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गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

मेरा दिल तड़पे दिलदार बिना.. राहत साहब की दर्दीली आवाज़ में इस ग़मनशीं नज़्म का असर हज़ार गुणा हो जाता है

महफ़िल ए कहकशाँ 17




 राहत फ़तेह अली खान
दोस्तों सुजोय और विश्व दीपक द्वारा संचालित "कहकशां" और "महफिले ग़ज़ल" का ऑडियो स्वरुप लेकर हम हाज़िर हैं, "महफिल ए कहकशां" के रूप में पूजा अनिल और रीतेश खरे  के साथ।  अदब और शायरी की इस महफ़िल में आज पेश है राहत फ़तेह अली खान की आवाज़ में एक पंजाबी नगमा| 










मुख्य स्वर - पूजा अनिल एवं रीतेश खरे 

स्क्रिप्ट - विश्व दीपक एवं सुजॉय चटर्जी


शनिवार, 10 दिसंबर 2016

वर्षान्त विशेष: 2016 का फ़िल्म-संगीत (भाग-2)

वर्षान्त विशेष लघु श्रृंखला

2016 का फ़िल्म-संगीत  
भाग-2





रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार! दोस्तों, देखते ही देखते हम वर्ष 2016 के अन्तिम महीने पर आ गए हैं। कौन कौन सी फ़िल्में बनीं इस साल? उन सभी फ़िल्मों का गीत-संगीत कैसा रहा? ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में अगर आपने इस साल के गीतों को ठीक से सुन नहीं सके या उनके बारे में सोच-विचार करने का समय नहीं निकाल सके, तो कोई बात नहीं। अगले पाँच सप्ताह, हर शनिवार हम आपके लिए लेकर आएँगे वर्ष 2016 में प्रदर्शित फ़िल्मों के गीत-संगीत का लेखा-जोखा। आइए इस लघु श्रृंखला की दूसरी कड़ी में आज चर्चा करते हैं उन फ़िल्मों के गीतों की जो प्रदर्शित हुए मार्च और अप्रैल के महीनों में।


2016 के हिन्दी फ़िल्म गीत समीक्षा की पहली कड़ी आकर पिछले सप्ताह रुकी थी ’बॉलीवूड
डायरीज़’ पर। मार्च का महीना शुरु हुआ फ़िल्म ’ज़ुबान’ से। इस फ़िल्म में तीन संगीतकार थे - आशु पाठक, मनराज पातर और इश्क बेक्टर। वरुण ग्रोवर और आशु पाठक का लिखा रशेल वरगीज़ का गीत "म्युज़िक इज़ माइ आर्ट" पाश्चात्य रंग के साथ थिरकाने वाला होने के बावजूद कर्णप्रिय है। इसी तिकड़ी का फ़िल्म का शीर्षक गीत "ध्रुवतारा" बिल्कुल अलग ही रंग का है जिसमें फ़्युज़न का रंग शामिल है, रशेल के साथ कीर्ति सरगठिया की आवाज़ है। फ़िल्मकार प्रकाश झा ’गंगाजल’ के बाद इस साल लेकर आए ’जय गंगाजल’। संगीतकार सलीम-सुलेमान और गीतकार मनोज मुन्तशिर और स्वयं प्रकाश झा के ऐल्बम में आवाज़ों की कई विविधताएँ सुनने को मिली। प्रवेश मल्लिक के गाये दो गीत - "माया ठगनी" और "धीरे धीरे" लीक से हट कर हैं। लोक-शैली की गायिकी दोनों गीतों में नज़र आई। सुखविन्दर सिंह का गाया "टेटुआ दबोच लेंगे" को सुन कर "चक दे इण्डिया" गीत की याद आई। लोक-शैली आधारित "जोगनिया नाचे बीच बजार" में बहुत दिनों बाद उदित नारायण की आवाज़ सुन कर अच्छा लगा, लेकिन इस गीत के लिए उदित जी की आवाज़ की कौन सी आवश्यक्ता थी समझ नहीं आया। कीर्ति सरगथिया का गाया "घनघोर घनन घनन" में भी ’लगान’ के "घनन घनन" और "बार बार हाँ" जैसे गीतों की छाया महसूस की जा सकती है। रीचा शर्मा की आवाज़ में मुजरा "नजर तोरी राजा बड़ी बेइमान रे" को "नजर लागी राजा तोरे बंगले पर" का आधुनिक रूप कहा जा सकता है। दिव्य कुमार की आवाज़ में "बिनु बादर बिजुरी कहाँ रे चमके" इन्हीं बोलों के मूल लोक-गीत पर आधारित है। डिस्को किंग् बप्पी लाहिड़ी की आवाज़ भी सुनाई दी इस ऐल्बम में, "सनके है सन सन बयरिया" में यूपी के लोक और पाश्चात्य संगीत का फ़्युज़न है, मज़ा नहीं आया! लेकिन सुगंधा दाते का गाया "माई री सुन ले माई" ही ऐल्बम का दिल को छूने वाला गीत है; बोल, संगीत और गायिकी, हर दृष्टि से बेहद कर्णप्रिय और सुकूनदायक रचना है। और सारंगी के इन्टरल्यूड्स ने भी गीत का स्तर बढ़ाया है। ऐल्बम के अन्तिम गीत के रूप में कबीरदास के विचार वाले "आँख खुले तो सब धन माटी" के दो संस्करण हैं - अरिजीत सिंह और अमृता फडनविस के। यह भी एक सुन्दर रचना है जिसने इस ऐल्बम के स्तर को बढ़ाने में मदद की है। "ना काहुं से दोस्ती, ना काहुं से बैर, तन्त्र मन्त्र के फेर क़िस्मत बनी रखैल" जैसे दोहे के बोलों से ही शुरु होने वाला ’ग्लोबल बाबा’ फ़िल्म का पहला गीत "बाबायोग" सुन कर फ़िल्म के अन्य गीतों के बारे में भी धारणा बन जाती है। रिपुल शर्मा, ऐग्नल जोसेफ़ और फ़ैज़न हुसैन, अर्थात् अमर-अकबर-ऐन्थनी के होते हुए भी यह ऐल्बम कोई कमाल नहीं दिखा सकी। अब कौन इन्हें समझाये कि बस "मौला" शब्द के होने से ही गीत हिट नहीं होने वाला! इस फ़िल्म में एक होली गीत भी है "होली में उड़े है गुलाल" सोना महापात्र और केसरी लाला यादव का गाया, लेकिन यह गीत भी कोई कमाल करने में असमर्थ रही।

हिमेश रेशम्मिया के अभिनय और संगीत से सजी फ़िल्म आई ’तेरा सुरूर’। लेकिन हैरानी की बात
है रही कि इस फ़िल्म के गीतों को उन्होंने ख़ुद नहीं गाया बल्कि अरिजीत सिंह, दर्शन रावल और ॠतुराज मोहन्ती जैसे गायकों से गवाया। उनकी आवाज़ बस दो गीतों में सुनाई दी। दर्शन की आवाज़ में "मैं वह चाँद जिसका तेरे बिन न कोई आसमाँ" और "बेख़ुदी मेरे दिल पे ऐसे छायी" में हिमेश का मोहर लगा हुआ है; पर दर्शन ने "बेख़ुदी" को "बेखुदी" और "ख़ुदाई" को "खुदाई" क्यों गाया समझ नहीं आया। अरिजीत की आवाज़ में "वफ़ा ने बेवफ़ाई की है" ने पिछले दो गीतों से अलग कुछ नहीं महसूस कराया। ॠतुराज मोहन्ती की आवाज़ में रॉक शैली में निबद्ध "अधूरी ज़िन्दगी है तू कर दे मुकम्मल" आज की पीढ़ी को ज़रूर भाएगी। हिमेश की आवाज़ में "तेरी याद" तो जैसे "आशिक़ बनाया आपने पार्ट टू" है। कनिका कपूर के साथ हिमेश का गाया "इश्क़ समुन्दर" गीत पल्ले नहीं पड़ा। सुनिधि चौहान और आनन्द राज आनन्द के गाए फ़िल्म ’काँटे’ का मूल गीत इतना लोकप्रिय है कि इसका रीमेक करना ख़तरे से खेलना है। बी-ग्रेड ऐडल्ट फ़िल्मों की श्रेणी में एक और फ़िल्म जुड़ी मार्च के महीने में, शीर्षक ’ओके में धोखे’। फ़िल्म के कुल छह गीतों में स्मिता अधिकारी और सावन हुसैन का गाया "मैं नशा हूँ नशा, नशे में तू झूम ले" गायन की दृष्टि से अच्छा गीत है, बोलों पर ज़्यादा ग़ौर न फ़रमाइएगा। फ़िल्म के संगीतकार हैं बाबा जागिरदार। मार्च की अन्तिम दो फ़िल्में बड़ी फ़िल्में रहीं। सिद्धार्थ कपूर - आलिआ भट्ट अभिनीत ’कपूर ऐण्ड सन्स’ में कई संगीतकार और गीतकार शामिल किए गए हैं। लेकिन जो उल्लेखनीय है वह है डॉ. देवेन्द्र काफ़िर का लिखा और तनिश्क बागची का स्वरवद्ध किया अरिजीत सिंह व असीस कौर का गाया गीत "बोलना"। आलिआ भट्ट की पिछले साल की फ़िल्म के गीत "मैं तनु समझावाँ" से इस गीत की समानता होते हुए भी अलग है और अच्छा भी। अमाल मलिक द्वारा स्वरबद्ध और गाया गीत "बुद्धू सा मन" में एक ताज़गी है। यह देख कर अच्छा लगता है कि सरदार मलिक और डबू मलिक के व्यावसायिक सफलता ना पाने के बाद तीसरी पीढ़ी के दो भाई बहुत नाम कमा रहे हैं। और इस महीने की अन्तिम फ़िल्म के रूप में प्रदर्शित हुई ’रॉकी हैण्डसम’। सनी बावरा, इन्दर बावरा और अंकित तिवारी फ़िल्म के संगीतकार हैं। अंकित ने केवल एक ही गीत को स्वरबद्ध किया है, "तू मेरे अलफ़ाज़ों की तरह", जिसे उन्होंने ख़ुद ही गाया है। कुल मिलाकर एक अच्छा गीत रहा। फ़िल्म के अन्य गीतों में श्रेया घोषाल और इन्दर बावरा का गाया "रहनुमा" में श्रेया की आवाज़ बिलकुल सुनाई दी, अच्छा प्रयोग रहा उनकी आवाज़ को लेकर। श्रेया और राहत फ़तेह अली ख़ान का गाया "ऐ ख़ुदा" कम साज़ों के इस्तमाल वाला कोमल दर्दभरा गीत रहा। और सुनिधि चौहान से "तितलियाँ" गवाने का कोई अर्थ नहीं था, यह किसी नई गायिका से भी गवाया जा सकता था।


अप्रैल का महीना शुरु हुआ फ़िल्म ’कि ऐण्ड का’ से जिसने बॉक्स ऑफ़िस पर ज़्यादा कमाल तो नहीं
दिखा सकी, पर इसके गीत-संगीत की चर्चा ज़रूरी है। वरिष्ठ गीतकार सईद क़ादरी का लिखा और मिथुन का स्वरबद्ध व गाया “मोहब्बत है यह जी हुज़ूरी नहीं” गीत बहुत कामयाब रहा। मोहब्बत के साथ जी हुज़ूरी का पहली बार इस्तमाल फ़िल्म गीतों में एक नया व सुखद प्रयोग सिद्ध हुआ। फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक आर. बाल्की, जिनके साथ संगीतकार इलैयाराजा का लम्बा साथ रहा है, इस फ़िल्म में भी एक गीत में इलैयाराजा का संगीत सुनाई दिया – “फ़ूलिश्क़ फ़ूलिश्क़ तेरा मेरा” जिसमें श्रेया घोषाल और अरमान मलिक की आवाज़ें हैं और जिसे अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखा है, पर इलैयाराजा कोई नई बात इस गीत में नहीं ला सके। फ़िल्म का पार्श्वसंगीत भी इलैयाराजा ने ही तैयार किया है। फ़िल्म के बाक़ी के चार गीत फ़ूट तैपरिंग्‍पार्टी नंबर्स हैं जिन्हें कुमार ने लिखा है और मीत ब्रदर्स अनजान ने स्वरबद्ध किया है। “मोस्ट वान्टेड मुंडा...” के दो संस्करण हैं – पहले में मीत ब्रदर्स अनजान और अर्ल एडगर की आवाज़ें हैं जबकि दूसरे में मीत बरदर्स अनजान के साथ पलक मुछाल और अर्जुन कपूर की आवाज़ें हैं। “पम्प इट...” में मीत बरदर्स अनजान और यश नर्वेकर ने जिम में वर्काउट करने वाले दृश्य को साकार किया है। पर जिस गीत ने सबसे ज़्यादा धूम मचाई वह है यो यो हनी सिंह, अदिति सिंह शर्मा और जैज़ धमी का गाया “हाइ हील दे नच्चे ते तू बड़े जच्चे”। ’नील बट्टे सन्नाटा’ एक ऐसी फ़िल्म रही जो एक कम बजट फ़िल्म खोने के बावजूद दर्शकों की ख़ूब  वाह-वाही लूटी। गणित और माँ-बेटी के रिश्ते के इर्दगिर्द घूमती इस कहानी ने दर्शकों पर अमिट छाप छोड़ी। गीत-संगीत की बात करें तो नओदित संगीतकार रोहण और विनायक ने अच्छा प्रदर्शन करते हुए नितेश तिवारी, मनोज यादव और श्रेयस जैन के लिखे गीतों को कम्पोज़ किया, जिनमें मोहन कन्नन का गाया “माँ” (जिसका एक हरिहरण का गाया संस्करण भी है) दिल को छू जाती है। कहीं न कहीं इस गीत में “मेरी माँ, प्यारी माँ” और “मैं कभी बतलाता नहीं” जैसे गीतों की झलक मिलती है। 22 अप्रैल को ही एक और फ़िल्म आई ’लाल रंग’ जिसमें संगीत था शिराज़ उप्पल, मैथियस डुप्लेसी, विपिन पतवा का। फ़िल्म नहीं चली और ना ही इसके गानें गूंजे, पर गाने मेलडी-प्रधान रहे। शकील सोहैल का लिखा तथा काशिफ़ अली व शिराज़ उप्पल का गाया “तुझमें लगा है मेरा मन मेरा मन” एक नर्म रुमानीयत से लवरेज़ नग़मा है जो सुकून देता है। कौसर मुनीर का लिखा व मुख़तियार अली और समीर ख़ान का गाया “ऐ ख़ुदा तुझको ख़ुद से मिलाने चला मैं” भी एक अलग ही माहौल बनाता है। विकास कुमार का लिखा व गाया पंजाबी गीत “खर्च करोड़” में संगीतकार विपिन पतवा ने मेलडी और दर्द कूट-कूट कर भरा है। समीर ख़ान का गाया “लाली, दिल से मैंने चुरा ली” गीत संगीत-संयोजन की वजह से अनोखा बन पड़ा है, साथ ही समीर ख़ान की अदायगी ने भी गीत में कशिश भरा है।

विक्रम भट्ट एक ऐसे फ़िल्मकार हैं जो बोल्ड और हॉरर फ़िल्मों के निर्माण के लिए जाने जाते रहे हैं।
2016 में उनकी दो फ़िल्में आईं – अप्रैल में ’लव गेम्स’ और सितंबर में ’राज़ रीबूट’। ’लव गेम्स’ एक थ्रिलर फ़िल्म रही जो कामुक और बोल्ड दृश्यों के लिए चर्चा में रही। फ़िल्म चाहे जैसी भी हो, विक्रम भट्ट के फ़िल्मों का संगीत मेलोडी-प्रधान होता आया है। संगीतकार जोड़ी संगीत-सिद्धार्थ जो 2009 से एक बड़ी फ़िल्म की प्रतीक्षा कर रहे थे, उनका सपना साकार हुआ इस फ़िल्म में जब उन्हें फ़िल्म के सभी गीतों को कम्पोज़ करने का मौका मिला। कौसर मुनीर के लिखे पाँच हिन्दी और विक्रम भट्ट के लिखे दो अंग्रेज़ी गीतों से सजा यह ऐल्बम फ़िल्म को बचा नहीं सके। फ़िल्म के गानों में कई नई आवाज़े ली गईं जैसे कि संगीत हल्दीपुर, सिद्धार्थ हल्दीपुर, रसिका शेखर, आँचल श्रिवास्तव, मोहन कन्नन, सोनिया सहगल, रवीन्द्र चरी। सुनिधि चौहान की आवाज़ एक गीत में गूंजी पर कुछ ख़ास असर नहीं कर सकी। कुल मिला कर एक साधारण ऐल्बम और फ़िल्म भी बकवास!! 8 अप्रैल को ’लव गेम्स’ के साथ एक और फ़िल्म रिलीज़ हुई थी ’The Blueberry Hunt’। नसीरुद्दीन शाह अभिनीत इस फ़िल्म में संगीत परेश कामत और नरेश कामत का था। फ़िल्म तो कब आई और कब गई पता भी नहीं लगा, पर इस फ़िल्म के गीतों में ख़ास बात है। कीर्ति किलेदार की आवाज़ में “ज़रा ज़रा” और “जाने कहाँ हो गए तुम गुम” जैसे गीतों में लोक-शैली झलकती है और सारंगी और अन्य भारतीय साज़ों की ताने गीतों को और सुरीला बनाती हैं। तत्व कुंडलिनी की आवाज़ शास्त्रीय शैली में “सजनवा, कैसी ख़ुमारी छायी बलमवा” और पाश्चात्य रंग लिए “पफ़ दि नाइट अवे” अनूठी रचनाएँ हैं। 15 अप्रैल को प्रदर्शित हुई शाहरुख़ ख़ान अभिनीत फ़िल्म ’फ़ैन’ जिसे अच्छी रिव्यु मिली। इस फ़िल्म के गीतों की ख़ासियत यह है कि फ़िल्म में केवल एक ही गीत है, पर आठ अलग अलग भाषाओं में। हिन्दी में “जबरा फ़ैन”, जिसे नकश अज़ीज़ ने गाया, ने काफ़ी धूम मचाई। वरुण ग्रोवर के लिखे और विशाल-शेखर द्वारा स्वरबद्ध इस गीत ने लोकप्रियता के झंडे गाढ़े। पंजाबी, भोजपुरी, गुजराती, बांगला, मराठी, तमिल और ओड़िया में भी यह गीत बना जिसे प्रादेशिक कलाकारों ने गाए।

29 अप्रैल को प्रदर्शित टाइगर श्रॉफ़ अभिनीत ’बाग़ी’ में पाँच गीत हैं चार अलग-अलग संगीतकारों के। अमाल मलिक के संगीत में अरमान मलिक और श्रद्धा कपूर का गाया “सब तेरा” गीत वैसे तो कर्णप्रिय है लेकिन इस गीत में इसी वर्ष अमाल मलिक के ’एअरलिफ़्ट’ फ़िल्म के लिए बनाए हुए गीत “तेरे लिए दुनिया छोड़ दी है...” से बहुत ज़्यादा समानता है, इसलिए इस गीत में कोई नई बात नज़र नहीं आयी। ’बाग़ी’ में अमाल-अरमान का बस यही एक गीत है। मंज म्युज़िक के संगीत में “Lets talk about love” में कोई ख़ास बात नहीं है। मीत ब्रदर्स के दो गीत हैं, पहला – “Girl I need you” को अरिजीत सिंह और मीत ब्रदर्स की आवाज़ों के कॉनट्रस्ट ने ख़ूबसूरत जामा पहनाया है। मीत ब्रदर्स के संगीत में दूसरा गीत है “छम छम छम” जिसे मोनाली ठाकुर की आवाज़ ने सुरीला जामा पहनाया है – कुल मिला कर अच्छा नृत्य गीत। ऐल्बम का अन्तिम गीत है अंकित तिवारी के संगीत और उन्हीं की आवाज़ में – “अगर तू होता न रोते हम”। उनकी वही शैली, उनका वही अंदाज़। वही ’आशिक़ी 2’ के उनके “सुन रहा है न तू, रो रहा हूँ मैं” वाली बात! 29 अप्रैल को ही ’शॉर्टकट सफ़ारी’ फ़िल्म प्रदर्शित हुई जिसमें पाँच अलग तरह के गीत रहे और एक विविधता से भरा ऐल्बम बना। समीर-मना के संगीत में शान का गाया “सपनों से भरा पिग्गी बैंक” एक ख़ुशनुमा थिरकता गीत है जो बच्चों पर फ़िल्माया गया है। कुछ कुछ ’तारे ज़मीं पर’ के शान के ही गाए “बम बम बोले” का अंदाज़ महसूस हुआ इस गीत में। गायिका साधना सरगम और बाल कलाकार अत्रेयी भट्टाचार्य की आवाज़ों में “एक धरा के जन गण” जिसे रोहित शर्मा ने लिखा व स्वरबद्ध किया है बिना रीदम वाला गीत है जिसकी गायन शैली लीक से हट कर है। “बको सुफ़ु”, “ज़ोर लगा दे” और “डिप डिप डर” कुछ और गीत हैं जो इस ऐल्बम को तड़का लगाते हैं। यह फ़िल्म दरसल एक ऐडवेन्चर फ़िल्म है जिसमें कुछ स्कूली छात्र एक घने जंगल में भटक जाते हैं। कहानी को ध्यान में रखते हुए गीतों की शैली व बोल सटीक हैं।

तो दोस्तों, ये था 2016 के मार्च और अप्रैल के महीनों में प्रदर्शित हिन्दी फ़िल्मों के गीत-संगीत का लेखा-जोखा। अगले सप्ताह इसी स्तंभ में हम 2016 के गीतों की चर्चा जारी रखेंगे। तब तक के लिए अपने इस दोस्त सुजॉय चटर्जी को दीजिए अनुमति, नमस्कार!



खोज, आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए.. पेश-ए-नज़र है अल्लामा इक़बाल का दर्द मेहदी हसन की जुबानी



कहकशाँ - 25
अल्लामा इक़बाल का दर्द मेहदी हसन की जुबानी  
"परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है मोहम्मद अल्लामा इक़बाल की लिखी ग़ज़ल मेहदी हसन की आवाज़ में।



सितारों के आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं|

अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म
मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं|

गए दिन के तन्हा था मैं अंजुमन में
यहाँ अब मेरे राज़दाँ और भी हैं|

हमारे यहाँ कुछ शायर ऐसे हुए हैं, जिन्हें हमने उनकी कुछ ग़ज़लों (कभी-कभी तो महज़ एक ग़ज़ल या एक नज़्म) तक ही बाँधकर रखा है। ऐसे ही एक शायर हैं "मोहम्मद इक़बाल"। अभी हमने ऊपर जो शेर पढ़े, उन शेरों में से कम-से-कम एक शेर तो (पहला शेर ही) अमूमन हर इंसान की जुबान पर काबिज़ है ,लेकिन ऐसे कितने हैं जिन्हें इन शेरों के शायर का नाम पता है। हाँ, "इक़बाल" के नाम से सभी वाकिफ़ हैं, लेकिन कितनों की इसकी जानकारी है कि "सितारों के आगे... " कहकर लोगों में आशा की एक नई लहर पैदा करने वाला शायर "इक़बाल" ही है। हमारे लिए तो इक़बाल बस "सारे जहां से अच्छा" तक ही सीमित हैं। और यही कारण है कि जब हम बड़े शायरों की गिनती करते हैं तो ग़ालिब के दौर के शायरों को गिनने के बाद सीधे ही फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ तक पहुँच जाते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि इन दो दौरों के बीच भी एक शायर हुआ है, जिसने पुरानी शायरी और नई शायरी के बीच एक पुल की तरह काम किया है। मेरे हिसाब से ऐसी ग़लती या ऐसी अनदेखी बस हिन्दुस्तान में ही होती है, क्योंकि पाकिस्तान के तो ये क़ौमी शायर (राष्ट्रकवि) हैं और इनके जन्म की सालगिरह पर यानि कि ९ नवंबर को वहाँ सार्वजनिक (राष्ट्रीय) छुट्टी होती है। 

मैंने अपने कई लेखों में यह लिखा है कि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ग़ालिब के एकमात्र उत्तराधिकारी थे, यह बात शायद सच हो, लेकिन यह भी सच है कि उर्दू भाषा ने ‘ग़ालिब’ के अतिरिक्त अभी तक इक़बाल से बड़ा शायर उत्पन्न नहीं किया। ग़ालिब के उत्तराधिकारी होने वाली बात इसलिए सच हो सकती है क्योंकि इक़बाल पर सबसे ज्यादा प्रभाव मौलाना 'रूमी' का था। हाँ, साथ-ही-साथ ये ग़ालिब और जर्मन शायर 'गेटे' को भी खूब पढ़ा करते थे, लेकिन ’रूमी’ की बात तो कुछ और ही थी। इक़बाल की शायरी प्रसिद्धि के मामले में ग़ालिब के आस-पास ठहरती है, ऐसा कइयों का मानना है, उन्हीं में से एक हैं उर्दू पत्रिका "मख़जन" के भूतपूर्व संपादक "स्वर्गीय शेख अब्दुल कादिर बैरिस्टर-एट-लॉ"। उन्होंने कहा था (साभार: प्रकाश पंडित):

"अगर मैं तनासख़ (आवागमन) का क़ायल होता तो ज़रूर कहता कि ‘ग़ालिब’ को उर्दू और फ़ारसी शायरी से जो इश़्क था उसने उनकी रूह को अदम (परलोक) में भी चैन नहीं लेने दिया और मजबूर किया कि वह फिर किसी इन्सानी जिस्म में पहुँचकर शायरी के चमन की सिंचाई करे; और उसने पंजाब के एक गोशे में, जिसे स्यालकोट कहते हैं, दोबारा जन्म लिया और मोहम्मद इक़बाल नाम पाया।"

इक़बाल के बारे में और कुछ जानने के लिए चलिए प्रकाश पंडित जी की पुस्तक "इक़बाल और उनकी शायरी" को खंगालते हैं:

सन् १८९९ में इक़बाल ने पंजाब विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए. किया। और यही वह ज़माना था जब लाहौर के सीमित क्षेत्र से निकलकर उनकी शायरी की चर्चा पूरे भारत में पहुँची। पत्रिका ‘मख़ज़न’ उन दिनों उर्दू की सर्वोत्तम पत्रिका मानी जाती थी। उसके सम्पादक स्वर्गीय शेख़ अब्दुल क़ादिर ‘अंजुमने-हिमायते-इस्लाम’ के जल्सों में इक़बाल को नज़्में पढ़ते देख चुके थे और देख चुके थे कि इन दर्द-भरी नज़्मों को सुनकर उपस्थिति सज्जनों की आँखों में आँसू आ जाते हैं। उन्होंने इक़बाल की नज़्मों को ‘मख़ज़न’ में विशेष स्थान देना शुरू किया। पहली नज़्म ‘हिमालय’/’हिमाला’ के प्रकाशन पर ही, जो अप्रैल १९०१ के अंक में निकली, पूरा उर्दू-जगत् चौंक उठा। सभाओं द्वारा प्रार्थनाएं की जाने लगीं कि उनके वार्षिक सम्मेलनों में वे अपनी नज़्मों के पाठ द्वारा लोगों को लाभान्वित करें। स्वर्गीय अब्दुल क़ादिर के कथनानुसार उन दिनों इक़बाल शे’र कहने पर आते तो एक-एक बैठक में अनगिनत शे’र कह डालते। "मैंने उन दिनों उन्हें कभी काग़ज़-क़लम लेकर शे’र लिखते नहीं देखा। गढ़े-गढ़ाए शब्दों का एक दरिया या चश्मा उबलता मालूम होता था। अपने शे’र सुरीली आवाज़ में, तरन्नुम से (गाकर) पढ़ते थे। स्वयं झूमते थे, औरों को झुमाते थे। यह विचित्र विशेषता है कि मस्तिष्क ऐसा पाया था कि जितने शे’र इस प्रकार ज़बान से निकलते थे, सब-के-सब दूसरे समय और दूसरे दिन उसी क्रम से मस्तिष्क में सुरक्षित होते थे।"

शायरी कैसी हो, इस बारे में इक़बाल का ख्याल था: "अगरचे आर्ट के मुतअ़ल्लिक़ दो नज़रिये (दृष्टिकोण) मौजूद हैं : अव्वल यह कि आर्ट की ग़रज़ (उद्देश्य) महज़ हुस्न (सौंदर्य) का अहसास (अनुभूति) पैदा करना है और दोयम यह है कि आर्ट से ज़िन्दगी को फ़ायदा पहुँचाना चाहिए। मेरा ज़ाती ख़याल यह है कि आर्ट ज़िन्दगी के मातहत है। हर चीज़ को इन्सानी ज़िन्दगी के लिए वक़्त होना चाहिए और इसलिए हर आर्ट जो ज़िन्दगी के लिए मुफ़ीद हो, अच्छा और जाइज़ है। और जो ज़िन्दगी के ख़िलाफ़ हो, जो इन्सानों की हिम्मतों को पस्त और उनके जज़बाते-आलिया (उच्च भावनाओं) को मुर्दा करने वाला हो, क़ाबिले-नफ़रत है और उसकी तरवीज (प्रसार) हुकूमत की तरफ़ से ममनू (निषिद्ध) क़रार दी जानी चाहिए।" इसी ख्य़ाल के तहत १९०५ तक (जब तक वे उच्च शिक्षा के लिए यूरोप नहीं गए थे) वे देश-प्रेम में डूबी हुई तथा भारत की पराधीनता और दरिद्रता पर खून के आँसू रुलाने वाली नज़्मों की रचना करते रहे। उन्होंने हर किसी के मुख में यह प्रार्थना डाली:

हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनत 
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत

फिर १९०५ में उनका यूरोप जाना हुआ। वहाँ छोटे-बड़े और काले-गोरे का भेद-भाव देखकर उनके हृदय पर गहरी चोट लगी। अब विशाल अध्ययन तथा विस्तृत निरीक्षण के बाद उनकी क़लम से ऐसे शेर निकलने लगे:

दियारे-मग़रिब के रहनेवालों खुदा की बस्ती दुकां नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो, वो अब ज़रे-कम-अयार होगा
तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही खुदकशी करेगी
जो शाख़े-नाजुक पे आशियाना बनेगा नापायदार होगा

वे अब प्रगतिशील शायरी की और कूच करने लगे। ये इक़बाल ही थे जिन्होंने सबसे पहले ‘इंक़िलाब’ (क्रान्ति) का प्रयोग राजनीतिक तथा सामाजिक परिवर्तन के अर्थों में किया और उर्दू शायरी को क्रान्ति का वस्तु-विषय दिया। पूँजीपति और मज़दूर, ज़मींदार और किसान, स्वामी और सेवक, शासक और पराधीन की परस्पर खींचातानी के जो विषय हम आज की उर्दू शायरी में देखते हैं, उन सबपर सबसे पहले इक़बाल ने ही क़लम उठाई थी और यही वे विषय हैं जिनसे उनके बाद की पूरी पीढ़ी प्रभावित हुई और यह प्रभाव राष्ट्रवादी, रोमांसवादी और क्रान्तिवादी शायरों से होता हुआ आधुनिक काल के प्रगतिशील शायरों तक पहुँचा है।

१९०८ में यूरोप से लौटने के बाद वे उर्दू की बजाय फ़ारसी में अधिक लिखने लगे। फ़ारसी इस्तेमाल करने का कारण यह था कि उर्दू भाषा का शब्द-भण्डार फ़ारसी के मुक़ाबले में बहुत कम है। वहीं कुछ लोगों का मत यह है कि अब वे केवल भारत के लिए नहीं, संसार-भर के मुसलमानों के लिए शे’र कहना चाहते थे। कारण कुछ भी हो, वास्तविकता यह है कि फ़ारसी भाषा में शे’र कहने से उनका यश भारत से निकलकर न केवल ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, टर्की और मिश्र तक पहुँचा, बल्कि ‘असरारे-ख़ुदी’ (अहंभाव के रहस्य) पुस्तक की रचना और डॉक्टर निकल्सन के उसके अंग्रेज़ी अनुवाद से तो पूरे यूरोप और अमरीका की नज़रें इस महान भारतीय कवि की ओर उठ गईं। और फिर अंग्रेज़ी सरकार ने उन्हें ‘सर’ की श्रेष्ठ उपाधि प्रदान की।

इक़बाल का जन्म ९ नवंबर १८७७ को स्यालकोट में हुआ था। पुरखे कश्मीरी ब्राह्मण थे जिन्होंने तीन सौ वर्ष पूर्व इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था और कश्मीर से निकलकर पंजाब में आ बसे थे। उनके पिता एक अच्छे सूफी संत थे। यह उनके पिता की हीं तालीम थी कि इक़बाल की शायरी में गहरी सोच के दर्शन होते हैं। जैसे कि इन्हीं शेरों को देखिए:

पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है

ख़ुदा के बन्दे तो हैं हज़ारों बनो‌ में फिरते हैं मारे-मारे
मैं उसका बन्दा बनूँगा जिसको ख़ुदा के बन्दों से प्यार होगा

भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूँ, सज़ा चाहता हूँ 

इक़बाल के बारे में इतनी जानकारियों के बाद चलिए अब हम आज की ग़ज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की ग़ज़ल को अपनी मखमली आवाज़ से मुकम्मल किया है उस्ताद मेहदी हसन ने। तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है "राख" को परीशां करके "दिल" बना देने वाली ग़ज़ल, जो इक़बाल की पुस्तक "बाम-ए-जिब्रील" में दर्ज़ है:

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
जो मुश्किल अब है यारब फिर वोही मुश्किल न बन जाए

कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को
खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए

बनाया इश्क़ ने दरिया-ए-ना-पैगा-गराँ मुझको
ये मेरी ख़ुद निगहदारी मेरा साहिल न बन जाए

अरूज़-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
के ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए





’कहकशाँ’ की आज की यह पेशकश आपको कैसी लगी, ज़रूर बताइएगा नीचे ’टिप्पणी’ पे जाकर। या आप हमें ई-मेल के ज़रिए भी अपनी राय बता सकते हैं। हमारा ई-मेल पता है soojoi_india@yahoo.co.in. 'कहकशाँ’ के लिए अगर आप कोई लेख लिखना चाहते हैं, तो इसी ई-मेल पते पर हम से सम्पर्क करें। आज बस इतना ही, अगले जुमे-रात को फिर हमारी और आपकी मुलाक़ात होगी इस कहकशाँ में, तब तक के लिए ख़ुदा-हाफ़िज़!


खोज और आलेख : विश्व दीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

गुरुवार, 24 नवंबर 2016

"सातों बार बोले बंसी" और "जाने दो मुझे जाने दो" जैसे नगीनों से सजी है आज की "गुलज़ार-आशा-पंचम"-मयी महफ़िल



कहकशाँ - 24
गुलज़ार, पंचम और आशा ’दिल पड़ोसी है’ में  
"दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकले दो नगमें 'दिल पड़ोसी है’ ऐल्बम से।



बाद मुद्दत के फिर मिली हो तुम,
ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम,
ये वज़न तुम पर अच्छा लगता है..

अभी कुछ दिनों पहले ही भरी-पूरी फिल्मफेयर की ट्रॉफ़ी स्वीकार करते समय गुलज़ार साहब ने जब ये पंक्तियाँ कहीं तो उनकी आँखों में गज़ब का एक आत्म-विश्वास था, लहजे में पिछले ४८ सालों की मेहनत की मणियाँ पिरोई हुई-सी मालूम होती थीं और बालपन वैसा ही जैसे किसी पाँचवे दर्जे के बच्चे को सबसे सुंदर लिखने या सबसे सुंदर कहने के लिए "इन्स्ट्रुमेंट बॉक्स" से नवाज़ा गया हो। उजले कपड़ों में देवदूत-से सजते और जँचते गुलज़ार साहब ने अपनी उम्र का तकाज़ा देते हुए नए-नवेलों को खुद पर गुमान करने का मौका यह कह कर दे दिया कि "अच्छा लगता है, आपके साथ-साथ यहाँ तक चला आया हूँ।" अब उम्र बढ़ गई है तो नज़्म भी पुरानी होंगी साथ-साथ, लेकिन "दिल तो बच्चा है जी", इसलिए हर दौर में वही "छुटभैया" दिल हर बार कुछ नया लेकर हाज़िर हो जाता है। यूँ तो यह दिल गुलज़ार साहब का है, लेकिन इसकी कारगुजारियों का दोष अपने मत्थे नहीं लेते हुए, गुलज़ार साहब "विशाल" पर सारा दोष मथ देते हैं और कहते हैं कि "इस नवजवान के कारण ही मैं अपनी नज़्मों को जवान रख पाता हूँ।" अब इसे गुलज़ार साहब का बड़प्पन कहें या छुटपन, लेकिन जो भी हो, इतना तो मानना पड़ेगा कि लगभग पचास सालों से चल रही इनकी लेखनी अब भी दवात से लबालब है। अब भी दिल पर वही सुंदर-से "हस्ताक्षर" रचती रहती है, वही गोल-गोल अक्षर, गोल-गोल अंडा, मास्टर-जी का डंडा, बकड़ी की पूँछ, मास्टर-जी की मूँछ, और लो बन गया "क"। ऐसे ही प्यारे-प्यारे तरीकों से और कल्पना की उड़ानों के सहारे गुलज़ार साहब हमारे बीच की ही कोई चीज हमें सौंप जाते हैं, जिसका तब तक हमें पता हीं नहीं होता। ८ सितम्बर १९८७ को भी यही बात हुई थी। उस दिन जब गुलज़ार साहब ने हमें "दिल" का अड्डा बताया, तभी हमें मालूम हुआ कि यह नामुराद कोई और नहीं "हमारा पड़ोसी है", यह ऐसा पड़ोसी है जो "हमारे ग़म उठा लेता है, लेकिन हमारे ग़मों को दूर नहीं करता" तभी तो गुलज़ार साहब कहते हैं:

हाँ मेरे ग़म तो उठा लेता है, ग़मख्वार नहीं,
दिल पड़ोसी है, मगर मेरा तरफ़दार नहीं..

("ये जो थोड़ी-सी भर गई हो तुम..." यह सुनकर आपको नहीं लगता कि शायर ने किसी ख़ास के लिए ये अल्फ़ाज़ कहे हैं। अलग बात है कि फिल्मफेयर की ब्लैक-लेडी पर भी ये पंक्तियाँ सटीक बैठती हैं, लेकिन पवन झा जी की मानें तो गुलज़ार साहब ने कुछ सालों पहले "एक ख़ास" के लिए यह नज़्म लिखी थी.. वह ख़ास कौन है? यह पूछने की ज़रूरत भी है क्या? :) )

हाँ तो हम गुलज़ार साहब और "दिल पड़ोसी है" की बातें कर रहे थे। इस एलबम के एक-एक गीत को गुलज़ार साहब ने इतनी शिद्दत से लिखा है (वैसे ये हर गीत को उतनी ही मेहनत, शिद्दत और हसरत से रचते हैं) कि मुझसे अपनी पसंद के एक या दो गाने चुनते नहीं बन रहे। "कोयले से हीरे को ढूँढ निकाला जा सकता है, लेकिन जहाँ हीरे ही हीरे हो वहाँ पारखी का सर घूम न जाए तो कहना।" वैसे मैं अपने आप को पारखी नहीं मानता लेकिन हीरों के बीच बैठा तो ज़रूर हूँ। शायद एक-एक हीरा परखता चलूँ तो कुछ काम बने। अब ज़रा इसे देखिए:

चाँद पेड़ों पे था,
और मैं गिरजे में थी,
तूने लब छू लिए,
जब मैं सजदे में थी,
कैसे भूलूँगी मैं, वो घड़ी गश की थी,
ना तेरे बस की थी, ना मेरे बस की थी.. (रात क्रिसमस की थी)

या फिर इसे:

माँझी रे माँझी, रमैया माँझी,
मोइनी नदी के उस पार जाना है,
उस पार आया है जोगी,
जोगी सुना है बड़ा सयाना है..

शाम ढले तो पानी पे चलके पार जाता है,
रात की ओट में छुपके रसिया मोहे बुलाता है,
सोना सोना, जोगी ने मेरा
जाने कहाँ से नाम जाना है.. (माँझी रे माँझी) 

यहाँ पर माँझी और मोइनी नदी के बहाने "माया-मोह" की दुनिया के उस पार बसे "अलौकिक" संसार की बात बड़े ही खूबसूरत और सूफ़ियाना तरीके से गुलज़ार साहब ने कह दी है। ऐसी ही और भी कई सारी नज़्में हैं इस एलबम में जिसमें गुलज़ार, पंचम और आशा की तिकड़ी की तूती गूँज-गूँज कर बोलती है। जिस तरह हमने पिछली कड़ी में खुद इन दिग्गजों से ही इनकी पसंद-नापसंद और गानों के बनने की कहानी सुनी थी, उसी तरह आज भी क्यों न वह बागडोर इन्हीं को सौंप दी जाए।

आशा: "सातों बार बोले बंसी"

पंचम: इसके बारे में गुलज़ार, तुम बताओ।

गुलज़ार: "सातों बार बोले बंसी, एक हीं बार बोले ना.. तन की लागी सारी बोले, मन की लागी खोले ना".. ये गाने में खास बात ये है कि बांसुरी को "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: कैसे?

गुलज़ार: जितनी फूंक तन पे लगती है, उतनी हीं बार बोलती है लेकिन अंदर की बात नहीं बताती। उसके सुर सात हैं, सातों बोलते हैं, जो चुप रहती है जिस बात पे, वो नहीं बोलती।

आशा: वाह!

गुलज़ार: उसमें खूबसूरत बात ये है कि उसको "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए। किस तरह से वो उठके कृष्णा के मुँह लगती है, मुँह लगी हुई है, मुँह चढी हुई है, और वो सारी बातें कहती है, एक जो उसका अपनापन है, वो चुप है, वो नहीं बोलती, उन सात सुरों के अलावा। उसके सारी "इलस्ट्रेशन" जितनी है, वो बाँसुरी के साथ "पर्सोनिफ़ाई" करके देखिए आप।

पंचम: ये गाने में थोड़ा लयकारी भी किया था, सरगम भी किए थे, बड़ा अच्छा था।

आशा: और उसमें बाँसुरी साथ में बोल रही है, और आवाज़ भी आ रही है, तो समझ में नहीं आ रहा कि बाँसुरी बोल रही है कि राधा बोल रही है।

गुलज़ार: हाँ, वही, उसमें "परसोनिफ़िकेशन" है सारी की सारी। फूंक पे बोलती है और वो फूंक पे हीं बोलती है बाँसुरी।

अब चूँकि गुलज़ार साहब ने इस गाने को बड़ी ही बारीकी से समझा दिया है, इसलिए मुझे नहीं लगता है मुझे कुछ और कहने की ज़रुरत पड़ेगी। तो चलिए पढते और सुनते हैं यह गाना:

सातों बार बोले बंसी,
एक ही बार बोले ना,
तन की लागी सारी बोले,
मन की लागी खोले ना..

चुपके सुर में भेद छुपाये,
फूँक-फूँक बतलाये,
तन की सीधी मन की घुन्नी,
पच्चीस पेंचे खाए,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..

प्रीत की पीड़ा जाने मुई,
छाती छेद पड़े, 
उठ-उठ के फिर मुँह लगती है,
कान्हा संग लड़े,
हो.. हाँ बोले ना बोले ना,
हाँ बोले ना बोले ना..




नियम से तो हमें बस एक ही गाने तक अपनी महफ़िल को सीमित रखना चाहिए था, लेकिन बात जब इस "स्वर्णिम" तिकड़ी की हो रही हो तो एक से किसका मन भरता है! यूँ भी हम जितना इनके गाने सुनेंगे, उतना ही हमें संगीत की बारीकियाँ जानने को मिलेंगी। पंचम दा की यही तो ख़ासियत रही थी कि वे संगीत को बस "ट्रेडिशनल" एवं "कन्वेशनल" वाद्य-यंत्रों तक घेरकर नहीं रखते थे, बल्कि "बोल" के हिसाब से उसमे "रेलगाड़ी की सीटी", "मुर्गे की बाँग", "जहाज का हॉर्न" तक डाल देते थे। तभी तो सुनने वाला इनके संगीत की ओर खुद-ब-खुद खींचा चला आता था। जहाँ तक आशा ताई की बात है, तो इनके जैसा "रेंज" शायद ही किसी गायिका के पास होगा। ये जितने आराम से "दिल चीज़ क्या है" गाती हैं, उतनी ही सहूलियत से "दम मारो दम" को भी निभा जाती हैं। अब जहाँ ये तीनों अलग-अलग इतने करामाती हैं तो फिर साथ आ जाने पर "क़यामत" तो आनी ही है। आशा जी "दिल पड़ोसी है" को अपना सर्वश्रेष्ठ एलबम मानती है, तभी तो गुलज़ार साहब को उनके जन्मदिवस पर बधाई-संदेश भी इसी के रंग में रंगकर भेज डालती हैं: "भाई जन्म-दिन मुबारक। पंचम, आप और मैं खंडाला में, दिल पड़ोसी है के दिन, मैं जिंदगी में कभी नहीं भूलूंगी।" हम भी इस तिकड़ी को कभी नहीं भूलेंगे। इसी वादे और दावे के साथ चलिए अगली बातचीत और अगले गाने का लुत्फ़ उठाते हैं:

आशा(गाती हैं): "जेते दाओ आमाए डेको ना... "

गुलज़ार: वाह!

पंचम: ये तो आप बंगाली में गा रही हैं.. "प्रोग्राम" का हिन्दी गानों का है।

आशा: हिन्दी हो, पंजाबी हो, चाहे टिम्बकटु की ज़बान हो, गाना सुर जहाँ अच्छे, मतलब जहाँ अच्छा, वो गाना अच्छा होता है।

गुलज़ार: सच में आशा जी, मैंने इसके कई बंगाली गाने चुराए हैं।

आशा: अच्छा?

गुलज़ार: हाँ, बहुत बार। ये पूजा के लिए जो गाने करते हैं, तो मैं पास बैठे हुए, कई बार धुन बहुत अच्छी लगी, जैसे एक, उसके पूरे बंगाली के बोल मुझे याद नहीं, और गौरी दा "फ़ेमस पोयट फ़्रॉम बंगाल"

आशा: गौरी शंकर मजुमदार

गुलज़ार: जी हाँ, और इनके बोल चल रहे थे पूजा के गाने के "आस्थे आमार देरी होबे"

पंचम: आ हा हा

गुलज़ार: उसपे वो गाना लिखा था उस ट्युन पर.. "तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं"

पंचम: ये उसी का गाना?

गुलज़ार: हाँ, आँधी में। और ये भी उसी तरह का गाना इनका, जिसपे आप अभी गा रहीं थीं, "जेते दाव आमाय"

आशा: "दिल पड़ोसी है" में.. (गाती हैं) "जाने दो मुझे जाने दो"।

और ये रहे उस गाने के बोल:

जाने दो मुझे जाने दो
रंजिशें या गिले, वफ़ा के सिले
जो गये जाने दो
जाने दो मुझे जाने दो

थोड़ी ख़लिश होगी, थोड़ा सा ग़म होगा,
तन्हाई तो होगी, अहसास कम होगा
गहरी ख़राशों की गहरी निशानियाँ हैं
चेहरे के नीचे कितनी सारी कहानियाँ हैं
माज़ी के सिलसिले, जा चुके जाने दो 
ना आ आ..

उम्मीद-ओ-शौक़ सारे लौटा रही हूँ मैं,
रुसवाई थोड़ी-सी ले जा रही हूँ मैं
बासी दिलासों की शब तो गुज़ार आये
आँखों से गर्द सारी रोके उतार आये
आँखों के बुलबुले बह गये, जाने दो 
ना आ आ..




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खोज और आलेख : विश्वदीपक ’तन्हा’
प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

शनिवार, 19 नवंबर 2016

"इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...”, बटालवी के इस कविता की क्यों ज़रूरत आन पड़ी ’उड़ता पंजाब’ में?


एक गीत सौ कहानियाँ - 99
 

'इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...' 



रेडियो प्लेबैक इण्डिया' के सभी श्रोता-पाठकों को सुजॉय चटर्जी का प्यार भरा नमस्कार।
दोस्तों, हम रोज़ाना रेडियो पर, टीवी पर, कम्प्यूटर पर, और न जाने कहाँ-कहाँ, जाने कितने ही गीत सुनते हैं, और गुनगुनाते हैं। ये फ़िल्मी नग़में हमारे साथी हैं सुख-दुख के, त्योहारों के, शादी और अन्य अवसरों के, जो हमारे जीवन से कुछ ऐसे जुड़े हैं कि इनके बिना हमारी ज़िन्दगी बड़ी ही सूनी और बेरंग होती। पर ऐसे कितने गीत होंगे जिनके बनने की कहानियों से, उनसे जुड़े दिलचस्प क़िस्सों से आप अवगत होंगे? बहुत कम, है न? कुछ जाने-पहचाने, और कुछ कमसुने फ़िल्मी गीतों की रचना प्रक्रिया, उनसे जुड़ी दिलचस्प बातें, और कभी-कभी तो आश्चर्य में डाल देने वाले तथ्यों की जानकारियों को समेटता है 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' का यह स्तम्भ 'एक गीत सौ कहानियाँ'| इसकी 99-वीं कड़ी में आज जानिए 2016 की फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ के मशहूर गीत "इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत ग़ुम है ग़ुम है...” के बारे में जिसे दिलजीत दोसंझ और शाहिद मालिया ने गाया था। बोल शिव कुमार बटालवी के और संगीत अमित त्रिवेदी का।

कुछ वर्ष पहले फ़िल्म ’लव आजकल’ के मशहूर गीत “अज दिन चढ़ेया तेरे रंग वरगा...” के लिए गीतकार
Shiv Kumar Batalvi
इरशाद कामिल को सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिला था, यह बात बहुतों को पता है। पर जो बात पंजाब के बाहर बहुत कम लोग जानते हैं, वह यह कि इस गीत का जो मुखड़ा है “अज दिन चढ़ेय तेरे रंग वरगा”, यह दरसल प्रसिद्ध पंजाबी कवि शिव कुमार बटालवी की लिखी कविता की पंक्ति है। ’लव आजकल’ के गीत के लिए बटालवी को कोई क्रेडिट नहीं मिला, पर इस वर्ष की चर्चित फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ में बटालवी की लिखी कविता “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” को जब गीत के रूप में पेश किया गया तो उन्हें पूरा-पूरा सम्मान और क्रेडिट दिया गया इस गीत के लिए। शिव कुमार बटालवी पंजाब के पहले आधुनिक कवि माने जाते हैं। उनकी कविताएँ बेहद लोकप्रिय हो जाया करती थीं और लेखन शैली ऐसी थी कि उनकी कविताओं को गीतों के रूप में भी पेश किया जा सकता था। शुरु शुरु में वो ख़ुद ही अपनी कविताओं को गा कर प्रस्तुत करते थे, पर बाद में अन्य गायकों ने भी उनकी कविताओं को ख़ूब गाया। 70 के दशक के शुरुआती किसी वर्ष में बम्बई के शणमुखानन्द हॉल में उन्होंने पहली बार “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” गाया था। उस दिन वो मन में एक अवसाद लेकर स्टेज पर गए थे। उनके भीतर यह भावना थी कि कई गए-गुज़रे लेखक और कवि शोहरत की बुलन्दी पर पहुँच चुके हैं जबकि वो दुनिया की नज़रों में आने के लिए कड़ी संघर्ष किए जा रहे हैं। झल्लाकर उन्होंने उस दिन स्टेज पर यह कह दिया कि “आजकल हर कोई कवि है”, और भी अनाप-शनाप कई बातें उन्होंने कही जिसकी वजह से वहाँ बैठी ऑडिएन्स भड़क उठी। तभी उन्होंने गाना शुरु किया “इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत...”। जनता शान्त हो गई और गाना ख़त्म होते ही तालियों की गड़गड़ाहट ने पूरे हॉल पर कब्ज़ा कर लिया। गीत बेहद मशहूर हो गई और कई गायकों ने इसे गाया। महेन्द्र कपूर की आवाज़ में भी यह गीत काफ़ी मशहूर हुआ था। इनके अलावा जगजीत सिंह ज़िरवी और रब्बी शेरगिल के संस्करण भी ख़ूब चर्चित रहे। और अब इस साल 2016 में विवादों से घिरी फ़िल्म ’उड़ता पंजाब’ में भी इसी गीत को दो संसकरणों में पेश किया गया। अमित त्रिवेदी के संगीत में इसे दिलजीत दोसंझ और शाहिद मालिया ने अलग-अलग गाया।


’उड़ता पंजाब’ फ़िल्म में इस कविता की ज़रूरत क्यों आन पड़ी, इस पर चर्चा करते हैं। फ़िल्म के निर्देशक अभिषेक चौबे बताते हैं, “इक कुड़ी इस फ़िल्म में आई अपने बोलों की वजह से और तब आई जब हम फ़िल्म को लिख ही रहे थे। और इस कविता के शब्द भी ऐसे थे कि जो हमारे सिचुएशन पर पूरी तरह से फ़िट बैठ रहे थे।“ संगीतकार अमित त्रिवेदी के शब्दों में, “जब मेरे पास गीत के बोल आए तो मैंने देखा कि पूरे के पूरे चार पन्ने हैं। पूरे चार पन्ने का गीत। फिर हम लोग सब एक साथ बैठे और साथ मिल कर डिसाइड किया कि जो बेस्ट लाइन्स हैं उन्हें हम इस गीत में रखें। कम्पोज़िशन में हमने मूल गीत से पाँच-छह स्केल ऊपर गए और दिलजीत ने ज़बरदस्त निभाया गीत को।“ अभिनेत्री आलिया भट्ट पर फ़िल्माये इस गीत के बारे में वो कहती हैं, “मैं समझती हूँ कि फ़िल्म में मेरे किरदार की पंजाब में आने से पहले की जो जर्नी है और पंजाब आने के बाद उसकी जर्नी कैसी हो गई, इन दोनों चीज़ों को दिखाना ज़रूरी था। इस गीत के ज़रिए इन बातों को उभारा जा सका है।“ इसमें कोई संदेह नहीं कि बटालवी के इस कविता को अमित त्रिवेदी ने एक नया रूप प्रदान किया है सिर्फ़ एक बार नहीं बल्कि दो दो बार। और दोनों संस्करण अपने आप में उम्दा है। शाहिद मालिया का गाया संस्करण ग्राम्य, लोक-आधारित और भावपूर्ण है, जबकि दिलजीत दोसंझ का गाया संस्करण समकालीन (आधुनिक) और मेलोडी-सम्पन्ना है। दोनों की अपनी-अपनी ख़ासियत है, सुनने वाले पर निर्भर करता है कि उसे कौन सा संस्करण पसन्द है! लेकिन जो भी कहें, महेन्द्र कपूर वाले संस्करण का कोई मुकाबला नहीं है।

“इक कुड़ी जिदा नाम मोहब्बत” कविता एक गीत के लिए बहुत लम्बी है। इसलिए जब भी इसे गाया गया, कुछ पंक्तियाँ काट दी गई। ’उड़ता पंजाब’ में तो केवल मुखड़ा और कविता का पहला अन्तरा ही लिया गया है। करीब साढ़े चार मिनटों में ही गीत को निपटा दिया गया है, जबकि महेन्द्र कपूर वाले संस्करण में चार अन्तरे (तीन शुरु के और एक आख़िर का) लिया गया है। शिव कुमार बटालवी के गाए मूल गीत में उन्होंने सभी अन्तरे गाये थे। लीजिए पेश है बटालवी की लिखी यह कविता...

इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है

सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओह मरियम लगदी
हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी
लम्म सलम्मी सरूं क़द दी
उम्र अजे है मर के अग्ग दी
पर नैणां दी गल्ल समझदी

गुमियां जन्म जन्म हन ओए
पर लगदै ज्यों कल दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों अज्ज दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों हुण दी गल्ल है
हुणे ता मेरे कोल खड़ी सी
हुणे ता मेरे कोल नहीं है
इह की छल है इह केही भटकण
सोच मेरी हैरान बड़ी है
नज़र मेरी हर ओंदे जांदे
चेहरे दा रंग फोल रही है

ओस कुड़ी नूं टोल रही है
सांझ ढले बाज़ारां दे जद
मोड़ां ते ख़ुशबू उगदी है
वेहल थकावट बेचैनी जद
चौराहियां ते आ जुड़दी है
रौले लिप्पी तनहाई विच
ओस कुड़ी दी थुड़ खांदी है
ओस कुड़ी दी थुड़ दिसदी है
हर छिन मैंनू इयें लगदा है
हर दिन मैंनू इयों लगदा है

ओस कुड़ी नूं मेरी सौंह है
ओस कुड़ी नूं आपणी सौंह है
ओस कुड़ी नूं सब दी सौंह है
ओस कुड़ी नूं रब्ब दी सौंह है
जे किते पढ़दी सुणदी होवे
जिउंदी जां उह मर रही होवे
इक वारी आ के मिल जावे
वफ़ा मेरी नूं दाग़ न लावे
नई तां मैथों जिया न जांदा
गीत कोई लिखिया न जांदा
इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है।



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आलेख व प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी
प्रस्तुति सहयोग: कृष्णमोहन मिश्र 




शनिवार, 12 नवंबर 2016

"या तो अभी शुरु में संघर्ष कर लो और बाद में आराम से रहो, या फिर अभी आराम कर लो और बूढ़े होने के बाद संघर्ष करो"


तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी - 18
 
सोनू निगम



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को सुजॉय चटर्जी का सप्रेम नमस्कार। दोस्तों, किसी ने सच ही कहा है कि यह ज़िन्दगी एक पहेली है जिसे समझ पाना नामुमकिन है। कब किसकी ज़िन्दगी में क्या घट जाए कोई नहीं कह सकता। लेकिन कभी-कभी कुछ लोगों के जीवन में ऐसी दुर्घटना घट जाती है या कोई ऐसी विपदा आन पड़ती है कि एक पल के लिए ऐसा लगता है कि जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। पर निरन्तर चलते रहना ही जीवन-धर्म का निचोड़ है। और जिसने इस बात को समझ लिया, उसी ने ज़िन्दगी का सही अर्थ समझा, और उसी के लिए ज़िन्दगी ख़ुद कहती है कि 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िन्दगी'। इसी शीर्षक के अन्तर्गत इस नई श्रृंखला में हम ज़िक्र करेंगे उन फ़नकारों का जिन्होंने ज़िन्दगी के क्रूर प्रहारों को झेलते हुए जीवन में सफलता प्राप्त किये हैं, और हर किसी के लिए मिसाल बन गए हैं। आज का यह अंक केन्द्रित है सुप्रसिद्ध पार्श्वगायक सोनू निगम पर।  
  

सोनू निगम का जन्म फ़रिदाबाद में हुआ था, परवरिश उनकी दिल्ली में, और बाद में मुम्बई में हुई। पिता
माता-पिता के साथ बालक सोनू एक शादी के शो में गाते हुए
अगम कुमार निगम और माँ शोभा निगम भी गायक थे पर फ़िल्म जगत में दाखिल नहीं हो सके, और दोनों की गायिकी स्टेज शोज़, शादी और जागरण तक ही सीमित रह गई। सोनू के पिता अगम जी शुरु शुरु में मुंबई फ़िल्मी पार्श्वगायक बनने आए ज़रूर थे, जेब में पैसे नहीं, रेल्वे प्लैटफ़ॉर्म पर सोया किए। अगम कुमार निगम गायक बनने के लिए वो सब नहीं कर सके जो सोनू ने किया। लोगों के पीछे भागना, स्टुडियो के बाहर घंटों इन्तज़ार करना, चपरासी तक के पाँव छूना और ऐसे लोगों के पाँव पकड़ना जो उन जगहों पर विराजमान थे जहाँ होने की उनकी काबलियत ही नहीं थी, ये सब ना कर पाने की वजह से अगम कुमार निगम को किसी ने नहीं पूछा, और हार मान कर वो दिल्ली वापस चले गए और स्टेज शोज़, जागरण और शादी-व्याह में गाने लगे। इसी दौरान स्टेज शोज़ करते हुए गायिका शोभा से उनकी जान-पहचान बढ़ी, दोनों में प्यार हो गया और घर से भाग कर दोनों ने शादी कर ली। जल्दी ही सोनू का जन्म हुआ; और चार वर्ष की आयु से सोनू भी अपने माता-पिता के साथ शोज़ में गाने लगे। 7 से 10 वर्ष की उम्र में सोनू ने कुछ फ़िल्मों में बतौर बाल कलाकार अभिनय किया जैसे कि ’प्यारा दुश्मन’, ’उस्तादी उस्ताद से’, ’हमसे है ज़माना, ’तक़दीर’ और ’बेताब’। सोनू एक होनहार बच्चा था, अपनी कक्षा में वो अव्वल आता था। कक्षा दसवीं तक अव्वल आने के बाद उनके मन में एक वैज्ञानिक बनने की चाह जागृत हुई। लेकिन होनी को कुछ और मंज़ूर थी। 15 वर्ष की आयु में सोनू की आवाज़ खुल गई और उनकी गाती हुई आवाज़ बेहद सुन्दर सुनाई देने लगी, बिलकुल एक फ़िल्मी गायक जैसी।


जब सोनू 15 वर्ष के थे, तब माता, पिता और उनके द्वारा प्रस्तुत शो के लिए कुल 50 रुपये मिला करते थे।
धीरे धीरे राशि बढ़ी और 175 रुपये तक पहुँची। सोनू मुंबई जाकर संघर्ष करने के लिए पैसे बचाने लगे। उनकी दृष्टि लक्ष्य पर थी। बारहवीं उत्तीर्ण करते ही सोनू ने पढ़ाई से किनारा कर लिया और अपने पिता के साथ 18 वर्ष की आयु में 1991 में मायानगरी मुंबई चले आए। सोनू ने संगीत ऑडियो कैसेट्स सुन सुन कर ही सीखा था, पर मुंबई में लोग उनकी तालीम के बारे में सवाल ना खड़ा कर सके, सिर्फ़ इस वजह से उन्होंने दिल्ली में रहते चार महीनों का एक कोर्स किया जिसमें राग और ताल की प्राथमिक शिक्षा उन्हें मिली। पिता अगम कुमार निगम को फ़िल्म-इंडस्ट्री का सबकुछ पता था, इसलिए उनकी दूर-दृष्टि से उन्होंने अपने बेटे की हर क़दम पर मदद की, उन्हें गाइड किया। पिता ने उन्हें चेतावनी दी कि चाहे कुछ भी हो जाए, चाहे कितने भी पैसे मिले, पार्श्वगायक बनने से पहले मुंबई में कभी स्टेज शोज़ या शादी में नहीं गाना। अगम जी को पता था कि अगर एक बार सोनू शोज़ करते हुए पैसे कमाने लग गया तो पार्श्वगायक बनने का जुनूं ख़त्म हो जाएगा और वो भी उन जैसा नाकामयाब गायक बन कर रह जाएगा। मुम्बई में पिता-पुत्र शुरु-शुरु में उनके किसी रिश्तेदार के घर पर ठहरे हुए थे। बाद में उन्होंने दिल्ली का अपना मकान बेच दिया और मुंबई के अन्धेरी में एक कमरे का एक फ़्लैट ख़रीद कर मुंबई शिफ़्ट हो गए। माँ अभी भी दिल्ली में ही थीं क्योंकि उनके शोज़ वहाँ हुआ करते थे। पिता-पुत्र अन्धेरी के एक कमरे वाले फ़्लैट में रहने लगे। सोनू ही खाना पकाते, झाडू लगाते, कपड़े धोते, बरतन माँजते, घर की तमाम साफ़-सफ़ाई करते। आलम यह था कि वहाँ आस-पड़ोस के कुछ लोग उन्हें घर का नौकर समझ बैठे थे!

सोनू के पिता ने उन्हें यह सीख दी थी कि या तो अभी शुरु में संघर्ष कर लो और बाद में आराम से रहो, या फिर अभी आराम कर लो और बूढ़े होने के बाद संघर्ष करो। यह सीख सोनू ने सदा याद रखी। अन्धेरी के फ़्लैट में उनका कोई टेलीफ़ोन नहीं था, उस ज़माने में मोबाइल फ़ोन नहीं आया था, इसलिए सोनू को PCO जाकर सारे म्युज़िक कंपनियों और संगीतकारों को फ़ोन लगा कर उनसे समय माँगना पड़ता था। कई बार दूसरी तरफ़ से बिना कोई जवाब दिए ही फ़ोन काट दिया जाता, कभी कोई ग़लत तरीक़े से जवाब दे देता। पर सोनू ने हिम्मत
नहीं हारी। इन सब बातों को नज़रन्दाज़ करते हुए अपनी नज़र को सिर्फ़ अपनी मंज़िल की तरफ़ रखा, बाक़ी सब भूल गए। संघर्षरत सोनू सुबह से ही संगीतकारों के दफ़्तरों में जाकर बैठ जाते थे, कि आप आओ और मुझे सुनो। सात-आठ घंटे बिना खाये पीये रेकॉर्डिंग् स्टुडिओज़ के बाहर बैठे रहते इस उम्मीद से कि शायद आज मुझे कोई सुन ले। थकने का सवाल ही नहीं था। और अगर जुनून सवार है सर पे कुछ बनने की तो थकावट तो आती ही नहीं। इन्डस्ट्री में सोनू का कोई Godfather नहीं था, उन्हें ख़ुद अपना रास्ता बनाना था, तमाम चुनौतियों का ख़ुद ही मुक़ाबला करना था। सोनू ने एक इन्टरव्यू में यह बताया कि ट्रेन से उतर कर पिता के साथ वो सीधे बान्द्रा के उसी कॉकरोच वाले मानसरोवर होटल में ठहरने के लिए गए जहाँ धर्मेन्द्र ठहरे थे जब वो पहली बार मुंबई आए थे। धर्मेन्द्र की तरह उनकी क़िस्मत का सितारा भी चमका दे यह होटल, क्या पता! पिता-पुत्र ने होटल के कमरे में सामान रखा और सीधे सचिन पिलगाँवकर के पास चल दिए। सचिन ने सोनू को दिल्ले के एक प्रतियोगिता में सुन सुन रखा था और सोनू के पिता को उस समय यह कहा भी था कि जब ये बड़ा हो जाए तो उनके पास ले आएँ। सचिन पिता-पुत्र से बहुत अच्छी तरह से मिले। फिर वो गए अनु मलिक के पास जिन्होंने सोनू को दिल्ली के ही एक अन्य प्रतियोगिता में सुना था। जब सोनू ने उन्हें याद दिलाया कि वो वही लड़का है जिसनी टूटीघुई टाँग के साथ गाना गाया था, तब अनु मलिक को याद आ गया। हालाँकि अनु मलिक के पास सोनू के लिए कोई काम नहीं था उस समय, पर वो अच्छी तरह से मिले।

सचिन और अनु मलिक के बाद सोनू और अगम साहब पहुँचे उषा खन्ना के पास। उन्हें ख़बर थी कि उषा जी
नए कलाकारों को ब्रेक देती हैं। सात घंटे इन्तज़ार करने के बाद सोनू को उषा खन्ना के दर्शन हुए और अपना गीत सुनाने का मौक़ा भी मिल गया। उषा खन्ना को सोनू की आवाज़ बहुत अच्छी लगी और जल्दी ही उनके संगीत में सोनू से उनका पहला गाना गवाया। लेकिन यह गीत सोनू के करीअर में कोई कमाल नहीं दिखा
सका। पिता-पुत्र पूरे मुंबई शहर में बसों में और बाद में एक टू-व्हीलर पर घूमा करते काम की तलाश में। उसके बाद 1992 में सोनू को एक डमी गीत गाने का मौका मिला जो एस. पी. बालसुब्रह्मण्यम् द्वारा गाया जाने वाला था। शूटिंग् डमी वर्ज़न से हुई और इस तरह से फ़िल्म के सेट पर गाना बार बार बजने की वजह से गुल्शन कुमार के दिल-ओ-दिमाग़ पर सोनू की आवाज़ रच बस गई। गुल्शन कुमार को संगीत की समझ थी, हीरा परखना जानते थे, और उन्होंने सोनू को बुलवा भेजा। सोनू को देख कर गुल्शन कुमार बोले, "ओय, कोहली तो कह रहा था कि आप छोटे हो, लेकिन आप तो बहुत छोटे हो!" लेकिन गुलशन कुमार ने सोनू वाला डमी वर्ज़न को ही अप्रूव कर दिया और "ओ आसमाँ वाले" गीत सोनू का पहला ब्रेक सिद्ध हुआ। गुल्शन कुमार ने सोनू से यह वादा लिया कि चाहे वो बाहर कितने भी मूल गीत गाए, लेकिन कवर वर्ज़न सिर्फ़ उन्हीं के लिए गाए। टी-सीरीज़ की कुछ फ़िल्मों में गाने बावजूद सोनू को किसी महत्वपूर्ण फ़िल्म में गाने का मौक़ा नहीं मिला। उस समय कुमार सानू, उदित नारायण और अभिजीत शीर्ष पर चल रहे थे। सोनू ने इसी दौरान टेलीविज़न पर ’अन्ताक्षरी’ में हिस्सा लिया और फिर ’सा रे गा मा’ को होस्ट कर ख़ूब लोकप्रियता हासिल की और घर-घर वो पहचाने जाने लगे। और फिर 1997 में उन्होंने गाया वह गीत जिसके बाद फिर कभी उन्हें पीछे मुड़ कर देखने की ज़रूरत नहीं पड़ी। "संदेसे आते हैं, हमें तड़पाते हैं" गीत ने उन्हें बतौर पार्श्वगायक फ़िल्म जगत में स्थापित कर दिया। सोनू के माता-पिता ने अपने बेटे का साथ देते हुए अपने बेटे के ज़रिए वह मुकाम हासिल किया जो मुकाम वो दोनों हासिल न कर सके। माँ-बाप के लिए इससे ज़्यादा ख़ुशी की बात भला और क्या हो सकती है!  ’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की तरफ़ से हम सोनू निगम को ढेरों शुभकामनाएँ देते हैं, साथ ही सलाम करते हैं उनके माता-पिता शोभा निगम और अगम कुमार निगम को। 




आपको हमारी यह प्रस्तुति कैसी लगी, हमे अवश्य लिखिए। हमारा यह स्तम्भ प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को प्रकाशित होता है। यदि आपके पास भी इस प्रकार की किसी घटना की जानकारी हो तो हमें पर अपने पूरे परिचय के साथ cine.paheli@yahoo.com मेल कर दें। हम उसे आपके नाम के साथ प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। आप अपने सुझाव भी ऊपर दिये गए ई-मेल पर भेज सकते हैं। आज बस इतना ही। अगले शनिवार को फिर आपसे भेंट होगी। तब तक के लिए नमस्कार। 

प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी  



गुरुवार, 10 नवंबर 2016

अपने पडो़सी दिल से भीनी-भीनी भोर की माँग कर बैठे गोटेदार गुलज़ार साहब, आशा जी एवं राग तोड़ी वाले पंचम दा



कहकशाँ - 23
गुलज़ार, पंचम और आशा ’दिल पड़ोसी है’ में  
"भीनी भीनी भोर आई..."



’रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के सभी दोस्तों को हमारा सलाम! दोस्तों, शेर-ओ-शायरी, नज़्मों, नगमों, ग़ज़लों, क़व्वालियों की रवायत सदियों की है। हर दौर में शायरों ने, गुलुकारों ने, क़व्वालों ने इस अदबी रवायत को बरकरार रखने की पूरी कोशिशें की हैं। और यही वजह है कि आज हमारे पास एक बेश-कीमती ख़ज़ाना है इन सुरीले फ़नकारों के फ़न का। यह वह कहकशाँ है जिसके सितारों की चमक कभी फ़ीकी नहीं पड़ती और ता-उम्र इनकी रोशनी इस दुनिया के लोगों के दिल-ओ-दिमाग़ को सुकून पहुँचाती चली आ रही है। पर वक्त की रफ़्तार के साथ बहुत से ऐसे नगीने मिट्टी-तले दब जाते हैं। बेशक़ उनका हक़ बनता है कि हम उन्हें जानें, पहचानें और हमारा भी हक़ बनता है कि हम उन नगीनों से नावाकिफ़ नहीं रहें। बस इसी फ़ायदे के लिए इस ख़ज़ाने में से हम चुन कर लाएँगे आपके लिए कुछ कीमती नगीने हर हफ़्ते और बताएँगे कुछ दिलचस्प बातें इन फ़नकारों के बारे में। तो पेश-ए-ख़िदमत है नगमों, नज़्मों, ग़ज़लों और क़व्वालियों की एक अदबी महफ़िल, कहकशाँ। आज पेश है गुलज़ार, राहुल देव बर्मन और आशा भोसले की तिकड़ी के सुरीले संगम से निकला एक नगमा 'दिल पड़ोसी है’ ऐल्बम से।



गुलज़ार और पंचम - ये दो नाम दो होते हुए भी एक से लगते हैं और जब भी इन दोनों का नाम साथ में आता है तो सुनने वालों को मालूम हो जाता है कि कुछ नया कुछ अलबेला पक के आने वाला है बाहर। अभी-अभी पतीला खुलेगा और कोई मीठी-सी नज़्म छलकते हुए हमारे कानों तक पहुँच जाएगी। ये दोनों फ़नकार एक-दूसरे के पूरक-से हो चले थे। कैसी भी घुमावदार सोच हो, किसी भी मोड़ पर बिन कहे मुड़ने वाले मिसरे हों या फिर किसी अखबार की सुर्खियाँ ही क्यों न हो, गुलज़ार के हरेक शब्द-नुमा ईंट का जवाब पंचम अपने सुरों के पत्थर (अजीब उपमा है.. यूँ होना तो फूल चाहिए, लेकिन मुहावरा बनाने वाले ने हमारे पास कम ही विकल्प छोड़े हैं) से दिया करते थे। और जवाब ऐसा कि "साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे"; गुलज़ार के शब्द जहाँ शिखर पर ही मौजूद रहे, वहीं उसी के इर्द-गिर्द पंचम अपनी पताका भी लहरा आएँ, तभी तो दोनों की जोड़ी आजतक प्यार और गुमान से याद की जाती है। 

लेकिन यह जोड़ी ज़्यादा दिनों तक रह नहीं पाई। गुलज़ार को राह में अकेले छोड़कर पंचम दूसरी दुनिया में निकल लिए। पंचम के गुज़रने का असर गुलज़ार पर किस हद तक पड़ा, इसका अंदाज़ा पंचम की याद में लिखे गुलज़ार के इस नज़्म से लगाया जा सकता है:

याद है बारिशों का दिन, पंचम 

याद है जब पहाड़ी के नीचे वादी में 
धुंध से झांककर निकलती हुई 
रेल की पटरियां गुज़रती थीं 
धुंध में ऐसे लग रहे थे हम 
जैसे दो पौधे पास बैठे हों 
हम बहुत देर तक वहां बैठे 
उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे 
जिसको आना था पिछली शब, लेकिन 
उसकी आमद का वक्‍त टलता रहा 
देर तक पटरियों पर बैठे हुए 
रेल का इंतज़ार करते रहे 
रेल आई ना उसका वक्‍त हुआ 
और तुम, यूं ही दो क़दम चलकर 
धुंध पर पांव रखके चल भी दिए 

मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम'...

पंचम की क्षति अपूर्णीय है, जितना गुलज़ार के लिए उतना ही संगीत के अन्य साधकों के लिए भी। मैंने जब यह "आलेख" लिखना शुरू किया था तो यह सोचा नहीं था कि मेरी लेखनी पंचम को याद करने में डूब जाएगी, लेकिन भावनाओं का वह सैलाब बह निकला कि न मैं खुद को रोक पाया, न अपनी लेखनी को। बात जब गुलज़ार और पंचम की हो रही है तो क्यों न आज अपनी महफ़िल को इन्हीं दोनों की एक नज़्म से सजाया जाए। 

हम आज की नज़्म तक पहुँचें, इससे पहले एक और फ़नकार से आपका परिचय कराना लाजिमी हो जाता है, मुआफ़ कीजिएगा, फ़नकार नहीं.. फ़नकारा। इन फ़नकारा के बिना गुलज़ार-पंचम की जोड़ी में उतनी जान नहीं, जो कि इनकी तिकड़ी में है। यह फ़नकारा कोई और नहीं, बल्कि पंचम दा की अर्धांगिनी आशा भोसले जी हैं, जिन्हें सारी दुनिया आशा ताई के नाम से पुकारती है। गुलज़ार साहब, पंचम दा और आशा ताई की तिकड़ी ने फिल्मों में एक से बढ़ कर एक गीत दिए हैं। चंद नाम यहाँ पेश किए देता हूँ: --'क़तरा क़तरा‍ मिलती है', 'मेरा कुछ सामान', 'आंकी चली बांकी चली', 'आऊंगी एक दिन आज जाऊं', 'बड़ी देर से मेघा बरसा', 'बेचारा दिल क्‍या करे', 'छोटी सी कहानी से', ’घर जाएगी तर जाएगी’, ’ये साये हैं ये दुनिया है’... यह फेहरिश्त और भी बहुत लंबी है, लेकिन मेरे हिसाब से इतने उदाहरण ही काफी हैं। 

न सिर्फ़ फिल्मों में बल्कि इनकी तिकड़ी का कमाल "एलबमों" में भी नज़र आता है। "एलबमों" की बात करने पर जिस एलबम की याद सबसे पहले आती है, वह है "दिल पड़ोसी है"। इस एलबम को आशा ताई के जन्मदिन पर यानि कि ८ सितम्बर को १९८७ में रीलिज किया गया था। इसमें में कुल चौदह गाने हैं। आज आपको हम इस एलबम से "भीनी भीनी भोर आई" सुनवाने जा रहे हैं। अगली कड़ी में हम एलबम के बाकी गानों से रूबरू होंगे। इस गाने के बारे में हम कुछ कहें, इससे अच्छा होगा कि क्यों न इसके कारीगरों से ही इसके बनने की कहानी सुन लें। "संगीत सरिता" कार्यक्रम के अंतर्गत "मेरी संगीत यात्रा" लेकर आ रहे हैं "गुलज़ार साहब, पंचम दा एवं आशा ताई"..

पंचम दा: आशा जी, आपको याद है कोई गीत जो आपने काफ़ी मेहनत से गाया होगा?

आशा जी: हाँ, एक गीत आपने राग तोड़ी में बनाया था। वैसे तोड़ी में "धा" से पंचम लगाना चाहिए, पर फिल्मी गीत में अगर पूरा का पूरा राग वैसे हीं रख दिया जाए तो उस राग पर आधारित सभी गीत एक जैसे हीं लगेंगे। थोड़ी-बहुत चेंज करके अगर गीतों को ढाला जाए तो एक नयापन भी आता है और सुनने में भी अच्छा लगता है।

गुलज़ार साहब: हाँ सही बात है, अगर "क्लासिकल म्युज़िक" को मिसाल बनाकर कोई फिल्म बन रही है तब अलग बात है।

पंचम दा: गुलज़ार, आप को याद है "भीनी भीनी भोर".. "दिल पड़ोसी है" एलबम का ये पहला गाना रखा था हमने?

आशा जी: गुलज़ार भाई, आपने इस गाने में "गोटा" शब्द का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया था।

गुलज़ार साहब: सोने की चमक की "उपमा" हमारे फिल्मी गीतों में काफ़ी पाई जाती है, कभी आग से, कभी धूप से। लेकिन हर चीज़ जो चमकती है वह सोना नहीं होती (तीनों हँसते हैं), हमारे यहाँ शादी में गोटेदार चुनरी देखने को मिलती है, तो उसी से मैंने यह लिया था।

आशा जी: लेकिन आपने तो बादल को गोटा लगाया था ना?

गुलज़ार साहब: मुझे लगता था कि गोटे की जो चुनरी है वो बहुत हीं खूबसूरत है। आशा जी, आपने कहा कि पंचम ने तोड़ी का "चलन" बदला, मुझे तो हमेशा हीं इसके चाल-चलने पर शक़ रहा है (तीनों ठहाका लगाते हैं), आपने कहा कि इन्होंने अपना चलन बदला! (हँसी ज़ारी है)

पंचम दा: यह सुबह का गाना था, इसमें हमने मुर्गियों की आवाज़ डाली थी, बहुत सारे "साउंड इफ़ेक्ट्स" थे कि जिससे सुबह का "वातावरण" सामने आए, एक आदत हो चुकी थी, अब आप इसे चलन कहिये, ऐसे कोई राग बन जाता हओ, "मूड" बन जाता है।

तो आपने देखा कि माहौल कितना खुशगवार हो जाता था, जब ये तीनों एक जगह आ जुटते थे। जब बातचीत इतनी सुरीली है तो संगीत के बारे में क्या कहा जाए! चलिए तो फिर हम भी राग तोड़ी में मुर्गिर्यों की बांग के बीच गुलज़ार साहब के "गोटे" का मज़ा लेते हैं और इस तिकड़ी को फिर से याद करते हैं (वैसे अगली कड़ी भी इसी तिकड़ी और इसी एलबम को समर्पित है):

भीनी भीनी भोर आई
भीनी भीनी भोर आई
रूप रूप पर छिडके सोना
स्वर्ण कलश चमकाती आई
भीनी भीनी भोर आई...

माथे सुनहरी टीका लगाये
पात पात पर गोटा लगाये
गोटा लगाई
सात रंग की जाई आई
भीनी भीनी भोर आई...

ओस धुले मुख पोछे सारे
आँगन लेप गई उजियारे
उजियारे उजियारे
सा रे ग मा धा नि
जागो जगर की बेला आई
भीनी भीनी भोर आई...

भीनी भीनी भोर आई
रूप रूप पर छिडके सोना
रूप रूप पर छिडके सोना
स्वर्ण कलश चमकाती आई
भीनी भीनी भोर आई
भीनी भीनी भोर आई


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प्रस्तुति सहयोग : कृष्णमोहन मिश्र 
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी 

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