी बहन लता जी की। नक्श ल्यालपुरी साहब का कलाम है और क्या ख़ूब उन्होने लिखा है कि "अहल-ए-दिल यूँ भी निभा लेते हैं, दर्द सीने में छुपा लेते हैं"। आज 'सेहरा में रात फूलों की' शृंखला में इसी ग़ज़ल की बारी। १९८१ की फ़िल्म 'दर्द' की यह ग़ज़ल है। इस फ़िल्म के गीतों की अगर बात करें तो इसमें दो शीर्षक गीत शामिल हैं; एक तो आशा-किशोर का गाया "प्यार का दर्द है, मीठा मीठा प्यारा प्यारा", और दूसरा है यह प्रस्तुत ग़ज़ल। इस ग़ज़ल के भी दो वर्ज़न हैं, पहला लता जी का गाया हुआ और दूसरा भूपेन्द्र की आवाज़ में। ख़य्याम साहब के हिसाब से पहला गीत यंग जेनरेशन के लिहाज़ से बना था, और दूसरा गीत, यानी कि यह ग़ज़ल सीनियर जेनरेशन के लिए बनाया गया था। फ़िल्म 'दर्द' का निर्माण किया था श्याम सुंदर शिवदासानी ने और निर्देशक थे अम्ब्रीश संगल। फ़िल्म प्रदर्शित हुई थी ३१ जुलाई १९८१ के दिन, जिसके मुख्य कलाकार थे राजेश खन्ना, हेमा मालिनी, पूनम ढिल्लों, कृषण धवन प्रमुख।

नक्श ल्यालपुरी ने ख़य्याम के साथ बहुत सी फ़िल्मों में काम किया है, जैसे कि 'दर्द', 'आहिस्ता आहिस्ता', 'ख़ानदान', 'नूरी', आदि। जब नक्श साहब को विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में ख़य्याम साहब के बारे में पूछा गया, तो और बातों ही बातों में फ़िल्म 'दर्द' का भी ज़िक्र आया था। आइए उसी मुलाक़ात का एक अंश यहाँ पढ़ते हैं -

प्र: ख़य्याम साहब से जुड़ी कोई यादगार घटना याद है आपको?

उ: फ़िल्म 'दर्द' में एक गाना था "न जाने क्या हुआ जो तूने छू लिया", इस गीत के लिए जब मैंने मुखड़ा फ़ाइनलाइज़ किया तो ख़य्याम साहब बोले कि यह तो अंतरे का मीटर है, आपने इसे मुखड़ा बना दिया! मैंने कहा कि सभी को पसंद आ गया और यह भी अच्छा बन सकता है। जब यह गाना बना तो राजेश खन्ना हर एक को यह गाना पूरे एक महीने तक सुनवाते रहे।

प्र: ख़य्याम साहब का कौन सा गीत आपको सब से ज़्यादा पसंद है?

उ: "बहारों मेरा जीवन भी संवारो", 'आख़िरी ख़त' फ़िल्म का यह गीत मेरा फ़ेवरीट है। फिर 'शगुन', 'फिर सुबह होगी' और 'उमरावजान' के गानें भी मुझे बेहद पसंद है।

प्र: ख़य्याम साहब आज भी ऐक्टिव हैं फ़िल्म जगत में।

उ: जी हाँ, भगवान उन्हे लम्बी उम्र दे!

तो दोस्तों, यह तो रही नक्श ल्यालपुरी से कमल शर्मा की बातचीत का एक छोटा सा अंश जिसमें ज़िक्र छिड़ा था ख़य्याम साहब का। आइए अब इस प्यारी सी ग़ज़ल को सुना जाए लता जी की शहद घोलती आवाज़ में, लेकिन उससे पहले ये रहे इस ग़ज़ल के कुल ७ शेर ...

लता वर्ज़न:

अहल-ए-दिल युं भी निभा लेते हैं,
दर्द सीने में छुपा लेते हैं।

दिल की महफ़िल में उजालों के लिए,
याद की शम्मा जला लेते हैं।

जलते मौसम में भी ये दीवाने,
कुछ हसीं फूल खिला लेते हैं।

अपनी आँखों को बनाकर ये ज़ुबाँ,
कितने अफ़सानें सुना लेते हैं।

जिनको जीना है मोहब्बत के लिए,
अपनी हस्ती को मिटा लेते हैं।

भूपेन्द्र वर्ज़न:

अहल-ए-दिल युं भी निभा लेते हैं,
दर्द सीने में छुपा लेते हैं।

ज़ख़्म जैसे भी मिले ज़ख़्मों से,
दिल के दामन को सजा लेते हैं।

अपने क़दमों पे मुहब्बत वाले,
आसमानों को झुका लेते हैं।



क्या आप जानते हैं...
कि नक्श ल्यालपुरी ने फ़िल्मों के लिए करीब करीब ६० मुजरे लिखे हैं और हर एक का अंदाज़ एक दूसरे से अलग रहा। यह बात उन्होने विविध भारती के 'उजाले उनकी यादों के' कार्यक्रम में कहा था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. मतले की पहली पंक्ति में शब्द है "खुदा", शायर बताएं - ३ अंक.
२. कल इस महान गायक की जयंती है, नाम बताये - १ अंक.
३. १९८५ में प्रदर्शित इस फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
४. इस संगीतकार को भी कल हम पहली बात ओल्ड इस गोल्ड में सुनेंगे, जिन्हें सामानांतर फिल्मों के संगीतकार के रूप में अधिक जाना जाता है, कौन हैं ये कमाल के संगीतकार - २ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी आपने ओ सवालों के जवाब दे डाले, इसलिए आपको नक् नहीं मिल पायेंगें, पर आपने एक खूबसूरत याद को हमारे साथ शेयर किया, वाकई वो दिन भी कुछ खास थे, शरद जी, और पवन जी सही जवाबों के लिए बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

सोमवार, 2 अगस्त 2010

ये क्या जगह है दोस्तों.....शहरयार, खय्याम और आशा की तिकड़ी और उस पर रेखा की अदाकारी - बेमिसाल

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 452/2010/152

'सेहरा में रात फूलों की' - ८० के दशक की कुछ यादगार ग़ज़लों की इस लघु शृंखला की दूसरी कड़ी में आप सभी का स्वागत है। जैसा कि कल हमने कहा था कि इस शृंखला में हम दस अलग अलग शायरों के क़लाम पेश करेंगे। कल हसरत साहब की लिखी ग़ज़ल आपने सुनी, आज हम एक बार फिर से सन् १९८१ की ही एक बेहद मक़बूल और कालजयी फ़िल्म की ग़ज़ल सुनने जा रहे हैं। यह वह फ़िल्म है दोस्तों जो अभिनेत्री रेखा के करीयर की सब से महत्वपूर्ण फ़िल्म साबित हुई। और सिर्फ़ रेखा ही क्यों, इस फ़िल्म से जुड़े सभी कलाकारों के लिए यह एक माइलस्टोन फ़िल्म रही। अब आपको फ़िल्म 'उमरावजान' के बारे में नई बात और क्या बताएँ! इस फ़िल्म के सभी पक्षों से आप भली भाँति वाक़ीफ़ हैं। और इस फ़िल्म में शामिल होने वाले मुजरों और ग़ज़लों के तो कहने ही क्या! आशा भोसले की गाई हुई ग़ज़लों में किसे किससे उपर रखें समझ नहीं आता। "दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिए" या फिर "इन आँखों की मस्ती के", या "जुस्तजू जिसकी थी उसको तो ना पाया हमने" या फिर "ये क्या जगह है दोस्तों"। एक से एक लाजवाब! उधर तलत अज़ीज़ के गाए "ज़िंदगी जब भी तेरी बज़्म में लाती है हमें" भी तो हमें एक अलग ही दुनिया में लिए जाते हैं जिसे सुन कर यह ज़मीं चांद से बेहतर हमें भी नज़र आने लगती हैं। मौसीकार ख़य्याम साहब ने इस फ़िल्म के लिए १९८२ का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार जीता था और राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित हुए थे। निर्देशक मुज़फ़्फ़र अली को भी सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। आशा भोसले फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार से अपना नाम वापस ले चुकीं थीं, इसलिए उनका नाम नॊमिनेशन में नहीं आया, और इस साल यह पुरस्कार चला गया परवीन सुल्ताना की झोली में फ़िल्म 'कुद्रत' के गीत "हमें तुम से प्यार कितना" के लिए। लेकिन आशा जी को इस फ़िल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से ज़रूर सम्मानित किया गया। दोस्तों, यह इतनी महत्वपूर्ण फ़िल्म रही ग़ज़लों की दृष्टि से कि इस शृंखला में इस फ़िल्म को नज़रंदाज़ करना बेहद ग़लत बात होती। तभी तो आज के लिए हमने चुना है "ये क्या जगह है दोस्तों"।

फ़िल्म 'उमरावजान' की कहानी और इस फ़िल्म के बारे में तो लगभग सभी कुछ आपको मालूम होगा, तो आइए आज ख़ास इस ग़ज़ल की ही चर्चा की जाए। चर्चा क्या साहब, ख़ुद ख़य्याम साहब से ही पूछ लेते हैं इसके बारे में, क्या ख़याल है? विविध भारती के 'संगीत सरिता' कार्यक्रम के सौजन्य से ये अंश हम यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं - "एक और नग़मा आपने सुना होगा, फ़िल्म में ऒलमोस्ट क्लाइमैक्स है, लड़की, शरीफ़ज़ादी अपने घर में, अपने मोहल्ले में, अपने शहर में, किस तरह से एडुकेशन लेती थी, रहते थे सब, उसके माँ-बाप, और वो लड़की किसी कारण बहुत बड़ी तवायफ़ बन गई। उस मकाम पर, अपने ही घर के सामने उसे मुजरा करना है। और मुजरे का मतलब है लोगों की दिलजोयी। जो तवायफ़ है वो लोगों का दिल लुभाए, दिलजोयी करे, और अब यह सिचुएशन है कि जब मुजरा शुरु हुआ, उसने देखा कि मैं तो वहीं हूँ, घर सामने है, और मेरी बूढ़ी माँ, उस चिलमन के पीछे, इसका डबल मीनिंग् हो गया कि लोगों को, जिनके सामने मुजरा कर रही है वो, उनका दिल लुभा रही है, और उसके इनर में एक तूफ़ान चल रहा है, जो उसकी माँ, कि मैं अपनी माँ को मिल सकूँगी या नहीं, और मैं मुजरा कर रही हूँ। मुजरे वाली वो थी नहीं, लेकिन हालात ने बना दिया। तो वो इस नग़मे में, 'ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है", तो इसमें देखिए आशा जी ने किस अंदाज़ में, उसी अंदाज़ को पकड़ा, जो मैंने कहा, उसी तरह से गाया है, और शहरयार साहब ने उम्दा, बहुत अच्छा लिखा है। मुज़फ़्फ़र अली साहब ने भी हक़ अदा किया। उसका पिक्चराइज़ेशन इतना अच्छा किया है कि लोगों को बाक़ायदा रोते हुए सुना है।" सचमुच दोस्तों, यह ग़ज़ल इतना दिल को छू जाती है कि जितनी भी बार सुनी जाए, जैसे दिल ही नहीं भरता। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर पहली बार 'उमरावजान' की ग़ज़ल, सुनिए, लेकिन उससे पहले ये रहे इस ग़ज़ल के तमाम शेर...

ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है,
हद-ए-निगाह तक जहाँ ग़ुबार ही ग़ुबार है।

ये किस मक़ाम पर हयात मुझको लेके आ गई,
ना बस ख़ुशी पे है जहाँ, ना ग़म पे इख़्तियार है।

तमाम उम्र का हिसाब माँगती है ज़िंदगी,
ये मेरा दिल कहे तो क्या, के ख़ुद से शर्मसार है।

बुला रहा है कौन मुझको चिलमनों के उस तरफ़,
मेरे लिए भी क्या कोई उदासो बेक़रार है।

दोस्तों, यह जो अंतिम शेर है, उसमें उमरावजान की माँ को चिलमन की ओट से अपनी बेटी को देखती हुई दिखाई जाती है। इतना मर्मस्पर्शी सीन था कि शायद ही ऐसा कोई होगा जिसकी आँखें नम ना हुईं होंगी। जैसे अल्फ़ाज़, वैसा संगीत, वैसी ही गायकी, और रेखा की वैसी ही अदायगी। अभी हाल में ख़य्याम साहब को जब 'लाइफ़टाइम अचीवमेण्ट अवार्ड' से नवाज़ा गया था और उन्हे पुरस्कार प्रदान किया था आशा जी ने, और सामने की पंक्ति पर रेखा बैठी हुईं थीं। ख़य्याम साहब ने तब कहा था कि 'उमरावजान' के लिए सब से ज़्यादा श्रेय आशा जी और रेखा को ही जाता है। अकस्मात इतनी बड़ी ऒडिएन्स में इस तरह से ख़य्याम साहब की ज़ुबान से अपनी तारीफ़ सुन कर रेखा अपने जज्बात पर क़ाबू न रख सकीं और उनकी आँखों से टप टप आँसू बहने लग पड़े। ठीक वैसे ही जैसे इस ग़ज़ल को सुनते हुए हम सब के बहते हैं। तो आइए फिर एक बार इस क्लासिक ग़ज़ल को सुने और फिर एक बार अपनी आँखें नम करें। पता नहीं क्यों इस ग़ज़ल के बहाने आँखें नम करने को जी चाहता है!



क्या आप जानते हैं...
'उमरावजान' में ख़य्याम साहब ने लता जी के बजाय आशा जी से गानें इसलिए गवाए क्योंकि वो नहीं चाहते थे कि 'पाक़ीज़ा' के हैंग्-ओवर से 'उमरावजान' ज़रा सा भी प्रभावित हो। उस पर उन्हे यह भी लगा कि रेखा के लिए आशा जी की कशिश भरी आवाज़ ही ज़्यादा मेल खाती है।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)

१. ग़ज़ल के मतले में फिल्म का शीर्षक है, शायर बताएं - ३ अंक.
२. खय्याम साहब का है संगीत, गायिका बताएं - २ अंक.
३. इस गज़ल का एक पुरुष संस्करण भी है उसमें किसकी आवाज़ है बताएं - २ अंक.
४. अम्ब्रीश संगल निर्देशित फिल्म का नाम बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
पवन जी ने ३ अंकों के सवाल का सही जवाब दिया, तो शरद जी, अवध जी और इंदु जी भी कमर कसे मिले, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

बरसे फुहार....गुलज़ार साहब के ट्रेड मार्क शब्द और खय्याम साहब का सुहाना संगीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 437/2010/137

'रिमझिम के तराने' शृंखला की आज है आठवीं कड़ी। दोस्तों, हमने इस बात का ज़िक्र तो नहीं किया था, लेकिन हो सकता है कि शायद आप ने ध्यान दिया हो, कि इस शृंखला में हम बारिश के १० गीत सुनवा रहे हैं जिन्हे १० अलग अलग संगीतकारों ने स्वरबद्ध किए हैं। अब तक हमने जिन संगीतकारों को शामिल किया, वो हैं कमल दासगुप्ता, वसंत देसाई, शंकर जयकिशन, हेमन्त कुमार, सचिन देव बर्मन, रवीन्द्र जैन, और राहुल देव बर्मन। आज जिस संगीतकार की बारी है, वह एक बेहद सुरीले और गुणी संगीतकार हैं, जिनकी धुनें हमें एक अजीब सी शांति और सुकून प्रदान करती हैं। एक सुकून दायक ठहराव है जिनके संगीत में। उनके गीतों में ना अनर्थक साज़ों की भीड़ है, और ना ही बोलों में कोई सस्तापन। जी हाँ, हम बात कर रहे हैं ख़य्याम साहब की। आज की कड़ी में सुनिए आशा भोसले की आवाज़ में सन्‍ १९८० की फ़िल्म 'थोड़ी सी बेवफ़ाई' का रिमझिम बरसता गीत "बरसे फुहार, कांच की जैसी बूंदें बरसे जैसे, बरसे फुहार"। गुलज़ार साहब का लिखा हुआ गीत है। इस फ़िल्म के दूसरे गानें भी काफ़ी मशहूर हुए थे, मसलन लता-किशोर के गाए "आँखों में हमने आप के सपने सजाए हैं" और "हज़ार राहें मुड़के देखीं"; भुपेन्द्र का गाया "आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं", अनवर और सुलक्षणा का गाया "मौसम मौसम लवली मौसम"; तथा जगजीत कौर व सुलक्षणा का गाया "सुनो ना भाभी"। अंतिम दो गीतों को छोड़कर बाकी सभी गीतों में ख़य्याम साहब का ठहराव भरा अंदाज़ साफ़ झलकता है, जिन्हे जितनी भी बार सुना जाए उतना ही अच्छा लगता है और दिल को सुकून पहुँचाता है। अगर आप के शहर में बारिश ना भी हो रही हो, तो भी इन गीतों को, और ख़ास कर आज के प्रस्तुत गीत को सुन कर आपके तन-मन में ठंडक का अहसास हो जाएगा, ऐसा हमारा ख़याल है!

दोस्तों, आइए आज ख़य्याम साहब की कुछ बातें की जाए। बातें जो ख़य्याम साहब ने ख़ुद बताया था विविध भारती के किसी कार्यक्रम में: "पंडित अमरनाथ, हुस्नलाल जी, भगतराम जी, तीन भाई, इन लोगों से मैंने संगीत सीखा सब से पहले। उन दिनों ऐक्टर बनने का शौक था मुझे। लेकिन उन दिनों ऐक्टर बनने के लिए भी संगीत सीखना ज़रूरी था। लाहौर में मेरी मुलाक़ात हुई चिशती बाबा से, जो उन दिनों टॊप के संगीतकार हुआ करते थे। एक बार वो एक म्युज़िकल कॊम्पीटिशन कर रहे थे। आधे घंटे के बाद उन्होनें अपने ऐसिस्टैण्ट को बोला कि मैंने वह जो धुन बजाई थी, वह मैंने क्या बजाया था, बजाओ ज़रा! उन दिनों आज की तरह धुन रिकार्ड नहीं किया जाता था। मैं कोने में बैठा हुआ था, मैंने उनसे कहा कि मैं बजा सकता हूँ। तो उन्होने मुझसे कहा कि तुम कैसे बजाओगे, तुम्हे याद है? फिर मैंने बजाया और वो बोले कि तुम मेरे साथ काम करो, तुम्हारा जेहन अच्छा है संगीत का, मेरे ऐसिस्टैण्ट रहो और शिष्य भी। मैंने कहा कि मुझे तो ऐक्टर बनना है। तो उन्होने कहा कि मेरे साथ रहो, इस तरह से लोगों से मिल भी सकते हो, ऐक्टर भी बन जाओगे।" दोस्तों, ख़य्याम ऐक्टर तो नहीं बने, लेकिन उनके संगीतकार बनने की आगे की कहानी हम फिर किसी दिन आपको सुनवाएँगे। फिलहाल सुनते हैं आशा जी की आवाज़ में यह सुकून भरा नग़मा "बरसे फुहार"।



क्या आप जानते हैं...
कि संगीतकार ख़य्याम ने सन १९४७ के आसपास शर्माजी के नाम से कई फ़िल्मों में संगीत दिया था। ऐसा उन्हे उन दिनों बम्बई में चल रही साम्प्रदायिक तनाव के मद्देनज़र करना पड़ा था।

पहेली प्रतियोगिता- अंदाज़ा लगाइए कि कल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर कौन सा गीत बजेगा निम्नलिखित चार सूत्रों के ज़रिए। लेकिन याद रहे एक आई डी से आप केवल एक ही प्रश्न का उत्तर दे सकते हैं। जिस श्रोता के सबसे पहले १०० अंक पूरे होंगें उस के लिए होगा एक खास तोहफा :)
१. इस नाम से ८० के दशक में भी एक फिल्म आई थी जिसमें अमिताभ ने यादगार अभिनय किया था, संगीतकार बताएं-३ अंक.
२. मुखड़े में शब्द है -"आग", गीतकार का नाम बताएं - २ अंक.
३. रफ़ी साहब के गाये इस बहके बहके गीत की फिल्म का नाम बताएं - २ अंक.
४. गीत के दो वर्जन हैं, फिल्म में, पहली पंक्ति बताएं - १ अंक

पिछली पहेली का परिणाम -
अवध जी, गलती के लिए माफ़ी चाहेंगें, वैसे एक बार आप और शरद जी एकदम सही ठहरे

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

बुधवार, 2 जून 2010

बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हनोज़... कुछ इस तरह जोश की जिंदादिली को स्वर दिया मेहदी हसन ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #८६

दैनिक जीवन में आपका ऐसे इंसानों से ज़रूर पाला पड़ा होगा जिनके बारे में लोग दो तरह के ख्यालात रखते हैं, मतलब कि कुछ लोग उन्हें नितांत हीं शरीफ़ और वफ़ादार मानते हैं तो वहीं दूसरे लोगों की नज़र में उनसे बड़ा अवसरवादी कोई नहीं। हमारे आज के शायर की हालत भी कुछ ऐसी हीं है। कहीं कुछ लोग उन्हें राष्ट्रवादी मानते हैं तो कुछ उन्हें "छिपकली की तरह रंग बदलने वाला" छद्म-राष्ट्रवादी। उनका चरित्र-चित्रण करने के लिए जहाँ एक और "अली सरदार जाफरी" का "कहकशां"(धारावाहिक) है तो वहीं "प्रकाश पंडित" की "जोश और उनकी शायरी"(पुस्तक)। जी हाँ हम जोश की हीं बात कर रहे हैं। जोश अकेले ऐसे शायर हैं जिनकी अच्छाईयाँ और बुराईयाँ बराबर-मात्रा में अंतर्जाल पर उपलब्ध है, इसलिए समझ नहीं आ रहा कि मैं किसका पक्ष लूँ। अगर "कहकशां" देखकर कोई धारणा निर्धारित करनी हो तब तो जोश ने जो भी किया वह समय की माँग थी। उनके "पाकिस्तान-पलायन" के पीछे उनकी मजबूरी के अलावा कुछ और न था। जान से प्यारा "देश" उन्हें बस इसलिए छोड़ना पड़ा क्योंकि उनके परिवार-वालों ने उनका जीना मुहाल कर दिया था। जाते-जाते उन्होंने नेहरू (जो कि जोश के जिगरी दोस्त थे) के सामने अपनी मजबूरियों का हवाला दिया। तब नेहरू ने उन्हें बीच का रास्ता दिखाते हुए कहा कि आप जाओ लेकिन साल में तीन महिने हिन्दुस्तान में गुजारना, इससे आपका यह अपराध-बोध भी जाता रहेगा कि आपने हिन्दुस्तान छोड़ दिया है। लेकिन एक बार पाकिस्तान जाने के बाद यह हो न पाया। यह था "अली सरदार जाफरी" का मत। इस मुद्दे पर "प्रकाश" कुछ नहीं कहते, लेकिन इस मुद्दे पर "अंतर्जाल" चुप नहीं। मुझे कहीं यह पढने को मिला कि "जोश" पाकिस्तान इसलिए गए थे क्योंकि "वहां उन्हें रिक्शा चलाने के लाइसेंस मिले, कुछ सिनेमाघरों में हिस्सेदारी मिली और शासकों के कशीदे काढ़ने के लिए मोटी रकम। " साथ हीं साथ पाकिस्तान के मुख्य मार्शल लॉ प्रशासक सिकंदर मिर्ज़ा उनके बहुत बड़े प्रशंसक थे। लेकिन दु:ख की बात यह है कि मिर्जा के पतन के बाद पाकिस्तान में जोश को गद्दार कहकर सार्वजनिक रूप से दुत्कारा गया। इसलिए कई बार उन्होंने भारत लौटने की कोशिश भी की। कहा जाता है कि "तब स्वर्गीय मौलाना आजाद अड़ गए, वे एक ही शर्त पर जोश के भारत लौटने पर सहमत थे कि लौटने पर उन्हें जेल में रखा जाए।" अब यह किस हद तक सच है यह मालूम नहीं लेकिन अगर आप इस वाक्ये पर नज़र दौड़ाएँगे तो ऊपर कही बात पर यकीन करने का मन न होगा:

जोश साहिब और मौलाना आज़ाद भी दोस्त थे तथा वह प्राय: आज़ाद साहिब से मिलने जाते रहते थे। एक बार जब वह मौलाना से मिलने गए, तो वह अनेक सियासी लोगों में घिरे हुए थे। दस-बीस मिनट इंतज़ार के बाद जोश साहिब ने यह शेर कागज़ पर लिखकर उनके सचिव को दिया और उठकर चल पड़े—

नामुनासिब है ख़ून खौलाना
फिर किसी और व़क्त मौलाना

जोश अभी बाहरी गेट तक भी नहीं पहुंचे थे कि सचिव भागे आगे आए और रुकने को कहा। जोश साहिब ने मुड़कर देखा। मौलाना कमरे के बाहर खड़े मुस्कुरा रहे थे।

यानि कि जोश और मौलाना में अच्छी दोस्ती थी, फिर मौलाना क्योंकर यह चाहने लगें कि जोश को जेल में डाल दिया जाए। यही तो दिक्कत है.... दो अलग तरह के विचार अंतर्जाल पर चक्कर काट रहे हैं और मुझे इन दोनों विचारों को पढकर कोई निष्कर्ष निकालना है। अब मुझमें इतना तो सामर्थ्य नहीं कि कुछ अपनी तरफ़ से कह सकूँ या कोई निर्णय हीं दे सकूँ इसलिए मुझे जो भी हासिल हुआ है आप सबके सामने रख रहा हूँ। सबसे पहले जोश का परिचय (सौजन्य: प्रकाश पंडित):

शबीर हसन खां जोश का जन्म ५ दिसम्बर, १८९४ ई. को मलीहाबाद (जिला लखनऊ) के एक जागीरदार घराने में हुआ। परदादा फ़कीर मोहम्मद ‘गोया’ अमीरुद्दौला की सेना में रिसालदार भी थे और साहित्यक्षेत्र के शहसवार भी। एक ‘दीवान’, (ग़ज़लों का संग्रह) और गद्य की एक प्रसिद्ध पुस्तक ’बस्ताने-हिकमत’ यादगार छोड़ी। दादा मोहम्द अहमद खाँ ‘अहमद’ और पिता बशीर अहमद ख़ाँ ‘बशीर’ भी अच्छे शायर थे। यों जोश ने उस सामन्ती वातावरण में पहला श्वास लिया जिसमें काव्यप्रवृत्ति के साथ साथ घमंड स्वेच्छाचार, अहं तथा आत्मश्लाघा अपने शिखर पर थी। गाँव का कोई व्यक्ति यदि तने हुए धनुष की तरह शरीर को दुहरा करके सलाम न करता था तो मारे कोडों के उसकी खाल उधेड़ दी जाती थी। ज़ाहिर है कि जन्म लेते ही ‘जोश’ इस वातावरण से अपना पिंड न छुड़ा सकते थे, अतएव उनमें भी वही ‘गुण’ उत्पन्न हो गए जो उनके पुरखों की विशेषता थी। इस वातावरण में पला हुआ रईसज़ादा जिसे नई शिक्षा से पूरी तरह लाभान्वित होने का बहुत कम अवसर मिला और जिसके स्वभाव में शुरू ही से उद्दण्डता थी, अत्यन्त भावुक और हठी बन गया। युवावस्था तक पहुँचते-पहुँचते उनके कथनानुसार वे बड़ी सख्ती से रोज़े-नमाज़ के पाबंद हो चुके थे। नमाज़ के समय सुगन्धित धूप जलाते और कमरा बन्द कर लेते थे। दाढ़ी रख ली और चारपाई पर लेटना और मांस खाना छोड़ दिया था और भावुकता इस सीमा पर पहुँच चुकी थी कि बात-बात पर उनके आँसू निकल आते थे। इस मंजिल पर पहुँचकर उनकी भावुकता ने उनके सामाजिक सम्बन्धों पर कुठाराघात किया। उन्होंने अपने पिता से विद्रोह किया। जोश लिखते हैं- "मेरे पिता ने बड़ी नर्मी से मुझे समझाया, फिर धमकाया, मगर मुझ पर कोई असर न हुआ। मेरी बग़ावत बढ़ती ही चली गई। नतीजा यह हुआ कि मेरे बाप ने वसीयतनामा लिखकर मेरे पास भेज दिया कि अगर अब भी मैं अपनी जिद पर कायम रहूँगा तो सिर्फ १०० रुपये माहवार वज़ीफ़े के अलावा कुल ज़ायदाद से महरूम कर दिया जाऊँगा लेकिन मुझ पर इसका कोई असर न हुआ"

जोश ने घर पर उर्दू फारसी की पाठ्य पुस्तकें पढ़ीं। फिर अंग्रेजी शिक्षा के लिए सीतापुर स्कूल, जुबली स्कूल लखनऊ और सेंट पीटर कॉलेज आगरा और अलीगढ़ में भी प्रविष्ट हुए, लेकिन पूरी तरह कहीं भी न पढ़ सके। अपनी शायरी के लटके बारे में वे कहते हैं कि "मैंने नौ बरस की उम्र से शेर कहना शुरू कर दिया था। शेर कहना शुरू कर दिया था-यह बात मैंने खिलाफ़े-वाक़ेआ और ग़लत कही है। क्योंकि यह किसी इन्सान की मज़ाल नहीं कि वह खुद से शेर कहे। शेर अस्ल में कहा नहीं जाता, वो तो अपने को कहलवाता है। इसलिए यही तर्ज़े-बयान अख़्तियार करके मुझे यह कहना चाहिए कि नौ बरस की उम्र से शेर ने मुझसे अपने को कहलावाना शुरू कर दिया था। जब मेरे दूसरे हम-सिन (समवयस्क) बच्चे पतंग उड़ाते और गोलियाँ खेलते थे, उस वक़्त किसी अलहदा गोशे (एकान्त स्थान) में शेर मुझसे अपने को कहलवाया करता था।" उस समय उनकी आयु २३-२४ वर्ष की थी जब उन्होंने पहले ‘उमर ख़य्याम’ और फिर ‘हाफ़िज़’ की शायरी का अध्ययन किया। फ़ारसी भाषा के ये दोनों महान कवि अपने काल के विद्रोही कवि थे। अध्ययन का अवसर मिलने पर जोश मिल्टन, शैले, बायरन और वर्डजवर्थ से भी प्रभावित हुए और आगे चलकर गेटे, दांते, शॉपिनहार, रूसों और नित्शे से भी। विशेषकर नित्शे से वे बुरी तरह प्रभावित हुए। नित्शे, गेटे के बाद वाली पीढ़ी का दार्शनिक साहित्यकार था, जिसने जर्मनी में एक जबरदस्त राज्य और केन्द्रीय शक्ति का समर्थन किया और हर प्रकार के नैतिक सिद्धान्त अहिंसा और समानता को अस्वीकार किया। जोश ने नित्शे के हर विचार को अपनी नीति और नारा बना लिया और अपनी हर रचना पर बिस्मिल्लाह (ख़ुदा के नाम से शुरू करता हूँ) के स्थान पर ब-नामे कुब्वतों बयात (शक्ति तथा जीवन के नाम) लिखना शुरू कर दिया। इन सबके अतिरिक्त देश की राजनैतिक परिस्तिथियों ने भी उन पर सीधा प्रभाव डाला और उनकी विद्रोही प्रवृत्ति को बड़ी शक्ति मिली। अंग्रेजी राज्य में बुरी तरह पिसी जा रही देश की जनता ने उनके नारों को उठा लिया और इस तरह उन्हें शायर-ए-इंकलाब की उपाधि हासिल हुई।

जोश का स्वभाव बागी था और इसमें कोई दो राय भी नहीं है। वह किसी भी एक निज़ाम से कभी संतुष्ट नहीं हुए। हैदराबाद में निज़ाम दक्कन की मुलाज़मत में होते हुए, उसी के ख़िलाफ़ एक स़ख्त नज़्म लिख दी। जिस पर उन्हें चौबीस घंटे के अंदर-अंदर हैदराबाद छोड़ देने का आदेश मिला। अगर प्रकाश पंडित की मानें तो जोश साहब अपनी कही बात पर कभी भी टिकते नहीं थे। जोश साहब के विचारों का यह परस्पर विरोध उनकी पूरी शायरी में मौजूद है और इसकी गवाही देते हैं ‘अ़र्शोफ़र्श’ (धरती-आकाश) ‘शोला-ओ-शबनम (आग और ओस) संबलों-सलासिल (सुगन्धित घास और ज़ंजीरें) इत्यादि उनके कविता-संग्रहों के नाम। और उनकी निम्नलिखित रूबाई से तो उनकी पूरी शायरी के नैन-नक्श सामने आ जाते हैं;

झुकता हूँ कभी रेगे-रवाँ की जानिब,
उड़ता हूँ कभी कहकशाँ की जानिब,
मुझ में दो दिल हैं, इक मायल-ब-ज़मीं,
और एक का रुख़ है आस्माँ की जानिब।


रेगे-रवाँ - बहती हुई रेत
कहकशाँ - आकाशगंगा
मायल-ब-जमीं- धरती की ओर जिसका रूख है

न सिर्फ जोश साहब के विचारों में परस्पर विरोध था, बल्कि उनकी शायरी में छुपे भावों और शायरी के स्तर में भी कभी-कभी आसमान-जमीन का अंतर दिख पड़ता है। अगर आपसे कहा जाए कि जिस शायर ने आज की गज़ल लिखी है उसी की कलम से कभी "मोरे जोबना का देखो उभार" भी निकला था तो आप निस्संदेह हीं दंग रह जाएँगे। अगर मेरी बात पर आपको यकीन न हो तो यहाँ जाएँ। खैर उन सब बातों पर चर्चा कभी और करेंगे अभी तो आज की गज़ल का लुत्फ़ उठाने का समय है। हाँ, जोश के बारें आप क्या ख्याल रखते हैं, अपनी टिप्पणियों के माध्यम से यह जरूर बताईयेगा।

आज हम जो गज़ल लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं उन्हें अपनी आवाज़ से मुकम्मल किया है "मेहदी हसन" साहब ने। तो पेश-ए-खिदमत है यह गज़ल:

नक़्श-ए-ख़याल दिल से मिटाया नहीं हनोज़
बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हनोज़

तेरी हीं जुल्फ़-ए-नाज़ का अब तक असीर हूँ,
यानि किसी के दाम में आया नहीं हनोज़

या दस-बा-खैर (?) जिसपे कभी थी तेरी नज़र
वो दिल किसी से मैंने लगाया नहीं हनोज़

वो सर जो तेरी राहगुज़र में था सज्दा-रेज़
मैं ने किसी क़दम पे झुकाया नहीं हनोज़

बेहोश हो के जल्द तुझे होश आ गया
मैं ______ होश में आया नहीं हनोज़

मर कर भी आयेगी ये सदा क़ब्र-ए-"जोश" से
बेदर्द मैंने तुझको भुलाया नहीं हनोज़




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सूफ़ी" और शेर कुछ यूँ था-

ये रुपहली छाँव, ये आकाश पर तारों का जाल
जैसे सूफ़ी का तसव्वुर, जैसे आशिक़ का ख़याल

इस शब्द को सबसे पहले पहचाना "सीमा" जी ने लेकिन शेर लेकर सबसे पहले हाज़िर हुए अवनींद्र जी।
ये रहे अवनींद्र जी के शेर:

मेरी मुहब्बत पे इतनी हैरत न जताओ
आशिक़ सी फितरत है सूफी न बनाओ (स्वरचित )...... माशा-अल्लाह! इस इश्क़ पर वारा जाऊँ!!

जिस तरह पत्थर पे घिस के रंग हिना देती है
आशिकी हद से जो गुजरे सूफी बना देती है ... पहले शेर में हद मालूंम थी शायद जो इस शेर में टूट गई :)

और ये सारे शेर सीमा जी ने पेश किए:

जिसे पा सका न ज़ाहिद जिसे छू सका न सूफ़ी,
वही तीर छेड़ता है मेरा सोज़-ए-शायराना (मुईन अहसन जज़्बी)

ज़ाहिद को तआज्जुब है, सूफ़ी को तहय्युर है।
सद-रस्के-तरीक़त है, इक लग़ज़िशे-मस्ताना॥ (असग़र गोण्डवी)

डाक्टर अनुराग साहब, आपका दस्तखत, आपकी उपस्थिति इस मंच पर देखकर मैं बता नहीं सकता कि मुझे कितनी खुशी हासिल हुई है। आप तो शेर-ओ-शायरी और त्रिवेणियों के उस्ताद हैं फिर खाली हाथ इस महफ़िल में आने का सबब? अगली बार ऐसा नहीं चलेगा :)

नीलम जी, तो इस तरह आप भी शेरो-शायरी के कुरूक्षेत्र में उतर हीं गईं। चलिए अच्छा है, अवनींद्र जी को टक्कर देने के लिए एक और रथी/महारथी की जरूरत थी। यह रहा आपका शेर, जो मुझे खासा पसंद आया:

तेरी ये इबादत सूफी न बना दे मुझको
मेरी ये हसरत,इन्सां ही नजर आऊँ तुझको (स्वरचित)

शन्नो जी, आप भी कमर कस लीजिए। नीलम जी मैदान में उतर चुकी हैं। यह रहा आपकी तरकश का तीर:

हर शख्श जो शायरी करते हुये रोता है
वह दिल सूफी न होगा तो क्या होगा..?

सारे शायरों ने अपनी तरफ से "सूफ़ी" का सही अर्थ जानने की पूरी कोशिश की , लेकिन मुझे लगता है कि अभी भी कुछ छूट रहा है, इसलिए यह लिंक यहाँ डाले देता हूँ:
http://en.wikipedia.org/wiki/Sufism

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

मैं पल दो पल का शायर हूँ...हर एक पल के शायर साहिर हैं मनु बेतक्ल्लुस जी की खास पसंद

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 409/2010/109

पकी फ़रमाइशी गीतों के ध्वनि तरंगों पे सवार हो कर 'पसंद अपनी अपनी' शृंखला की नौवीं कड़ी में हम आज आ पहुँचे हैं। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है मनु बेतख़ल्लुस जी की पसंद पर एक गीत। अपनी इस पसंद के बारे में उन्होने हमें कुछ इस तरह से लिख भेजा है।

"गीत तो जाने कितने ही हैं..जो बेहद ख़ास हैं...और ज़ाहिर है..हर ख़ास गीत से कुछ ना कुछ दिली अहसास गहरे तक जुड़े हुए हैं... क्यूंकि आवाज़ को हम काफी समय से पढ़ते/सुनते आ रहे हैं...और आज अपने उन खास गीतों कि फेहरिश्त जब दिमाग में आ रही है..तो ये भी याद आ रहा है के ये गीत तो पहले ही बजाया जा चुका है... हरे कांच की चूड़ियाँ...तकदीर का फ़साना....जीवन से भरी तेरी आँखें... और ना जाने कितने ही.....जो मन से गहरे तक जुड़े हैं... ऐसे में एक और गीत याद आ रहा है...हो सकता है ये भी बजाया जा चुका हो पहले...मगर दिल कर रहा है इसी गीत को फिर से सुनने का.... मुकेश कि आवाज़ में फिल्म कभी कभी कि नज़्म.... आमतौर पर इसके एक ही पहलू पर ज्यादा गौर किया गया है..में पल दो पल का शायर हूँ.... इसी नज़्म का एक और पहलू है..जो उतना मशहूर नहीं हुआ था... मगर हमारे लिए ये पहलू बहुत मायने रखता है... में हर इक पल का शायर हूँ....
हर इक पल मेरी कहानी है..
हर इक पल मेरी हस्ती है
हर इक पल मेरी जवानी है.....

पल दो पल..को...हर इक पल कहती..... जिंदगी कि ललक पैदा करती.....इस नज़्म का एक एक हर्फ़ हमारे लिए बहुत ज़रूरी है.....इसे डूब कर सुन लेने के बाद जीना आसान लगने लगता है....
इसका एक अंतरा..

तुझको मुझको जीवन अमृत अब इन हाथों से पीना है.
इनकी यादों में बसना है, इनकी साँसों में जीना है..
तू अपनी अदाएं बख्श इन्हें,मैं अपनी वफाएं देता हूँ...
जो अपने लिए सोचीं थी कभी वो सारी दुआएं देता हूँ...
मैं हर इक पल का.....

और इसी के पहले अंतरे में....

ख़्वाबों कि और उमंगों कि मीयादें ख़त्म नहीं होतीं....(कितना गहरा असर डालतीं हैं....)
ऐसा ही एक और गीत था... वो भी साहिर की ही कलम का कमाल था... लता ने क्या गाया था.....

कितने दिन आँखें तरसेंगी,कितने दिन यूं दिल तरसेंगे...
इक दिन तो बादल बरसेंगे...ऐ मेरे प्यासे दिल....
आज नहीं तो कल महकेगी, ख़्वाबों कि महफ़िल...."

तो दोस्तों, मनु जी के इन शब्दों के बाद हमें नहीं लगता कि इस आलेख में कुछ और लिखने की आवश्यकता नहीं है। तो आइए सुना जाए मुकेश की आवाज़ में फ़िल्म 'कभी कभी' का यह गीत। संगीतकार हैं ख़य्याम। वैसे मनु जी, हम आपसे माफ़ी चाहेंगें कि आज गलती से हमने इस गीत का पहला ही संस्करण यहाँ जोड़ दिया है, जिसे समय के अभाव में हम बदल नहीं पाए, पर हमें यकीं है ये संस्करण भी आपको बेहद पसंद होगा.



क्या आप जानते हैं...
कि 'कभी कभी' फ़िल्म के लिए ख़य्याम को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था। और मुकेश को इसी फ़िल्म के गीत "कभी कभी मेरे दिल में" के लिए सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक का पुरस्कार।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मुखड़े में शब्द है -"चुनरिया", फिल्म का नाम बताएं -३ अंक.
2. लता के गाये इस मधुर गीत को किस गीतकार ने लिखा है- २ अंक.
3. संगीतकार बताएं -२ अंक.
4. धर्मेन्द्र हैं नायक, नायिका का नाम बताएं-२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
रोमेंद्र जी, इंदु जी, शरद जी और अवध जी को बहुत बहुत बधाई....

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

शुक्रवार, 19 मार्च 2010

चले आओ सैयां रंगीले मैं वारी रे....क्या खूब समां बाँधा था इस विवाह गीत ने

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 378/2010/78

जिस तरह से ५० से लेकर ७० के दशक तक के समय को फ़िल्म संगीत का सुनहरा दौर माना जाता है, वैसे ही अगर समानांतर सिनेमा की बात करें तो इस जौनर का सुनहरा दौर ८० के दशक को माना जाना चाहिए। इस दौर में नसीरुद्दिन शाह, ओम पुरी, शबाना आज़्मी, स्मिता पाटिल, सुप्रिया पाठक, फ़ारुख़ शेख़ जैसे अभिनेताओं ने अपने जानदार अभिनय से इस जौनर को चार चांद लगाए। दोस्तों, मैं तो आज एक बात क़बूल करना चाहूँगा, हो सकता है कि यही बात आप के लिए भी लागू हो! मुझे याद है कि ८० के दशक में, जो मेरे स्कूल के दिन थे, उन दिनों दूरदर्शन पर रविवार (बाद में शनिवार) शाम को एक हिंदी फ़ीचर फ़िल्म आया करती थी, और हम पूरा हफ़्ता उसी की प्रतीक्षा किया करते थे। साप्ताहिकी कार्यक्रम में अगले दिन दिखाई जाने वाली फ़िल्म का नाम सुनने के लिए बेचैनी से टीवी के सामने बैठे रहते थे। और ऐसे में अगर फ़िल्म इस समानांतर सिनेमा के या फिर कलात्मक फ़िल्मों के जौनर से आ जाए, तो हम सब उदास हो जाया करते थे। हमें तो कमर्शियल फ़िल्मों में ही दिलचस्पी रहती थी। लेकिन जैसे जैसे हम बड़े होते गए, वैसे वैसे इन समानांतर फ़िल्मों की अहमियत से रु-ब-रु होते गए। और आज इन फ़िल्मों को बार बार देखने का मन होता है, पर अफ़सोस कि किसी भी चैनल पर ये फ़िल्में दिखाई नहीं देती। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में हमने जिस गीत को चुना है वह १९८२ की फ़िल्म 'बाज़ार' का है। युं तो इस फ़िल्म में लता जी का गाया "दिखाई दिए युं के बेख़ुद किया", लता जी और तलत अज़ीज़ का गाया "फिर छोड़ी रात बात फूलों की", जगजीत कौर का गाया "देख लो आज हमको जी भर के" और भुपेन्द्र का गाया "करोगे याद तो हर बात याद आएगी" जैसे गानें मशहूर हुए, लेकिन आज के अंक के लिए हमने इस फ़िल्म का जो गीत चुना है, वह दरअसल एक पारम्परिक रचना है, जिसे गाया है जगजीत कौर, पामेला चोपड़ा और साथियों नें। इस मिट्टी की ख़ुशबू लिए यह गीत है "चले आओ सइयां रंगीले मैं वारी रे"। दिलचस्प बात यह है कि इस गीत के जो अंतरे हैं, उनकी धुन पर बरसों बाद पामेला चोपड़ा ने ही फ़िल्म 'चांदनी' में एक गीत गाया था "मैं ससुराल नहीं जाउँगी", जिसके अंतरे भी कुछ कुछ इसी तरह के थे, सिर्फ़ रिदम में फ़र्क था।

विजय तलवार निर्मित 'बाज़ार' को निर्देशित किया था सागर सरहदी ने, और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे फ़ारुख़ शेख़, स्मिता पाटिल, नसीरुद्दिन शाह, सुप्रिया पाठक, भरत कपूर, सुलभा देशपाण्डेय प्रमुख। यानी कि समानांतर सिनेमा के सभी मज़बूत स्तंभ इस फ़िल्म में मौजूद थे। 'बाज़ार' की कहानी आधारित थी युवतियों को अर्थाभाव के कारण अपने माँ बाप द्वारा गल्फ़ के देशों के बूढ़े अमीरों से शादी के लिए बेच देने की परम्परा पर। उस साल फ़िल्मफ़ेयर में सुप्रिया पाठक को इस फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सह-अभिनेत्री का पुरस्कार मिला था। फ़िल्म में संगीत था ख़ैय्याम साहब का, और उनके संगीत सफ़र का यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। हैदराबाद की पृष्ठभूमि पर बने इस फ़िल्म में ख़ैय्याम साहब थोड़े से अलग रंग में नज़र आए। ख़ास कर प्रस्तुत गीत में उन्होने हैदराबादी शादी के फूल बिखेरे। आज जब भी फ़िल्म 'बाज़ार' की बात चलती है, तो इसके संगीत के ज़िक्र के बिना चर्चा पूरी नहीं होती। दोस्तों, ख़ैयाम साहब की पत्नी और गायिका जगजीत कौर ने फ़िल्मों में ज़्यादा गानें नहीं गाए। ख़ैय्याम साहब ने ख़ुद बताया था कि वो जान बूझ कर उनसे नहीं गवाते थे ताकि लोग यह न कहे कि अपनी पत्नी को मौके दे रहा है। लेकिन जब जब कुछ इस तरह के गानें बनें जो नायिका के होठों पर नहीं बल्कि किसी "दूसरे" किरदार पर फ़िल्माए गए और जिनके अंदाज़ बिल्कुल इस मिट्टी के रंग में रंगे हुए थे, तब तब ख़ैय्याम साहब ने जगजीत जी को मौका दिया। यही बात लागू होती है यश चोपड़ा और उनकी गायिका पत्नी पामेला चोपड़ा पर भी। ख़ैर, आइए इस ख़ूबसूरत शादी गीत को सुनें और इसी बहाने हैदराबाद की सैर करें।



क्या आप जानते हैं...
कि ख़ैय्याम ने ४० के दशक में जब फ़िल्म जगत में दाख़िल हुए थे तब देश में चल रहे साम्प्रदायिक तनाव के चलते अपना नाम शर्माजी रख लिया था, और शर्माजी ने नाम से उन्होने कई फ़िल्मों में संगीत दिया। १९४६ में फ़िल्म 'रोमियो ऐण्ड जुलिएट' में उन्होने अभिनय भी किया था।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. अंतिम पंक्ति में शब्द है -"रिश्ता", पहचाने इस नज़्म को -३ अंक.
2. इसे निर्देशक की आत्मकथा भी माना जाता है, फिल्म बताएं - २ अंक.
3. इस बेहद दर्द भरी नज़्म को किस अजीम शायर ने लिखा है -२ अंक.
4. मदन मोहन के बाद इन्हें फिल्मों में गज़ल स्वरबद्ध करने के मामले सबसे ज्यादा याद किया जाता है, इस संगीतकार का नाम बताएं -२ अंक.

विशेष सूचना -'ओल्ड इज़ गोल्ड' शृंखला के बारे में आप अपने विचार, अपने सुझाव, अपनी फ़रमाइशें, अपनी शिकायतें, टिप्पणी के अलावा 'ओल्ड इज़ गोल्ड' के नए ई-मेल पते oig@hindyugm.com पर ज़रूर लिख भेजें।

पिछली पहेली का परिणाम-
वाह शरद जी आपको तो मानना ही पड़ेगा, क्या खूब पहचानते हैं आप दुर्लभ गीतों को भी, इंदु जी, पदम जी आप भी सही हैं बिलकुल, अवध जी आपको भी दो जरूर देंगें, बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

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