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Thursday, November 22, 2012

स्मृतियों के झरोखे से : अमित तिवारी की देखी पहली फिल्म 'बालिका वधु'


मैंने देखी पहली फ़िल्म : अमित तिवारी


भारतीय सिनेमा के शताब्दी वर्ष में ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ द्वारा आयोजित विशेष अनुष्ठान में प्रत्येक गुरुवार को हम आपके लिए सिनेमा के इतिहास पर विविध सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं। माह के दूसरे और चौथे गुरुवार को आपके संस्मरणों पर आधारित ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ का प्रकाशन करते हैं। आज माह का चौथा गुरुवार है, इसलिए आज बारी है आपकी देखी पहली फिल्म के रोचक संस्मरण की। आज हम प्रस्तुत कर रहे हैं, एक गैर-प्रतियोगी संस्मरण। आज का यह संस्मरण प्रस्तुत कर रहे हैं, रेडियो प्लेबैक इण्डिया के संचालक-मण्डल के सदस्य अमित तिवारी। 


सचमुच बहुत अच्छा लगता है, 'बालिका वधू' का गीत ‘बड़े अच्छे लगते हैं...’


मुझसे जब पुछा गया कि मेरी देखी पहली फिल्म कौन सी है तो मुझे दिमाग पर ज्यादा जोर डालने की जरूरत नहीं पड़ी। मेरी याद में जो मेरी देखी पहली फिल्म है , वो थी शशि कपूर, प्राण और सुलक्षणा पण्डित के अभिनय से सजी 1978 में प्रदर्शित हुई फिल्म 'फाँसी'। उस समय मैं करीब पाँच साल का था। मुझे इस फिल्म का केवल एक दृश्य याद है, जिसमे ट्रेन धड़धड़ाती दौड़ी जा रही है। परदे पर ट्रेन तिरछी दिखाई जाती है और डाकू उसमे चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। शायद डाकुओं के जीवन पर आधारित फिल्म थी जिसमें मार-पीट, ढिशुम-ढिशुम की भरमार थी।

बस इस फिल्म का यही एक दृश्य याद है। बाकी कहानी क्या थी, पता नहीं। करीब बीस वर्षों के बाद इस फिल्म को दूरदर्शन पर देखने का मौका मिला, पर आज भी मानस -पटल पर यही एक दृश्य अंकित है और बाकी कहानी भूल चूका हूँ। अब चूँकि आज इसके बारे में लिख रहा हूँ तो कोशिश करूँगा कि इसे दुबारा देख सकूँ। बचपन में फ़िल्में देखना एक सपना हुआ करता था। फ़िल्में देखना अच्छा नहीं माना जाता था और मैं भी और बच्चों की तरह सोचा करता था कि जब बड़ा हो जाऊँगा तो रोजाना ढेर सारी फिल्में देखा करूँगा। और हाँ, मेरी वह सोच सच साबित भी हुई। वैसे भी मैं एक छोटे से कस्बे का रहने वाला था, जहाँ सिनेमा हॉल नहीं था। जब कभी हम ननिहाल छुट्टियों में जाते थे तो सिनेमा हॉल के दर्शन हो जाया करते थे। टेलीविजन भी उस समय शुरु नहीं हुआ था।

1983 में दो और फिल्मे देखने का मौका मिला, और वो थीं- अमोल पालेकर और टीना मुनीम अभिनीत 'बातों बातों में' और अभिताभ के अभिनय से सजी 'अन्धा क़ानून'। नियमित रूप से फिल्मे देखने का मौका मिला 1985 में, जब दूरदर्शन पर रविवार की शाम फिल्म 'बालिका वधू' देखी। एक बेहतरीन फिल्म थी, जिसे अब तक 3-4 बार मैं देख चुका हूँ। तब से अब तक तो अनगिनत फिल्मे देख चुका हूँ, लेकिन मेरी पहली फिल्म तो 'फाँसी' ही रहेगी।

अमित जी को फाँसी फिल्म का कोई भी गाना याद नहीं रहा परन्तु हम आपके साथ अमित जी को भी फिल्म 'फाँसी' का एक लोकप्रिय गीत सुनवाते हैं। इसके साथ ही अमित जी का एक और प्रिय गीत, जो फिल्म 'बालिका बधू' से है, उसे भी हम प्रस्तुत कर रहे हैं।

फिल्म फाँसी : ‘जब आती होगी याद मेरी...’ : मोहम्मद रफी और सुलक्षणा पण्डित


फिल्म बालिका बधू : ‘बड़े अच्छे लगते हैं...’ : अमित कुमार



आपको अमित जी की देखी पहली फिल्म का संस्मरण कैसा लगा? हमें अवश्य लिखिएगा। आप अपनी प्रतिक्रिया radioplaybackindia@live.com पर भेज सकते हैं। रेडियो प्लेबैक इण्डिया के सभी पाठकों-श्रोताओं को हम यह शुभ समाचार देना चाहते हैं कि 1 दिसम्बर को रेडियो प्लेबैक इण्डिया का स्थापना दिवस है। आपके सुझावों के अनुसार दिसम्बर से हम ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ के स्वरूप में परिवर्तन कर रहे है। दिसम्बर से प्रत्येक दूसरे और चौथे गुरुवार को हम ‘मन्थन’ शीर्षक से एक नया स्तम्भ आरम्भ करेंगे। ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ स्तम्भ को हम आज के इस अंक से विराम दे रहे हैं। अगले गुरुवार को हम ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता का परिणाम घोषित करेंगे। ‘मैंने देखी पहली फिल्म’ प्रतियोगिता के विजेताओं का नाम जानने के लिए अगले गुरुवार को इस मंच पर आप सादर आमंत्रित हैं।

प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Monday, May 25, 2009

सफल 'हुई' तेरी आराधना - अंतिम कडी

अब तक आपने पढ़ा -

आनंद आश्रम से शुरू हुआ सफ़र...., हावड़ाब्रिज से कश्मीर की कली तक... ,रोमांटिक फिल्मों के दौर में आराधना की धूम..., और अमर प्रेम, अजनबी और अनुराग जैसी कामियाब फिल्मों का सफ़र अब पढें आगे....


शक्ति सामंत को समर्पित 'आवाज़' की यह प्रस्तुति "सफल हुई तेरी आराधना" एक प्रयास है शक्तिदा के 'फ़िल्मोग्राफी' को बारीक़ी से जानने का और उनके फ़िल्मों के सदाबहार 'हिट' गीतों को एक बार फिर से सुनने का। पिछले अंक में हमने ज़िक्र किया था १९७४ की फ़िल्म 'अजनबी' का। आइए अब आगे बढ़ते हैं और क़दम रखते हैं सन १९७५ में। यह साल भी शक्तिदा के लिए एक महत्वपूर्ण साल रहा, इसी साल आयी फ़िल्म 'अमानुष' जिसका निर्माण व निर्देशन दोनो ही उन्होने किया। पहली बार बंगला के सर्वोत्तम नायक उत्तम कुमार को लेकर उन्होने यह फ़िल्म बनायी, साथ में थीं उनकी प्रिय अभिनेत्री शर्मिला। इसी फ़िल्म के बारे में बता रहे हैं ख़ुद शक्तिदा - "१९७२ में कलकत्ता में 'नक्सालाइट' का बहुत ज़्यादा 'प्राबलेम' शुरु हो गया था। कलकत्ता फ़िल्म इंडस्ट्री का बुरा हाल था। उससे पहले उत्तमदा ने एक 'पिक्चर' यहाँ बनाई थी 'छोटी सी मुलाक़ात' जो शायद अच्छी नहीं चली थी, या जो भी थी, 'He couldn't establish himself yet'। तो एक दिन रात को उन्होने ऐसे ही कह दिया कि 'क्या मैं दोबारा यहाँ पे आ नहीं सकता हूँ?' मैने कहा 'ज़रूर, मैं आपको लेकर एक 'पिक्चर' बनाउँगा'। तो मैने सोचा कि यह बंगला 'पिक्चर' है तो ज़्यादातर 'आर्टिस्ट्स' वहीं के ले लूँ। कुछ यहाँ के 'आर्टिस्ट्स' को छोड़कर सब वहाँ के 'आर्टिस्ट्स' को मैने लिया। और भगवान की दया से वह पिक्चर भी चल पड़ी।"

'अमानुष' फ़िल्म की 'शूटिंग भी रोमांच से भरा हुआ था। इस फ़िल्म को 'शूट' करने के लिए शक्तिदा अपनी पूरी टीम को लेकर बंगाल के सामुद्रिक इलाके 'सुंदरबन' गए जो 'रायल बेंगाल टाइगर' के लिए प्रसिद्ध है। पूरी टीम के लिए वह एक अविस्मरणीय यात्रा रही। वहाँ पर सिर्फ़ एक ऐसी जगह थी जहाँ शेर नहीं आ सकते थे। एक छोटा सा द्वीप जिसके चारों तरफ़ सिर्फ़ पानी ही पानी। वहाँ पर १५० लोगों के रहने लायक तंबू लगाये गये थे और 'मोटर बोट्स' की सहायता से सामानों का आवाजाही हो रहा था। उन लोगों ने साफ़ देखा की पानी में छोटी छोटी 'शार्क' मछलियाँ तैर रही हैं। इसलिए उन्हे यह निर्देश था कि कोई भी पानी में ना उतरें। साथ ही यह भी बताया गया था कि रात में कोई तंबू से बाहर ना निकले, यहाँ तक कि हाथ भी तंबू से बाहर ना निकालें क्युंकि एक ताज़े माँस के टुकड़े के लिए ख़ूंखार शेर पानी में डुबकी लगाए छुपे होते हैं। 'अमानुष' के शुरुआती दिनों में शक्तिदा उत्तम कुमार के घर ख़ूब जाया करते थे। उन्ही के घर पर वो गायक संगीतकार श्यामल मित्रा से मिले, और वहीं पर उन्होने श्यामलदा से निवेदन किया कि वो इस फ़िल्म के गीतों को स्वरबद्ध करें। श्यामल मित्रा इस बात पर राज़ी हुए कि गीतों के बोल अच्छे स्तर के होने चाहिए।

गीत: दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा (अमानुष)


'अमानुष' फ़िल्म में गीत लिखे थे इंदीवर साहब ने। कितनी अजीब बात है कि 'अमानुष' के इस 'हिट' गीत के लिए गीतकार इंदीवर और गायक किशोर कुमार को 'फ़िल्म-फ़ेयर अवार्ड' से सम्मानित किया गया, लेकिन संगीतकार श्यामल मित्रा वंचित रह गये। ख़ुशी फिर भी इस बात की रही कि हिंदी फ़िल्मों के पहली ब्रेक में ही उन्होने अपार सफलता हासिल की। हिंदी फ़िल्मों में आने से पहले वे बंगाल के जानेमाने गायक और संगीतकार बन चुके थे। फ़िल्म 'अमानुष' में इस तरह के असाधारण गाने लिखने के बाद शक्तिदा इंदीवर साहब के 'फ़ैन' बन गए। लेकिन क्या आपको पता है कि इंदीवर का लिखा कौन सा गाना शक्तिदा को सबसे ज़्यादा पसंद था? वह गीत था १९५४ की फ़िल्म 'बादबान' का। यह गीत सुनने से पहले आपको यह भी बता दें कि इस फ़िल्म के संवाद और स्क्रीनप्ले शक्तिदा ने ख़ुद लिखे थे जो उन दिनो निर्देशक फणी मजुमदार के सहायक के रूप में काम कर रहे थे बौम्बे टाकीज़ में। बौम्बे टाकीज़ की आर्थिक अवस्था बहुत ख़राब हो चुकी थी। यह फ़िल्म इस कंपनी में काम करने वाले मज़दूरों के लिए बनाई गयी थी, जिसके लिए किसी भी कलाकार ने कोई पैसे नहीं लिए। अशोक कुमार, देव आनंद, लीला चिटनिस, उषा किरन जैसे कलाकारों ने इस फ़िल्म में काम किया था। संगीतकार थे तिमिर बरन और एस. के पाल। अभी उपर इंदीवर के लिखे जिस गीत का ज़िक्र हम कर रहे थे, उसे गाया था गीता दत्त ने, और एक वर्ज़न हेमन्त कुमार की आवाज़ में भी था। सुनिए गीताजी की वेदना भरी आवाज़ में "कैसे कोई जीये ज़हर है ज़िंदगी"।

गीत: कैसे कोई जियें ज़हर है ज़िंदगी (बादबान)


अमानुष के बाद ७० के दशक के आख़िर के चंद सालों में भी शक्तिदा के फ़िल्मों का जादू वैसा ही बरक़रार रहा। निर्माता-निर्देशक के रूप मे १९७७ मे उनकी फ़िल्म आयी 'आनंद आश्रम' जो 'अमानुष' की ही तरह बंगाल के पार्श्वभूमि पर बनाया गया था। इस फ़िल्म का निर्माण बंगला में भी किया गया था, और इस फ़िल्म मे भी उत्तम कुमार और शर्मिला टैगोर ने अभिनय किया था। बतौर निर्माता, शक्तिदा ने १९७६ मे फ़िल्म 'बालिका बधु' का निर्माण किया, जिसका एक बार फिर बंगाल की धरती से ताल्लुख़ था। शरतचंद्र की बंगला उपन्यास पर आधारित इस फ़िल्म को निर्देशित किया था तरु मजुम्दार ने और फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे सचिन और रजनी शर्मा। गाने लिखे आनंद बक्शी ने और संगीत दिया राहुल देव बर्मन ने। इस फ़िल्म मे आशा भोसले, मोह्द रफ़ी, किशोर कुमार, अमित कुमार और चंद्राणी मुखर्जी ने तो गीत गाये ही थे, ख़ास बात यह है कि इस फ़िल्म मे आनद बक्शी, आर.डी. बर्मन और उनके सहायक और गायक सपन चक्रवर्ती ने भी गानें गाये, और वह भी अलग अलग एकल गीत। इस फ़िल्म का मशहूर होली गीत हमने 'ओल्ड इज़ गोल्ड' मे आपको सुनवा ही चुके हैं। बतौर निर्देशक, शक्तिदा ने १९७६ मे 'महबूबा', १९७७ में 'अनुरोध' और १९७९ मे 'दि ग्रेट गैम्बलर' जैसी सफल फ़िल्मों का निर्देशन किया। ये सभी फ़िल्में अपने ज़माने की सुपरहिट फ़िल्में रहीं हैं। वह दौर ऐसा था दोस्तों कि सफल फ़िल्में कहें या शक्तिदा की फ़िल्में कहें, मतलब एक ही निकलता था।

गीत: आप के अनुरोध पे मैं यह गीत सुनाता हूँ (अनुरोध)


८० के दशक के आते आते फ़िल्मों का मिज़ाज बदलने लगा था। कोमलता फ़िल्मों से विलुप्त होती जा रही थी और उनकी जगह ले रहा था 'ऐक्शन' फ़िल्में। बावजूद इस बदलती मिज़ाज के, शक्तिदा ने अपना वही अंदाज़ बरक़रार रखा। इस दशक मे जिन हिंदी फ़िल्मों के वो निर्माता-निर्देशक बने, वो फ़िल्में थीं 'बरसात की एक रात', 'अय्याश', और 'आर-पार'। इन फ़िल्मों के अलावा उन्होने 'आमने सामने', 'मैं आवारा हूँ', 'पाले ख़ान' और 'आख़िरी बाज़ी' जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया, तथा 'ख़्वाब', 'आवाज़', और 'अलग अलग' जैसी फ़िल्मों का निर्देशन भी किया। ९० के दशक मे 'गीतांजली' फ़िल्म के वो निर्माता-निर्देशक रहे, तथा 'आँखों में तुम हो' का निर्माण किया व 'दुश्मन' का निर्देशन किया।

शक्ति दा आज इतनी दूर चले गये हैं लेकिन जो काम वो कर गये हैं, उसकी लौ हमेशा नयी पीढ़ी को राह दिखाती रहेगी, नये फ़िल्मकारों को अच्छी फ़िल्में बनाने की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी। दूसरे शब्दों में उनकी आराधना ज़रूर सफल होगी। चलते चलते उनकी फ़िल्म 'आनंद आश्रम' के शीर्षक गीत का मुखड़ा याद आ रहा है "सफल वही जीवन है, औरों के लिए जो अर्पण है"। शक्तिदा ने भी अपना पूरा जीवन फ़िल्म जगत को और पूरे समाज को सीख देनेवाली अच्छी अच्छी फ़िल्में देते हुए गुज़ार दिये। शक्तिदा को हिंद युग्म की तरफ़ से भावभीनी श्रद्धाजंली।

५ अंकों के इस पूरे आलेख को तैयार करने में विविध भारती के निम्नलिखित कार्यक्रमों से जानकारियाँ बटोरी गयीं:

१. युनूस ख़ान द्वारा प्रस्तुत शक्तिदा को श्रद्धांजलि - "सफल होगी तेरी आराधना"
२. कमल शर्मा से की गयी शक्तिदा की लम्बी बातचीत - "उजाले उनकी यादों के"
३. शक्तिदा द्वारा प्रस्तुत फ़ौजी भाइयों के लिए "विशेष जयमाला" कार्यक्रम


प्रस्तुति: सुजॉय चटर्जी
समाप्त



Wednesday, March 11, 2009

सुनिए सपन चक्रवर्ती की आवाज़ में एक दुर्लभ होली गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 20
होली विशेषांक
वाज़ के आप सभी पाठकों और श्रोताओं को रंगों के इस त्यौहार होली पर हमारी ओर से बहुत बहुत शुभकामनाएँ. होली का यह त्यौहार आपके जीवन को और रंगीन बनाए, आपके सभी सात रंगोंवाले सपने पूरे हों, ऐसी हम कामना करते हैं. दोस्तों, हिन्दी फिल्मों में जब भी कभी होली की 'सिचुयेशन' आयी है, तो फिल्मकारों ने उन उन मौकों पर अच्छे अच्छे से होली गीत बनाने की कोशिश की है और उनका फ़िल्मांकन भी बडे रंगीन तरीके से किया है. या यूँ कहिए की हिन्दी फिल्मी गीतों में होली पर बेहद खूबसूरत खूबसूरत गाने बने हैं जिन्हे होली के दिन सुने बिना यह त्यौहार अधूरा सा लगता है. और आज होली के दिन 'ओल्ड इस गोल्ड' में अगर हम कोई होली गीत ना सुनवाएँ तो शायद आप में से कई श्रोताओं को हमारा यह अंदाज़ अच्छा ना लगे. इसलिए आज 'ओल्ड इस गोल्ड' में पेश है होली की हुडदंग. यूँ तो होली पर बने फिल्मी गीतों की कोई कमी नहीं है, एक से एक 'हिट' होली गीत हमारे पास हैं, लेकिन 'ओल्ड इस गोल्ड' की यह रवायत है की हम उसमें ऐसे गीत शामिल करते हैं जो कुछ अलग "हट्के" हो, थोडे अनोखे हो, कोई अलग बात हो. इसलिए हमने जो होली गीत चुना है वो ना तो फिल्म "शोले" का है और ना ही फिल्म "पराया धन" का, ना वो "मदर इंडिया" का है, और ना ही "मशाल" का. यह गीत है 1976 में बनी फिल्म "बालिका वधु" का. इससे पहले की इस गीत से संबंधित कुछ बातें आपको बताएँ, क्यूँ ना थोड़ी देर के लिए हिन्दी फिल्मों में होली गीतों के इतिहास में झाँक लिया जाए! 30 के दशक में फिल्मी होली गीतों के बारे में तो मैं कुछ ढूँढ नहीं पाया, लेकिन क्योंकि उस वक़्त ठुमरी का काफ़ी चलन था फिल्म संगीत में और ठुमरी का अर्थ ही है कृष्ण से संबंधित गीत, तो ज़ाहिर है की ठुमरी के रूप में ज़रूर होली गीत भी रहे होंगे. जो सबसे पुराना होली गीत मुझे प्राप्त हुआ वो है 1940 की फिल्म "होली" में ए आर ओझा और सितारा का गाया "फागुन की रुत आई रे", जिसके संगीतकार थे खेमचंद प्रकाश. और फिर लता मंगेशकर का पहला गाना "पा लागूँ कर ज़ोरी रे, श्याम मोसे ना खेलो होरी" भी तो एक होली गीत था, फिल्म "आप की सेवा में", जो आई थी 1947 में. 1950 की फिल्म "जोगन" में गीता रॉय ने बहुत सारे मीरा भजन गाये, साथ ही साथ पंडित इंद्रा के लिखे दो होरी गीत भी गाये जिनके बोल थे “चंदा खेले आँख मिचोली बदली से नदी किनारे, दुल्हन खेले फागुन होली पिया करो ना हमसे ठिठोली” और “डारो रे रंग डारो रे रसिया फागुन के दिन आए रे”. गीता रॉय की ही आवाज़ में 1953 की फिल्म "लाडली" में एक होली गीत था “बाट चलत नयी चुनरी रंग डारी, हे तोहे बेदर्दी बनवारी”. और फिर 1957 में "मदर इंडिया" में शक़ील बदयुनीं ने लिखा “होली आई रे कन्हाई रंग छलके सुना दे ज़रा बाँसुरी”. यह गीत बेहद मशहूर हो गया और इसके बाद तो जैसे फिल्मों में होली गीतों का तांता लग गया.

तो इतनी जानकारी के बाद अब हम वापस आते हैं बालिका वधु फिल्म के होली गीत पर. शक्ति सामंता ने इस फिल्म का निर्माण किया था इसी नाम से लिखी गयी शरतचंद्रा चट्टोपाध्याय की प्रसिद्ध बांग्ला उपन्यास के आधार पर. तरु मजूमदार निर्देशित इस फिल्म के मुख्य कलाकार थे सचिन और रजनी शर्मा. गाने लिखे आनंद बक्शी ने और संगीतकार थे राहुल देव बर्मन. इस फिल्म में आशा भोंसले, मोहम्मद रफी, किशोर कुमार,अमित कुमार और चंद्राणी मुखेर्जी ने तो गीत गाए ही थे, ख़ास बात यह है कि इस फिल्म में आनंद बक्शी,राहुल देव बर्मन और उनके सहायक सपन चक्रवर्ती ने भी गाने गाए, और वो भी अलग अलग एकल गीत. प्रस्तुत होली गीत सपन चक्रवर्ती और साथियों की आवाज़ों में है. राहुल देव बर्मन अगर चाहते तो किसी भी नामी गायक से इस गीत को गवा सकते थे. लेकिन उन्हे लगा कि गाँव की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म के होली गीत के गायक की आवाज़ कुछ ऐसी अलग होनी चाहिए, एक ऐसी आवाज़ जो धरती के बहुत करीब लगे, लोक संगीत और ख़ास कर होली पर गाए जानेवाले लोकसंगीत के गायक की तरह लगे. बस, पंचम दा ने अपने सहायक और गायक सपन चक्रवर्ती से यह गीत गवा लिया और सचमुच उन्होने जैसा सोचा था, सपन चक्रवर्ती की आवाज़ ने बिल्कुल वैसा ही जादू कर डाला इस गीत में. आज भले ही यह गीत दूसरे होली गीतों की तुलना में बहुत ज़्यादा सुनाई ना दे, लेकिन होली पर बना यह एक अनूठा फिल्मी गीत है, और हमें पूरा यकीन है कि हमारी यह पसंद आपकी भी पसंद होगी. तो सुनिए "आओ रे आओ खेलो होली बिरज में".



गीत सुनकर मस्ती छा गयी होगी...है न...भाई अब होली हो और कोई छेड़खानी या मस्ती न हो तो क्या है मज़ा. "ओल्ड इस गोल्ड" के तेंदुलकर की उपाधि से सम्मानित हमारे प्रिय मनु "बे-तक्ख्ल्लुस" जी लाये हैं कुछ कार्टूनों के गुलाल और गुब्बारे. चलिए तैयार हो जाईये भाई....होली है....

पहला गुब्बारा आपके लिए है "तन्हा" जी


नीलम जी आप कहाँ जा रही हैं बच के


अरे भाई इन्होने तो मुझे भी नहीं छोडा


सुजॉय आप कहाँ छुपे बैठे हैं रंग जाईये आज आप भी इस रंग में



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. दिलीप कुमार और नलनी जयवंत पर फिल्मांकित है ये गीत.
२. टीम है शैलेन्द्र, शंकर जयकिशन, लता और तलत की.
३. गीत में शब्द युगल है - "फूल खिले".

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
उज्जवल जी, आचार्य जी और मनु जी...गलत जवाब....दूसरा सूत्र देखिये...कटी पतंग नाम का कोई धरावाहिक नहीं आता :). चलिए होली में सब माफ़ है.ये होली गीत कैसा लगा अवश्य बताईयेगा.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी


ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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