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Tuesday, December 9, 2008

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से लक्ष्मी प्यारे..और आज के एल पी तक...एक सुनहरा अध्याय


३७ लंबे वर्षों तक श्रोताओं को दीवाना बनाकर रखने वाले इस संगीत जोड़ी को अचानक ही हाशिये पर कर दिया गया. आखिर ऐसा क्यों हुआ. ५०० से भी अधिक फिल्में, अनगिनत सुपरहिट गीत, पर फ़िर भी संगीत कंपनियों ने और मिडिया ने उन्हें नई पीढी के सामने उस रूप में नही रखा जिस रूप में कुछ अन्य संगीतकारों को रखा गया. गायक महेंद्र कपूर ने एक बार इस मुद्दे पर अपनी राय कुछ यूँ रखी थी- "उनका संगीत पूरी तरह से भारतीय था, जहाँ लाइव वाद्यों का भरपूर प्रयोग होता था. चूँकि उनके अधिकतर गीत मेलोडी प्रधान हैं उनका रीमिक्स किया जाना बेहद मुश्किल है और संगीत कंपनियाँ अपने फायदे के लिए केवल उन्हीं को "मार्केट" करती हैं जिनके गीतों में ये "खूबी" होती है." ये बात काफ़ी हद तक सही प्रतीत होती है. पर अगर हम बात करें हिट्स की तो किसी भी सच्चे हिन्दी फ़िल्म संगीत के प्रेमी को जो थोड़ा बहुत भी बीते सालों पर अपनी नज़र डालने की जेहमत करें वो बेझिझक एल पी के बारे में यह कह सकेगा - "बॉस" कौन था मालूम है जी...

चलिए इस बात को कुछ तथ्यों के आधार पर परखें -

हिन्दी फिल्मों कि स्वर सम्राज्ञी लता मंगेशकर ने एल पी के संगीत निर्देशन में सबसे अधिक (करीब ७००) गीत गाये. कुछ ऐसा था ये गठबंधन कि जैसे एल पी जानते हो कि क्या जचेगा लता जी की आवाज़ में और लता दी भी समझती हों कि क्या है एल पी के किसी ख़ास गीत के गहरे छुपे भाव. तभी तो इस टीम ने सालों साल एक से बढ़कर एक गीत दिए, वो भी विविधता से भरे हुए, बानगी देखिये "अखियों को रहने दे" (बॉबी), "एक प्यार का नग्मा है" (शोर), "जाने क्यों लोग.."(महबूब की मेहंदी), "चलो सजना" (मेरे हमदम मेरे दोस्त), गुडिया (दोस्ती)....ये सूची बहुत बहुत लम्बी है. बहरहाल तर्क ये है कि लता दी की आवाज़ का हर रंग हर रूप देखा दुनिया ने, एल पी के निर्देशन में.

गायक/गायिका की मार्केट पोजीशन से अलग हट कर वो ये देखते थे कि उनके गीतों पर किसकी आवाज़ जचेगी. रफी साहब एक "सूखे" दौर से गुजर रहे थे जब एल पी ने उन्हें "अमर अकबर अन्थोनी" का सुपर हिट गीत "परदा है परदा" दिया. इसी फ़िल्म में उन्होंने हिन्दी फिल्मों के चार सबसे बड़े गायकों को एक साथ गवाया. "हम को तुमसे..." गीत में लता के साथ स्वर मिलाया रफी साहब, किशोर दा और मुकेश के स्वरों ने. मुकेश साहब भी अपने कैरियर के मुश्किल दौर से गुजर रहे थे जब एल पी ने उनसे "मिलन" के गीत गवाए, जिसके लिए उन्हें फ़िल्म के निर्माता -निर्देशक को बहुत समझाना-मनाना भी पड़ा था.

फ़िल्म फेयर पुरस्कारों की बात करें तो एल पी ने ये सम्मान ७ बार जीता. जिसमें ४ बार लगातार (१९७७ से १९८० तक) इस सम्मान के विजेता होने का रिकॉर्ड भी है. बहुत सी "बी" ग्रेड और गैर सितारों से सजी फिल्मों को भी उन्होंने अपने संगीत के दम पर उंचाईयां दी. यहाँ तक कि इंडस्ट्री के दो बड़े गायकों (मोहम्मद रफी और किशोर कुमार) पर बिना निर्भर रहे भी उन्होंने "रोटी कपड़ा और मकान","बॉबी", "एक दूजे के लिए", "हीरो", "उत्सव", और "सुर संगम" जैसी फिल्मों में ढेरों हिट गीत दिए. पर बड़े गायकों में भी उन्होंने एक सामंजस्य बनाये रखा गीतों की संख्या के मामले में रफी साहब ने लगभग ३७० गीत गाये तो किशोर दा ने करीब ३९९ गीतों को आवाज़ दी उनके संगीत निर्देशन में. आशा जी ने २५० गीत गाये तो मुकेश ने ८० गीतों में योगदान दिया. हेमंत कुमार, मन्ना डे, तलत महमूद, महेंद्र कपूर से लेकर सुरेश वाडकर, मनहर उधास, पंकज उधास, सुदेश भोंसले, सोनू निगम, कुमार सानू, कविता कृष्णमूर्ति, अलका याग्निक, साधना सरगम, अनुराधा पौडवाल, सुखविंदर, अलीशा, उदित नारायण, रूप कुमार राठोड.... कौन सा ऐसा गायक है जिसे उन्होंने मौका नही दिया और जिसने उनके संगीत निर्देशन में गाकर ख़ुद को खुशकिस्मत न महसूस किया हो.

एल पी की कमियाबी का सबसे बड़ा राज़ था, उत्कृष्ट आपसी समन्वय, काम का उचित बंटवारा, एक दूसरे के काम में दखल न देने की आदत, सरल और गुनगुनाने लायक धुन, अकॉस्टिक वाद्यों का अधिक इस्तेमाल, इलेक्ट्रॉनिक वाद्यों का भी सही मात्र में उपयोग, और इन सब से बढ़कर दोनों की भारतीय और पाश्चात्य संगीत की और वाद्यों की विशाल और विस्तृत जानकारी. लक्ष्मीकांत प्यारेलाल से लक्ष्मी प्यारे और लक्ष्मी प्यारे से एल पी, संगीत का एक विशाल अध्याय है ये सफर जिसकी शुरूआती कहानी भी कम दिलचस्प नही है, जिसका जिक्र हम करेंगें कल साथ ही आपको मिलवायेंगें प्यारेलाल जी से,फिलहाल सुनते हैं एल पी के कुछ और यादगार नग्में.





Monday, October 27, 2008

हम होंगे कामियाब

कभी कभी छोटी छोटी कोशिशें एक बड़ी सोच का रूप धारण कर लेती है. और फ़िर उस सोच का अंकुर पल्लवित होकर एक बड़ा वृक्ष बनने की दिशा में बढ़ने लगता है और उसकी शाखायें आसमान को छूने निकल पड़ती है. आज से ठीक एक साल पहले २७ अक्टूबर २००७ की शाम को हिंद युग्म ने अपना पहला संगीतबद्ध गीत जारी किया था. दिल्ली, हैदराबाद और नागपुर में बैठे एक गीतकार, एक संगीतकार और एक गायक ने ऑनलाइन बैठकों के माध्यम से तैयार किया था एक अनूठा गीत "सुबह की ताजगी". और इसी के साथ नींव पड़ी एक विचार की जो आज आपके सामने "आवाज़" के रूप में फल फूल रहा है. हिंद युग्म ने महसूस किया कि जिस तरह हमने उभरते हुए कवियों,कथाकारों और बाल साहित्य सृजकों को एक मंच दिया क्यों न इन नए गीतकारों,संगीतकारों और गायकों को भी हम एक ऐसा आधार दें जहाँ से ये बिना किसी बड़े निवेश के अपनी कला का नमूना दुनिया के सामने रख सकें.चूँकि इन्टनेट जुडाव का माध्यम था तो दूरियां कोई समस्या ही नही थी. कोई भी कहीं से भी एक दूसरे से जुड़ सकता था बस कड़ी जोड़नी थी हिंद युग्म के साथ. सिलसिला शुरू हुआ तो एक से बढ़कर एक कलाकार सामने आए. मात्र तीन महीने में युग्म ने १० गीत रच डाले, इन्हें १० कविताओं की चाशनी में डूबोकर हमने बनाया इन्टरनेट गठबन्धनों के माध्यम से तैयार पहला सुरीला एल्बम "पहला सुर".


इस एल्बम में युग्म परिवार के १० कवियों की शिरकत थी, तो ४ गीतकारों, ७ संगीतकारों और ९ गायकों ने अपनी प्रतिभा दुनिया के सामने रखी. हिन्दी ब्लॉग्गिंग जगत पहली बार किसी ब्लॉग ने अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेले जैसे बड़े मंच पर अपनी प्रस्तुति का विमोचन किया. "पहला सुर" जिसके भी हाथ में गया उसने मुक्त कंठ से इस महाप्रयास की सराहना की. हिंद युग्म ने संगीत और पॉडकास्ट के लिए एक अलग शाखा के तौर पर "आवाज़" की शुरुआत की. आवाज़ ने अपने प्रयास और तेज़ किए, मुश्किल परिस्तिथियों से जूझते हुए भी हिंद युग्म के कर्णधारों ने अभूतपूर्व योजनाओं को अंजाम दिया. वो फ़िर कवियों और पाठकों को पुरस्कृत करने का अद्भुत विचार हो या फ़िर दूरभाष के माध्यम से हिन्दी टंकण की निशुल्क शिक्षा प्रदान करने का काम हो, पहल हमेशा हिंद युग्म ने की और औरों के लिए प्रेरणा बना. आवाज़ पर भी दूसरे संगीत सत्र की शुरुआत हुई जुलाई में, जिसके तहत हर शुक्रवार एक नए गीत को हम दुनिया के सामने रख रहे हैं, अब तक १७ गीत प्रकाशित हो चुके हैं और अब इस संगीत परिवार में ५० से अधिक नए कलाकार जुड़ चुके हैं. पॉडकास्ट कवि सम्मलेन का मासिक आयोजन आवाज़ पर हो रहा है ये भी अपने आप में एक नायाब प्रयास है. साहित्यिक रचनाओं को ऑडियो फॉर्मेट में उपलब्ध करवाने के उद्देश्य से शुरू हुई योजना "सुनो कहानी" जिसके तहत हर शनिवार एक ताज़ा कहानी का पॉडकास्ट हम लोगों तक पहुंचा रहे हैं. हाल ही हुए ऑनलाइन पुस्तक विमोचन से "आवाज़" ने साबित किया है इन्टरनेट पर उपलब्ध इस ब्लॉग रुपी मंच का बहुयामी उपयोग सम्भव है. फिल्मकारों के लिए भी अब आवाज़ के दरवाज़े खुले हैं, अब तक दो लघु फिल्मों का प्रसारण हम कर चुके हैं. संगीत से जुड़ी तमाम तरह की जानकारियों को हिन्दी में उपलब्ध करवाने की आवाज़ की पहल में आज ब्लॉग्गिंग जगत से जुड़े भाषा और संगीत की सेवा में समर्पित कई बड़े नामी ब्लॉगर अपना अनमोल समय देकर हमारा साथ दे रहे हैं.
मीडिया बहुत कुछ लिख चुका है हिंद युग्म के बारे में, हमारे साथी ब्लोग्गेर्स भी इसे एक "फिनोमिना" मान चुके हैं. पर युग्म की असली ताक़त तो युग्म के जोशीले, कर्मठ, और समर्पित सदस्य हैं, जो दिन रात अपने इस खूबसूरत सपने को सजाने सँवारने की योजनाओं पर काम करते रहते हैं. इतने नाम हैं कि सब का जिक्र बेहद मुश्किल होगा, चूँकि आज हम अपने उस बीज रुपी गीत "सुबह की ताजगी" का ब्लॉग पर जन्मदिवस मना रहे हैं, तो बस संगीत से जुड़े कलाकारों पर बात करेंगे. शुरुआत इस ऑनलाइन पार्टी की होनी चहिये उसी शानदार गीत से. अनुरोध है सुबोध साठे से कि एक बार फ़िर अपनी मधुर आवाज़ में छेड़े "सुबह की ताजगी" का तराना.



सुबोध हमेशा की तरह हंसमुख है आज की पार्टी में, हमने जाना चाहा सुबोध से -
“सुबोध नए सत्र में बहुत से नए कलाकार आए हैं इनमें से अधिकतर आपको रोल मॉडल मानते हैं, आप बताएं इनमें से आपके पसंदीदा गायक और संगीतकार कौन कौन है ?”
सुबोध का जवाब था "सबसे पहले तो हिंद युग्म को बधाई, मुझे गायक के तौर पर कृष्ण कुमार बहुत पसंद आए, उनके गीत का संगीत पक्ष कुछ कमजोर था पर गायकी और आवाज़ बहुत जबरदस्त लगी. संगीतकारों में "संगीत दिलों का उत्सव है..." वाले निखिल बहुत प्रतिभाशाली लगे."सुबोध के आग्रह पर हम अनुरोध कर रहे हैं कृष्ण कुमार से वो सुनाएँ अपना गीत "राहतें सारी.."



वाकई कृष्ण कुमार का भविष्य काफी उज्जवल नज़र आ रहा है....इसी बीच हमने पकड़ा ज़रा से शर्मीले और ज़रा से एकांतप्रिये युग्म के पहले संगीतकार ऋषि एस को, दरअसल जहाँ तक आज हम पहुंचें हैं वह सम्भव नही होता अगर ऋषि एस का हमें साथ नही मिलता, ऋषि युग्म के वार्षिक अंशदाता भी हैं. यानी कि वो युग्म की सोच और योजनाओं से बेहद आत्मीयता से जुड़े हैं. ऋषि से भी हमने वही सवाल किया जो सुबोध से किया था. तो जवाब मिला -
"मेरा अब तक का सबसे पसंदीदा गीत है सुबोध का गाया "खुशमिजाज़ मिटटी". इसका मुखडा कमाल का है और जिस स्केल पर ये गाया गया है वो उसकी आवाज़ के लिए बिल्कुल परफेक्ट है. मुझे सुबोध की आवाज़ हमेशा से ही पसंद रही है और इस गीत में उनकी संगीत रचने की क्षमता भी बखूबी उभर कर सामने आई है. मेरे पहले ३ गीत सुबोध ने ही गाये थे, और उम्मीद करता हूँ कि आगे भी हम साथ काम करेंगे.
मैं हिन्दी साहित्य की बहुत अधिक जानकारी नही रखता तो किसी गीतकार की समीक्षा करना जरा मुश्किल काम है. पर व्यक्तिगत तौर पर मुझे सजीव का लिखा "जीत के गीत" बहुत पसंद है, सजीव शायद दिए हुए धुन पर बेहतर लिखते हैं, मेरे आखिरी दो गीत (जीत और मैं नदी ) के बोलों की बेहद तारीफ हुई है, बनिस्पत मेरे पिछले गीतों से जो पहले लिखे गए और बाद में स्वरबद्ध हुए. मैं सभी ग़ज़लकारों को भी बधाई देना चाहता हूँ, मैं ग़ज़लों का दीवाना हूँ, पर शायद ग़ज़ल को स्वरबद्ध करना अभी is not my cup of tea, i guess."
ऋषि ने बहुत इमानदारी से जो बात कही है वो हम सब जानते हैं. ग़ज़लों को स्वरबद्ध करना और गाना दोनों ही कलायें विलक्षण क्षमता की मांग करती है. युग्म पर अब तक बहुत सी बेमिसाल ग़ज़लें आई हैं और हमारे कलाकारों ने हमेशा ही श्रोताओं के दिलों को जीतने में कामयाबी हासिल की है. दोस्तों, तो क्यों न इन खूबसूरत ग़ज़लों का एक बार फ़िर से आनंद लिया जाए. स्वागत करें महफ़िल में, आभा मिश्रा, रुपेश ऋषि, प्रतिष्ठा, निशांत अक्षर, और रफीक शेख का.

इन दिनों - आभा मिश्रा



ये ज़रूरी नही - रुपेश व् प्रतिष्ठा



चले जाना - रुपेश



तेरे चेहरे पे - निशांत अक्षर



सच बोलता है - रफ़ीक शेख



ग़ज़लों का दौर चला तो हमें झूमती हुई दिखी शिवानी जी, शिवानी का आवाज़ परिवार विशेष आभारी है. इनका सहयोग हर कदम पर हम सब के साथ रहा है. अब तक इनकी ३ ग़ज़लें आवाज़ पर आ चुकी हैं, शिवानी जी जाहिर है अपनी ग़ज़लें आपको प्रिय होंगी, पर उसके अलावा कोई और गीत जो आपको विशेष प्रिय हो बताएं. जवाब शिवानी जी अपनी मधुर आवाज़ में दिया "आवाज़ की पहली सालगिरह पर मैं हिंद युग्म और आवाज़ के सभी श्रोतागण को बधाई देना चाहती हूँ !हिंद युग्म और आवाज़ अपने श्रोताओं और पाठकों के सहयोग से ही अपनी बुलंदियों को छूने जा रहा है !आवाज़ पर आये सभी गीत ,ग़ज़ल और कवितायें भिन्न भिन्न प्रकार के फूलों के रूप में एकत्र हो कर एक महकता गुलदस्ता बन गए हैं !सभी की अपने बोल ,गीत और संगीत से अपनी अलग पहचान है !परन्तु यदि किसी एक को चुनना हो तो मेरे विचार से `मुझे दर्द दे ' मेरा पसंदीदा गीत है ! सजीव जी ने बहुत खूबसूरत गीत लिखा है ,बोल लाजवाब हैं हर कोई सूफी गीत नहीं लिख सकता !गीत में ठहराव है ! संगीत दिल को सुकून देता है !शुरुआत बहुत खूबसूरत है !अमनदीप और सुरेंदर जी की आवाज़ में गहराई और अमन कायम है !गीतकार, गायक और संगीतकार में बहुत अच्छा सामंजस्य है !मेरी नज़र में इन्ही सब खूबियों के कारण ये मेरा पसंदीदा गीत है ! इस गीत की पूरी टीम को एक बार फिर मेरी शुभकामनायें !धन्यवाद !"
अब जब शिवानी जी ने इतनी तारीफ की है तो क्यों न सुन लिया जाए उनका पसंदीदा गीत, स्वागत करें लुधिआना पंजाब के पेरुब और उनके साथ जोगी और अमनदीप का, साथ में आमंत्रित हैं बेहद प्रतिभाशाली कृष्णा पंडित और उनके साथी भी अपनी ताज़ा सूफी रचना के साथ. तो दोस्तों आनंद लें इस सूफी गुलदस्ते का.

मुझे दर्द दे - जोगी व् अमनदीप



डरना झुकना - जोगी व् अमनदीप



सूरज चाँद सितारे - कृष्णा पंडित



पार्टी में लेट लतीफ़ आए हैं परिवार के सबसे छोटे सदस्य मात्र १७ साल के नौजवान कोलकत्ता से सुभोजित. आते ही हमने घेर लिया उन्हें भी और किया वही सवाल. तो मिला बस एक लाइन का जवाब-
"हाँ मुझे पसंद है निखिल का गीत... मेरे ख्याल से “संगीत दिलों का उत्सव है” युग्म का अब तक का सर्वश्रेष्ट गीत है." तभी उनके पास चल कर आए UK से आए हमारे नए सनसनीखेज गायक बिस्वजीत भी, हमने पूछा कि क्या वो सहमत हैं सुभोजित से तो बिस्वजीत का जवाब था,"मुझे मानसी की आवाज़ बहुत पसंद आयी, “मैं नदी” गीत को उन्होंने बहुत खूब गया है, चूँकि संगीत सीखा हुआ होने के कारण वो हरकतें बहुत सहज रूप से ले लेती है और गाने में नई जान फूंक देती है"
अब बिस्वजीत सामने हो तो हम उन्हें ऐसे कैसे छोड़ सकते है. तो पहले सुन लेते हैं उनकी आवाज़, और फ़िर हम पेश करेंगे सुभोजित और बिस्वजीत के पसंदीदा गीत भी. स्वागत करें बिस्वजीत, मानसी, चार्ल्स और मिथिला का.

जीत के गीत - बिस्वजीत



मेरे सरकार - बिस्वजीत



संगीत दिलों का उत्सव है - चार्ल्स व् मिथिला



मैं नदी - मानसी




दोस्तों महफिल शबाब पर है. आईये आवाज़ की अब तक की टीम का एक संक्षिप्त परिचय लिया जाए -
संगीत परिवार -

गीतकार के रूप में - अलोक शंकर, गौरव सोलंकी, मोईन नज़र, सजीव सारथी, विश्व दीपक "तन्हा", शिवानी सिंह, अज़ीम राही, निखिल आनंद गिरी, मोहिंदर कुमार, मनुज मेहता, और संजय द्विवेदी.

गीतकार संगीतकार और गायक के रूप में - सुनीता यादव, और सुदीप यशराज.

संगीतकार के रूप में - ऋषि एस, सुभोजित, चेतन्य भट्ट, अनुरूप, निखिल वर्गीस और पेरुब.

संगीतकार और गायक के रूप में - सुबोध साठे, रुपेश ऋषि, निरन कुमार, जे एम् सोरेन, कृष्ण राज, कृष्णा पंडित, रफ़ीक शेख, आभा मिश्रा और शिशिर पारखी.

गायक के रूप में - जोगी सुरेंदर, अमन दीप कौशल, प्रतिष्ठा, चार्ल्स, मिथिला, निशांत अक्षर, मानसी पिम्पले, जयेश शिम्पी, बिस्वजीत, अभिषेक, और रुद्र प्रताप.

आवाज़ की टीम - सजीव सारथी (संपादक), शैलेश भारतवासी, अनुराग शर्मा, और तपन शर्मा चिन्तक (सह-संपादक),प्रशेन , राहुल पाठक (डिजाईन व् साज सज्जा),संजय पटेल, अशोक पाण्डेय, मृदुल कीर्ति, पंकज सुबीर, युनुस खान, सागर नाहर, मनीष कुमार, सुरेश चिपनकुर, दिलीप कवठेकर, रंजना भाटिया, शोभा महेन्द्रू, शिवानी सिंह, अनीता कुमार, अमिताभ मीत, पारुल, विश्व दीपक तन्हा और अन्य साथी सहयोगी.

इससे पहले की हम आवाज़ रुपी इस सोच की शुरुआत के एक वर्ष मुक्कमल होने की खुशी में केक काटें, ईश्वर की स्तुति कर लें, याद करें उस परम पिता को जिसके आदेश के बिना एक पत्ता भी नही हिलता. हमारे संगीत समूह में सबसे अनुभवी शिशिर पारखी जी से अनुरोध है कि वो एक मन को छू लेने वाला भजन सुनाएँ -

भजन (अप्रकाशित) - शिशिर पारखी



चलिए दोस्तों अब पार्टी का आनंद लें -



मौका भी है और दस्तूर भी, कुछ झूम लिया जाए कुछ नाच लिया जाए, पेश है एक बार फ़िर सुबोध, अपने आवारा दिल के साथ -



सोरेन जो अब तक चुप चाप खड़े हैं अब आपको रॉक करने वाले हैं अपने दमदार "ओ मुनिया" गीत के साथ.



और अंत में आईये हम सब मिलकर दोहराएँ वो मूल मन्त्र जिसने हमें एक सूत्र में बांधा है -

हिन्दी है मेरे हिंद की धड़कन,
हिन्दी मेरी आवाज़ है.
बढे चलो....पेश है जयेश, मानसी और ऋषि की आवाजों में -



आशा है आप सब मेहमानों ने इस ऑनलाइन संगीत महफिल का जम कर आनंद लिया होगा. हिंद युग्म और आवाज़ के साथ आपकी दोस्ती, आपका प्यार और आप सब का सहयोग युहीं बना रहे यही दुआ है. धन्येवाद.

Monday, August 4, 2008

वो खंडवा का शरारती छोरा

किशोर कुमार का नाम आते ही जेहन में जाने कितनी तस्वीरें, जाने कितनी सदायें उभर कर आ जाती है. किशोर दा यानी एक हरफनमौला कलाकार, एक सम्पूर्ण गायक, एक लाजवाब शक्सियत. युग्म के वाहक और किशोर दा के जबरदस्त मुरीद, अवनीश तिवारी से हमने गुजारिश की कि वो किशोर दा पर, "आवाज़" के लिए एक श्रृंखला करें. आज हम सब के प्यारे किशोर दा का जन्मदिन है, तो हमने सोचा क्यों न आज से ही इस श्रृंखला का शुभारम्भ किया जाए. पेश है अवनीश तिवारी की इस श्रृंखला का पहला अंक, इसमें उन्होंने किशोर दा के फिल्मी सफर के शुरूवाती दस सालों पर फोकस किया है, साथ में है कुछ दुर्लभ तस्वीरें भी.

किशोर कुमार ( कालावधी १९४७ - १९६० )- वो खंडवा का शरारती छोरा

यह एक कठिन प्रश्न है कि किशोर कुमार जैसे हरफनमौला व्यक्तित्व के विषय में जिक्र करते समय कहाँ से शुरुवात करें आइये सीधे बढ़ते है उनके पेशेवर जीवन ( प्रोफेसनल करिअर ) के साथ , जो उनकी पहचान है बात करते है उनके शुरू के दशक की, याने १९४७ - १९६० तक की बड़े भाई अशोक कुमार के फिल्मों में पैर जमाने के बाद छोटे भाई आभास यानी हमारे चहेते किशोर और मझले भाई अनूप बम्बई ( मुम्बई ) आ गए आभास की उम्र १८ बरस थी छुटपन से ही कुंदन लाल सहगल का अनुसरण ( follow up ) कर उनके गीतों को गाने में माहीर किशोर को पहला मौका पार्श्व गायक ( play back singer ) के रूप में मिला फ़िल्म "जिद्दी" में और गाना था - "मरने की दुआएं क्या मांगू " देव आनद पर फिल्माए इस गीत में कुछ भी नया नही था और के. एल. सहगल की नक़ल जैसी थी इसके पहले किशोर ने एक समूह गीत में भी भाग लिया था उन्ही दिनों आभास ने अपना नाम बदल कर किशोर रख लिया कहा जाता है कि नाम में बहुत कुछ होता है तभी तो यह नाम आज तक याद किया जा रहा है

अदाकारी में कामयाबी की मंजिलों को चुमते दादा मुनी याने अशोक कुमार चाहते थे कि किशोर भी अभिनय (acting) में ही मन लगाये लेकिन मन मौजी किशोर को यह दिखावे कि दुनिया कम भाती रही बड़े भाई के दबाव से अभिनय शुरू किया साथ - साथ अपने लिए गीत भी गाये लेकिन शुरुवाती दौर का यह सफर इतना मशहूर नही हो पा रहा था " शिकारी" नाम की एक फ़िल्म में उन्होंने अपना पहला अभिनय किया

इन बरसों की कुछ यादगार फिल्में -

१९५१ - आन्दोलन - अभिनय किया

१९५४ - नौकरी - सफल निर्देशक बिमल रॉय की फ़िल्म में किशोर ने अभिनय किया और गाया भी
एक मीठा गीत है - " छोटा सा घर होगा बादलों की छाँव में ...." ख्याल आया ?

१९५६ - नयी दिल्ली का गाना - " नखरेवाली ..."

१९५६ - फंटूस - इसका एक गीत " दुखी मन मेरे ..." आज भी मन को भाव विभोर करता है यह एक ऐसा गीत है जो सच में किशोर के उन दिनों की जदोजहत को बयान करता है ध्यान से सुनने पर मुझे ऐसा लगा जैसे सहगल और किशोर दोनों कि आवाज़ मिली है इसमे किशोर अपने माने गुरु सहगल को सुनते और सीखते अपनी पहचान बनाने में लगे थे यह उसी बदलाव का एक बेहतरीन नमूना है जगजीत सिंह जैसे गायकों ने भी यह गीत दोहराया है अपनी आवाज में

१९५७ - नौ दो ग्यारह - सदाबहार गीत " आंखों में क्या जी ...."

१९५७ - मुसाफिर

१९५८ - दिल्ली का ठग - अभिनेत्री नूतन और किशोर की एक सौगात - " हम तो मोहब्बत करेगा ..."

किशोर की आवाज़ में उनके इस दशक का मेरा सबसे पसंदीदा गीत "दुखी मन मेरे", ज़रूर सुनें -



अशोक कुमार के घर आए संगीत निर्देशक सचिन देव बर्मन ( S. D. Burman) ने किशोर को बाथरूम में गाते सूना और उनकी तारीफ़ करते हुए उन्हें आपने आवाज़ में गाने की सलाह दी दो गुणों का मेल किसी नए कृति का सृजक होता है बर्मन दा और किशोर मिले और शुरू हुया एक ऐसा सफर जो हिन्दी फ़िल्म जगत का एक सुनहरा इतिहास बन गया बर्मन जी ने किशोर को और निखारा और दोनों ने उस दशक में कई अच्छे गीत दिए

दोनों के कुछ सफल प्रयोग -

१९५४ - मुनीमजी ,

१९५६ - फंटूस - पहले ही बताया इस के बारे में ,

१९५७ - Paying Guest ,

१९५८- फ़िल्म चलती का नाम गाडी के गीत ह्म्म्म... इस फ़िल्म के सभी गानों में तो किशोर ने आवाज़ दी थी
इस फ़िल्म के लिए क्या कहा जाए - superb

दशक में किशोर ने मेहनत कर अपनी पहचान तो लगभग बना ली थी लेकिन अभी तक आवाज़ से ज्यादा अभिनय के लिए ही मशहूर हुए थे १९५१ में रुमा गुहा के साथ शादी की लेकिन यह केवल ८ बरस तक ही कामयाब रही रुमा खास कर बंगला की अभिनेत्री और गायिका है इस दंपत्ति ने हमे अमित कुमार के नाम से एक नया कलाकार दिया

इस तरह शुरूवात के दशक में किशोर की आवाज देव आनंद के लिए पहचान बनी , आशा और लता जी का संग हुया और एस. डी. बर्मन जैसे गुरु का हाथ मिला

ये कुछ दुर्लभ तस्वीरें है पहला किशोर और देव जी का है



दूसरे में किशोर और रफी जी के साथ हैं कुछ और बड़े धुरंधर भी, खोजिये और बताएं ये कौन कौन हैं.



किशोर कुमार के शुरुवात के दिनों की कहानी को मै अपने इन शेरों से रोकता हूँ -

अभिनय - गायकी, कला में वो लाजवाब था ,
सिने जगत में आया एक नया आफताब था ,
आया बोम्बे वो खंडवा का शरारती छोरा ,
जैसे राजकुमार चला कोई बनने नवाब था ,
वक्त की रफ़्तार में गिरते - संभलते रहा ,
नया मुकाम हासील करना उसका ख्वाब था


धन्यवाद

बाबू अब तो चलते हैं,
अगले माह मिलेंगे
पम्प पम्प पम्प .....



(जारी...)

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