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Monday, September 28, 2009

मुस्कुराहट तेरे होंठों की मेरा सिंगार है....लता जी का हँसता हुआ चेहरा संगीत प्रेमियों के लिए ईश्वर का प्यार है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 216

ज २८ सितंबर का दिन फ़िल्म संगीत के लिए एक बेहद ख़ास दिन है। क्यों शायद बताने की ज़रूरत नहीं। लता जी को ईश्वर दीर्घायु करें, उन्हे उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करें, लता जी के जन्मदिन पर हम तह-ए-दिल से उन्हे मुबारक़बाद देते हैं। आज है साल २००९। आज से ८० साल पहले १९२९ को लता जी का जन्म हुआ था मध्य प्रदेश के इंदौर में। दोस्तों आज मौका है लता जी के जन्मदिन का, तो क्यों ना आज हम उन्ही से जानें उनकी जनम के बारे में। एक बार अमीन सायानी ने लता जी का एक इंटरव्यू लिया जिसमें उन्होने लता जी को कई 'कॊन्ट्रोवर्शियल' सवालों के जाल से घेर लिया था, लेकिन लता जी हर बार जाल को चीरते हुए बाहर निकल आईं थीं। उन सवालों में से एक सवाल यह भी था - "कुछ लोगों का ख़याल है कि कुछ सस्पेन्स सा आप ने क्रीएट किया हुआ है कि आप कहाँ पैदा हुईं थीं। कुछ कहते हैं गोवा में पैदा हुईं थीं, कुछ कहते हैं धुले में, कुछ इंदौर में, तो कुछ कहीं और का बताते हैं। तो आप बताइए कि आप कहाँ पैदा हुईं थीं?" लता जी का बेझिझक जवाब था - "नहीं, इसमें कोई सस्पेन्स नहीं है अमीन भाई, मेरा जनम इंदौर में हुआ है, क्योंकि मेरी मौसी वहाँ रहती थीं, और मेरी माँ जब, मतलब मैं पेट में थीं तो वहाँ गई, मौसी के वहाँ, पहला जो बच्चा होता है वो अपने मायके में होता है, तो वहाँ नहीं जा सकी जहाँ मेरी नानी रहती थीं, क्योंकि छोटा सा गाँव था, तो वो फिर इंदौर गईं और इंदौर में सिख मोहल्ले में मेरा जनम हुआ। और वहाँ वकील का बाड़ा था वह। मेरे पिताजी गोवा के थे, माँ धुले की तरफ़ छोटा सा गाँव है, और मेरी माँ की जो माँ थीं वो गुजराती नहीं थीं पर पिताजी गुजराती थे, मेरे नाना गुजराती थे, और उनको महाराष्ट्र से बड़ा प्यार था, महाराष्ट्र की भाषा से, और वो मराठी बोलते थे, गुजराती बहुत कम बोलते थे। और मैं सिख मोहल्ले में पैदा हुई, इसलिए मेरे बाल लम्बे हैं (यह कहकर लता जी ज़ोर से हँस पड़ीं)।"

लता जी के जन्मदिन पर हम उनकी शुभकामना करते हुए उनके जिस दुर्लभ गीत को प्रस्तुत करने जा रहे हैं वह है १९५२ की फ़िल्म 'शीशम' का। इस शृंखला में आप दस संगीतकारों के संगीतबद्ध किए दस बेहद दुर्लभ गीत सुन रहे हैं, तो आज के कड़ी के संगीतकार हैं रोशन। गीत इंदीवर का लिखा हुआ है। फ़िल्म 'शीशम' बनी थी 'अनिल पिक्चर्स' के बैनर तले। किशोर शर्मा निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे नासिर ख़ान और नूतन। इसके पिछले साल, १९५१ में फ़िल्म 'मल्हार' में लता-मुकेश के गाए सुपरहिट गीत "प्यार की दुनिया में यह पहला क़दम" के बाद 'शीशम' में रोशन ने एक बार फिर से लता-मुकेश से गवाया "सपनों में आना छेड़ छेड़ जाना सीखा कहाँ से मेरे बलम ने"। इस फ़िल्म में भी कई गीतकारों ने गीत लिखे जैसे कि इंदीवर, ज़िया सरहदी, उद्धव कुमार, नज़ीम पानीपती और कैफ़ इर्फ़ानी। आज का गीत है "मुस्कुराहट तेरे होंठों की मेरा सिंगार है, तू है जब तक ज़िंदगी में ज़िंदगी से प्यार है"। बेहद मीठा और सुरीला गाना है यह। सोचने वाली बात है कि क्या कमी रह गई होगी इस गीत में जो यह गीत बहुत ज़्यादा मशहूर नहीं हुआ, और ना ही आज कहीं से सुनाई देता है। आज लता जी के जन्मदिन पर उनकी तारीफ़ में भी हम इसी गीत के मुखड़े के आधार पर यही कहेंगे कि 'लता जी, आपकी आवाज़ ही फ़िल्म संगीत का सिंगार है, और जब तक आप के गाए गीत हमें कहीं ना कहीं से सुनाई देते रहेंगे, हम सब युंही जीते रहेंगे।" इससे ज़्यादा आपकी तारीफ़ में और क्या कहें!



मुस्कराहट तेरे होठों की मेरा सिंगार है
तू है जब तक ज़िन्दगी में ज़िन्दगी से प्यार है ।

मैनें कब मांगी मुहब्बत कब कहा तुम प्यार दो
प्यार तुमको कर सकूं इतना मुझे अधिकार दो
मेरे नैया की तुम्हारे हाथ में पतवार है ।

मेरे काजल में भरा है रंग तेरी तस्वीर का
सामने है तू मेरे एहसान है तक्दीर का
तेरी आँखों में बसाया मैनें इक संसार है ।


और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा तीसरा (पहले दो गेस्ट होस्ट बने हैं शरद तैलंग जी और स्वप्न मंजूषा जी)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

१. मदन मोहन की तर्ज पर लता के गाये इस गीत को बूझिये और जीतिए ३ अंक.
२. एक बार फिर गीतकार हैं इन्दीवर.
३. मुखड़े में शब्द है -"निसदिन"

पिछली पहेली का परिणाम -

शरद जी ६ अंकों पर पहुँच गए हैं आप....बधाई

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

The Radio Playback Originals (Click on the covers to reach out the Albums)



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