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Saturday, July 18, 2009

आजा सनम मधुर चांदनी में हम तुम मिले तो वीराने में भी आ जायेगी बहार....

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 145

१९५६ का साल संगीतकार शंकर जयकिशन के लिए एक बहुत कामयाब साल रहा। इस साल उनके संगीत से सजी फ़िल्में आयी थीं - बसंत बहार, चोरी चोरी, हलाकू, क़िस्मत का खेल, न्यु डेल्ही, पटरानी, और राजहठ। 'क़िस्मत का खेल' को छोड़कर बाक़ी सभी फ़िल्में हिट रहीं। दक्षिण का मशहूर बैनर ए.वी.एम की फ़िल्म थी 'चोरी चोरी' जो अंग्रेज़ी फ़िल्म 'रोमन हौलिडे' पर आधारित थी। अनंत ठाकुर ने फ़िल्म का निर्देशन किया और यह फ़िल्म राज कपूर और नरगिस की जोड़ी की आख़िरी फ़िल्म थी। फ़िल्म की एक और ख़ास बात कि इस फ़िल्म ने संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन को दिलवाया उनके जीवन का पहला फ़िल्म-फ़ेयर पुरस्कार। शैलेन्द्र और हसरत जयपुरी साहब के गानें थे और मुकेश के बदले मन्ना डे से राज कपूर का पार्श्वगायन करवाया गया, जिसके बारे में मन्ना दा के उद्‍गार हम पहले ही आप तक पहुँचा चुके हैं 'राज कपूर विशेष' के अंतर्गत। आज 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में सुनिये 'चोरी चोरी' फ़िल्म से लता मंगेशकर और मन्ना डे का गाया एक बड़ा ही सदाबहार रोमांटिक युगल गीत। चांदनी रात में दो प्यार करनेवाले किस तरह से वीराने को बहार में परिवर्तित कर सकते हैं, उसी का बखान किया है हसरत साहब ने अपनी इस सुमधुर रचना में। "आजा सनम मधुर चांदनी में हम तुम मिले तो वीराने में भी आज आयेगी बहार, झूमने लगेगा आसमान"। ५ दशक से भी उपर हो गया है इस गीत को बने हुए, लेकिन क्या इस गीत को कोई भुला पाया है आज तक? कभी नहीं। यह गीत आज भी उतना ही तरोताज़ा है, इसकी महक आज भी उसी तरह से बिखर रही है दुनिया की फिजाओं में। लता जी और मन्ना दा के गाये लोकप्रिय युगल गीतों की अगर सूची बनायी जाये तो इस गीत का क्रमांक यक़ीनन शीर्ष की तरफ़ ही रहेगा।

फ़िल्म 'चोरी चोरी' में लता-मन्ना के गाये कुल तीन युगल गीत थे और ये तीनों गीत बहुत कामयाब रहे। प्रस्तुत गीत के अलावा "जहाँ मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो" और "ये रात भीगी भीगी" को भी अपार शोहरत हासिल हुई। इन गीतों में समानता यह है कि इन तीनों के मुखड़े बहुत ज़्यादा लम्बे हैं, जो उस समय के प्रचलित धारा से हट के था। प्रस्तुत प्रेम गीत को सुनने से पहले जान लेते हैं शंकर जी के चंद शब्द जिनमें वो बता रहे हैं कि ऐसे अच्छे प्रेम गीत को बनाने के लिए संगीत के साथ प्रेम होना कितना ज़रूरी होता है - "आप को शायद मालूम होगा या किसी पेपर में पढ़ा होगा कि मुझे कसरत का भी बड़ा शौक था। और उस वक़्त मैं कसरत भी करता था, कुश्ती भी लड़ता था। यह मेरे ख़याल से आप को ख़ुशी होगी जानकर कि संगीतकार पहलवान भी था। लेकिन उस कुश्ती के साथ साथ मैने छोटेपन से संगीत में भी बड़ी मेहनत की है, उसमें भी कुश्ती की है मैने। लेकिन संगीत की कुश्ती आम कुश्ती की तरह नहीं होती। यह तो प्यार और मोहब्बत से होती है। और संगीत जो है ये हाथ और ताक़त से नहीं चलती है। संगीत आप जितने प्यार से बना सकते हैं, जितना प्यार आप दे सकते हैं, उतना ही संगीत में आनंद और मज़ा आता है।" सच में दोस्तो, शंकर जयकिशन ने अपने संगीत से जिस तरह का प्यार किया है, यही कारण है कि उनका संगीत सदा हिट रहा, आज भी हिट है, और आगे आने वाली कई पीढ़ियों तक हिट रहेगा। इस जोड़ी की संगीत साधना को सलाम करते हुए सुनते हैं "आजा सनम मधुर चांदनी में हम"।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा पहला "गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. कल गुलज़ार साहब पहली बार आयेंगें ओल्ड इस गोल्ड की महफिल में, यानी ये गीत है उनका लिखा हुआ.
2. इस फिल्म का और मशहूर गीत मन्ना डे की आवाज़ में है पर इस गीत को उस गायक ने गाया है जिसने ओल्ड इस गोल्ड की १४२ वीं महफिल आबाद की थी.
3. मुखड़े में शब्द है -"धूप".

पिछली पहेली का परिणाम -
दिशा जी समय पर तो आई पर जवाब सही देने में फिर चूक गयी. स्वप्न जी ३२ अंकों की बधाई और साथ में इस बात की भी कि शैल साहब घर वापस आ गए हैं. हाँ आपकी जानकारी के लिए बता दें कि शरद जी के पसंदीदा गीत अभी शुरू नहीं हुए हैं, आपके उनके चुने हुए गीत सुन सकेंगें एपिसोड १७६ से १८० तक तो थोडा सा इंतज़ार और....दिलीप जी हमेशा सही बात उठाते हैं, आप जब प्रस्तुत गीत पर टिपण्णी करते हैं तो बहुत अच्छा लगता है.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, April 26, 2009

चंदा मामा मेरे द्वार आना...बच्चों के साथ बच्ची बनी आशा की आवाज़ में ये स्नेह निमंत्रण

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 62

साधारणत: हिन्दी फ़िल्मों के विषय नायक और नायिका को केन्द्र में रख कर ही चुने जाते हैं। लेकिन नायक-नायिका की प्रेम-कहानी के बिना भी सफ़ल फ़िल्में बनाई जा सकती है ये हमारे फ़िल्मकारों ने समय समय पर साबित किया है। ऐसी ही एक फ़िल्म है 'लाजवंती' जिसमें एक माँ और उसकी छोटी सी बच्ची के रिश्ते को बड़ी संवेदनशीलता से दर्शाया गया है। दोस्तों, मैने यह फ़िल्म बहुत साल पहले दूरदर्शन पर देखी था और जितना मुझे याद आ रहा है, इस फ़िल्म की कहानी कुछ इस तरह की है कि ग़लतफ़हमी का शिकार पति (बलराज साहनी) अपनी पत्नी (नरगिस) को घर से निकाल देता है और इस तरह से माँ अपनी बेटी (बेबी नाज़) से भी अलग हो जाती है। थोड़े दिनो के बाद पति-पत्नी की ग़लतफ़हमी दूर हो जाती है और वो घर भी वापस आ जाती है लेकिन बेटी के दिल में तब तक अपनी माँ के लिए इतना ज़हर भर चुका होता है कि यही फ़िल्म का मुख्य मुद्दा बन जाता है। अंततः जब बेटी को सच्चाई का पता चलता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है क्योंकि तब तक नरगिस आत्महत्या के लिए निकल पड़ती है। नरगिस खाई में छलांग लगाने ही वाली है कि पीछे से उसकी बेटी उसे "माँ" कहकर पुकारती है और इस तरह से माँ-बेटी के पुनर्मिलन के साथ फ़िल्म का सुखांत होता है।

१९५८ की फ़िल्म 'लाजवंती' में सचिन देव बर्मन का संगीत था और इस फ़िल्म के ज़्यादातर गीतों को आशा भोंसले ने गाया था । "कोई आया धड़कन कहती है", "कुछ दिन पहले एक ताल में कमलकुंज के अंदर रहता था एक हंस का जोड़ा" और "गा मेरे मन गा, यूहीं बिताये जा दिन ज़िन्दगी के" जैसे गीत बेहद मशहूर हैं। सन १९५७ में लता मंगेशकर और सचिन देव बर्मन के बीच कुछ ग़लतफ़हमी हो गई थी जिसकी वजह से दोनों ने एक दूसरे के साथ काम करना बंद कर दिया था। इस ग़लतफ़हमी की पूरी कहानी हम किसी और दिन आपको तफ़सील से बताएँगे। तो इस ग़लतफ़हमी की वजह से दादा बर्मन लताजी के बजाये आशाजी से गाने गवा रहे थे। 'लाजवंती' इसी दौरान बनी फ़िल्म थी और शायद यही वजह रही होगी कि दादा ने इस फ़िल्म का एक भी गाना लताजी से नहीं गवाया। आज इस फ़िल्म से हम आपको सुनवा रहे हैं आशा भोंसले और साथियों का गाया एक बच्चोंवाला गाना और गाने के बोल हैं "चंदामामा मेरे द्वार आना"। यह लीजिये, यह तो तुकबंदी भी हो गई। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे इस गीत में परदे पर बेबी नाज़ और दूसरे बच्चों को स्कूल के किसी जलसे में स्टेज पर गाते और नृत्य करते हुए दिखाया गया है। तो सुनिये यह गीत और याद कीजिये अपने स्कूल के दिनो को और अपने स्कूल के वार्षिक जलसों को...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. साहिर के बोल और रोशन का संगीत.
२. लता की जादूई आवाज़.
३. गीत शुरू होता है इस शब्द से - "दुनिया"

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
जहाँ पिछली बार ढेरों विजेता थे इस बार एक भी नहीं...गीत मुश्किल था, इस कारण सभी को माफ़ी दी जाती है....

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Wednesday, April 15, 2009

आजा रे अब मेरा दिल पुकारा...- लता-मुकेश का एक बेमिसाल युगल गीत

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 52

ले ही आज की फ़िल्मों में दर्द भरे गानें ज़्यादा सुनने को नहीं मिलते, लेकिन एक दौर ऐसा भी रहा है कि जब हर फ़िल्म में कम से कम एक ग़मज़दा नग्मा ज़रूरी हुआ करता था। दर्द भरे गीतों का एक अलग ही मुक़ाम हुआ करता था। ऐसे गीतों के साथ लोग अपना ग़म बांट लिया करते थे, जी हल्का कर लिया करते थे। युं तो ३० और ४० के दशकों में बहुत सारे दर्दीले नग्में बने और ख़ूब चले, ५० के दशक के आते आते जब नये नये संगीतकार फ़िल्म जगत में धूम मचा रहे थे, तब दूसरे गीतों के साथ साथ दुख भरे गीतों का भी मिज़ाज कुछ बदला। शंकर जयकिशन फ़िल्म संगीत में जो नई ताज़गी लेकर आए थे, वही ताज़गी उनके ग़मज़दा गीतों में भी बराबर दिखाई दी। १९५१ में राज कपूर और नरगिस की फ़िल्म 'आवारा' में हसरत जयपुरी का लिखा, शंकर जयकिशन क संगीतबद्ध किया, और लता मंगेशकर का गाया "आ जाओ तड़पते हैं अरमान अब रात गुज़रनेवाली है" बहुत बहुत लोकप्रिय हुआ था। "चांद की रंगत उड़ने लगी, वो तारों के दिल अब डूब गए, घबराके नज़र भी हार गई, तक़दीर को भी नींद आने लगी", अपने साथी के इंतज़ार की यह पीड़ा बिल्कुल जीवन्त हो उठी है हसरत साहब के इन शब्दों में। इस गीत का असर कुछ इस क़दर हुआ कि राज कपूर की अगली ही फ़िल्म 'आह' में भी उन्होने हसरत साहब से ऐसा ही एक गीत लिखवाया। इस बार गीत एकल नहीं बल्कि लताजी और मुकेश साहब की युगल आवाज़ों में था। और यही गीत आज पेश-ए-खिदमत है 'ओल्ड इज़ गोल्ड' में।

१९५३ की फ़िल्म 'आह' में राज कपूर के साथ नरगिस की जोड़ी एक बार फिर नज़र आयीं। यह फ़िल्म 'आवारा' की तरह 'बॉक्स औफ़िस' पर कामयाबी के झंडे तो नहीं गाढ़े लेकिन जहाँ तक इसके संगीत का सवाल है, तो इसके गाने गली गली गूंजे, और आज भी कहीं ना कहीं से अक्सर सुनाई दे जाते हैं। प्रस्तुत गीत "आजा रे अब मेरा दिल पुकारा" फ़िल्मी गीतों के इतिहास का वह मोती है जिसको अच्छे संगीत के क़द्र्दानों ने आज भी अपने दिलों में बसा रखा है, और आज ५५ साल बाद भी इस मोती की वही चमक बरक़रार है। इस गीत की ख़ासीयत यह है कि बहुत कम साज़ों का इस्तेमाल किया है शंकर जयकिशन ने, मुख्य रूप से मटके का सुंदर प्रयोग हुआ है। लताजी के गाया अलाप इस गीत को और भी ज़्यादा असरदार बना देते हैं। और जुदाई के दर्द को बयां करते हसरत साहब के बोलों के तो क्या कहने, बस गीत सुनिये और ख़ुद ही महसूस कीजिये।



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाईये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं -

१. दत्ता राम, हसरत जयपुरी और मुकेश की टीम.
२. १९५८ में आई इस फिल्म के नाम पर एक और फिल्म बनी जिसमें अमिताभ बच्चन थे.
३. पहला अंतरा इस शब्द से शुरू होता है -"वादे..."

कुछ याद आया...?

पिछली पहेली का परिणाम -
पहेली कुछ आसान थी. इसी बहाने हमें मिला एक नया विजेता - सुमित भारद्वाज के रूप में. मनु जी, अविनाश जी, हेमंत दा के ये गीत आपका भी पसंदीदा है जानकार ख़ुशी हुई. नीरज जी व्यस्ततायें लाख हों पर संगीत से दूर न रहें. यही तो हमारी लाइफ लाइन है भाई :)

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम ६-७ के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवायेंगे, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.


Tuesday, December 16, 2008

तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा...

ग्रेट शो मैन राज कपूर की जयंती पर विशेष


१४ दिसम्बर को हमने गीतकार शैलेन्द्र को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया था. गौरतलब ये है कि फ़िल्म जगत में उनके "मेंटर" कहे जाने वाले राज कपूर साहब की जयंती भी इसी दिन पड़ती है. पृथ्वी राज कपूर के एक्टर निर्माता और निर्देशक बेटे रणबीर राज कपूर को फ़िल्म जगत में "ग्रेट शो मैन" के नाम से भी जाना जाता है. हिन्दी फिल्मों के लिए उनका योगदान अमूल्य है. १९४८ में बतौर अदाकार शुरुआत करने वाले राज कपूर ने मात्र २४ साल की उम्र में मशहूर आर के स्टूडियो की स्थापना की और पहली फ़िल्म बनाई "आग" जिसमें अभिनय भी किया. फ़िल्म की नायिका थी अदाकारा नर्गिस. हालाँकि ये फ़िल्म असफल रही पर नायक के तौर पर उनके काम की तारीफ हुई. नर्गिस के साथ उनकी जोड़ी को प्रसिद्दि मिली १९४९ में आई महबूब खान की फ़िल्म "अंदाज़" से. निर्माता निर्देशक और अदाकार की तिहरी भूमिका में फ़िल्म "बरसात" को मिली जबरदस्त कमियाबी के बाद राज कपूर ने फ़िल्म जगत को एक से बढ़कर एक फिल्में दी और कमियाबी की अनोखी मिसालें कायम की. आईये आज उन्हें याद करें उनकी चंद फिल्मों का जिक्र कर.

शुरुआत करते हैं राज साहब की अमर कृति "आवारा" से. ये वो फ़िल्म है जिसने राज कपूर को देश विदेश में एक बड़े कलाकार के रूप में स्थापित किया. भारत में बेहद कामियाब हुई इस लाजवाब फ़िल्म को एशिया और रूस में भी जबरदस्त सराहना मिली. राज साहब की अपनी एक टीम हुआ करती थी जिन पर वो भरोसा करते थे. आर के स्टूडियो में बनी इस पहली फ़िल्म में भी सभी उनके चहेते साथी थे. अभिनेत्री नर्गिस थी जोडीदार तो संगीत का जिम्मा था शंकर जयकिशन शैलेन्द्र और हसरत की टीम पर, आवाजें थी मुकेश (राज कपूर) और लता (नर्गिस) की. इस फ़िल्म में ही पहली बार राज कपूर चैपलिन के भेष में दिखाई दिए थे. हालाँकि ये एक छोटा सा तोहफा था राज का अपने प्रिये अभिनेता के लिए (श्री ४२० में ये अधिक मुखर था),पर सिने प्रेमी इस लघु भूमिका को नही भूले. राज कपूर के प्रशंसकों को ये जानकर खुशी होगी ये परिधान आज भी आर के स्टूडियो ने जतन से सहेज कर रखा हुआ है. राज कपूर और नर्गिस कभी न बिछड़ने वाले प्रेमी युगल के रूप में परदे पर आए और छा गए. फ़िल्म का एक एक गीत एक शाहकार बना था. शीर्षक गीत 'आवारा हूँ' और 'दम भर जो उधर मुंह फेरे ..." के आलावा एक ९ मिनट का स्वप्न दृश्य गीत अपने बहतरीन सेट सज्जा के लिए आज भी जाना जाता है. घुमावदार सीढियों और उड़ते बादलों के बीच (स्वर्ग) में लय पर थिरकरी अप्सराएँ और सब से उपर की सीढ़ी पर खड़ी नायिका गा रही है "तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा ..." नायक काली टी शर्ट और पैंट पहने कहीं नर्क जैसी जगह में तड़प रहा है "ये नही ये नहीं जिन्दगी...." चारों तरफ़ आग है नाचते अस्थि पिंजर और शैतानी मुखौटों से मुक्त हो कर अंत में वह बादलों से निकलता है और ध्वनि होती है "ओम् नम शिवाय..." की. ब्रह्म विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति है सीढियों की शुरुआत में नायिका नीचे उतरती है और नायक को ऊपर स्वर्ग की तरफ़ ले चलती है गाती हुई "घर आया मेरा परदेसी...". घुमावदार सीढ़ियों से नायिका के पीछे चलता नायक अंत में नटराज की मूर्ति के आगे पहंचता है. जहाँ से एक नई सड़क चलती है, यहीं खलनायक एक चाकू लिए प्रकट होता है. नायक नायिका का नाम पुकारता है पर जब तक नायिका उस तक पहुंचें नायक एक बार फ़िर गर्त में गिर कर ख़ाक हो जाता है. ये स्वप्न दृश्य एक "विसुअल ट्रीट" है अवश्य देखें -



१९६४ में आई "संगम" राज की पहली रंगीन फ़िल्म थी और पहली ऐसी फ़िल्म जो उन्होंने विदेश में शूट की. दरअसल इसी फ़िल्म ने विदेश में शूट करने का ट्रेंड शुरू किया था. बाद में तो लगभग हर फ़िल्म में एक गीत स्विट्जरलैंड में शूट करना लाजमी हो गया चाहे उसका कहानी से कुछ लेना देना हो या नही. साधारण सी प्रेम त्रिकोण कहानी में भी उनका निर्देशन फ़िल्म की जान था. हालाँकि फ़िल्म कुछ जरुरत से ज्यादी लम्बी थी पर राज साहब हमेशा ही बड़े कैनवास के फिल्मकार थे. राज की हर फ़िल्म की तरह इस फ़िल्म के गीतों ने भी धूम मचायी. "बोल राधा बोल", "बुड्डा मिल गया", "ये मेरा प्रेम पत्र" जैसे लाजवाब गीतों के अलावा एक गीत और था "दोस्त दोस्त न रहा...". जिस खूबसूरती से राज ने इस गीत को फिल्माया फ़िल्म का एक एक किरदार और उसके मन के भावों जिस तरीके परदे पर उभारा गया इस गीत में, वो हिन्दी फ़िल्म क्राफ्ट में राज की दक्षता का जीवंत उदाहरण है.

कुछ साल और आगे बढ़ते हैं. शानदार अभिनय से सजी "तीसरी कसम" और उनकी बेहद महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की नकामियाबी ने राज को बहुत बड़ा सदमा दिया. उन्होंने फैसला किया की अब वो अभिनय नही करेंगे. चुनांचे उन्होंने परदे पर उतरा अपने मंझले बेटे ऋषि कपूर को. ऋषि इससे पहले "मेरा नाम जोकर" राज के बचपन की भूमिका निभा चुके थे. साथ ही एक नई नायिका दी उन्होंने फ़िल्म जगत को डिम्पल कपाडिया के रूप में. दोनों ही कलाकार अपनी "टीनएज" अवस्था में थे जब ये फ़िल्म शुरू की. "बॉबी" को हम राज की पहली शो मैन सरीखी फ़िल्म मान सकते हैं जहाँ उन्होंने फ़िल्म को कामियाब बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाए और फ़िल्म को एक "लार्जर देन लाइफ" प्रस्तुति दी. के ऐ अब्बास की लिखी इस प्रेम कहानी में राज ने सब कुछ दिया दर्शकों को. सुखद अंत दिया कहानी को ताकि खतरा कम रहे असफलता का. सुपर हिट संगीत और नए परिधानों में सजा धजा एक प्रेमी युगल जिसने एक पूरी पीढी को प्रेरित किया दीवारों को तोड़ कर प्रेम करने के लिए. ऋषि कपूर अगले २० सालों तक कमोबेश इसी रोमांटिक इमेज में जीये. फ़िल्म का एक दृश्य विशेष ध्यान आकर्षित करता है. युवा नायक नायिका से मिलने उसके घर जाता है. पकौडे बना रही नायिका जब दरवाज़ा खोलती है तो अनजाने में हाथ में लगा आटा अपने बालों में लगा बैठती है. कहते हैं कि जब राज पहली बार नर्गिस के घर गए थे तब कुछ ऐसा ही हुआ था. नायक का नायिका से पूछना "मुझसे दोस्ती करोगी" एक ऐसा संवाद था जिसने आने वाली पीढी के फिल्मकारों को एक लड़का और लड़की की दोस्ती और प्रेम जैसे विषय पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया. सूरज बड़जात्या की "मैंने प्यार किया" और करण जौहर की "कुछ कुछ होता है" जैसी फिल्में इसका उदाहरण है. राज साहब की ८४ वीं जयंती पर उन्हें आवाज़ का सलाम.

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