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Sunday, March 19, 2017

राग काफी : SWARGOSHTHI – 309 : RAG KAFI




स्वरगोष्ठी – 309 में आज

फागुन के रंग – 1 : राग काफी गाने-बजाने का परिवेश

विदुषी परवीन सुलताना से सुनिए -‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ की एक नई श्रृंखला “फागुन के रंग” के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला में हम आपसे फाल्गुनी संगीत पर चर्चा करेंगे। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। बसन्त ऋतु के आगमन के साथ ऋतु के अनुकूल गायन-वादन का सिलसिला आरम्भ हो जाता है। इस ऋतु में राग बसन्त और राग बहार आदि का गायन-वादन किया जाता है। होलिका दहन के साथ ही रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। पिछले सप्ताह ही हमने हर्षोल्लास से होलिका दहन और उसके अगले दिन रंगों का पर्व मनाया है। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से होली के रस-रंग को अभिव्यक्त करने के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। आज के अंक में हम पहले इस राग में एक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे, जिसे परवीन सुल्ताना ने स्वर दिया है। इसके साथ ही डॉ. कमला शंकर का गिटार पर बजाया राग काफी की ठुमरी भी सुनेगे। आज की तीसरी प्रस्तुति डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा है।



विदुषी परवीन  सुलताना
राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे ग(कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म ग(कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन मास में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है। आज की पहली प्रस्तुति राग काफी की ठुमरी है। यह ठुमरी विख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना ने प्रस्तुत किया है। खयाल, ठुमरी और भजन गायन में सिद्ध विदुषी परवीन सुल्ताना का जन्म 14 जुलाई, 1950 असम के नौगांव जिलान्तर्गत डाकापट्टी नामक स्थान पर एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता इकरामुल मजीद और दादा मोहम्मद नजीब खाँ से प्राप्त हुई। बाद में 1973 से कोलकाता के सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से उन्हें संगीत का विधिवत मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। पटियाला घराने के गायक उस्ताद दिलशाद खाँ से भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सीखने का अवसर मिला। आगे चल इन्हीं दिलशाद खाँ से उनका विवाह भी हुआ। परवीन सुल्ताना ने पहली मंच-प्रस्तुति 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में दी थी। 1965 से ही उनके ग्रामोफोन रेकार्ड बनने लगे थे। उन्होने कई फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया है। फिल्म दो बूँद पानी, पाकीजा, कुदरत और गदर के गाये गीत अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे। 1976 में मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाजा गया। 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ में गाये गीत के लिए परवीन जी को श्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1986 में उन्हें तानसेन सम्मान और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। इस वर्ष (2014) उन्हें ‘पद्मभूषण’सम्मान के लिए चुना गया है। परवीन जी के गायन में उनकी तानें तीनों सप्तकों में फर्राटेदार चलती हैं। आइए इनकी आवाज़ में सुनते हैं राग मिश्र काफी की कृष्ण की छेड़छाड़ से युक्त, श्रृंगार रस प्रधान एक मोहक ठुमरी।

ठुमरी मिश्र काफी : ‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’ : विदुषी परवीन सुल्ताना



डॉ.कमला शंकर
अभी आपने राग काफी की ठुमरी का रसास्वादन किया। गायन में स्वर संयोजन के साथ ही गीत के शब्द भी रस उत्पत्ति में सहयोगी होते है। किन्तु वाद्य संगीत में शब्द नहीं होते। राग काफी श्रृंगार रस के परिवेश को रचने में पूर्ण समर्थ है, इसे प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए अब हम आपको राग मिश्र काफी की ठुमरी का वादन सुनवाते हैं, वह भी पाश्चात्य संगीत वाद्य हवाइयन गिटार पर। दरअसल आज का पाश्चात्य हवाइयन गिटार प्राचीन भारतीय तंत्रवाद्य विचित्र वीणा का परिवर्तित रूप है। पिछले कुछ दशकों से कई भारतीय संगीतज्ञों ने गिटार में संशोधन कर उसे भारतीय संगीत के अनुकूल बनाया है। सुपरिचित संगीत विदुषी डॉ. कमला शंकर ने भारतीय संगीत के रागों के अनुकूल गिटार वाद्य में कुछ संशोधन किए हैं। कमला जी का गिटार बिना जोड़ की लकड़ी का बना हुआ है। इसमें स्वर और चिकारी के चार-चार तार तथा तरब के बारह तार लगे हैं। डॉ. कमला शंकर का जन्म 1966 में तमिलनाडु के तंजौर नामक जनपद में हुआ था। संगीत की पहली गुरु स्वयं इनकी माँ थीं। बाद में वाराणसी के पण्डित छन्नूलाल मिश्र से खयाल और ठुमरी की शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध सितारवादक विमलेन्दु मुखर्जी से कमला जी ने तंत्रवाद्य की बारीकियाँ सीखी। कमला जी हैं पहली महिला कलाकार हैं जिन्हें भारतीय संगीत के सन्दर्भ में पीएच डी की उपाधि मिली है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और विचित्र वीणा वादक डॉ. गोपाल शंकर मिश्र के निर्देशन में उन्होने अपना शोधकार्य किया। गिटार वादन के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ की आज की कड़ी में हम उनका गिटार पर बजाया राग मिश्र काफी की ठुमरी प्रस्तुत कर रहे हैं।

ठुमरी मिश्र काफी : गिटार वादन : डॉ. कमला शंकर


डॉ.सोमा घोष
भारतीय उपशास्त्रीय संगीत की एक शैली है, टप्पा। अब हम आपको राग काफी का एक टप्पा सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, पूरब अंग की सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. सोमा घोष। बनारस (वाराणसी) में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुम्बई में रह रही सोमा एक समय के महान फिल्मकार नवेन्दु घोष की पुत्रवधू है। संगीत की दुनिया में भी सोमा प्राचीन वाद्यों को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए संघर्षरत है। उन्हें आज जो प्रतिष्ठा मिली है, उसके लिए वह डॉ. राजेश्वर आचार्य से मिली प्रेरणा को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है। विश्वविख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ सोमा जी की प्रतिभा से प्रभावित होकर अपनी दत्तक पुत्री बना लिया था। वर्ष 2001 के एक सांगीतिक आयोजन में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने सोमा जी का गायन सुना और बड़े प्रभावित हुए। तभी उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ जुगलबन्दी करोगी। मुझे बतौर बेटी अपनाने के पहले उन्होंने अपने पूरे परिवार को बताया और सबकी अनुमति ली। इसके बाद ही उन्होंने इसकी घोषणा की। खाँ साहब ने सोमा जी को अपनी कला विरासत का उत्तराधिकारी बनाया था। सोमा जी ने संगीत की शिक्षा सेनिया घराने के पण्डित नारायण चक्रवर्ती और बनारस घराने की विदुषी बागेश्वरी देवी जी से ली। वर्ष 2002 में मुंबई के एक समारोह में सोमा जी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की ऐतिहासिक जुगलबन्दी हुई थी। उस आयोजन में सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता अमिताभ बच्चन जी सपत्नीक टिकट लेकर आए थे। नौशाद साहब पहली पंक्ति के श्रोताओं में थे। सोमा जी ने खयाल गायकी को बिलकुल नई दिशा दी है और ठुमरी, होरी जैसी विधाओं को तो नई पीढ़ी के लिए नए ढंग से लोकप्रिय बनाया है। लीजिए, अब आप डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश की सार्थक अनुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

टप्पा राग काफी : ‘वीरा दे जानियाँ रबी...’ : डॉ. सोमा घोष



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 309वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको तीन में से कम से कम कोई दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के पहले सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।





1 – संगीत के इस अंश में आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – इस प्रस्तुति-अंश को सुन रचना में प्रयोग किए गए ताल का नाम बताइए।

3 – यह भारतीय संगीत की कौन सी शैली है?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 25 मार्च, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 311वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘‘स्वरगोष्ठी’ की 307वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको 1959 में प्रदर्शित फिल्म “चाचा ज़िन्दाबाद” के एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों का उत्तर पूछा गया था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है, राग – ललित, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है, ताल – तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है, स्वर – लता मंगेशकर तथा मन्ना डे

इस अंक के प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, और वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से हमारी नई श्रृंखला ‘फागुन के रंग’ की शुरुआत हो रही है। इस श्रृंखला में हम बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा कर रहे हैं। अगले अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 8 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 



Sunday, March 27, 2016

राग काफी : SWARGOSHTHI – 263 : RAG KAFI




स्वरगोष्ठी – 263 में आज

होली और चैती के रंग – 1 : राग काफी

राग काफी में रची-बसी फागुनी रचनाएँ





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से हमारी नई श्रृंखला – ‘होली और चैती के रंग’ आरम्भ हो रही है। श्रृंखला की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम ऋतु के अनुकूल भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों और रचनाओं की चर्चा करेंगे, जिन्हें ग्रीष्मऋतु के शुरुआती परिवेश में गाने-बजाने की परम्परा है। भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव, प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। अबीर-गुलाल के उड़ते बादलों और पिचकारियों से निकलती इन्द्रधनुषी फुहारों के बीच आज के अंक में और अगले अंक में भी हम फागुन की सतरंगी छटा से सराबोर होंगे। संगीत के सात स्वर, इन्द्रधनुष के सात रंग बन कर हमारे तन-मन पर छा जाएँगे। भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी असंख्य रचनाएँ हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। आज हम आपको राग काफी के स्वरों पर तैरती कुछ फागुनी रचनाएँ सुनवा रहे हैं।


मारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग है- काफी। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जातीं हैं। आइए, पहले हम राग काफी के स्वरों की संरचना पर विचार करते हैं। राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी कोमल गान्धार और संवादी कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिया राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। सुप्रसिद्ध गायिका मालिनी राजुरकर ने राग काफी में एक मोहक तराना गाया है। अब हम आपके लिए द्रुत तीनताल में निबद्ध वही काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। लीजिए सुनिए यह तराना और शब्दों के स्थान पर काफी के स्वरों में होली के परिवेश का अनुभव कीजिए।


राग काफी : द्रुत तीनताल में निबद्ध तराना : स्वर – विदुषी मालिनी राजुरकर




होली, उल्लास, उत्साह और मस्ती का प्रतीक-पर्व होता है। इस अनूठे परिवेश का चित्रण भारतीय संगीत की सभी शैलियों में मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत में तो होली गीतों का सौन्दर्य खूब निखरता है। ठुमरी-दादरा, विशेष रूप से पूरब अंग की ठुमरियों में होली का मोहक चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय संगीत की वरिष्ठ गायिका विदुषी गिरिजा देवी की गायी अनेक होरी हैं, जिनमे राग काफी के साथ-साथ होली के परिवेश का आनन्द भी प्राप्त होता है। बोल-बनाव से गिरिजा देवी जी गीत के शब्दों में अनूठा भाव भर देतीं हैं। आम तौर पर होली गीतों में ब्रज की होली का जीवन्त चित्रण होता है। अब हम आपको विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में जो काफी होरी सुनवा रहे हैं, उसमें राधा-कृष्ण की होली का अत्यन्त भावपूर्ण चित्रण है। लीजिए, आप भी सुनिए, यह मनमोहक काफी होरी।


काफी होरी : ‘तुम तो करत बरजोरी...’ : स्वर – विदुषी गिरिजा देवी




अब हम आपको सुनवाते है, राग काफी पर आधारित एक फिल्मी गीत। 1963 में एक फिल्म- ‘गोदान’ प्रदर्शित हुई थी। उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित थी यह फिल्म, जिसके संगीतकार थे विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और विभिन्न लोक संगीत शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर-समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म- ‘गोदान’ के इस होली गीत का। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग काफी : फिल्म – गोदान : ‘होली खेलत नन्दलाल बिरज में...’ : मुहम्मद रफी





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 263वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह किस राग पर आधारित गीत है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनका नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 2 अप्रैल, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 265वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 261 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1979 में प्रदर्शित फिल्म ‘मीरा’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पूर्वी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – सितारखानी और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – वाणी जयराम

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागी सही उत्तर देकर विजेता बने हैं। ये विजेता हैं - वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल। सभी पाँच प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


पिछली श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ पहेली की पहली श्रृंखला 251वें अंक से लेकर 260वें अंक के बीच आयोजित की गई थी। 251वें अंक में पहेली का प्रश्न नहीं पूछा गया था। इस प्रकार 9 अंको में अधिकतम 18 अंक हुए। श्रृंखला के कुल 12 प्रतिभागियों के प्राप्तांकों की गणना करने के बाद पहले तीन स्थान पर 6 प्रतिभागियों ने विजेता होने का सम्मान प्राप्त किया है। 18 में से 18 अंक अर्जित कर प्रथम स्थान पर चार विजेता हैं- वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। 16 अंक प्राप्त कर दूसरे स्थान पर चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल विजेता हुए हैं। इसी क्रम में 4 अंक अर्जित कर मिन्नेसोटा, अमेरिका से दिनेश कृष्णजोइस ने तीसरा स्थान प्राप्त किया है। सभी विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप पर्व और ऋतु के अनुकूल श्रृंखला ‘होली और चैती के रंग’ की पहली कड़ी का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के पहले अंक में हमने आपसे राग काफी की चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पास हर सप्ताह आपकी फरमाइशे आती हैं। हमारे कई पाठकों ने ‘स्वरगोष्ठी’ में दी जाने वाली रागों के विवरण के प्रामाणिकता की जानकारी माँगी है। उन सभी पाठकों की जानकारी के लिए बताना चाहूँगा कि रागों का जो परिचय इस स्तम्भ में दिया जाता है, वह प्रामाणिक पुस्तकों से पुष्टि करने का बाद ही लिखा जाता है। यह पुस्तकें है; संगीत कार्यालय, हाथरस द्वारा प्रकाशित और श्री वसन्त द्वारा संकलित और श्री लक्ष्मीनारायण गर्ग द्वारा सम्पादित ‘राग-कोष’, संगीत सदन, इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित और श्री हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव द्वारा लिखित पुस्तक ‘राग परिचय’ तथा आवश्यकता पड़ने पर पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे के ग्रन्थ ‘क्रमिक पुस्तक मालिका’। हम इन ग्रन्थों से साभार पुष्टि करके ही आप तक रागों का परिचय पहुँचाते हैं। आप भी अपने विचार, सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते हैं। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

 


Sunday, April 5, 2015

टप्पा गीतों का लालित्य : SWARGOSHTHI – 213 : TAPPA



स्वरगोष्ठी – 213 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 11 : टप्पा

ऊँटों के काफिले के सौदागरों से उपजी टप्पा गायकी 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हमने भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत किया है, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली पिछली तीन कड़ियों में हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय ‘ठुमरी’ शैली पर चर्चा की थी। आज के अंक में हम आपको ठुमरी के साथ-साथ विकसित हुई गीत शैली, टप्पा पर चर्चा करेंगे और उसका रसास्वादन भी करा रहे हैं। आज हम इस गोष्ठी में विख्यात गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर और उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ का गाया टप्पा प्रस्तुत कर रहे हैं। 


पंजाब की धरती पर विकसित संगीत शैली ‘टप्पा’ भी एक श्रृंगाररस प्रधान गायकी है। इस शैली में खयाल और ठुमरी, दोनों की विशेषताएँ उपस्थित रहती है। टप्पा गायन के लिए खयाल और ठुमरी, दोनों शैलियों का प्रशिक्षण और अभ्यास आवश्यक है। इसका विकास चूँकि पंजाब और सिन्ध के पहाड़ी क्षेत्रों में हुआ है, अतः अधिकतर टप्पा पंजाबी भाषा में मिलता है। सिन्ध क्षेत्र में ‘टप्पे’ नामक एक लोकगीत शैली का प्रचलन रहा है। यह लोकगीत आज भी पंजाब में सुनने में आता है। रागदारी संगीत के अन्तर्गत गाया जाने वाला टप्पा, ‘टप्पे’ लोकगीत से काफी भिन्न होता है। कुछ विद्वानों के मतानुसार पंजाब के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में ऊँटों पर अपना व्यापारिक सामान ढोने वाले सौदागरों द्वारा जो लोकगीत गाया जाता था, उनमें रागों का रंग भर कर टप्पा गायन शैली का विकास हुआ। इसे विकसित करने का श्रेय शोरी मियाँ को दिया जाता है। शोरी मियाँ का वास्तविक नाम गुलाम नबी था और ये सुप्रसिद्ध खयाल गायक गुलाम रसूल के पुत्र थे। शोरी मियाँ अठारहवीं शताब्दी में लखनऊ के नवाब आसफुद्दौला के समकालीन थे। उनका कण्ठ खयाल गायकी के अनुकूल नहीं थी, इसीलिए उन्होने अपने गले के अनुकूल टप्पा गायकी को विकसित किया। काफी समय तक पंजाब प्रान्त में रहने के कारण पंजाबी भाषा और उस क्षेत्र के लोक संगीत का उन्हें ज्ञान हो गया था। शोरी मियाँ के पंजाबी भाषा में रचे अनेक टप्पा गीत आज भी गाये जाते हैं। शोरी मियाँ के पंजाब से लखनऊ आने के बाद टप्पा गायन का प्रचार-प्रसार लखनऊ संगीत जगत में भी हुआ। आगे चल कर पूरे उत्तर भारत में टप्पा गाया जाने लगा। पंजाब और लखनऊ के अलावा बनारस और ग्वालियर के प्रमुख खयाल गायकों ने टप्पा को अपना लिया।

अब हम प्रस्तुत करते हैं, ग्वालियर परम्परा में टप्पा गायन का एक उदाहरण, देश की जानी-मानी गायिका विदुषी मालिनी राजुरकर के स्वरों में। 1941 में जन्मीं मालिनी जी का बचपन राजस्थान के अजमेर में बीता और वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा भी सम्पन्न हुई। आरम्भ से ही दो विषयों- गणित और संगीत, से उन्हें गहरा लगाव था। उन्होने गणित विषय से स्नातक की पढ़ाई की और अजमेर के सावित्री बालिका विद्यालय में तीन वर्षों तक गणित विषय पढ़ाया भी। इसके साथ ही अजमेर के संगीत महाविद्यालय से गायन में निपुण स्तर तक शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित गोविन्दराव राजुरकर और उनके भतीजे बसन्तराव राजुरकर से उन्हें गुरु-शिष्य परम्परा में संगीत की शिक्षा प्राप्त हुई। बाद में मालिनी जी ने बसन्तराव जी से विवाह कर लिया। मालिनी जी को देश का सर्वोच्च संगीत-सम्मान, ‘तानसेन सम्मान’ से नवाजा जा चुका है। खयाल के साथ-साथ मालिनी जी टप्पा, सुगम और लोक संगीत के गायन में भी कुशल हैं। लीजिए, उनके मधुर स्वर में सुनिए, राग भैरवी और अद्धा त्रिताल में निबद्ध एक पारम्परिक टप्पा।


टप्पा राग भैरवी : ‘लाल वाला जोबन मियाँ...’ : विदुषी मालिनी राजुरकर




शोरी मियाँ के प्रमुख शिष्य मियाँ गम्मू और ताराचन्द्र थे। इन्होने भी टप्पा गायकी का भरपूर प्रचार किया। मियाँ गम्मू के पुत्र शादी खाँ भी टप्पा गायन में दक्ष थे और तत्कालीन काशी नरेश के दरबारी गवैये थे। लखनऊ, बनारस और ग्वालियर के ख्याल गायन पर भी टप्पा का प्रभाव पड़ा। नवाब वाजिद अली खाँ के समय में तो टप्पा अंग से खयाल गाना, गायक की एक विशेष योग्यता मानी जाती थी। टप्पा अंग से खयाल गायकी को लोकप्रियता मिलने के कारण एक नई गायन शैली का चलन हुआ, जिसे ‘ठप्प खयाल’ कहा जाने लगा। टप्पा की प्रकृति चंचल, लच्छेदार ताने, मुर्की, खटका आदि के प्रयोग के कारण खयाल और ठुमरी की गम्भीरता से दूर है। टप्पा गायन में शुरू से ही छोटी-छोटी दानेदार तानों से सजाया जाता है। स्वरों में किसी प्रकार की रुकावट नहीं होती। बोल आलाप का प्रयोग नहीं किया जाता। खयाल की तरह टप्पा गायन के घराने नहीं होते, किन्तु विभिन्न स्थानों पर विकसित टप्पा गायकी की प्रस्तुतियों में थोड़ा अन्तर मिलता है। ग्वालियर में प्रचलित टप्पा गायकी में खयाल का प्रभाव स्पष्ट नज़र आता है। इसी प्रकार बनारस में गेय टप्पा पर ठुमरी का प्रभाव परिलक्षित होता है। टप्पा का साहित्य श्रृंगाररस प्रधान होता है और ठुमरी की तरह अधिकतर खमाज, भैरवी, काफी, झिंझोटी, तिलंग, पीलू, बरवा आदि रागों में गायी जाती है। इसी प्रकार अधिकतर टप्पा पंजाबी, अद्धा त्रिताल, सितारखानी जैसे सोलह मात्रा के तालों में निबद्ध मिलता है। अब हम आपको रामपुर सहसवान घराने के सुविख्यात गायक उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ का गाया राग काफी का एक टप्पा सुनवाते हैं। आप इस टप्पा गायकी का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


टप्पा राग काफी : आ जा गले लग जा...’ : उस्ताद मुश्ताक हुसेन खाँ





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 213वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक घरानेदार गायक की आवाज़ में खयाल गायन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। पहेली क्रमांक 220 के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश में किस राग का आभास हो रहा है? राग का नाम बताइए।

2 – प्रस्तुत रचना किस ताल में निबद्ध है? ताल का नाम बताइए।

3 - क्या आप गायक स्वर पहचान रहे है? यदि हाँ, तो उनका नाम बताइए।

आप इन प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 11 अप्रेल, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 215वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत किये गए गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और पहली श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 211वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको विख्यात गायिका विदुषी रसूलन बाई के स्वरों में प्रस्तुत की गई ठुमरी का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्नों के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग जोगिया और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दीपचन्दी। इस बार की पहेली में पूछे गए प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

इसके अलावा ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली क्रमांक 201 से 210, अर्थात दस अंकों की पहली श्रृंखला में उपरोक्त तीनों प्रतिभागियों- जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने सभी प्रश्नों के सही उत्तर देकर 20-20 अंक अर्जित कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है। तीनों विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से एक बार पुनः बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ जारी है। श्रृंखला के आज के अंक में हमने आपसे टप्पा शैली पर सोदाहरण चर्चा की। अगले अंक से हम एक नई श्रृंखला शुरू कर रहे है। इस श्रृंखला में हम उत्तर भारतीय संगीत में प्रचलित दस प्रकार के थाट पर चर्चा करेंगे। ‘स्वरगोष्ठी’ के विभिन्न अंकों के बारे में हमें पाठकों, श्रोताओं और पहेली के प्रतिभागियों के अनेक प्रतिक्रियाएँ और सुझाव मिलते हैं। प्राप्त सुझाव और फर्माइशों के अनुसार ही हम अपनी आगामी प्रस्तुतियों का निर्धारण करते हैं। पिछले दिनों हमारी एक नियमित प्रतिभागी पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा है- ‘I would like more students be exposed to this kind of Quizes. It's a good exercise to review the subject and hope you can spread this message to all music lovers. I am doing it only for the fun and enjoy it too. I appreciate very much what you are doing in service to classical music and hope there will be some more ways to add to your website for this purpose’.
विजया जी के प्रति हम आभार प्रदर्शित करते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के नये अंक के साथ हम उपस्थित होंगे। अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, March 15, 2015

रंग ठुमरी के : SWARGOSHTHI – 210 : THUMARI




 
स्वरगोष्ठी – 210 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 8 : ठुमरी

‘रस के भरे तोरे नैन...’






‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नवीन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धान्तों के अनुकूल जो धाराएँ थीं उन्हें स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली कड़ी से हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय खयाल शैली के अन्तर्गत ‘चतुरंग’ गायकी का सोदाहरण परिचय प्रस्तुत किया था। आज के अंक से हम उपशास्त्रीय संगीत के अन्तर्गत ‘ठुमरी’ गीतों पर चर्चा करेंगे और भारतीय संगीत जगत की सुप्रसिद्ध गायिकाएँ विदुषी गिरिजा देवी और बेगम अख्तर की गायी ठुमरियाँ प्रस्तुत करेंगे। 


र्तमान में भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय शैली ‘ठुमरी’ है। यह शैली कैशिकी वृत्ति की मानी जाती है। यह श्रृंगार रस प्रधान, कोमल भाव से युक्त, ललित रागबद्ध और भावपूर्ण गायकी है। अनेक प्राचीन ग्रन्थों में विभिन्न सामाजिक उत्सवों और मांगलिक अवसरों पर स्त्रियॉं द्वारा गायी जाने वाली कैशिकी वृत्ति के गीतों का उल्लेख मिलता है। भरत के नाट्यशास्त्र में भी यह उल्लेख है कि इस प्रकार के गीतों का प्रयोग नृत्य और नाट्य विधा में भावाभिव्यक्ति के लिए किया जाता था। आज भी कथक नृत्य में भाव प्रदर्शन के लिए ठुमरी गायन का प्रयोग किया जाता है। गीत के जिस प्रकार को आधुनिक ठुमरी के नाम से पहचाना जाता है उसका विकास नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल में हुआ। अवध के नवाब वाजिद अली शाह संगीत, नृत्य के प्रेमी और कला-संरक्षक के रूप में विख्यात थे। नवाब 1847 से 1856 तक अवध के शासक रहे। उनके शासनकाल में ही ठुमरी एक शैली के रूप में विकसित हुई थी। उन्हीं के प्रयासों से कथक नृत्य को एक अलग आयाम मिला और ठुमरी, कथक नृत्य का अभिन्न अंग बनी। नवाब ने 'कैसर' उपनाम से अनेक गद्य और पद्य की रचनाएँ भी की थी। इसके अलावा ‘अख्तर' उपनाम से दादरा, ख़याल, ग़ज़ल और ठुमरियों की भी रचना की थी। 7 फरवरी, 1856 को अंग्रेजों ने जब उन्हें सत्ता से बेदखल किया और बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द कर दिया तब उनका दर्द ठुमरी भैरवी –‘बाबुल मोरा नैहर छुटो जाए...’ में अभिव्यक्त हुआ। नवाब वाजिद अली शाह की यह ठुमरी इतनी लोकप्रिय हुई कि तत्कालीन और परवर्ती शायद ही कोई शास्त्रीय या उपशास्त्रीय गायक हो जिसने इस ठुमरी को न गाया हो।

उन्नीसवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी के मध्य तक ठुमरी का विकास नृत्याभिनय और स्वतंत्र गायकी के रूप में हुआ। आरम्भिक काल से ही ठुमरी की दो धाराएँ स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। इसमें पहले प्रकार की ठुमरी नृत्य के साथ गायी जाने वाली ठुमरी है, जिसमें हावभाव और आंगिक अभिनय के तत्व प्रबल होते हैं। दूसरे प्राकार की ठुमरियों में बोलों की भावाभिव्यंजना, स्वर सन्निवेश और काकु का समन्वित प्रयोग होता है। इस प्रकार को ‘गानप्रधान ठुमरी’ कहा जा सकता है। गत्यात्मकता और भावावाभिव्यंजना के आधार पर भी ठुमरियों के दो भेद होते है। इन्हें क्रमशः ‘बोलबाँट की ठुमरी’ और ‘बोलबनाव की ठुमरी’ कहा जाता है। बोलबाँट की ठुमरी गतिप्रधान और बोलबनाव की ठुमरी भावप्रधान होती है। इस श्रृंखला में हम ठुमरी के इन प्रकारों पर आगे चल कर विस्तृत चर्चा करेंगे, परन्तु आज सबसे पहले हम आपको पूरब अंग की बोलबनाव की ठुमरी का एक उदाहरण सुनवाते हैं। राग भैरवी की यह ठुमरी दीपचंदी ताल में निबद्ध है और इसे प्रस्तुत कर रही हैं, विश्वविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी।



ठुमरी भैरवी : ‘रस के भरे तोरे नैन साँवरिया...’ विदुषी गिरिजा देवी




उनीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में लखनऊ में बोलबाँट और बोलबनाव दोनों प्रकार की ठुमरियों का प्रचलन रहा है। परन्तु बोलबाँट ठुमरियों का प्रसार पश्चिमी उत्तर प्रदेश, ब्रज, दिल्ली आदि क्षेत्रों में अधिक हुआ। इसलिए इस प्रकार की ठुमरियों को ‘पछाहीं ठुमरी’ भी कहा जाने लगा। इसी प्रकार लखनऊ से पूर्व दिशा में अर्थात पूर्वी उत्तर प्रदेश, बनारस और बिहार के कुछ क्षेत्रों में ठुमरी की जो शैली विकसित हुई उसे ‘पूरब अंग की ठुमरी’ कहा जाने लगा। 1956 में अँग्रेजों द्वारा बन्दी बनाए जाने के बाद नवाब वाजिद अली शाह को बंगाल के मटियाबुर्ज नामक स्थान पर नज़रबन्द करने के बाद लखनऊ के कई संगीतज्ञ कोलकाता जाकर बस गए। इन्हीं संगीतज्ञों के माध्यम से बंगाल में भी ठुमरी का प्रचार-प्रसार हुआ।

अब हम आपको एक ऐसी अप्रतिम ठुमरी गायिका की गायी ठुमरी सुनवाते हैं, जिन्होने अपनी अपनी शैली का स्वयं निर्माण किया। उस अप्रतिम गायिका का नाम है, अख्तरी बाई फैजाबादी अर्थात बेगम अख्तर, जिनका जन्म 7 अक्तूबर, 1914 को उत्तर प्रदेश के फ़ैज़ाबाद नामक शहर (तत्कालीन अवध) में एक कट्टर मुस्लिम परिवार में हुआ था। एक बार सुविख्यात सरोदवादक उस्ताद सखावत हुसेन खाँ के कानों में अख्तरी के गुनगुनाने की आवाज़ पड़ी। उन्होने परिवार में ऐलान कर दिया कि आगे चल कर यह नन्ही बच्ची असाधारण गायिका बनेगी, और देश-विदेश में अपना व परिवार का नाम रोशन करेगी। उस्ताद ने अख्तरी के माता-पिता से संगीत की तालीम दिलाने का आग्रह किया। पहले तो परिवार का कोई भी सदस्य इसके लिए राजी नहीं हुआ किन्तु अख्तरी की माँ ने सबको समझा-बुझा कर अन्ततः मना लिया। उस्ताद सखावत हुसेन ने अपने मित्र, पटियाला के प्रसिद्ध गायक उस्ताद अता मुहम्मद खाँ से अख्तरी को तालीम देने का आग्रह किया। वे मान गए और अख्तरी उस्ताद के पास भेज दी गईं। मात्र सात वर्ष की आयु में उन्हें उस्ताद के कठोर अनुशासन में रियाज़ करना पड़ा। तालीम के दिनों में ही उनका पहला रिकार्ड- ‘वह असीरे दम बला हूँ...’ बना और वे अख्तरी बाई फैजाबादी बन गईं। उस्ताद अता मुहम्मद खाँ के बाद उन्हें पटना के उस्ताद अहमद खाँ से रागों की विधिवत शिक्षा मिली। इसके अलावा बेगम अख्तर को उस्ताद अब्दुल वहीद खाँ और हारमोनियम वादन में सिद्ध उस्ताद गुलाम मुहम्मद खाँ का मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। बेगम अख्तर यद्यपि खयाल गायकी में अत्यंत कुशल थीं किन्तु उन्हें ठुमरी और गज़ल गायन में सर्वाधिक ख्याति मिली। बेगम अख्तर की गायकी में शुचिता थी और श्रोताओं के हृदय को छूने की क्षमता भी थी। अब हम आपके लिए बेगम अख्तर के स्वर में एक होरी ठुमरी प्रस्तुत करते हैं। होली के माहौल में आप यह ठुमरी सुनिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



होरी ठुमरी : ‘कैसी ये धूम मचाई...’ : बेगम अख्तर





संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक महान गायक की आवाज़ में कण्ठ संगीत की रचना का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।

3 – इस रचना के गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 21 मार्च, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 212वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 208वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको महान गायक पण्डित जसराज के स्वरों में प्रस्तुत चतुरंग का एक एक अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग श्याम कल्याण, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल द्रुत तीनताल और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- पण्डित जसराज। इस बार पहेली के तीन में से दो प्रश्नों के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने तीनों प्रश्नों के सही उत्तर दिये हैं। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ का यह अंक हम पिछले रविवार को कुछ आपरिहार्य कारणों से नहीं प्रकाशित कर सके, जिसके लिए हमें खेद है। हम आपके इस प्रिय साप्ताहिक स्तम्भ का निर्बाध प्रकाशन करने का प्रयास करते हैं, किन्तु कभी-कभी तकनीकी व्यवधान के कारण हम ऐसा नहीं कर पाते। भविष्य में हम स्तम्भ की निरन्तरता का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आज के अंक से हम जारी श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ के अन्तर्गत ठुमरी गायकी पर चर्चा शुरू की है। आपको यह अंक कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। अगले अंक में हम आपका परिचय ठुमरी के कुछ अन्य प्रकार कराएंगे। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा का सदुपयोग करेने। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। आज बस इतना ही, अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Sunday, March 23, 2014

फिल्मों के राग आधारित होली गीत


स्वरगोष्ठी – 160 में आज

रागों के रस-रंग से अभिसिंचित फिल्मों में राधाकृष्ण की होली


‘बिरज में होली खेलत नन्दलाल...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली कड़ी में अबीर-गुलाल के उड़ते सतरंगी बादलों के बीच सप्तस्वरों के माध्यम से सजाई गई महफिल में आपने धमार के माध्यम से होली के मदमाते परिवेश की सार्थक अनुभूति की है। हम यह चर्चा पहले भी कर चुके हैं कि भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी रचनाएँ मौजूद हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। इस श्रृंखला में अब तक हमने फिल्म संगीत के अलावा संगीत की इन सभी शैलियों में से रचनाएँ चुनी हैं। आज के अंक में हम विभिन्न रागों पर आधारित कुछ फिल्मी होली गीत लेकर आपके बीच उपस्थित हुए हैं। आज हम आपको राग काफी, पीलू और भैरवी पर आधारित फिल्मी होली गीत सुनवा रहे हैं। 



सांस्कृतिक दृष्टि से ब्रज की होली और इस अवसर के संगीत-नृत्य की परम्परा विख्यात है। फिल्मों में भी ब्रज की होली के प्रसंग खूब चित्रित हुए हैं। आज के अंक में प्रस्तुत किये जाने वाले तीनों गीत राधाकृष्ण की होली से जुड़े हुए हैं। हमारे संगीत का एक अत्यन्त मनमोहक राग काफी है। इस राग में होली विषयक रचनाएँ खूब मुखर हो जाती हैं। राग काफी पर आधारित एक बेहद आकर्षक गीत 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से हमने लिया है। यह फिल्म उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचन्द की कालजयी कृति ‘गोदान’ पर आधारित थी। फिल्म के संगीतकार विश्वविख्यात सितार-वादक पण्डित रविशंकर थे। फिल्म के प्रायः सभी गीत रागों और विभिन्न लोक संगीत की शैलियों पर आधारित थे। इन्हीं में एक होली गीत भी था, जिसे गीतकार अनजान ने लिखा और मोहम्मद रफी और साथियों ने स्वर दिया था। यह होली गीत फिल्म में गोबर की भूमिका निभाने वाले अभिनेता महमूद और उनके साथियों पर फिल्माया गया था। इस गीत के माध्यम से परदे पर ग्रामीण होली का परिवेश साकार हुआ था। लोकगीत के स्वरूप में होते हुए भी राग काफी के स्वर-समूह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होते हैं। इस श्रृंखला के पिछले अंकों में हम राग काफी के स्वरूप पर विस्तार से चर्चा कर चुके हैं। आइए, हम सब आनन्द लेते है, फिल्म ‘गोदान’ के इस होली गीत का।


फिल्म – गोदान : ‘होली खेलत नन्दलाल बिरज में...’ : संगीत – पं. रविशंकर : मोहम्मद रफी और साथी



यूँ तो राग काफी में होली की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं, परन्तु कुछ अन्य राग भी हैं जिनमें रंगों के इस पर्व के परिवेश का अनूठा चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय रचनाओं में प्रायः होली का चित्रण राग देस, खमाज, तिलंग, पीलू आदि में भी मिलता है। 1996 में एक संगीतप्रधान फिल्म ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग का एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। फिल्म में यह गीत आशा भोसले और आरती अंकलीकर की आवाज़ में दो अलग-अलग प्रसंगों में फिल्माया गया है। उपशास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली के रंग किस खूबी से निखरता हैं।


फिल्म – सरदारी बेगम : ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के...’ : संगीत – वनराज भाटिया : आरती अंकलीकर



रंग-रंगीली होली के समापन पर्व पर ‘स्वरगोष्ठी’ की इस विशेष श्रृंखला का समापन हम संगीत के मंचों की परम्परा के अनुसार राग भैरवी की एक ऐतिहासिक महत्त्व की रचना से करेंगे। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दो दशकों में दिल्ली में ठुमरी के कई गायक और रचनाकार हुए, जिन्होंने इस शैली को समृद्धि प्रदान की। इन्हीं में एक थे गोस्वामी श्रीलाल, जिन्होंने ‘पछाही ठुमरी’ (पश्चिमी ठुमरी) को विकसित किया था। इनका जन्म 1860 में दिल्ली के एक संगीतज्ञ परिवार में हुआ था। संगीत की शिक्षा इन्हें अपने पिता गोस्वामी कीर्तिलाल से प्राप्त हुई थी। ये सितारवादन में भी प्रवीण थे। ‘कुँवरश्याम’ उपनाम से उन्होने अनेक ध्रुवपद, धमार, ख़याल, ठुमरी आदि की रचनाएँ की। इनका संगीत स्वान्तःसुखाय और अपने आराध्य भगवान् श्रीकृष्ण को सुनाने के लिए ही था। जीवन भर इन्होने किशोरीरमण मन्दिर से बाहर कहीं भी अपने संगीत का प्रदर्शन नहीं किया। इनकी ठुमरी रचनाएँ कृष्णलीला प्रधान तथा स्वर, ताल और साहित्य की दृष्टि से अति उत्तम है। राग भैरवी की ठुमरी- ‘बाट चलत नई चुनरी रंग डारी श्याम...’, कुँवरश्याम जी की सुप्रसिद्ध रचना है। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में भी देवालय संगीत की परम्परा कहीं-कहीं दीख पड़ती थी। संगीतज्ञ कुँवरश्याम इसी परम्परा के संवाहक और पोषक थे। आज हम यही पसिद्ध ठुमरी आपको सुनवाएँगे। राधाकृष्ण की होली के रंगों से सराबोर इस ठुमरी अनेक सुप्रसिद्ध गायकों ने स्वर दिया है। 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘लड़की’ में गायिका गीता दत्त ने और 1957 की फिल्म ‘रानी रूपमती’ में कृष्णराव चोनकर और मुहम्मद रफी ने भी इस ठुमरी को अपना स्वर दिया था। राग भैरवी के स्वरों पर आधारित यह ठुमरी अब हम प्रस्तुत कर रहे है। पार्श्वगायिका गीता दत्त की आवाज़ में फिल्म ‘लड़की’ के इस गीत का संगीत धनीराम और आर. सुदर्शनम् ने दिया था। आप राग भैरवी के स्वरों में राधाकृष्ण की होली का आनन्द लीजिए और मुझे इस अंक और इस लघु श्रृंखला को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


फिल्म – लड़की : ‘बाट चालत नई चुनरी रंग डारी श्याम...’ : संगीत – धनीराम और आर. सुदर्शनम् : गीता दत्त





आज की पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक फिल्म संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – गीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 162वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ की 158वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित आशीष सांकृत्यायन के स्वरों में एक धमार रचना का अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- धमार और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग खमाज। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने दिया है। चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दूसरे प्रश्न में राग पहचानने में भूल की है। अतः उन्हें इस पहेली में केवल एक अंक ही मिलेगा। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में बसन्तोत्सव पर केन्द्रित लघु श्रृंखला जारी है। अभी तक आपने फाल्गुनी रस-रंग में पगी रचनाओं का आनन्द लिया। अगले अंक में हम एक और ऋतु आधारित संगीत शैली पर आपसे चर्चा करेंगे। आप अपनी पसन्द के गीत-संगीत की फरमाइश हमे भेज सकते हैं। हमारी अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को प्रातः 9 बजे एक नए अंक के साथ हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, March 2, 2014

राग काफी में खयाल, तराना और भजन


स्वरगोष्ठी – 157 में आज

फाल्गुनी परिवेश में राग काफी के विविध रंग


‘कान्ह कुँवर के कर-पल्लव पर मानो गोवर्धन नृत्य करे...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली कड़ी से हमने फाल्गुनी परिवेश के सर्वप्रिय राग काफी पर चर्चा आरम्भ की है। फाल्गुन मास में शीत ऋतु का क्रमशः अवसान और ग्रीष्म ऋतु की आहट होने लगती है। यह परिवेश उल्लास और श्रृंगार भाव से परिपूर्ण होता है। प्रकृति में भी परिवर्तन परिलक्षित होने लगता है। रस-रंग से परिपूर्ण फाल्गुनी परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से श्रृंगार रस की अभिव्यक्ति के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। पिछले अंक में हमने इस राग में ठुमरी और टप्पा प्रस्तुत किया था। आज के अंक में हम राग काफी में खयाल, तराना और भजन प्रस्तुत करेंगे, जिसे क्रमशः विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे, पण्डित कुमार गन्धर्व और पण्डित जसराज की आवाज़ में प्रस्तुत किया गया है। 
 


पिछले अंक में हमने राग काफी के स्वरूप पर चर्चा करते हुए निवेदन किया था कि राग काफी, इसी नाम से पहचाने जाने वाले काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी में धमार गायकी से लेकर खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, टप्पा और भजन आदि रचनाएँ आकर्षक लगती हैं। चंचल प्रकृति के इस राग में निबद्ध रचनाओं के माध्यम से उल्लास और उमंग का भाव सहज ही सृजित किया जा सकता है। ठुमरियों में प्रायः मिश्र काफी का रूप मिलता है। रस और भाव में विविधता के लिए राग काफी के स्वर-संगतियों में प्रयोग की अपार सम्भावनाएँ हैं। राग का ऐसा ही एक रूप आज के इस अंक में हम प्रस्तुत कर रहे हैं। राग के इस रूप को काफी कान्हड़ा के नाम से पहचाना जाता है। राग काफी कान्हड़ा में आरोह के स्वर काफी के अनुसार प्रयोग होते है, जबकि अवरोह के स्वर कान्हड़ा अंग में प्रयोग किए जाते हैं। राग काफी की प्रवृत्ति चंचल होती है और कान्हड़ा की प्रवृत्ति गम्भीर होती है। राग काफी कान्हड़ा में परस्पर विरोधी भाव उत्पन्न करने का प्रयास होता है। अब हम आपको राग काफी कान्हड़ा में आपको द्रुत खयाल की एक मोहक रचना का रसास्वादन कराते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही है, सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. अश्विनी भिड़े देशपाण्डे।

डॉ. अश्विनी भिड़े जयपुर अतरौली खयाल गायकी परम्परा की एक सर्वप्रिय गायिका हैं। मुख्यतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात अश्विनी जी ठुमरी, दादरा, भजन और अभंग गायन में भी समान रूप से दक्ष हैं। उनकी प्रारम्भिक संगीत शिक्षा गन्धर्व महाविद्यालय से और पारम्परिक संगीत की शिक्षा पण्डित नारायण राव दातार से पलुस्कर परम्परा में हुई। बाद में उन्हें अपनी माँ श्रीमती माणिक भिड़े और गुरु पण्डित रत्नाकर पै से जयपुर अतरौली परम्परा में मार्गदर्शन भी प्राप्त हुआ। अश्विनी जी ने भारतीय संगीत के व्यावहारिक पक्ष के साथ-साथ सैद्धान्तिक पक्ष को भी आत्मसात किया है। एक कुशल गायिका होने के साथ ही उन्होने ‘रागरचनांजलि’ नामक पुस्तक की रचना भी की है। इस पुस्तक के पहले भाग का प्रकाशन वर्ष 2004 में और दूसरे भाग का प्रकाशन वर्ष 2010 में किया गया। वर्तमान में अश्विनी जी संगीत के मंचों पर जितनी लोकप्रिय हैं उतनी ही निष्ठा से नई पीढ़ी को पारम्परिक संगीत की दीक्षा भी दे रही हैं। आज की कड़ी में हम उनकी आवाज़ में राग काफी कान्हड़ा का एक द्रुत खयाल प्रस्तुत कर रहे हैं। यह तीनताल की मोहक रचना है।


राग काफी कान्हड़ा : ‘कान्ह कुँवर के कर-पल्लव पर मानो गोवर्धन नृत्य करे...’ : विदुषी अश्विनी भिड़े देशपाण्डे



लोक, फिल्म और सुगम संगीत की रचनाओं में शब्दों का महत्त्व अधिक होता है, किन्तु जैसे-जैसे हम शास्त्रीयता की ओर बढ़ते है शब्दों की अपेक्षा स्वरों का महत्त्व बढ़ता जाता है। हमारे संगीत की एक विधा है, तराना, जिसमें शब्दों की अपेक्षा स्वर बेहद महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। गायन की सभी विधाओं में तराना एक ऐसी विधा है जिसमें स्पष्ट सार्थक शब्द नहीं होते। इसलिए रागानुकूल परिवेश रचने में स्वर महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। अब हम आपको राग काफी का एक तराना सुनवा रहे है, जिसे भारतीय संगीत जगत के शीर्षस्थ साधक पण्डित कुमार गन्धर्व ने स्वर दिया है। कुमार गन्धर्व भारतीय संगीत की एक नई प्रवृत्ति और नई प्रक्रिया के पहले कलासाधक थे। घरानों की पारम्परिक गायकी की अनेक शताब्दी पुरानी जो प्रथा थी उसमें संगीत तो जीवित रहता था, किन्तु संगीतकार के व्यक्तित्व और प्रतिभा का विसर्जन हो जाता था। कुमार गन्धर्व ने पारम्परिक संगीत के कठोर अनुशासन के अन्तर्गत ही कलासाधक की सम्भावना को स्थापित किया। 8 अप्रैल, 1924 को बेलगाम, कर्नाटक के पास सुलेभवी नामक स्थान में एक संगीत-प्रेमी परिवार में एक बालक का जन्म हुआ था, जिसका माता-पिता का रखा नाम तो था शिवपुत्र सिद्धरामय्या कोमकलीमठ, किन्तु आगे चल कर संगीत-जगत ने उसे कुमार गन्धर्व के नाम से पहचाना। कुमार गन्धर्व ने जब संगीत-जगत में पदार्पण किया, उन दिनों भारतीय संगीत दरबारी जड़ता से प्रभावित था। कुमार गन्धर्व, पूर्णनिष्ठा और स्वर-संवेदना से एकाकी ही संघर्षरत हुए। उन्होने अपनी एक निजी गायन-शैली विकसित की, जो हमें भक्ति-पदों के आत्म-विस्मरणकारी गायकी का स्मरण कराती थी। वे मात्र एक साधक ही नहीं अन्वेषक भी थे। उनकी अन्वेषण-प्रतिभा ही उन्हें भारतीय संगीत का कबीर बनाती है। उनका संगीत इसलिए भी रेखांकित किया जाएगा कि वह लोकोन्मुख रहा है। कुमार गन्धर्व ने अपने समय में गायकी की बँधी-बँधाई लीक से अलग हट कर अपनी एक भिन्न शैली का विकास किया। 1947 से 1952 तक वे फेफड़े के रोग से ग्रसित हो गए। चिकित्सकों ने घोषित कर दिया की स्वस्थ हो जाने पर भी वे गायन नहीं कर सकेंगे, किन्तु अपनी साधना और दृढ़ इच्छा-शक्ति के बल पर संगीत-जगत को चमत्कृत करते हुए संगीत-मंचों पर पुनर्प्रतिष्ठित हुए। अपनी अस्वस्थता के दौरान कुमार गन्धर्व, मालवा अंचल के ग्राम्य-गीतों का संकलन और प्राचीन भक्त-कवियों की विस्मृत हो रही रचनाओं को पुनर्जीवन देने में संलग्न रहे। आदिनाथ, सूर, मीरा, कबीर आदि कवियों की रचनाओं को उन्होने जन-जन का गीत बनाया। वे परम्परा और प्रयोग, दोनों के तनाव के बीच अपने संगीत का सृजन करते रहे। आज के अंक में हम आपको इस महान संगीतज्ञ के स्वरों में राग काफी का तराना प्रस्तुत कर रहे हैं। आप यह तराना सुनिए और राग काफी की प्रत्यक्ष रसानुभूति कीजिए।


राग काफी : तीनताल में निबद्ध तराना : पण्डित कुमार गन्धर्व




खयाल और तराना के बाद अब हम आपको राग काफी में एक भजन सुनवाते है। इसे प्रस्तुत कर रहे हैं, सुविख्यात संगीतज्ञ पण्डित जसराज, जिनका जन्म 28 जनवरी 1930 को एक ऐसे परिवार में हुआ जिसे 4 पीढ़ियों तक भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक से बढ़कर एक शिल्पी देने का गौरव प्राप्त है। उनके पिताजी पण्डित मोतीराम जी स्वयं मेवाती घराने के एक विशिष्ट संगीतज्ञ थे। पण्डित जसराज को संगीत के संस्कार अपने परिवार से मिले। जब वे मात्र 3 वर्ष के थे, प्रकृति ने उनके सर से पिता का साया छीन लिया। उनके बाद परिवार के भरण-पोषण का दायित्व जसराज जी के अग्रज, संगीत महामहोपाध्याय पण्डित मणिराम जी पर आगया। इन्हीं की छत्र-छाया में जसराज जी की संगीत शिक्षा आगे बढ़ी। मणिराम जी अपने साथ बालक जसराज को तबला वादक के रूप में ले जाया करते थे। परन्तु उस समय सारंगी वादकों की तरह तबला वादकों को भी हेय दृष्टि से देखा जाता था। संगति कलाकारों के साथ इस प्रकार के निम्न बर्ताव से अप्रसन्न होकर जसराज ने तबला त्याग दिया और प्रण लिया कि जब तक वे शास्त्रीय गायन में दक्ष नहीं हो जाते, वे अपने बाल नहीं कटवाएँगे। इसके पश्चात् उन्होंने मेवाती घराने के दिग्गज महाराणा जयवन्त सिंह वाघेला से तथा आगरा के स्वामी वल्लभदास जी से संगीत को आत्मसात किया। पण्डित जसराज के आवाज़ का फैलाव साढ़े तीन सप्तकों तक है। उनके गायन में पाया जाने वाला शुद्ध उच्चारण और स्पष्टता मेवाती घराने की खयाल शैली की विशिष्टता को झलकाता है। उन्होंने बाबा श्याम मनोहर गोस्वामी महाराज के मार्गदर्शन में हवेली संगीत विधा पर व्यापक अनुसन्धान कर अनेक नवीन बन्दिशों की रचना भी की है। भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनका सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान है। उनके द्वारा अवधारित एक अद्वितीय एवं अनोखी जुगलबन्दी, जो 'मूर्छना' की प्राचीन पद्यति पर आधारित है। इसमें एक महिला और एक पुरुष गायक अपने-अपने सुर में भिन्न रागों को एक साथ गाते हैं। पण्डित जसराज के सम्मान में इस जुगलबन्दी का नाम 'जसरंगी' रखा गया है। आज के अंक में हम पण्डित जसराज के द्वारा राग काफी के स्वरों में पिरोया एक भजन प्रस्तुत कर रहे हैं। इसे हमने उनके अल्बम ‘बिहरत रंग लाल गिरधारी’ से लिया है। आप भक्तिरस अभिसिंचित इस भजन का रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग काफी : भजन : ‘कहा करूँ वैकुण्ठ ही जाए...’ : पण्डित जसराज




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 157वीं संगीत पहेली में हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें राग का नाम लिख भेजिए।

2 – रचना के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 159वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 155वीं संगीत पहेली में हमने आपको तंत्रवाद्य पर ठुमरी वादन का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग मिश्र काफी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गिटार। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज का हमारा यह अंक फाल्गुनी रस और रंग से अभिसिंचित राग काफी के खयाल, तराना और भजन में किये गए प्रयोग पर केन्द्रित था। यह सिलसिला आगामी अंक में भी जारी रहेगा। इस अंक में पण्डित जसराज का परिचय 'भारत ज्ञानकोश' से साभार उद्धरित किया है। श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

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