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Friday, May 22, 2009

"रोने से दुःख कम न होंगे तो क्यों न हंस खेल जिंदगी बिता लें हम..."- यही था फलसफा किशोर दा का

श्रोताओं और दर्शकों से खचा खच भरे सभागृह में एक हीरे का सौदागर आता है और उसे देख सभी १० मिनट तक सीटी बजाते हैं, चिल्लाते हैं, सारा माहौल गूंज रहा है, सब मस्त है ... |
आख़िर ये कौन है जिसे देख कर मस्ती आ जाती है, नौजवान मुश्कियां मारने लगते हैं, कौन है यह कौन है ... ?

ये जनाब हैं अपने किशोर कुमार |आदरणीय गालिब के शेर को किशोर बाबू के लिए उधार मांगूं तो कुछ ऐसा होगा -

जिसके आने से आती थी स्टेज पर मस्ती,
लोग कहतें हैं वो तो किशोर कुमार था |

एक वो भी समय था जब किशोर के दिल की धड़कन स्टेज शो के नाम पर तेज हो जाती थी | किशोर कुमार एक मस्ती का नाम जरुर था लेकिन उनमें एक शर्मिलापन भी दिख जाता था | एक बार तो सुनील दत्त और उनके दोस्तों ने उन्हें परदे के पीछे से स्टेज पर ढकेला और शो कराने के लिए मजबूर किया | डरते डरते दादा ने एक लय पकड़ ली और बस निकल पडी स्टेज शो की गाडी ... पम्प पम्प पम्प |

अब स्टेज शो में किशोर भैया तब तक गाते जब तक नही थकते | इस सजीव शो (real show) में किशोर ने गाया भी, नाचा भी और अभिनय भी किया | अपने अंदाजों को लोगों की मांग (public demand) पर बदलने लगे | कभी सभ्य आदमी (gentle man) बनकर तो कभी कुरते , पैजामे और सर पर मखमली टोपी पहन कोई जौहरी (diamond merchant) बनकर गाते रहें |क्या वे कला के हीरे(diamond)नही थे ?

उनका एक अंदाज़ आज भी याद किया जाता है | स्टेज शो की शुरुआत कुछ इस तरह से करते -
"ओ मेरे संगीत प्रेमियों....,
मेरे दादा दादियों , मेरे नाना नानियों ,
वो मेरे मामा मामियों , मेरे यारों यारियों ,
आप सब को किशोर कुमार का सप्रेम नमस्कार ..."


और सब उनके पीछे यह दोहराते मानो कोई प्रार्थना हो रही हो | कई बार तो वे स्टेज पर लेट कर, माइक को मुंह पर लगा गाते, लुढ़कते, उठते फिर गिरते | उनका यह कुदरती अंदाज लोगों को बहुत लुभाता | कला मंच पर मंझ चुके किशोर दा अब तरह तरह के नए प्रयोग करने लगे | अभिनय का अनुभव उन्हें वहां बहुत काम आ रहा था | श्रोताओं की मांग पर गाना गाया जाने लगा और किशोर कुमार दल इसके लिए हमेशा तैयार रहता था ! अपने सफल स्टेज शो के दौर में उन्होंने बहुत से संगीतकारों, गायिकाओं और अपने बेटे अमित कुमार के साथ स्टेज पर धूम मचाया, संग नाचा, गाया |

धीरे-धीरे, देश-विदेश में में उनका यह स्टेज शो उनके बिगड़ते स्वस्थ के कारण रुकने लगा और लोग किशोर स्टेज शो को तरसने लगे| बेटे अमित कुमार ने उनके इस सिलसिले को आज भी कायम रखा है |आज आवाज़ पर देखिये किशोर कुमार एक मशहूर लाइव कार्यक्रम की कुछ झलकियाँ, जहाँ वो गा रहे हैं ईना मीना डीका, मेरे सपनों की रानी, रोते हुए आते हैं सब और प्यार बांटते चलो जैसे लाजवाब गीत अपने मस्तमौला अंदाज़ में. आनंद लें-



जाते जाते ...

तुमने स्टेज पर कूदा ,
फिर गाया - नाचा ,
अब तरसता मन कहे ,
किशोर फिर से आजा |



प्रस्तुतकर्ता- अवनीश तिवारी

Friday, March 20, 2009

ईन मीना डीका...रम पम पोस रम पम पोस....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 28

निर्देशक एम् वी रमण किशोर कुमार को बतौर नायक दो फिल्मों में अभिनय करवा चुके थे. 1954 की फिल्म "पहली झलक" में और 1956 की फिल्म "भाई भाई" में. 1957 में जब रमण साहब ने खुद फिल्म निर्माण का काम शुरू किया तो अपनी पहली निर्मित और निर्देशित फिल्म "आशा" में किशोर कुमार को ही बतौर नायक मौका दिया. नायिका बनी वैजैन्तीमाला. "पहली झलक" में राजेंदर कृष्ण और हेमंत कुमार पर गीत संगीत का भार था तो "भाई भाई" में राजेंदर कृष्ण और मदन मोहन पर. "आशा" में एक बार फिर राजेंदर कृष्ण ने गीत लिखे, लेकिन संगीतकार एक बार फिर बदलकर बने सी रामचंद्र. इस फिल्म में सी रामचंद्र ने एक ऐसा गीत दिया किशोर कुमार और आशा भोंसले को जो इन दोनो के संगीत सफ़र का एक मील का पत्थर बनकर रह गया. "ईना मीना डीका" का शुमार सदाबहार 'क्लब सॉंग्स' में होता है. इस गीत की धुन, 'ऑर्केस्ट्रेशन', संगीत संयोजन, और 'कॉरल सिंगिंग', कुल मिलकर यह गीत उस ज़माने के 'क्लब्स' और 'पार्टीस' में बजनेवाले 'ऑर्केस्ट्रा' को ध्यान में रखते हुए बनाया गया था. इस गीत के दो 'वर्ज़न' हैं, एक किशोर कुमार की आवाज़ में और दूसरे में आशा भोंसले की आवाज़ है. आशाजी की आवाज़ कभी और, आज आपको किशोर-दा की आवाज़ में यह गीत सुनवा रहे हैं.

"ईना मीना डीका" हिन्दी फिल्म संगीत के पहले 'रॉक एन रोल' गीतों में से एक है. ऐसा कहा जाता है कि सी रामचंद्र के संगीत कक्ष के बाहर कुछ बच्चे खेल रहे थे और "ईनी, मीनी, मिनी, मो" जैसे शब्द बोल रहे थे. इसी से प्रेरित होकर उन्होने अपने सहायक जॉन गोमेस के साथ मिलकर इस गीत के पहले 'लाइन' का ईजाद किया - "ईना मीना डीका, दे डाई दमनिका". जॉन गोमेस, जो की गोआ के रहनेवाले थे, उन्होने आगे गीत को बढाया और कहा "मका नाका", जिसका कोंकनी में अर्थ है "मुझे नहीं चाहिए". इस तरह से वो शब्द जुड्ते चले गये और "रम रम पो" पे जाके उनकी गाडी रुकी. है ना मज़ेदार किस्सा! इस गाने को पूरा किया राजेंदर कृष्ण ने. यह गीत सुनवाने से पहले आपको यह भी बता दें की इसी गीत के मुख्डे से प्रेरित होकर डेविड धवन ने 1994 में फिल्म बनाई थी "ईना मीना डीका". तो अब इतनी जानकारी के बाद आप उठाइये आनंद किशोर-दा के खिलंदड और मस्ती भरे अंदाज़ का.



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. शैलेन्द्र के बोल और शंकर जयकिशन का अमर संगीत.
२. लता की दिव्य आवाज़.
३. मुखड़े में शब्द है - "सौतन".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
नीरज जी एक बार फिर आपने सही पकडा, चूँकि ईना मीना डीका "डमी" शब्द हैं इसलिए वैसे संकेत दिए थे. तो मनु जी और आचार्य जी परेशान न होइए आपके system में कोई प्रॉब्लम नहीं है, हा हा हा....अब तो हँसना भी पाप हो गया भाई. राज जी पहेली भी बूझा कीजिये कभी कभी

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.




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