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Saturday, December 9, 2017

चित्रकथा - 48: 2017 के जुलाई - अगस्त में प्रदर्शित फ़िल्मों का संगीत

अंक - 48

2017 के जुलाई - अगस्त में प्रदर्शित फ़िल्मों का संगीत


"हँस मत पगली प्यार हो जाएगा..." 




’रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। समूचे विश्व में मनोरंजन का सर्वाधिक लोकप्रिय माध्यम सिनेमा रहा है और भारत कोई व्यतिक्रम नहीं है। बीसवीं सदी के चौथे दशक से सवाक् फ़िल्मों की जो परम्परा शुरु हुई थी, वह आज तक जारी है और इसकी लोकप्रियता निरन्तर बढ़ती ही चली जा रही है। और हमारे यहाँ सिनेमा के साथ-साथ सिने-संगीत भी ताल से ताल मिला कर फलती-फूलती चली आई है। सिनेमा और सिने-संगीत, दोनो ही आज हमारी ज़िन्दगी के अभिन्न अंग बन चुके हैं। हमारी दिलचस्पी का आलम ऐसा है कि हम केवल फ़िल्में देख कर या गाने सुनने तक ही अपने आप को सीमित नहीं रखते, बल्कि फ़िल्म संबंधित हर तरह की जानकारियाँ बटोरने का प्रयत्न करते रहते हैं। इसी दिशा में आपके हमसफ़र बन कर हम आ रहे हैं हर शनिवार ’चित्रकथा’ लेकर। ’चित्रकथा’ एक ऐसा स्तंभ है जिसमें बातें होंगी चित्रपट की और चित्रपट-संगीत की। फ़िल्म और फ़िल्म-संगीत से जुड़े विषयों से सुसज्जित इस पाठ्य स्तंभ के पहले अंक में आपका हार्दिक स्वागत है। 

देखते ही देखते वर्ष 2017 अपनी समाप्ति की ओर बढ़ चला है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी हिन्दी फ़िल्म जगत में बहुत सी फ़िल्में बनी और इन फ़िल्मों के लिए बहुत सारे गाने भी बने। वर्ष के प्रथम छह महीनों के फ़िल्म-संगीत की समीक्षा ’चित्रकथा’ में हम कर चुके हैं। आइए आज के अंक में निगाह डालें जुलाई और अगस्त के महीनों में प्रदर्शित होने वाली फ़िल्मों के गीत-संगीत पर। 



जुलाई का महीना शुरू हुआ था फ़िल्म ’मॉम’ से। इस फ़िल्म की ख़ास बात यह रही कि इसके संगीतकार हैं ए. आर. रहमान। गीतकार इरशाद कामिल के साथ मिल कर रहमान ने कुल छह गीत रचे इस फ़िल्म के लिए। शाशा तिरुपति की आवाज़ में पहला गीत "ओ सोना" जितना कर्णप्रिय है, उतना ही सुन्दर है इसका फ़िल्मांकन श्रीदेवी और उनकी ऑन-स्क्रीन बेटी पर। लेकिन दूसरे ही गीत में कौवे की काँव काँव सुन कर जैसे मिठास में किसी ने कड़वाहट घोल दी हो। "कूके काँव" एक क्लब नंबर है; सुखविन्दर सिंह की आवाज़ होने के बावजूद इसे आप एक बार से ज़्यादा सुनना शायद पसन्द ना करें। जोनिता गांधी और रियांजलि की आवाज़ में "राखी बाखी" एक सुन्दर रचना है जो फ़िल्म की कहानी और सितुएशन के अनुसार बनाया गया है। गीतकार-गायिका रियांजलि की मुख्य आवाज़ में "फ़्रेकिंग् लाइफ़" एक "फ़ील-गूड" गीत है जो हर तरफ़ से पाश्चात्य रंग लिए हुए है। यानी कि संगीत, बोल और गायकी, सभी में पाश्चात्य रंग है। रियांजलि के साथ इस गीत में राजा कुमारी और सुज़ेन डी’मेलो की आवाज़ें भी शामिल हैं। शाशा तिरुपति की एकल आवाज़ में "चल कहीं दूर" भी एक सितुएशनल गीत है जिसमें श्रीदेवी के मन की उदासी बयान होती है; लेकिन फ़िल्म के बाहर शायद यह श्रोताओं को आकर्षित ना कर पाए! दक्षिण की गायिकाओं में एक और नाम दर्शना केटी का है जिनकी आवाज़ बॉलीवूड में अभी तक सुनाई नहीं दी है। "मुआफ़ी मुश्किल" गीत के लिए रहमान ने दर्शना को चुना है। इस बहुआयामी गीत में रहमान ने अपने कम्पोज़िशन का कमाल दिखाया है, लेकिन अन्तिम परिणाम बहुत अधिक आकर्षक नहीं बन पाया है। फ़िल्म का अन्तिम गीत सुदीप जयपुरवाले की आवाज़ में है "बे नज़ारा" जो एक पारम्परिक शास्त्रीय रचना है। करीब आठ मिनट अवधि की इस रचना को फ़िल्म में किस तरह से और कहाँ पर इस्तमाल किया गया होगा, यह निस्संदेह एक रोचक तथ्य होगा। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि ’मॉम’ का गीत-संगीत पूर्णत: सिचुएशनल है और "ओ सोना" व "राखी बाखी" ऐल्बम के श्रेष्ठ गीत हैं।

"उल्लू का पट्ठा" के साथ प्रीतम और अमिताभ भट्टाचार्य लेकर आए ’जग्गा जासूस’ फ़िल्म का साउन्डट्रैक। अरिजीत सिंह और निकिता गांधी की आवाज़ों में यह गीत उतना बुरा नहीं है सुनने में जितना इसका शीर्षक है। दूसरा गीत "गलती से मिसटेक" में अरिजीत का एक अलग ही अंदाज़ सुनने को मिलता है। बॉयज़ स्कूल स्टुडेण्ट्स पर केन्द्रित इस गीत में अमिताभ के बोल यकीनन होस्टल कैम्पस में रहने वाले लड़कों को पसन्द आयेंगे। अरिजीत के साथ अमित मिश्र ने भी अपनी आवाज़ मिलाई है और दोनों ने मिल कर एक उछलता-कूदता मस्ती भरा गीत रच डाला है। इसके बाद ऐल्बम में एक के बाद एक कुल तीन शान्त क़िस्म के गीत हैं - पहला है अरिजीत और मोहन कानन की आवाज़ों में "झुमरीतलैया" जिसे लिखा है अतिथी गीतकार नीलेश मिश्र ने। बोलों के हिसाब से यह गीत भी अनूठा है इसमें कोई संदेह नहीं। अरिजीत की आवाज़ में "फिर वही" शायद फ़िल्म का श्रेष्ठ गीत है जिसमें अमिताभ ने सुन्दर काव्य ्का प्रयोग किया है। फ़िल्म में इस गीत का प्रयोग भले एक बेटे द्वारा अपने पिता को याद किए जाने के दृश्य में होता है, लेकिन फ़िल्म के बाहर भी इसे किसी भी तरह के अकेलेपन और किसी की याद में याद किया जा सकता है। और तीसरा गीत है "मुसाफ़िर" तुषार जोशी का गाया हुआ। इस नवोदित गायक ने अपनी आवाज़ का कमाल दिखाया है जिसमें दर्द भी है, उदासी भी, लेकिन यह आपको अवसाद का अनुभव नहीं कराएगा। फ़िल्म का अन्तिम गीत है "खाना खाके दारु पीके चले गए" जो सही मायने में एक प्रयोगधर्मी गीत है प्रीतम और अमिताभ की तरफ़ से। ख़ास बात यह कि इस गीत में आवाज़ें हैं प्रीतम, अमिताभ, तुषार, गीत सागर, जून, अन्तरा, अमित, आश्विन, आरोह और सनी की। कुल मिला कर ’जग्गा जासूस’ का ऐल्बम सराहनीय है जिसे सुनते हुए बोरियत या शोर का अहसास नहीं होता। फ़िल्म के अधिक ना चलने की वजह से इसके गाने बहुत ज़्यादा चर्चा में नहीं रहे। अगर किसी ने अभी तक इन्हें नहीं सुना हो तो कम से कम एक बार ज़रूर सुनें।

ओनिर की फ़िल्म ’शब’ भी जुलाई में प्रदर्शित हुई। ओनिर के साथ संगीतकार-गीतकार-गायक मिथुन का ’बस एक पल’ से साथ रहा है। अत: ’शब’ में भी कुछ सुरीला सुनने की उम्मीद किया जा सकता है। ’शब’ में कुल चार गीत हैं। पहला गीत "ओ साथी" अरिजीत सिंह की आवाज़ में है जिसमें उनका अंदाज़ उनके उस अंदाज़ से बिल्कुल अलग है जो उनके अधिकांश गीतो में नज़र आता है। हर गीत में अरिजीत यह सिद्ध करते हैं कि आज के दौर में वो ही शीर्ष पर हैं। गायक केके भी ओनिर के पुराने पसन्दीदा गायकों में से हैं। "मुसाफ़िर" में केके की आवाज़ को चुनना बेहद सार्थक रहा, इसे सुनते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि यह गीत केके के लिए ही बना है। तीसरे गीत "आवारी" में मिथुन की आवाज़ है जोए क्बार फिर एक कर्णप्रिय गीत है। एक के बाद एक तीन पुरुष आवाज़ों को देख कर अगर आप किसी गायिका की आवाज़ तलाश रहे हैं तो बता दूँ कि "मुसाफ़िर" का एक और संस्करण भी है जिसे नेहा भसीन ने गाया है। फ़िल्म का चौथा व अन्तिम गीत है "आफ़िया" जिसे मोहम्मद इरफ़ान और अरुण दागा ने गाया है। इस सूफ़ियाने गीत को दोनों गायकों ने ख़ूबसूरत अंजाम दिया है। ’लिप्सस्टिक अंडर माइ बुरखा’ एक चर्चित फ़िल्म रही जुलाई की। हालाँकि कहानी के हिसाब से किसी ने इस फ़िल्म में किसी गीत की गुंजाइश नहीं की होगी, लेकिन इसमें तीन गीत डाले गए हैं। पाक़िस्तानी संगीतकार ज़ेबुन्निसा बंगश ने इस फ़िल्म में संगीत दिया है, अन्विता दत्त गीतकार हैं और सभी गीत महिला कंठों में हैं। लोक गायिका मालिनी अवस्थी की आवाज़ में "जिगि जिगि" एक मस्ती भरा गीत है जिसमें एक अनोखा पाक़िस्तानी-अफ़ग़ानी अंग है। तेज़ रफ़्तार वाले इस लोक शैली के गीत में यह बताने की कोशिश की गई है कि औरतों को किन चीज़ों से ख़ुशी मिलती है। नीति मोहन की आवाज़ में "इश्क़िया" में 70 के दशक का अंदाज़-ए-बयाँ नज़र आता है जिसमें डिस्को क़िस्म का रंग है। क्या बोल क्या संगीत, यह तो बिल्कुल बप्पी दा का इलाका लगता है। अन्तिम गीत "ले ली जान" में 40-50 के दशक का पाश्चात्य अंदाज़ महसूस किया जा सकता है जिसमें ख़ुद ज़ेबुन्निसा की आवाज़ है। एक अलग ही तरह का गीत है, जिसमें एक नयापन है। कुल मिला कर इस फ़िल्म के गीत सिचुएशनल है जो फ़िल्म की कहानी के साथ-साथ चलते हैं। फ़िल्म के बाहर इनका कितना और कब तक अस्तित्व रहेगा, यह तो वक़्त ही बताएगी।

माइकल जैकसन को श्रद्धांजलि स्वरूप ’मुन्ना माइकल’ फ़िल्म का निर्माण हुआ। और इस चरित्र के लिए टाइगर श्रॉफ़ से बेहतर अभिनेता और कौन हो सकता है भला! इसके ऐल्बम में कुल 10 ट्रैक्स हैं। ’कमबख़्त इश्क़’, ’हीरोपन्ती’ और ’बाग़ी’ जैसे फ़िल्मों के निर्देशक शब्बीर ख़ान की इस फ़िल्म का संगीत भी मसालेदार होगा यह तो हर कोई अन्दाज़ा लगा सकता है। इस फ़िल्म में कई गीतकार व संगीतकार हैं। तनिष्क बागची के संगीत में "मैं हूँ" से ऐल्बम शुरु होता है। कुमार के लिखे इस गीत को सिद्धार्थ महादेवन की आवाज़ एक अलग ही मुकाम तक लेकर जाता है। हूक लाइन "मैं हूँ" गीत का मुख्य आकर्षण है। डेविड धवन, गोविन्दा, रवीना, करिश्मा की याद दिलाता हुआ ऐल्बम का दूसरा गीत है "डिंग् डांग्"। जावेद-मोहसीन द्वारा स्वरबद्ध और दानिश साबरी व शब्बीर ख़ान लिखित इस झूमते नग़में में अमित मिश्र, अन्तरा मित्र, पैरी जी शिवि और दानिश साबरी की आवाज़ें हैं। कभी कभी इस तरह का फ़ुल्मस्ती भरा गीत सुनने का भी मन होता है, है ना? इन डान्स नंबर्स के बाद अगला गीत है "प्यार हो" जिसे विशाल मिश्र ने कम्पोज़ किया है। कुमार का लिखा यह गीत एक कर्णप्रिय प्रेम गीत है और शब्बीर ख़ान अपनी हर फ़िल्म में इस तरह का कम से कम एक गीत ज़रूर रखते हैं। विशाल मिश्र और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में इस युगल गीत को सुनना एक सुखद अनिभव है। डान्स नंबर्स की वापसी करता हुआ "स्वाग" ऐल्बम का अगला गीत है जिसमें संगीतकार-गायक प्रणय और गायक बृजेश शान्डिल्य की आवाज़ें हैं। कुमार और शब्बीर ख़ान के लिखे इस गीत का एक "स्वाग रीबर्थ" नामक संस्करण भी है। ऐल्बम का सही मायने में चार्टबस्टर गीत है गौरव-रोशिन स्वरबद्ध "बेपरवाह"। कुमार के लिखे इस गीत की ख़ासियत है इसकी गायकी। सिद्धार्थ बसरूर और नन्दिनी देब ने इसे जिस तरह से गाया है, यह यकीनन एक यादगार डान्स नंबर बन सकता है। अगला गीत है कनिका कपूर की आवाज़ में "शेक करां"। कुमार और मीत ब्रदर्स के इस थिरकते नग़में को देख कर सनी लियोन का भी ध्यान आकर्षित हो जाएगा! प्रणय का एक और गीत है "फ़ील द रीदम" जिसे प्रणय और शब्बीर ने लिखा है। आवाज़ है राहुल पाण्डेय की जो एक नवोदित गायक हैं और इस गीत में उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि वो एल लम्बी रेस का घोड़ा हैं। अन्तिम गीत तनिष्क-वायु लिखित व स्वरबद्ध है जो एक देसी-पाश्चात्य फ़्युज़न नंबर है। आसिस कौर और रेनेसा बादची की आवाज़ों में इस थिरकते नग़में को सुन कर क़दम अपने आप थिरकने लगते हैं। ’मुन्ना माइकल’ के ऐल्बम को अगर सुनना है तो हल्के मिज़ाज में सुनना पड़ेगा, तभी इससे आनन्द पाया जा सकता है।

जुलाई में एक उल्लेखनीय देशभक्ति फ़िल्म बनी ’राग देश’। राज्य सभा टीवी द्वारा प्रस्तुत और गुरदीप सिंह सप्पाल स्वारा निर्मित यह फ़िल्म 28 जुलाई को प्रदर्शित हुई थी। ’राग देश’ फ़िल्म की कहानी इन्डियन नैशनल आर्मी के तीन अफ़सरों के बहुचर्चित ’रेड फ़ोर्ड ट्रायल’ की घटना पर आधारित है जिसने भारत के स्वाधीनता संग्राम को एक नया मोड़ दे दिया था। इस फ़िल्म के लिए लेखक-निर्देशक टिग्मांशु धुलिआ ने "तुझे नमामे" गीत लिखा जिसे स्वरबद्ध किया राना मजुमदार ने। टिग्मांशु ने कहा कि "फ़िल्म के शीर्षक को ध्यान में रखते हुए एक ऐसे गीत की आवश्यक्ता थी जो एक राष्ट्र के जन्म की कहानी को व्यक्त करता हो। यह गीत एक राष्ट्रीय प्रार्थना गीत है जो शास्त्रीय राग देश पर ही आधारित है।" प्रार्थना शैली में निबद्ध इस गीत को राग देश पर आधारित करने का निर्णय इसलिए भी लिया गया कि "वन्दे मातरम" और "मिले सुर मेरा तुम्हारा" भी इसी राग पर आधारित है। ’राग देश’ फ़िल्म में तीन अफ़सरों की भूमिकाओं में नज़र आए कुणाल कपूर, अमित साध और मोहित मारवाह। अब बात करते हैं ’इंदु सरकार’ की। मधुर भण्डारकर की इस पीरियड फ़िल्म के लिए अनु मलिक को संगीतकार चुना गया। फ़िल्म में कुल चार गीत हैं और चारों अलग अलग जौनर के - जैज़, डिस्को, क़व्वाली और एक साधारण नर्म गीत। 70-80 के दशक के डिस्को संगीत में जिन्हें दिलचस्पी है, उनके लिए "दिल्ली की रात" सुनने लायक है। डिस्को किंग् बप्पी लाहिड़ी के गाए इस गीत में अनु मलिक ने आर. डी. बर्मन को भी याद किया है और गीत के विडियो में पंचम की तस्वीर भी दिखाई दे जाती है। बप्पी दा और अनु मलिक की बेटी अनमोल की आवाज़ों में यह गीत हमें उस रेट्रो दौर में ले जाता है। दूसरा गीत है जैज़ पार्श्व पर आधारित "ये पल" जिसे अमृता फ़डनविस ने गाया है। इस नवोदित गायिका ने इस गीत में 70 के दशक का फ़ील ले आयी हैं। मोनाली ठाकुर की आवाज़ में चाशनी में डूबा हुआ "ये आवाज़ है" बेहद कर्णप्रिय रोमान्टिक गीत है और पुनीत शर्मा के बोलों ने भी कमाल किया है। "चढ़ता सूरज धीरे धीरे" एक पारम्परिक क़व्वाली की शैली में गाया हुआ क़व्वाली है जिसे अज़ीज़ नाज़ाँ ने गाया है क़ैसर रत्नागिरिवी के कलाम पर। इस दार्शनिक रचना पर अनु मलिक ने एक कन्टेम्पोररी अंग भी दिया है मूल ध्वनि को बिना परेशान किए।

जुलाई की अन्तिम फ़िल्म थी ’मुबारकाँ’। पिछले साल हमने सुना "काला चश्मा" और इस बार "दि गौगल सॉंग्"। गीतकार कुमार को इस जौनर में महारथ हासिल है। संगीतकार अमाल मलिक के संगीत में सोनू निगम, अरमान मलिक, अमाल मलिक, तुल्सी कुमार और नीति मोहन की आवाज़ों में ऐल्बम का यह पहला गीत फ़िल्म का भी मुख्य आकर्षण रहा। फ़िल्म ’शान’ के सदाबहार "यम्मा यम्मा" गीत की हस्ताक्षर धुन वापस आ गई है ’मुबारकाँ’ के शीर्षक गीत में। ऋषि रिच और यश आनन्द ने इस धुन को इस गीत में मिलाया है। जिस तरह से संगीत के बहाव और संयोजन को कुमार के बोलों पर घोला गया है, "मुबारकाँ" गीत एक बड़ा ही कैची और आकर्षक गीत बन पड़ा है। इसे गाया है सुकृति कक्कर, जुग्गी डी, यश नरवेकर और बादशाह ने। हर आवाज़ ने अपना काम बख़ूबी निभाया है। दूसरा गीत है "जट्ट जागुअर" जो पूरी तरह से एक पंजाबी गीत है। नवराज हंस गीत को शुरू करते हैं अपनी "heavy bass singing" से, लेकिन शो चुरा ले जाते हैं विशाल दादलानी। अपेक्षा डांडेकर की भी आवाज़ इस गीत में शामिल है। गौरव-रोशिन के संगीत में सूफ़ियाना शैली का "हाथों में थे हाथ" भी एक उल्लेखनीय गीत है जिसे कुमार ने लिखा है और पापोन, अल्तमश फ़रीदी, अदिति सिंह शर्मा और अर्पिता मुखर्जी ने गाया है। ख़ास बात यह है कि यह गीत सूफ़ियाना होते हुए भी फ़िल्मी सुनाई देता है। 80 के दशक का हसन जहांगिर का "हवा हवा" तो सभी को आज तक याद होगा! गौरव-रोशिन ने इस गीत का अपने अंदाज़ में एक नया संस्करण तैयार किया है जिसे मीका और प्रकृति कक्कर ने गाया है। हालाँकि गीत की मूल धुन को कायम रखा गया है, लेकिन गौरव-रोशिन ने उस पर अपनी कलाकारी की है। इस गीत को चार्टबस्टर माना गया है, लेकिन हसन जहांगिर का वह मूल गीत जिसने सुना है, उसके लिए वही खरा सोना है। दशकों से पंजाबी शादियों में "काला डोरिया कुण्डे नाल" गीत को गाने बजाने का रिवाज़ चला आ रहा है। और क्योंकि "मुबारकाँ" शब्द का अर्थ भी त्योहार, उत्सव, आनन्दानुष्ठान से ताल्लुख़ है, इसलिए इस गीत का ऐल्बम में होना सार्थक है। कुमार ने पारम्परिक गीत को नया जामा पहनाया है। गीत में आवाज़ें हैं रिंकु गिरि और पूजा बसनेत की। ’मुबारकाँ’ ऐलब्म की ख़ास बात यह है कि इसमें ध्वनियों की सुसंगति है। एक ही ऐलब्म में बहुत ज़्यादा विविधता लाने की अनर्थक कोशिशें नहीं की गई हैं।

अगस्त का महीना शुरू हुआ शाहरुख़ ख़ान - अनुष्का शर्मा अभिनीत फ़िल्म ’जब हैरी मेट सेजल’ से। इम्तियाज़ अली, शाहरुख़ ख़ान, प्रीतम और इरशाद कामिल... फ़िल्म के गीतों से लोगों की उम्मीदें तो होंगी ही। पहला गीत शाहिद माल्या और सुनिधि चौहान की आवाज़ों में है "राधा"। पंजाबी और हिन्दी शब्दों के मेलजोल से लिखा यह गीत बहुत कैची है और पहली बार सुनते ही इससे इश्क़ हो जाता है। इस देसी नंबर के तुरन्त बाद आता है क्लब सॉंग् "बीच बीच में"। अरिजीत सिंह का यह नया अवतार भी कमाल का है। और उनका साथ दिया है शालमली खोलगडे और शेफ़ाली अल्वरेस ने। कुल मिला कर इस गीत से 80 के दशक की ख़ुश्बू आती है। बेहतर होता अगर मुखड़े की तरह अन्तरे भी उतने ही प्रभावशाली होते! तीसरा गीत है "सफ़र" अरिजीत के उसी जाने-पहचाने अंदाज़ में, और इस गीत का बेस पाश्चात्य है। हालाँकि यह एक शाहरुख़ ख़ान जैसा गीत नहीं है, लेकिन उन पर इस तरह के गीत का प्रयोग एक नई बात है। लेकिन अगला ही गीत एक बिल्कुल शाहरुख़ गीत है। पूरी मस्ती और धमाल भरा यह गीत है "बटरफ़्लाई" जिसे नूरन सिस्टर्स, आमन त्रिखा, देव नेगी और सुनिधि चौहान ने गाया है। यह एक तड़कता भड़कता भंगड़ा गीत है जो सिर्फ़ ख़ुशी ही देती है। ऐल्बम का श्रेष्ठ गीत वैसे अरिजीत की आवाज़ में ही है "हवाएँ" जो एक उत्कृष्ट कम्पोज़िशन है और क्या ख़ूब लिखा है इरशाद कामिल ने। शाहरुख़ के रोमान्टिक अंदाज़ की याद दिला जाता है यह गीत। इस फ़िल्म के गाने ख़ूब पसन्द किए गए। फ़िल्म भी अच्छी खासी चली और निस्सन्देह इस साल के श्रेष्ठ ऐल्बमों में से एक है।

’टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ जिस फ़िल्म का शीर्षक है, उस फ़िल्म का गीत-संगीत किस तरह का होगा, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल हो जाता है। लेकिन जब अक्षय कुमार हैं फ़िल्म में, तो फ़िल्म में अच्छे गीतों की उम्मीद तो रहती ही है। फ़िल्म के गाने लिखे हैं गरिमा वहाल और सिद्धार्थ सिंह ने। पहला गीत ही हमारा ध्यान आकर्षित करता है क्योंकि इसमें सोनू निगम की मखमली आवाज़ है। सोनू की आवाज़ जैसे अब और भी ताज़ी हो गई है और विक्की प्रसाद के सुकूनदायक संगीत में ढल कर सोनू निगम और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में "हँस मत पगली प्यार हो जाएगा" 90 के दशक के रोमान्टिक गीतों की याद दिला जाता है। वैसे "हँस मत पगली..." ट्रक या ऑटो के पीछे लिखा हुआ देखा जाता है, है ना? दूसरा गीत है "बखेड़ा" विक्की का लिखा व स्वरबद्ध किया हुआ। यह गीत भी "हँस मत पगली..." का ही एक्स्टेन्शन जैसा लगता है जिसे सुखविन्दर सिंह और सुनिधि चौहान ने गाया है। अगला गीत कैची है "गोरी तू लठमार"। मानस-शिखर के इस मुश्किल कम्पोज़िशन को सोनू निगम और पलक मुछाल ने अच्छा अंजाम दिया है। "राधे-राधे" का जप इस गीत में जैसे एक बोनस है। और आख़िरी गीत है "सुबह की ट्रेन" सचेत टंडन और परम्परा ठाकुर की आवाज़ों में है और उन्हीं का स्वरबद्ध किया हुआ है। ठीक-ठाक गीत है, कुछ ख़ास नहीं। कुल मिला कर इस फ़िल्म का गीत-संगीत सुरीला है और बहुत दिनों बाद सोनू, श्रेया, सुखविन्दर, सुनिधि को एक साथ एक ही ऐल्बम में सुन कर 90 के दशक की यादें ताज़ा हो गईं।

’बरेली की बरफ़ी’ का ऐलब्म भी अनोखा है। पहला गीत है "स्वीटी तेरा ड्रामा" जिसे देव नेगी, पावनी पाण्डेय,श्रद्धा पण्डित और प्रवेश मल्लिक ने गाया है तनिष्क बागची की तर्ज़ पर। इस गीत को सुनते हुए ’बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ याद आ जाती है। दूसरा गीत है आर्को का लिखा, स्वरबद्ध और गाया "नज़्म नज़्म" जिसे सुनते ही आपको याद आ जाएगा ’फटा पोस्टर निकला हीरो’ का गीत "मैं रंग शरबतों का..."। इस गीत के तीन संस्करण हैं - आर्को का, आयुष्मान खुराना का, सुमेधा करमाहे का। और तीनों का अपना अपना अंदाज़ है, कहना मुश्किल है कि कौन किससे बेहतर है। तनिष्क-वायु का लिखा व स्वरबद्ध "ट्विस्ट कमरिया" भी "स्वीटी तेरा ड्रामा" जैसा ही है। हर्षदीप कौर, यासेर देसाई, तनिष्क और अल्तमश फ़रीदी का गाया यह गीत पहली बार सुन कर सही मालूम पड़ता है, लेकिन दो चार बार सुनने के बाद ऐसा लगता है कि यह लम्बी रेस का घोड़ा नहीं है। पुनीत शर्मा का लिखा और समीरा कोपीकर का स्वरबद्ध किया "बैरागी" अरिजीत सिंह की आवाज़ में सुन कर ऐसा लगता है कि जैसे उन्हीं के लिए इसे बनाया गया है। पाश्चात्य संयोजन के साथ पारम्परिक बॉलीवूड मेलडी के फ़्युज़न से सुसज्जित इस गीत में गीत के संगीतकार समीरा भी अरिजीत के साथ अपनी आवाज़ मिलाती है। फ़िल्म का अन्तिम गीत है "बैड ऐस बबुआ" जो एक सिचुएशनल गीत है। समीरुद्दीन द्वारा स्वरबद्ध और अक्षय वर्मा का लिखा यह गीत रैप शैली में रचा गया है जिसे अभिषेक नैलवाल, नेहा भसीन और समीरुद्दीन ने गाया है। कुल मिला कर ’बरेली की बरफ़ी’ ने उम्मीद से ज़्यादा दिया है सुनने वालों को।

अगस्त महीना की एक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही ’अ जेन्टलमैन’। जब किसी फ़िल्म में सिद्धार्थ मल्होत्रा और जैक्वीलीन जैसे ख़ूबसूरत अभिनेता हों, और जो फ़िल्म अमरीका के मायामी में बेज़्ड हो, उस फ़िल्म के गीत-संगीत की ज़िम्मेदारी भी बढ़ जाती है। संगीतकार सचिन-जिगर और गीतकार वायु और प्रिया सरैया ने निराश नहीं किया। पहला गीत "डिस्को डिस्को" बेनी दयाल की आवाज़ में है जिसमें वही पुराना डिस्को के साथ पंजाबी का मिक्स है। गीत में डिस्को वाली फ़ीलिंग् ही याद रखने वाली है और एक और बात जो याद रखने वाली है वह यह कि इसमें इन्टरनेट सेन्सेशन शिरले सेतिया ने डेब्यु किया है। "बात बन जाए" दूसरा गीत है जिसे लिखा और गाया है प्रिया सरैया ने। हालाँकि गीत का शुरुआती संगीत सुन कर ऐसा लगता है कि जैसे अरिजीत की आवाज़ बस आने ही वाली है, लेकिन असल में यह गीत इससे बहुत दूर है। साथ में सिद्धार्थ बसरूर भी ढेर सारी मस्ती ले आते हैं इस गीत में। इस गीत को सुनते हुए आप किसी समुन्दर के किनारे छुट्टी के माहौल में पहुँच जाएंगे। ऐल्बम का सबसे अच्छा गीत है विशाल दादलानी और जोनिता गांधी की आवाज़ों में। वायु का लिखा यह गीत "चन्द्रलेखा" एक जवाँ गीत है जो एक बहुत ही अलग क़िस्म का गीत है। चौथे गीत में अरिजीत सिंह और श्रेया घोषाल की आवाज़ें हैं - "लागी ना छूटे"। पार्श्व में पियानो निरन्तर धुनें पूरे गीत में एक अंडर-करण्ट की तरह चलती रहती हैं। यह एक रोमान्टिक गीत है प्रिया सरैया का लिखा। और फ़िल्म का अन्तिम गीत है "बन्दूक मेरी लैला" जिसे ऐश किंग्, जिगर सरैया और रफ़्तार ने गाया है। वायु का लिखा यह गीत तमाम वेरिएशन्स को पार करता हुआ अपने हूक तक पहुँचता है जो बेहद आकर्षक है। और ख़ास बात यह भी इस गीत में सिद्धार्थ मल्होत्रा इसमें एक रैपर के रूप में सुनाई देते हैं। 

जिस फ़िल्म में नवाज़ुद्दीन सिद्दिक़ी मुख्य नायक हों, उस फ़िल्म में गीत-संगीत की ख़ास उम्मीद रखना उचित नहीं। लेकिन ’बाबूमोशाइ बन्दूकबाज़’ फ़िल्म की बात और है। संगीतकार गौरव दगाओंकर और गीतकार ग़ालिब असद भोपाली (असद भोपाली के पुत्र) ने मिल कर कुल छह गीत रचे हैं इस फ़िल्म के लिए। पहला गीत "बरफ़ानी" शास्त्रीय संगीत आधारित कामुक रचना है अरमान मलिक की मुख्य आवाज़ में। एक दौर ऐसा था जब इस तरह के उपशास्त्रीय आधारित गीत सुरेश वाडकर गाया करते थे। इसी गीत का एक और संस्करण है अरुणिमा भट्टाचार्य की आवाज़ में। इन्होंने भी इस गीत को ख़ूबसूरती के साथ निभाया है। लेकिन सभी को चकित करती हुईं अरुणिमा एक बिल्कुल ही अलग अंदाज़ का गीत भी इस फ़िल्म के लिए गाती हैं। "ऐ संइया" में भोजपुरी रंग है, एक देहाती अन्दाज़ है, जो लोक गायिकाओं में होती है। लेकिन यह गीत उतना प्रभावशाली नहीं है। आपको फ़िल्म ’ढोंगी’ का "हाय रे हाय तेरा घुंगटाह" गीत तो याद ही होगा! इसी गीत को रीक्रिएट किया गया है और इसमें आवाज़ है नेहा कक्कर की। आनन्द बक्शी - राहुल देव बर्मन की मूल रचना पर कारीगरी की गई है। 60 के दशक के संगीत की याद दिलाता "चुलबुली" पापोन की आवाज़ में है। इस गीत में कोशिश की गई है कि यह उस पुराने ज़माने की याद दिलाए जब इस तरह के गीत देव आनन्द, बिस्वजीत आदि पर फ़िल्माए जाते थे। फ़िल्म का अन्तिम गीत मोहित चौहान की आवाज़ में है "ख़ाली ख़ाली"। मोहित की आवाज़ भले बहुत समय बाद सुनने को मिला है, लेकिन बहुत ही साधारण गीत है यह जिसे याद रखने की कोई वजह नज़र नहीं आती। क्योंकि ’बाबूमोशाइ बन्दूकबाज़’ फ़िल्म से गीत-संगीत की उम्मीद किसी ने नहीं रखी थी, इसलिए इसके ऐल्बम में जो भी परोसा गया है, उसे स्वीकार कर लेने में ही भलाई है।

और अब अन्तिम फ़िल्म ’क़ैदी बैण्ड’ की बातें। फ़िल्म की कहानी जेल में बने एक म्युज़िक बैण्ड की कहानी है। इस वजह से इस फ़िल्म का गीत-संगीत महत्वपूर्ण है। संगीतकार अमित त्रिवेदी और गीतकार हबीब फ़ैज़ल और कौसर मुनीर से अच्छे गीत-संगीत की उम्मीद रखना ग़लत नहीं है। फ़िल्म में कुल नौ गीत हैं और अच्छी बात यह है कि फ़िल्म के नायक-नायिका के लिए केवल अरिजीत सिंह और याशिता शर्मा की आवाज़ें ही ली गई हैं। पहला गीत है "आइ ऐम इंडिया"। हबीब फ़ैज़ल के लिखे इस गीत से विरक्ति होती है क्योंकि इसे देशभक्ति का जामा पहनाने की असफल कोशिशें की गई हैं। इस गीत का एक अमित त्रिवेदी संस्करण भी है, लेकिन इस गीत की धुन ही ऐसी है कि जो दिल पर बे-असर है। दूसरा गीत "हलचल" रॉक शैली का गीत है जिसमें अरिजीत ने अलग अंदाज़ चुना है। याशिता के साथ इस युगल गीत को फ़िल्म के बाहर सुनने में शायद मज़ा ना आए। कौसर मुनीर लिखित "फिर नई"/ "फिर वही" एक कर्णप्रिय गीत है जिसमें संतूर और बांसुरी की ताने सुनाई देती हैं और यकायक हमें शिव-हरि की याद दिला जाते हैं। अगला गीत "जुनूनी" सिद्धान्त मागो और कौसर मुनीर ने संयुक्त रूप से लिखा है। अरिजीत-याशिता की आवाज़ों में यश-राज रोमान्टिक नंबर जैसा है, और यह गीत शायद ऐल्बम के कर्णप्रिय गीतों में से एक है। अमित त्रिवेदी और कौसर मुनीर वापस आते हैं अरिजीत-याशिता के गाए "उड़न-छू" के साथ जिसमें "आइ ऐम इंडिया" की झलक मिलती है पार्श्व में। फिर भी उससे यह बेहतर है। ऐल्बम के बाकी गीत में भी कुछ ख़ास दम नहीं है। फ़िल्म की तरह इसके गीत भी पिट चुके हैं।

तो आज बस इतना ही। जुलाई-अगस्त के फ़िल्म-संगीत की समीक्षा यहीं सम्पन्न होती है। आने वाले अंक में सितंबर-अक्टुबर की समीक्षा के साथ फिर उपस्थित होंगे, तब तक के लिए अपने दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार!


आख़िरी बात

’चित्रकथा’ स्तंभ का आज का अंक आपको कैसा लगा, हमें ज़रूर बताएँ नीचे टिप्पणी में या soojoi_india@yahoo.co.in के ईमेल पते पर पत्र लिख कर। इस स्तंभ में आप किस तरह के लेख पढ़ना चाहते हैं, यह हम आपसे जानना चाहेंगे। आप अपने विचार, सुझाव और शिकायतें हमें निस्संकोच लिख भेज सकते हैं। साथ ही अगर आप अपना लेख इस स्तंभ में प्रकाशित करवाना चाहें तो इसी ईमेल पते पर हमसे सम्पर्क कर सकते हैं। सिनेमा और सिनेमा-संगीत से जुड़े किसी भी विषय पर लेख हम प्रकाशित करेंगे। आज बस इतना ही, अगले सप्ताह एक नए अंक के साथ इसी मंच पर आपकी और मेरी मुलाक़ात होगी। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिए, नमस्कार, आपका आज का दिन और आने वाला सप्ताह शुभ हो!




शोध,आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र  



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