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Saturday, January 27, 2018

चित्रकथा - 53: पंचम के दो महारथियों का निधन

अंक - 53

पंचम के दो संगीत महारथियों का निधन


पंडित उल्हास बापट और अमृतराव काटकर 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! स्वागत है आप सभी का ’चित्रकथा’ स्तंभ में। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें हम लेकर आते हैं सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े विषय। श्रद्धांजलि, साक्षात्कार, समीक्षा, तथा सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर शोधालेखों से सुसज्जित इस साप्ताहिक स्तंभ की आज 53-वीं कड़ी है।

4 जनवरी 2018 को सुप्रसिद्ध संतूर वादक पंडित उल्हास बापट और 15 जनवरी 2018 को फ़िल्मी गीतों में रेसो रेसो वाद्य के भीष्म पितामह व जाने-माने संगीत संयोजक व वादक श्री अमृतराव काटकर का निधन हो गया। संयोग की बात है कि इन दोनों संगीत महारथियों ने संगीतकार राहुल देव बर्मन के साथ लम्बा सफ़र तय किया, और उससे भी आश्चर्य की बात यह है कि 4 जनवरी को राहुल देव बर्मन की भी पुण्यतिथि है। इस दुनिया-ए-फ़ानी को छोड़ कर जाने के लिए इन दोनों शिल्पियों ने साल का लगभग वही दिन चुना जिस दिन पंचम इस दुनिया को छोड़ गए थे। आइए आज ’चित्रकथा’ में पंडित उल्हास बापट और श्री अमृतराव काटकर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए राहुल देव बर्मन के साथ उनके संगीत सफ़र पर नज़र डालें।




संतूर एक ऐसा वाद्य है जो रुद्र वीणा, सितार, सरोद और सारंगी जितना पुराना नहीं है। और यही कारण है कि संतूर के घराने नहीं बने जिस वजह से संतूर वादकों के पास खुला मैदान है प्रयोगों के लिए। पंडित शिव कुमार शर्मा का नाम संतूर में सर्वोपरि ज़रूर  है लेकिन बीते दशकों में कुछ और बड़े कलाकार भी हुए हैं इस वाद्य के। इनमें एक महत्वपूर्ण नाम पंडित उल्हास बापट का है जिन्होंने संतूर में एक नई धारा लेकर आए। 67 वर्ष की आयु में उनके इस दुनिया से चले जाने से संतूर जगत को ऐसी क्षति पहुँची है जिसकी भरपाई होना मुश्किल है। पंडित बापट ने अपना संगीत सफ़र तबले से शुरु किया रमाकान्त म्हापसेकर के पास। 1973 में एक दिन अचानक उन्होंने एक साज़ों की दुकान में संतूर वाद्य को देखा और बिना कुछ सोचे उसे ख़रीद लाए। बिना किसी औपचारिक गुरु के, पंडित बापट ने अपने आप ही उसे बजाना शुरु किया हारमोनियम के नियमों को ध्यान में रख कर। आगे चल कर उन्होंने विभिन्न रागों को बजाया और यही नहीं रागों को आपस में मिला कर यौगिक रागों का सृजन किया। उन्होंने संतूर के कलमों में कुछ ऐसे बदलाव किए जिससे दो मींड के बीच जो अन्तराल या ख़ाली जगह होता था, वो ग़ायब हो गया। यही नहीं, पंडित जी ने कलमों के अन्त में एक मेटल स्ट्रिप भी जोड़ा जिससे कि दोनों में से किसी एक को संतूर के तार से घिसते हुए दूसरे को तार पर मारा जा सके। पंडित उल्हास बापट शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान ततो दिया ही है, साथ ही साथ फ़िल्म संगीत में उनके योगदान को भी भुलाया नहीं जा सकता। ख़ास तौर से राहुल देव बर्मन के साथ उन्होंने एक लम्बी पारी खेली और पंचम के तमाम यादगार गीतों को अपने दिलकश संतूर के टुकड़ों से सजाया।

पंचम के तमाम गीतों में हमने संतूर के यादगार टुकड़े सुने हैं, लेकिन हम में से शायद बहुत कम ही लोग ऐसे होंगे जिन्हें पता होगा कि इन टुकड़ों को दरसल पंडित उल्हास बापट ने बजाया है। पंचम के साथ पंडित बापट का सफ़र शुरु हुआ था 1978 की फ़िल्म ’घर’ से। पंडित शिव कुमार शर्मा ने भी पंचम के साथ काम किया है जिसमें "काली पलक तेरी गोरी", "करवटें बदलते रहे सारी रात हम", "प्यार के दिन आए काले बादल छाये", "ये लड़का हाय अलाह कैसा है दीवाना" जैसे गीत शामिल हैं। पंडित बापट के बजाए गीतों में "राह पे रहते हैं यादों पे बसर करते हैं" (नमकीन),  "हुज़ूर इस क़दर भी ना इतरा के चलिए" (मासूम), "मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है" (इजाज़त), "जाने क्या बात है, नींद नहीं आती" (सनी), "तेरे लिए पलकों की झालर बुनूँ" (हरजाई), "रिमझिम रिमझिम रुमझुम रुमझुम" (1942 A Love Story), "प्यार हुआ चुपके से" (1942 A Love Story), "सीली हवा छू गई" (लिबास) जैसे यादगार गीत शामिल हैं। पंडित उल्हास बापट एक ऐसे संतूर वादक थे जिन्हे क्रोमेटिक ट्युनिंग् की महारथ हासिल थी। 12 सुरों को अगर लगातार बजाया जाता रहे तो वो क्रोमेटिक ट्युनिंग् जैसा सुनाई देता है। पंडित बापट अकेले ऐसे कलाकार रहे जो संतूर पर इस तरह की ट्युनिंग् कर पाते थे और यही कारण था कि वो किसी भी स्केल के गीत को आसानी से संतूर पर बजा लेते थे, जो सामान्यत: संतूर पर बहुत मुश्किल होता है। उदाहरण के तौर पर 1981 की फ़िल्म ’ज़माने को दिखाना है’ के मशहूर गीत "दिल लेना खेल है दिलदार का" शुरु होता है डी स्केल से और पंडित जी का संतूर आता है सी-स्केल पर। लेकिन क्योंकि वो एक क्रोमेटिक ट्युनर थे, वो दोनो सेक्शन बजा लेते थे। 

क्रोमेटिक ट्युनिंग् जैसी मुश्किल विधा के अलावा पंडित उल्हास बापट ने संतूर की एक तकनीक का आविष्कार भी किया जिसका पेटेण्ट उनके पास है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में इसे मींड कहा जाता है जिसमें एक सुर से दूसरे सुर पर बिना अन्तराल के जाया जा सकता है। संतूर के कलमों में कुछ बदलाव करके पंडित बापट ने मींड को संतूर में साकार किया और पहली बार 1982 की फ़िल्म ’अंगूर’ के गीत "होठों पे बीती बात" में प्रयोग किया। यह पहला अवसर था कि जब पंचम ने उन्हें अपने गीत में मींड तकनीक प्रयोग करने का मौका दिया। इस गीत में यह प्रयोग इतना खरा उतरा कि पंचम ने चिल्लाते हुए कहा, "यह लड़का ने क्या कमाल किया है, संतूर पे मींड लाया है!" पंचम ख़ुद भी एक प्रयोगधर्मी संगीतकार थे, इसलिए पंडित बापट के साथ उनकी ट्युनिंग् ख़ूब जमी। 1987 के प्राइवेट ऐल्बम ’दिल पड़ोसी है’ में भी इसी मींड पद्धति का प्रयोग किया गया है। पंचम के अलावा पंडित बापट ने कई और संगीतकारों के गीतों में भी बजाया है जिनमें एक उल्लेखनीय नाम है रवीन्द्र जैन का। उनके साथ पहली बार 1979 की फ़िल्म ’सुनैना’ के पार्श्व-संगीत में उन्होंने बजाया। ’राम तेरी गंगा मैली’ के गीतों और पार्श्व-संगीत में भी पंडित बापट के सुमधुर संतूर के पीसेस सुनाई देते हैं। रवीन्द्र जैन के साथ उन्होंने लगभग 40 फ़िल्मों में काम किया है। पंडित उल्हास बापट ने 2004 की फ़िल्म ’वीर ज़ारा’ में भी बजाया, फ़िल्म के मुख्य गीत "तेरे लिए हम हैं जिये" के शुरुआती संगीत में ही उनके संतूर की ध्वनियों ने ऐसा समा बांधा कि सुनने वाले उसमें बहते चले गए। एक लम्बी बीमारी के बाद पंडित बापट इस दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर गए, पर पीछे छोड़ गए संतूर और संगीत का एक ऐसा ख़ज़ाना जो आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाता रहेगा। पंडित उल्हास बापट की पुण्य स्मृति को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ का विनम्र नमन!


राहुल देव बर्मन के संगीत में कई महत्वपूर्ण साज़िन्दों, संगीत संयोजकों और सहायकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। मारुति राव, होमी मुल्ला, रणजीत गज़मर, बासुदेव चक्रबर्ती, मनोहारी सिंह, फ़्रैंको वाज़, रमेश अय्यर के साथ साथ एक महत्वपूर्ण नाम अमृतराव काटकर का भी है। अमृतराव काटकर एक ऐसे संगीत शिल्पि थे जो पंचम के साथ शुरु से ही जुड़े हुए थे और पंचम के ’रेसो-रेसो’ (Reso Reso) नामक वाद्य में जान फूंकने का श्रेय अमृतराव को जाता है। 15 जनवरी 2018 को अमृतराव काटकर के इस दुनिया-ए-फ़ानी से चले जाने से पंचम बैण्ड का एक और महत्वपूर्ण सदस्य हमसे बिछड़ गया। पंचम के गीतों में इस वाद्य का जितना प्रयोग हुआ, शायद ही किसी अन्य संगीतकार के गीतों में उससे पहले हुआ होगा। और इस दिशा में अमृतराव साहब का महत्वपूर्ण योगदान रहा। रेसो-रेसो मूलत: एक अफ़्रीकन वाद्य है जिसे ’स्क्रेपर’ (scraper) भी कहा जाता है। इस वाद्य को अतिरिक्त या सहायक रीदम के तौर पर प्रयोग किया जाता है जिससे कि मूल ताल या रीदम को अतिरिक्त धार या तिगुना गति मिल जाती है। रेसो वाद्य खोखले बाँस का बना होता है, एक पाइप के आकार में। निर्धारित दूरियों पर स्केल चिन्हित किया जाता है। जब इसका इस्तमाल कंघी जैसे किसी सपाट स्ट्रिप के साथ किया जाता है तो इससे बहुत ही तीक्ष्ण ध्वनि उत्पन्न होती है। इस अतिरिक्त रीदम को ’साइड रीदम’ भी कहा जाता है। पंचम के गीतों में साइड रीदम के लिए रेसो के अलावा खंजिरी, कब्बाज़ आदि का प्रयोग भी काफ़ी हुआ है। उनके गीतों में रेसो का प्रयोग 1965 की फ़िल्म ’तीसरी मंज़िल’ के गीतों से ही शुरु हो गया था। "आजा आजा मैं हूँ प्यार तेरा", "ओ मेरे सोना रे" और "ओ हसीना ज़ुल्फ़ों वाली" में रेसो का साइड रीदम में इस्तमाल महसूस किया जा सकता है। लेकिन जिस गीत में रेसो का प्रयोग सबसे ज़्यादा प्रॉमिनेण्ट रहा, वह था "मेरे सामने वाली खिड़की में"। इस गीत की शुरुआत में किशोर कुमार के आलाप और उन सात खंबों के बाद रेसो ही पूरे रीदम पर हावी रहता है। यूं तो रेसो को मुख्य रीदम के सहारे के रूप में प्रयोग किया जाता है, लेकिन पंचम ने उल्टा रुख़ अपनाया और रेसो को ही रीदम का मुख्य वाद्य बना लिया। ’पड़ोसन’ के इस गीत में केश्टो मुखर्जी द्वारा झाड़ू पर कंघी बजाने वाले जगह में दरसल रेसो पर कंघी पा प्रयोग होता है।

पंचम के गीतों में रेसो के महत्वपूर्ण प्रयोग के बारे में हमने जाना, लेकिन इन सब के पीछे जिस व्यक्ति का सबसे बड़ा योगदान रहा है, वो अमृतराव काटकर हैं, जिन्हें सभी प्यार से अमृत काका कह कर बुलाते थे। वो असल में एक तबला वादक थे लेकिन पंचम और उनके रीदम सेक्शन के प्रमुख मारुतिराव कीरजी ने उन्हें रेसो वादक बना दिया। अमृतराव ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जल्दी ही उन्होंने एक अपना अलग स्टाइल बना लिया रेसो के इस्तमाल का। उन्होंने इस विधा में ऐसी महारथ हासिल की कि आज वो भारत के शीर्ष के रेसो वादक के रूप में जाने जाते हैं। एक तबला वादक को रेसो वादक के रूप में स्थापित करने में पंचम और उनके गीतों का बड़ा हाथ रहा है। कंघी बजाने जैसी आवाज़ें पंचम के गीतों में कई बार सुनने को मिला है, जो रेसो की ध्वनियाँ हैं, और इन सबके पीछे हैं अमृतराव काटकर। ’कटी पतंग’ के "मेरा नाम है शबनम" गीत तो पूर्णत: रेसो और बॉंगो पर आधारित है। फ़िल्म ’सागर’ का गीत "सच मेरे यार है" भी तो रेसो से ही शुरु होता है। अमृतराव ने 1982-83 के आसपास रेसो के प्रयोग में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया। गीत था ’सनम तेरी कसम’ का "जानेजाँ ओ मेरी जानेजाँ"। पारम्परिक बाँस के बने रेसो के स्थान पर वो लेकर आए धातु से बना रेसो। गीत के दूसरे इन्टरल्युड संगीत में इस नए रेसो को सुना व महसूस किया जा सकता है। 

यूं तो एक अफ़्रीकन साज़ होने की वजह से रेसो का इस्तमाल साधारणत: उन गीतों में होता है जो तेज़ गति या तेज़ रीदम का हो, या कैबरे किस्म का कोई गीत हो, लेकिन पंचम और अमृतराव ने मिल कर रेसो को शास्त्रीय संगीत आधारित रचनाओं में भी प्रयोग किया और इस तरह के गीतों को एक नया रूप मिला। ’ख़ूबसूरत’ फ़िल्म के गीत "पिया बावरी पी कहाँ", ’अमर प्रेम’ के गीत "चिंगारी कोई भड़के तो सावन उसे बुझाये", ’जुर्माना’ के गीत "सावन के झूले पड़े तुम चले आओ" और ’महबूबा" के गीत "मेरे नैना सावन भादों" में रेसो का प्रयोग करके इन दोनों ने सभी को चमत्कृत कर दिया। कितने आश्चर्य की बात है कि पंचम की पुण्यतिथि 4 जनवरी है और उनके ये दिग्गज साज़िंदे भी जनवरी के महीने में ही इस फ़ानी दुनिया को छोड़ कर जा रहे हैं। 4 जनवरी को पंडित उल्हास बापट और 15 जनवरी को अमृतराव काटकर के चले जाने से यूं लगा कि जैसे ये दोनों पंचम से ही फिर एक बार मिलने के लिए अपनी अपनी अनन्त यात्रा पर निकल पड़े हों। इन दो महान संगीत साधकों को ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ करती है झुक कर सलाम!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!





शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Thursday, June 1, 2017

"सातों बार बोले बंसी" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल

महफ़िल ए कहकशाँ 23





पंचम, आशा ताई और गुलज़ार 

दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकला एक नगमा 'दिल पडोसी है' एल्बम से| 










मुख्य स्वर - पूजा अनिल, रीतेश खरे एवं सजीव सारथी 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी


Thursday, May 4, 2017

अपने पडो़सी दिल से भीनी-भीनी भोर की माँग कर बैठे गोटेदार गुलज़ार साहब, आशा जी एवं राग तोड़ी वाले पंचम दा


महफ़िल ए कहकशाँ 22





पंचम, आशा ताई और गुलज़ार 

दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकला एक नगमा 'दिल पडोसी है' एल्बम से| 










मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी



Wednesday, February 9, 2011

"सातों बार बोले बंसी" और "जाने दो मुझे जाने दो" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #११०

बाद मुद्दत के फिर मिली हो तुम,
ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम,
ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है..

अभी कुछ दिनों पहले हीं भरी-पूरी फिल्मफेयर की ट्रॉफ़ी स्वीकार करते समय गुलज़ार साहब ने जब ये पंक्तियाँ कहीं तो उनकी आँखों में गज़ब का एक आत्म-विश्वास था, लहजे में पिछले ४८ सालों की मेहनत की मणियाँ पिरोई हुई-सी मालूम होती थीं और बालपन वैसा हीं जैसे किसी पाँचवे दर्ज़े के बच्चे को सबसे सुंदर लिखने या सबसे सुंदर कहने के लिए "इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स" से नवाज़ा गया हो। उजले कपड़ों में देवदूत-से सजते और जँचते गुलज़ार साहब ने अपनी उम्र का तकाज़ा देते हुए नए-नवेलों को खुद पर गुमान करने का मौका यह कह कर दे दिया कि "अच्छा लगता है, आपके साथ-साथ यहाँ तक चला आया हूँ।" अब उम्र बढ गई है तो नज़्म भी पुरानी होंगी साथ-साथ, लेकिन "दिल तो बच्चा है जी", इसलिए हर दौर में वही "छुटभैया" दिल हर बार कुछ नया लेकर हाज़िर हो जाता है। यूँ तो यह दिल गुलज़ार साहब का है, लेकिन इसकी कारगुजारियों का दोष अपने मत्थे नहीं लेते हुए, गुलज़ार साहब "विशाल" पर सारा दोष मथ देते हैं और कहते हैं कि "इस नवजवान के कारण हीं मैं अपनी नज़्मों को जवान रख पाता हूँ।" अब इसे गुलज़ार साहब का बड़प्पन कहें या छुटपन.. लेकिन जो भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि लगभग पचास सालों से चल रही इनकी लेखनी अब भी दवात से लबालब है.. अब भी दिल पर वही सुंदर-से "हस्ताक्षर" रचती रहती है.. वही गोल-गोल अक्षर.. गोल-गोल अंडा, मास्टर-जी का डंडा, बकड़ी की पूँछ, मास्टर-जी की मूँछ... और लो बन गया "क".. ऐसे हीं प्यारे-प्यारे तरीकों से और कल्पना की उड़ानों के सहारे गुलज़ार साहब हमारे बीच की हीं कोई चीज हमें सौंप जाते हैं, जिसका तब तक हमें पता हीं नहीं होता। ८ सितम्बर १९८७ को भी यही बात हुई थी। उस दिन जब गुलज़ार साहब ने हमें "दिल" का अड्डा बताया, तभी हमें मालूम हुआ कि यह नामुराद कोई और नहीं "हमारा पड़ोसी है", यह ऐसा पड़ोसी है जो "हमारे ग़म उठा लेता है, लेकिन हमारे ग़मों को दूर नहीं करता" तभी तो गुलज़ार साहब कहते हैं:

हाँ मेरे ग़म तो उठा लेता है, ग़मख्वार नहीं,
दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..


("ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम..." यह सुनकर आपको नहीं लगता कि शायर ने किसी खास के लिए ये अल्फ़ाज़ कहे हैं। अलग बात है कि फिल्मफेयर की बलैक-लेडी पर भी ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं, लेकिन पवन झा जी की मानें तो गुलज़ार साहब ने कुछ सालों पहले "एक खास" के लिए यह नज़्म लिखी थी.. वह खास कौन है? यह पूछने की ज़रूरत भी है क्या? :) )

हाँ तो हम गुलज़ार साहब और "दिल पड़ोसी है" की बातें कर रहे थे। इस एलबम के एक-एक गीत को गुलज़ार साहब ने इतनी शिद्दत से लिखा है (वैसे ये हर गीत को उतनी हीं मेहनत, शिद्दत और हसरत से रचते हैं) कि मुझसे अपनी पसंद के एक या दो गाने चुनते नहीं बन रहे। "कोयले से हीरे को ढूँढ निकाला जा सकता है, लेकिन जहाँ हीरे हीं हीरे हो वहाँ पारखी का सर घूम न जाए तो कहना।" वैसे मैं अपने आप को पारखी नहीं मानता लेकिन हीरों के बीच बैठा तो ज़रूर हूँ।.... शायद एक-एक हीरा परखता चलूँ तो कुछ काम बने। अब ज़रा इसे देखिए:

चाँद पेड़ों पे था,
और मैं गिरजे में थी,
तूने लब छू लिए,
जब मैं सजदे में थी,
कैसे भूलूँगी मैं, वो घड़ी गश की थी,
ना तेरे बस की थी, ना मेरे बस की थी..
(रात क्रिसमस की थी)

या फिर इसे:

माँझी रे माँझी, रमैया माँझी,
मोइनी नदी के उस पार जाना है,
उस पार आया है जोगी,
जोगी सुना है बड़ा सयाना है..

शाम ढले तो पानी पे चलके पार जाता है,
रात की ओट में छुपके रसिया मोहे बुलाता है,
सोना सोना, जोगी ने मेरा
जाने कहाँ से नाम जाना है..
(माँझी रे माँझी)

यहाँ पर माँझी और मोइनी नदी के बहाने "माया-मोह" की दुनिया के उस पार बसे "अलौकिक" संसार की बात बड़े हीं खूबसूरत और सूफ़ियाना तरीके से गुलज़ार साहब ने कह दी है। ऐसी हीं और भी कई सारी नज़्में हैं इस एलबम में जिसमें गुलज़ार, पंचम और आशा की तिकड़ी की तूती गूँज-गूँज कर बोलती है। जिस तरह हमने पिछली कड़ी में खुद इन दिग्गजों से हीं इनकी पसंद-नापसंद और गानों के बनने की कहानी सुनी थी, उसी तरह आज भी क्यों न वह बागडोर इन्हीं को सौंप दी जाए। (साभार: सजीव जी एवं सुजॉय जी)

आशा: "सातों बार बोले बंसी"

पंचम: इसके बारे में गुलज़ार, तुम बताओ।

गुलज़ार: "सातों बार बोले बंसी, एक हीं बार बोले ना.. तन की लागी सारी बोले, मन की लागी खोले ना".. ये गाने में खास बात ये है कि बांसुरी को "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: कैसे?

गुलज़ार: जितनी फूंक तन पे लगती है, उतनी हीं बार बोलती है लेकिन अंदर की बात नहीं बताती। उसके सुर सात हैं, सातों बोलते हैं, जो चुप रहती है जिस बात पे, वो नहीं बोलती।

आशा: वाह!

गुलज़ार: उसमें खूबसूरत बात ये है कि उसको "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए। किस तरह से वो उठके कृष्णा के मुँह लगती है, मुँह लगी हुई है, मुँह चढी हुई है, और वो सारी बातें कहती है, एक जो उसका अपनापन है, वो चुप है, वो नहीं बोलती, उन सात सुरों के अलावा। उसके सारी "इलस्ट्रेशन" जितनी है, वो बाँसुरी के साथ "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: ये गाने में थोड़ा लयकारी भी किया था, सरगम भी किए थे, बड़ा अच्छा था।

आशा: और उसमें बाँसुरी साथ में बोल रही है, और आवाज़ भी आ रही है, तो समझ में नहीं आ रहा कि बाँसुरी बोल रही है कि राधा बोल रही है।

गुलज़ार: हाँ, वही, उसमें "परसोनिफ़िकेशन" है सारी की सारी। फूंक पे बोलती है और वो फूंक पे हीं बोलती है बाँसुरी।

अब चूँकि गुलज़ार साहब ने इस गाने को बड़ी हीं बारीकी से समझा दिया है, इसलिए मुझे नहीं लगता है मुझे कुछ और कहने की ज़रुरत पड़ेगी। तो चलिए पढते और सुनते हैं यह गाना:

सातों बार बोले बंसी,
एक ही बार बोले ना,
तन की लागी सारी बोले,
मन की लागी खोले ना..

चुपके सुर में भेद छुपाये,
फूँक-फूँक बतलाये,
तन की सीधी मन की घुन्नी,
पच्चीस पेंचे खाए,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..

प्रीत की पीड़ा जाने मुई,
छाती छेद पड़े,
उठ-उठ के फिर मुँह लगती है,
कान्हा संग लड़े,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..




नियम से तो हमें बस एक हीं गाने तक अपनी महफ़िल को सीमित रखना चाहिए था, लेकिन बात जब इस "स्वर्णिम" तिकड़ी की हो रही हो तो एक से किसका मन भरता है! यूँ भी हम जितना इनके गाने सुनेंगे, उतना हीं हमें संगीत की बारीकियाँ जानने को मिलेंगी। पंचम दा की यही तो खासियत रही थी कि वे संगीत को बस "ट्रेडिशनल" एवं "कन्वेशनल" वाद्य-यंत्रों तक घेरकर नहीं रखते थे, बल्कि "बोल" के हिसाब से उसमे "रेलगाड़ी की सीटी", "मुर्गे की बाँग", "जहाज का हॉर्न" तक डाल देते थे। तभी तो सुनने वाला इनके संगीत की ओर खुद-ब-खुद खींचा चला आता था। जहाँ तक आशा ताई की बात है, तो इनके जैसा "रेंज" शायद हीं किसी गायिका के पास होगा। ये जितने आराम से "दिल चीज़ क्या है" गाती हैं, उतनी हीं सहूलियत से "दम मारो दम" को भी निभा जाती हैं। अब जहाँ ये तीनों अलग-अलग इतने करामाती हैं तो फिर साथ आ जाने पर "क़यामत" तो आनी हीं है। आशा जी "दिल पड़ोसी है" को अपना सर्वश्रेष्ठ एलबम मानती है.. तभी तो गुलज़ार साहब को उनके जन्मदिवस पर बधाई-संदेश भी इसी के रंग में रंगकर भेज डालती हैं: "भाई जन्म-दिन मुबारक। पंचम, आप और मैं खंडाला में, दिल पड़ोसी है के दिन, मैं जिंदगी में कभी नहीं भूलूंगी।" हम भी इस तिकड़ी को कभी नहीं भूलेंगे। इसी वादे और दावे के साथ चलिए अगली बातचीत और अगले गाने का लुत्फ़ उठाते हैं:

आशा(गाती हैं): "जेते दाओ आमाए डेको ना... "

गुलज़ार: वाह!

पंचम: ये तो आप बंगाली में गा रही हैं.. "प्रोग्राम" का हिन्दी गानों का है।

आशा: हिन्दी हो, पंजाबी हो, चाहे टिम्बकटु की ज़बान हो, गाना सुर जहाँ अच्छे, मतलब जहाँ अच्छा, वो गाना अच्छा होता है।

गुलज़ार: सच में आशा जी, मैंने इसके कई बंगाली गाने चुराए हैं।

आशा: अच्छा?

गुलज़ार: हाँ, बहुत बार। ये पूजा के लिए जो गाने करते हैं, तो मैं पास बैठे हुए, कई बार धुन बहुत अच्छी लगी, जैसे एक, उसके पूरे बंगाली के बोल मुझे याद नहीं, और गौरी दा "फ़ेमस पोयट फ़्रॉम बंगाल"

आशा: गौरी शंकर मजुमदार

गुलज़ार: जी हाँ, और इनके बोल चल रहे थे पूजा के गाने के "आस्थे आमार देरी होबे"

पंचम: आ हा हा

गुलज़ार: उसपे वो गाना लिखा था उस ट्युन पर.. "तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं"

पंचम: ये उसी का गाना?

गुलज़ार: हाँ, आँधी में। और ये भी उसी तरह का गाना इनका, जिसपे आप अभी गा रहीं थीं, "जेते दाव आमाय"

आशा: "दिल पड़ोसी है" में.. (गाती हैं) "जाने दो मुझे जाने दो"।

और ये रहे उस गाने के बोल:

जाने दो मुझे जाने दो
रंजिशें या गिले, वफ़ा के सिले
जो गये जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, _______ कम होगा
गहरी ख़राशों की गहरी निशानियाँ हैं
चेहरे के नीचे कितनी सारी कहानियाँ हैं
माज़ी के सिलसिले, जा चुके जाने दो
ना आ आ..

उम्मीद-ओ-शौक़ सारे लौटा रही हूँ मैं,
रुसवाई थोड़ी-सी ले जा रही हूँ मैं
बासी दिलासों की शब तो गुज़ार आये
आँखों से गर्द सारी रोके उतार आये
आँखों के बुलबुले बह गये, जाने दो
ना आ आ..




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल/नज़्म हमने पेश की है, उसके एक शेर/उसकी एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल/नज़्म को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "आँगन" और मिसरे कुछ यूँ थे-

ओस धुले मुख पोछे सारे
आँगन लेप गई उजियारे

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

आँगन में चहकें गौरैयाँ छत पर बैठा काग
जाड़ों की धूप सलोनी उस पर तेरा ये राग. - शन्नो जी

जिस आँगन में सजन संग हुए फेरे ,
अपनों का सुहाना मंजर याद आए रे - मंजु जी

कोई हँसता है तो तुमसा लगता है
दिल धड़कता है तो तुमसा लगता है
किसी सुबह मेरे आंगन मैं ओस से भीगा
कोई जब फूल खिलता है तो तुमसा लगता है - अवनींद्र जी

बहुत याद आती है
आँगन में लेटी हुई ,
कहानी सुनाती हुई वो मेरी
अम्मा (दादी ) - नीलम जी

डॉक्टर साहब महफ़िल की शुरूआत आपकी टिप्पणी से हुई, मेरे लिए इससे बड़ी बात क्या होगी। आपने सही कहा कि पंचम के गुजरने के बाद अकेले पड़े गुलज़ार के लिए विशाल भारद्वाज राहत की साँस की तरह आए हैं। वैसे बीच-बीच में "भूपिंदर" भी ऑक्सीजन की झलक दिखाते रहते हैं। लेकिन गुलज़ार तो गुलज़ार हैं। इन्हें कहीं एक छोटी-सी चिनगी भी दिख गई तो ये उसे आग में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। इसलिए हमें फ़िक्र करने की कोई ज़रूरत नहीं है। हम तो बस उन पढते और लिखते जाएँगे, बस आप ऐसे हीं हमारा हौसला-आफ़ज़ाई करते रहें। शन्नो जी, घर छोड़कर कहाँ जाएँगीं आप.. आखिरकार लौटकर तो यहीं आना है :) सुजॉय जी, लीजिए हमने आज आपकी फ़रमाईश पूरी कर दी.. आप भी क्या याद करेंगे! मंजु जी, अवनींद्र जी एवं नीलम जी, आपकी स्वरचित पंक्तियों ने महफ़िल के सूनेपन को समाप्त करने में हमारी सहायता की। इसके लिए हम आपके तह-ए-दिल से आभारी हैं। पूजा जी, दिलीप जी से हमारा परिचय कराने के लिए आपका धन्यवाद! लेकिन यह क्या.. शेर किधर हैं? अगली बार ध्यान रखिएगा।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

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