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Sunday, January 29, 2017

राग पीलू और भीमपलासी : SWARGOSHTHI – 303 : RAG PILU & BHIMPALASI




स्वरगोष्ठी – 303 में आज

राग और गाने-बजाने का समय – 3 : दिन के तीसरे प्रहर के राग

राग पीलू की ठुमरी - ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- “राग और गाने-बजाने का समय” की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ। है। उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के तृतीय प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के राग पीलू की एक ठुमरी सुविख्यात गायिका विदुषी गिरिजा देवी के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही संगीतकार रोशन का स्वरबद्ध किया राग भीमपलासी पर आधारित, फिल्म ‘बावरे नैन’ का एक गीत गायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं।




विदुषी गिरिजा देवी
भारतीय संगीत के प्राचीन विद्वानों ने विभिन्न स्वर-समूहों से उपजने वाले रस व भावों, अपने अनुभव, और मनोवैज्ञानिक आधार पर विभिन्न रागों के प्रयोग का समय निर्धारित किया है। उन्होने राग के समय निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। पिछले अंक में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वरसिद्धान्त’ पर चर्चा की थी, जिसके अन्तर्गत राग के मध्यम स्वर से रागों के पूर्वार्द्ध या उत्तरार्द्ध समय का निर्धारण किया गया है। आज के अंक में हम वादी और संवादी स्वरों के आधार पर रागों के समय निर्धारण के सिद्धान्त पर चर्चा कर रहे हैं। जिस प्रकार चौबीस घण्टे की अवधि को दो भागों, पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध, में बाँट कर रागों के समय निर्धारण कर सकते हैं, उसी प्रकार सप्तक के भी दो भाग, उत्तरांग और पूर्वांग, में विभाजित कर रागों का समय निर्धारित किया जाता है। संख्या की दृष्टि से सप्तक के प्रथम चार स्वर, अर्थात षडज, ऋषभ, गान्धार और मध्यम पूर्वांग तथा पंचम, धैवत, निषाद और अगले सप्तक का षडज मिल कर उत्तरांग कहलाते हैं। शास्त्रकारों ने यह नियम बनाया कि जिन रागों का वादी स्वर पूर्वांग के स्वर में से कोई एक स्वर है उस राग को दिन के पूर्वार्द्ध में अर्थात मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच तथा जिन रागों का वादी स्वर उत्तरांग के स्वरों में से कोई एक स्वर हो तो उसे दिन के उत्तरार्द्ध में अर्थात मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जा सकता है। इस नियम की रचना से कुछ राग अपवाद रह गए। उदाहरण के रूप में राग भीमपलासी का उल्लेख किया जा सकता है। इस राग में वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। उपरोक्त नियम से राग का वादी और संवादी सप्तक के पूर्वांग में आ जाता है। राग का एक प्रमुख नियम है कि अगर वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में होगा तो संवादी स्वर उत्तरांग में और यदि वादी स्वर उत्तरांग में होगा तो संवादी स्वर पूर्वांग में होना चाहिए। इस दृष्टि से राग भीमपलासी और भैरव उपरोक्त नियम के प्रतिकूल हैं। इस नियम के अनुसार भीमपलासी के समान भैरवी भी पूर्वांग प्रधान राग होना चाहिए, किन्तु भैरवी प्रातःकालीन राग है। इन अपवादों के चलते उपरोक्त नियम में संशोधन किया गया। संशोधन के अनुसार सप्तक के दोनों अंगों का दायरा बढ़ा दिया गया, अर्थात सप्तक के पूर्वांग में षडज से पंचम तक के स्वर और उत्तरांग में मध्यम से तार सप्तक के षडज तक के स्वर हो सकते हैं। इस नियम के अनुसार राग का वादी स्वर यदि सप्तक के पूर्वांग में आता है तो उसका गायन-वादन दिन के पूर्व अंग में होगा और यदि वादी स्वर उत्तरांग में आता है तो उसका गायन-वादन दिन के ऊतर अंग में किया जाएगा।

आज हम आपसे दिन के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न 12 से अपराह्न 3 बजे के बीच का समय। इस प्रहर के रागों का का वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग के स्वर में से कोई एक स्वर होता है। इस प्रहर का एक बेहद लोकप्रिय राग पीलू है। राग पीलू में उपशास्त्रीय रचनाएँ खूब निखरती हैं। अब हम आपको राग पीलू में निबद्ध एक ठुमरी विदुषी गिरिजा देवी की आवाज़ में सुनवाते हैं। पीलू काफी थाट और सम्पूर्ण जाति का राग है। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के दोनों रूप, शुद्ध और कोमल प्रयोग किये जाते हैं। अब आप राग पीलू की ठुमरी- ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’ सुनिए, जिसे विदुषी गिरिजा देवी ने गाया है।

राग पीलू ठुमरी : “पपीहरा पी की बोल न बोल...” : विदुषी गिरिजा देवी



रोशन और  लता  मंगेशकर
राग पीलू के अलावा दिन के तीसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- धनाश्री, पटमंजरी, प्रदीपकी या पटदीपकी, भीमपलासी, मधुवन्ती, हंसकंकणी, हंसमंजरी आदि। अब हम आपको दिन के तीसरे प्रहर के एक और राग, भीमपलासी का रसास्वादन कराते हैं। राग भीमपलासी भी काफी थाट का राग है। इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। राग में कोमल गान्धार और कोमल निषाद का प्रयोग होता है, शेष सभी शुद्ध स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आइए, भक्त कवयित्री मीरा का एक पद अब राग भीमपलासी पर आधारित सुनते हैं। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ में इसी भक्तिपद को शामिल किया गया था। इसके संगीतकार थे रोशन और इसे स्वर दिया, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार रोशन ने इस भक्तिपद को राग भीमपलासी के स्वरों में और कहरवा ताल में पिरोया है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग भीमपलासी के स्वर भक्तिरस के साथ-साथ श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति में समर्थ होते है। राग के इसी स्वभाव के कारण मीरा के इस पद की प्रस्तुति में भक्ति के साथ श्रृंगाररस की अनुभूति भी होगी। लीजिए, मीरा का यह भजन राग भीमपलासी के स्वरों में सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।

राग भीमपलासी : “ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” : लता मंगेशकर : फिल्म – नौबहार



संगीत पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ के 303वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 60 के दशक की फिल्म का राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 310वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस प्रथम सत्र का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश मे गायक और गायिका के युगल स्वरों को पहचानिए और हमे उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 4 फरवरी, 2017 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 305वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 301 की संगीत पहेली में हमने आपको फिल्म ‘सन्त ज्ञानेश्वर’ से एक गीत का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तोड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल एकताल तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायक मन्ना डे। इस बार की पहेली में जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात

मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘राग और गाने-बजाने का समय’ का यह तीसरा अंक था। इस अंक में हमने दिन के तीसरे प्रहर के कुछ रागों की चर्चा की है। अगले अंक में हम दिन के चौथे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  


रेडियो प्लेबैक इण्डिया 

Sunday, June 12, 2016

राग पीलू : SWARGOSHTHI – 274 : RAG PILU




स्वरगोष्ठी – 274 में आज

मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन – 7 : मदन मोहन और लता का सुरीला संगम

‘मैंने रंग ली आज चुनरिया, सजना तोरे रंग में...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हमारी श्रृंखला – ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ जारी है। श्रृंखला की सातवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र अपने साथी सुजॉय चटर्जी के साथ आप सभी संगीत-प्रेमियों का एक बार फिर हार्दिक स्वागत करता हूँ। यह श्रृंखला आप तक पहुँचाने के लिए हमने फिल्म संगीत के सुपरिचित इतिहासकार और ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के स्तम्भकार सुजॉय चटर्जी का सहयोग लिया है। हमारी यह श्रृंखला फिल्म जगत के चर्चित संगीतकार मदन मोहन के राग आधारित गीतों पर केन्द्रित है। श्रृंखला के प्रत्येक अंक में हम मदन मोहन के स्वरबद्ध किसी राग आधारित गीत की चर्चा और फिर उस राग की उदाहरण सहित जानकारी दे रहे हैं। श्रृंखला की सातवीं कड़ी में आज हम आपको राग पीलू के स्वरों में पिरोये गए 1966 में प्रदर्शित फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ से राग पीलू पर आधारित एक गीत का रसास्वादन कराएँगे। इस राग आधारित गीत को स्वर दिया है, मदन मोहन की मुहबोली बहन, सुप्रसिद्ध पार्श्वगायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार मदन मोहन द्वारा राग पीलू के स्वर में निबद्ध फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ के इस गीत के साथ ही राग का यथार्थ स्वरूप उपस्थित करने के लिए हम विश्वविख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खाँ का सरोद पर बजाया राग पीलू की एक रसपूर्ण रचना भी प्रस्तुत कर रहे हैं। 


दन मोहन द्वारा स्वरबद्ध राग आधारित फ़िल्मी गीतों की इस श्रृंखला की आज की कड़ी में फिर एक बार लता मंगेशकर और मदन मोहन का सुरीला संगम प्रस्तुत है। अपने मदन भ‍इया को याद करती हुईं लता जी कहती हैं - "ज़रा यह सुनिए कि उनको संगीत की कितनी बड़ी देन थी। आमद का यह हाल था कि बस हारमोनियम लेकर बैठते और धुन चुटकियों में बन जाती। कभी मोटर चलाते हुए, कभी लिफ़्ट पर उपर या नीचे आते हुए भी उनकी धुन तैयार हो जाती। मदन भ‍इया एक दो साल मिलिटरी में थे, और शायद इसी वजह से उनके बरताव में एक उपरी सख़्ती हुआ करती थी। कई बार बड़े रफ़ से लगते थे। बातें खरी खरी मुँह पर सुना देते थे। प्यार भी उनका यूँ होता था कि बस हाथ उठाया और धम से मार दिया। मगर यह सख़्ती सिर्फ़ उपर की थी, अन्दर से तो वे बड़े भावुक थे और बड़े नर्म थे। यह नरमी, यह भावुकता कभी कभी अपनी झलक दिखला जाती थी दिल को छू लेने वाली धुनों में ढल कर। बड़े खुद्दार थे मदन भ‍इया। अपने आदर्शों को वो न किसी के सामने झुकने देते थे, न दबने देते थे। ’वो कौन थी’ के गीतों की सफलता पर मुमकिन था कि उन्हें एक बहुत बड़ा अवार्ड मिले। कुछ लोग उनके पास आए और उस अवार्ड के लिए उनसे सौदा करना चाहा। मदन भ‍इया ने साफ़ इनकार कर दिया। वह अवार्ड मदन भ‍इया को नहीं मिला और ना मिलने पर जब मैंने अफ़सोस ज़ाहिर किया तो वो कहने लगे कि मेरे लिए क्या यह कम अवार्ड है कि तुम्हे अफ़सोस हुआ!" आज हम लता और मदन मोहन जोड़ी की जिस रचना को प्रस्तुत कर रहे हैं उसे हमने चुना है 1966 की फ़िल्म ’दुल्हन एक रात की’ से - "मैंने रंग ली आज चुनरिया सजना तोरे रंग में..." जिसे लिखा था राजा मेंहदी अली ख़ाँ ने और फ़िल्माया गया था अभिनेत्री नूतन पर। गीत आधारित है राग पीलू पर और ताल है कहरवा।

आप सभी ने यह महसूस किया होगा कि मदन मोहन की अधिकतर रचनाओं में सितार के बेहद सुरीले टुकड़े सुनाई देते हैं, गीत के शुरुआत में या अन्तराल संगीत के दौरान। आज के प्रस्तुत गीत में भी सितार कई जगहों पर सुनाई देता है। ये तमाम सितार के टुकड़े इतने सुरीले क्यों न हो जब इन्हें बजाने वाले हों उस्ताद रईस ख़ाँ जैसे सितार वादक। मदन जी के गीतों में ख़ाँ साहब का सितार पहली बार सुनाई दिया था 1964 की फ़िल्म 'पूजा के फूल' के गीत "मेरी आँखों से कोई नींद लिए जाता है" में। ख़ाँ साहब उस्ताद विलायत ख़ाँ साहब के भतीजे थे। विलायत ख़ाँ साहब मदन जी के दोस्त हुआ करते थे। इस तरह से रईस ख़ाँ मदन मोहन के सम्पर्क में आये और मदन जी के गीतों को चार चाँद लगाया। "नैनों में बदरा छाए...", "रस्म-ए-उल्फ़त को निभाएँ..." जैसे कई गीतों में सितार बेहद ख़ूबसूरत बन पड़ा है। मदन मोहन सितार से इस तरह जज़्बाती रूप से जुड़े थे और ख़ास तौर से रईस ख़ाँ के साथ उनकी ट्यूनिंग कुछ ऐसी जमी थी कि 1974 में जब किसी ग़लतफ़हमी की वजह से एक दूसरे से दोनो अलग हो गये तब मदन मोहन ने अपने गीतों में सितार का प्रयोग ही बन्द कर दिया। वो इतने ही हताश हुए थे। इस वजह से मदन मोहन के अन्तिम दो वर्षों, अर्थात 1974 और 1975 में 'मौसम', 'साहिब बहादुर' आदि फ़िल्मों के गीतों में हमें सितार सुनने को नहीं मिले। यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि हाल ही में मदन मोहन की पुत्री संगीता जी ने मुझे स्वयं बताया कि बाद में मदन मोहन जी ने उस्ताद शमीम अहमद से ख़ुद सितार सीखा और अपनी आख़िर की कुछ फ़िल्मों में शमीम अहमद साहब से बजवाया। अब कुछ बातें इस गीत के गीतकार राजा मेंहदी अली ख़ाँ साहब की। राजा साहब और मदन जी की जोड़ी के बारे में मदन जी के छोटे पुत्र समीर कोहली बताते हैं, "राजा साहब भी पिताजी के बहुत अच्छे दोस्त थे। ’आँखें’ (1950, ’अदा’ (1951) और ’मदहोश’ (1951) के बाद एक लम्बे अरसे के बाद दोनों साथ में ’अनपढ़’ (1962) में काम कर रहे थे। ’अनपढ़’ से पहले राजा साहब ज़्यादातर हास्य गीत लिखा करते थे, पर ’अनपढ़’ के गीतों के बाद वो गम्भीर शायरी की वजह से मशहूर हो गए। बहुत जल्दी उनका निधन हो गया ’जब याद किसी की आती है’ (1966) का शीर्षक गीत लिखने के बाद ही। मदन जी का राजा साहब के लिए दिल में क्या जगह थी इसका पता चलता है एक घटना से। पिताजी समय के बड़े पाबन्द हुआ करते थे, फिर भी एक बार एक पत्रकार-सम्मेलन (press conference) में वो देर से पहुँचे। इस बात पर एक पत्रकार ने उनसे इस देरी का कारण पूछा तो उनका जवाब था कि मैं घर से समय पर ही चला था। रास्ते में मुझे राजा साहब की कब्र दिख गई और मैं अपने आप को रोक नहीं सका। मैं वहाँ दो मिनट के लिए रुका, उन्हें अपनी श्रद्धांजलि दी। इस वजह से मुझे देर हो गई, इसके लिए आप सब मुझे क्षमा करें।" अब आप राजा मेंहदी अली खाँ का लिखा, मदन मोहन का संगीतबद्ध किया और लता मंगेशकर का गाया, फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ का वही गीत सुनिए।


राग पीलू : ‘मैंने रंग ली आज चुनरिया, सजना तेरे रंग में...’ : लता मंगेशकर : फिल्म – दुल्हन एक रात की


राग पीलू का सम्बन्ध काफी थाट से जोड़ा जाता है। आमतौर पर इस राग के आरोह में ऋषभ और धैवत स्वर वर्जित किया जाता है। अवरोह में सभी सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। इसलिए राग की जाति औड़व-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग होते हैं। इस राग में ऋषभ, गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के कोमल और शुद्ध, दोनों रूप का प्रयोग किया जाता है। राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग के गायन-वादन का समय दिन का तीसरा प्रहर माना गया है। इस राग के प्रयोग करते समय प्रायः अन्य कई रागों की छाया दिखाई देती है, इसीलिए राग पीलू को संकीर्ण जाति का राग कहा जाता है। यह चंचल प्रकृति का और श्रृंगार रस की सृष्टि करने वाला राग है। इस राग में अधिकतर ठुमरी, दादरा, टप्पा, गीत, भजन आदि का गायन बेहद लोकप्रिय है। फिल्मी गीतों में भी इस राग का प्रयोग अधिक किया गया है। इस राग में ध्रुपद और विलम्बित खयाल का प्रचलन नहीं है। राग पीलू पूर्वांग प्रधान राग है। इसमे पूर्वांग के स्वर इतने प्रमुख रहते हैं कि प्रायः गायक या वादक मध्यम स्वर को अपना षडज मान कर गाते-बजाते हैं, जिससे मंद्र सप्तक के स्वरों में सरलता से विचरण किया जा सके। राग पीलू के गायन-वादन का समय यद्यपि दिन का तीसरा प्रहर निर्धारित किया गया है, किन्तु परम्परागत रूप से यह सार्वकालिक राग हो गया है। ठुमरी अंग का राग होने से किसी भी गायन-वादन की सभा के अन्त में पीलू की ठुमरी, दादरा या सुगम संगीत से कार्यक्रम के समापन की परम्परा बन गई है। अब आप विश्वविख्यात सरोद वादक उस्ताद अमजद अली खाँ से सरोद पर राग पीलू की एक रसपूर्ण रचना सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति प्रदान कीजिए।


राग पीलू : सरोद पर दादरा ताल की रचना : उस्ताद अमजद अली खाँ




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 274वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको एक बार पुनः संगीतकार मदन मोहन के संगीत से सजे एक राग आधारित गीत का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 280वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत के इस अंश को सुन का आपको किस राग का अनुभव हो रहा है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत के गायक को पहचान सकते हैं? हमे गायक का नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 18 जून, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 276वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 272 की संगीत पहेली में हमने आपको मदन मोहन के संगीत निर्देशन में बनी और 1950 में प्रदर्शित फिल्म ‘आँखें’ से एक राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – पहाड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है – ताल – कहरवा तथा तीसरे प्रश्न का उत्तर है- गायिका – मीना कपूर

इस बार की पहेली में चार प्रतिभागियों ने सही उत्तर देकर विजेता बनने का गौरव प्राप्त किया है। सही उत्तर देने वाले प्रतिभागी हैं - चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी और पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया। इन सभी विजेताओं ने दो-दो अंक अर्जित किये है। सभी विजेता प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में जारी हमारी श्रृंखला ‘मदन मोहन के गीतों में राग-दर्शन’ की आज की कड़ी में आपने राग पीलू का परिचय प्राप्त किया। इस श्रृंखला में हम फिल्म संगीतकार मदन मोहन के कुछ राग आधारित गीतों को चुन कर आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। राग पीलू के बारे में कोटा, राजस्थान के तुलसी राम वर्मा ने हमसे अनुरोध किया था। आज के अंक में हमने श्री वर्मा के अनुरोध पर आपको राग पीलू की जानकारी दी। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 8 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


शोध व आलेख : सुजॉय चटर्जी 
 प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



 

Sunday, April 3, 2016

विविध शैलियों में होली : SWARGOSHTHI – 264 : HOLI SONGS




स्वरगोष्ठी – 264 में आज

होली और चैती के रंग – 2 : विविध शैलियों और रागों में होली

धमार, ठुमरी और फिल्मी गीत में फागुनी रचनाएँ





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी नई श्रृंखला – ‘होली और चैती के रंग’ की दूसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत और अभिनन्दन करता हूँ। इस श्रृंखला में हम ऋतु के अनुकूल भारतीय संगीत के कुछ ऐसे रागों और रचनाओं की चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें ग्रीष्मऋतु के शुरुआती परिवेश में गाने-बजाने की परम्परा है। भारतीय समाज में अधिकतर उत्सव और पर्वों का निर्धारण ऋतु परिवर्तन के साथ होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतु की सन्धिबेला में मनाया जाने वाला पर्व- होलिकोत्सव, प्रकारान्तर से पूरे देश में आयोजित होता है। यह उल्लास और उमंग का, रस और रंगों का, गायन-वादन और नर्तन का पर्व है। अबीर-गुलाल के उड़ते बादलों और पिचकारियों से निकलती इन्द्रधनुषी फुहारों के बीच हम ‘स्वरगोष्ठी’ की इन प्रस्तुतियों के माध्यम से फागुन की सतरंगी छटा से सराबोर हो रहे हैं। संगीत के सात स्वर, इन्द्रधनुष के सात रंग बन कर हमारे तन-मन पर छा जाते हैं। भारतीय संगीत की सभी शैलियों- शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, सुगम, लोक और फिल्म संगीत में फाल्गुनी रस-रंग में पगी असंख्य रचनाएँ हैं, जो हमारा मन मोह लेती हैं। पिछले अंक में हमने आपको राग काफी के स्वरों पर तैरती कुछ फागुनी रचनाओं का रसास्वादन कराया था, आज के अंक में हम आपको धमार, ठुमरी और फिल्म शैली की कुछ रचनाएँ सुनवा रहे हैं।



गुंडेचा बन्धु
भारतीय पर्वों में होली एक ऐसा पर्व है, जिसमें संगीत-नृत्य की प्रमुख भूमिका होती है। जनसामान्य अपने उल्लास को व्यक्त करने के लिए मुख्य रूप से देशज संगीत का सहारा लेता है। इस अवसर पर प्रस्तुत की जाने वाली रचनाओं में लोक-संगीत की प्रधानता के बावजूद सभी भारतीय संगीत शैलियों में होली की रचनाएँ प्रमुख रूप से उपलब्ध हैं। आज के अंक में हम आपके लिए कुछ संगीत शैलियों में रंगोत्सव के चुनिन्दा गीतों पर चर्चा करेंगे। भारतीय संगीत की प्राचीन और शास्त्र-सम्मत शैली है- ध्रुपद अथवा ध्रुवपद। इस शैली के अन्तर्गत धमार गायकी तो पूरी तरह रंगों के पर्व पर ही केन्द्रित रहती है। धमार एक प्रकार की गायकी भी है और एक ताल विशेष का नाम भी है। यह पखावज पर बजने वाला 14 मात्रा का ताल है, जिसकी संगति धमार गायन में होती है। धमार की रचनाओं में अधिकतर राधा-कृष्ण की होली का वर्णन मिलता है। कुछ धमार रचनाओं में फाल्गुनी परिवेश का चित्रण भी होता है। गम्भीर प्रवृत्ति के रागों की अपेक्षा चंचल प्रवृत्ति के रागों में धमार की प्रस्तुतियाँ मन को अधिक लुभातीं हैं। आज हम आपको धमार गायकी के माध्यम से रंगोत्सव का एक अलग रंग दिखाने का प्रयास करेंगे।

ध्रुवपद-धमार गायकी में एक युगल गायक हैं- गुंडेचा बन्धु (रमाकान्त और उमाकान्त गुंडेचा), जिन्हें देश-विदेश में भरपूर यश प्राप्त हुआ है। इनकी संगीत-शिक्षा उस्ताद जिया फरीदउद्दीन डागर और विख्यात रुद्रवीणा वादक उस्ताद जिया मोहिउद्दीन डागर द्वारा हुई है। ध्रुवपद के ‘डागुरवाणी’ गायन में दीक्षित इन कलासाधकों से ‘स्वरगोष्ठी’ के होली अंकों के लिए हमने एक धमार अपने पाठकों/श्रोताओं को सुनवाने का अनुरोध किया था। हमारे अनुरोध का मान रखते हुए रमाकान्त गुंडेचा ने हमें तत्काल राग केदार का यह मनमोहक धमार, आपको सुनवाने के लिए उपलब्ध कराया। गुंडेचा बन्धु के प्रति आभार व्यक्त करते हुए, राग केदार का यह धमार प्रस्तुत है।


धमार- केदार : ‘चोरी चोरी मारत हो कुमकुम...’ : स्वर – रमाकान्त और उमाकान्त गुंडेचा


पं. छन्नूलाल मिश्र
इस अंक के आरम्भ में हमने इस तथ्य को रेखांकित किया था की भारतीय संगीत की सभी शैलियों में होली के गीत मिलते हैं। परन्तु लोक शैली में होली गीतों का सौन्दर्य निराला होता है। वह भी तब, जब ऐसी रचना किसी शास्त्रीय गायक द्वारा प्रस्तुत की गई हो। मेरे मित्र, संगीत समीक्षक और हाथरस से प्रकाशित प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका- ‘संगीत’ के परामर्शदाता मुकेश गर्ग ने इस तथ्य को इन शब्दों में रेखांकित किया है- "हिन्दुस्तानी संगीत में होली की जगह कुछ अलग ही है. ध्रुपद शैली की धमार गायकी से लेकर ख़याल और ठुमरी गायकी तक इस रंग-बिरंगे त्योहार का उल्लास देखते ही बनता है। इन गायन-शैलियों में संयोग श्रृंगार के ढेरों चित्र तो मिलते ही हैं, वियोग की पीड़ा को दर्शाने वाली ठुमरियों की भी कोई कमी नहीं। यहाँ तक कि ठुमरी का एक प्रकार तो 'होरी' या 'होली' नाम से ही जाना जाता है।" इन ठुमरियों ने शब्द और स्वर दोनों स्तरों पर बहुत कुछ लोक-संगीत से ग्रहण किया है।’ लोक संगीत की इस महत्ता को स्वीकारती हुई लखनऊ स्थित भातखण्डे संगीत महाविद्यालय (अब विश्वविद्यालय) की सेवानिवृत्त प्रोफेसर कमला श्रीवास्तव का मत है कि भारतीय संगीत के कई राग, लोक संगीत की धुनों पर ही निर्मित है। राग पीलू, पहाड़ी, माँड़ आदि का उदगम लोक संगीत से ही हुआ है। आइए अब आपको होली की एक लोक संगीत की रचना उपशास्त्रीय दादरा अंग में सुनवाते हैं, वरिष्ठ शास्त्रीय गायक पण्डित छन्नूलाल मिश्र से।


शिव की होली : ‘खेले मसाने की होली दिगम्बर...’ : स्वर – पं. छन्नूलाल मिश्र


आरती अंकलीकर
रंगोत्सव के उल्लासपूर्ण परिवेश में फाल्गुनी संगीत-रचनाओं का सिलसिला जारी रखते हुए अब हम आपको एक फिल्मी गीत सुनवाते हैं। यह फिल्मी गीत होते हुए भी ठुमरी अंग में प्रस्तुत की गई है। 1996 में एक संगीत-प्रधान फिल्म, ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग की एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। यूँ तो राग काफी में होली की रचनाएँ खूब मुखर होती हैं, परन्तु कुछ अन्य राग भी हैं जिनमें रंगों के इस पर्व के परिवेश का अनूठा चित्रण मिलता है। उपशास्त्रीय रचनाओं में प्रायः होली का चित्रण राग देस, खमाज, तिलंग, पीलू आदि में भी मिलता है। 1996 में एक संगीतप्रधान फिल्म ‘सरदारी बेगम’ का प्रदर्शन हुआ था। इस फिल्म में ठुमरी अंग का एक अत्यन्त मोहक गीत शामिल था। संगीतकार वनराज भाटिया ने गीतकार जावेद अख्तर के शब्दों को राग पीलू के स्वरों की चाशनी में डुबो कर और ठुमरी अंग से अलंकृत कर फिल्म में प्रस्तुत किया था। इस गीत में होली के उमंग और उल्लास के साथ-साथ सौम्य भाव भी परिलक्षित होता है। फिल्म में यह गीत आशा भोसले और आरती अंकलीकर की आवाज़ में दो अलग-अलग प्रसंगों में फिल्माया गया है। उपशास्त्रीय गायिका आरती अंकलीकर के स्वरों में आप यह फिल्मी ठुमरी सुनिए और अनुभव कीजिये कि राग पीलू में भी होली का रंग किस खूबी से निखरता हैं।


राग - पीलू : फिल्म – सरदारी बेगम : ‘मोरे कान्हा जो आए पलट के...’ : आरती अंकलीकर




संगीत पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 264वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको राग पर आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 270वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने के बाद तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की दूसरी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – गीत का यह अंश सुन कर बताइए कि इस गीत में किस राग का स्पर्श है?

2 – गीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – क्या आप गीत की गायिका का नाम हमे बता सकते हैं?

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 9 अप्रैल, 2016 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 266वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता 


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 262 की संगीत पहेली में हमने आपको 1963 में प्रदर्शित फिल्म ‘गोदान’ से राग आधारित गीत का एक अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। इस पहेली के पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग – काफी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल – कहरवा और तीसरे प्रश्न का उत्तर है- मुख्य गायक – मोहम्मद रफी

इस बार की पहेली में कुल छः प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया है। हमारी नई प्रतिभागी मुम्बई, महाराष्ट्र से मीरा ठाकुर हैं, जिन्होने ‘स्वरगोष्ठी’ की पहेली में पहली बार भाग लिया है और पहेली का एकदम सही उत्तर दिया है। संगीत-प्रेमियों के इस परिवार में मीरा जी को शामिल करते हुए उनका हार्दिक स्वागत है। हमारे अन्य नियमित प्रतिभागी विजेता हैं- चेरीहिल, न्यूजर्सी से प्रफुल्ल पटेल, जबलपुर, मध्यप्रदेश से क्षिति तिवारी, पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी और वोरहीज, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया। सभी छः प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात 


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ में आप हमारी श्रृंखला ‘होली और चैती के रंग’ का रसास्वादन कर रहे हैं। श्रृंखला के इस अंक में हमने आपसे विविध शैलियों में होली गीतों पर चर्चा की। ‘स्वरगोष्ठी’ साप्ताहिक स्तम्भ के बारे में हमारे पाठक और श्रोता नियमित रूप से हमें पत्र लिखते है। हम उनके सुझाव के अनुसार ही आगामी विषय निर्धारित करते है। ‘स्वरगोष्ठी’ पर आप भी अपने सुझाव और फरमाइश हमें भेज सकते है। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करेंगे। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल अवश्य कीजिए। अगले रविवार को एक नई श्रृंखला के नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  




Sunday, September 6, 2015

राग भीमपलासी और पीलू : SWARGOSHTHI – 234 : RAG BHIMPALASI & PILU



स्वरगोष्ठी – 234 में आज 

रागों का समय प्रबन्धन – 3 : दिन के तीसरे प्रहर के राग 

राग पीलू की ठुमरी- ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर हमारी श्रृंखला- ‘रागों का समय प्रबन्धन’ की तीसरी कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र आप सब संगीत-प्रेमियों का हार्दिक स्वागत करता हूँ।  उत्तर भारतीय रागदारी संगीत की अनेक विशेषताओं में से एक विशेषता यह भी है कि संगीत के प्रचलित राग परम्परागत रूप से ऋतु प्रधान हैं या प्रहर प्रधान। अर्थात संगीत के प्रायः सभी राग या तो अवसर विशेष या फिर समय विशेष पर ही प्रस्तुत किये जाने की परम्परा है। बसन्त ऋतु में राग बसन्त और बहार तथा वर्षा ऋतु में मल्हार अंग के रागों के गाने-बजाने की परम्परा है। इसी प्रकार अधिकतर रागों को गाने-बजाने की एक निर्धारित समयावधि होती है। उस विशेष समय पर ही राग को सुनने पर आनन्द प्राप्त होता है। भारतीय कालगणना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने वाले प्राचीन मनीषियों ने दिन और रात के चौबीस घण्टों को आठ प्रहर में बाँटा है। सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक के चार प्रहर को दिन के और सूर्यास्त से लेकर अगले सूर्योदय से पहले के चार प्रहर को रात्रि के प्रहर कहे जाते हैं। उत्तर भारतीय संगीत के साधक कई शताब्दियों से विविध प्रहर में अलग-अलग रागों का परम्परागत रूप से प्रयोग करते रहे हैं। रागों का यह समय-सिद्धान्त हमारे परम्परागत संस्कारों से उपजा है। विभिन्न रागों का वर्गीकरण अलग-अलग प्रहर के अनुसार करते हुए आज भी संगीतज्ञ व्यवहार करते हैं। राग भैरव का गायन-वादन प्रातःकाल और मालकौंस मध्यरात्रि में ही किया जाता है। कुछ राग ऋतु-प्रधान माने जाते हैं और विभिन्न ऋतुओं में ही उनका गायन-वादन किया जाता है। इस श्रृंखला में हम विभिन्न प्रहरों में बाँटे गए रागों की चर्चा कर रहे हैं। श्रृंखला की आज की कड़ी में आज हम आपसे दिन के तृतीय प्रहर के रागों पर चर्चा करेंगे और इस प्रहर के राग पीलू की एक ठुमरी सुविख्यात गायिका गिरिजा देवी के स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। इसके साथ ही संगीतकार रोशन का स्वरबद्ध किया राग भीमपलासी पर आधारित, फिल्म ‘बावरे नैन’ का एक गीत गायिका लता मंगेशकर की आवाज़ में सुनवा रहे हैं। 


भारतीय संगीत के प्राचीन विद्वानों ने विभिन्न स्वर-समूहों से उपजने वाले रस व भावों, अपने अनुभव, और मनोवैज्ञानिक आधार पर विभिन्न रागों के प्रयोग का समय निर्धारित किया है। उन्होने राग के समय निर्धारण के लिए कुछ सिद्धान्त बनाए हैं। पिछले अंक में हमने आपसे ‘अध्वदर्शक स्वरसिद्धान्त’ पर चर्चा की थी, जिसके अन्तर्गत राग के मध्यम स्वर से रागों के पूर्वार्द्ध या उत्तरार्द्ध समय का निर्धारण किया गया है। आज के अंक में हम वादी और संवादी स्वरों के आधार पर रागों के समय निर्धारण के सिद्धान्त पर चर्चा कर रहे हैं। जिस प्रकार चौबीस घण्टे की अवधि को दो भागों, पूर्वार्ध और उत्तरार्द्ध, में बाँट कर रागों के समय निर्धारण कर सकते हैं, उसी प्रकार सप्तक के भी दो भाग, उत्तरांग और पूर्वांग, में विभाजित कर रागों का समय निर्धारित किया जाता है। संख्या की दृष्टि से सप्तक के प्रथम चार स्वर, अर्थात षडज, ऋषभ, गान्धार और मध्यम पूर्वांग तथा पंचम, धैवत, निषाद और अगले सप्तक का षडज मिल कर उत्तरांग कहलाते हैं। शास्त्रकारों ने यह नियम बनाया कि जिन रागों का वादी स्वर पूर्वांग के स्वर में से कोई एक स्वर है उस राग को दिन के पूर्वार्द्ध में अर्थात मध्याह्न 12 बजे से मध्यरात्रि 12 बजे के बीच तथा जिन रागों का वादी स्वर उत्तरांग के स्वरों में से कोई एक स्वर हो तो उसे दिन के उत्तरार्द्ध में अर्थात मध्यरात्रि 12 बजे से लेकर मध्याह्न 12 बजे के बीच गाया-बजाया जा सकता है। इस नियम की रचना से कुछ राग अपवाद रह गए। उदाहरण के रूप में राग भीमपलासी का उल्लेख किया जा सकता है। इस राग में वादी मध्यम और संवादी षडज होता है। उपरोक्त नियम से राग का वादी और संवादी सप्तक के पूर्वांग में आ जाता है। राग का एक प्रमुख नियम है कि अगर वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग में होगा तो संवादी स्वर उत्तरांग में और यदि वादी स्वर उत्तरांग में होगा तो संवादी स्वर पूर्वांग में होना चाहिए। इस दृष्टि से राग भीमपलासी और भैरव उपरोक्त नियम के प्रतिकूल हैं। इस नियम के अनुसार भीमपलासी के समान भैरवी भी पूर्वांग प्रधान राग होना चाहिए, किन्तु भैरवी प्रातःकालीन राग है। इन अपवादों के चलते उपरोक्त नियम में संशोधन किया गया। संशोधन के अनुसार सप्तक के दोनों अंगों का दायरा बढ़ा दिया गया, अर्थात सप्तक के पूर्वांग में षडज से पंचम तक के स्वर और उत्तरांग में मध्यम से तार सप्तक के षडज तक के स्वर हो सकते हैं। इस नियम के अनुसार राग का वादी स्वर यदि सप्तक के पूर्वांग में आता है तो उसका गायन-वादन दिन के पूर्व अंग में होगा और यदि वादी स्वर उत्तरांग में आता है तो उसका गायन-वादन दिन के ऊतर अंग में किया जाएगा।

आज हम आपसे दिन के तीसरे प्रहर के रागों पर चर्चा कर रहे हैं। दिन का तीसरा प्रहर, अर्थात मध्याह्न 12 से अपराह्न 3 बजे के बीच का समय। इस प्रहर के रागों का का वादी स्वर सप्तक के पूर्वांग के स्वर, अर्थात षडज से पंचम स्वर में से कोई एक स्वर होता है। इस प्रहर का एक बेहद लोकप्रिय राग पीलू है। राग पीलू में उपशास्त्रीय रचनाएँ खूब निखरती हैं। अब हम आपको राग पीलू में निबद्ध एक ठुमरी विदुषी गिरिजा देवी की आवाज़ में सुनवाते हैं। पीलू काफी थाट और सम्पूर्ण जाति का राग है। इसका वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। इस राग में गान्धार, धैवत और निषाद स्वर के दोनों रूप, शुद्ध और कोमल प्रयोग किये जाते हैं। अब आप राग पीलू की ठुमरी- ‘पपीहरा पी की बोल न बोल...’ सुनिए, जिसे विदुषी गिरिजा देवी ने गाया है।


राग पीलू ठुमरी : “पपीहरा पी की बोल न बोल...” : विदुषी गिरिजा देवी




राग पीलू के अलावा दिन के तीसरे प्रहर के कुछ अन्य प्रमुख राग हैं- धनाश्री, पटमंजरी, प्रदीपकी या पटदीपकी, भीमपलासी, मधुवन्ती, हंसकंकणी, हंसमंजरी आदि। अब हम आपको दिन के तीसरे प्रहर के एक और राग, भीमपलासी का रसास्वादन कराते हैं। राग भीमपलासी भी काफी थाट का राग है। इस राग की जाति औडव-सम्पूर्ण होती है, अर्थात आरोह में पाँच और अवरोह में सात स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आरोह में ऋषभ और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं किया जाता। राग में कोमल गान्धार और कोमल निषाद का प्रयोग होता है, शेष सभी शुद्ध स्वर प्रयोग किये जाते हैं। आइए, भक्त कवयित्री मीरा का एक पद अब राग भीमपलासी पर आधारित सुनें। 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘नौबहार’ में इस भक्तिपद को शामिल किया गया था। इसके संगीतकार थे रोशन और इसे स्वर दिया, सुप्रसिद्ध गायिका लता मंगेशकर ने। संगीतकार रोशन ने इस भक्तिपद को राग भीमपलासी के स्वरों में और कहरवा ताल में पिरोया है। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। इसके गायन-वादन का उपयुक्त समय दिन का तृतीय प्रहर होता है। राग भीमपलासी के स्वर भक्तिरस के साथ-साथ श्रृंगाररस की अभिव्यक्ति में समर्थ होते है। राग के इसी स्वभाव के कारण मीरा के इस पद की प्रस्तुति में भक्ति के साथ श्रृंगाररस की अनुभूति भी होगी। श्रृंखला के पिछले अंक में आपने यही पद राग तोड़ी में सुना था। लीजिए, भजन का यह दूसरा संस्करण राग भीमपलासी के स्वरों में सुनिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भीमपलासी : “ए री मैं तो प्रेम दीवानी...” : लता मंगेशकर : फिल्म – नौबहार





संगीत पहेली - 234


‘स्वरगोष्ठी’ के 234वें अंक की संगीत पहेली में आज हम आपको 60 के दशक की फिल्म का राग आधारित फिल्मी गीत का एक अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 240वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस वर्ष की चौथी श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।

1 – संगीत का यह अंश सुन कर बताइए कि यह गीत किस राग पर आधारित है?

2 – संगीत में प्रयोग किये गए ताल का नाम बताइए।

3 – गीतांश मे गायक और गायिका के युगल स्वरों को पहचानिए और हमे उनके नाम बताइए।

आप उपरोक्त तीन में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर इस प्रकार भेजें कि हमें शनिवार, 12 सितम्बर, 2015 की मध्यरात्रि से पूर्व तक अवश्य प्राप्त हो जाए। COMMENTS में दिये गए उत्तर मान्य हो सकते है, किन्तु उसका प्रकाशन पहेली का उत्तर भेजने की अन्तिम तिथि के बाद किया जाएगा। इस पहेली के विजेताओं के नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 236वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रकाशित और प्रसारित गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए COMMENTS के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ क्रमांक 230 की संगीत पहेली में हमने आपसे फिल्म ‘मीरा’ से मीराबाई के एक पद का अंश सुनवा कर आपसे तीन प्रश्न पूछा था। आपको इनमें से किसी दो प्रश्न का उत्तर देना था। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तोड़ी, दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- ताल रूपक तथा तीसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका वाणी जयराम। इस बार की पहेली में पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, जबलपुर से क्षिति तिवारी, वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी ने सही उत्तर दिये हैं। चारो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

‘स्वरगोष्ठी’ की इस वर्ष की तीसरी श्रृंखला (पहेली क्रमांक 221 से 230 तक) के विजेताओं के प्राप्तांकों की गणना के जा चुकी है। प्राप्तांक के अनुसार प्रथम और द्वितीय स्थान पर दो-दो प्रतिभागी हैं। 20-20 अंक के साथ पेंसिलवेनिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया और जबलपुर से क्षिति तिवारी ने श्रृंखला में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। दूसरे स्थान पर वोरहीज़, न्यूजर्सी से डॉ. किरीट छाया और हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी हैं। इन दोनों प्रतिभागियों को 18-18 अंक प्राप्त हुए हैं। तीसरे स्थान पर 4 अंक के साथ रायपुर, छत्तीसगढ़ की राजश्री श्रीवास्तव रहीं। इन सभी पाँच प्रतिभागियों को रेडियो प्लेबैक इण्डिया की ओर से हार्दिक बधाई।


अपनी बात


मित्रो, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर लघु श्रृंखला ‘रागों का समय प्रबन्धन’ का यह तीसरा अंक था। अगले अंक में हम दिन के चौथे प्रहर के रागों पर आधारित कार्यक्रम प्रस्तुत करेंगे। इस श्रृंखला के लिए यदि आप किसी राग, गीत अथवा कलाकार को सुनना चाहते हों तो अपना आलेख या गीत हमें शीघ्र भेज दें। हम आपकी फरमाइश पूर्ण करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। आपको हमारी यह श्रृंखला कैसी लगी? हमें ई-मेल swargoshthi@gmail.com पर अवश्य लिखिए। अगले रविवार को एक नए अंक के साथ प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर आप सभी संगीतानुरागियों का हम स्वागत करेंगे।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र  



Sunday, October 12, 2014

‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : SWARGOSHTHI – 189 : THUMARI PILU AND DES



स्वरगोष्ठी – 189 में आज

फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी – 8 : ठुमरी पीलू और देस

एकल और युगल रूप में श्रृंगार रस से परिपूर्ण ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’




‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर मैं कृष्णमोहन मिश्र अपनी साथी प्रस्तुतकर्त्ता संज्ञा टण्डन के साथ आप सब संगीत-प्रेमियों का अभिनन्दन करता हूँ। इन दिनों हमारी जारी श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के आठवें अंक में आज हमने एक ऐसी पारम्परिक ठुमरी का चयन किया है, जिसे कई सुविख्यात गायक-गायिकाओं ने गाया है। इस ठुमरी को एकल और युगल, दोनों रूप में प्रस्तुत किया गया है। आमतौर पर ठुमरी एकल रूप में ही गायी जाती है। परन्तु नृत्य-प्रस्तुतियों में या युगल कलाकारों की प्रस्तुतियों में ठुमरी का युगल गायन भी परिलक्षित होता है। इस श्रृंखला में आप कुछ ऐसी पारम्परिक ठुमरियों का रसास्वादन भी कर रहे हैं जिन्हें फिल्मों में कभी यथावत तो कभी परिवर्तित अन्तरे के साथ इस्तेमाल किया गया। फिल्मों मे शामिल ऐसी ठुमरियाँ अधिकतर पारम्परिक ठुमरियों से प्रभावित होती हैं। आज की ठुमरी का फिल्मी संस्करण भी युगल गायन के रूप में है। इस श्रृंखला की अन्य कड़ियों की तरह आज के अंक भी प्रायोगिक रूप से श्रव्य माध्यम में भी प्रस्तुत किया जा रहा है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की प्रमुख सहयोगी संज्ञा टण्डन की आवाज़ में पूरा आलेख और गीत-संगीत श्रव्य माध्यम से भी प्रस्तुत किया जा रहा है। हमारे इस प्रयोग पर आप अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिएगा। आज के अंक हम आपको एक श्रृंगाररस प्रधान ठुमरी– ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ का गायन राग पीलू और देस में सुनवा रहे हैं।
 



फिल्मों में शामिल की गई पारम्परिक ठुमरियों पर केन्द्रित लघु श्रृंखला ‘फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के आज के अंक में आप संगीत-प्रेमियों के लिए जिस ठुमरी का चयन किया गया है, वह है राग पीलू की ठुमरी ‘गोरी तोरे नैन, काजर बिन कारे...’। इसका पारम्परिक स्वरूप हम आपको सबसे पहले गायिका इकबाल बानो की आवाज़ में सुनवाते हैं। इकबाल बनो का जन्म 1935 में दिल्ली के एक सामान्य परिवार में हुआ था। बचपन में ही उनकी प्रतिभा को पहचान कर दिल्ली के उस्ताद चाँद खाँ ने उन्हें रागदारी संगीत का प्रशिक्षण देना आरम्भ किया। कुछ वर्षों की संगीत-शिक्षा के दौरान उस्ताद ने अनुभव किया कि इकबाल बानो के स्वरों में भाव और रस के अभिव्यक्ति की अनूठी क्षमता है। उस्ताद ने उन्हें ठुमरी, दादरा और गजल गायन की ओर प्रेरित और प्रशिक्षित किया। मात्र 14 वर्ष की आयु में इकबाल बानो ने दिल्ली रेडियो से शास्त्रीय और उपशास्त्रीय गायन आरम्भ कर दिया था। वर्ष 1950 में उन्हें देश की प्रख्यात गायिकाओं में शुमार कर लिया गया था। 1952 में 17 वर्ष की आयु में उनका विवाह पाकिस्तान के एक समृद्ध परिवार में हुआ और उन्होने मुल्तान शहर को अपना नया ठिकाना बनाया। पाकिस्तान के संगीत-प्रेमियों ने इकबाल बानो को सर-आँखों पर बैठाया। शीघ्र ही वह रेडियो पाकिस्तान की नियमित गायिका बन गईं। यही नहीं उन्होने अनेक फिल्मों में पार्श्वगायन भी किया। 1985 में उन्हें फैज अहमद ‘फैज’ की नज़मों पर विशेष शोध और गायन के लिए विश्वस्तर पर सम्मान प्राप्त हुआ था। 21 अप्रैल, 2009 को लाहौर में उनका निधन हो गया। इस अप्रतिम गायिका के स्वरों में ही है, राग पीलू की यह ठुमरी, लीजिए प्रस्तुत है।


पीलू ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : गायिका - इकबाल बानो




आमतौर पर ठुमरी एकल रूप में ही गाये जाने की परम्परा है। युगल ठुमरी गायन का उदाहरण कभी-कभी उस समय परिलक्षित होता है, जब युगल खयाल गायक, खयाल के बाद ठुमरी गाते है। इसके अलावा नृत्य के कार्यक्रम में भाव अंग के अन्तर्गत दो नर्तक या नृत्यांगना मंच पर जब भाव-प्रदर्शन करते हैं। बीसवीं शताब्दी के मध्यकाल में संगीत के मंच पर जिन युगल गायकों का वर्चस्व था उनमें शामचौरासी घराने के उस्ताद नज़ाकत अली (1920-1984) और सलामत अली (1934-2001) बन्धुओं का नाम शीर्ष पर था। इन्हीं के दो छोटे भाई अख्तर अली और ज़ाकिर अली हैं, जिनका ठुमरी-दादरा गायन संगीत के मंचों पर बेहद लोकप्रिय हुआ। आइए, अब हम आपको उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ की आवाज़ में राग पीलू की यही ठुमरी सुनवाते हैं।


पीलू ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ उस्ताद अख्तर अली और ज़ाकिर अली खाँ 



1964 में अजीत और माला सिन्हा अभिनीत फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ प्रदर्शित हुई थी। इस फिल्म का संगीत फिल्मों के एक कम चर्चित संगीतकार लच्छीराम तँवर ने तैयार किया था। लच्छीराम की स्वतंत्र रूप से प्रथम संगीत निर्देशित 1947 की फिल्म थी ‘आरसी’। इस पहली फिल्म के संगीत ने तत्कालीन संगीत-प्रेमियों और समीक्षकों का ध्यान आकर्षित किया था। फिल्म का संगीत लोकप्रिय भी हुआ था, किन्तु 1947 से 1964 के बीच उन्हें साधारण स्तर की फिल्मों के प्रस्ताव ही मिले। इसके बावजूद उनकी प्रत्येक फिल्मों के एक-दो गीतों ने लोकप्रियता के मानक गढ़े। 1964 की फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ उनकी अन्तिम फिल्म थी। इस फिल्म में लच्छीराम ने इसी परम्परागत ठुमरी को आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी के स्वरों में प्रस्तुत किया था। फिल्मों में प्रयोग की गई ठुमरियों में सम्भवतः पहली बार युगल स्वरों में किसी ठुमरी को शामिल किया गया था। फिल्म में नायक-नायिका अजीत और माला सिन्हा हैं, परन्तु इस ठुमरी को फिल्म के सह-कलाकारों, सम्भवतः केवल कुमार और निशी पर फिल्माया गया है। ठुमरी के अन्त में अभिनेत्री द्वारा तीनताल में कथक के तत्कार और टुकड़े भी प्रस्तुत किये गए हैं। मूलतः यह ठुमरी राग पीलू की है। परन्तु लच्छीराम ने इसे राग देस के स्वरों में बाँधा है। आशा भोसले और मोहम्मद रफ़ी ने गायन में राग देस के स्वरों को बड़े आकर्षक ढंग से निखारा है। रफ़ी ने इस गीत को सहज-सपाट स्वरों में गाया है किन्तु आशा भोसले ने स्वरों में मुरकियाँ देकर और बोलों में भाव उत्पन्न कर ठुमरी को आकर्षक रूप दे दिया है। आइए सुनते हैं, श्रृंगार रस से ओतप्रोत राग देस में यह फिल्मी ठुमरी।


फिल्म ‘मैं सुहागन हूँ’ : देस ठुमरी : ‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ : आशा भोसले और मोहम्मद रफी : संगीत – लच्छीराम तँवर



और अब प्रस्तुत है, इस श्रृंखला 'फिल्मों के आँगन में ठुमकती पारम्परिक ठुमरी’ के आठवें अंक की ठुमरी –‘गोरी तोरे नैन काजर बिन कारे...’ के आलेख और ठुमरी गीतों का समन्वित श्रव्य संस्करण। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ परिवार की सक्रिय सदस्य संज्ञा टण्डन ने अपनी भावपूर्ण आवाज़ से इसे अलंकृत किया है। आप इस प्रस्तुति का रसास्वादन कीजिए और हमे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।




आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 189वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक अत्यन्त लोकप्रिय ठुमरी रचना का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 190वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।




1 – कण्ठ संगीत के इस अंश को सुन कर बताइए कि यह ठुमरी किस राग में निबद्ध है?

2 – यह ठुमरी रचना किस महान गायक की आवाज़ में है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 191वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस मंच पर स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 187वें अंक की संगीत पहेली में हमने आपको 1952 में प्रदर्शित फिल्म ‘रागरंग’ में शामिल लता मंगेशकर की आवाज़ में बेहद प्रचलित राग यमन के द्रुत खयाल का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग यमन और पहेली के दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- गायिका लता मंगेशकर। इस अंक की पहेली में हमारी एक नियमित श्रोता / पाठक को प्रस्तुति में लता मंगेशकर द्वारा एक स्थान पर शुद्ध मध्यम स्वर का प्रयोग किए जाने के कारण राग यमन कल्याण का भ्रम हुआ। यहाँ हम यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि प्रायः फिल्मी गीतों में राग के स्वरों में मामूली फेर-बदल तो मिलता ही है। परन्तु पहेली में पूछी गई बन्दिश राग यमन की ही है। इसलिए इस बार की पहेली में राग यमन और यमन कल्याण, दोनों ही उत्तरों को हमने सही मान लिया है। पूछे गए दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, पेंसिलवानिया, अमेरिका से विजया राजकोटिया, और हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


आपकी और अपनी बात



मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर इन दिनों हम पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी प्रयोग पर चर्चा कर रहे हैं। आज के अंक में हमने ठुमरी के एकल और युगल गायन के उदाहरण प्रस्तुत किये। श्रृंखला के अगले अंक में हम एक और पारम्परिक ठुमरी और उसके फिल्मी प्रयोग पर चर्चा करेंगे। 

नई फिल्मों के प्रति रुचि रखने वाले पाठकों-श्रोताओं के लिए एक सूचना है। ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ पर प्रत्येक शुक्रवार को हम आपसे नई फिल्मों और उसके गीत-संगीत की जानकारी बाँटते हैं। कुछ अपरिहार्य कारणों से पिछले कुछ समय से हम इसे जारी नहीं नहीं रख पा रहे थे। परन्तु अगले शुक्रवार, 17 अक्तूबर से हम इस साप्ताहिक श्रृंखला को पुनः आरम्भ कर रहे हैं। इस शुक्रवार के अंक में हम नई प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘रोर – टाइगर ऑफ सुन्दरवन’ का ट्रेलर प्रस्तुत कर रहे हैं। आप यह पृष्ठ अवश्य देखिएगा। इसके अलावा रविवार, 19 अक्तूबर को ‘स्वरगोष्ठी’ के अगले अंक भी हमें आपकी प्रतीक्षा रहेगी।



वाचक स्वर : संज्ञा टण्डन 
आलेख व प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र

Sunday, January 19, 2014

पण्डित पलुस्कर और तुलसी के राम

  
स्वरगोष्ठी – 151 में आज

रागों में भक्तिरस – 19

राम की बाललीला के चितेरे तुलसीदास को पलुस्कर जी ने गाया 

‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैजनिया...’



‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की उन्नीसवीं कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्त कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने आपको सोलहवीं शताब्दी के कृष्णभक्त कवि सूरदास के एक लोकप्रिय पद- ‘मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो...’ पर सांगीतिक चर्चा की थी। यह पद कृष्ण की माखन चोरी लीला का वात्सल्य भाव से अभिसिंचित है। इसी क्रम में आज की कड़ी में हम राम की बाललीला का आनन्द लेंगे। गोस्वामी तुलसीदास अपने राम को ठुमक कर चलते हुए और पैजनी की मधुर ध्वनि बिखेरते हुए देखते हैं। तुलसीदास के इस पद को भारतीय संगीत के अनेकानेक शीर्षस्थ कलासाधकों स्वर दिया है। परन्तु ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम आपको यह पद पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर, भजन गायक पुरुषोत्तमदास जलोटा और लता मंगेशकर की आवाज़ों में प्रस्तुत कर रहे हैं। 

 



सोलहवीं शताब्दी के भक्त कवियों में गोस्वामी तुलसीदास शीर्ष स्थान पर विराजमान हैं। आधुनिक काल में सूरदास और तुलसीदास का मूल्यांकन सूर्य और चन्द्र की उपमा से किया जाता है। तुलसीदास की जन्मतिथि और उनके जन्मस्थान के बारे में कई मत हैं। परन्तु एक प्रचलित धारणा के अनुसार उनका जन्म संवत 1554 को वर्तमान उत्तर प्रदेश के बाँदा जनपद के राजापुर नामक ग्राम में हुआ था। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। इनके गुरु बाबा नरहरिदास (नृसिंहदास) थे, जिन्होंने इन्हें दीक्षा दी। इनका अधिकाँश जीवन चित्रकूट, काशी और अयोध्या में बीता। संवत 1631 में अपने अयोध्या प्रवास के दौरान तुलसीदास ने रामचरितमानस का सृजन आरम्भ किया। अभी अरण्य काण्ड की रचना भी न हो पाई थी कि वैष्णवों से विवाद होने के कारण अयोध्या छोड़ कर काशी जाकर निवास करना पड़ा। तुलसीदास श्रीसम्प्रदाय के आचार्य रामानन्द की शिष्य परम्परा में थे। उन्होंने सामाजिक स्थितियों को देखते हुए लोकभाषा में 'रामचरितमानस' की रचना की। उनके साहित्य में वर्णाश्रमधर्म, अवतारवाद, साकार उपासना, सगुणवाद, गो-ब्राह्मण रक्षा, देवादि विविध योनियों का यथोचित सम्मान एवं प्राचीन संस्कृति और वेदमार्ग का मण्डन और साथ ही उस समय के धार्मिक अत्याचारों और सामाजिक दोषों की एवं पन्थवाद की आलोचना भी की है। गोस्वामीजी पन्थ व सम्प्रदाय चलाने के विरोधी थे। उन्होंने भ्रातृप्रेम, स्वराज्य के सिद्धान्त, रामराज्य का आदर्श, अत्याचारों से बचने और शत्रु पर विजयी होने का निदान भी प्रस्तुत किया है। तत्कालीन परिवेश की समस्त शंकाओं का रामचरितमानस में उत्तर है। अकेले इस ग्रन्थ को लेकर यदि गोस्वामी तुलसीदास चाहते तो अपना अत्यन्त विशाल और शक्तिशाली सम्प्रदाय चला सकते थे। परन्तु उन्होने ऐसा नहीं किया। यह एक सौभाग्य की बात है कि आज यही एक ग्रन्थ है, जो साम्प्रदायिकता की सीमाओं को लाँघ कर सारे देश में व्यापक और सभी मत-मतान्तरों को पूर्णतया मान्य है। सबको एक सूत्र में बाँधने का जो कार्य शंकराचार्य ने किया था वही अपने युग में तुलसीदास की प्रवृत्ति साम्प्रदायिक न थी। उनके ग्रन्थों में अद्वैत और विशिष्टाद्वैत का सुन्दर समन्वय उपस्थित है। इसी प्रकार वैष्णव, शैव, शाक्त आदि साम्प्रदायिक भावनाओं और पूजापद्धतियों का समन्वय भी उनकी रचनाओं में पाया जाता है। वे आदर्श समुच्चयवादी सन्त कवि थे। ‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में हम आपको गोस्वामी तुलसीदास का एक पद, जो उनके आराध्य श्रीराम की बाललीला पर केन्द्रित है, सुनवाएँगे। यह पद इस प्रकार है-

ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ।

किलकि किलकि उठत धाय, गिरत भूमि लटपटाय,

धाय मातु गोद लेत दशरथ की रानियाँ।

अंचल रज अंग झारि, विविध भाँति सो दुलारि,

तन मन धन वारि वारि कहत मृदु बचनियाँ।

विद्रुम से अरुण अधर, बोलत मुख मधुर मधुर,

सुभग नासिका में चारु, लटकत लटकनियाँ।

तुलसीदास अति आनन्द, देख कर मुखारविन्द,

रघुवर छबि के समान रघुवर छबि बनियाँ।

ठुमक चलत रामचन्द्र, बाजत पैंजनियाँ।

आइए, सबसे पहले गोस्वामी तुलसीदास का यह पद सुप्रसिद्ध गायक पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर जी (डी.वी. पलुस्कर) के स्वरों में सुनते हैं। इस पद के भाव, गायक पलुस्कर जी और प्रस्तुति में मौजूद राग पीलू की चर्चा हम यह पद सुनने के बाद करेंगे।



तुलसी भजन : ‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ...’ : पण्डित डी.वी. पलुस्कर





तुलसीदास के मानस में श्रीराम मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में विराजमान थे। इसीलिए सूरदास के कृष्ण की भाँति श्रृंगार और चंचल भावों को उन्होने विस्तार नहीं दिया है। रामचरितमानस में भी श्रीराम की बाललीलाओं के प्रसंग संक्षिप्त ही हैं। रामचरितमानस के दोहा संख्या 190 में रामजन्म का प्रसंग है। इसके उपरान्त दोहा संख्या 191 के बाद अत्यन्त प्रचलित छन्द- ‘भए प्रगट कृपाला...’ में माता कौशल्या ‘कीजै शिशुलीला...’ का अनुरोध करतीं हैं। यहाँ से लेकर दोहा संख्या 203 तक गोस्वामी जी ने राम सहित चारो भाइयों के विभिन्न संस्कारों का उल्लेख किया है। बाल सुलभ क्रीडा का जितना मोहक चित्रण तुलसीदास ने इस पद में किया है, वैसा अन्यत्र नहीं मिलता।

इस पद का पण्डित दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर ने भावपूर्ण गायन प्रस्तुत कर अपने पिता पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर की संगीत परम्परा को आगे बढ़ाया है। पण्डित विष्णु दिगम्बर पलुस्कर ने भक्त कवियों की कृतियों को सरल रागों में बाँध कर समाज में शास्त्रीय संगीत को ग्राह्य और सर्वसुलभ बनाया था। तुलसीदास का यह पद पलुस्कर जी ने चंचल, श्रृंगार और नटखट भाव की सृष्टि करने वाले राग पीलू के स्वरों में प्रस्तुत किया था। इस पद के लिए यह धुन इतनी लोकप्रिय हुई कि परवर्ती प्रायः सभी गायकों ने इसी धुन का अनुसरण किया। राग पीलू काफी थाट के अन्तर्गत माना जाता है। यह ठुमरी अंग का संकीर्ण राग है। रग भैरवी की तरह रसानुभूति के लिए और रचना के भाव को सम्प्रेषित करने के लिए सभी 12 स्वरों का प्रयोग भी किया जा सकता है। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद होता है। गोस्वामी तुलसीदास का यही पद अब हम आपको दो प्रमुख कलासाधकों से सुनवाते हैं। पहले प्रस्तुत है, चर्चित भजन गायक पुरुषोत्तमदास जलोटा की आवाज़ में। पुरुषोत्तमदास जी आज के लोकप्रिय भजन गायक अनूप जलोटा के पिता हैं। यह भजन उन्होने कीर्तन शैली में राग मिश्र पीलू के स्वर के साथ गाया है। इसके बाद आप स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर की आवाज़ में यही भजन सुनेंगे। इनकी गायकी में अधिकतर पलुस्कर जी के स्वर-समूह को स्वीकार किया गया है। आप तुलसीदास के इस पद के रस-भाव की अनुभूति कीजिए और मुझे आज के इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।



तुलसी भजन : ‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ...’ : पुरुषोत्तमदास जलोटा

 




तुलसी भजन : ‘ठुमक चलत रामचन्द्र बाजत पैंजनियाँ...’ : लता मंगेशकर






आजकी पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ की 151वीं संगीत पहेली में हम आपको गायन और सितार वादन की जुगलबन्दी के अन्तर्गत एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 160वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – यह किस जनप्रिय भजन की धुन है? भजन की केवल आरम्भिक पंक्ति लिख भेजिए।

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 153वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।



पिछली पहेली के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 149वीं संगीत पहेली में हमने आपको सूरदास के एक पद का एक अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग काफी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- एम.एस. शुभलक्ष्मी। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर जबलपुर से क्षिति तिवारी, जौनपुर से डॉ. पी.के. त्रिपाठी, चंडीगढ़ से हरकीरत सिंह और बड़ोदरा, गुजरात से हमारे एक नए प्रतिभागी गोविन्द नामदेव ने दिया है। हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी का एक ही उत्तर सही है। पाँचो प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।



अपनी बात


मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ हमने 20 कड़ियों में प्रस्तुत करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। यह इस श्रृंखला की उन्नीसवीं कड़ी थी। आज की कड़ी में हमने आपसे गोस्वामी तुलसीदास के वात्सल्य भाव से परिपूर्ण एक पद का रसास्वादन कराया। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसके माध्यम से अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। आप हमें एक नई श्रृंखला के विषय का सुझाव भी दे सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करेंगे। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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