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रविवार, 23 सितंबर 2018

राग अड़ाना : SWARGOSHTHI – 386 : RAG ADANA







स्वरगोष्ठी – 386 में आज

पूर्वांग और उत्तरांग राग – 1 : राग अड़ाना

उस्ताद अमीर खाँ से फिल्मी गीत और उस्ताद कमाल साबरी से सारंगी पर राग अड़ाना सुनिए





उस्ताद अमीर खाँ
उस्ताद कमाल साबरी
‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर आज से आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की पहली कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। रागों को पूर्वांग और उत्तरांग में विभाजित करने के लिए सप्तक के सात स्वरों के साथ तार सप्तक के षडज स्वर को मिला कर आठ स्वरों के संयोजन को दो भागों में बाँट दिया जाता है। प्रथम भाग षडज से मध्यम तक पूर्वांग और दूसरे भाग पंचम से तार षडज तक उत्तरांग कहा जाता है। इसी प्रकार जो राग दिन के पहले भाग (पूर्वार्द्ध) अर्थात दिन के 12 बजे से रात्रि के 12 बजे के बीच में गाया-बजाया जाता हो उन्हें पूर्व राग और जो राग दिन के दूसरे भाग (उत्तरार्द्ध) अर्थात रात्रि 12 बजे से दिन के 12 बजे के बीच गाया-बजाया जाता हो उन्हें उत्तर राग कहा जाता है। भारतीय संगीत का यह नियम है कि जिन रागों में वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में हो तो उन्हें दिन के पूर्वार्द्ध में और जिन रागों को वादी स्वर सप्तक उत्तरांग में हो उन्हे दिन के उत्तरार्द्ध में गाया-बजाया जाना चाहिए। राग का वादी स्वर यदि सप्तक के प्रथम भाग में है संवादी स्वर निश्चित रूप से सप्तक के दूसरे भाग में होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर सप्तक के दूसरे भाग में हो तो संवादी स्वर सप्तक के पूर्व में होगा। वादी और संवादी स्वरों में सदैव तीन अथवा चार स्वरों का अन्तर होता है। इसलिए यदि वादी स्वर ऋषभ है तो संवादी स्वर पंचम या धैवत होगा। इसी प्रकार यदि वादी स्वर धैवत हो तो संवादी स्वर गान्धार अथवा ऋषभ होगा। भीमपलासी, बसन्त और भैरवी जैसे कुछ राग इस नियम के अपवाद होते हैं। इस कठनाई को दूर करने के लिए सप्तक के पूर्वांग और उत्तरांग का क्षेत्र बढ़ा दिया जाता है। पूर्वांग का क्षेत्र षडज से पंचम तक और उत्तरांग का क्षेत्र मध्यम से तार सप्तक के षडज तक माना जाता है। इस प्रकार वादी-संवादी में से यदि एक स्वर पूर्वांग में हो तो दूसरा स्वर उत्तरांग में हो जाता है। इस श्रृंखला में हम आपसे कुछ पूर्वांग और उत्तरांग प्रधान रागों पर चर्चा करेंगे। इस श्रृंखला के लिए चुने गए रागों में वादी स्वर षडज अथवा ऋषभ होता है और संवादी स्वर पंचम अथवा मध्यम होता है। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हमने उत्तरांग प्रधान राग अड़ाना चुना है। श्रृंखला की पहली कड़ी में आज हम सुविख्यात गायक उस्ताद अमीर खाँ और उनके साथियों के स्वर में 1955 में प्रदर्शित फिल्म “झनक झनक पायल बाजे” से राग अड़ाना पर आधारित एक गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग के शास्त्रीय स्वरूप को समझने के लिए सेनिया घराने के सुप्रसिद्ध सारंगीवादक उस्ताद कमाल साबरी का सारंगी पर बजाया राग अड़ाना भी प्रस्तुत कर रहे हैं।



भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष में निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और संतूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था।

संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा का सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। दरअसल वसन्त देसाई फिल्मों के नायक बनने की अभिलाषा लेकर ‘प्रभात’ में शान्ताराम के पास आये थे। उन्हें फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू को जानने और परखने का सुझाव शान्ताराम ने दिया। उस प्रथम मुलाक़ात के बारे में वसन्त देसाई ने एक रेडिओ प्रस्तुतकर्त्ता को कुछ इन शब्दों में बताया था– “अजी बस एक दिन यूँही सामने जाके खड़ा हो गया कि मुझे ऐक्टर बनना है। म्युज़िक तब कहाँ आता था? और वैसे भी फ़िल्मों में हर कोई पहले ऐक्टर बनने ही तो आता है। फिर बन जाता है टेक्निशियन। तो मैं भी बाल बढ़ाकर पहुँच गया ऐक्टर बनने। मगर एक कमी थी मुझमें, मैं दुबला-पतला और छोटे कद का था जब कि वह स्टण्ट का ज़माना था। सब ऊँचे कद के पहलवान जैसे हुआ करते थे, छोटे कद के आदमी का काम नहीं था। शान्ताराम जी ने पूछा, 'क्या करना चाहते हो?' मैंने गर्दन हिलाकर बाल दिखाये और कहा कि ऐक्टर बनना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे सर से पाँव तक देखा और सोचा होगा कि लड़का पागल है। फिर मुझ पर तरस आ गया और बोले कि मैं तुम्हे रख लेता हूँ, मगर सब काम करना पड़ेगा। कल से आ जाओ स्टुडिओ में। मैं ऑफ़िस बॉय बन गया, नो पगार, मुफ़्त में 18-18 घण्टे का काम। अरे, मालिक ख़ुद काम करते थे हमारे साथ। ऋषियों के आश्रम जैसा था 'प्रभात' का परिवेश। उनका हमेशा से ऐसा ही स्वभाव रहा है कि जैसा कहें वैसा फ़ौरन कर दो। और मैं भी उनकी हर बात मानता था, इसलिए मुझसे वो हमेशा ख़ुश रहते थे। जिस विभाग में कमी हो, अन्ना साहब मुझे फ़ौरन भेज देते, चाहे वह कैमरा विभाग हो या संगीत विभाग। इसलिए आज मैं फिल्म निर्माण की हर इकाई का काम जानता हूँ। फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में मैं उनका सहायक तक रहा हूँ। सिनेमा तकनीक में मैं उन्हें गुरु मानता हूँ। एक साल के बाद उन्होंने मेरी तनख्वाह सात रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दी, और बाद में तो यह समझ लीजिए, 'प्रभात' में सबसे ज़्यादा तनख्वाह हीरो चन्द्रमोहन को और मुझे मिलती थी।" आरम्भ से ही शान्ताराम जी को एक ऐसे सामाजिक फ़िल्मकार का दर्जा प्राप्त था, जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज की कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते रहते थे। इसके बाद उनकी हर फ़िल्म में समाज को कोई न कोई सन्देश दिया है। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत।

राग अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : उस्ताद अमीर खाँ और साथी : फिल्म – झनक झनक पायल बाजे


फिल्म के इस गीत में आपको राग अड़ाना के स्वरों का स्पष्ट अनुभव हुआ होगा। राग दरबारी से ही मिलता-जुलता राग है, अड़ाना। सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर में यह राग खूब खिलता है। यह आसावरी थाट और कान्हड़ा अंग का राग है। षाड़व-षाड़व जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और अवरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में कोमल गान्धार और शुद्ध मध्यम स्वर वक्रगति से प्रयोग किया जाता है। चंचल प्रकृति के इस राग से विनयपूर्ण और प्रबल पुकार के भाव की सार्थक अभिव्यक्ति सम्भव है। वीर रस के गीतों के लिए यह एक आदर्श राग है। यह राग, दरबारी से काफी मिलता-जुलता है। परन्तु अड़ाना में दरबारी की तरह अतिकोमल गान्धार स्वर का आन्दोलनयुक्त प्रयोग नहीं होता। इसके अलावा राग अड़ाना उत्तरांग प्रधान है, अर्थात इस राग के स्वर अधिकतर मध्य और तार सप्तक में चलते हैं। जबकि दरबारी पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग अड़ाना का वादी स्वर तार सप्तक का षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग अड़ाना, राग दीपक के आठ पुत्रों में से एक माना जाता है। इसे ‘रात की सारंग’ भी कहा जाता है।

वाद्य संगीत पर राग अड़ाना की सहज अनुभूति के लिए अब हम आपको यही राग सारंगी पर सुनवाते हैं। सारंगी एक ऐसा वाद्य है जो मानव कण्ठ के सर्वाधिक निकट होता है। आपके लिए सारंगी पर तीनताल में निबद्ध रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद कमाल साबरी। सारंगीवादकों के खानदान की सातवीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे उस्ताद कमाल साबरी रामपुर-मुरादाबाद के सेनिया घराने की वादन परम्परा के प्रतिभावान संवाहक हैं। इनके पिता उस्ताद साबरी खाँ विश्वविख्यात सारंगीवादक थे। कमाल साबरी ने अनेकानेक अवसरों पर स्वतंत्र सारंगीवादन के माध्यम से संगीत-प्रेमियों को चमत्कृत किया है। हमारी आज कि गोष्ठी में कमाल साबरी राग अड़ाना की एक ओजपूर्ण रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रस्तुति में तबला पर साथ दिया है, सरवर साबरी ने। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज का यह अंक यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग अड़ाना : सारंगी पर तीनताल की रचना : उस्ताद कमाल साबरी




संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 386वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वर्ष 1966 में प्रदर्शित एक फिल्म से रागबद्ध गीत का अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको दो अंक अर्जित करने के लिए निम्नलिखित तीन में से कम से कम दो प्रश्नों के उत्तर देने आवश्यक हैं। यदि आपको तीन में से केवल एक अथवा तीनों प्रश्नों का उत्तर ज्ञात हो तो भी आप प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। 390वें अंक की ‘स्वरगोष्ठी’ तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें वर्ष 2018 के चौथे सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा। इसके साथ ही पूरे वर्ष के प्राप्तांकों की गणना के बाद वर्ष के अन्त में महाविजेताओं की घोषणा की जाएगी और उन्हें सम्मानित भी किया जाएगा।





1 – इस गीतांश को सुन कर बताइए कि इसमें किस राग की छाया है?

2 – इस गीत में प्रयोग किये गए ताल को पहचानिए और उसका नाम बताइए।

3 – इस गीत में किस पार्श्वगायिका के स्वर हैं?

आप उपरोक्त तीन मे से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार, 29 सितम्बर, 2018 की मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। आपको यदि उपरोक्त तीन में से केवल एक प्रश्न का सही उत्तर ज्ञात हो तो भी आप पहेली प्रतियोगिता में भाग ले सकते हैं। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते हैं, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर देने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। “फेसबुक” पर पहेली का उत्तर स्वीकार नहीं किया जाएगा। विजेता का नाम हम उनके शहर, प्रदेश और देश के नाम के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के 388वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 384वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1980 में प्रदर्शित फिल्म “कुदरत” के एक रागबद्ध गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन में से किसी दो प्रश्न के उत्तर पूछा था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है; राग – भैरवी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है; ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है; स्वर – विदुषी परवीन सुल्ताना

“स्वरगोष्ठी” की इस पहेली प्रतियोगिता में तीनों अथवा तीन में से दो प्रश्नो के सही उत्तर देकर विजेता बने हैं; कल्याण, महाराष्ट्र से शुभा खाण्डेकर, चेरीहिल न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, मैरिलैण्ड, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। उपरोक्त सभी प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई। सभी प्रतिभागियों से अनुरोध है कि अपने पते के साथ कृपया अपना उत्तर ई-मेल से ही भेजा करें। इस पहेली प्रतियोगिता में हमारे नये प्रतिभागी भी हिस्सा ले सकते हैं। यह आवश्यक नहीं है कि आपको पहेली के तीनों प्रश्नों के सही उत्तर ज्ञात हो। यदि आपको पहेली का कोई एक भी उत्तर ज्ञात हो तो भी आप इसमें भाग ले सकते हैं।


अपनी बात

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर आज से आरम्भ हमारी नई श्रृंखला “पूर्वांग और उत्तरांग राग” की पहली कड़ी में आपने राग अड़ाना का परिचय प्राप्त किया। इस राग में आपने उस्ताद कमाल साबरी द्वारा सारंगी पर प्रस्तुत एक रचना का रसास्वादन किया। साथ ही आपने उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में इस राग पर केन्द्रित एक फिल्मी गीत फिल्म “झनक झनक पायल बाजे” से सुना। हमें विश्वास है कि हमारे अन्य पाठक भी “स्वरगोष्ठी” के प्रत्येक अंक का अवलोकन करते रहेंगे और अपनी प्रतिक्रिया हमें भेजते रहेगे। आज के अंक और श्रृंखला के बारे में यदि आपको कुछ कहना हो तो हमें अवश्य लिखें। हमारी वर्तमान अथवा अगली श्रृंखला के लिए यदि आपका कोई सुझाव या अनुरोध हो तो हमें swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले अंक में रविवार को प्रातः 7 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर एक बार फिर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

राग अड़ाना : SWARGOSHTHI – 386 : RAG ADANA : 23 सितम्बर, 2018

रविवार, 30 नवंबर 2014

‘झनक झनक पायल बाजे...’ : SWARGOSHTHI – 196 : RAG ADANA



स्वरगोष्ठी – 196 में आज

शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत – 5 : राग अड़ाना


फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उस्ताद अमीर खाँ ने गाया राग अड़ाना के स्वरों में यह गीत




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी है, हमारी लघु श्रृंखला, ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मी गीत’। फिल्म संगीत के क्षेत्र में चौथे से लेकर आठवें दशक के बीच शास्त्रीय संगीत के कई विद्वानों और विदुषियों ने अपना योगदान किया है। इस श्रृंखला में हमने कुछ ऐसे ही फिल्मी गीतों का चुनाव किया है, जिन्हें रागदारी संगीत के प्रयोक्ताओं और विशेषज्ञों ने रचा है। इन रचनाओं में राग के स्पष्ट स्वरूप की उपस्थिति मिलती है। श्रृंखला के पाँचवें अंक में आज हम आपसे 1955 में प्रदर्शित, भारतीय फिल्म जगत की संगीत और नृत्य की प्रधानता वाली फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ के एक शीर्षक गीत- ‘झनक झनक पायल बाजे...’ पर चर्चा करेंगे। फिल्म के इस गीत में राग अड़ाना के स्वरों का ओजपूर्ण उपयोग किया गया है। भारतीय संगीत के उल्लेखनीय स्वरसाधक उस्ताद अमीर खाँ ने इस गीत को स्वर दिया है। खाँ साहब और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में राग देसी के स्वरों में पिरोया युगल गीत आपको इस श्रृंखला के दूसरे अंक में हम सुनवा चुके हैं। आज हम उस्ताद अमीर खाँ और समूह स्वरों में राग अड़ाना पर आधारित यह गीत प्रस्तुत कर रहे हैं। इसके साथ ही राग ‘अड़ाना’ की कर्णप्रियता का अनुभव करने के लिए इस राग की एक भावपूर्ण रचना उस्ताद कमाल साबरी की सारंगी पर सुनेंगे। 
 


उस्ताद अमीर खाँ 
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्मों की गणना ‘मील के पत्थर’ के रूप में की जाती है। ऐसी ही एक उल्लेखनीय फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ थी जिसका प्रदर्शन 1955 में हुआ था। इस फिल्म में कथक नृत्य शैली का और राग आधारित गीत-संगीत का कलात्मक उपयोग किया गया था। फिल्म का निर्देशन वी. शान्ताराम ने और संगीत निर्देशन वसन्त देसाई ने किया था। वी. शान्ताराम के फिल्मों की सदैव यह विशेषता रही है कि उसके विषय नैतिक मूल्यों रक्षा करते प्रतीत होते है। साथ ही उनकी फिल्मों में रूढ़ियों का विरोध भी नज़र आता है। फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ में उन्होने भारतीय शास्त्रीय नृत्य और संगीत की महत्ता को रेखांकित किया था। फिल्म को इस लक्ष्य तक ले जाने में संगीतकार वसन्त देसाई का उल्लेखनीय योगदान रहा। जाने-माने कथक नर्तक गोपीकृष्ण फिल्म की प्रमुख भूमिका में थे। इसके अलावा संगीत के ताल पक्ष में निखारने के लिए सुप्रसिद्ध तबलावादक गुदई महाराज (पण्डित सामता प्रसाद) का उल्लेखनीय योगदान था। वसन्त देसाई ने सारंगीनवाज़ पण्डित रामनारायन और संतूरवादक पण्डित शिवकुमार शर्मा का सहयोग भी प्राप्त किया था।

वसन्त देसाई 
संगीतकार वसन्त देसाई की सफलता का दौर फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ से ही आरम्भ हुआ था। वसन्त देसाई की प्रतिभा सही मूल्यांकन वी. शान्ताराम ने ही किया था। प्रभात कम्पनी में एक साधारण कर्मचारी के रूप में उनकी नियुक्ति हुई थी। यहीं रह कर उन्होने अपनी कलात्मक प्रतिभा का विकास किया था। आगे चलकर वसन्त देसाई, शान्ताराम की फिल्मों के मुख्य संगीतकार बने। दरअसल वसन्त देसाई फिल्मों के नायक बनने की अभिलाषा लेकर ‘प्रभात’ में शान्ताराम के पास आये थे। उन्हें फ़िल्म-निर्माण के हर पहलू को जानने और परखने का सुझाव शान्ताराम ने दिया। उस प्रथम मुलाक़ात के बारे में वसन्त देसाई ने एक रेडिओ प्रस्तुतकर्त्ता को कुछ इन शब्दों में बताया था– “अजी बस एक दिन यूँही सामने जाके खड़ा हो गया कि मुझे ऐक्टर बनना है। म्युज़िक तब कहाँ आता था? और वैसे भी फ़िल्मों में हर कोई पहले ऐक्टर बनने ही तो आता है। फिर बन जाता है टेक्निशियन। तो मैं भी बाल बढ़ाकर पहुँच गया ऐक्टर बनने। मगर एक कमी थी मुझमें, मैं दुबला-पतला और छोटे कद का था जब कि वह स्टण्ट का ज़माना था। सब ऊँचे कद के पहलवान जैसे हुआ करते थे, छोटे कद के आदमी का काम नहीं था। शान्ताराम जी ने पूछा, 'क्या करना चाहते हो?' मैंने गर्दन हिलाकर बाल दिखाये और कहा कि ऐक्टर बनना चाहता हूँ। उन्होंने मुझे सर से पाँव तक देखा और सोचा होगा कि लड़का पागल है। फिर मुझ पर तरस आ गया और बोले कि मैं तुम्हे रख लेता हूँ, मगर सब काम करना पड़ेगा। कल से आ जाओ स्टुडिओ में। मैं ऑफ़िस बॉय बन गया, नो पगार, मुफ़्त में 18-18 घण्टे का काम। अरे, मालिक ख़ुद काम करते थे हमारे साथ। ऋषियों के आश्रम जैसा था 'प्रभात' का परिवेश। उनका हमेशा से ऐसा ही स्वभाव रहा है कि जैसा कहें वैसा फ़ौरन कर दो। और मैं भी उनकी हर बात मानता था, इसलिए मुझसे वो हमेशा ख़ुश रहते थे। जिस विभाग में कमी हो, अन्ना साहब मुझे फ़ौरन भेज देते, चाहे वह कैमरा विभाग हो या संगीत विभाग। इसलिए आज मैं फिल्म निर्माण की हर इकाई का काम जानता हूँ। फिल्म निर्देशन के क्षेत्र में मैं उनका सहायक तक रहा हूँ। सिनेमा तकनीक में मैं उन्हें गुरु मानता हूँ। एक साल के बाद उन्होंने मेरी तनख्वाह सात रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दी, और बाद में तो यह समझ लीजिए, 'प्रभात' में सबसे ज़्यादा तनख्वाह हीरो चन्द्रमोहन को और मुझे मिलती थी।" आरम्भ से ही शान्ताराम जी को एक ऐसे सामाजिक फ़िल्मकार का दर्जा प्राप्त था, जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज की कुप्रथाओं के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है। इसके बाद उनकी हर फ़िल्म में समाज को कोई न कोई सन्देश दिया है। शान्ताराम जी ने 1955 में फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ का निर्माण किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक बसन्त देसाई ने इस फिल्म में कई राग आधारित स्तरीय गीतों की रचना की थी। फिल्म का शीर्षक गीत ‘झनक झनक पायल बाजे...’ राग अड़ाना का एक मोहक उदाहरण है। इस गीत को स्वर प्रदान किया, सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ ने। आइए, सुनते हैं, राग अड़ाना पर आधारित यह गीत।


राग – अड़ाना : ‘झनक झनक पायल बाजे...’ : फिल्म – झनक झनक पायल बाजे : स्वर – उस्ताद अमीर खाँ और साथी : संगीत – वसन्त देसाई : गीत – हसरत जयपुरी





उस्ताद कमाल साबरी 
फिल्म के इस गीत में आपको राग अड़ाना के स्वरों का स्पष्ट अनुभव हुआ होगा। राग दरबारी से ही मिलता-जुलता राग है, अड़ाना। सातवें प्रहर अर्थात रात्रि के तीसरे प्रहर में यह राग खूब खिलता है। यह आसावरी थाट और कान्हड़ा अंग का राग है। षाड़व-षाड़व जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और अवरोह में धैवत स्वर वर्जित होता है। अवरोह में कोमल गान्धार और शुद्ध मध्यम स्वर वक्रगति से प्रयोग किया जाता है। चंचल प्रकृति के इस राग से विनयपूर्ण और प्रबल पुकार के भाव की सार्थक अभिव्यक्ति सम्भव है। वीर रस के गीतों के लिए यह एक आदर्श राग है। यह राग, दरबारी से काफी मिलता-जुलता है। परन्तु अड़ाना में दरबारी की तरह अतिकोमल गान्धार स्वर का आन्दोलनयुक्त प्रयोग नहीं होता। इसके अलावा राग अड़ाना उत्तरांग प्रधान है, अर्थात इस राग के स्वर अधिकतर मध्य और तार सप्तक में चलते हैं। जबकि दरबारी पूर्वांग प्रधान राग होता है। राग अड़ाना का वादी स्वर तार सप्तक का षडज और संवादी स्वर पंचम होता है। प्राचीन सिद्धान्तों के अनुसार राग अड़ाना, राग दीपक के आठ पुत्रों में से एक माना जाता है। इसे ‘रात की सारंग’ भी कहा जाता है।

वाद्य संगीत पर राग अड़ाना की सहज अनुभूति के लिए अब हम आपको यही राग सारंगी पर सुनवाते हैं। सारंगी एक ऐसा वाद्य है जो मानव कण्ठ के सर्वाधिक निकट होता है। आपके लिए सारंगी पर तीनताल में निबद्ध रचना प्रस्तुत कर रहे हैं, सुप्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद कमाल साबरी। सारंगीवादकों के खानदान की सातवीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे उस्ताद कमाल साबरी रामपुर-मुरादाबाद के सेनिया घराने की वादन परम्परा के प्रतिभावान संवाहक हैं। इनके पिता उस्ताद साबरी खाँ विश्वविख्यात सारंगीवादक थे। कमाल साबरी ने अनेकानेक अवसरों पर स्वतंत्र सारंगीवादन के माध्यम से संगीत-प्रेमियों को चमत्कृत किया है। हमारी आज कि गोष्ठी में कमाल साबरी राग अड़ाना की एक ओजपूर्ण रचना प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रस्तुति में तबला पर साथ दिया है, सर्वर साबरी ने। आप यह रचना सुनिए और मुझे आज का यह अंक यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग – अड़ाना : सारंगी पर तीनताल की रचना : उस्ताद कमाल साबरी






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 196वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको लगभग साठ वर्ष पहले की एक फिल्म के जुगलबन्दी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 200वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा तथा वर्ष 2014 में सर्वाधिक अंक अर्जित करने वाले प्रतिभागी को वार्षिक विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस अंश में आपको किस राग की अनुभूति हो रही है?

2 – जिस ताल में यह गीत निबद्ध है, उसे पहचानिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 6 दिसम्बर, 2014 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 198वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 194वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ के स्वरों में गाये, फिल्म मुगल-ए-आजम के गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग सोहनी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल दीपचंदी। पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘शास्त्रीय संगीतज्ञों के फिल्मों गीत’ के माध्यम से हम भारतीय संगीत जगत के मूर्धन्य कलासाधकों के द्वारा उनके फिल्म संगीत के क्षेत्र में किये गए योगदान को रेखांकित कर रहे हैं। इस श्रृंखला के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। नए वर्ष से ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के अन्तर्गत आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   



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