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Saturday, November 8, 2014

इसकी टोपी उसके सर - प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता बता रहे हैं पुराने ज़माने के कुछ इन्स्पायर्ड गीतों के बारे में




स्मृतियों के स्वर - 12

प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता बता रहे हैं पुराने ज़माने के कुछ इन्स्पायर्ड गीतों के बारे में

इसकी टोपी उसके सर





'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार। दोस्तों, एक ज़माना था जब घर बैठे प्राप्त होने वाले मनोरंजन का एकमात्र साधन रेडियो हुआ करता था। गीत-संगीत सुनने के साथ-साथ बहुत से कार्यक्रम ऐसे हुआ करते थे जिनमें कलाकारों से साक्षात्कार करवाये जाते थे और जिनके ज़रिये फ़िल्म और संगीत जगत के इन हस्तियों की ज़िन्दगी से जुड़ी बहुत सी बातें जानने को मिलती थी। गुज़रे ज़माने के इन अमर फ़नकारों की आवाज़ें आज केवल आकाशवाणी और दूरदर्शन के संग्रहालय में ही सुरक्षित हैं। मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि शौकिया तौर पर मैंने पिछले बीस वर्षों में बहुत से ऐसे कार्यक्रमों को लिपिबद्ध कर अपने पास एक ख़ज़ाने के रूप में समेट रखा है। 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' पर, महीने के हर दूसरे और चौथे शनिवार को इसी ख़ज़ाने में से मैं निकाल लाता हूँ कुछ अनमोल मोतियाँ हमारे इस स्तम्भ में, जिसका शीर्षक है - स्मृतियों के स्वर। इस स्तम्भ के अन्तर्गत हम और आप साथ मिल कर गुज़रते हैं स्मृतियों के इन हसीन गलियारों से। आज हम आपकी मुलाक़ात करवा रहे हैं प्रसिद्ध ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड कलेक्टर वी. एस. दत्ता से। दत्ता साहब बता रहे हैं गुज़रे ज़माने के कुछ ऐसे मशहूर गीतों के बारे में जो प्रेरित थे अन्य फ़िल्मी गीतों से ही। यानी कि इसकी टोपी उसके सर। आनन्द लीजिये, ऐसे गीतों के साथ।





सूत्र: जुबिली झंकार, विविध भारती, 3 सितंबर 2008


1. "लेके पहला पहला प्यार, भरके आँखों में ख़ुमार..." (सी.आई.डी. 1956)

देखिये, यह तो नौशाद साहब ने आपको 'विविध भारती' में ही बताया था कि वो जो गाना है "जादू नगरी से आया है कोई जादूगर", उसकी ट्यून मेरे गीत से नकल की हुई है। वह जो एक उनकी फ़िल्म आयी थी 'नमस्ते', शायद 1943 में, उसमें एक गाना था "दिल ना लगे मोरा, जिया ना लगे, मन ना लगे, नेक-टाई वाले बाबू को बुलाते कोई रे..."। इस गीत की धुन हू-ब-हू "जादू नगरी से आया है कोई जादूगर" जैसा है। तो यह 'नमस्ते' फ़िल्म आई थी 1942-43 में, और 'CID' आयी थी 1956 में, यानी इसके 13 साल बाद। तो नय्यर साहब ने नौशाद की धुन को उठा लिया। लीजिए, पहले आप फिल्म सी. आई. डी. का और फिर फिल्म 'नमस्ते' का गाना सुनिए। 


फिल्म - सी. आई. डी. : 'लेके पहला पहला प्यार भरके आँखों में खुमार...' : शमशाद बेगम और मोहम्मद रफी : संगीत - ओ. पी. नैयर




फिल्म - नमस्ते : 'दिल न लगे मोरा जिया न लगे...' : संगीत - नौशाद : गीत - दीनानाथ मधोक




2. "आये भी अकेला जाये भी अकेला" (दोस्त, 1954)

तलत महमूद साहब का फ़िल्म 'दोस्त' का गीत "आये भी अकेला जाये भी अकेला, दो दिन की ज़िन्दगी है दो दिन का मेला" एक बहुत मशहूर गीत है, आपने सुना होगा। हंसराज बहल का संगीत था। इसका जो है पंजाबी फ़िल्म 'लच्छी' (1949) से लिफ़्ट किया गया था। सिर्फ़ धुन ही नहीं बल्कि बोल भी। और 'लच्छी' में जो है इसको मोहम्मद रफ़ी साहब ने गाया था, और बेहतरीन गाना था, "जगवाला मेला यारों थोड़ी देर दा, हँस दे या रात लंगी पता नहीं सवेर दा..."। यह गाना पीछे रह गया और वह गाना आगे निकल गया। यह संगीतकार शार्दूल क्वात्रा के करीयर का शुरुआती गीत था; उस समय वो हंसराज बहल साहब के सहायक हुआ करते थे। मतलब बहल साहब ने अपने सहायक की धुन को बाद में इस्तेमाल किया अपने गीत में। कहा जाता है कि एक बार हंसराज बहल बम्बई से बाहर गये थे, तब गीतकार नाज़िम पानीपती ने क्वात्रा को एक गीत की धुन बनाने को कहा, और तभी उन्होंने इस गीत की धुन बनाई थी। अब आप इन इन दोनों गीतों को सुनिए।


फिल्म - दोस्त : 'आए भी अकेला जाए भी अकेला...' : तलत महमूद : संगीत - हंसराज बहल




फिल्म - लच्छी (पंजाबी) : 'जगवाला मेला यारों थोड़ी देर दा...' : मोहम्मद रफी : संगीत शार्दूल क्वात्रा 


 
3. "ख़ुशी का ज़माना गया रोने से अब काम है" (छोटी भाभी, 1950)

इसी तरह से और भी गाने थे जो पंजाबी में थे। एक गाना था जिसे नूरजहाँ ने गाया था, "हूक मेरी क़िस्मत सो गई जागो हुज़ूर रे...", इसे फिर फ़िल्म 'छोटी भाभी' में हुस्नलाल-भगतराम ने लिफ़्ट किया और बना दिया "ख़ुशी का ज़माना गया रोने से अब काम है, प्यार इसका नाम था जुदाई इसका नाम है..." जिसे रफ़ी साहब और लता जी ने गाया। तो ऐसे लोग धुन एक दूसरे की लिफ़्ट करते आये हैं और यह परम्परा आज भी जारी है। नूरजहाँ का गाया गीत उपलब्ध नहीं पाया है, फ़िल्म 'छोटी भाभी' का गीत अब आप सुनें।


फिल्म - छोटी भाभी : 'खुशी का जमाना गया रोने से अब काम है...' : मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर : संगीत - हुस्नलाल भगतराम 



4. "तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा" (आख़िरी दाव, 1958)

आज इसको लेकर काफ़ी चर्चा होती है, कानून तक में जाने की भी बात भी होती रहती है, लेकिन उस वक़्त तो कितना अनायास होता था और इस बात को लेकर कोई किसी से कुछ कहता तक नहीं था। पर एक गाना था जिसके लिफ़्ट करने पर सज्जाद हुसैन काफ़ी बिगड गये थे मदन मोहन पर। तलत महमूद का जो गाना था ना "ये हवा ये रात ये चांदनी", फ़िल्म 'संगदिल' का, इसके आधार पर मदन मोहन साहब ने गाना बना दिया "तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा...", इसमें क्या हुआ कि सज्जाद साहब जिन्होंने "ये हवा ये रात" बनाया था, वो बिगड़ गये थे मदन मोहन पे, "तुमने कैसे मेरे गाने से लिफ़्ट किया?" मदन मोहन ने कहा कि हुज़ूर, मैंने सोचा कि उसी धुन को थोड़ा सा बदलकर देखें तो कैसा लगेगा। पर उसके बाद मदन मोहन ने कहा कि मैंने ऐसी गुस्ताख़ी फिर कभी नहीं की।


फिल्म - आखिरी दाव : 'तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा...' मोहम्मद रफी : संगीत - मदन मोहन : गीत मजरूह सुल्तानपुरी




फिल्म - संगदिल : 'ये हवा ये रात ये चाँदनी...' : तलत महमूद : संगीत - सज्जाद हुसैन



5. "हमारी गली आना" (मेमसाहिब, 1956)

एक 'शुक्रिया' फ़िल्म आयी थी, जिसमें एक गाना था "हमारी गली आना अच्छा जी, हमें ना भुलाना अच्छा जी...", जिसे बाद में 'मेमसाहिब' फ़िल्म में तलत महमूद और आशा भोसले ने गाया। इसको 'मेमसाहिब' में बिल्कुल सेम टू सेम लिफ़्ट किया गया है संगीतकार मदन मोहन ने। लेकिन ऑरिजिनल 'शुक्रिया' फ़िल्म का गाना था, पुराना, 1944 की फ़िल्म, जिसमें रमोला हीरोइन थीं, पर वह वाला गाना हिट नहीं हो पाया। इसके संगीतकार थे जी. ए. चिश्ती। इन दोनों गीतों को आप सुनिए और अन्तर खोजिए।


फिल्म - मेमसाहिब : 'हमारी गली आना अच्छा जी...' : तलत महमूद और आशा भोसले : संगीत - मदन मोहन 




फिल्म - शुक्रिया : 'हमारी गली आना अच्छा जी...' : नसीम अख्तर और अमर : संगीत - जी.ए. चिश्ती 




कॉपीराइट: विविध भारती



तो दोस्तों, आज बस इतना ही। आशा है आपको यह प्रस्तुति पसन्द आयी होगी। अगली बार ऐसे ही किसी स्मृतियों की गलियारों से आपको लिए चलेंगे उस स्वर्णिम युग में। तब तक के लिए अपने इस दोस्त, सुजॉय चटर्जी को अनुमति दीजिये, नमस्कार! इस स्तम्भ के लिए आप अपने विचार और प्रतिक्रिया नीचे टिप्पणी में व्यक्त कर सकते हैं, हमें अत्यन्त ख़ुशी होगी।


प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 





Sunday, January 20, 2013

दिन के तीसरे प्रहर के कुछ मोहक राग



 

स्वरगोष्ठी-105 में आज
राग और प्रहर – 3

कृष्ण की बाँसुरी और राग वृन्दावनी सारंग 



‘स्वरगोष्ठी’ के 105वें अंक में, मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। इन दिनों आपके इस प्रिय स्तम्भ में लघु श्रृंखला ‘राग और प्रहर’ जारी है। गत सप्ताह हमने आपसे दिन के दूसरे प्रहर के कुछ रागों के बारे में चर्चा की थी। आज दिन के तीसरे प्रहर गाये-बजाये जाने वाले रागों पर चर्चा की बारी है। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न से लेकर अपराह्न लगभग तीन बजे तक की अवधि के बीच का माना जाता है। इस अवधि में सूर्य की सर्वाधिक ऊर्जा हमे मिलती है और इसी अवधि में मानव का तन-मन अतिरिक्त ऊर्जा संचय भी करता है। आज के अंक में हम आपके लिए तीसरे प्रहर के रागों में से वृन्दावनी सारंग, शुद्ध सारंग, मधुवन्ती और भीमपलासी रागों की कुछ रचनाएँ प्रस्तुत करेंगे।


सारंग अंग के रागों में वृन्दावनी सारंग और शुद्ध सारंग राग तीसरे प्रहर के प्रमुख राग माने जाते हैं। यह मान्यता है कि श्रीकृष्ण अपनी प्रिय बाँसुरी पर वृन्दावनी सारंग और मेघ राग की अवतारणा किया करते थे। सारंग का अर्थ होता है मयूर और कृष्ण द्वारा दिन के तीसरे प्रहर वृन्दावन के कुंजों में अपने सखाओं के संग इस राग की अवतारणा की परिकल्पना के कारण ही वृन्दावनी सारंग नाम प्रचलन में आया होगा। वर्तमान में राग वृन्दावनी सारंग काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। औड़व-औड़व जाति के इस राग के आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद, अर्थात दोनों निषाद का प्रयोग किया जाता है। इस राग में गान्धार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। शेष सभी स्वर शुद्ध प्रयोग किया जाता है। इसका वादी स्वर ऋषभ और संवादी स्वर पंचम होता है। सामान्य परिवेश में इस राग का गायन-वादन दिन के तीसरे प्रहर में ही किया जाता है, परन्तु ग्रीष्म ऋतु की चरम अवस्था और वर्षा ऋतु का आहट देने वाले कजरारे मेघों के एकत्रीकरण के परिवेश का सार्थक चित्रण करने में भी राग वृन्दावनी सारंग पूर्ण समर्थ होता है। अब हम आपको राग वृन्दावनी सारंग में निबद्ध एक मध्य-द्रुत तीनताल की रचना बाँसुरी पर सुनवाते हैं। वादक हैं आश्विन श्रीनिवासन्।

राग वृन्दावनी सारंग : बाँसुरी - मध्य-द्रुत तीनताल की रचना : आश्विन श्रीनिवासन् 


दिन के तीसरे प्रहर अर्थात मध्याह्न से लेकर अपराह्न तक की अवधि का एक और राग है, शुद्ध सारंग। आरोह में पाँच और अवरोह में छह स्वरों, अर्थात औड़व-षाडव जाति के इस राग के आरोह में गान्धार और धैवत स्वर तथा अवरोह में गान्धार स्वर का प्रयोग वर्जित है। साथ ही आरोह में तीव्र मध्यम स्वर तथा अवरोह में शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किया जाता है। इस राग को कुछ संगीतकार कल्याण थाट से तो कुछ बिलावल थाट के अन्तर्गत मानते हैं। आपको राग शुद्ध सारंग का एक मनमोहक उदाहरण सुनवाने के लिए एक बार फिर हमने बाँसुरी वाद्य का ही चयन किया है। विश्वविख्यात बाँसुरी-वादक पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया के प्रिय रागों में राग शुद्ध सारंग भी एक राग है। उन्हीं का बजाया राग शुद्ध सारंग का आकर्षक आलाप अब हम आपको सुनवाते हैं।

राग शुद्ध सारंग : बाँसुरी – आलाप : पण्डित हरिप्रसाद चौरसिया


दिन के तीसरे प्रहर में ही गाया-बजाया जाने वाला एक और मधुर राग है, मधुवन्ती। इस राग के बारे में यह तथ्य प्रचलित है कि मैहर घराने के सुप्रसिद्ध सरोद-वादक उस्ताद अली अकबर खाँ ने कर्नाटक पद्यति के 29वें मेलकर्ता राग धर्मावती के आरोह से ऋषभ और धैवत को हटा कर इस राग को स्वरूप दिया। स्वयं उस्ताद अली अकबर खाँ, पण्डित रविशंकर और इनके शिष्यों ने इस राग को प्रचारित-प्रसारित किया। औड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता। आरोह में कोमल गान्धार और तीव्र मध्यम तथा अवरोह में इन स्वरों के साथ शुद्ध धैवत और ऋषभ स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। अब हम आपको राग मधुवन्ती की एक मध्य लय की रचना सरोद पर ही सुनवाते है। वादक हैं, उस्ताद अली अकबर खाँ।

राग मधुवन्ती : सरोद – मध्यलय की गत : उस्ताद अली अकबर खाँ


तीसरे प्रहर में अधिकाधिक प्रयोग किया जाने वाला एक राग भीमपलासी है। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला भीमपलासी, औड़व-सम्पूर्ण जाति का राग होता है। इसमें गान्धार व निषाद कोमल तथा अन्य स्वर शुद्ध प्रयोग किये जाते हैं। इसके आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित होता है, किन्तु अवरोह में सभी सातों स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर तार सप्तक का षडज होता है। कुछ विद्वान वादी स्वर के रूप में मध्यम का प्रयोग भी करते हैं। आज के इस अंक में अब हम आपको राग भीमपलासी पर आधारित एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। 1966 में सुनील दत्त और साधना अभिनीत एक फिल्म ‘मेरा साया’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म के संगीत निर्देशक मदनमोहन ने राग भीमपलासी के सुरों में गीत- ‘नैनों में बदरा छाए...’ संगीतबद्ध किया था। गीतकार राजा मेंहदी अली खाँ के शब्दों को लता मंगेशकर के स्वरों का साथ मिला था। राग भीमपलासी पर आधारित इस फिल्मी गीत का आप रसास्वादन कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : फिल्म – मेरा साया : ‘नैनों में बदरा छाए...’ : लता मंगेशकर


आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 105वीं संगीत पहेली में हम आपको एक राग आधारित फिल्मी गीत का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 110वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 - संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – यह गीत किस ताल में निबद्ध है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 107वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ के 103वें अंक में हमने आपको 1991 में बनी फिल्म ‘लेकिन’ से राग गूजरी अथवा गूर्जरी तोड़ी पर आधारित एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग गूजरी या गूर्जरी तोड़ी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक हृदयनाथ और गायिका लता मंगेशकर। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र जबलपुर की क्षिति तिवारी ने ही दिया है। इन्हें पूरे दो अंक मिलते हैं। लखनऊ के प्रकाश गोविन्द ने दूसरे प्रश्न के आधे भाग का सही उत्तर दिया है, अतः इन्हें मिलते हैं .5 अंक। बैंगलुरु के पंकज मुकेश ने पहले प्रश्न का अधूरा उत्तर दिया है, अतः इन्हें मिलते हैं 1.5 अंक। जौनपुर के डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने राग को तो सही पहचाना किन्तु गायक-गायिका को नहीं पहचान सके, अतः इन्हें एक अंक से ही सन्तोष करना होगा। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ।

झरोखा अगले अंक का 

मित्रों, ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों ‘राग और प्रहर’ शीर्षक से लघु श्रृंखला जारी है। श्रृंखला के आगामी अंक में हम आपके लिए दिन के चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले कुछ आकर्षक रागों की प्रस्तुतियाँ लेकर उपस्थित होंगे। आप हमारे आगामी अंकों के लिए आठवें प्रहर तक के प्रचलित रागों और इन रागों में निबद्ध अपनी प्रिय रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों को पूरा सम्मान देंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9-30 ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सब संगीत-रसिकों की हम प्रतीक्षा करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  

Thursday, January 3, 2013

मैंने देखी पहली फिल्म प्रतियोगिता का परिणाम


भारतीय सिनेमा के सौ साल – 30

मैंने देखी पहली फ़िल्म : कृष्णमोहन मिश्र

बैंड वाले मेरे पसन्द के गीत की धुन नहीं बजाते थे


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान- ‘स्मृतियों के झरोखे से’ में आप सभी सिनेमा प्रेमियों का मैं सजीव सारथी नए वर्ष 2013 में हार्दिक स्वागत करता हूँ। गत जून मास के दूसरे गुरुवार से हमने आपके संस्मरणों पर आधारित प्रतियोगिता ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ का आयोजन किया था। इस स्तम्भ में हमने आपके प्रतियोगी संस्मरण और रेडियो प्लेबैक इण्डिया के संचालक मण्डल के सदस्यों के गैर-प्रतियोगी संस्मरण प्रस्तुत किये हैं। आज के इस समापन अंक में हम ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ संचालक मण्डल के सदस्य कृष्णमोहन मिश्र का गैर-प्रतियोगी संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं। कृष्णमोहन जी ने 1955 में मोतीलाल और निगार सुल्ताना अभिनीत फिल्म ‘मस्ताना’ देखी थी। इस फिल्म के गीतकार राजेन्द्र कृष्ण और संगीतकार मदनमोहन थे। इस संस्मरण के साथ-साथ हम आपके प्रतियोगी संस्मरणों के परिणामों की घोषणा भी करेंगे।


म्र के पहले दशक की किसी घटना या प्रसंग को आधी शताब्दी से भी अधिक समय बाद तक स्मृतियों में सुरक्षित रख पाना उतना कठिन नहीं, जितना पाँच-छः दशक बाद उन स्मृतियों को शब्दों में बाँधना। इस कार्य में हमारी कठिनाई इसलिए बढ़ जाती है कि हम बचपन की घटना को वयस्क मानसिकता से देखने लगते हैं। इस आलेख को तैयार करते समय मैं इसी कठिनाई से गुज़रा हूँ। दरअसल सात वर्ष की आयु में अपनी देखी हुई पहली फिल्म के कई प्रसंग और तत्कालीन परिवेश आज 64 वर्ष की आयु में भी मेरी स्मृतियों में काफी हद तक सुरक्षित है। वह फिल्म है- 1954 में प्रदर्शित ‘मस्ताना’, जिसमें मोतीलाल और निगार सुल्ताना की मुख्य भूमिकाएँ थी। यह फिल्म मैंने अपनी माँ, अपने छोटे भाई, मामा (अब तीनों स्वर्गीय) और मामी के साथ बनारस (अब वाराणसी) के कन्हैया चित्र मन्दिर नामक सिनेमाघर में देखी थी। अब तो नगर का सबसे खूबसूरत सिनेमाघर ही नहीं रहा। उसके स्थान पर व्यावसायिक केन्द्र बन चुका है। वह 1954 का दिसम्बर या 1955 का जनवरी मास के कड़ाके की ठण्डक वाला कोई दिन रहा होगा, क्योकि माँ ने गरम कपड़ों से मुझे पूरी तरह से ढक रखा था। वास्तव में यह मेरी देखी पहली फिल्म नहीं थी। माँ के अनुसार इससे पहले मैं हर हर महादेव, आनन्दमठ, आन, परिणीता आदि फिल्में माँ और मामा-मामी के साथ देख चुका था, किन्तु इनमें से किसी भी फिल्म का कोई प्रसंग मुझे याद नहीं रहा। हाँ, फिल्म ‘परिणीता’ के एक गीत- ‘चली राधे रानी अँखियों में पानी...’ की धुन (शब्द नहीं) लम्बे समय तक स्मृतियों में सुरक्षित रही। दरअसल मेरी माँ के अनुसार बचपन से ही मुझमें सबसे बड़ा गुण और पिताजी के अनुसार सबसे बड़ा दुर्गुण यह था की कोई गीत एक बार सुन लेने पर धुन तो लम्बे समय तक याद रहती थी किन्तु शब्द भूल जाता था। अपने इस गुण या दुर्गुण के कारण प्रायः मेरी स्थिति तब हास्यास्पद हो जाती थी, जब भूले हुए शब्दों के स्थान पर जोड़-तोड़ कर, अटपटे शब्दों को ठूँस कर गीत को पूर्ण कर देता था और गलियों में, घाट (गंगा के तट) पर और खेल के दौरान ज़ोर-ज़ोर से गाया करता था।

मैं जिस दौर की बात कर रहा हूँ, वह देश के स्वतंत्र होने के बाद का पहला दशक था। मेरे पिताजी स्वयं स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे और प्रभात-फेरियों में हमेशा मुझे अपने साथ ले जाते थे। परन्तु फिल्म देखना या फिल्मी गीत गुनगुनाना उन्हें बिलकुल पसन्द नहीं था। हाँ, फिल्मों के शौकीन मेरे मामा के आगे उनकी एक न चलती। उन दिनों असम में मेरे नाना का व्यवसाय हुआ करता था। साल में एक या दो बार छुट्टियाँ बिताने मामा-मामी बनारस आया करते थे और उनके आते ही मेरी माँ को फिल्में देखने की आज्ञा सहज ही मिल जाती थी। बचपन से लेकर किशोरावस्था तक मैंने जितनी भी फिल्में देखी वह सब मामा-मामी के सौजन्य से ही। सात वर्ष की आयु में जब मैंने फिल्म ‘मस्ताना’ देखी थी तब फिल्म संगीत सुनने के साधन बड़े सीमित थे। उन दिनों फिल्म संगीत का आनन्द लेने के लिए सर्वसुलभ साधन सिनेमाघर ही हुआ करता था। उच्च वर्ग के संगीत-प्रेमी परिवारों में ग्रामोफोन हुआ करता था, जिस पर 78RPM के रेकार्ड सुने जाते थे। मध्यम वर्ग के परिवार में रेडियो बड़ी मुश्किल से नज़र आता था। उन दिनों रेडियो के किसी भी भारतीय केन्द्र से फिल्मी गीतों का प्रसारण नहीं होता था। फिल्मी गीतों का प्रसारण केवल रेडियो सीलोन से ही होता था, जिसका सबसे लोकप्रिय साप्ताहिक कार्यक्रम हुआ करता था, ‘बिनाका गीतमाला’। मेरी स्मृतियों में मेरी देखी पहली फिल्म ‘मस्ताना’ का एक गीत भी 1955 के ‘बिनाका गीतमाला’ वार्षिक हिट गीतों में शामिल हुआ था। फिल्म ‘मस्ताना’ का यह गीत उन दिनों अत्यन्त लोकप्रिय हुआ था। तब फिल्मी गीतों की लोकप्रियता मापने का एक साधन यह भी था कि बारातों में बजने वाले बैंड पर उस गीत की धुन बजती है या नहीं। फिल्म देखने के बाद मेरे घर के सामने से जितनी भी बारातें गुजरती मेरे उत्सुकता यही होती थी कि मेरी देखी फिल्म ‘मस्ताना’ के गीत की धुन बजाई जा रही है या नहीं। इस फिल्म में मोहम्मद रफी का गाया और मदनमोहन का स्वरबद्ध किया गीत ‘मत भूल अरे इंसान...’ मेरा सर्वप्रिय गीत था। परन्तु बैंड वाले इस गीत के बजाय फिल्म का एक दूसरा गीत ‘झूम झूम के दो दीवाने गाते जाएँ गली गली...’ की धुन ही बजाते थे। बैंड वालों का यह अन्याय प्रायः मुझे झेलना पड़ता था। फिल्म ‘मस्ताना’ के मेरे सर्वप्रिय गीत को आप भी सुनिए। यह गीत 1955 के ‘बिनाका गीतमाला’ की वार्षिक हिट गीतों में शामिल था। हम आपको गीत का वही रेडियो संस्करण सुनवा रहे हैं।


फिल्म - मस्ताना : ‘मत भूल अरे इंसान...’ : मोहम्मद रफी : संगीत – मदनमोहन


बचपन में देखी हुई फिल्म ‘मस्ताना’ को मैं दोबारा कभी देख नहीं पाया। शायद यह फिल्म इतनी हिट न रही हो कि दोबारा इसे प्रदर्शित किया जा सके। परन्तु मेरे लिए तो ‘मस्ताना’ तब खुशियों का खजाना थी। इस गीत का दृश्य आज भी स्मृतियों में सुरक्षित है। एक माँ अपने नवजात शिशु को मन्दिर की सीढ़ियों पर छोड़ कर चली जाती है। मन्दिर में एक साधु यह गीत गा रहे हैं। बाद में इस शिशु का पालन-पोषण झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले फिल्म के अविवाहित नायक (मोतीलाल) द्वारा की जाती है। बड़ा होकर यह बालक (मास्टर रोमी) सारी बस्ती का दुलारा बन जाता है। रोते हुए इस अनाथ बच्चे को पुचकारने, दुलराने और चुप कराने के प्रयास में हास्य अभिनेता गोप और सुन्दर के अनेक हास्य प्रसंग मेरी स्मृति में आज भी सुरक्षित हैं। इन अभिनेताओ के नाम तो तब नहीं जानता था, परन्तु साथियों को फिल्म की कथा बताते समय मोटू (गोप) और ठिंगनू (सुन्दर) नामों का प्रयोग किया करता था। फिल्म में कई बालसुलभ प्रसंग और गीत भी थे। परन्तु यह प्रसंग और गीत मेरी स्मृतियों में बहुत स्पष्ट नहीं हैं। हाँ, एक गीत कुछ ऐसा था, जिसमें सभी पात्र चीनी या जापानी बने नाच रहे थे, वह कुछ-कुछ याद है। यह भी सम्भव है कि इस प्रकार के बालसुलभ प्रसंग उन दिनों पसन्द आए हों और याद भी रहे हों, किन्तु जैसे-जैसे आयु बढ़ी होगी वयस्क मानसिकता ने उन्हें बचकाना मान कर त्याग दिया हो। बहरहाल, फिल्म का वह प्रसंग एकदम स्पष्ट है, जब बड़ा होकर मुन्ना (मास्टर रोमी) आगे-आगे धनिकों के मुहल्ले में खिड़कियों के शीशे पत्थर मार कर तोड़ते हुए गुजरता था और उसके पीछे-पीछे नायक (मोतीलाल) पीठ पर शीशे का थैला लटकाए, ‘टूटे-फूटे शीशे बदलवा लो...’ की आवाज़ लगाते हुए आता था। इस दृश्य का अभिनय मैं अनेकानेक बार अपने बालसखाओं के साथ किया करता था। अपने साथियों को यह दृश्य मैं ही समझाता था और जाहिर है कि नायक की भूमिका मेरे अलावा और कौन करता। अब हम आपको फिल्म ‘मस्ताना’ का वह गीत सुनवाते हैं जिसकी धुन उन दिनों बैंड पर बेहद लोकप्रिय थी। यह एक युगल गीत है जिसे मोहम्मद रफी और लक्ष्मी शंकर ने गाया है।

फिल्म - मस्ताना : ‘झूम झूम के दो दीवाने...’ : मोहम्मद रफी और लक्ष्मी शंकर : संगीत – मदनमोहन


इस गीत ने उस आयु में मुझे एक अमूल्य ज्ञान यह भी दिया कि बम्बई की गलियाँ भी हमारे बनारस की सड़कों से भी अधिक चौड़ी होती हैं। अपने इस ज्ञान का उल्लेख मैंने काफी समय तक अपने साथियों से किया था। फिल्म के गीत ‘झूम झूम के दो दीवाने गाते जाएँ गली गली...’ की शूटिंग तत्कालीन बम्बई के किसी सूनसान सड़क पर की गई थी और गीत में शब्द आया है- ‘गली गली’। यह प्रसंग मेरे लिए आश्चर्यजनक इसलिए था कि मेरा जन्म गलियों के लिए विख्यात बनारस के गंगातट पर स्थित गलियों वाले मुहल्ले में हुआ था और फिल्म में जिस चौड़ी सड़क को गली कहा गया था, उस उम्र तक मैंने उतनी चौड़ी सड़क देखी नहीं थी। बहरहाल आइए, अब हम आपको ‘मस्ताना’ का वह गीत सुनवाते है जिसके शब्द मैं बिलकुल भूल चुका था किन्तु इसकी धुन आज भी मेरी स्मृतियों के किसी कोने में दबी पड़ी थी। फिल्म के गीतों की खोज करते समय जब यह गीत मेरे हाथ लगा तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। दरअसल इसी गीत को सुन कर मैंने बचपन में मुख से सीटी बजाना सीखा था। मोहम्मद रफी के गाये इस गीत- ‘दुनिया के सारे गमों से बेगाना...’ को आप भी सुनिए।

फिल्म - मस्ताना : ‘दुनिया के सारे गमों से बेगाना...’ : मोहम्मद रफी : संगीत – मदनमोहन




आपको कृष्णमोहन जी का यह गैर-प्रतियोगी संस्मरण कैसा लगा, हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता का यह समापन गैर-प्रतियोगी संस्मरण था। आप अपने सुझाव, संस्मरण और फरमाइश हमें अवश्य भेजें।


‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के विजेता 

दोस्तों, भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ के अन्तर्गत आपके संस्मरणों पर आधारित प्रतियोगिता का आयोजन किया था। विगत जून माह से आरम्भ किये गए इस स्तम्भ में हमने 11 प्रतियोगी और 6 गैर-प्रतियोगी संस्मरण प्रस्तुत किये। इस प्रतियोगिता के मुख्य निर्णायक का दायित्व हमने मुम्बई में कार्यरत वरिष्ठ फिल्म पत्रकार और स्तम्भ लेखक श्री शिशिर कृष्ण शर्मा को सौंपा था। आपने 30 अगस्त, 2012 को प्रकाशित ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ में शिशिर जी का ही गैर-प्रतियोगी संस्मरण पढ़ा था। आपके आलेखों का गहन अध्ययन कर उन्होने अपना निर्णय हमें भेज दिया है। शिशिर जी के प्रति आभार प्रकट करते हुए हम विजेताओं की घोषणा कर रहे हैं।

‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता में औसत 84 अंक अर्जित कर प्रथम स्थान प्राप्त किया है, लखनऊ की श्रीमती सुमन दीक्षित ने। गुड़गाँव, हरियाणा की सुश्री सीमा गुप्ता ने औसत 81 अंक के साथ दूसरा स्थान प्राप्त किया है। तीसरे स्थान पर बैंगलुरु की श्रीमती अंजू पंकज रहीं। इनका औसत प्राप्तांक 77 है। इनके अलावा संचालक मण्डल और निर्णायक मण्डल द्वारा सुश्री रंजना भाटिया, श्री सतीश पाण्डेय और श्री प्रेमचन्द्र सहजवाला के आलेखों की विशेष सराहना की गई। साथ ही सुश्री सुनीता शानू, श्री पंकज मुकेश, श्री मनीष कुमार, श्री निखिल आनन्द गिरि और श्री मिकी गोथवाल की सहभागिता का भी सम्मान करते हैं। उपरोक्त तीनों विजेताओं को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

तीनों विजेताओं से अनुरोध है कि आप अपना डाक का पूरा पता हमें radioplaybackindia@live.com पर शीघ्र मेल कर दें। आपका पुरस्कार हम आपके भेजे पते पर डाक द्वारा भेजेंगे।

प्रस्तुति : सजीव सारथी 





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