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Sunday, May 22, 2016

राग कल्याण अथवा यमन : SWARGOSHTHI – 271 : RAG KALYAN OR YAMAN



स्वरगोष्ठी – 271 में आज


मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 4 : मुकेश और राग यमन के स्वर


‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की चौथी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। श्रृंखला की चौथी कड़ी में आज हमने राग कल्याण अथवा यमन के स्वरों पर आधारित मदन मोहन का स्वरबद्ध किया, फिल्म ‘संजोग’ का एक गीत चुना है। इस गीत को पार्श्वगायक मुकेश ने स्वर दिया है। मदन मोहन के स्वरबद्ध बहुत कम गीतों को गायक मुकेश ने स्वर दिया है। मदन मोहन और मुकेश के इस योग से राग का स्वरूप और गीत का भाव भरपूर उभरता है। राग कल्याण अथवा यमन पर आधारित इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम सुप्रसिद्ध गायक उस्ताद राशिद खाँ के स्वर में इसी राग की एक बन्दिश भी प्रस्तुत कर रहे हैं।


ह सच है कि मदन मोहन की अधिकतर रचनाएँ गायिका प्रधान हुआ करती थीं, पुरुष गायकों को ज़्यादा गीत गाने को नहीं मिलते थे उनकी फ़िल्मों में, और जितने मिलते थे, उनमें से ज़्यादातर रफ़ी साहब की आवाज़ में होते क्योंकि उनके कम्पोज़िशन्स और स्टाइल के मुताबिक रफ़ी साहब की आवाज़ ही उन गीतों के लिए सटीक होती थी। आप शायद यक़ीन न करें कि गायक मुकेश ने अपने पूरे संगीत सफर में मदन मोहन के लिए मात्र नौ गीत ही गाए हैं। कारण क्या है पता नहीं, पर शायद यही वजह रही होगी जो अभी हमने कहा। पर यह बताना अत्यन्त आवश्यक है कि मदन मोहन के करीअर की पहली रचना को स्वर मुकेश ने ही दिया था। यह थी 1950 की फ़िल्म ’आँखें’ का गीत "प्रीत लगा के मैंने यह फल पाया..."। यह मदन मोहन के संगीत में पहला हिन्दी फ़िल्मी गीत था। आइए आज आपको बतायें कि इस पहली फ़िल्म तक पहुँचने से पहले मदन मोहन ने क्या-क्या किया। अपने लाहौर काल में उन्होंने शास्त्रीय संगीत का क ख ग सीखा श्री करतार सिंह से, लेकिन यह बहुत ही अल्प समय के लिए था। संगीत की कोई औपचारिक शिक्षा उन्होंने नहीं ली। 11 वर्ष की आयु में बम्बई में वो आकाशवाणी पर बच्चों के कार्यक्रमों में भाग लेना शुरू किया। लेकिन यहाँ भी संगीत से उनका नाता कुछ ख़ास नहीं बन सका। 1946 में जब वो कार्यक्रम सहायक के रूप में आकाशवाणी लखनऊ में कार्यरत हुए, तभी उन्हें ठीक तरह से संगीत के साथ घुलने का मौक़ा मिला। उन पर पहला प्रभाव पड़ा जद्दनबाई के गाये गीतों का। आगे चलकर बेगम अख़्तर और बरकत अली ख़ाँ की गायकी से वो मुतासिर हुए। आकाशवाणी में रहने की वजह से उन्हें अपने समय के नामचीन शास्त्रीय गायकों और वादकों से मिलने और उनसे संगीत की बारीकियों को सीखने-समझने के बहुत से अवसर मिले जिनका उन्होंने पूरा-पूरा लाभ उठाया। अनजाने में मदन मोहन ने धुनों की रचना भी शुरू कर दी छोटे-मोटे रेडियो कार्यक्रमों के लिए। 1947 में उनका तबादला आकाशवाणी दिल्ली में हो गया, लेकिन उन्हें वहाँ संगीत का वह माहौल नहीं मिला जो लखनऊ में था। तंग आकर उन्होंने आकाशवाणी की सरकारी नौकरी छोड़ दी और पहुँच गए मायानगरी बम्बई।

आगे की दास्तान हम आने वाले अंकों में बतायेंगे, फ़िलहाल बापस मुड़ते हैं मदन मोहन की पहली फ़िल्म ’आँखें’ की ओर। इसी फ़िल्म में मुकेश ने एक और गीत गाया "हमसे नैन मिलाना बी.ए. पास करके..." जो शमशाद बेगम के साथ गाया हुआ एक युगल गीत था। मुकेश और मदन मोहन की जोड़ी के बाक़ी सात गीत इस प्रकार हैं - "क्या साथ मेरा दोगे तुम प्यार की राहों में..." (फ़िल्म- समुन्दर 1957, लता के साथ), "तुम चल रहे हो हम चल रहे हैं..." (फ़िल्म- दुनिया न माने, 1959, लता के साथ), "हम चल रहे थे वो चल रहे थे..." (फ़िल्म- दुनिया न माने, 1959), "एक मंज़िल राही दो फिर प्यार ना कैसे हो..." (फ़िल्म- संजोग, 1961, लता के साथ), "भूली हुईं यादों मुझे इतना ना सताओ..." (फ़िल्म- संजोग, 1961), "चल चल मेरे दिल प्यार तेरी है मंज़िल..." (फ़िल्म- अकेली मत ज‍इयो, 1963, जॉनी विस्की के साथ), और "इंसानों से क्यों झुकते हो..." (फ़िल्म- चौकीदार, 1974, रफ़ी और आशा के साथ)। मुकेश - मदन मोहन जोड़ी के उपर्युक्त गीतों की ओर ध्यान दें तो यह पायेंगे कि फ़िल्म ’संजोग’ के दो गीतों के अलावा कोई भी गीत ज़्यादा लोकप्रिय नहीं हुआ। ख़ास तौर पर "भूली हुईं यादों..." गीत सर्वसाधारण के साथ-साथ स्तरीय संगीत की समझ रखने वाले संगीत विशेषज्ञों को भी बहुत पसन्द आया। राग कल्याण पर आधारित इस गीत की ख़ासियत यह है कि मुकेश की आवाज़ और अदायगी नैज़ल (nasal) होने की वजह से "न" के उच्चरण वाले शब्द सुनने में अच्छा लगता है। "हुईं", "यादों", "इतना ना", "चैन", "रहने", "पास ना" जैसे शब्दों में "न" की ध्वनि होने की वजह से इस गीत में मुकेश की आवाज़ ही श्रेष्ठ हो सकती थी। इस गीत में दादरा ताल का प्रयोग हुआ है। लीजिए, अब आप राग कल्याण अर्थात यमन पर आधारित संगीतकार मदन मोहन का स्वरबद्ध यह गीत सुनिए।


राग कल्याण अथवा यमन : ‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’ : मुकेश :फिल्म – संजोग



राग कल्याण अथवा यमन, कल्याण थाट का ही आश्रय राग है। यह सम्पूर्ण-सम्पूर्ण जाति का राग है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग होते हैं। राग में मध्यम स्वर तीव्र और शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। राग कल्याण अथवा यमन का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का उपयुक्त समय गोधूलि बेला, अर्थात रात्रि के पहले प्रहर का पूर्वार्द्ध काल होता है। इस राग का प्राचीन नाम कल्याण ही मिलता है। मुगल काल में राग का नाम यमन प्रचलित हुआ। वर्तमान में इसका दोनों नाम, कल्याण और यमन, प्रचलित है। यह दोनों नाम एक ही राग के सूचक हैं, किन्तु जब हम ‘यमन कल्याण’ कहते हैं तो यह एक अन्य राग का सूचक हो जाता है। राग यमन कल्याण, राग कल्याण अथवा यमन से भिन्न है। इसमें दोनों मध्यम का प्रयोग होता है, जबकि यमन में केवल तीव्र मध्यम का प्रयोग होता है। राग कल्याण अथवा यमन के चलन में अधिकतर मन्द्र सप्तक के निषाद से आरम्भ होता है और जब तीव्र मध्यम से तार सप्तक की ओर बढ़ते हैं तब पंचम स्वर को छोड़ देते हैं। राग कल्याण के कुछ प्रचलित प्रकार हैं; पूरिया कल्याण, शुद्ध कल्याण, जैत कल्याण आदि। राग कल्याण गंभीर प्रकृति का राग है। इसमे ध्रुपद, खयाल तराना तथा वाद्य संगीत पर मसीतखानी और रजाखानी गतें प्रस्तुत की जाती हैं। राग की यथार्थ प्रकृति और स्वरूप का उदाहरण देने के लिए अब हम आपको इस राग की एक श्रृंगारपरक् बन्दिश प्रस्तुत कर रहे हैं। तीनताल में निबद्ध इस रचना के विश्वविख्यात गायक उस्ताद राशिद खाँ हैं।


राग कल्याण अथवा यमन : ‘ऐसों सुगढ़ सुगढ़वा बालमा...’ : उस्ताद राशिद खान




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 271वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। गीत के इस अंश को सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष के तीसरे सत्र (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – इस गीतांश के स्वरों में आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक और गायिका की आवाज़ को पहचान रहे हैं? हमें उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 28 मई, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 273वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 269 की संगीत पहेली में हमने आपको वर्ष 1964 में प्रदर्शित फिल्म ‘आपकी परछाइयाँ’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – दरबारी कान्हड़ा, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – दादरा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- पार्श्वगायक – मोहम्मद रफी

इस बार की संगीत पहेली में पाँच प्रतिभागियों ने तीनों प्रश्नों का सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। ये विजेता हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किया है। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी नई श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ का रसास्वादन कर रहे हैं। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। आज की इस कड़ी में हमने आपसे राग कल्याण अथवा यमन पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र भेजते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय और कड़ियों का निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नई श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



 


Sunday, June 22, 2014

संगीतकार मदनमोहन के राग आधारित गीत




स्वरगोष्ठी – 173 में आज

व्यक्तित्व – 3 : फिल्म संगीतकार मदनमोहन

‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ अब चैन से रहने दो मेरे पास न आओ...’ 
 




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ की तीसरी कड़ी में, मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सभी संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, जारी लघु श्रृंखला ‘व्यक्तित्व’ के अन्तर्गत हम आपसे संगीत के कुछ असाधारण संगीत-साधकों के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्होंने मंच, विभिन्न प्रसारण माध्यमों अथवा फिल्म संगीत के क्षेत्र में लीक से हट कर उल्लेखनीय योगदान किया है। हमारी आज की कड़ी के व्यक्तित्व हैं, फिल्म संगीत-प्रेमियों के बीच “गजल-सम्राट” की उपाधि से विभूषित यशस्वी संगीतकार, मदनमोहन। उनके संगीतबद्ध गीत अत्यन्त परिष्कृत हुआ करते थे। आभिजात्य वर्ग के बीच उनके गीत बड़े शौक से सुने और सराहे जाते थे। वे गज़लों को संगीतबद्ध करने में सिद्ध थे। गज़लों के साथ ही अपने गीतों में रागों का प्रयोग भी निपुणता के साथ करते थे। विभिन्न रागों पर आधारित उनके अनेक गीत आज भी सदाबहार बने हुए हैं। उनके अधिकतर राग आधारित गीतों को लता मंगेशकर और मन्ना डे स्वर प्रदान किए हैं। आज के अंक में हम मदनमोहन के शास्त्रीय राग आधारित रचनाओं के सन्दर्भ में उनकी विलक्षण प्रतिभा को रेखांकित करेंगे। यह भी सुखद संयोग है कि आज से तीसरे दिन अर्थात 25 जून को मदनमोहन का 91वाँ जन्मदिवस है। इस अवसर पर ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार इस महान संगीत-साधक की स्मृतियों को उन्हीं के स्वरबद्ध गीतों के माध्यम से स्वरांजलि अर्पित करता है। 
 



फिल्म संगीत के क्षेत्र में मदनमोहन का नाम एक ऐसे संगीतकार के रूप में लिया जाता है, जिनकी रचनाएँ सभ्रान्त और संगीत रसिकों के बीच चाव से सुनी जाती है। उनका संगीत जटिलताओं से मुक्त होते हुए भी हमेशा सतहीपन से भी दूर ही रहा। उनका जन्म 25 जून, 1924 को बगदाद में हुआ था। फिल्मी संस्कार उन्हें विरासत में मिला था। मदनमोहन के पिता रायबहादुर चुन्नीलाल, विख्यात फिल्म निर्माण संस्था ‘फिल्मिस्तान’ के संस्थापक थे। मुम्बई में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। बचपन से ही संगीत के प्रति लगाव होते हुए भी शिक्षा पूर्ण होने के बाद आश्चर्यजनक रूप से मदनमोहन ने सेना की नौकरी की। परन्तु लम्बे समय तक वे सेना की नौकरी में नहीं रहे और वहाँ से मुक्त होकर लखनऊ रेडियो के संगीत विभाग में नियुक्त हो गए। यहाँ रह कर जिस सांगीतिक परिवेश और संगीत की विभूतियों से उनका सम्पर्क हुआ, उसका प्रभाव उनकी रचनाओं पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। लखनऊ रेडियो केन्द्र पर कार्य करते हुए मदनमोहन का सम्पर्क विख्यात गायिका बेगम अख्तर और उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ से हुआ। आगे चलकर मदनमोहन के फिल्म संगीत पर इन विभूतियों का असर हुआ। फिल्मों में गजल गायकी का एक मानक स्थापित करने में मदनमोहन का योगदान प्रशंसनीय रहा है। निश्चित रूप से यह प्रेरणा उन्हें बेगम अख्तर से ही मिली थी। इसी प्रकार उनके अनेक गीतों में रागों की विविधता के दर्शन भी होते हैं। फिल्म संगीत को रागों के परिष्कृत और सरलीकृत रूप प्रदान करने की प्रेरणा उन्हें उस्ताद फ़ैयाज़ खाँ और लखनऊ के तत्कालीन समृद्ध सांगीतिक परिवेश से ही मिली थी। ‘स्वरगोष्ठी’ की इस कड़ी में हम मदनमोहन के संगीतबद्ध कुछ राग आधारित गीतों पर चर्चा कर रहे हैं। सबसे पहले हम जिस गीत की चर्चा करेंगे वह 1957 में प्रदर्शित फिल्म ‘देख कबीरा रोया’ से लिया गया है। मदनमोहन ने इस फिल्म के प्रायः सभी गीत विविध शास्त्रीय रागों पर आधारित करते हुए रचे थे। फिल्म के सभी गीत गुणबत्ता और लोकप्रियता की दृष्टि से अद्वितीय थे। इन्हीं गीतों में से हमने आपके लिए राग जैजैवन्ती के स्वरों से अलंकृत गीत- ‘बैरन हो गई रैना...’ चुना है। इस गीत में नायिका के विरह भाव का चित्रण किया गया है। रात्रि के दूसरे प्रहर में मध्यरात्रि के निकट गाया-बजाया जाने वाला राग जैजैवन्ती के स्वरों में प्रतीक्षा और विरह का भाव खूब मुखर होता है। ऐसे गीतों के लिए पुरुष पार्श्वगायकों में मन्ना डे, मदनमोहन की पहली पसन्द थे। तीनताल में निबद्ध इस गीत को मन्ना डे ने बड़े ही भावपूर्ण ढंग से गाया है।


राग जैजैवन्ती : ‘बैरन हो गई रैन...’ : स्वर – मन्ना डे : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – देख कबीरा रोया

 



मदनमोहन के संगीत में लता मंगेशकर के स्वरों का योगदान हमेशा महत्त्वपूर्ण रहा है। पाँचवें दशक के अन्तिम वर्षों में लता मंगेशकर पार्श्वगायन के क्षेत्र में अवसर पाने के लिए संघर्षरत थीं। उन्हीं दिनों मदनमोहन भी अपनी रेडियो की नौकरी छोड़ कर फिल्मों में प्रवेश का मार्ग खोज रहे थे। यूँतो उनके पिता रायबहादुर चुन्नीलाल तत्कालीन फिल्म जगत के प्रतिष्ठित व्यक्तित्व थे, किन्तु मदनमोहन अपनी प्रतिभा के बल पर ही फिल्म संगीत के क्षेत्र में अपना स्थान बनाना चाहते थे। उन्हीं दिनों संगीतकार गुलाम हैदर फिल्म ‘शहीद’ के लिए नई आवाज़ खोज रहे थे। उन्होने स्वर-परीक्षा के लिए मदनमोहन और लता मंगेशकर की आवाज़ों में एक युगल गीत रिकार्ड किया। एस. मुखर्जी ने इस रिकार्डिंग को सुन कर दोनों आवाज़ों को खारिज कर दिया। उन्हें क्या पता था कि आगे चल कर इनमें से एक आवाज़ विश्वविख्यात गायिका का और दूसरी आवाज़ उच्चकोटि के संगीतकार की है। आगे चल कर मदनमोहन और उनकी मुँहबोली बहन लता मंगेशकर की जोड़ी ने फिल्म संगीत जगत को अनेक मधुर गीतों से समृद्ध किया। 1950 में मदनमोहन के संगीत निर्देशन में बनी देवेन्द्र गोयल की फिल्म ‘आँखें’ का संगीत काफी लोकप्रिय हुआ, किन्तु इन गीतों में लता मंगेशकर की आवाज़ नहीं थी। फिल्म में मीना कपूर, शमशाद बेगम और मुकेश की आवाज़ें थी। फिल्म ‘शहीद’ के लिए की गई स्वर-परीक्षा के दौरान मदनमोहन ने लता मंगेशकर से वादा किया था कि अपनी पहली फिल्म में वे लता से गीत गवाएंगे, किन्तु अपनी पहली फिल्म ‘आंखे’ में वे अपना संकल्प पूरा न कर सके। परन्तु 1951 में बनी देवेंद्र गोयल की ही अगली फिल्म ‘अदा’ में मदनमोहन और लता मंगेशकर का साथ हुआ और यह साथ लम्बी अवधि तक जारी रहा। इस दौरान लता मंगेशकर ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में अनेक उत्कृष्ट गीत गाये। मदनमोहन के संगीत से सजा दूसरा गीत, जो हम प्रस्तुत कर रहे हैं, वह एक युगल गीत है। 1959 में प्रदर्शित फिल्म ‘चाचा ज़िन्दाबाद’ में मदनमोहन का संगीत था। इस फिल्म के गीतों में भी उन्होने रागों का आधार लिया और आकर्षक संगीत रचनाओं का सृजन किया। फिल्म में राग ललित के स्वरों में पिरोया एक मधुर गीत- ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ था, जिसे मन्ना डे और लता मंगेशकर ने स्वर दिया। आइए, तीनताल मे निबद्ध यह गीत सुनते हैं। 


राग ललित : ‘प्रीतम दरश दिखाओ...’ : स्वर – मन्ना डे और लता मंगेशकर : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – चाचा ज़िन्दाबाद





मदनमोहन को ‘गजलों का बादशाह’ कहा जाता है। नौशाद जैसे वरिष्ठ संगीतकार भी उनकी गज़लों के प्रशंसक रहे हैं। मदनमोहन के संगीतबद्ध अधिकतर गजलों में पुरुष कण्ठस्वर तलत महमूद के और नारी स्वर के लिए तो एकमात्र लता मंगेशकर ही थीं। पिछले दिनों हमारे साथी स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी ने अपने ‘एक गीत सौ कहानियाँ’ स्तम्भ में मदनमोहन के गज़लों की विशेषताओं को रेखांकित किया था। (पढ़ने और सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें) मदनमोहन के स्वरबद्ध गज़लों को अन्य पार्श्वगायकों ने भी गाया है, किन्तु तलत महमूद के स्वर में उनकी गज़लें कुछ अधिक मुखर हुई हैं। मदनमोहन के गीतकारों में राजेन्द्र कृष्ण और राजा मेंहदी अली खाँ के गीतों को जनसामान्य ने खूब सराहा। उनके संगीत में सितार का श्रेष्ठतम उपयोग हुआ। इसके लिए उस्ताद रईस खाँ ने उनके सर्वाधिक गीतों में सितार बजाया था। इसके अलावा कुछेक गीतों में बाँसुरी वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया और सन्तूर वादक पण्डित शिवकुमार शर्मा जैसे दिग्गज संगीतज्ञों का योगदान मिलता है। मदनमोहन द्वारा संगीतबद्ध पहली फिल्म ‘आँखें’ में पार्श्वगायक मुकेश ने सदाबहार गीत- ‘प्रीत लगाके मैंने ये फल पाया...’ गाया था। एक लम्बे अन्तराल के बाद मुकेश की वापिसी मदनमोहन के साथ फिल्म ‘दुनिया न माने’ में हुई। इसके बाद 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘संजोग’ में मुकेश ने मदनमोहन के संगीत निर्देशन में एक बेहद गम्भीर और असरदार गीत- ‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’ गाया। मदनमोहन ने यह गीत राग कल्याण अर्थात यमन के स्वरों में बाँधा था। फिल्मों में प्रायः राग आधारित गीतों को तैयार करने वाले संगीतकारों ने प्रायः मुकेश को प्राथमिकता देने में परहेज किया, किन्तु मदनमोहन ने मुकेश की गायकी से रागानुकूल तत्त्वों को किस प्रकार उभारा है, यह अनुभव आप गीत सुन कर स्वयं कर सकते हैं। तीव्र मध्यम के साथ सभी शुद्ध स्वरों वाले राग यमन के गायन-वादन का उपयुक्त समय गोधूलि बेला अर्थात पाँचवें प्रहर का आरम्भिक समय होता है। गीत में उदासी का जो भाव है वह यमन के स्वरों में खूब उभरता है। मुकेश ने दादरा ताल में निबद्ध इस गीत को पूरी संवेदना के साथ गाया है। आप यह गीत सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग यमन : ‘भूली हुई यादों मुझे इतना न सताओ...’ : स्वर – मुकेश : संगीत – मदनमोहन : फिल्म – संजोग 






आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 173वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत प्रस्तुति का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 180वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत के इस अंश को सुन कर राग पहचानिए और हमें उसका नाम लिख भेजिए।

2 – यह संगीत रचना किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 175वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 171वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1953 में प्रदर्शित फिल्म ‘अनारकली’ से एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक हेमन्त कुमार। सुनवाए गए गीतांश में केवल हेमन्त कुमार की आवाज़ है, किन्तु पूरा गीत हेमन्त कुमार और लता मंगेशकर ने युगल रूप में गाया है। पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग बागेश्री। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी, चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह तथा पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर ‘व्यक्तित्व’ शीर्षक से जारी श्रृंखला के आज के अंक में हमने यशस्वी फिल्म संगीतकार मदनमोहन के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा की है। इसके साथ ही उनके राग आधारित कुछ गीतों की रंजकता का अनुभव भी किया। आप भी यदि ऐसे किसी संगीतकार की जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पते पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र   

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