Showing posts with label begam parvin sultana. Show all posts
Showing posts with label begam parvin sultana. Show all posts

Sunday, December 27, 2015

नौशाद के गीतों में राग-दर्शन : SWARGOSHTHI – 250 : RAG BASED SONGS BY NAUSHAD


स्वरगोष्ठी – 250 में आज


संगीत के शिखर पर – 11 : फिल्म संगीतकार नौशाद अली


फिल्मों में रागदारी संगीत की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम साधक नौशाद अली




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी हमारी सुरीली श्रृंखला – ‘संगीत के शिखर पर’ की ग्यारहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-रसिकों का एक बार पुनः हार्दिक स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला में हम भारतीय संगीत की विभिन्न विधाओं में शिखर पर विराजमान व्यक्तित्व और उनके कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। संगीत गायन और वादन की विविध लोकप्रिय शैलियों में किसी एक शीर्षस्थ कलासाधक का चुनाव कर हम उनके व्यक्तित्व का उल्लेख और उनकी कृतियों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। आज श्रृंखला की ग्यारहवीं कड़ी में हम आपको फिल्म संगीत के माध्यम से रागों की सुगन्ध बिखेरने वाले अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर चर्चा कर रहे हैं। आपको हम यह भी अवगत कराना चाहते हैं कि दो दिन पूर्व, अर्थात 25 दिसम्बर को नौशाद अली का 96वीं जयन्ती थी। इस उपलक्ष्य में हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक में नौशाद अली के चार महत्त्वपूर्ण दशकों की संगीत-यात्रा के कुछ चुने हुए गीतों का उल्लेख कर रहे हैं। पाँचवें से लेकर आठवें दशक के बीच नौशाद सर्वाधिक सक्रिय थे। इन चार दशकों में से प्रत्येक दशक के एक-एक गीत चुन कर हम आपके लिए प्रस्तुत करेंगे। इन गीतों में आपको क्रमशः राग बिहाग, मालकौंस, वृन्दावनी सारंग और पहाड़ी के स्वरों के दर्शन होंगे।



25 दिसम्बर, 1919 को सांगीतिक परम्परा से समृद्ध शहर लखनऊ के कन्धारी बाज़ार में एक साधारण परिवार में नौशाद का जन्म हुआ था। नौशाद जब कुछ बड़े हुए तो उनके पिता घसियारी मण्डी स्थित अपने नए घर में आ गए। यहीं निकट ही मुख्य मार्ग लाटूश रोड (वर्तमान गौतम बुद्ध मार्ग) पर संगीत के वाद्ययंत्र बनाने और बेचने वाली दूकाने थीं। उधर से गुजरते हुए बालक नौशाद घण्टों दूकान में रखे साज़ों को निहारा करता था। एक बार तो दूकान के मालिक गुरबत अली ने नौशाद को फटकारा भी, लेकिन नौशाद ने उनसे आग्रह किया की वे बिना वेतन के दूकान पर रख लें। नौशाद उस दूकान पर रोज बैठते, साज़ों की झाड़-पोछ करते और दूकान के मालिक का हुक्का तैयार करते। साज़ों की झाड़-पोछ के दौरान उन्हें कभी-कभी बजाने का मौका भी मिल जाता था। उन दिनों मूक फिल्मों का युग था। लखनऊ के रॉयल सिनेमाघर में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान एक लद्दन खाँ थे जो हारमोनियम बजाया करते थे। यही खाँ साहब नौशाद के पहले गुरु बने। नौशाद के पिता संगीत के सख्त विरोधी थे, अतः घर में बिना किसी को बताए सितार नवाज़ युसुफ अली और गायक बब्बन खाँ की शागिर्दी की। कुछ बड़े हुए तो उस दौर के नाटकों की संगीत मण्डली में भी काम किया। घर वालों की फटकार बदस्तूर जारी रहा। अन्ततः एक दिन घर में बिना किसी को बताए मायानगरी बम्बई की ओर रुख किया।

इसके आगे का वृतान्त हम जारी रखेंगे, इस बीच थोड़ा विराम लेकर हम आपको नौशाद के फिल्मी सफर के पहले दशक का संगीतबद्ध किया एक गीत सुनवाते हैं। यह गीत हमने 1946 में प्रदर्शित फिल्म ‘शाहजहाँ’ से लिया है। फिल्म के नायक और गायक कुन्दनलाल (के.एल.) सहगल थे। कई अर्थों में यह फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास के पन्नों पर स्वर्णाक्षरों से अंकित है। इस फिल्म का गीत- ‘जब दिल ही टूट गया...’ सहगल का अन्तिम गीत हुआ। इसी गीत के गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की यह पहली फिल्म थी। इसी गीत को नौशाद ने सहगल से आग्रह कर दो बार, एक बार बिना शराब पिये और फिर दोबारा शराब पिला कर रिकार्ड कराया और उन्हें यह एहसास कराया कि बिना पिये वे बेहतर गाते हैं। बहरहाल, आइए हम आपको सहगल का गाया और नौशाद का संगीतबद्ध किया फिल्म ‘शाहजहाँ’ का वह गीत सुनवाते हैं जो राग बिहाग पर आधारित है। इस गीत में राग के स्वर और भाव स्पष्ट रूप से झलकते हैं।


राग बिहाग : फिल्म ‘शाहजहाँ’ : ‘ऐ दिल-ए-बेकरार झूम…’ : कुन्दनलाल सहगल




घर से भाग कर बम्बई (अब मुम्बई) पहुँचे नौशाद अली कुछ समय तक भटकते रहे। एक दिन न्यू पिक्चर कम्पनी में संगीत वादकों के चयन के लिए प्रकाशित विज्ञापन के आधार पर नौशाद बड़ी उम्मीद लेकर ग्रांट रोड स्थित कम्पनी के कार्यालय पहुँचे। वहाँ उस समय के जाने-माने संगीतकार उस्ताद झण्डे खाँ वादकों का इंटरव्यू ले रहे थे। नौशाद ने भी खाँ साहब को कुछ सुनाया। उन्होने बाद में आने को कह कर नौशाद को रुखसत किया। उसी इंटरव्यू में नौशाद की भेंट गुलाम मोहम्मद से हुई, जो आगे चलकर पहले उनके सहायक बने और फिर बाद में स्वतंत्र संगीतकार भी हुए। बहरहाल, उस्ताद झण्डे खाँ ने नौशाद को पियानो वादक के रूप में चालीस रुपये और गुलाम मोहम्मद को तबला व ढोलक वादक के रूप में साठ रुपये मासिक वेतन पर रख लिया। और इस तरह नौशाद का प्रवेश फिल्म संगीत के क्षेत्र में हुआ।

नौशाद की छठें दशक की फिल्मों में रागदारी संगीत का प्रभुत्व बढ़ता गया। आइए अब हम वर्ष 1952 की उस फिल्म और उसके एक गीत की चर्चा करते हैं जिसने नौशाद की राग आधारित गीतों की रचना करने की अपनी क्षमता को उजागर किया। इस वर्ष प्रदर्शित फिल्म ‘बैजू बावरा’ में नौशाद ने कई कालजयी गीतो की रचना कर अपने शास्त्रीय संगीत के प्रति अनुराग को सिद्ध किया। फिल्म के गीतों के लिए उनके पास मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर की आवाज़ का साथ तो था ही, रागों का शुद्ध रूप में प्रस्तुत करने की ललक के कारण उन्होने उस समय के प्रख्यात शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर को भी फिल्म गीत गाने के लिए राजी किया। खाँ साहब और पण्डित पलुस्कर द्वारा प्रस्तुत राग देशी के स्वरों में जुगलबन्दी वाला गीत- ‘आज गावत मन मेरो...’ तो फिल्म संगीत के इतिहास में एक अमर गीत बन चुका है। इसके अलावा उस्ताद अमीर खाँ ने अपने एकल स्वर में राग पूरिया धनाश्री में गीत- ‘तोरी जय जय करतार...’ भी गाया था। परन्तु आज हम आपको नौशाद के सर्वप्रिय पार्श्वगायक मोहम्मद रफी के स्वर में राग मालकौंस पर आधारित वह गीत सुनवाते हैं, जिसकी लोकप्रियता आज भी कायम है।


राग मालकौंस : फिल्म ‘बैजू बावरा’ : ‘मन तड़पत हरिदर्शन को आज...’ : मोहम्मद रफी




पियानो वादक के रूप में नौशाद को न्यू पिक्चर कम्पनी में एक ठिकाना तो मिल गया, परन्तु मंज़िल तो अभी कोसों दूर थी। अभी तक नौशाद मुम्बई (तब बम्बई) में रह रहे अलीम साहब के नाम लखनऊ से अपने एक मित्र का खत लेकर आए थे और उन्हीं के साथ गुजर कर रहे थे। नौकरी मिलते ही उन्होने अलीम साहब पर बोझ बने रहना उचित नहीं समझा और लखनऊ के ही एक अख्तर साहब के साथ दादर में रहने लगे। नौशाद के यह दूसरे आश्रयदाता एक दूकान में सेल्समैन थे और रात में दूकान बन्द होने के बाद दरवाजा बन्द कर अन्दर ही सोते थे। नौशाद को भी ऐसे ही रहना पड़ता था। कभी जब दूकान में गर्मी अधिक होती तो दोनों बाहर फुटपाथ पर रात गुजारते थे।

फिल्मों के प्रसंग के अनुसार नौशाद उस समय के दिग्गज शास्त्रीय गायकों को आमंत्रित कर गवाने से भी नहीं चूके। 1952 की फिल्म ‘बैजू बावरा’ में उस्ताद अमीर खाँ और पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर के स्वरों में तथा 1954 की फिल्म ‘शबाब’ में दोबारा उस्ताद अमीर खाँ के स्वर में ऐसा प्रयोग वे कर चुके थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के एक प्रसंग में अकबर के दरबारी गायक तानसेन के स्वर में जब एक गीत की आवश्यकता हुई तो नौशाद ने उस्ताद बड़े गुलाम अली खाँ को गाने के लिए बड़ी मुश्किल से राजी किया। उस्ताद का राग सोहनी में गाया वह गीत था- ‘प्रेम जोगन बनके…’। इस ठुमरीनुमा गीत के लिए के. आसिफ ने उस्ताद को पचीस हजार रुपये मानदेय के रूप में दिया था। यह गीत उन्हें इतना पसन्द आया कि के. आसिफ ने उस्ताद बड़े गुलाम अली को पचीस हजार रुपये और देकर एक और गीत ‘शुभ दिन आयो राजदुलारा...’ (राग रागेश्री) भी गवाया था। लोकधुनों और राग आधारित गीतों के अलावा गज़लों की संगीत-रचना में भी नौशाद सिद्ध थे। फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’, ‘मेरे महबूब’, ‘दिल दिया दर्द लिया’, ‘पालकी’ आदि फिल्मों में उनकी संगीतबद्ध गज़लें बेहद लोकप्रिय हुई थीं। सातवें दशक की फिल्म ‘दिल दिया दर्द लिया’ में मोहम्मद रफी का गाया- ‘कोई सागर दिल को बहलाता नहीं...’और ‘गुजरे हैं आज इश्क़ में...’ की धुनें बेहद आकर्षक थीं। परन्तु आज हम इस दशक के गीतों में से चुन कर आपको फिल्म का जो गीत सुनवा रहे हैं, वह राग वृन्दावनी सारंग पर आधारित है। मोहम्मद रफी और आशा भोसले के स्वरों में प्रस्तुत इस युगल गीत के बोल हैं- ‘सावन आए या न आए, जिया जब झूमे सावन है...’। तीनताल और कहरवा में निबद्ध इस गीत का आनन्द आप लीजिए।


राग वृन्दावनी सारंग : ‘सावन आए या न आए...’ : आशा भोसले और रफी : फिल्म दिल दिया दर्द लिया




स्वतंत्र संगीतकार के रूप में नौशाद को अवसर तो 1939-40 में ही मिल चुका था। अपने शुरुआती दौर में उन्होने उत्तर प्रदेश की लोकधुनों का प्रयोग करते हुए अनेक लोकप्रिय गीत रचे। ऐसे गीतों में प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की छटा थी। दरअसल नौशाद के ऐसे प्रयोगों से उन दिनों प्रचलित फिल्म संगीत को एक नया मुहावरा मिला। आगे चल कर अन्य संगीतकारों ने भी प्रादेशिक और क्षेत्रीय लोक संगीत से जुड़ कर ऐसे ही प्रयोग किए। लोक संगीत के साथ ही उन्होने शास्त्रीय राग आधारित गीतों का प्रचलन भी पाँचवें दशक से आरम्भ कर दिया था। नौशाद के संगीत से सजे अगले जिस गीत की हम चर्चा करने जा रहे हैं, वह आठवें दशक की फिल्म ‘पाकीजा’ की एक ठुमरी है। इस ठुमरी, ‘कौन गली गयो श्याम...’ के फिल्मी प्रयोग पर थोड़ी चर्चा करेंगे। फिल्म और फिल्म संगीत के इतिहास में दो दशकों का प्रतिनिधित्व करने वाली फिल्म ‘पाकीज़ा’ है। 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में फिल्म ‘पाकीजा’ के निर्माण की योजना बनी थी। फिल्म की निर्माण प्रक्रिया में इतना अधिक समय लग गया कि दो संगीतकारों को फिल्म का संगीत तैयार करना पड़ा। 1972 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीत के लिए संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने शास्त्रीय रागों का आधार लेकर एक से एक गीतों की रचना की थी। गुलाम मोहम्मद ने इस फिल्म के अधिकतर गीत अपने जीवनकाल में ही रिकार्ड करा लिये थे। इसी दौरान वे ह्रदय रोग से पीड़ित हो गए थे। अन्ततः 17 मार्च, 1968 को उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद फिल्म का पृष्ठभूमि संगीत और तीन ठुमरियाँ- परवीन सुल्ताना, राजकुमारी और वाणी जयराम कि आवाज़ में संगीतकार नौशाद ने रिकार्ड किया। अन्ततः यह महत्वाकांक्षी फिल्म गुलाम मोहम्मद के निधन के लगभग चार वर्ष बाद प्रदर्शित हुई थी। संगीत इस फिल्म का सर्वाधिक आकर्षक पक्ष सिद्ध हुआ, किन्तु इसके सर्जक इस सफलता को देखने के लिए हमारे बीच नहीं थे। आइए, फिल्म ‘पाकीज़ा’ में नौशाद द्वारा शामिल की गई वह पारम्परिक ठुमरी सुनवाते हैं, जिसे सुप्रसिद्ध गायिका परवीन सुलताना ने राग पहाड़ी का स्वर दिया है। विदुषी परवीन सुलताना ने तीनों सप्तकों में फिरने वाले स्वरो में इस ठुमरी को एक अलग रंग दिया है। आप इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए और मुझे वर्ष 2015 के इस समापन अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग  पहाड़ी : फिल्म  पाकीज़ा : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : बेगम परवीन सुलताना






संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 250वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के इस अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पाँचवीं श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा। ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी अंक में हम वार्षिक विजेताओं द्वारा प्रस्तुत ‘स्वरगोष्ठी’ का अंक प्रकाशित करेंगे।


1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि आपको किस राग का आभास हो रहा है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप वाद्य के वादक के नाम का अनुमान लगा सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 2 जनवरी, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 252वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 248 की संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रामनारायण द्वारा प्रस्तुत सारंगी पर राग दरबारी का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग दरबारी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल मध्यलय तीनताल और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- वाद्य – सारंगी। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं- जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘संगीत के शिखर पर’ का यह ग्यारहवाँ और समापन अंक था। इस अंक में हमने भारतीय फिल्मों के अप्रतिम संगीतकार नौशाद अली के व्यक्तित्व और कृतित्व पर संक्षिप्त प्रकाश डालने का प्रयत्न किया है। यह वर्ष 2015 का समापन अंक था। अगला अंक वर्ष 2016 का पहला अंक होगा। इस अंक में ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली के चौथे वार्षिक विजेता का परिचय प्राप्त करेंगे। आगामी अंकों में यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  





Sunday, February 22, 2015

तराना : SWARGOSHTHI – 208 : TARANA RECITAL


स्वरगोष्ठी – 208 में आज

भारतीय संगीत शैलियों का परिचय : 6 : तराना

सार्थक शब्दों की अनुपस्थिति के बावजूद रसानुभूति कराने में समर्थ तराना शैली




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’ की एक और नयी कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। पाठकों और श्रोताओं के अनुरोध पर आरम्भ की गई इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत हम भारतीय संगीत की उन परम्परागत शैलियों का परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं, जो आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारे बीच उपस्थित हैं। भारतीय संगीत की एक समृद्ध परम्परा है। वैदिक युग से लेकर वर्तमान तक इस संगीत-धारा में अनेकानेक धाराओं का संयोग हुआ। इनमें से जो भारतीय संगीत के मौलिक सिद्धांतों के अनुकूल धारा थी उसे स्वीकृति मिली और वह आज भी एक संगीत शैली के रूप स्थापित है और उनका उत्तरोत्तर विकास भी हुआ। विपरीत धाराएँ स्वतः नष्ट भी हो गईं। पिछली कड़ी से हमने भारतीय संगीत की सर्वाधिक लोकप्रिय ‘खयाल’ शैली का परिचय आरम्भ किया है। आज के अंक में हम खयाल शैली के साथ अभिन्न रूप से सम्बद्ध ‘तराना’ शैली पर सोदाहरण चर्चा करेंगे। तराना रचनाओं में सार्थक शब्द नहीं होते। परन्तु रचना से रसानुभूति पूरी होती है। आज के अंक में हम आपको सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना के स्वरों में राग हंसध्वनि के तराना का रसास्वादन कराते हैं। इसके अलावा लगभग छः दशक पुरानी फिल्म ‘लड़की’ से सुविख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर गाये एक गीत का अंश भी प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसमें उन्होने राग चन्द्रकौंस का तराना गाया है।
 



रम्परागत भारतीय संगीत की शैलियों में खयाल शैली वर्तमान में सर्वाधिक प्रचलित है। वर्तमान शास्त्रीय संगीत से यह इतनी घुल-मिल गई है कि इसके बिना रागदारी संगीत की कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसकी लोकप्रियता का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि वाद्य संगीत पर भी खयाल बजाया जाता है। खयाल शैली विकास अठारहवीं शताब्दी से हुआ है। खयाल शब्द फारसी भाषा का है, जो संस्कृत के ‘ध्यान’ शब्द का पर्याय है। प्राचीन ग्रन्थकार मतंग के काल में विभिन्न रागों को ध्यान शैली में गायन का उल्लेख मिलता है। सम्भव है ध्यान परम्परा से खयाल शैली का सम्बन्ध हो। खयाल शैली का सम्बन्ध सूफी संगीत से भी जुड़ता है। सूफी काव्य में भी खयाल नाम से एक प्रकार प्रचलित रहा है। कुछ विद्वान खयाल शैली पर मध्यकाल के लोक संगीत का प्रभाव भी मानते हैं। आज भी राजस्थान, ब्रज और अवध क्षेत्र में खयाल नामक लोक संगीत का एक प्रकार प्रचलित है। एक खयाल रचना के तीन भाग होते हैं; अत्यन्त संक्षिप्त आलाप, विलम्बित खयाल और द्रुत खयाल। खयाल के भी दो भाग हो जाते हैं; स्थायी और अन्तरा। स्थायी और अन्तरा के लिए एक संक्षिप्त सी पद की रचना भी होती है। भारतीय शास्त्रीय संगीत स्वर-प्रधान है। अधिकतर विद्वान शब्दों को स्वर के आरोहण का एक माध्यम ही मानते हैं और राग के स्वरों की अपेक्षा शब्दों को विशेष महत्त्व नहीं देते। परन्तु कुछ विद्वान खयाल गायन में शब्दों के उच्चारण पर विशेष बल देते हैं। इनका मानना है कि स्वरो में रस के निष्पत्ति की सीमित सम्भावना होती है, जबकि शब्दों अर्थात साहित्य को जब स्वरों का संयोग मिलता है तब सभी नौ प्रकार के रसों की सृष्टि सहज हो जाती है। विलम्बित, मध्य और द्रुत खयाल के साथ ही तराना गायकी का विशेष महत्त्व है। तराना की संरचना मध्य या द्रुत लय के खयाल जैसी होती है, अन्तर इसकी शब्द रचना में होता है। खयाल के स्थायी और अन्तरा में सार्थक शब्दों की रचना होती है, जबकि तराना मे निरर्थक शब्दों का प्रयोग किया जाता है। ये शब्द सार्थक नहीं होते किन्तु लय के प्रवाह सरलता से घुल-मिल जाते हैं। कुशल कलासाधक तराना के इन्हीं निरर्थक साहित्य के माध्यम सार्थक रसानुभूति कराने में समर्थ होते हैं। तराना के उदाहरण के लिए आज के अंक में हमने राग हंसध्वनि के एक मोहक तराना का चुनाव किया है। यह तराना सुविख्यात संगीत-विदुषी परवीन सुल्ताना प्रस्तुत कर रही हैं। हमारी यह चर्चा जारी रहेगी, पहले आप यह तराना सुनिए।


राग हंसध्वनि : आलापचारी और द्रुत तीनताल का तराना : बेगम परवीन सुल्ताना




स्वर-विस्तार की प्रधानता होने कारण खयाल में आलाप का महत्त्व सीमित हो गया है। इस शैली में ध्रुपद जैसी स्थिरता और गम्भीर गमक के अलावा छूट, मुरकी, जमजमा आदि का महत्त्व बढ़ जाता है। आरम्भिक काल के खयाल में तानों का प्रयोग नहीं होता था। बाद में जब घरानों की स्थापना हुई तो तानों का प्रयोग वैचित्र्य के लिए किया जाने लगा। यही नहीं इस शैली में सरगम का प्रयोग भी बाद में शुरू हुआ। तराना गायकी में लयकारी का विशेष महत्त्व होता है। फिल्म संगीत में कई संगीतकारों ने तराना का इस्तेमाल किया है। 1953 में ए.वी.एम. प्रोडक्शन की एक फिल्म ‘लड़की’ के एक गीत में तराना का प्रयोग किया गया था। इस फिल्म के संगीतकार धनीराम ने फिल्म के एक नृत्यगीत के अन्त में राग चन्द्रकौंस के संक्षिप्त तराना को जोड़ा था। फिल्म में यह गीत अभिनेत्री और नृत्यांगना वैजयन्तीमाला द्वारा मंच पर प्रस्तुत किये जा रहे नृत्य में शामिल किया गया था। मूल गीत के बोल हैं- ‘मेरे वतन से अच्छा कोई वतन नहीं है...’। गीतकार राजेंद्र कृष्ण की इस रचना के अन्तिम डेढ़ मिनट की अवधि में संगीतकार धनीराम ने राग चन्द्रकौंस का ताराना इस्तेमाल किया था। पूरा गीत और अन्त का तराना लता मंगेशकर ने गाया है। आप गीत का तराना वाला हिस्सा सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग चन्द्रकौंस : फिल्म लड़की : गीत ‘मेरे वतन से अच्छा...’ का तराना अंश : लता मंगेशकर 





संगीत पहेली 


‘स्वरगोष्ठी’ के 208वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की पहली श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – प्रस्तुति के इस अंश में किस ताल का प्रयोग किया गया है? ताल का नाम बताइए।

3 – इस रचना के गायक को पहचानिए और उनका नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार 28 फरवरी, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 210वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 206वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको उस्ताद अब्दुल करीम खाँ की एक पुरानी रेकार्डिंग का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल विलम्बित एकताल। इस बार पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी और हैदराबाद से डी. हरिना माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी है हमारी लघु श्रृंखला- ‘भारतीय संगीत शैलियों का परिचय’। इस श्रृंखला के अन्तर्गत वर्तमान में भारतीय संगीत की जो भी शैलियाँ प्रचलन में हैं, उनका सोदाहरण परिचय प्रस्तुत कर रहे हैं। आज आपने खयाल शैली से जुड़े तराना का परिचय प्राप्त किया। अगले अंक में हम आपका परिचय संगीत की किसी अन्य प्रकार से कराएंगे। यदि आप भी संगीत के किसी भी विषय पर हिन्दी में लेखन की इच्छा रखते हैं तो हमसे सम्पर्क करें। हम आपकी प्रतिभा को निखारने का अवसर सहर्ष देंगे। आगामी श्रृंखलाओं के बारे में आपके सुझाव सादर आमंत्रित हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ स्तम्भ के आगामी अंकों में आप क्या पढ़ना और सुनना चाहते हैं, हमे आविलम्ब लिखें। अपनी पसन्द के विषय और गीत-संगीत की फरमाइश अथवा अगली श्रृंखलाओं के लिए आप किसी नए विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 



Sunday, September 14, 2014

‘कौन गली गयो श्याम...’ : SWARGOSHTHI – 185 : THUMARI KHAMAJ & PAHADI



स्वरगोष्ठी – 185 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 4 : ठुमरी खमाज और पहाड़ी


डॉ. प्रभा अत्रे को जन्मदिवस पर शुभकामना देते हुए सुनिए श्रृंगार और भक्तिरस से अभिमंत्रित ठुमरी 




रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ की चौथी कड़ी में कृष्णमोहन मिश्र और संज्ञा टण्डन की ओर से आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन है। यह पूर्व में प्रकाशित / प्रसारित श्रृंखला का परिमार्जित रूप है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के कुछ स्तम्भ केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं तो कुछ स्तम्भ आलेख और चित्र दृश्य के साथ गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से तो कुछ स्तम्भ पूर्णतः केवल श्रव्य माध्यम से प्रस्तुत किये जाते हैं। इस श्रृंखला से हम एक नया प्रयोग कर रहे हैं। श्रृंखला के अंकों को हम प्रायोगिक रूप से दोनों माध्यमों में प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। आज के अंक में हम प्रस्तुत करने जा रहे हैं, खमाज की एक बेहद लोकप्रिय ठुमरी- ‘कौन गली गयो श्याम...’। इस ठुमरी को कई गायक-गायिकाओं ने गाया है। इनमें विदुषी रसूलन बाई, डॉ. प्रभा अत्रे, पण्डित छन्नूलाल मिश्र, विदुषी परवीन सुलताना आदि की प्रस्तुतियाँ रेखांकित की जा सकती है। आज हम आपको पहले यह पारम्परिक ठुमरी डॉ. प्रभा अत्रे के स्वर में प्रस्तुत करेंगे। इसके बाद यही ठुमरी बेगम परवीन सुलताना की आवाज़ में सुनवाएँगे, जिसे उन्होने फिल्म ‘पाकीज़ा’ के लिए गाया था।



पिछले छह दशक की अवधि में भारतीय संगीत जगत की किसी ऐसी कलासाधिका का नाम लेना हो, जिन्होने संगीत-चिन्तन, मंच-प्रस्तुतीकरण, शिक्षण, पुस्तक-लेखन, शोध आदि सभी क्षेत्रों में पूरी दक्षता के साथ संगीत के शिखर को स्पर्श किया है, तो वह एक नाम विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे का ही है। वर्तमान में प्रभा जी ऐसी महिला कलासाधिका हैं, जो किराना घराने की गायकी का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। कल ही उनका 83वाँ जन्मदिवस बीता है। 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' परिवार इस अवसर पर उन्हें शताधिक शुभकामनाएँ अर्पित करता है। गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत प्रभा जी को किराना घराने के विद्वान सुरेशबाबू माने और विदुषी (पद्मभूषण) हीराबाई बरोडकर से संगीत-शिक्षा मिली। कठिन साधना के बल पर उन्होने खयाल, तराना, ठुमरी, दादरा, गजल, भजन आदि शैलियों के गायन में दक्षता प्राप्त की। डॉ. अत्रे को प्रत्यक्ष सुनना एक दिव्य अनुभूति देता है। उनकी गायकी में राग और रचना के साहित्य की स्पष्ट भवाभिव्यक्ति उपस्थित होती है। स्पष्ट शब्दोच्चार और संगीत के विविध अलंकारों से सुसज्जित रचना उनके कण्ठ पर आते ही हर वर्ग के श्रोताओं मुग्ध कर देती है। मूलतः खयाल गायिका के रूप में विख्यात प्रभा अत्रे ठुमरी गायन में समान रूप से दक्ष हैं। राग मिश्र खमाज, दीपचंदी ताल में गायी गई ठुमरी- ‘कौन गली गयो श्याम...’ अनेक संगीत समारोहों में अनुरोध के साथ सुनी जाती रही है। लीजिए, आप भी इस ठुमरी की रसानुभूति कीजिए। तबला संगति नारायण राव इन्दोरकर ने की है।


ठुमरी - मिश्र खमाज : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : विदुषी (डॉ.) प्रभा अत्रे




अब हम आज की ठुमरी ‘कौन गली गयो श्याम...’ के फिल्मी प्रयोग पर थोड़ी चर्चा करेंगे। फिल्म और फिल्म संगीत के इतिहास में दो दशकों का प्रतिनिधित्व करने वाली फिल्म ‘पाकीज़ा’ है। 60 के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में फिल्म ‘पाकीजा’ के निर्माण की योजना बनी थी। फिल्म की निर्माण प्रक्रिया में इतना अधिक समय लग गया कि दो संगीतकारों को फिल्म का संगीत तैयार करना पड़ा। 1972 में प्रदर्शित इस फिल्म के संगीत के लिए संगीतकार गुलाम मोहम्मद ने शास्त्रीय रागों का आधार लेकर एक से एक गीतों की रचना की थी। गुलाम मोहम्मद ने इस फिल्म के अधिकतर गीत अपने जीवनकाल में ही रिकार्ड करा लिये थे। इसी दौरान वे ह्रदय रोग से पीड़ित हो गए थे। अन्ततः 17 मार्च, 1968 को उनका निधन हो गया। उनके निधन के बाद फिल्म का पृष्ठभूमि संगीत और तीन ठुमरियाँ- परवीन सुल्ताना, राजकुमारी और वाणी जयराम कि आवाज़ में संगीतकार नौशाद ने रिकार्ड किया। अन्ततः यह महत्वाकांक्षी फिल्म गुलाम मोहम्मद के निधन के लगभग चार वर्ष बाद प्रदर्शित हुई थी। संगीत इस फिल्म का सर्वाधिक आकर्षक पक्ष सिद्ध हुआ, किन्तु इसके सर्जक इस सफलता को देखने के लिए प्रदर्शन के दौरान हमारे बीच नहीं थे। आइए, फिल्म ‘पाकीज़ा’ में नौशाद द्वारा शामिल की गई वह पारम्परिक ठुमरी सुनवाते हैं, जिसे सुप्रसिद्ध गायिका परवीन सुलताना ने राग पहाड़ी का स्वर दिया है। विदुषी परवीन सुलताना ने तीनों सप्तकों में फिरने वाले स्वरो में इस ठुमरी को एक अलग रंग दिया है। आप इस ठुमरी का रसास्वादन कीजिए।


राग – पहाड़ी : फिल्म – पाकीज़ा : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : विदुषी परवीन सुलताना : संगीत – नौशाद




अब हम आज के इस आलेख और गीतों के समन्वित रूप को श्रव्य माध्यम में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिसे संज्ञा टण्डन ने अपनी भावपूर्ण आवाज़ से सुसज्जित किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


ठुमरी खमाज और पहाड़ी : ‘कौन गली गयो श्याम...’ : फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 4 : वाचक स्वर – संज्ञा टण्डन




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 185वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको देश के सुविख्यात गायक की आवाज़ में एक ठुमरी गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 190वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – कण्ठ संगीत की इस रचना के अंश को सुन कर बताइए कि यह किस राग में निबद्ध है?

2 – क्या आप गायक की आवाज़ को पहचान रहे है? यदि हाँ, तो हमें गायक का नाम बताइए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 187वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 183वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक मन्ना डे की आवाज़ में एक पारम्परिक ठुमरी के फिल्मी संस्करण का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरवी और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक मन्ना डे। इस अंक की पहेली के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, चण्डीगढ़ के हरकीरत सिंह, और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात




मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। इस लघु श्रृंखला में हम एक नया प्रयोग भी कर रहे हैं। आपको ‘स्वरगोष्ठी’ का यह स्वरूप कैसा लगा? हमें अवश्य बताइएगा। आप भी यदि भारतीय संगीत के किसी विषय में कोई जानकारी हमारे बीच बाँटना चाहें तो अपना आलेख अपने संक्षिप्त परिचय के साथ ‘स्वरगोष्ठी’ के ई-मेल पर भेज दें। अपने पाठको/श्रोताओं की प्रेषित सामग्री प्रकाशित/प्रसारित करने में हमें हर्ष होगा। आगामी श्रृंखलाओं के लिए आप अपनी पसन्द के कलासाधकों, रागों या रचनाओं की फरमाइश भी कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-प्रेमियों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, February 23, 2014

राग काफी गाने-बजाने का परिवेश

  

स्वरगोष्ठी – 156 में आज

फाल्गुन के रंग राग काफी के संग


‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के मंच पर ‘स्वरगोष्ठी’ के एक नए अंक के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। मित्रों, पिछली तीन कड़ियों से हम आपसे बसन्त ऋतु के संगीत पर चर्चा कर रहे हैं। भारतीय पंचांग के अनुसार बसन्त ऋतु की आहट माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही मिल जाती है। इसके उपरान्त रंग-रँगीले फाल्गुन मास का आगमन होता है। इस परिवेश का एक प्रमुख राग काफी होता है। स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश, विशेष रूप से हो के रस-रंग को अभिव्यक्त करने के लिए राग काफी सबसे उपयुक्त राग है। आज के अंक में हम पहले इस राग में एक ठुमरी प्रस्तुत करेंगे, जिसे परवीन सुल्ताना ने स्वर दिया है। इसके साथ ही डॉ. कमला शंकर का गिटार पर बजाया राग काफी की ठुमरी भी सुनेगे। आज की तीसरी प्रस्तुति डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा है।  


राग काफी, काफी थाट का आश्रय राग है और इसकी जाति है सम्पूर्ण-सम्पूर्ण, अर्थात इस राग के आरोह-अवरोह में सात-सात स्वर प्रयोग किए जाते हैं। आरोह में सा रे (कोमल) म प ध नि(कोमल) सां तथा अवरोह में सां नि(कोमल) ध प म (कोमल) रे सा स्वरों का प्रयोग किया जाता है। इस राग का वादी स्वर पंचम और संवादी स्वर षडज होता है। कभी-कभी वादी स्वर कोमल गान्धार और संवादी स्वर कोमल निषाद का प्रयोग भी मिलता है। दक्षिण भारतीय संगीत का राग खरहरप्रिय राग काफी के समतुल्य राग है। राग काफी, ध्रुवपद और खयाल की अपेक्षा उपशास्त्रीय संगीत में अधिक प्रयोग किया जाता है। ठुमरियों में प्रायः दोनों गान्धार और दोनों धैवत का प्रयोग भी मिलता है। टप्पा गायन में शुद्ध गान्धार और शुद्ध निषाद का प्रयोग वक्र गति से किया जाता है। इस राग का गायन-वादन रात्रि के दूसरे प्रहर में किए जाने की परम्परा है, किन्तु फाल्गुन मास में इसे किसी भी समय गाया-बजाया जा सकता है।

आज की पहली प्रस्तुति राग काफी की ठुमरी है। यह ठुमरी विख्यात गायिका विदुषी परवीन सुल्ताना ने प्रस्तुत किया है। खयाल, ठुमरी और भजन गायन में सिद्ध विदुषी परवीन सुल्ताना का जन्म 14 जुलाई, 1950 असम के नौगांव जिलान्तर्गत डाकापट्टी नामक स्थान पर एक संगीत-प्रेमी परिवार में हुआ था। संगीत की प्रारम्भिक शिक्षा उन्हें अपने पिता इकरामुल मजीद और दादा मोहम्मद नजीब खाँ से प्राप्त हुई। बाद में 1973 से कोलकाता के सुप्रसिद्ध गुरु पण्डित चिन्मय लाहिड़ी से उन्हें संगीत का विधिवत मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। पटियाला घराने के गायक उस्ताद दिलशाद खाँ से भी उन्हें संगीत की बारीकियाँ सीखने का अवसर मिला। आगे चल इन्हीं दिलशाद खाँ से उनका विवाह भी हुआ। परवीन सुल्ताना ने पहली मंच-प्रस्तुति 1962 में मात्र 12 वर्ष की आयु में दी थी। 1965 से ही उनके ग्रामोफोन रेकार्ड बनने लगे थे। उन्होने कई फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया है। फिल्म दो बूँद पानी, पाकीजा, कुदरत और गदर के गाये गीत अत्यन्त लोकप्रिय हुए थे। 1976 में मात्र 25 वर्ष की आयु में उन्हें ‘पद्मश्री’ सम्मान से नवाजा गया। 1981 में फिल्म ‘कुदरत’ में गाये गीत के लिए परवीन जी को श्रेष्ठ पार्श्वगायिका का फिल्मफेयर पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1986 में उन्हें तानसेन सम्मान और 1999 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला। इस वर्ष (2014) उन्हें ‘पद्मभूषण’सम्मान प्राप्त हुआ है। परवीन जी के गायन में उनकी तानें तीनों सप्तकों में फर्राटेदार चलती हैं। आइए इनकी आवाज़ में सुनते हैं राग मिश्र काफी की कृष्ण की छेड़छाड़ से युक्त, श्रृंगार रस प्रधान एक मोहक ठुमरी।


ठुमरी मिश्र काफी : ‘कैसी करी बरजोरी श्याम, देखो बहियाँ मोरी मरोरी...’ : विदुषी परवीन सुल्ताना




अभी आपने राग काफी की ठुमरी का रसास्वादन किया। गायन में स्वर संयोजन के साथ ही गीत के शब्द भी रस उत्पत्ति में सहयोगी होते है। किन्तु वाद्य संगीत में शब्द नहीं होते। राग काफी श्रृंगार रस के परिवेश को रचने में पूर्ण समर्थ है, इसे प्रत्यक्ष अनुभव करने के लिए अब हम आपको राग मिश्र काफी की ठुमरी का वादन सुनवाते हैं, वह भी पाश्चात्य संगीत वाद्य हवाइयन गिटार पर। दरअसल आज का पाश्चात्य हवाइयन गिटार प्राचीन भारतीय तंत्रवाद्य विचित्र वीणा का परिवर्तित रूप है। पिछले कुछ दशकों से कई भारतीय संगीतज्ञों ने गिटार में संशोधन कर उसे भारतीय संगीत के अनुकूल बनाया है। सुपरिचित संगीत विदुषी डॉ. कमला शंकर ने भारतीय संगीत के रागों के अनुकूल गिटार वाद्य में कुछ संशोधन किए हैं। कमला जी का गिटार बिना जोड़ की लकड़ी का बना हुआ है। इसमें स्वर और चिकारी के चार-चार तार तथा तरब के बारह तार लगे हैं। डॉ. कमला शंकर का जन्म 1966 में तमिलनाडु के तंजौर नामक जनपद में हुआ था। संगीत की पहली गुरु स्वयं इनकी माँ थीं। बाद में वाराणसी के पण्डित छन्नूलाल मिश्र से खयाल और ठुमरी की शिक्षा ग्रहण की। सुप्रसिद्ध सितारवादक विमलेन्दु मुखर्जी से कमला जी ने तंत्रवाद्य की बारीकियाँ सीखी। कमला जी हैं पहली महिला कलाकार हैं जिन्हें भारतीय संगीत के सन्दर्भ में पीएच डी की उपाधि मिली है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और विचित्र वीणा वादक डॉ. गोपाल शंकर मिश्र के निर्देशन में उन्होने अपना शोधकार्य किया। गिटार वादन के लिए उन्हें अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान मिल चुके हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ की आज की कड़ी में हम उनका गिटार पर बजाया राग मिश्र काफी की ठुमरी प्रस्तुत कर रहे हैं।


ठुमरी मिश्र काफी : गिटार वादन : डॉ. कमला शंकर




भारतीय उपशास्त्रीय संगीत की एक शैली है, टप्पा। अब हम आपको राग काफी का एक टप्पा सुनवाते हैं। इसे प्रस्तुत कर रही हैं, पूरब अंग की सुप्रसिद्ध गायिका डॉ. सोमा घोष। बनारस (वाराणसी) में जन्मी, पली-बढ़ी और अब मुम्बई में रह रही सोमा एक समय के महान फिल्मकार नवेन्दु घोष की पुत्रवधू है। संगीत की दुनिया में भी सोमा प्राचीन वाद्यों को प्रतिष्ठा दिलाने के लिए संघर्षरत है। उन्हें आज जो प्रतिष्ठा मिली है, उसके लिए वह डॉ. राजेश्वर आचार्य से मिली प्रेरणा को बहुत महत्त्वपूर्ण मानती है, जिन्होने सोमा जी को नौकरी न करने का सुझाव दिया था। विश्वविख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने सोमा जी की प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें अपनी दत्तक पुत्री बना लिया था। वर्ष 2001 के एक सांगीतिक आयोजन में उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ ने सोमा जी का गायन सुना और बड़े प्रभावित हुए। तभी उन्होंने कहा कि तुम मेरे साथ जुगलबन्दी करोगी। सोमा जी को बतौर बेटी अपनाने के पहले उन्होंने अपने पूरे परिवार को बताया और सबकी अनुमति ली। इसके बाद ही उन्होंने इसकी घोषणा की। खाँ साहब ने सोमा जी को अपनी कला विरासत का उत्तराधिकारी भी बनाया था। सोमा जी ने संगीत की शिक्षा सेनिया घराने के पण्डित नारायण चक्रवर्ती और बनारस घराने की विदुषी बागेश्वरी देवी जी से ली। वर्ष 2002 में मुंबई के एक समारोह में सोमा जी और उस्ताद बिस्मिल्लाह खाँ की ऐतिहासिक जुगलबन्दी हुई थी। उस आयोजन में अमिताभ बच्चन जी सपत्नीक टिकट लेकर आए थे। नौशाद साहब पहली पंक्ति के श्रोताओं में बैठे थे। सोमा जी ने खयाल गायकी को बिलकुल नई दिशा दी है और ठुमरी, होरी जैसी विधाओं को तो नई पीढ़ी के लिए नए ढंग से लोकप्रिय बनाया है। लीजिए, अब आप डॉ. सोमा घोष की आवाज़ में राग काफी का एक टप्पा सुनिए और स्वरों के माध्यम से फाल्गुनी परिवेश की सार्थक अनुभूति कीजिए। इसके साथ ही मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


टप्पा राग काफी : ‘वीरा दे जानियाँ रबी...’ : डॉ. सोमा घोष





आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 156वें अंक की पहेली में आज हम आपको कण्ठ संगीत की एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह संगीत की कौन सी शैली है? इस संगीत शैली का नाम बताइए।

2 – इस प्रस्तुति-अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और उनका नाम लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 158वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 154वीं कड़ी की पहेली में हमने आपको पण्डित लालमणि मिश्र द्वारा प्रस्तुत तंत्रवाद्य पर एक रचना का अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- विचित्र वीणा और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- राग बसन्त बहार। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर इन दिनों बसन्त ऋतु के फाल्गुनी परिवेश में गाये-बजाए वाले रागों पर चर्चा जारी है। अगले अंक में हम इस लघु श्रृंखला के अन्तर्गत एक और ऋतु प्रधान राग पर चर्चा करेंगे। इस लघु श्रृंखला के बाद हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 
 

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



Popular Posts सर्वप्रिय रचनाएँ