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Saturday, March 29, 2014

अभिनेत्री नन्दा को श्रद्धांजलि आज 'एक गीत सौ कहानियाँ' में...


एक गीत सौ कहानियाँ - 26
 

‘अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम...’



"मुझे अभी-अभी पता चला कि अभिनेत्री नन्दा, जिसे हम बेबी नन्दा कहते थे, वो अब हमारे बीच नहीं रही। यह सुन कर मुझे बहुत दुख हुआ। बेबी नन्दा जब 4-5 साल की थी, तब उसने 'मन्दिर' फ़िल्म में मेरे छोटे भाई की भूमिका निभायी थी। मैं नन्दा के पिताजी मास्टर विनायक जी की कम्पनी में बतौर बाल कलाकार 1943 से काम करती थी। मेरी और नन्दा और उसकी बड़ी बहन मीना के साथ बड़ी दोस्ती थी। नन्दा की पहली फ़िल्म 'तूफ़ान और दीया' से मैंने नन्दा के लिए प्लेबैक शुरु किया। बहुत अच्छी इंसान थी। भगवान उसकी आत्मा को शान्ति दे।" --- लता मंगेशकर


भिनेत्री नन्दा अब इस दुनिया में नहीं रहीं। लता जी के उपर्युक्त शब्दों से पता चलता है कि कितना अन्तरंग रिश्ता रहा होगा दोनों में। आज नन्दा जी को श्रद्धा-सुमन अर्पित करने के लिए लता जी के गाये और नन्दा जी पर फ़िल्माये फ़िल्म 'हम दोनो' के भजन "अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम" से बेहतर कोई रचना नहीं होगी। गाँधीवादी विचारधारा लिये राग गौड़ सारंग आधारित इस भजन को सुन कर ऐसा लगता है कि जैसे कोई पारम्परिक रचना होगी। पर नहीं, यह एक फ़िल्मी गीत है जिसे साहिर लुधियानवी ने लिखा है और जयदेव ने स्वरबद्ध किया है। फ़िल्मी भजनों की श्रेणी में शायद सर्वोपरि है यह भजन। यह केवल भजन ही नहीं, बल्कि साप्रदायिक एकता और अहिंसा का संदेश भी है। ख़ास बात यह है कि स्वतंत्र संगीतकार के रूप में यह जयदेव की पहली भक्ति रचना थी। जयदेव के ही शब्दों में, "बतौर स्वतन्त्र संगीतकार, मेरी पहली फ़िल्में थीं 'जोरु का भाई', 'किनारे-किनारे' और 'नवकेतन' की एक फ़िल्म, जो सारे के सारे नाकामयाब रहे। फिर मुझे मिला 'हम दोनो"। तो पहली ही भजन में इस तरह की सफलता यकायक देखने को नहीं मिलती। इस भजन की गायिका, स्वयं लता जी कहती हैं, "इस भजन को अगर सुबह और रात के वक़्त सुना जाये तो एक अजीब सी सुकून मिलता है" (जयमाला, विविध भारती)। लता जी को यह भजन इतना पसन्द है कि नूरजहाँ जब कई वर्ष बाद भारत आयीं थीं और उनके स्वागत में -'Mortal Men, Immortal Melodies' नामक शो आयोजित किया गया था, उस शो में लता जी ने इसे शामिल किया था। रूपक ताल में स्वरबद्ध यह भजन सुनने में कितना सीधा-सरल लगता है, ध्यान से सुनने पर अहसास होता है कि जयदेव ने कितनी मेहनत की होगी इस पर। गीत निचले स्वर से शुरू होकर क्रमश: ऊपर के स्वरों तक पहुंचता चला जाता है। एक तरफ़ लता की आवाज़ और दूसरी तरफ़ कोरस की आवाज़, इन दो आवाज़ों के साथ जयदेव ने क्या ख़ूब प्रयोग किया हैं। दो आवाज़ों को एक बार मिला दिया और फिर किस सुन्दरता से दोनों को अलग कर दिया, इन सब छोटी-छोटी बातों से भी इस भजन में निखार आया है।

केवल लता जी ही नहीं, इस भजन के कद्रदानों की संख्या बहुत बड़ी है। फ़िल्म-संगीत के पहले दौर के कलाकारों से लेकर आज के दौर के कलाकारों में इस भजन के चाहनेवाले शामिल हैं। तिमिर बरन और उमा देवी ने अपने अपने 'जयमाला' कार्यक्रमों में इस भजन को चुना था। कलात्मक फ़िल्मों के जाने-माने संगीतकार अजीत वर्मन ने इस भजन के बारे में अपने 'जयमाला' में फ़ौजी भाइयों से कहा है, "मेरे भाई, अभी जो गाना मैं सुनाने जा रहा हूँ, सच्ची, जब मैं अकेला, अकेला तो मैं हो ही नहीं सकता क्योंकि मेरा दिल मेरे साथ रहता है, my heart is my inspiration, हाँ तो यह गाना जयदेव का "अल्लाह तेरो नाम" इतना अच्छा भजन बहुत कम बना है। इतना सिम्पल वो ही बना सकता है जो बहुत लम्बी राह चला हो।" अनूप जलोटा द्वारा प्रस्तुत 'हिट सुपरहिट फ़ेवरिट फ़ाइव' कार्यक्रम में अपने मनपसन्द पाँच गीतों में सर्वप्रथम उन्होंने इसी भजन को चुना और कहा, "मुझे बहुत पसन्द है लता जी का गाया "अल्लाह तेरो नाम"। यह कहूँगा कि इसकी ख़ूबी है कि कितनी सरल कम्पोज़िशन और कितनी पावरफ़ुल कम्पोज़िशन है जिसे जयदेव जी ने बनायी है, लता जी ने गाया तो अच्छा ही है, लेकिन आपको एक छोटा सा उदाहरण दे दूँ इस गाने के बारे में, कि इससे ज़्यादा सरल क्या हो सकती है कम्पोज़िशन की कि इसका स्थायी और अन्तरा एक ही धुन पर है। सिर्फ़ "स" को "म" कर दिया।" इस भजन के कद्रदानों में कविता कृष्णमूर्ती, जावेद अख़्तर, शबाना आज़मी, राकेश ओमप्रकाश मेहरा, स्वानन्द किरकिरे और सोनू निगम भी शामिल हैं।

जयदेव और लता
फ़िल्म 'हम दोनों' में लता के गाये दो भजन हैं - एक तो "अल्लाह तेरो नाम" और दूसरा भजन है राग धानी आधारित "प्रभु तेरो नाम, जो ध्याये फल पाये"। कुछ लोगों के अनुसार "अल्लाह तेरो नाम" "प्रभु तेरो नाम" का ही एक दूसरा संस्करण है, पर सच्चाई यह है कि ये दोनों एक दूसरे से बिल्कुल अलग, और स्वतंत्र रचनाएँ हैं। दोनों भजन नन्दा पर फ़िल्माया गया है। फिल्म के इन गीतों से एक रोचक प्रसंग जुड़ा है। सचिनदेव बर्मन से कुछ मतभेद के कारण उन दिनों लता मंगेशकर ने उनकी फिल्मों में गाने से मना कर दिया था। बर्मन दादा के सहायक रह चुके जयदेव ने इस प्रसंग में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। पहले तो लता जी ने जयदेव के संगीत निर्देशन में गाने से मना कर दिया, परन्तु जब उन्हें यह बताया गया कि यदि ‘हम दोनों’ के गीत लता नहीं गाएँगी तो फिल्म से जयदेव को ही हटा दिया जाएगा, यह जान कर लता जी गाने के लिए तैयार हो गईं। उन्हें यह भी बताया गया कि भक्तिरस में पगे इन गीतों के लिए जयदेव ने अलौकिक धुनें बनाई है। अब इसे लता जी की उदारता मानी जाए या व्यावसायिक कुशलता, उन्होने इन गीतों को अपने स्वरों में ढाल कर कालजयी बना दिया। "अल्लाह तेरो नाम" भजन में दो अन्तरे हैं। फ़िल्म के पर्दे पर और ग्रामोफ़ोन रेकॉर्ड पर, दोनों में दो अन्तरे सुनाई पड़ते हैं। पर एक बात ध्यान देने योग्य हैं कि जब जयदेव जी ने विविध भारती पर अपनी 'जयमाला' प्रस्तुत की थी, उसमें इस भजन को सुनवाते हुए कहा था, "फ़ौजी भाइयों, जो सेवा आप हमारी कर रहे हैं, इस देश की रक्षा कर रहे हैं, हम सब आप लोगों के शुक्रगुज़ार हैं, आप जहाँ भी हों, पहाड़ों में, सहराओं में, समन्दरों में, भगवान आप को ख़ुश रखें, आप के परिवारों को ख़ुशहाल रखें। इस धरती का रूप न उजड़े, प्यार की ठण्डी धूप न उजड़े, सबको मिले दाता सबको मिले इसका वरदान। सबको मिले सुख-शान्ति, यही है ईश्वर से मेरी प्रार्थना"। अगर आप इन शब्दों पर ग़ौर करें तो साफ़-साफ़ इस भजन का तीसरी अन्तरा हमारे सामने आ जाता है - "इस धरती का रूप न उजड़े, प्यार की ठण्डी धूप न उजड़े, सबको मिले दाता सबको मिले इसका वरदान, सबको सन्मति दे भगवान"। तो क्या यह तीसरा अन्तरा भी साहिर साहब ने लिखा था जिसे गीत में जगह नहीं मिली? या फिर ये शब्द जयदेव जी के ही थे इस कार्यक्रम के लिए? क्या पता!

साहिर
इस दौर के सुप्रसिद्ध गीतकार स्वानन्द किरकिरे ने हाल में इस भजन की सुन्दर स्मीक्षा की है, जिसका हिन्दी में अनुवाद कुछ इस तरह का है - "पीछे मुड़ कर देखता हूँ तो अहसास होता है कि बहुत सालों तक मैंने सही मायने में इस भजन के शब्दों पर ग़ौर नहीं किया था। अपनी उम्र के तीसरे दशक में पाँव रखने के बाद मैं इस भजन के बोलों की ओर आकर्षित हुआ और समझ आया कि ये बोल क्या संदेश दे रहे हैं। मैंने आविष्कार किया कि "अल्लाह तेरो नाम" महज़ एक भजन नहीं है, यह युद्ध के ख़िलाफ़ एक दरख्वास्त है। कुछ तो बात है इस गीत में कि यह मेरे साथ रहा है इतने सालों से। इसे मैं गीत नहीं समझता, यह तो एक प्रार्थना है, श्लोक है, अमृत वाणी है, और मेरे अनुसार यह हिन्दी फ़िल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ प्रार्थना है। इस गीत के साथ मेरी जो सबसे पुरानी स्मृतियाँ हैं, वो ये कि इसे हमारे स्कूल में स्वाधीनता दिवस और गणतन्त्र दिवस पर गाया जाता था। और मेरी यह धारणा थी कि मैं इसे जानता हूँ, समझता हूँ। पर उस वक़्त मैं ग़लत था। बोलों की अगर बात करें तो मुझे नहीं लगता कि साहिर साहब से बेहतर कोई इसे लिख पाते, जिनकी शायरी ने मुझे हमेशा प्रेरित किया है। यह उनका ही कमाल है कि एक साधारण प्रार्थना गीत में उन्होंने ऐसी सोच, ऐसे उच्च विचार भरे हैं कि यह एक यूनिवर्सल प्रेयर बन गया है। अगर पहला अन्तरा हीरा है तो दूसरे अन्तरे में तो साहिर साहब ने काव्य के गहराई की हर सीमा पार कर दी है। "ओ सारे जग के रखवाले, निर्बल को बल देने वाले, बलवानों को दे दो ज्ञान" हमें एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। इसमें मीटर है, मेलडी है, अर्थ है, गहराई है। युद्ध में विश्वास रखने वालों और बिना कुछ जाने एक दूसरे को मारने वालों के लिए यह गीत जैसे एक व्यंग है, वार है। इस गीत का एक और आकर्षण है साज़ों का अरेन्जमेण्ट और कम्पोज़िशन। कमचर्चित संगीतकार जयदेव ने इस गीत में कई रागों को इस तरह से छिड़का है कि एक आकर्षण करने वाली ख़ुशबू सी आती है जब जब इसे सुनते हैं। इसे हर बार सुनते हुए मेरी आँखें भर आती हैं। लता जी ने यह गीत गाया है। सोनू निगम एक और गायक हैं जो इसे बहुत ख़ूबसूरती से गाते हैं। मैं जब भी उनसे मिलता हूँ, अपने दोस्तों के साथ बैठ जाता हूँ उनसे यह गीत सुनने के लिए। यह गीत एक बेहतरीन उदाहरण है एक सशक्त और सर्वव्यापी प्रार्थना का जो मुझे अपने जज़्बातों और देशभक्ति भावना को जगाने में मदद करती है। इस भजन के सुर मेरे विवेक में और मुझमें समाया हुआ है, हमेशा हमेशा।"

इसी गीत के माध्यम से 'रेडियो प्लेबैक इण्डिया' की तरफ़ से स्वर्गीय अभिनेत्री नन्दा को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे!

फिल्म - हम दोनों : अल्लाह तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम...' : लता मंगेशकर : संगीत - जयदेव : गीतकार - साहिर लुधियानवी 





अब आप भी 'एक गीत सौ कहानियाँ' स्तंभ के वाहक बन सकते हैं। अगर आपके पास भी किसी गीत से जुड़ी दिलचस्प बातें हैं, उनके बनने की कहानियाँ उपलब्ध हैं, तो आप हमें भेज सकते हैं। यह ज़रूरी नहीं कि आप आलेख के रूप में ही भेजें, आप जिस रूप में चाहे उस रूप में जानकारी हम तक पहुँचा सकते हैं। हम उसे आलेख के रूप में आप ही के नाम के साथ इसी स्तम्भ में प्रकाशित करेंगे। आप हमें ईमेल भेजें cine.paheli@yahoo.com के पते पर।


खोज और आलेख - सुजॉय चटर्जी व कृष्णमोहन मिश्र
प्रस्तुति : सुजॉय चटर्जी

Sunday, September 22, 2013

‘प्रभु तेरो नाम जो ध्याये फल पाए...’


  
स्वरगोष्ठी – 138 में आज

रागों में भक्तिरस – 6

राग धानी का रंग : लता मंगेशकर और लक्ष्मी शंकर के संग


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की छठी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, एक बार पुनः आप सब संगीत-रसिकों का स्वागत करता हूँ। इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस राग पर आधारित फिल्म संगीत के उदाहरण भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला के आज के अंक में हम आपसे संगीत के शास्त्रीय मंचों पर कम प्रचलित राग धानी पर चर्चा करेंगे। आज हम आपको इस राग में निबद्ध सुप्रसिद्ध गायिका लक्ष्मी शंकर के स्वरों में एक खयाल सुनवाएँगे। साथ ही इस राग पर आधारित, 1961 में प्रदर्शित फिल्म ‘हम दोनों’ से एक बेहद लोकप्रिय भक्तिगीत विख्यात पार्श्वगायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में प्रस्तुत करेंगे। आपको याद ही होगा कि आगामी 28 सितम्बर को कोकिलकंठी गायिका लता मंगेशकर का जन्मदिवस है। इस अवसर के लिए हमने पिछले अंक में और आज के अंक में भी लता जी के ही उत्कृष्ट गीतों का चुनाव किया है।  

फिल्म संगीत में रागों के समिश्रण के बावजूद गीत को जन-जन के बीच लोकप्रिय स्वरूप देने में संगीतकार जयदेव का कोई विकल्प नहीं था। 1961 में प्रदर्शित नवकेतन की फिल्म ‘हम दोनों’ में उनके संगीतबद्ध गीतों को आशातीत सफलता मिली। इस फिल्म के प्रायः सभी गीतों में जयदेव ने विभिन्न रागों का स्पर्श किया था। फिल्म में राग बिलावल पर आधारित गीत- ‘मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया...’, यमन कल्याण पर आधारित- ‘अभी ना जाओ छोड़ कर...’ और ‘जहाँ में ऐसा कौन है...’ बेहद लोकप्रिय हुए थे। परन्तु इस फिल्म के दो भक्तिगीत तो कालजयी सिद्ध हुए। पहला भजन गाँधीवादी विचारधारा से प्रेरित और राग गौड़ सारंग के स्वरों में पिरोया हुआ- ‘अल्ला तेरो नाम ईश्वर तेरो नाम...’ था। फिल्म का दूसरा भक्तिरस प्रधान गीत था-‘प्रभु तेरो नाम जो ध्याये फल पाए...’, जिसे संगीतकार जयदेव ने राग धानी के स्वरों में बाँध कर एक अलौकिक स्वरूप प्रदान किया। आज हमारी चर्चा में यही गीत है। फिल्म ‘हम दोनों’ के इन भक्तिरस से परिपूर्ण गीतों को लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। फिल्म के इन गीतों से एक रोचक प्रसंग जुड़ा है। सचिनदेव बर्मन से कुछ मतभेद के कारण उन दिनों लता मंगेशकर ने उनकी फिल्मों में गाने से मना कर दिया था। बर्मन दादा के सहायक रह चुके जयदेव ने इस प्रसंग में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। पहले तो लता जी ने जयदेव के संगीत निर्देशन में गाने से मना कर दिया, परन्तु जब उन्हें यह बताया गया कि यदि ‘हम दोनों’ के गीत लता नहीं गाएँगी तो फिल्म से जयदेव को ही हटा दिया जाएगा। यह जान कर लता जी गाने के लिए तैयार हो गईं। उन्हें यह भी बताया गया कि भक्तिरस में पगे इन गीतों के लिए जयदेव ने अलौकिक धुनें बनाई है। अब इसे लता जी कि उदारता मानी जाए या व्यावसायिक कुशलता, उन्होने इन गीतों को अपने स्वरों में ढाल कर कालजयी बना दिया। अब हम आपको साहिर लुधियानवी का लिखा, जयदेव द्वारा राग धानी के स्वरों में पिरोया और लता मंगेशकर का गाया यही गीत सुनवाते हैं। यह गीत अभिनेत्री नन्दा पर फिल्माया गया था।


राग धानी : ‘प्रभु तेरो नाम जो ध्याये फल पाए...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – हम दोनो 



मुख्य रूप से श्रृंगाररस के विरह पक्ष को उकेरने में सक्षम राग धानी भक्तिरस का सृजन करने में भी सक्षम होता है। उत्तर भारतीय संगीत में धानी नाम से प्रचलित यह राग कर्नाटक संगीत में राग शुद्ध धन्यासी के नाम से पहचाना जाता है। राग धानी का प्राचीन स्वरूप इस दक्षिण भारतीय राग के समतुल्य है। कुछ विद्वान इस राग को उदय रविचन्द्रिका नाम से भी सम्बोधित करते हैं। राग धानी काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। राग के दो स्वरूप प्रचलित है। प्राचीन स्वरूप के अन्तर्गत यह राग औड़व-औड़व जाति काहै। अर्थात आरोह और अवरोह में पाँच-पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग वर्जित होता है। वर्तमान में प्रचलित इस राग के आरोह में पाँच किन्तु अवरोह में सात स्वरों का प्रयोग होता है। अर्थात इस राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है। परन्तु राग के इस रूप में ऋषभ और धैवत का अल्प प्रयोग ही किया जाता है। राग धानी में गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किए जाते हैं। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। दिन के चौथे प्रहर में गाये-बजाए जाने वाले इस राग के स्वर समूह मन की उलझन, भटकाव और पुकार जैसे भावों की अभिव्यक्ति में सहायक होते हैं। अब हम आपको राग धानी में एक खयाल सुनवाते हैं। पटियाला घराने की गायकी में दक्ष गायिका लक्ष्मी शंकर ने राग धानी, झपताल में इस खयाल को प्रस्तुत किया है। इस रचना में कृष्ण-भक्त नायिका को उनके आगमन की प्रतीक्षा का भाव है। आप भक्तिरस के एक भिन्न रूप से साक्षात्कार कीजिए और मुझे आज इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग धानी : ‘अबहूँ न आए श्याम...’ : विदुषी लक्ष्मी शंकर 




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 138वें अंक की पहेली में आज हम आपको वाद्य संगीत पर प्रस्तुत एक रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 140वें अंक की समाप्ति तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – वाद्य संगीत की यह रचना किस राग में निबद्ध है?

2 – गायकी अंग में प्रस्तुत संगीत की इस रचना का अंश सुन कर बताइए कि इस बेहद चर्चित भक्तिगीत के बोल अर्थात आरम्भिक पंक्ति क्या है?

आप अपने उत्तर केवल radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 140वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से अथवा radioplaybackindia@live.com या swargoshthi@gmail.com पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

 
‘स्वरगोष्ठी’ के 136वें अंक की पहेली में हमने आपको उस्ताद सईदुद्दीन डागर द्वारा प्रस्तुत एक ध्रुवपद रचना का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग भैरव और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल सूल। दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी और जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी ने दिया है। दोनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक में हमने आपसे राग धानी के भक्तिरस के पक्ष पर चर्चा की। आगामी अंक में हम एक और भक्तिरस प्रधान राग में गूँथी रचनाएँ लेकर उपस्थित होंगे। अगले अंक में इस लघु श्रृंखला की सातवीं कड़ी के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की प्रतीक्षा करेंगे। 


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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