Showing posts with label talat mehmood. Show all posts
Showing posts with label talat mehmood. Show all posts

Saturday, February 27, 2010

देख ली तेरी खुदाई...न्याय शर्मा, जयदेव और तलत ने रचा निराशा का एक संसार

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 358/2010/58

'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़', इस शृंखला की आज है आठवीं कड़ी, और पिछले सात ग़ज़लों की तरह आज की ग़ज़ल भी ग़मज़दा ही है। १९६३ की फ़िल्म 'किनारे किनारे' तो फ़िल्म की हैसियत से तो नहीं चली थी, लेकिन इस फ़िल्म के गीत संगीत ने लोगों के दिलों में अच्छी ख़ासी जगह ज़रूर बनाई, जो जगह आज भी बरक़रार है। न्याय शर्मा के लिखे गीत और ग़ज़लें थीं, तो जयदेव का संगीत था। मन्ना डे और मुकेश के साथ साथ इस फ़िल्म में तलत महमूद साहब ने भी एक ऐसी ग़ज़ल गाई जो उनके करीयर की एक बेहद लोकप्रिय और कामयाब ग़ज़ल साबित हुई। याद है ना आपको "देख ली तेरी खुदाई बस मेरा दिल भर गया"? आज इसी ग़ज़ल को यहाँ सुनिए और हमें यक़ीन है कि एक लम्बे समय से आपने इस ग़ज़ल को नहीं सुना होगा। वैसे हमने इस फ़िल्म से मुकेश की आवाज़ में "जब ग़म-ए-इश्क़ सताता है तो हँस लेता हूँ" ग़ज़ल 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में सुनवा चुके हैं और इस फ़िल्म से संबंधित जानकारी भी दे चुके हैं और न्याय शर्मा से जुड़ी कुछ बातें भी आपके साथ बाँटा हैं। आज करते हैं तलत महमूद साहब की ही बातें। पुरस्कारों की बात करें तो तलत साहब को जिन प्रमुख पुरस्कारों से नवाज़ा गया है, वो कुछ इस प्रकार हैं - भारत सरकार का पद्मभूषण, महाराष्ट्र राज्य सरकार फ़िल्म पुरस्कार, आशिर्वाद पुरस्कार, मध्य प्रदेश शासन का लता मंगेशकर पुरस्कार, अलामी उर्दू कॊन्फ़्रेन्स पुरस्कार, बॊम्बे फ़िल्म क्रिटिक्स अवार्ड, ग़ालिब अवार्ड, नौशाद अली अवार्ड, फ़िल्म जर्नलिस्ट्स अवार्ड, सिने-गोअर ऐसोसिएशन अवार्ड, बेग़म अख़्तर अवार्ड, ई.एम.आई. लाइफ़ टाइम अचीवमेण्ट अवार्ड, लायन क्लब अवार्ड, और रोटरी कल्ब अवार्ड प्रमुख। लेकिन दोस्तों, इनसे भी बढ़कर जो पुरस्कार तलत साहब को मिला, वह है लाखों, करोड़ों लोगों का प्यार, उनके चाहनेवालों की मोहब्बत, जो उन्हे बेशुमार मिली और आज भी उनके जाने के इतने सालों के बाद भी उन्हे मिल रही है। इससे बढ़कर और क्या पुरस्कार हो सकता है किसी कलाकार के लिए!

तलत महमूद अनेक बार विदेश यात्रा की हैं और हर बार उनके शोज़ में हज़ारों की संख्या में उनके चाहने वाले जमा हुए, हर जगह भीगी आँखों से लोगों ने उनके गाए गीतों को स्वीकारा, खड़े होकर उन्हे सम्मान दिया। सन् १९५६ में तलत पहले भारतीय पार्श्वगायक बने जो किसी दूसरे देश में जाकर व्यावसायिक कॊन्सर्ट में हिस्सा लिया। वह एक ६ शोज़ का टूर था ईस्ट अफ़्रीका क। लेकिन उनकी लोकप्रियता का यह नतीजा हुआ कि केवल ६ शोज़ से बात नही बनी, पब्लिक डीमाण्ड को देखते हुए उन्हे २५ शोज़ करने पड़े। १९६१ में कराची स्टेडियम में ५८,००० की भीड़ जमा हो गई, जिनमें से ज़्यादातर महिलाएँ थीं, केवल तलत साहब को सुनने के लिए। ई.एम.आई कराची ने तलत साहब को सम्मान स्वरूप एक सिल्वर डिस्क भेंट की, और इस तरह से तलत साहब भारत के पहले डिस्क पाने वाले गायक बनें। १९६८ में तलत साहब की वेस्ट इंडीज़ के त्रिनिदाद में ज़बरदस्त स्वागत हुआ उनके कॊन्सर्ट तो बाद की बात थी, उनके स्वागत में एयरपोर्ट पर ही हज़ारों की भीड़ जमा हो गई थी। तलत फ़ैन कल्ब की बैज लगाए हुए लोग सड़क के दोनों तरफ़ कतार में खड़े हो गए थे एयरपोर्ट से लेकर शहर तक। एक खुली लिमोसीन गाड़ी ने तलत को एयरपोर्ट से होटल तक पहुँचाया और तलत साहब गाड़ी से अपने चाहनेवालों के लिए हाथ हिला रहे थे। स्थानीय समाचार पत्रों ने तलत साहब के कॊन्सर्ट का मुख्य पृष्ठ पर जगह दी। उस देश में जहां बॊक्सिंग् बेहद लोकप्रिय खेल है, कभी बॊक्सिंग् को भी इस तरह का कवरेज नहीं मिला था। यहीं बात ख़तम नहीं हुई, वहाँ का बेहद पॊपुलर ग्रूप 'वेस्ट इंडीज़ स्टील बैण्ड' ने एक कैलीप्सो शैली का गीत बनाया "तलत महमूद वी आर प्राउड ऐण्ड ग्लैड, टू हैव अ पर्सोनलिटी लाइक यू हेयर इन त्रिनिदाद"। इस गीत को रेडियो पर बार बार बजाया गया, एयरपोर्ट पर बजाया गया, और सभी म्युज़िक दुकानों पर लगातार बजाया गया। दोस्तों, ये थी तलत साहब की विदेशों में लोकप्रियता की कुछ बातें। और आइए अब सुना जाए आज की ग़ज़ल, जिसके कुल तीन शेर इस प्रकार हैं।

देख ली तेरी ख़ुदाई बस मेरा दिल भर गया,
तेरी रहमत चुप रही मैं रोते रोते मर गया।

मेरे मालिक क्या कहूँ तेरी दुआओं का फ़रेब,
मुझ पे युं छाया कि मुझको घर से बेघर कर गया।

वो बहारें नाचती थी झूमती थी बदलियाँ,
अपनी क़िस्मत याद आते ही मेरा जी डर गया।



क्या आप जानते हैं...
कि तलत महमूद साहब के गीतों पर आधारित एक बैले (नृत्यनाटिका) की रचना की थी न्यु यॊर्क की The Joel Jay Fisher Ballet Company ने।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रहे आज के सवाल-

1. मतले में ये दो शब्द है - "सहारा" और "दर्द", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. फिल्म के निर्देशक ने ही इस गज़ल को लिखा है, उनका नाम बताएं - ३ अंक.
3. गज़ल के संगीतकार का नाम बताएं- २ अंक.
4. फिल्म के नाम में ३ अक्षर हैं जिसमें से एक है- "ख्वाब", फिल्म का नाम बताएं- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

विशेष सूचना - यदि आप ओल्ड इस गोल्ड में कोई विशेष गीत सुनना चाहते हैं या पेश करने के इच्छुक हैं, या कोई भी अन्य जानकारी हमारे साथ बांटना चाहते हैं तो हमें oig@hindyugm.com पर भी संपर्क कर सकते हैं

पिछली पहेली का परिणाम-
पाबला जी आने का शुक्रिया, प्रेम और आशीर्वाद बनाये रखियेगा, पर ये क्या आपके चक्कर में हमारी इंदु जी जवाब देते देते रह गयी खैर शरद जी ने तीन अंक कमाए, हमारे पास जो रिकॉर्डिंग हैं उसमें ये शेर पहला ही है, सुनकर देखिये, अवध जी आपका भी अनुमान एकदम सही है, बधाई...
खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Monday, February 22, 2010

ज़िंदगी किस मोड़ पर लाई मुझे...पूछते हैं तलत साहब नक्श की इस गज़ल में

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 353/2010/53

ह है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' की महफ़िल और आप इन दिनों इस पर सुन रहे हैं तलत महमूद साहब पर केन्द्रित शृंखला 'दस महकती ग़ज़लें और एक मख़मली आवाज़'। तलत साहब की गाई ग़ज़लों के अलावा इसमें हम आपको उनके जीवन से जुड़ी बातें भी बता रहे हैं। कल हमने आपको उनके शुरुआती दिनों का हाल बताया था, आइए आज उनके शब्दों में जानें कि कैसा था उनका पहला पहला अनुभव बतौर अभिनेता। ये उन्होने विविध भारती के 'जयमाला' कार्यक्रम में कहे थे। "कानन देवी, एक और महान फ़नकार। उनके साथ मैंने न्यु थिएटर्स की फ़िल्म 'राजलक्ष्मी' में एक छोटा सा रोल किया थ। उस फ़िल्म में एक रोल था जिसमें उस चरित्र को एक गाना भी गाना था। निर्देशक साहब ने कहा कि आप तो गाते हैं, आप ही यह रोल कर लीजिये। मं अगले दिन ख़ूब शेव करके, दाढ़ी बनाकर सेट पर पहुँच, और तब मुझे पता चला कि दरसल रोल साधू का है। मेक-अप मैन आकर मेरा पूरा चेहरा सफ़ेद दाढ़ी से ढक दिया। जब गोंद सूखने लगा तो चेहरा इतना खिंचने लगा कि मुझसे मुंह भी खोला नहीं जा रहा था। निर्देशक साहब ने कहा कि ज़रा मुंह खोल कर तो गाओ! मुझे उन पर बड़ा ग़ुस्सा आया और दिल किया कि दाढ़ी उतार कर फेंक दूँ। तभी वहाँ आ पहुँची कानन देवी और मैं अपने आप को संभाल लिया।" दोस्तों, थी यह एक मज़ेदार क़िस्सा। 'राजलक्ष्मी' तलत महमूद साहब की पहली फ़िल्म थी बतौर अभिनेता और गायक। साल था १९४५। इसके बाद उन्होने १२ और फ़िल्मों में अभिनय किया जिनकी फ़ेहरिस्त इस प्रकार है - तुम और मैं ('४७), समाप्ति ('४९), आराम ('५१), दिल-ए-नादान ('५३), डाक बाबू ('५४), वारिस ('५४), रफ़्तार ('५५), दिवाली की रात ('५६), एक गाँव की कहानी ('५७), लाला रुख़ ('५८), मालिक ('५८) और सोने की चिड़िया ('५८)। आज के अंक के लिए हमने जिस ग़ज़ल को चुना है वह है १९५६ की फ़िल्म 'दिवाली की रात' का। "ज़िंदगी किस मोड़ पर लाई मुझे, हर ख़ुशी रोती नज़र आई मुझे"। नक्श ल्यालपुरी का क़लाम और मौसिक़ी कमचर्चित संगीतकार स्नेहल भाटकर की।

'दिवाली की रात' फ़िल्म में तलत महमूद साहब के साथ पर्दे पर नज़र आईं रूपमाला और शशिकला। फ़िल्म के निर्मता थे विशनदास सप्रू और राम रसीला, तथा निर्देशक थे दीपक आशा। प्रस्तुत ग़ज़ल के शायर नक्श ल्यायलपुरी के अलावा इस फ़िल्म के गानें लिखे मधुकर राजस्थानी ने। आपको यहाँ बताना चाहेंगे कि नक्श साहब ने फ़िल्मी दुनिया में बतौर गीतकार क़दम रखा था सन् १९५२ में जगदीश सेठी की फ़िल्म 'जग्गू' में, जिसमें उन्होने एक कैबरे गीत लिखा था। जसवंत राय के नाम से पंजाब के ल्यायलपुर में जन्मे नक्श साहब अपने स्कूली दिनों से ही लिखने में प्रतिभा रखते थे। उनके उर्दू टीचर परीक्षाओं के बाद उनकी कॊपियाँ अपने पास रख लेते थे, नोट्स के लिए नहीं बल्कि उन शेरों और कविताओं के लिए जो आख़िरी पन्नों पर वो लिखा करते थे। नक्श साहब की यह प्रतिभा परवान चढ़ती गई और वो स्कूल से कॊलेज में दाख़िल हुए। देश के बंटवारे के बाद वो अपने परिवार के साथ लखनऊ आ गए, लेकिन उनकी सृजनात्मक पिपासा और उनकी बेरोज़गारी ने उन्हे लखनऊ छोड़ बम्बई चले जाने पर मजबूर किया। उस समय उनकी आयु १९ वर्ष की थी और साल था १९५१। बम्बई के वो शुरुआती बहुत सुखद नहीं थे। लेकिन उन्हे कुछ राहत मिली जब डाक-तार विभाग में उन्हे एक नौकरी मिल गई। लेकिन उनके जैसे प्रतिभाशाली इंसान की वह जगह नहीं थी। बहरहाल वहाँ पर उन्होने कुच दोस्त बनाए और उन्ही दोस्तों के आग्रह पर उन्होने एक नाटक लिखा 'तड़प', जो उनके लिए फ़िल्म जगत में दाख़िले के लिए मददगार साबित हुआ। राम मोहन, जो उस नाटक के नायक थे और फ़िल्मकार जगदीश सेठी के सहायक भी, नक्श साहब को सेठी साहब के पास ले गए, और इस तरह से उन्हे फ़िल्म 'जग्गू' में गीत लिखने का मौका मिला और हिंदी फ़िल्म जगत में उनकी एंट्री हो गई। नक्श साहब की बातें आगे भी जारी रहेंगे, फ़िल्हाल सुना जाए तलत साहब की मख़मली आवाज़, लेकिन उससे पहले ये रहे इस ग़ज़ल के चार शेर।

ज़िंदगी किस मोड़ पर लाई मुझे,
हर ख़ुशी रोती नज़र आई मुझे।

जिनके दामन में सुहाने ख़्वाब थे,
फिर उन्ही रातों की याद आई मुझे।

हो गई वीरान महफ़िल प्यार की,
ये फ़िज़ा भी रास ना आई मुझे।

छीन कर मुझसे मेरे होश-ओ-हवास,
अब जहाँ कहता है सौदाई मुझे।



क्या आप जानते हैं...
तलत महमूद की फ़िल्म 'दिल-ए-नादान' के हीरोइन की तलाश के लिए ए. आर. कारदार ने 'ऒल इंडिया बिउटी कॊंटेस्ट' का आयोजन किया जिसे प्रायोजित किया उस ज़माने की मशहूर टूथपेस्ट कंपनी 'कोलीनोस' ने। इस कॊंटेस्ट की विजेयता बनीं पीस कंवल (Peace Kanwal), जो नज़र आए तलत साहब के साथ 'दिल-ए-नादान' में।

चलिए अब बूझिये ये पहेली, और हमें बताईये कि कौन सा है ओल्ड इस गोल्ड का अगला गीत. हम आपसे पूछेंगें ४ सवाल जिनमें कहीं कुछ ऐसे सूत्र भी होंगें जिनसे आप उस गीत तक पहुँच सकते हैं. हर सही जवाब के आपको कितने अंक मिलेंगें तो सवाल के आगे लिखा होगा. मगर याद रखिये एक व्यक्ति केवल एक ही सवाल का जवाब दे सकता है, यदि आपने एक से अधिक जवाब दिए तो आपको कोई अंक नहीं मिलेगा. तो लीजिए ये रही आज की पंक्तियाँ-

1. तलत की गाई इस ग़ज़ल के मतले में शब्द है- "नवाज़िश", बताईये ग़ज़ल के बोल.-३ अंक.
2. कौन हैं इस गज़ल के शायर- २ अंक.
3. नानुभाई वकील निर्देशित इस फिल्म के संगीतकार का नाम बताएं जो बेहद कमचर्चित ही रहे- २ अंक.
4. एक और मकबूल संगीतकार का भी नाम जुड़ा है इस गीत के साथ उनका भी नाम बताएं- सही जवाब के मिलेंगें २ अंक.

पिछली पहेली का परिणाम-
इंदु जी, आप बड़ी हैं, कुछ विपक्ष में कहने की हिम्मत नहीं होती, इसलिए अपनी जान बचने की खातिर हम ये इलज़ाम शरद जी के सर डाल देते हैं, दरअसल उनका सुझाव था और इससे हमें भी इत्तेफाक है कि यदि सारे जवाब आ जाते हैं तो बाकी श्रोता मूक दर्शक बने रहते हैं, और हमारा उद्देश्य सबकी भागीदारी है, वैसे कल के सवाल का कोई सही जवाब नहीं आया. अवध जी बहुत दिनों में आये और जवाब दिए बिना चले गए. :), खैर आज सही

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी
पहेली रचना -सजीव सारथी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, December 18, 2009

मोहब्बत तर्क की मैने...तलत की कांपती आवाज़ का जादू

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 294

ज पराग सांकला जी की पसंद पर बारी है तलत महमूद साहब के मख़मली आवाज़ की। १९५१ में 'आराम' और 'तराना' जैसी हिट म्युज़िकल फ़िल्में देने के बाद अनिल बिस्वास के संगीत में १९५२ में प्रदर्शित हुए दो फ़िल्में - 'आकाश' और 'दोराहा'। हालाँकि ये दोनों फ़िल्में ही बॊक्स ऒफ़िस पर असफल रही, लेकिन इनके गीतों को, ख़ास कर फ़िल्म 'दोराहा' के गीतों को लोगों ने पसंद किया। दिलीप कुमार के बाद 'दोराहा' में अनिल दा ने तलत साहब की मख़मली अंदाज़ का इस्तेमाल किया अभिनेता शेखर के लिए। दिल को छू लेनेवाली और पैथोस वाले गानें जैसे कि "दिल में बसा के मीत बना के भूल ना जाना प्रीत पुरानी", "तेरा ख़याल दिल से मिटाया नहीं कभी, बेदर्द मैने तुझको भुलाया नही अभी", और "मोहब्बत तर्क की मैने गरेबाँ चीर लिया मैने, ज़माने अब तो ख़ुश हो ज़हर ये भी पी लिया मैने" इस फ़िल्म के सुपरहिट गानें रहे हैं। दोस्तों, आज है इसी तीसरे गीत की बारी। अनिल दा फ़िल्मों के लिए हल्के फुल्के अदाज़ में ग़ज़लें बनाने के लिए जाने जाते थे जिन्हे आम जनता आसानी से गुनगुना सके। इस फ़िल्म के गानें उनके इसी खासियत को उजागर करते हैं। शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी ने ये ख़ूबसूरत बोल लिखे हैं। युं तो सचिन देव बर्मन के संगीत में साहिर साहब के पहले पहले गानें फ़िल्म 'नौजवान' और 'बाज़ी' जैसी फ़िल्मों में सुने गए थे सन् १९५१ मे। लेकिन साहिर साहब ने पहली दफ़ा अनिल दा के साथ ही काम किया था सन् १९५० में इसी 'दोराहा' फ़िल्म में। लेकिन फ़िल्म बनते बनते दो साल निकल गए और १९५२ में जाकर यह फ़िल्म और इसके गानें प्रदर्शित हुए।

आज जब एक साथ अनिल दा और तलत महमूद साहब की बात चली है तो आपको यह याद दिला दें, हालाँकि आपको मालूम ही होगा, कि तलत साहब को पहली बार किसी फ़िल्म में गवाने का श्रेय अनिल दा को ही जाता है। फ़िल्म 'आरज़ू' में "ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल" गीत गा कर ही तलत साहब रातों रात मशहूर हो गए थे। तलत साहब जब बम्बई में जमने लगे थे तब एक अफ़वाह फ़ैल गई कि वो गाते वक़्त नर्वस हो जाते हैं। उनके गले की लर्जिश को नर्वसनेस का नाम दिया गया, जिससे उनके करीयर पर विपरीत असर होने लगा था। तब अनिल बिस्वास ने यह बताया कि उनके गले की यह कंपन ही उनकी आवाज़ की खासियत है। जब अनिल दा के पास तलत गाना रिकार्ड करने पहुँचे तो जान बूझ कर उन्होने बिना कंपन के गाना गाया। इससे अनिल दा बहुत नाराज़ हुए और कहा कि उनकी उस कंपन के लिए ही वो उनसे वह गाना गवाना चाहते हैं और उनको उनके गले की वही लर्जिश चाहिए। इससे तलत साहब का हौसला बढ़ा और एक के बाद एक बेहतरीन गीत गाते चले गए, और यह फ़ेहरिस्त लम्बी, और लम्बी होती चली गई। दोस्तों, आज हम उस फ़ेहरिस्त पर नहीं जाएँगे, बल्कि अब जल्दी से आपको सुनवा रहे हैं फ़िल्म 'दोराहा' में तलत साहब की मख़मली आवाज़।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा अगला (अब तक के चार गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी (दो बार), स्वप्न मंजूषा जी, पूर्वी एस जी और पराग सांकला जी)"गेस्ट होस्ट".अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. शकील नौशाद की जोड़ी का है ये नग्मा जिसे चुना है पराग जी ने.
२. इसी फिल्म में लता और शमशाद का गाया एक मशहूर युगल गीत भी था.
३. मुखड़ा शुरू होता है इस शब्द से -"नज़र".

पिछली पहेली का परिणाम -
इंदु जी एक कदम और मंजिल की तरफ आपका...बधाई

खोज व आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Thursday, September 3, 2009

दो दिल धड़क रहें हैं और आवाज़ एक है....आशा और तलत ने आवाज़ मिलाई आवाज़ से

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 191

गायक मुकेश के बाद आज से हम फ़िल्म संगीत की आकाश के उस सितारे पर एक लघु शृंखला शुरु करने जा रहे हैं जिनकी आवाज़ का जादू हर उम्र के सुनने वालों पर गहराई से हुआ है। दिल की गहराई में आसानी से उतर जाने वाली, हर भाव, हर रंग को उजागर करने वाली ये आवाज़ है फ़िल्म जगत के सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका आशा भोंसले की। आशा भोंसले की आवाज़ की अगर हम तारीफ़ करें तो शायद शब्द भी फीके पड़ जाये उनकी आवाज़ की चमक के सामने। और यह चमक दिन ब दिन बढ़ती चली गयी है अलग अलग रंग बदल कर, ठीक वैसे जैसे कोई चित्रकार अलग अलग रंगों से अपने चित्र को सुंदरता प्रदान करता चला जा रहा हो! ८ सितंबर को आशा जी का जनम दिन है। इसी को केन्द्र करते हुए आज से अगले १० दिनों तक 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर सुनिए आशा जी के गाए युगल गीतों की एक ख़ास लघु शृंखला '१० गायक और एक आपकी आशा'। इसके तहत हम आप को आशा जी के गाए फ़िल्म संगीत के सुनहरे युग के १० युगल गीत सुनवाएँगे, १० अलग अलग गायकों के साथ गाए हुए। इसमें हम गायिकाओं को शामिल नहीं कर रहे हैं। 'फ़ीमेल डुएट्स' पर हम भविष्य में एक अलग से शृंखला का आयोजन ज़रूर करेंगे। तो दोस्तों, '१० गायक और एक आपकी आशा' की इस पहली कड़ी में हम ने आशा जी के साथ जिस गायक को चुना है, वो हैं मखमली आवाज़ वाले, हर दिल अज़िज़, अपने तलत महमूद साहब। युं तो आशा जी और तलत साहब ने बहुत से युगल गीत गाए हैं, जिनमें से कुछ जाने कुछ अंजाने रह गये हैं, लेकिन सब से पहले जो दो चार गीत झट से ज़हन में आते हैं, वो हैं फ़िल्म 'सोने की चिड़िया' के "प्यार पर बस तो नहीं है" और "सच बता तू मुझपे फ़िदा", फ़िल्म 'बड़ा भाई' का "चोरी चोरी दिल का लगाना बुरी बात है", फ़िल्म 'अपसरा' का "है ज़िंदगी कितनी हसीन", फ़िल्म '२४ घंटे' का "हम हाल-ए-दिल तुम से कहना है, कहिए", फ़िल्म 'लैला मजनू' का "बहारों की दुनिया पुकारे तू आजा", फ़िल्म 'लाला रुख़' का "प्यास कुछ और भी भड़का दे झलक दिखला के", फ़िल्म 'मेम साहिब' का "कहता है दिल तुम हो मेरे लिए", फ़िल्म 'बहाना' का "तेरी निगाहों में तेरी ही बाहों में रहने को जी चाहता है", फ़िल्म 'एक साल पहले' का "नज़र उठा के ये रंगीं समा रहे न रहे", इत्यादि। आशा जी और तलत साहब के गाए ऐसे तमाम सुमधुर युगल गीतों के समुंदर में से आज हम ने जिस लोकप्रिय गीत को चुना है, वह है फ़िल्म 'इंसाफ़' का, "दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है"।

फ़िल्म 'इंसाफ़' बनी थी सन् १९५६ में केदार कपूर के निर्देशन में। रावजी यु. पटेल निर्मित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे अजीत और नलिनी जयवंत। फ़िल्म में संगीत का बीड़ा उठाया चित्रगुप्त ने और गीत लिखे असद भोपाली साहब ने। युं तो उस साल, यानी कि १९५६ में, चित्रगुप्त के संगीत निर्देशन में कई फ़िल्में प्रदर्शित हुईं जैसे कि 'बसंत पंचमी', 'बसरे की हूर', 'जयश्री', 'क़िस्मत', 'तलवार की धनी', और 'ज़िंदगी के मेले', लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म नहीं चली, और ना ही उनका संगीत। अगर कुछ चला तो सिर्फ़ फ़िल्म 'इंसाफ़' का प्रस्तुत गीत, जो आज एक सदाबहार नग़मा बन कर रह गया है। बड़ा ही नाज़ुक गाना है यह, जिसमें असद भोपाली ने मोहब्बत के अहसासों को कुछ इस क़दर शब्दों में पिरोया है कि सुन कर दिल ख़ुश हो जाता है। "रंगीन हर अदा है, बेचैन हर नज़र है, एक दर्द सा इधर है, एक दर्द सा उधर है, दोनों की बेक़रारी का अंदाज़ एक है, नग़में जुदा जुदा है मगर साज़ एक है"। इस गीत के रीदम में चित्रगुप्त जी ने 'वाल्ट्ज़' का प्रयोग किया है। अगर आप 'वाल्ट्ज़' की जानकारी रखते हैं तो आप इसे इस गीत में महसूस कर सकते हैं। और अगर आप को इसका पता नहीं है तो कृपया इन गीतों के रीदम को ज़हन में लाने की कोशिश कीजिए, आप ख़ुद ब ख़ुद महसूस कर लेंगे 'वाल्ट्ज़' के रीदम को। नौशाद साहब ने 'वाल्ट्ज़' को हिंदी फ़िल्मी गीतों में लोकप्रिय बनाया था, इसलिए उन्ही के बनाये कुछ ऐसे गीतों की याद आप को दिलाते हैं, फ़िल्म 'दास्तान' का "त र री त र री....ये सावन रुत तुम और हम", फ़िल्म 'अंदाज़' का "तोड़ दिया दिल मेरा", फ़िल्म 'मेला' का "धरती को आकाश पुकारे", वगेरह। ग़ुलाम मोहम्मद के संगीत में फ़िल्म 'लैला मजनू' का गीत "चल दिया कारवाँ" भी 'वाल्ट्ज़' पर ही आधारित है। और सज्जाद साहब के स्वरबद्ध फ़िल्म 'संगदिल' का गीत "दिल में समा गए सजन, फूल खिले चमन चमन" तथा फ़िल्म 'दोस्त' का "बदनाम मोहब्बत कौन करे" में भी वाल्ट्ज़ का सुंदर प्रयोग सुनने को मिलता है। तो दोस्तों, आज हमने आप को 'वाल्ट्ज़' की थोड़ी बहुत जानकारी दी, आइए अब सुनते हैं आज का यह प्रस्तुत गीत आशा भोसले और तलत महमूद की आवाज़ में।



गीत के बोल -

आशा : आ आ... हं हं... आ आ...
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2
तलत : नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दोनों : दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2

तलत: रँगीन हर अदा है, बेचैन हर नज़र है \-2
आशा: इक दर्द सा इधर, इक दर्द सा उधर है
तलत: दोनों की बेक़रारी का अंदाज़ एक है \-2
तलत-आशा: नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है

आशा: तड़पाइये न हमको, शर्माइये न हमसे \-2
तलत: दोनों की ज़िंदगी है एक दूसरे के दम से \-2
आशा: हम दो कहानियाँ हैं मगर राज़ एक है \-2
तलत-आशा: नग़मे जुदा\-जुदा हैं मगर साज़ एक है
दो दिल धड़क रहे हैं और आवाज़ एक है \-2


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. ये है आशा का गाया एक और दोगाना.
२. साथी गायक हैं "हेमंत कुमार".
३. गीतकार हैं एस एच बिहारी और गीत में "बादलों" के आगे जाने की बात की है.

आज की पहेली के साथ जीतिए १० बोनस अंक
आप के हिसाब से हम और किन ८ गायकों को इस शृंखला में शामिल करने जा रहे हैं। अगर आप ने अगले २० घंटे के भीतर बिल्कुल सही जवाब दे दिया तो आप को मिलेंगे बोनस १० अंक, जो आप को आप के ५० अंक तक जल्द से जल्द पहुँचने में बेहद मददगार साबित होंगे। तो यह सुनहरा मौका है आप सभी के लिए और जो श्रोता 'पहेली प्रतियोगिता' पहले से ही जीत चुके हैं, उन्हे भी हम यह मौका दे रहे हैं कि आप भी इस विशेष बोनस सवाल का जवाब दे सकते हैं, आप के अंक सुरक्षित रहेंगे भविष्य के लिए। तो झट से याद कीजिए सुनहरे दौर के गायकों के नाम, जिनके साथ आशा जी ने गीत गाए हैं और आप को लगता है कि हम उन्ही गायकों को शामिल करने वाले हैं। आज आप तलत महमूद को सुन रहे हैं और कल हेमंत कुमार को सुनेंगे। तो फिर आपने बताने हैं कि बाक़ी के ८ गायकों के नाम कौन कौन से हैं?

पिछली पहेली का परिणाम -
पूर्वी जी बधाई २० अंकों के साथ अब आप पराग जी के बराबर आ चुकी हैं...सभी साथियों का आभार

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Friday, July 17, 2009

प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूँ या न करूँ...

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 144

जरूह सुल्तानपुरी, क़मर जलालाबादी, प्रेम धवन आदि गीतकारों के साथ काम करने के बाद सन् १९५८ में संगीतकार ओ. पी. नय्यर को पहली बार मौका मिला शायर साहिर लुधियानवी के लिखे गीतों को स्वर्बद्ध करने का। फ़िल्म थी 'सोने की चिड़िया'। इस्मत चुगतई की लिखी कहानी पर आधारित फ़िल्म कार्पोरेशन ऒफ़ इंडिया के बैनर तले बनी इस फ़िल्म का निर्देशन किया था शाहीद लतीफ़ ने, और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे बलराज साहनी, नूतन और तलत महमूद। जी हाँ दोस्तों, यह उन गिनी चुनी फ़िल्मों में से एक है जिनमें तलत महमूद ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म में तलत साहब और आशा भोंसले के गाये कम से कम दो ऐसे युगल गीत हैं जिन्हे अपार सफलता हासिल हुई। इनमें से एक तो था "सच बता तू मुझपे फ़िदा कब हुआ और कैसे हुआ", और दूसरा गाना था "प्यार पर बस तो नहीं है मेरा लेकिन फिर भी, तू बता दे कि तुझे प्यार करूँ या न करूँ"। और यही दूसरा गीत आज के इस महफ़िल की शान बना है। साहिर साहब के क़लम से निकला हुआ, और प्रेमिका से प्यार करने की इजाज़त माँगता हुआ यह नग़मा प्रेम निवेदन की एक अनूठी मिसाल है। इस भाव पर बहुत सारे गानें बनें हैं, लेकिन इस गीत के बोल हर एक को पीछे छोड़ देते है शब्दों और भाषा की उत्कृष्टता में।

बरसों पहले फ़ौजी भा‍इयों से विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में मुख़ातिब तलत महमूद ने इस गीत के बारे में कहा था - "मैं और कुछ चुनिंदा कलाकार एक बार सिक्किम गये हुए थे आप फ़ौजी भा‍इयों का मनोरंजन करने। तब मुझे समझ में आया कि आप लोग मुझे और मेरे गाये गीतों को कितना पसंद करते हैं। जब भी मैं आप लोगों के लिए प्रोग्राम पेश करता हूँ तो एक गीत की फ़रमाइश अक्सर आती है, और वह गीत है फ़िल्म 'सोने की चिड़िया' का, जिसमें मैं 'हीरो' था और इस गीत में मैं और 'हीरोइन' एक कश्ती पे सवार हो कर गाते हैं।" दोस्तों, एक और अंश 'दस्तान-ए-नय्यर' से हो जाये! नय्यर साहब बता रहे हैं - "तलत साहब की एक तसवीर थी ('सोने की चिड़िया'), फ़िल्म 'बाज़' में वो गाना गाये, "एक हसरत की तसवीर हूँ मैं, जो बन बन के बिगड़े वह तक़दीर हूँ मैं", उसके बाद 'सोने की चिड़िया' में वो एक 'साइड हीरो' के रोल में आये। वो दो गानें मेरे पास गाये - "प्यार पर बस..." और "सच बता..."। वेल्वेट वायस और बहुत शरीफ़ आदमी, वो भी शरीफ़ आदमी कम बात करने वाले, काम से काम रखते थे!" जब नय्यर साहब से अहमद वसी साहब ने सवाल किया कि "क्या आप को कोई दुशवारी नहीं लगी क्यूंकि तलत साहब की गायकी बिल्कुल अलग थी, उनकी गायकी ग़ज़ल से बहुत क़रीब थी?", तो नय्यर साहब का सीधा और बेझिझक जवाब था - "नहीं, गायकी कोई चीज़ नहीं होती है, यह होगी क्लासिकल सिंगर्स की बनायी हुई, 'फ़िल्म लाइन' में कोई गायकी नहीं है, गायकी तो हम बनाते हैं लोगों की। अब रफ़ी साहब की आवाज़ को कितना तंग और दबाके इस्तेमाल किया गया है, यह तो काम्पोसर पे बहुत डिपेंड करता है कि किस गायक से कैसे काम लेना है"। तो दोस्तों, बातें बहुत सी हो गयी, अब बारी गीत सुनने की।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. जब भी सबसे खूबसूरत दोगानों की बात होगी इस गीत का अवश्य जिक्र आएगा.
2. अनंत ठाकुर के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सदाबहार हिट नायक और नायिका की जोड़ी थी.
3. मुखड़े में शब्द है -"मधुर".

पिछली पहेली का परिणाम -
शरद जी बहुत बहुत बधाई. ओल्ड इस गोल्ड पहेली के सबसे पहले विजेता हैं आप. जल्द ही आपकी पसंद गीत शामिल होने इस कारवाँ में. पूरा ओल्ड इस गोल्ड परिवार जोरदार तालियों से कर रहा है आज अपने इस पहले विजेता की ताजपोशी, अदा जी देखते हैं अब आपको कौन टक्कर देगा, अभी तक तो आप पराग जी से बहुत आगे हैं, पर फिर भी मुकाबला कड़ा होगा ऐसी उम्मीद है. दिशा जी अगर थोडा समय से (अमूमन ६.३० बजे शाम भारतीय समय अनुसार) यदि आ पायें तो सब पर भारी पड़ सकती हैं. मनु जी पीछे रह जाते हैं, वैसे रचना जी, दिलीप जी, और कभी कभी सुमित जी भी अपना जलवा दिखा ही देते हैं. खैर अगला विजेता कोई भी हो, पर फिलहाल तो रंग जमा रखा है शरद तैलंग जी ने. शरद जी ओल्ड इस गोल्ड से युहीं जुड़े रहिये, यदि बाकी सब जवाब देने में असमर्थ रहे तो आपको ही जवाब देना पड़ेगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ