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Wednesday, January 26, 2011

अपने पडो़सी दिल से भीनी-भीनी भोर की माँग कर बैठे गोटेदार गुलज़ार साहब, आशा जी एवं राग तोड़ी वाले पंचम दा

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #१०९

गुलज़ार और पंचम - ये दो नाम दो होते हुए भी एक से लगते हैं और जब भी इन दोनों का नाम साथ में आता है तो सुनने वालों को मालूम हो जाता है कि कुछ नया कुछ अलबेला पक के आने वाला है बाहर.. अभी-अभी पतीला खुलेगा और कोई मीठी-सी नज़्म छलकते हुए हमारे कानों तक पहुँच जाएगी। ये दोनों फ़नकार एक-दूसरे के पूरक-से हो चले थे। कैसी भी घुमावदार सोच हो, किसी भी मोड़ पर बिन कहे मुड़ने वाले मिसरे हों या फिर किसी अखबार की सुर्खियाँ हीं क्यों न हो.. गुलज़ार के हरेक शब्द-नुमा ईंट का जवाब पंचम अपने सुरों के पत्थर (अजीब उपमा है.. यूँ होना तो फूल चाहिए, लेकिन मुहावरा बनाने वाले ने हमारे पास कम हीं विकल्प छोड़े हैं) से दिया करते थे... और जवाब ऐसा कि "साँप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे".. गुलज़ार के शब्द जहाँ शिखर पर हीं मौजूद रहें, वहीं उसी के इर्द-गिर्द पंचम अपनी पताका भी लहरा आएँ... तभी तो दोनों की जोड़ी आजतक प्यार और गुमान से याद की जाती है।

लेकिन यह जोड़ी ज्यादा दिनों तक रह नहीं पाई। गुलज़ार को राह में अकेले छोड़कर पंचम दुसरी दुनिया में निकल लिए। पंचम के गुजरने का असर गुलज़ार पर किस हद तक पड़ा, इसका अंदाजा पंचम की याद में लिखे गुलज़ार के इस नज़्म से लगाया जा सकता है:

याद है बारिशों का दिन, पंचम

याद है जब पहाड़ी के नीचे वादी में
धुंध से झांककर निकलती हुई
रेल की पटरियां गुज़रती थीं
धुंध में ऐसे लग रहे थे हम
जैसे दो पौधे पास बैठे हों
हम बहुत देर तक वहां बैठे
उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे
जिसको आना था पिछली शब, लेकिन
उसकी आमद का वक्‍त टलता रहा
देर तक पटरियों पर बैठे हुए
रेल का इंतज़ार करते रहे
रेल आई ना उसका वक्‍त हुआ
और तुम, यूं ही दो क़दम चलकर
धुंध पर पांव रखके चल भी दिए

मैं अकेला हूं धुंध में 'पंचम'...


पंचम की क्षति अपूर्णीय है.. जितना गुलज़ार के लिए उतना हीं संगीत के अन्य साधकों के लिए भी... पंचम के गए पूरे सत्रह बरस हो गए, गए ४ जनवरी को उनकी पुण्य-तिथि थी। मैंने जब यह "आलेख" लिखना शुरू किया था तो यह सोचा नहीं था कि मेरी लेखनी पंचम को याद करने में डूब जाएगी, लेकिन भावनाओं का वह सैलाब बह निकला कि न मैं खुद को रोक पाया, न अपनी लेखनी को। बात जब गुलज़ार और पंचम की हो रही है तो क्यों न आज अपनी महफ़िल को इन्हीं दोनों की एक नज़्म से सजाया जाए।

हम आज की नज़्म तक पहुँचें, इससे पहले एक और फ़नकार से आपका परिचय कराना लाजिमी हो जाता है... मुआफ़ कीजिएगा, फ़नकार नहीं.. फ़नकारा। इन फ़नकारा के बिना गुलज़ार-पंचम की जोड़ी में उतनी जान नहीं, जोकि इनकी तिकड़ी में है। यह फ़नकारा कोई और नहीं, बल्कि पंचम दा की अर्धांगिनी आशा भोसले जी हैं, जिन्हें सारी दुनिया आशा ताई के नाम से पुकारती है। गुलज़ार साहब, पंचम दा और आशा ताई की तिकड़ी ने फिल्मों में एक से बढकर एक गीत दिए है। चंद नाम यहाँ पेश किए देता हूँ: --'क़तरा क़तरा‍ मिलती है', 'मेरा कुछ सामान', 'आंकी चली बांकी चली', 'आऊंगी एक दिन आज जाऊं' 'बड़ी देर से मेघा बरसा', 'बेचारा दिल क्‍या करे', 'छोटी सी कहानी से'... यह फेहरिश्त और भी बहुत लंबी है, लेकिन मेरे हिसाब से इतने उदाहरण हीं काफी हैं।

न सिर्फ़ फिल्मों में बल्कि इनकी तिकड़ी का कमाल "एलबमों" में भी नज़र आता है। "एलबमों" की बात करने पर जिस एलबम की याद सबसे पहले आती है, वह है "दिल पड़ोसी है"। इस एलबम को आशा ताई के जन्मदिन पर यानि कि ८ सितम्बर को १९८७ में रीलिज किया गया था। इसमें में कुल चौदह गाने थे(हैं)। आज आपको हम इस एलबम से "भीनी भीनी भोर आई" सुनवाने जा रहे हैं। अगली कड़ी में हम एलबम के बाकी गानों से रूबरू होंगे। इस गाने के बारे में हम कुछ कहें, इससे अच्छा होगा कि क्यों न इसके कारीगरों से हीं इसके बनने की कहानी सुन लें। "संगीत सरिता" कार्यक्रम के अंतर्गत "मेरी संगीत यात्रा" लेकर आ रहे हैं "गुलज़ार साहब, पंचम दा एवं आशा ताई" (सौजन्य: सजीव जी, सुजॉय जी)

पंचम दा: आशा जी, आपको याद है कोई गीत जो आपने काफ़ी मेहनत से गाया होगा?

आशा जी: हाँ, एक गीत आपने राग तोड़ी में बनाया था। वैसे तोड़ी में "धा" से पंचम लगाना चाहिए, पर फिल्मी गीत में अगर पूरा का पूरा राग वैसे हीं रख दिया जाए तो उस राग पर आधारित सभी गीत एक जैसे हीं लगेंगे। थोड़ी-बहुत चेंज करके अगर गीतों को ढाला जाए तो एक नयापन भी आता है और सुनने में भी अच्छा लगता है।

गुलज़ार साहब: हाँ सही बात है, अगर "क्लासिकल म्युज़िक" को मिसाल बनाकर कोई फिल्म बन रही है तब अलग बात है।

पंचम दा: गुलज़ार, आप को याद है "भीनी भीनी भोर".. "दिल पड़ोसी है" एलबम का ये पहला गाना रखा था हमने?

आशा जी: गुलज़ार भाई, आपने इस गाने में "गोटा" शब्द का बहुत खूबसूरत इस्तेमाल किया था।

गुलज़ार साहब: सोने की चमक की "उपमा" हमारे फिल्मी गीतों में काफ़ी पाई जाती है, कभी आग से, कभी धूप से। लेकिन हर चीज़ जो चमकती है वह सोना नहीं होती (तीनों हँसते हैं), हमारे यहाँ शादी में गोटेदार चुनरी देखने को मिलती है, तो उसी से मैंने यह लिया था।

आशा जी: लेकिन आपने तो बादल को गोटा लगाया था ना?

गुलज़ार साहब: मुझे लगता था कि गोटे की जो चुनरी है वो बहुत हीं खूबसूरत है। आशा जी, आपने कहा कि पंचम ने तोड़ी का "चलन" बदला, मुझे तो हमेशा हीं इसके चाल-चलने पर शक़ रहा है (तीनों ठहाका लगाते हैं), आपने कहा कि इन्होंने अपना चलन बदला! (हँसी ज़ारी है)

पंचम दा: यह सुबह का गाना था, इसमें हमने मुर्गियों की आवाज़ डाली थी, बहुत सारे "साउंड इफ़ेक्ट्स" थे कि जिससे सुबह का "वातावरण" सामने आए, एक आदत हो चुकी थी, अब आप इसे चलन कहिये, ऐसे कोई राग बन जाता हओ, "मूड" बन जाता है।

तो आपने देखा कि माहौल कितना खुशगवार हो जाता था, जब ये तीनों एक जगह आ जुटते थे। जब बातचीत इतनी सुरीली है तो संगीत के बारे में क्या कहा जाए! चलिए तो फिर हम भी राग तोड़ी में मुर्गिर्यों की बांग के बीच गुलज़ार साहब के "गोटे" का मज़ा लेते हैं और इस तिकड़ी को फिर से याद करते हैं (वैसे अगली कड़ी भी इसी तिकड़ी और इसी एलबम को समर्पित है):

भिनी भिनी भोर आई
भिनी भिनी भोर आई
रूप रूप पर छिडके सोना
स्वर्ण कलश चमकाती आई
भिनी भिनी भोर भोर आई ...

माथे सुनहरी टीका लगाये
पात पात पर गोटा लगाये
गोटा लगाई
सात रंग की जाई आई
भिनी भिनी भोर आई...

ओस धुले मुख पोछे सारे
_____ लेप गई उजियारे
उजियारे उजियारे
सा रे ग मा धा नि
जागो जगर की बेला आई
भिनी भिनी भोर आई...

भिनी भिनी भोर आई
रूप रूप पर छिडके सोना
रूप रूप पर छिडके सोना
स्वर्ण कलश चमकाती आई
भिनी भिनी भोर आई
भिनी भिनी भोर आई.....




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल/नज़्म हमने पेश की है, उसके एक शेर/उसकी एक पंक्ति में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल/नज़्म को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "ऊँगली" और मिसरे कुछ यूँ थे-

नज़र नीची किए दाँतों में ऊँगली को दबाती हो,
इसी को प्यार कहते हैं, इसी को प्यार कहते हैं।

इस शब्द पर ये सारे शेर/रूबाईयाँ/नज़्म महफ़िल में कहे गए:

उँगली उठाना बड़ा आसां होता है किसी पे
लोग अपनी कमियों की बात करते नहीं हैं. - शन्नो जी ( इशारा किसकी तरफ़ है? :) )

उसका अँगुली पकडना गजब ढा गया ,
उसका प्रेम का इजहार गजब ढा गया - मंजु जी (ये पंक्तियाँ शेर बनते-बनते रह गई.. कुछ कमी है कहीं न कहीं)

वो चीरता रहा मेरे हृदय को,
मैं देखता रहा फिर भी समय को
ऊँगली उठा रहा था वो मेरी तरफ मगर,
छुपा रहा था शायद वो अपने भय को - अवनींद्र जी (इस बार आपका चिरपरिचित जादू कहीं गायब मालूम पड़ता है)

उँगलिया उठेगी सुखे हुए बालो की तरफ,
एक नजर डालेंगें बीते हुए सालो की तरफ - कफ़ील आज़र.. हमने इनपर पूरी की पूरी एक कड़ी लिख डाली थी (जगजीत सिंह जी तो बस गुलुकार हैं, हमें तो ग़ज़लगो के नाम की दरकार है)

डूब गयी जब कलम हमारी प्यार के गहरे सागर मे..
दर्द की उंगली थामे थामे, उसे उबरते देखा है -दिलीप तिवारी (पूजा जी, इनके बारे में कुछ और जानकारी कहीं से हासिल होगी? )

पिछली महफ़िल में सबसे पहले हाज़िरी लगाई अवध जी ने, लेकिन कोई भी शब्द गायब न पाकर आप फिर से आने का वादा करके रवाना हो लिए, लेकिन यह क्या, एक बार फिर आपने वादाखिलाफ़ी की.. ये अच्छी बात नहीं :) आपके बाद आकर शन्नो जी ने न सिर्फ़ गायब शब्द पहचाना बल्कि उसपर एक-दो शेर भी कहे। इसलिए नियम से शन्नो जी हीं "शान-ए-महफ़िल" बनीं। प्रतीक जी, आपने हमारे प्रयास को सराहा, इसके लिए आपका तह-ए-दिल से आभार! मंजु जी एवं अवनींद्र जी, महफ़िल में स्वरचित शेरों के दौर को आप दोनों ने आगे बढाया। शुक्रिया! सुमित जी, अगली बार से शायर का नाम भूल मत आईयेगा कहीं :) नीलम जी, आपके आने को आना समझूँ या नहीं, आपने शेर कहने की बजाय शन्नो जी को शांत कराना हीं जरूरी समझा.. ऐसा क्यों? :) पूजा जी, दिलीप जी का शेर है तो काबिल-ए-तारीफ़, लेकिन हम इनकी तारीफ़ भी जानना चाहेंगे। इस बार याद रखिएगा :)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Monday, July 20, 2009

आज की काली घटा...याद कर रही है उस आवाज़ को जो कहीं दूर होकर भी पास है

ओल्ड इस गोल्ड शृंखला # 147

सुप्रसिद्ध पार्श्व गायिका गीता दत्त जी के आख़िर के दिनों की दुखभरी कहानी का ज़िक्र हमनें यहाँ कई बार किया है। दोस्तों, आज यानी कि २० जुलाई का ही वह दिन था, साल १९७२, जब काल के क्रूर हाथों ने गीता जी को हम से हमेशा हमेशा के लिए छीन लिया था। आज उनके गुज़रे ३७ साल हो गये हैं, लेकिन उनके बाद दूसरी किसी भी गायिका की आवाज़ के ज़रिये उनका वह अंदाज़ फिर वापस नहीं आया, जो कभी समा को नशीला बना जाती थी तो कभी मन में एक अजीब सी विकलता भर देती थी, और कभी वेदना के स्वरों से मन को उदास कर देती थी। अगर आप मेरे एक बात का कोई ग़लत अर्थ न निकालें तो मैं यह ज़रूर कहना चाहूँगा कि लता जी की आवाज़ के करीब करीब सुमन कल्याणपुर की आवाज़ ५० और ६० के दशकों में सुनाई दी थी, और दक्षिण की सुप्रसिद्ध गायिका एस. जानकी की आवाज़ भी कुछ कुछ आशा जी की आवाज़ से मिलती जुलती है। लेकिन ऐसी कोई भी दूसरी आवाज़ आज तक पैदा नहीं हुई है जो गीता जी की आवाज़ के करीब हो। कुल मिलाकर कहने का अर्थ यह है कि गीता दत्त, गीता दत्त हैं, उनकी जगह आज तक न कोई ले सका है और लगता नहीं कि आगे भी कोई ले पायेगा। आज गीता दत्त जी की पुण्य तिथि के अवसर पर हिंद युग्म की तरफ़ से हम उन्हे दे रहे हैं भावभीनी श्रद्धांजली, और सुनवा रहे हैं उनका गाया फ़िल्म 'उसकी कहानी' का एक बड़ा ही सुंदर गीत - "आज की काली घटा, मस्त मतवाली घटा".

'उसकी कहानी' फ़िल्म आयी थी सन् १९६६ में जिसका निर्माण बासु भट्टाचार्य ने किया था और मुख्य कलाकार थे तरुण घोष और अंजु महेन्द्रू। फ़िल्म का संगीत तैयार किया था एक बड़े ही कमचर्चित संगीतकार ने जिनका नाम था कानु राय। कानु राय ५० के दशक में हावड़ा से मुंबई गायक बनने आये थे। गायक बनने की उनकी तमन्ना तो पूरी नहीं हो सकी, लेकिन संगीतकार सलिल चौधरी के यहाँ उनकी अक्सर बैठकें होती थीं। यहीं उनका दो ऐसे व्यक्तियों से परिचय हुआ जो आगे चलकर सही मायने में उनके हितकर साबित हुए। और ये दो व्यक्ति थे गीतकार शैलेन्द्र और फ़िल्मकार बासु भट्टाचार्य। बासु साहब की पाँच फ़िल्मों में कानु राय का संगीत था (अनुभव, उसकी कहानी, आविष्कार, गृहप्रवेश, स्पर्श)। दोस्तों, आज हमने गीता जी की पुण्य तिथि पर कानु राय का स्वरबद्ध गीत इसलिए शामिल किया क्योंकि गीता जी को आख़िरी बार के लिए गवाने का श्रेय भी कानु राय को ही जाता है। उनकी संगीतबद्ध फ़िल्म 'अनुभव' में गीता जी की आवाज़ अंतिम बार सुनायी दी थी। 'उसकी कहानी' फ़िल्म के प्रस्तुत गीत में कैफ़ी आज़मी ने फ़िल्मी गीत की साधारण स्वरूप से बाहर निकलकर बिना तुकबंदी किए गाने को लिखा था। गीत में और्केस्ट्रेशन कम से कम रखा गया है। गीत जैसे एक ठंडी और हल्की बारिश के झोंके की तरह आता है और बड़े ही कोमलता से हमें भीगो जाता है। गीता जी के गले की कारिगरी के तो कहने ही क्या, कोमल लेकिन मादक। इसमें कोई शक़ नहीं कि यह गीत फ़िल्म संगीत के धरोहर का एक अनमोल नगीना है। दोस्तों, गीत सुनने से पहले एक बात और हम बताना चाहते हैं कि कई लोगों में यह ग़लत धारणा बनी हुई है कि मुकुल राय की तरह कानु राय भी गीता दत्त के भाई थे। लेकिन यह सच नहीं है, मुकुल राय ज़रूर गीता जी के भाई हैं, लेकिन कानु राय का गीता जी से कोई पारिवारिक संबंध नहीं है। लीजिए, गीता जी की याद में सुनते हैं "आज की काली घटा, मस्त मतवाली घटा, मुझसे कहती है के प्यासा है कोई, कौन प्यासा है मुझे क्या मालूम"। हम भी गीता जी की आवाज़ के प्यासे हैं, चाहे कितना भी उनके गानें सुन लें, दिल ही नहीं भरता, दिल तो बस यही करता है कि उनको सुनते ही चले जायें, सुनते ही चले जायें, सुनते ही चले जायें...



और अब बूझिये ये पहेली. अंदाजा लगाइये कि हमारा अगला "ओल्ड इस गोल्ड" गीत कौन सा है. हम आपको देंगे तीन सूत्र उस गीत से जुड़े. ये परीक्षा है आपके फ़िल्म संगीत ज्ञान की. याद रहे सबसे पहले सही जवाब देने वाले विजेता को मिलेंगें 2 अंक और 25 सही जवाबों के बाद आपको मिलेगा मौका अपनी पसंद के 5 गीतों को पेश करने का ओल्ड इस गोल्ड पर सुजॉय के साथ. देखते हैं कौन बनेगा हमारा दूसरा (पहले गेस्ट होस्ट हमें मिल चुके हैं शरद तैलंग जी के रूप में)"गेस्ट होस्ट". अगले गीत के लिए आपके तीन सूत्र ये हैं-

1. मुकेश की आवाज़ गूंजेगी कल बहुत दिनों बाद इस महफिल में.
2. शैलेन्द्र ने लिखा है इस बेहद खूबसूरत गीत को.
3. मुखड़े में शब्द है -"सुरूर".

पिछली पहेली का परिणाम -
३४ अंकों के साथ स्वप्न जी अपनी मंजिल की तरफ तेजी से अग्रसर हैं. बधाई आपको. पराग जी साईट काफी अच्छी बन पड़ी है बधाई आपको भी, हम सब आपके आभारी है क्योंकि आप ही के कारण आज हम सब गीता जी को और अधिक समझ पाए हैं. राज जी, मनु जी, शमिख जी, और शरद जी आप सब का भी आभार महफिल में पधारने के लिए.

खोज और आलेख- सुजॉय चटर्जी



ओल्ड इस गोल्ड यानी जो पुराना है वो सोना है, ये कहावत किसी अन्य सन्दर्भ में सही हो या न हो, हिन्दी फ़िल्म संगीत के विषय में एकदम सटीक है. ये शृंखला एक कोशिश है उन अनमोल मोतियों को एक माला में पिरोने की. रोज शाम 6-7 के बीच आवाज़ पर हम आपको सुनवाते हैं, गुज़रे दिनों का एक चुनिंदा गीत और थोडी बहुत चर्चा भी करेंगे उस ख़ास गीत से जुड़ी हुई कुछ बातों की. यहाँ आपके होस्ट होंगे आवाज़ के बहुत पुराने साथी और संगीत सफर के हमसफ़र सुजॉय चटर्जी. तो रोज शाम अवश्य पधारें आवाज़ की इस महफिल में और सुनें कुछ बेमिसाल सदाबहार नग्में.

Sunday, July 19, 2009

रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत (10)

पराग सांकला जी से हमारे सभी नियमित श्रोता परिचित हैं. इन्हें हम आवाज़ पर गीता दत्त विशेषज्ञ कहते हैं, सच कहें तो इनके माध्यम से गीता दत्त जी की गायिकी के ऐसे अनछुवे पहलूओं पर हम सब का ध्यान गया है जिसके बारे में शायाद हम कभी नहीं जान पाते. एक बार पहले भी पराग ने आपको गीता जी के गाये कुछ मधुर और दुर्लभ प्रेम गीत सुनवाए थे, इसी कड़ी को आज आगे बढाते हुए आज हम सुनते हैं गीता जी के गाये १४ और प्रेम गीत. ये हिंद युग्म परिवार की तरह से भाव भीनी श्रद्धाजंली है गायिका गीता दत्त को जिनकी कल ३७ वीं पुण्यतिथि है. पेश है पराग जी के नायाब संकलन में से कुछ अनमोल मोती इस रविवार सुबह की कॉफी में

गीता रॉय (दत्त) ने एक से बढ़कर एक खूबसूरत प्रेमगीत गाये हैं मगर जिनके बारे में या तो कम लोगों को जानकारी हैं या संगीत प्रेमियों को इस बात का शायद अहसास नहीं है. इसीलिए आज हम गीता के गाये हुए कुछ मधुर मीठे प्रणय गीतों की खोज करेंगे.

सन १९४८ में पंजाब के जाने माने संगीतकार हंसराज बहल के लिए फिल्म "चुनरिया" के लिए गीता ने गाया था "ओह मोटोरवाले बाबू मिलने आजा रे, तेरी मोटर रहे सलामत बाबू मिलने आजा रे". एक गाँव की अल्हड गोरी की भावनाओं को सरलता और मधुरता से इस गाने में गीता ने अपनी आवाज़ से सजीव बना दिया है.



सन १९५० में फिल्म "हमारी बेटी" के लिए जवान संगीतकार स्नेहल भाटकर (जिनका असली नाम था वासुदेव भाटकर) ने मुकेश और गीता रॉय से गवाया एक मीठा सा युगल गीत "किसने छेड़े तार मेरी दिल की सितार के किसने छेड़े तार". भावों की नाजुकता और प्रेम की परिभाषा का एक सुन्दर उदाहरण हैं यह युगल गीत जिसे लिखा था रणधीर ने.



बावरे नैन फिल्म में संगीतकार रोशन को सबसे पहला सुप्रसिद्ध गीत (ख़यालों में किसी के) देने के बाद अगले साल गीता रॉय ने रोशन के लिए फिल्म बेदर्दी के लिए गाया "दो प्यार की बातें हो जाए, एक तुम कह दो, एक हम कह दे". बूटाराम शर्मा के लिखे इस सीधे से गीत में अपनी आवाज़ की जादू से एक अनोखी अदा बिखेरी हैं गीता रोय ने.



जिस साल फिल्म "दो भाई" प्रर्दशित हुई उसी साल फिल्मिस्तान की और एक फिल्म आयी थी जिसका नाम था शहनाई. दिग्गज संगीतकार सी रामचन्द्र ने एक फडकता हुआ प्रेमगीत बनाया था "चढ़ती जवानी में झूलो झूलो मेरी रानी, तुम प्रेम का हिंडोला". इसे गाया था खुद सी रामचंद्र, गीता रॉय और बीनापानी मुख़र्जी ने. कहाँ "दो भाई" के दर्द भरे गीत और कहाँ यह प्रेम के हिंडोले!



गीतकार राजेंदर किशन की कलम का जादू हैं इस प्रेमगीत में जिसे संगीतबद्ध किया हैं सचिन देव बर्मन ने. "एक हम और दूसरे तुम, तीसरा कोई नहीं, यूं कहो हम एक हैं और दूसरा कोई नहीं". इसे गाया हैं किशोर कुमार और गीता रॉय ने फिल्म "प्यार" के लिए जो सन १९५० में आई थी. गीत फिल्माया गया था राज कपूर और नर्गिस पर.



"हम तुमसे पूंछते हैं सच सच हमें बताना, क्या तुम को आ गया हैं दिल लेके मुस्कुराना?" वाह वाह क्या सवाल किया हैं. यह बोल हैं अंजुम जयपुरी के लिए जिन्हें संगीतबद्ध किया था चित्रगुप्त ने फिल्म हमारी शान के लिए जो १९५१ में प्रर्दशित हुई थी. बहुत कम संगीत प्रेमी जानते हैं की गीता दत्त ने सबसे ज्यादा गीत संगीतकार चित्रगुप्त के लिए गाये हैं. यह गीत गाया हैं मोहम्मद रफी और गीता ने. रफी और गीता दत्त के गानों में भी सबसे ज्यादा गाने चित्रगुप्त ने संगीतबद्ध किये हैं.



पाश्चात्य धुन पर थिरकता हुआ एक स्वप्नील प्रेमगीत हैं फिल्म ज़माना (१९५७) से जिसके संगीत निर्देशक हैं सलील चौधरी और बोल हैं "दिल यह चाहे चाँद सितारों को छूले ..दिन बहार के हैं.." उसी साल प्रसिद्द फिल्म बंदी का मीठा सा गीत हैं "गोरा बदन मोरा उमरिया बाली मैं तो गेंद की डाली मोपे तिरछी नजरिया ना डालो मोरे बालमा". हेमंतकुमार का संगीतबद्ध यह गीत सुनने के बाद दिल में छा जाता है.



संगीतकार ओमकार प्रसाद नय्यर (जो की ओ पी नय्यर के नाम से ज्यादा परिचित है) ने कई फिल्मों को फड़कता हुआ संगीत दिया. अभिनेत्री श्यामा की एक फिल्म आई थी श्रीमती ४२० (१९५६) में, जिसके लिए ओ पी ने एक प्रेमगीत गवाया था मोहम्मद रफी और गीता दत्त से. गीत के बोल है "यहाँ हम वहां तुम, मेरा दिल हुआ हैं गुम", जिसे लिखा था जान निसार अख्तर ने.



आज के युवा संगीत प्रेमी शायद शंकरदास गुप्ता के नाम से अनजान है. फिल्म आहुती (१९५०) के लिए गीता दत्त ने शंकरदास गुप्ता एक युगल गीत गाया था "लहरों से खेले चन्दा, चन्दा से खेले तारे". उसी फिल्म के लिए और एक गीत इन दोनों ने गाया था "दिल के बस में हैं जहां ले जाएगा हम जायेंगे..वक़्त से कह दो के ठहरे बन स्वर के आयेंगे". एक अलग अंदाज़ में यह गीत स्वरबद्ध किया हैं, जैसे की दो प्रेमी बात-चीत कर रहे हैं. गीता अपनी मदभरी आवाज़ में कहती हैं -"चाँद बन कर आयेंगे और चांदनी फैलायेंगे".



अगर प्रेमगीत में हास्य रस को शामिल किया जाया तो क्या सुनने मिलेगा? मेरा जवाब हैं "दिल-ऐ-बेकरार कहे बार बार,हमसे थोडा थोडा प्यार भी ज़रूर करो जी". इस को गाया हैं गीता दत्त और गुलाम मुस्तफा दुर्रानी ने फिल्म बगदाद के लिए और संगीतबद्ध किया हैं बुलो सी रानी ने. जिस बुलो सी रानी ने सिर्फ दो साल पहले जोगन में एक से एक बेहतर भजन गीता दत्त से गवाए थे उन्हों ने इस फिल्म में उसी गीता से लाजवाब हलके फुलके गीत भी गवाएं. और जिस राजा मेहंदी अली खान साहब ने फिल्म दो भाई के लिखा था "मेरा सुन्दर सपना बीत गया" , देखिये कितनी मजेदार बाते लिखी हैं इस गाने में:

दुर्रानी : मैं बाज़ आया मोहब्बत से, उठा लो पान दान अपना
गीता दत्त : तुम्हारी मेरी उल्फत का हैं दुश्मन खानदान अपना
दुर्रानी : तो ऐसे खानदान की नाक में अमचूर करो जी



सचिन देव बर्मन ने जिस साल गीता रॉय को फिल्म दो भाई के दर्द भरे गीतों से लोकप्रियता की चोटी पर पहुंचाया उसी साल उन्ही की संगीत बद्ध की हुई फिल्म आई थी "दिल की रानी". जवान राज कपूर और मधुबाला ने इस फिल्म में अभिनय किया था. उसी फिल्म का यह मीठा सा प्रेमगीत हैं "आहा मोरे मोहन ने मुझको बुलाया हो". इसी फिल्म में और एक प्यार भरा गीत था "आयेंगे आयेंगे आयेंगे रे मेरे मन के बसैय्या आयेंगे रे".



और अब आज की आखरी पेशकश है संगीतकार बुलो सी रानी का फिल्म दरोगाजी (१९४९) के लिया संगीतबद्ध किया हुआ प्रेमगीत "अपने साजन के मन में समाई रे". बुलो सी रानी ने इस फिल्म के पूरे के पूरे यानी १२ गाने सिर्फ गीता रॉय से ही गवाए हैं. अभिनेत्री नर्गिस पर फिल्माया गया यह मधुर गीत के बोल हैं मनोहर लाल खन्ना (संगीतकार उषा खन्ना के पिताजी) के. गीता की आवाज़ में लचक और नशा का एक अजीब मिश्रण है जो इस गीत को और भी मीठा कर देता हैं.



जो अदा उनके दर्दभरे गीतों में, भजनों में और नृत्य गीतों में हैं वही अदा, वही खासियत, वही अंदाज़ उनके गाये हुए प्रेम गीतों में है. उम्मीद हैं की आप सभी संगीत प्रेमियों को इन गीतों से वही आनंद और उल्हास मिला हैं जितना हमें मिला.

प्रस्तुति - पराग सांकला


"रविवार सुबह की कॉफी और कुछ दुर्लभ गीत" एक शृंखला है कुछ बेहद दुर्लभ गीतों के संकलन की. कुछ ऐसे गीत जो अमूमन कहीं सुनने को नहीं मिलते, या फिर ऐसे गीत जिन्हें पर्याप्त प्रचार नहीं मिल पाया और अच्छे होने के बावजूद एक बड़े श्रोता वर्ग तक वो नहीं पहुँच पाया. ये गीत नए भी हो सकते हैं और पुराने भी. आवाज़ के बहुत से ऐसे नियमित श्रोता हैं जो न सिर्फ संगीत प्रेमी हैं बल्कि उनके पास अपने पसंदीदा संगीत का एक विशाल खजाना भी उपलब्ध है. इस स्तम्भ के माध्यम से हम उनका परिचय आप सब से करवाते रहेंगें. और सुनवाते रहेंगें उनके संकलन के वो अनूठे गीत. यदि आपके पास भी हैं कुछ ऐसे अनमोल गीत और उन्हें आप अपने जैसे अन्य संगीत प्रेमियों के साथ बाँटना चाहते हैं, तो हमें लिखिए. यदि कोई ख़ास गीत ऐसा है जिसे आप ढूंढ रहे हैं तो उनकी फरमाईश भी यहाँ रख सकते हैं. हो सकता है किसी रसिक के पास वो गीत हो जिसे आप खोज रहे हों.

Tuesday, March 31, 2009

कहाँ हाथ से कुछ छूट गया याद नहीं - मीना कुमारी की याद में


मीना कुमारी ने 'हिन्दी सिनेमा' जगत में जिस मुकाम को हासिल किया वो आज भी अस्पर्शनीय है ।वे जितनी उच्चकोटि की अदाकारा थीं उतनी ही उच्चकोटि की शायरा भी । अपने दिली जज्बात को उन्होंने जिस तरह कलमबंद किया उन्हें पढ़ कर ऐसा लगता है कि मानो कोई नसों में चुपके -चुपके हजारों सुईयाँ चुभो रहा हो. गम के रिश्तों को उन्होंने जो जज्बाती शक्ल अपनी शायरी में दी, वह बहुत कम कलमकारों के बूते की बात होती है. गम का ये दामन शायद 'अल्लाह ताला' की वदीयत थी जैसे। तभी तो कहा उन्होंने -

कहाँ अब मैं इस गम से घबरा के जाऊँ
कि यह ग़म तुम्हारी वदीयत है मुझको

पैदा होते ही अब्बा अली बख्श ने रुपये के तंगी और पहले से दो बेटियों के बोझ से घबरा कर इन्हे एक मुस्लिम अनाथ आश्रम में छोड़ आए. अम्मी के काफी रोने -धोने पर वे इन्हे वापस ले आए ।परिवार हो या वैवाहिक जीवन मीना जो को तन्हाईयाँ हीं मिली

चाँद तन्हा है,आस्मां तन्हा
दिल मिला है कहाँ -कहाँ तन्हां

बुझ गई आस, छुप गया तारा
थात्थारता रहा धुआं तन्हां

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं
जिस्म तन्हां है और जां तन्हां

हमसफ़र कोई गर मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हां

जलती -बुझती -सी रौशनी के परे
सिमटा -सिमटा -सा एक मकां तन्हां

राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जायेंगे ये मकां तन्हा

और जाते जाते सचमुच सरे जहाँ को तन्हां कर गयीं ।जब जिन्दा रहीं सरापा दिल की तरह जिन्दा रहीं ।दर्द चुनते रहीं संजोती रहीं और कहती रहीं -

टुकडे -टुकडे दिन बिता, धज्जी -धज्जी रात मिली
जितना -जितना आँचल था, उतनी हीं सौगात मिली

जब चाह दिल को समझे, हंसने की आवाज़ सुनी
जैसा कोई कहता हो, ले फ़िर तुझको मात मिली

होंठों तक आते -आते, जाने कितने रूप भरे
जलती -बुझती आंखों में, सदा-सी जो बात मिली

वह कोई साधारण अभिनेत्री नहीं थी, उनके जीवन की त्रासदी, पीडा, और वो रहस्य जो उनकी शायरी में अक्सर झाँका करता था, वो उन सभी किरदारों में जो उन्होंने निभाया बाखूबी झलकता रहा. फिल्म "साहब बीबी और गुलाम" में छोटी बहु के किरदार को भला कौन भूल सकता है. "न जाओ सैया छुडाके बैयाँ..." गाती उस नायिका की छवि कभी जेहन से उतरती ही नहीं. १९६२ में मीना कुमारी को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए तीन नामांकन मिले एक साथ. "साहब बीबी और गुलाम", मैं चुप रहूंगी" और "आरती". यानी कि मीना कुमारी का मुकाबला सिर्फ मीना कुमारी ही कर सकी. सुंदर चाँद सा नूरानी चेहरा और उस पर आवाज़ में ऐसा मादक दर्द, सचमुच एक दुर्लभ उपलब्धि का नाम था मीना कुमारी. इन्हें ट्रेजेडी क्वीन यानी दर्द की देवी जैसे खिताब दिए गए. पर यदि उनके सपूर्ण अभिनय संसार की पड़ताल करें तो इस तरह की "छवि बंदी" उनके सिनेमाई व्यक्तित्व के साथ नाइंसाफी ही होगी.

एक बार गुलज़ार साहब ने उनको एक नज़्म दिया था. लिखा था :

शहतूत की शाख़ पे बैठी मीना
बुनती है रेशम के धागे
लम्हा -लम्हा खोल रही है
पत्ता -पत्ता बीन रही है
एक एक सांस बजाकर सुनती है सौदायन
एक -एक सांस को खोल कर आपने तन पर लिपटाती जाती है
अपने ही तागों की कैदी
रेशम की यह शायरा एक दिन
अपने ही तागों में घुट कर मर जायेगी

पढ़ कर मीना जी हंस पड़ी । कहने लगी -"जानते हो न, वे तागे क्या हैं ?उन्हें प्यार कहते हैं । मुझे तो प्यार से प्यार है । प्यार के एहसास से प्यार है, प्यार के नाम से प्यार है । इतना प्यार कि कोई अपने तन से लिपट कर मर सके तो और क्या चाहिए?" महजबीं से मीना कुमारी बनने तक (निर्देशक विजय भट्ट ने उन्हें ये नाम दिया), और मीना कुमारी से मंजू (ये नामकरण कमाल अमरोही ने उनसे निकाह के बाद किया ) तक उनका व्यक्तिगत जीवन भी हजारों रंग समेटे एक ग़ज़ल की मानिंद ही रहा. "बैजू बावरा","परिणीता", "एक ही रास्ता", 'शारदा". "मिस मेरी", "चार दिल चार राहें", "दिल अपना और प्रीत पराई", "आरती", "भाभी की चूडियाँ", "मैं चुप रहूंगी", "साहब बीबी और गुलाम", "दिल एक मंदिर", "चित्रलेखा", "काजल", "फूल और पत्थर", "मँझली दीदी", 'मेरे अपने", "पाकीजा" जैसी फिल्में उनकी "लम्बी दर्द भरी कविता" सरीखे जीवन का एक विस्तार भर है जिसका एक सिरा उनकी कविताओं पर आके रुकता है -

थका थका सा बदन,
आह! रूह बोझिल बोझिल,
कहाँ पे हाथ से,
कुछ छूट गया याद नहीं....

३१ मार्च १९७२ को उनका निधन हुआ. आज उनकी ३७ वीं पुण्यतिथि पर उन्हें 'आवाज़' का सलाम. सुनते हैं उन्ही की आवाज़ में उन्हीं का कलाम. जिसे खय्याम साहब ने स्वरबद्ध किया है -

चाँद तन्हा...


मेरा माज़ी


ये नूर किसका है...


प्रस्तुति - उज्जवल कुमार

Wednesday, February 11, 2009

मेरी प्यास हो न हो जग को...मैं प्यासा निर्झर हूँ...- कवि गीतकार पंडित नरेंद्र शर्मा जी की याद में

महान कवि और गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा जी को उनकी पुण्यतिथि पर याद कर रही है सुपुत्री लावण्य शाह -

काव्य सँग्रह "प्यासा ~ निर्झर" की शीर्ष कविता मेँ कवि नरेँद्र कहते हैँ-

"मेरे सिवा और भी कुछ है,
जिस पर मैँ निर्भर हूँ
मेरी प्यास हो ना हो जग को,
मैँ,प्यासा निर्झर हूँ"


हमारे परिवार के "ज्योति -कलश" मेरे पापा और फिल्म "भाभी की चूडीयाँ " फिल्म के गीत मेँ,"ज्योति कलश छलके" शब्द भी उन्हीँ के लिखे हुए हैँ जिसे स्वर साम्राज्ञी लता दीदी ने भूपाली राग मेँ गा कर फिल्मोँ के सँगीत मेँ साहित्य का,सुवर्ण सा चमकता पृष्ठ जोड दिया !"यही हैँ मेरे लिये पापा"!

हमारे परिवार के सूर्य !
जिनसे हमेँ ज्ञान, भारतीय वाँग्मय, साहित्य,कला,संगीत,कविता तथा शिष्टाचार के साथ इन्सानियत का बोध पाठ भी सहजता से मिला- ये उन के व्यक्तित्त्व का सूर्य ही था जिसका प्रभामँडल "ज्योति कलश" की भाँति, उर्जा स्त्रोत बना हमेँ सीँचता रहा -


मेरे पापा उत्तर भारत, खुर्जा ,जिल्ला बुलँद शहर के जहाँगीरपुर गाँव के पटवारी घराने मेँ जन्मे थे.प्राँरभिक शिक्षा खुर्जा मेँ हुई -इलाहबाद विश्वविद्यालय से अँग्रेजी साहित्य मेँ M/A करनेके बाद, वे विविध प्रकार की साहित्यिक गतिविधियोँ से जुडे रहे
जैसा यहाँ सुप्रसिद्ध लेखक मेरे चाचा जी अमृत लाल नागर जी लिखते हैँ -"अपने छात्र जीवन मेँ ही कुछ पैसे कमाने के लिये नरेन्द्र जी कुछ दिनोँ तक "भारत" के सँपादीय विभाग मेँ काम करते थे. शायद "अभ्युदय" के सँपादीकय विभाग मेँ भी उन्होने काम किया था. M.A पास कर चुकने के बाद वह अकेले भारतीय काँग्रेस कमिटी के दफ्तर मेँ भी हिन्दी अधिकारी के रुप मेँ काम करने लगे. उस समय जनता राज मेँ राज्यपाल रह चुकनेवाले श्री सादिक अली(पढेँ यह आलेख सादिक अली जी द्वारा लिखा हुआ )और भारत के दूसरे या तीसरे सूचना मँत्री के रुप मेँ काम कर चुकनेवाले स्व. बालकृष्ण केसकर भी उनके साथ काम करते थे.एक बार मैँने उन दिनोँ का एक फोटोग्राफ भी बँधु के यहाँ देखा था. उसी समय कुछ दिनोँ के लिये वह कोँग्रेस के अध्यक्ष पँडित जवाहरलाल नेहरु के कार्यालय के सचिव भी रहे थे. इतने प्रतिभाशाली होने के बावजूद उन्होँने कभी, किसी से किसी प्रकार की मदद नहीं माँगी.फिल्मोँ मेँ उन्होँने सफल गीतकार के रुप मेँ अच्छी ख्याति अर्जित की. उससे भी अधिक ज्योतीषी के रुप मेँ भी उन्होँने वहाँ खूब प्रतिष्ठा पायी."

जैसा यहाँ नागर जी चाचा जी ने लिखा है, पापा कुछ वर्ष आनँद भवन मेँ अखिल भारतीय कोँग्रेस कमिटि के हिँदी विभाग से जुडे और वहीँ से २ साल के लिये,नज़रबंद किये गए -देवली जेल मेँ भूख हडताल से (१४ दिनो तक) ....जब बीमार हाल मेँ रिहा किए गए तब गाँव, मेरी दादीजी गँगादेवी से मिलने गये - ---जहाँ बँदनवारोँ को सजा कर देशभक्त कवि नरेन्द्र का हर्षोल्ल्लास सहित स्वागत किया गया - वहीँ से श्री भगवती चरण वर्मा जी ("चित्रलेखा" के प्रसिद्ध लेखक)के आग्रह से बम्बई आ बसे -वहीँ गुजराती कन्या सुशीला से पँतजी के आग्रह से व आशीर्वाद से पाणि ग्रहण सँस्कार संपन्न हुए. बारात मेँ हिँदी साहित्य जगत और फिल्म जगत की महत्त्व पूर्ण हस्तियाँ हाजिर थीँ --

श्री अमृतलाल नागर - संस्मरण : ~~~~
"खुर्जा कुरु जाँगल का ही बिगडा हुआ नाम है.उनके पिता पँडित पूरनलाल जी गौड जहाँगीरपुर ग्राम के पटवारी थे बडे कर्तव्यनिष्ठ, ईमानदार, सात्विक विचारोँ के ब्राह्मण !अल्पायु मेँ ही उनका देहावसन हो गया था. उनके ताऊजी ने ही उनकी देखरेख की और पालन पोषण उनकी गँगा स्वरुपा माता स्व. गँगादेवी ने ही किया. आर्यसमाज और राष्ट्रीय आँदोलन के दिन थे, इसलिये नरेन्द्र जी पर बचपन से ही सामाजिक सुधारोँ का प्रभाव पडा, साथ ही राष्ट्रीय चेतना का भी विकास हुआ. नरेन्द्रजी अक्सर मौज मेँ आकर अपने बचपन मेँ याद किया हुआ एक आर्यसमाजी गीत भी गाया करते थे, मुझे जिसकी पँक्ति अब तक याद है -
- "वादवलिया ऋषियातेरे आवन की लोड"

लेकिन माताजी बडी सँस्कारवाली ब्राह्मणी थीँ उनका प्रभाव बँधु पर अधिक पडा. जहाँ तक याद पडता है उनके ताऊजी ने उन्हेँ गाँव मेँ अँग्रेजी पढाना शुरु किया था बाद मेँ वे खुर्जा के एक स्कूल मेँ भर्ती कराये गये. उनके हेडमास्टर स्वर्गीय जगदीशचँद्र माथुर के पिता श्री लक्ष्मीनारायण जी माथुर थे. लक्ष्मीनारायण जी को तेज छात्र बहुत प्रिय थे. स्कूल मे होनेवाली डिबेटोँ मेँ वे अक्सर भाग लिया करते थे. बोलने मेँ तेज ! इन वाद विवाद प्रतियोगिताओं मेँ वे अक्सर फर्स्ट या सेकँड आया करते थे.

जगदीशचँद्र जी माथुर नरेन्द्र जी से आयु मे चार या पाँच साल छोटे थे. बाद मेँ तत्कालीक सूचना मँत्री बालकृष्ण केसकर ने उन्हेँ आकाशवाणी के डायरेक्टर जनरल के पद पर नियुक्त किया. जगदीशचँद्र जी सुलेखक एवँ नाटककार भी थे तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे पढते समय भी उनका श्रद्धेय सुमित्रा नँदन पँत और नरेन्द्र जी से बहुत सँपर्क रहा. वह बँधुको सदा "नरेन्द्र भाई" ही कहा करते थे --अवकाश प्राप्त करने के बाद,एक बार,मेरी उनसे दिल्ली मेँ लँबी और आत्मीय बातेँ हुईँ थी उन्होँने ही मुझे बताया था कि उनके स्वर्गीय पिताजी ने ही उन्हेँ (बँधु को) सदा "नरेन्द्र भाई" कहकर ही सँबोधित करने का आदेश दिया था. नरेन्द्र जी इलाहाबाद मेँ रहते हुए ही कविवर बच्चन, शमशेर बहादुर सिँह, केदार नाथ अग्रवाल और श्री वीरेश्वर से जो बाद मेँ "माया" के सँपादक हुए ,उनका घनिष्ट मैत्री सँबध स्थापित हो गया था. ये सब लोग श्रद्धेय पँतजी के परम भक्त थे. और पँतजी का भी बँधु के प्रति एक अनोखा वात्सल्य भाव था, वह मैँने पँतजी के बम्बई आने और बँधु के साथ रहने पर अपनी आँखोँ से देखा था.

नरेन्द्र जी के खिलँदडेपन और हँसी - मजाक भरे स्वभाव के कारण दोनोँ मेँ खूब छेड छाड भी होती थी. किन्तु, यह सब होने के बावजूद दोनोँ ने एक दूसरे को अपने ढँग से खूब प्रभावित किया था. नरेन्द्र जी की षष्ठिपूर्ति के अवसर पर, बँबईवालोँ ने एक स्मरणीय अभिनँदन समारोह का आयोजन किया था. तब तक सुपर स्टार चि. अमिताभ के पिता की हैसियत से आदरणीय बच्चन भाई भी बम्बई के निवासी हो चुके थे. उन्होँने एक बडा ही मार्मिक और स्नेह पूर्ण भाषण दिया था, जो नरेन्द्र के अभिनँदन ग्रँथ "ज्योति ~ कलश" मेँ छपा भी है.

उक्त अभिनँदन समारोह मेँ किसी विद्वान ने नरेन्द्र जी को प्रेमानुभूतियोँ का कवि कहा था !इस बात को स्वीकार करते हुए भी बच्चन भाई ने बडे खुले दिल से यह कहा था कि अपनी प्रेमाभिव्यक्तियोँ मेँ भी नरेन्द्र जी ने जिन गहराइयोँ को छुआ है और सहज ढँग से व्यक्त किया वैसा छायावाद का अन्य कोई कवि नहीँ कर पाया !(पूरा पढ़ें..)

भारत कोकिला श्रीमती सुब्बुलक्ष्मी जी की एक फिल्म् "मीरा" हिन्दी मेँ डब कर रहा था और इस निमित्त से वह और उनके पति श्रीमान् सदाशिवम् जी बँबई ही रह रहे थे। बँधुवर नरेन्द्रजी ने उक्त फिल्म के कुछ तमिल गीतोँ को हिन्दी मे इस तरह रुपान्तरित कर दिया कि वे मेरी डबिँग मेँ जुड सकेँ। सदाशिवं जी और उनकी स्वनामधन्य पत्नी तथा तथा बेटी राधा हम लोगोँ के साथ व्यावसायिक नहीँ किन्तु पारिवारिक प्रेम व्यवहार करने लगे थे. सदाशिवं जी ने बँबई मेँ ही एक नयी शेवरलेट गाडी खरीदी थी.वह जोश मेँ आकर बोले,"इस गाडी मेँ पहले हमारा यह वर ही यात्रा करेगा !"

गाडी फूलोँ से खूब सजाई गई उसमेँ वर के साथ माननीय सुब्बुलक्ष्मी जी व प्रतिभा बैठीँ । समधी का कार्य श्रद्धेय सुमित्रनँदन पँत ने किया। बडी शानदार बारात थी !बँबई के सभी नामी फिल्मस्टार और नृत्य - सम्राट उदयशँकर जी उस वर यात्रा मेँ सम्मिलित हुए थे.बडी धूमधाम से विवाह हुआ.मेरी माता बंधु से बहुत प्रसन्न् थी और पँत जी को ,जो उन दिनोँ बँबई मेँ ही नरेन्द्र जी के साथ रहा करते थे, वह देवता के समान पूज्य मानती थी ।मुझसे बोली,"नरेन्द्र और बहु का स्वागत हमारे घर पर होगा !"

दक्षिण भारत कोकिला : सुब्बुलक्षमीजी, सुरैयाजी, दीलिप कुमार, अशोक कुमार, अमृतलाल नागर व श्रीमती प्रतिभा नागरजी, भगवती बाब्य्, सपत्नीक, अनिल बिश्वासजी, गुरु दत्तजी, चेतनानँदजी, देवानँदजी इत्यादी सभी इस विलक्षण विवाह मेँ सम्मिलित हुए थे और नई दुल्हन को कुमकुम के थाल पर पग धरवा कर गृह प्रवेश करवाया गया उस समय सुरैया जी तथा सुब्बुलक्ष्मी जी मे मँगल गीत गाये थे और जैसी बारात थी उसी प्रकार बम्बई के उपनगर खार मेँ, १९ वे रास्ते पर स्थित उनका आवास भी बस गया - न्यू योर्क भारतीय भवन के सँचालक श्रीमान डा.जयरामनजी के शब्दोँ मेँ कहूँ तो "हिँदी साहित्य का तीर्थ - स्थान" बम्बई जेसे महानगर मेँ एक शीतल सुखद धाम मेँ परिवर्तित हो गया --

मेरी अम्मा स्व. श्रीमती सुशीला नरेन्द्र शर्मा का एक सँस्मरण है ~~
जब मुझसे बडी बहन वासवी का जन्म हो गया था तब पापा जी और अम्मा सुशीला माटुँगा तैकलवाडी के घर पर रहते थे इसी २ कमरे वाले फ्लैट मेँ कवि श्रेष्ठ श्री सुमित्रा नँदन पँत जी भी पापा जी के साथ कुछ वर्ष रह चुके थे -एक दिन पापाजी और अम्मा बाज़ार से सौदा लिये किराये की घोडागाडी से घर लौट रहे थे -अम्मा ने बडे चाव से एक बहुत महँगा छाता भी खरीदा था -जो नन्ही वासवी (मेरी बडी बहन ) और साग सब्जी उतारने मेँ अम्मा वहीँ भूल गईँ -जैसे ही घोडागाडी ओझल हुई कि वह छाता याद आ गया !पापा जी बोले, "सुशीला, तुम वासवी को लेकर घर जाओ, वह दूर नहीँ गया होगा मैँ अभी तुम्हारा छाता लेकर आता हूँ !"

अम्मा ने बात मान ली और कुछ समय बाद पापा जी छाता लिये आ पहुँचे !कई बरसोँ बाद अम्मा को यह रहस्य जानने को मिला कि पापा जी दादर के उसी छातेवाले की दुकान से हुबहु वैसा ही एक और नया छाता खरीद कर ले आये थे ताकि अम्मा को दुख ना हो !इतने सँवेदनाशील और दूसरोँ की भावनाओँ का आदर करनेवाले,उन्हेँ समझनेवाले भावुक कवि ह्र्दय के इन्सान थे मेरे पापा जी !


आज याद करूँ तब ये क्षण भी स्मृति मेँ कौँध - कौँध जाते हैँ .
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(अ) हम बच्चे दोपहरी मेँ जब सारे बडे सो रहे थे,पडोस के माणिक दादा के घर से कच्चे पक्के आम तोड कर किलकारियां भर रहे थे कि,अचानक पापाजी वहाँ आ पहुँचे ----
गरज कर कहा,
"अरे ! यह आम पूछे बिना क्योँ तोडे ?
जाओ, जाकर माफी माँगो और फल लौटा दो"
एक तो चोरी करते पकडे गए और उपर से माफी माँगनी पडी !!!
- पर अपने और पराये का भेद आज तक भूल नही पाए
-- यही उनकी शिक्षा थी --

( ब ) मेरी उम्र होगी कोई ८ या ९ साल की
- पापाजी ने, कवि शिरोमणि कवि कालिदास की कृति "मेघदूत" से पढनेको कहा --
सँस्कृत कठिन थी परँतु, जहाँ कहीँ , मैँ लडखडाती,
वे मेरा उच्चारण शुध्ध कर देते --
आज, पूजा करते समय , हर श्लोक के साथ ये पल याद आते हैँ --

( क ) मेरी पुत्रा सिँदूर के जन्म के बाद जब भी रात को उठती,
पापा , मेरे पास सहारा देते , मिल जाते
-- मुझसे कहते, " बेटा, मैँ हूँ , यहाँ " ,..................
आज मेरी बिटिया की प्रसूती के बाद,
यही वात्सल्य उँडेलते समय,
पापाजी की निस्छल, प्रेम मय वाणी और
स्पर्श का अनुभव हो जाता है ..
जीवन अत्तेत के गर्भ से उदित होकर,
भविष्य को सँजोता आगे बढ रहा है -


कुछ और यादेँ हैँ जिन्हेँ आप के साथ साझा कर रही हूँ -

*काव्यमय वाणी*
मैँ जब छोटी बच्ची थी तब,अम्मा व पापा जी का कहना है कि,अक्सर काव्यमय वाणी मेँ ही अपने विचार प्रकट किया करती थी !

अम्मा कभी कभी कहती कि,

"सुना था कि मयुर पक्षी के अँडे, रँगोँ के मोहताज नहीँ होते !
उसी तरह मेरे बच्चे पिता की काव्य सम्पत्ति की विरासत मेँ साथ लेकर आये हैँ !"

यह एक माँ का गर्व था जो छिपा न रह पाया होगा. या,उनकी ममता का अधिकार उन्हेँ मुखर कर गया था शायद !

कौन जाने ?

परँतु आज जो मेरी अम्मा ने मुझे बतलाया था

उसे आप के साथ बाँट रही हूँ -

तो सुनिये,
एक बार मैँ, मेरी बचपन की सहेली लता,बडी दीदी वासवी, - हम तीनोँ खेल रहे थे.वसँत ऋतु का आगमन हो चुका था
और होली के उत्सव की तैयारी बँबई शहर के गली मोहोल्लोँ मेँ ,जोर शोरोँ से चल रही थीँ -खेल खेल मेँ लता ने ,मुझ पर एक गिलास पानी फेँक कर मुझे भीगो दीया !मैँ भागे भागे अम्मा पापाजी के पास दौड कर पहुँची और अपनी गीली फ्रोक को शरीर से दूर खेँचते हुए बोली,

"पापाजी, अम्मा ! देखिये ना !
मुझे लताने ऐसे गीला कर दिया है
जैसे मछली पानी मेँ होती है !"

इतना सुनते ही,अम्मा ने मुझे वैसे,गीले कपडोँ समेत खीँचकर. प्यार से गले लगा लिया !

बच्चोँ की तोतली भाषा, सदैव बडोँ का मन मोह लेती है.

माता,पिता को अपने शिशुओँ के प्रति ऐसी उत्कट ममता रहती है कि, उन्हेँ हर छोटी सी बात ,विद्वत्तापूर्ण और अचरजभरी लगती है मानोँ सिर्फ उन्ही के सँतान इस तरह बोलते हैँ - चलते हैँ, दौडते हैँ -

पापा भी प्रेमवश, मुस्कुरा कर पूछने लगे,

"अच्छा तो बेटा,
मछली ऐसे ही गीली रहती है पानी मेँ?
तुम्हेँ ये पता है ?"

"हाँ पापा, एक्वेरीयम (मछलीघर)मेँ देखा था ना हमने !"
मेरा जवाब था --
हम बच्चे,सब से बडी वासवी, मैँ मँझली लावण्या, छोटी बाँधवी व भाई परितोष अम्मा पापा की सुखी, गृहस्थी के छोटे, छोटे स्तँभ थे !
उनकी प्रेम से सीँची फुलवारी के हम महकते हुए फूल थे!

आज जब ये याद कर रही हूँ तब प्रिय वासवी और वे दोनोँ ,हमारे साथ स -शरीर नहीँ हैँ !

उनकी अनमोल स्मृतियोँ की महक
फिर भी जीवन बगिया को महकाये हुए है.

हमारे अपने शिशु बडे हो गये हैँ -
- पुत्री सौ. सिँदुर का पुत्र नोआ ३ साल का हो गया है !
फुलवारी मेँ आज भी,फूल महक रहे हैँ !

यह मेरा परम सौभाग्य है और मैँ,लावण्या,सौभाग्यशाली हूँ
कि मैँ पुण्यशाली , सँत प्रकृति कवि ह्रदय के लहू से सिँचित,
उनके जीवन उपवन का एक फूल हूँ --

उन्हीँके आचरणसे मिली शिक्षा व सौरभ सँस्कार,
मनोबलको, हर अनुकूल या विपरित जीवन पडाव पर
मजबूत किये हुए,जी रही हूँ !

उनसे ही ईश्वर तत्व क्या है उसकी झाँकी हुई है -
- और,मेरी कविता ने प्रणाम किया है --

"जिस क्षणसे देखा उजियारा,
टूट गे रे तिमिर जाल !
तार तार अभिलाषा तूटी,
विस्मृत घन तिमिर अँधकार !
निर्गुण बने सगुण वे उस क्षण ,
शब्दोँ के बने सुगँधित हार !
सुमन ~ हार, अर्पित चरणोँ पर,
समर्पित, जीवन का तार ~ तार !!


(गीत रचना ~ लावण्या )

प्रथम कविता ~ सँग्रह, "फिर गा उठा प्रवासी" बडे ताऊजीकी बेटी श्रीमती गायत्री, शिवशँकर शर्मा " राकेश" जी के सौजन्यसे, तैयार है --
--"प्रवासी के गीत" पापाजी की सुप्रसिद्ध पुस्तक और खास उनके गीत "आज के बिछुडे न जाने कब मिलेँगे ?" जैसी अमर कृति से हिँदी साहित्य जगत से सँबँध रखनेवाले हर मनीषी को यह बत्ताते अपार हर्ष है कि,यह मेरा विनम्र प्रयास, मेरे सुप्रतिष्ठित कविर्मनीष पिताके प्रति मेरी निष्ठा के श्रद्धा सुमन स्वर स्वरुप हैँ --शायद मेरे लहू मेँ दौडते उन्ही के आशिष ,फिर हिलोर लेकर, माँ सरस्वती की पावन गँगाको, पुन:प्लावित कर रहे होँ क्या पता ?

डा. राही मासूम रज़ा सा'ब ने यह भावभीनी कविता लिखी है -

जिसे सुनिये चूँकि आज,रज़ा सा'ब भी हमारे बीच अब स- शरीर नहीँ रहे ! :-(

"वह पान भरी मुस्कान"

वह पान भरी मुस्कान न जाने कहाँ गई ?

जो दफ्तर मेँ ,इक लाल गदेली कुर्सी पर,
धोती बाँधे,इक सभ्य सिल्क के कुर्ते पर,
मर्यादा की बँडी पहने,आराम से बैठा करती थी,
वह पान भरी मुस्कान तो उठकर चली गई !
पर दफ्तर मेँ,वो लाल गदेली कुर्सी अब तक रक्खी है,

जिस पर हर दिन,अब कोई न कोई, आकर बैठ जाता है


खुद मैँ भी अक्सर बैठा हूँ

कुछ मुझ से बडे भी बैठे हैँ,
मुझसे छोटे भी बैठे हैँ,
पर मुझको ऐसा लगता है
वह कुरसी लगभग एक बरस से खाली है !


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अमीन सयानी द्वारा लिया गया पंडित जी का एक लंबा इंटरव्यू हमारे पास उपलब्ध है. आज उनकी पुण्य तिथि पर आईये हम सब भी लावण्या जी के साथ उन्हें याद करें इस इंटरव्यू को सुन -

भाग १.


भाग २.


भाग ३.


चित्र में - पँडित नरेन्द्र शर्मा, श्रीमती सुशीला शर्मा तथा २ बहनेँ वासवी (गोद मेँ है शौनक छोटा सा और पुत्र मौलिक) बाँधवी (बच्चे- कुँजम, दीपम ) लावण्या (बच्चे -सिँदुर व सोपान) और भाई परितोष घर के बारामदे में.

प्रस्तुति - लावण्या शाह




Thursday, January 29, 2009

संगीतकार हमेशा गायक से ऊँचा दर्जा रखता है, मानना था ओ पी नैयर का

(पहले अंक से आगे ...)

"किस्मत ने हमें मिलाया और किस्मत ने ही हमें जुदा कर दिया....", अक्सर उनके मुँह से ये वाक्य निकलता था. आशा के साथ सम्बन्ध विच्छेद होने के बाद ओ पी का जीवन फ़िर कभी पहले जैसा नही रहा. इस पूरी घटना ने उनके पारिवारिक रिश्तों में भी दरारें पैदा कर दी थी. ये सब उनकी पत्नी, तीन बेटियों और एक बेटे के लिए लगभग असहनीय हो चला था. कुंठा से भरे ओ पी ने किसी साधू की सलाह पर सारी धन संपत्ति, घर (जो लगभग ६ करोड़ का था उन दिनों), गाड़ी, बैंक बैलेंस आदि का त्याग कर सब से अपना नाता तोड़ लिया. पर उनके परिवार ने कभी भी उन्हें माफ़ नही किया....कुछ ज़ख्म कभी नही भरते शायद. 1989 में घर छोड़ने के बाद उन्होंने एक मध्यमवर्गीय महाराष्ट्रीय परिवार के साथ पेइंग गेस्ट बन कर रहने लगे, और मरते दम तक यही उनका परिवार रहा. यहाँ उन्हें वो प्यार और वो सम्मान मिला जिसे शायद उम्र भर तलाशते रहे ओ पी. उस परिवार के एक सदस्या के अनुसार उन्हें अपने परिवार और फ़िल्म इंडस्ट्री के बारे में बात करना बिल्कुल नही अच्छा लगता था. सुरैया, शमशाद बेगम और कभी कभी गजेन्द्र सिंह (स रे गा माँ पा फेम) ही थी जिनसे वो बात कर लिया करते थे. उन्हें होमीयो पेथी का अच्छा ज्ञान था और इसी ज्ञान को बाँट कर वो लोगों की सेवा करने लगे. उनके कुछ जो साक्षात्कार उपलब्ध हैं उनके कुछ अंशों के माध्यम से कोशिश करते हैं और करीब से समझने की हम सब के प्रिय संगीतकार ओ पी को.

पर पहले सुनिए वो गीत जो मुझे व्यक्तिगत तौर पर बहुत पसंद है -


"मुझे दिखावे और झूठ से नफ़रत है. मैं लता की आवाज़ का इस्तेमाल किए बिना भी कामियाब रहा. इस बात में कोई शक नही कि लता की आवाज़ में दिव्य तत्व हैं, वो एक महान गायिका हैं, पर उनकी आवाज़ पतली है, मेरे गीतों को जिस तरह की आवाजों की दरकार थी वो शमशाद, गीता और आशा में मुझे मिल गया था." तमाम मतभेदों के बावजूद ओ पी लता को ही सर्वश्रेष्ठ मानते थे. आशा के साथ उन्होंने कमियाबी की बुलंदियों को छुआ, लगभग 70 फिल्मों का रहा ये साथ. बाद में आशा ने आर डी बर्मन से विवाह कर लिया. पर ओ पी ने हमेशा ये कहा कि आर डी ने अपने बेहतर गाने लता से गवाए और आशा को हमेशा दूसरा ही स्थान दिया. रफी को सर्वश्रेष्ठ गायक मानते थे. पर मुकेश और महेंद्र कपूर के साथ भी उनके बेहद कामियाब गीत सुने जा सकते हैं.

उदहारण के लिए "संबंध" का ये गीत ही लीजिये -


ओ पी ने लता मंगेशकर सम्मान को लेने से इनकार कर दिया. उनका तर्क था -"एक संगीतकार कैसे वो सम्मान ले सकता है जो एक गायक या गायिका के नाम पर हों. संगीतकार गायक से उपर होता है. दूसरी बात लता अभी जीवित हैं उनके नाम पर सम्मान देना ग़लत है और तीसरा कारण ये कि मैंने कभी लता के साथ काम नही किया, इसलिए मैं इस पुरस्कार के स्वीकार करने में असमर्थ हूँ...मेरा सबसे बड़ा सम्मान तो मेरे श्रोताओं के प्यार के रूप में मुझे मिल ही चुका है..." सच ही तो है आज भी उनके गीत हम सब की जुबां पर बरबस आ जाते हैं, कौन सा ऐसा राष्ट्रीय त्यौहार है जब ये गीत स्कूलों में नही बजता...



गुरुदत्त को याद कर ओ पी बहुत भावुक हो जाते थे, उस रात को याद कर वो बताते हैं -"उस दिन जब मैं घर आया तो मुझे मेरी पत्नी ने बताया कि राज कपूर का फ़ोन आया था और बता रहे थे कि गुरुदत्त बेतहाशा रोये जा रहे हैं और मुझसे (ओ पी से)मिलना चाह रहे हैं. मैं उस दिन बहुत थका हुआ थे और नींद की ज़रूरत महसूस कर रहा था यूँ भी मुझे अगली सुबह उनसे मिलना ही था तो मैं नही गया...अगली सुबह जब उनके घर पहुँचा तब तक सब खत्म हो चुका था मैंने अपनी आदत स्वरुप खुले आम गीता और वहीदा को उनकी मौत का जिम्मेदार ठहराया. वहीदा शायद मुझसे नफरत करती थी...". संगीत के बदलते रूप से वो दुखी नही थे -"सब कुछ बदलता है समय के साथ लाजमी है संगीत भी बदलेगा. पर सात सुरों की शुद्धता कभी कम नही हो सकती, गीत भद्दे लिखे जा सकते हैं, नृत्य भद्दे हो सकते हैं पर संगीत कभी भद्दा नही हो सकता."



अपनी कुछ बाजीगारियों का ज़िक्र भी उन्होंने किया है कुछ जगहों पर मसलन - "मैं कभी भी १५ मिनट से अधिक नही लेता था कोई धुन बनने में, पर निर्माताओं को हमेशा १०-१५ दिन आगे की तारिख देता था ताकि उन्हें ये काम इतना सरल न लगे..." और उनके इस बयान पर ध्यान दीजिये ज़रा- "मैंने कभी भी अपने समय के संगीतकारों को नही सुना, दूसरे क्या कर रहे हैं मैं जान कर ये जानने की कोशिश नही करता था क्योंकि मैं नही चाहता था कि मेरे संगीत पर उनका या मशहूर होती, चलन में रहती चीज़ों का असर आए. मैं बस अपने ही गीत सुनता हूँ, तब भी और अब भी. एक बात है जिस पर मुझे हमेशा फक्र रहा है वो हैं मेरी इमानदारी अपने संगीत के प्रति, जिसके साथ मैंने कभी समझौता नही किया...". लगता है जैसे ओ पी बस अपने यादगार नग्मों को हम श्रोताओं को देने के लिए ही इस धरती पर आए थे. अन्तिम दो सालों में उन्होंने अपने संगीत को भी सुनना छोड़ दिया था. हाँ पर एक फ़िल्म थी जिसे वो एक दिन में भी कई बार देख लेते थे. १९६५ में आई "ये रात फ़िर न आएगी" के बारे में ओ पी का कहना थे कि इस फ़िल्म को देख कर उन्हें एक अलग ही अनुभूति होती है. नैयर साहब के गीतों से हम आवाज़ की महफ़िल सजाये रखेंगे ये वादा है. फिलहाल आपको छोड़ते हैं इसी फ़िल्म के इस बेहद खूबसूरत गीत के साथ जिसे आवाज़ दी है.....(बताने की ज़रूरत है क्या ?....)




Wednesday, January 28, 2009

बरकरार है आज भी ओ पी नैयर के संगीत का मदभरा जादू

जीनिअस संगीतकार ओ पी नैयर की दूसरी पुण्यतिथि पर विशेष -

१९५२ में एक फ़िल्म आई थी, -आसमान, जिसमें गीता दत्त ने एक बेहद खूबसूरत गीत गाया था -"देखो जादू भरे मोरे नैन..." यह संगीतकार ओ पी नैयर की पहली फ़िल्म थी, जो पहला गाना इस फ़िल्म के लिए रिकॉर्ड हुआ था वो था "बेवफा जहाँ में वफ़ा ढूँढ़ते रहे..." गायक थे सी एच आत्मा साहब. दो अन्य गीत सी एच आत्मा की आवाज़ में होने थे जो नासिर पर फिल्माए जाने थे और ४ अन्य गीत, गीता ने गाने थे जो नायिका श्यामा पर फिल्मांकित होने थे. फ़िल्म के कुल ८ गीतों में से आखिरी एक गीत जो फ़िल्म की सहनायिका पर चित्रित होना था उसके बोल थे "जब से पी संग नैना लगे...". नैयर ने इस गीत के लिए लता जी को तलब किया पर जब लता जी को ख़बर मिली कि उन्हें एक ऐसा गीत गाने को कहा जा रहा है जो नायिका पर नही फिल्माया जाएगा (ये उन दिनों बहुत बड़ी बात हुआ करती थी) उनके अहम् को धक्का लगा. वो उन दिनों की (और उसके बाद के दिनों की भी) सबसे सफल गायिका थी. लता ने ओ पी के लिए इस गीत को गाने से साफ़ इनकार कर दिया और जब नैयर साहब तक ये बात पहुँची, तो उन्होंने भी एक दृढ़ निश्चय किया, कि वो अपने कैरिअर में कभी भी लता के साथ काम नही करेंगें. ज़रा सोचिये इंडस्ट्री में कौन होगा ऐसा दूसरा, जो अपनी पहली फ़िल्म में ऐसा दबंग फैसला कर ले और लगभग दो दशकों तक जब तक भी उन्होंने फिल्मों में संगीत दिया वो अपने उस फैसले पर अडिग रहे. उस वक्त वो मात्र २५ साल के थे और पहली और आखिरी बार उन्होंने "जब से पी संग..." गीत के लिए चुना गायिका राजकुमारी को.

बेवफा जहाँ में वफ़ा ढूँढ़ते रहे (सुनिए ओ पी का सबसे पहला रेकॉर्डेड गीत)


हालांकि “आसमान” और उसके बाद आयी “छम छमा छम” और “बाज़”, तीनों ही फिल्में बुरी तरह पिट गई. पर गायिका गीता रॉय (दत्त) ने इस नए संगीतकार के हुनर को पहचान लिया था, उन्होंने गुरु दत्त से जब वो अपनी पहली प्रोडक्शन पर काम शुरू करने वाले थे ओ पी की सिफारिश की. गीता के आग्रह को गुरु टाल नही पाये और इस तरह ओ पी को मिली "आर पार". इस फ़िल्म ने नैयर ने गीता के साथ मिलकर वो गीत रचे कि आज तक जिनके रिमिक्सिस बनते और बिकते हैं. और इसी के साथ हिन्दी फिल्मों को मिला एक बेमिसाल संगीतकार. “आर पार” के बाद गुरु दत्त प्रोडक्शन के साथ नैयर ने अपनी हैट ट्रिक पूरी की मिस्टर और मिसिस ५५ (१९५५), और सी ई डी (१९५६) से. अब उनका सिक्का चल निकला था.

सुनिए गीता की मदभरी आवाज़ में "हूँ अभी मैं जवां..."


वो जिनके गीत आज भी हमें दौड़ भाग भरी इस जिंदगी में सकून देते हैं, उस ओ पी नैयर साहब के जीवन मगर फूलों की सेज नही रही कभी, कुछ स्वभाव से भी वो शुद्ध थे, खरे को खरा और खोटे को खोटा कहने से वो कभी नही चूकते थे. शायद यही वजह थी कि उनकी फिल्मी दुनिया में बहुत कम लोगों के साथ पटरी बैठी, यहाँ तक कि उनकी सबसे पसंदीदा गायिका गीता दत्त और आशा के साथ भी एक मोड़ पर आकर उन्होंने रिश्ता तोड़ दिया.

उनके दर्द को ही शायद आवाज़ दे रहे हैं मुकेश यहाँ -


स्कूल कॉलेजों में कभी उनका मन नही लगा था. मात्र 8 वर्ष की आयु में उन्हें लाहोर रेडियो में गाने का अवसर मिला. १० वर्ष की उम्र में वो संगीतकार बन गए पंजाबी फ़िल्म “धुलिया भट्टी” से जिसमें सी एच आत्मा का गाया गीत जिसे एच एम् वी ने रीलीस किया था "प्रीतम आन मिलो..." सुपर हिट साबित हुआ, इस फ़िल्म में उन्होंने एक छोटी सी भूमिका भी की. बँटवारे के बाद वो मुंबई आ गए. १९५२ में "आसमान" से शुरू हुआ संगीत सफर १९९३ में आई "जिद्द" फ़िल्म के साथ ख़तम हुआ. इस A टू Z के बीच ७३ फिल्में आई और ओ पी नैयर अपने कभी न भूल सकने वाले, गुनगुने, दिल के तार बरबस छेड़ते गीतों के साथ संगीत प्रेमियों के जेहन में हमेशा के लिए कैद हो गए. "आखों ही आखों में इशारा हो गया..." क्या ये गीत अपने बनने के आज लगभग ५०-५२ सालों के बाद भी उतना ही तारो ताज़ा नही लगता आपको, भाई हमें तो लगता है -



कितनी अजीब बात है कि आल इंडिया रेडियो ने उनके कुछ गीत ब्रोडकास्ट करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था यह कहकर कि इनके बोल और धुन युवा पीढी को पथभ्रमित करने वाले हैं. हँसी आती है आज सोच कर भी (निखिल भाई गौर कीजिये, आप अकले नही हैं). बाद में रेडियो सीलोन पर उनके गीतों को सुनने की बढती चाहत से हार कर ख़ुद मंत्री महोदय को इस अंकुशता को हटाने के लिए आगे आना पड़ा. मात्र ३० साल की उम्र में उन्हें “रिदम किंग” की उपाधि मिल गई थी. उन्होंने संगीतकार के दर्जे को हमेशा ऊँचा माना और एक लाख रुपये पाने वाले पहले संगीत निर्देशक बने. १९५७ में आई "नया दौर" संगीत के आयाम से देखें तो उनके सफर का "मील का पत्थर" थी. शम्मी कपूर के आने के बाद तो ओ पी नैयर के साथ साथ हिन्दी फ़िल्म संगीत भी जैसे फ़िर से जवान हो उठा. मधुबाला ने तो यहाँ तक कह दिया था कि वो अपना पारिश्रमिक उन निर्माताओं के लिए कम कर देंगीं जो ओ पी को संगीतकार लेंगें. मधुबाला की ६ फिल्मों के लिए ओ पी ने संगीत दिया. वो उन दिनों के सबसे मंहगे संगीतकार होने के बावजूद उनकी मांग सबसे अधिक थी. फ़िल्म के शो रील में उनका नाम अभिनेताओं के नाम से पहले आता था. ऐसा पहले किसी और संगीतकार के लिए नही हुआ था, ओ पी ने ट्रेंड शुरू किया जिसे बाद में बहुत से सफल संगीतकारों ने अपनाया.

फ़िल्म १२ o clock का ये गीत सुनिए -"कैसा जादू..." (गौर कीजियेगा इसमें जब गायिका "तौबा तौबा" बोलती है सुनने वालों के दिल में एक अजीब सी कसक उठती है, यही ओ पी का जादू था)


एक साल ऐसा भी आया जब ओ पी की एक भी फ़िल्म नही आई. वर्ष १९६१ को याद कर ओ पी कहते थे -"मोहब्बत में सारा जहाँ लुट गया था..". दरअसल ओ पी अपनी सबसे पसंदीदा पार्श्व गायिका (आशा) के साथ अपने संबंधों की बात कर रहे थे. १९६२ में उन्होंने शानदार वापसी की फ़िल्म 'एक मुसाफिर एक हसीना" से. इसी दशक में उन्होंने "फ़िर वही दिल लाया हूँ"(१९६३), काश्मीर की कली (१९६४, और "मेरे सनम(१९६५) जैसी फिल्मों के संगीत से शीर्ष पर स्थान बरकरार रखा. एक बार वो शर्मीला टैगोर पर फिल्माए अपने किसी गीत पर उनके अभिनय से खुश नही थे, उन्होंने बढ़ कर शर्मीला को सलाह दे डाली कि मेरे गीतों आप बस खड़े रहकर लब नही हिला सकते ये गाने हरकतों के हैं आपको अपने शरीर के हाव भावों का भी इस्तेमाल करना पड़ेगा. शर्मीला ने उनकी इस सलाह को गांठ बाँध ली और अपनी हर फ़िल्म में इस बात का ख़ास ध्यान रखा. ओ पी का सीमित संगीत ज्ञान कभी भी उनके आडे नही आया फ़िल्म "बहारें फ़िर भी आयेंगीं" के गीत "आपके हसीं रुख पे...." के लिए उन्होंने सारंगी का बहुत सुंदर इस्तेमाल किया.

रफी साहब की आवाज़ में पेश है "आपके हसीन रुख पे..."


पर दशक खत्म होते होते अच्छे संगीत के बावजूद उनकी फिल्में फ्लॉप होने लगी. रफी साहब से भी उनके सम्बन्ध बिगड़ चुके थे. गुरु दत्त की मौत के बाद गीता ने ख़ुद को शराब में डुबो दिया था और १९७२ में उनकी भी दुखद मौत हो गई, उधर आशा के साथ ओ पी के सम्बन्ध एक नाज़ुक दौर से गुजर रहा था. ये उनके लिए बेहद मुश्किल समय था. फ़िल्म "प्राण जाए पर वचन न जाए" में आशा ने उनके लिए गाया "चैन से हमको कभी....". अगस्त १९७२ में आखिरकार ओ पी और आशा ने कभी भी साथ न काम करने का फैसला किया और उसके बाद उन्हें कभी भी एक छत के नीचे एक साथ नही देखा गया. १९७३ में जब आशा को अपने इसी गीत के लिए फ़िल्म फेयर मिला तब वो वहां मौजूद नही थी (ऐसा उन्होंने जानकर ही किया होगा). ओ पी ने उनकी तरफ़ से पुरस्कार ले तो लिया, पर घर लौटते वक्त उन्होंने उस ट्रोफी को अपनी कार से बाहर फैंक दिया. कहते हैं उसके टूटने की गूँज आखिरी दम तक उन्हें सुनाई देती रही. जाहिर है, उसके बाद भी उन्होंने काम किया (लगभग १५० गीतों में) अलग अलग गायिकाओं को आजमाया, पर वो जादू अब खो चुका था. कहने को जनवरी २८, २००७ तक ओ पी जीवित रहे पर संगीतकार ओ पी नैयर को तो हम बहुत पहले ही कभी खो चुके थे….

"चैन से हमको कभी ...." (यकीनन ये आशा जी के गाये सर्वश्रेष्ठ गीतों में से एक है..महसूस कीजिये उस दर्द को जो उन्होंने आवाज़ में घोला है)


(जारी...)



Sunday, January 18, 2009

लेकिन दुनिया में कोई दूसरा 'सहगल' नहीं आया...

कुंदनलाल सहगल की ६२ वीं पुण्यतिथि पर विशेष
१८ जनवरी १९४७ —१८ जनवरी २००९, पूरे बासठ साल हुए उस आवाज़ को ख़ामोश हुए जिसका नाम कुंदनलाल सहगल है । आज तक उनके बारे में कई बार लिखा गया है, कई सुनायी गयी बातें जो उनके दोस्तों, सहकर्मियों ने, रिश्तेदारों ने सुनायी । उनका हाथ का लिखा हुआ कुछ या उनका इन्टरव्यु जैसी कोई सामग्री मौजुद नहीं जिनसे उनकी शख्सियत को पूरी तरह जाना जा सके । उनके साथ रहे लोग भी कितने बचे हैं अब ? नौशाद, केदार शर्मा, के एन सिंह जैसे कुछ सहकर्मियों ने वक्त वक्त पर उनके साथ बिताये गये समय का ज़िक्र किया है लेकिन उनके अपने आत्मकथन के बिना इस महान अदाकार के ज़िंदगी के सोये हुये पहलू कभी सामने नहीं आ सके । जगदीश सेठी, पृथ्वी राज कपूर उनके मित्रों में से थे । गुज़रे वक्त में प्रसार माध्यमों की गैर मौजूदगी की वजह से हमारे चालीस व पचास के दशक के ढ़ेर से फनकारों की जीवन संघर्ष की कहानियां हम तक कभी नहीं पहुंची । मोतीलाल, चन्द्रमोहन, ज़ोहरा बाई, अमीर बाई जैसे अनगिनत कलाकार, गायक हैं जिनके साक्षात्कार, व उनकी कोई तसवीर के लिये पुरानी पीढ़ी के लोग आज भी तरसते हैं ।

सहगल अपने गाये करीब ढ़ाई सौ गानों के ज़रिये अवाम में आज भी ज़िंदा हैं । जब तक अच्छा संगीत सुननेवाले इस दुनिया में रहेंगे तब तक सहगल की आवाज़ हमेशा फ़ज़ा में गुंजेगी । अपने छोटे से जीवनकाल –04 अप्रैल 1904 से 18 जनवरी 1947– यानी गायकी जीवन के पंद्रह से भी कम सालों में गिनी चुनी फिल्में और इतने कम गानों के साथ अपने समय में वे लोकप्रियता की हद तक पहुंचे ।

आम आदमी राग रागिनी, सुरताल को नहीं पहचानता फिर भी उसे 'झूलना झुलाओ…' और 'राधे रानी दे डारो ना…' जैसे गानों के भीतर डूबता देखा गया है । संगीत की कोई बाकायदा तालीम न लेते हुए गलियों के गायकों, सुफि़यों के संग गाने वाले इस सहज पर बुलंद आवाज़ के धनी ने भजन और ग़ज़लें एक से सातत्य से गायीं हैं । उनका पसंदीदा राग भैरवी था । भैरवी ही संगीतकार नौशाद व शंकर जयकिशन का भी पसंदीदा राग था ।

उनकी ग़ज़लें स्पष्ट भाषाई उच्चारण व अदा के नमूने हैं । ग़ालिब —'दिल से तेरी निगाह जीगर तक उतर गयी…', 'इश्क मुजको नहीं वहशत ही सही…', 'आह को चाहिये एक उम्र असर होने तक…' सीमाब —'ऐ बेख़बरी दिल को दीवाना बना देना…', और ज़ौक़ —'लायी हयात आए कज़ा ले चली चले…' को अपनी आवाज़ के जादू से सहगल ने घर घर तक पहुंचाया । ग़ालिब उनके पसंदीदा शायर थे जिसकी मज़ार की मरम्मत भी उन्होंने करवायी थी । उनकी ग़ज़ल गायकी की एक ख़ासियत थी कि वे ग़ज़ल को एक अनूठी तीव्रता से गाते थे । वे प्राय: तीन मिनट की ग़ज़ल में मुखड़े के साथ 5 या 6 शेर गा देते थे, सब कुछ एक बेहतरीन मिटर और सिमेट्री के साथ । एक निधार्रित तबले की उठी हुयी गति, एक निधार्रित बजाने वाले के संग ही वे गाते थे । यहाँ पर आप याद कर लें :

ग़ालिब की ग़ज़ल - आह को चाहिए...


इश्क मुझको नही...


उस मस्त नज़र पर पड़ी - फ़िल्म - परवाना- ये सहगल की अन्तिम प्रर्दशित फ़िल्म है


जब दिल ही टूट गया - फ़िल्म - शाह जहाँ


गम दिये मुश्तकिल - फ़िल्म - शाह जहाँ


दिया जलो जग में - फ़िल्म - तानसेन


एक बंगला बने न्यारा - फ़िल्म - प्रेजिडेंट


एक और नायब गैर फिल्मी ग़ज़ल - रहमत पे तेरी


या फ़िर स्ट्रीट सिंगर का ये गीत कानन देवी के साथ गाया हुआ - बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए...
(सहगल ने इस गीत को लाइव रिकॉर्ड किया था. गीत का फिल्मांकन ऐसे हुआ था कि सहगल कैमरे के सामने लाइव गाते हुए जा रहे थे और साजिन्दे पीछे चल रहे थे बजाते हुए, कैमरे की आंख बचा कर. कानन देवी वाला संस्करण कभी रिकॉर्ड पर नही आया)


झूलना झुलाओ - शायद उनका गाया हुआ ये पहला गीत था.


दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर टाइमकीपर, फिर टाइपराइटर मशीन के सेल्समॅन रहने के अलावा चमड़े की फॅक्टरी में भी उन्होंने काम किया । जम्मू में जन्मे और कलकत्ता में रेडियो स्टेशन पर गाना गाते आर सी बोराल ने उनको न्यू थियेटर्स के लिये चुना । फिल्म 'पूरन भगत' —1932 में दो गानों 'राधे रानी दे डारो ना…' व 'भजुं मैं तो भाव से श्री गिरधारी…' को गाने के लिये उन्हें 25 रुपये मिले पर उसके रेकॉर्डस् हज़ारों में बिके, तब ग्रामोफोन कंपनी को लगा कि सहगल के साथ यह अन्याय हुआ है तब रॉयल्टी के आधार पर उनसे गवाने की दरख़्वास्त रखी गयी । सहगल बहुत भोले थे, बोले –अगर मेरा गाना नहीं चला तो आपके पच्चीस रुपये भी डूब जाएंगे– यहाँ सहगल ने कंपनी से मौखिक करार किया और यहीं से रॉयल्टी की प्रथा भी शुरु हुई । 1940–1941 में न्यू थियेटर्स में आग लगी जिसमें उनकी शुरु की असफल फिल्में –मुहब्बत के आंसू ,ज़िन्दा लाश, सुबह का सितारा, जल गयीं ।

न्यू थियेटर्स की 'चंडीदास' लोकप्रियता की पहली सीढ़ी थी ।बाद में भारी सफल फिल्म 'देवदास' से वे बतौर गायक–एक्टर इतने मशहूर हुए कि लोकचाहना के शिखर तक पहुंच गये ।'बालम आए बसो मोरे मन में…' और 'अब दिन बितत नाहीं, दुख के…' जैसे श्री केदार शर्मा के लिखे गानों ने शरतचंद्र के एक नाकाम, निराश प्रेमी की छवि को अमर बना दिया । देवकी बोस के निर्देशन में इस पहली पूर्ण सामाजिक फिल्म से स्वर्गीय बिमल रॉय भी जुड़े थे । एक निरंतर चली आती असफल, दुखदायी प्यार की दास्तान को जिस तरह पेश किया गया था उससे आहत हुए बिमल रॉय ने बाद में 1955 में अपने निर्देशन में 'देवदास' बनाकर इसी वेदना को दोहराया ।'प्रसीडेंट', 'दुश्मन', 'ज़िंदगी', 'स्ट्रीट सींगर', 'सूरदास', 'मेरी बहन' ऐसी फिल्में हैं जो उन्हों ने अपने फिल्म जीवन के मध्यान्ह के समय कीं, और ज़ाहिर है, इन फिल्मों के गानों की गूंज न सिर्फ उस समय परंतु आज भी और आने वाले सालों तक सुनी जाएगी । बंबई में, उनकी बाद की फिल्में रणजीत की 'तानसेन', और 'भँवरा', कारदार की 'शाहजहाँ' थी ।'तदबीर' और 'परवाना' में उस समय की उभरती गायिका–अदाकारा सुरैया के साथ नायक बने ।'शाहजहाँ' व 'परवाना' उनकी अंतिम फिल्में थीं ।'ऐ दिले बेकरार झूम…', 'जन्नत ये बनायी है मोहब्बत के सहारे…' —शाहजहाँ और 'मोहब्बत में कभी ऐसी भी हालत पाई जाती है…', 'कहीं उलझ न जाना…' —परवाना फिल्मों के यह गाने गा कर उन्हों ने साबित कर दिया कि उनकी न्यू थियेटर्स की शुरु की गायकी —1933–34— और आख़िरी —1947— की गायकी की उत्तमता में कोई फ़र्क नहीं आया था ।

जितनी सहजता से वे अपनी मातृभाषा पंजाबी में गाते थे उतनी ही मीठास से वे बंगला गाने गाते थे ।पंजाबी एक या दो जब कि बंगला के कई गाने उनके उपलब्ध हैं ।हिंदी में उन्हों ने कृष्ण भजन बहुतेरे गाये हैं —भजुं मैं तो भाव से श्री गिरधारी, —राधे रानी दे डारो ना, —सुनो सुनो हे कृष्ण काला, फिल्म 'सूरदास' व 'चंडीदास' आदि के भजन भी कृष्ण भजन में शामिल हैं, पर उनका कोई राम भजन जेहन में नहीं आ रहा है ।

यह सत्य भी सभी जानते हैं कि हमारे सभी नामी गायक जैसे मुकेश, लता मंगेशकर, किशोर कुमार किस तरह अपने शुरूआती दौर में सहगल की नकल किया करते थे, इस बात का ज़िक्र उन्हों ने ख़ुद हमेशा किया है । लताजी ने सहगल के 'सो जा राजकुमारी…' को कॅसेट में भी गाया है । मुकेश का 'दिल जलता है तो जलने दे…' पहली नज़र व किशोर कुमार का 'मरने की दुआएं क्यूँ मांगू…' —ज़िददी— दोनों गीत इस बात की मिसाल हैं कि सहगल की तान उन पर किस कदर हावी थी ।किशोर कुमार इस कदर सहगल के दीवाने थे कि वे अपने घर में निरंतर, लगातार ज़िंदगी के आख़िर दिनों तक उनके गाने सुना करते थे,यह बात उनकी पत्नी लीना चंदावरकार ने बतायी । सुना है कि महान कालाकार प्रेमनाथ भी हर समय, फिल्म शूटिंग के दौरान भी, सहगल के गानों की कसॅट सुन करते थे ।पिछली पीढ़ी के अदाकार जो कि एक गहरी साहित्यिक और भाषाई —हिंदी, उर्दू —की समझ, ज्ञान रखते थे, सहगल की गायकी के कायल रहे हैं जिनमें कला के महान स्तंभ अशोक कुमार, प्राण, राज खोसला जैसे अनगिनत नाम हैं । सहगल के लहज़े की नकल उस दौर के व बाद के हर गायक ने कहीं न कहीं की । सहगल के गैर फिल्मी गीतों–ग़ज़लों की गायकी परंपरा को सी एच आत्मा, तलत मेहमूद, जगमोहन जैसे कलाकारों ने आगे बढ़ाया ।

संगीतकार नौशाद जिन्हों ने उनकी आख़िर की फिल्म 'शाहजहाँ' में संगीत दिया था बताते रहे कि कुंदन लाल सहगल को यह वहम हो गया था कि वे बिना शराब पिये नहीं गा सकते । जब नौशाद साहब ने शराब के साथ और बिना शराब के इस तरह एक ही गाना दो बार रेकॉर्ड करवा कर उन्हें सुनाया तो सहगल को वही गाना अच्छा लगा जो बिना शराब पीये गाया गया था । नौशाद से असलियत सुन कर उन्हें ताज्जुब हुआ । इस पर नौशाद साहब ने कहा कि —जिन लोगों ने आप से कहा कि आप बिना शराब पीये अच्छा नहीं गा सकते वे आपके दुश्मन होंगे, दोस्त नहीं । तब सहगल बोले कि —काश कुछ समय पहले आप यह कह देते तो कुछ दिन और जी लेता पर अब बहुत देर हो चुकी है ।नौशाद ने सहगल की मृत्यु के बाद जालंधर में मनायी गयी उनकी बरसी पर लिखा था —संगीत के माहिर तो बहुत आए हैं लेकिन दुनिया में कोई दूसरा 'सहगल' नहीं आया ।

- श्रीमती वी एन पुरोहित
(सौजन्य - नोसटोलोजिया )

तीर पर कैसे रूकूँ मैं, आज लहरों का निमंत्रण....

सुनिए अमिताभ बच्चन की आवाज़ में हरिवंश राय बच्चन का काव्य पाठ

आज हिन्दी साहित्य के माधुर्य रस से लबालब काव्य लिखने वाले हालावादी कवि हरिवंश राय बच्चन छठवीं पुण्यतिथि है।उनका नाम याद आते ही याद आता है २५ वर्ष का एक युवक - लम्बे घुँघराले बाल, इकहरा शरीर, दरमियाना कद,गेहुँआ रंग, दार्शनिक मुद्रा और शरारत भरी आँखें। दिन में कचहरी और रात में होटल या ट्रेन में। २ नोट बुक सदा हाथ में रहती। एक अखबारी नोट तथा दूसरी निजी जो उसकी सच्ची साथी थी,जिसमें वो अपनी प्यारी कल्पनाएँ छन्दोबद्ध रूप में लिखता था।गला सुरीला था। अक्सर गुनगुनाता था-

"अरूण कमल कोमल कलियों का, प्याली, फूलों का प्याला..."

अपने गीतों की धुन स्वयं बनाता और मस्ती से गाता था। एक ऐसा कवि जिसने मात्र १३ वर्ष की आयु में अपनी पहली कविता लिखी। आरम्भ में छोटी-छोटी सभाओं में लोकप्रिय हुआ और कुछ ही दिनों में समस्त हिन्दी प्रेमियों में गायक कवि के रूप में प्रचलित हो गया। १९३३ में बनारस में एक बड़ा कविसम्मेलन हुआ। दिग्गज कवियों के बीच मधुशाला के २ पद सुनाकर दिग्विजय पा ली। बैठबा चाहते थे पर तालियों की गड़गड़ाहट ने तीसरा, फिर चौथा पद सुनाया। विद्यार्थी सिर्फ़ बच्चन जी को सुनना चाहते थे। उनको आश्वासन दिया गया कि कल फिर से बच्चन जी का कविता पाठ होगा तब जाकर विद्यार्थी बैठे।

दूसरे दिन वाइसचान्सलर से लेकर सभी अध्यापक और विद्यार्थी उन्हें सुनने पहुँच गए। विद्यार्थी कापी लेकर आए थे। बच्चन जी ने अपनी मधुर तर्ज में मधुशाला गानी आरम्भ की। श्रोता झूम रहे थे और सैंकड़ों कंठ उनके साथ गुनगुना रहे थे। ३ दिनों में बच्चन जी की ख्याति पूरे हिन्दी जगत में फैल गई। मधुशाला का प्रथम संस्करण छपवाने के लिए धन नहीं था। एक प्रकाशक के पास पाँडुलिपि छोड़ आए। कुछ दिन बाद वह प्रकाशक मधुशाला की २० प्रतियाँ लेकर उनके पास आया। उसने बताया कि उसने १००० प्रतियाँ छपवाई थी जिनमें से केवल २० ही बची हैं। सब हाथों हाथ बिक गई।

आर्थिक संकट तो था ही साथ में पारिवारिक संकट भी कम नहीं थे। सबसे बड़ा आघात पत्नी श्यामा की मृत्यु से लगा। कवि का हृदय टूट गया। टूटे हृदय से १९३७ में निशा निमंत्रण लिखा । १९४० में आकुल अंतर और विकल विश्व की रचना की। १९४२ में तेजी जी से विवाह हुआ। यह विवाह बहुत शुभ था। इलाहबाद विश्व विद्यालय में अंग्रेजी साहित्य में लैक्चरार बने। समय बदल गया। प्रणय पत्रिका में उन्होने लिखा-लेकिन मैं तो बेरोक सफ़र में जीवन के एक और पहलू से होकर निकल चला ।

बच्चन जी साहित्य में हालावाद को लेकर आए।उनकी कविता विद्रोह और जीवन का संदेश देती थी। उसमें असाधारण माधुर्य का समावेश था। उन्होने नव जीवन और आस- विश्वास का संदेश दिया- जो बीत गई सो बात गई......

१९५२ में बच्चन जी अंग्रेजी में डाक्टरेट करने के लिए कैम्बरिज गए। १९५४ में आए और १९५५ में आकाशवाणी में हिन्दी प्रोड्यूसर बने। बाद में विदेश मंत्रालय से निमंत्रण मिल गया। उनकी लोकप्रियता का आधार उनका मधुर कंठ था। उनकी रचनाएँ उनके मुख से सुनना एक सौभाग्य था।

जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आए किन्तु सामाजिक जीवन में ऐसे रहे जैसे पानी में कमल। धीर-गम्भीर अपने परिवार में खुश रहते। दिल्ली में रहकर भी दिल्ली वालों की तरह क्लब आदि में बहुत कम जाते थे। अधिकतर समय घर पर ही बिताते थे। बीसियों निमंत्रणों के बाद भी बहुत कम बाहर जाते थे। दिनचर्या एकदम नियमित रहती। व्यायाम, स्वाध्याय नियम से करते। सादा जीवन और शाकाहारी भोजन किया करते । बागवानी का शौंक रखते थे, पत्थरों से घर सजाना उन्हें बहुत पसन्द था। जब भी सैर को जाते दो चार पत्थर उठा लाते। घर में एक मन्दिर भी बनाया हुआ था। अध्ययन में ज़रा भी हस्तक्षेप सहन नहीं करते। बैठकर लिखा करते। उनका कहना था- लेटकर लिखी कविता भी लेखक के समान ही शिथिल हो जाती है। वे चुस्ती में विश्वास रखते थे। उनके दो पुत्र हुए- अमित और अजित। अमित एक महान अभिनेता के रूप में लोकप्रिय हैं। आज भारत का बच्चा -बच्चा अमित जी को जानता है।

अपना परिचय उन्होने स्वयं आत्म परिचय में दिया-

मैं दीवानों का वेश लिए फिरता हूँ।
मैं मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ।
जिसको सुनकर जग झूम,झुके लहराए,
मैं मस्ती का संदेश लिए फिरता हूँ।

जीवन के संबन्ध में उनके विचार बहुत ही दार्शनिक थे। वे गाते थे-

प्याला है पर पी जाएँगें,
है ज्ञात नहीं इतना हमको,
इस पार नीयति ने भेजा है
असमर्थ बना कितना हमको।


किन्तु जीवन संघर्षों से जूझना उन्हें प्रिय था-

तीर पर कैसे रूकूँ मैं,
आज लहरों का निमंत्रण....


सुनिए सुपुत्र अमिताभ बच्चन की दमदार आवाज़ में हरिवंश राय बच्चन जी की ये रचनाएँ -

पहला हिस्सा


दूसरा हिस्सा


प्रस्तुति- शोभा महेन्द्रू

Tuesday, December 16, 2008

तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा...

ग्रेट शो मैन राज कपूर की जयंती पर विशेष


१४ दिसम्बर को हमने गीतकार शैलेन्द्र को उनकी पुण्यतिथि पर याद किया था. गौरतलब ये है कि फ़िल्म जगत में उनके "मेंटर" कहे जाने वाले राज कपूर साहब की जयंती भी इसी दिन पड़ती है. पृथ्वी राज कपूर के एक्टर निर्माता और निर्देशक बेटे रणबीर राज कपूर को फ़िल्म जगत में "ग्रेट शो मैन" के नाम से भी जाना जाता है. हिन्दी फिल्मों के लिए उनका योगदान अमूल्य है. १९४८ में बतौर अदाकार शुरुआत करने वाले राज कपूर ने मात्र २४ साल की उम्र में मशहूर आर के स्टूडियो की स्थापना की और पहली फ़िल्म बनाई "आग" जिसमें अभिनय भी किया. फ़िल्म की नायिका थी अदाकारा नर्गिस. हालाँकि ये फ़िल्म असफल रही पर नायक के तौर पर उनके काम की तारीफ हुई. नर्गिस के साथ उनकी जोड़ी को प्रसिद्दि मिली १९४९ में आई महबूब खान की फ़िल्म "अंदाज़" से. निर्माता निर्देशक और अदाकार की तिहरी भूमिका में फ़िल्म "बरसात" को मिली जबरदस्त कमियाबी के बाद राज कपूर ने फ़िल्म जगत को एक से बढ़कर एक फिल्में दी और कमियाबी की अनोखी मिसालें कायम की. आईये आज उन्हें याद करें उनकी चंद फिल्मों का जिक्र कर.

शुरुआत करते हैं राज साहब की अमर कृति "आवारा" से. ये वो फ़िल्म है जिसने राज कपूर को देश विदेश में एक बड़े कलाकार के रूप में स्थापित किया. भारत में बेहद कामियाब हुई इस लाजवाब फ़िल्म को एशिया और रूस में भी जबरदस्त सराहना मिली. राज साहब की अपनी एक टीम हुआ करती थी जिन पर वो भरोसा करते थे. आर के स्टूडियो में बनी इस पहली फ़िल्म में भी सभी उनके चहेते साथी थे. अभिनेत्री नर्गिस थी जोडीदार तो संगीत का जिम्मा था शंकर जयकिशन शैलेन्द्र और हसरत की टीम पर, आवाजें थी मुकेश (राज कपूर) और लता (नर्गिस) की. इस फ़िल्म में ही पहली बार राज कपूर चैपलिन के भेष में दिखाई दिए थे. हालाँकि ये एक छोटा सा तोहफा था राज का अपने प्रिये अभिनेता के लिए (श्री ४२० में ये अधिक मुखर था),पर सिने प्रेमी इस लघु भूमिका को नही भूले. राज कपूर के प्रशंसकों को ये जानकर खुशी होगी ये परिधान आज भी आर के स्टूडियो ने जतन से सहेज कर रखा हुआ है. राज कपूर और नर्गिस कभी न बिछड़ने वाले प्रेमी युगल के रूप में परदे पर आए और छा गए. फ़िल्म का एक एक गीत एक शाहकार बना था. शीर्षक गीत 'आवारा हूँ' और 'दम भर जो उधर मुंह फेरे ..." के आलावा एक ९ मिनट का स्वप्न दृश्य गीत अपने बहतरीन सेट सज्जा के लिए आज भी जाना जाता है. घुमावदार सीढियों और उड़ते बादलों के बीच (स्वर्ग) में लय पर थिरकरी अप्सराएँ और सब से उपर की सीढ़ी पर खड़ी नायिका गा रही है "तेरे बिना आग ये चांदनी तू आजा ..." नायक काली टी शर्ट और पैंट पहने कहीं नर्क जैसी जगह में तड़प रहा है "ये नही ये नहीं जिन्दगी...." चारों तरफ़ आग है नाचते अस्थि पिंजर और शैतानी मुखौटों से मुक्त हो कर अंत में वह बादलों से निकलता है और ध्वनि होती है "ओम् नम शिवाय..." की. ब्रह्म विष्णु और महेश की त्रिमूर्ति है सीढियों की शुरुआत में नायिका नीचे उतरती है और नायक को ऊपर स्वर्ग की तरफ़ ले चलती है गाती हुई "घर आया मेरा परदेसी...". घुमावदार सीढ़ियों से नायिका के पीछे चलता नायक अंत में नटराज की मूर्ति के आगे पहंचता है. जहाँ से एक नई सड़क चलती है, यहीं खलनायक एक चाकू लिए प्रकट होता है. नायक नायिका का नाम पुकारता है पर जब तक नायिका उस तक पहुंचें नायक एक बार फ़िर गर्त में गिर कर ख़ाक हो जाता है. ये स्वप्न दृश्य एक "विसुअल ट्रीट" है अवश्य देखें -



१९६४ में आई "संगम" राज की पहली रंगीन फ़िल्म थी और पहली ऐसी फ़िल्म जो उन्होंने विदेश में शूट की. दरअसल इसी फ़िल्म ने विदेश में शूट करने का ट्रेंड शुरू किया था. बाद में तो लगभग हर फ़िल्म में एक गीत स्विट्जरलैंड में शूट करना लाजमी हो गया चाहे उसका कहानी से कुछ लेना देना हो या नही. साधारण सी प्रेम त्रिकोण कहानी में भी उनका निर्देशन फ़िल्म की जान था. हालाँकि फ़िल्म कुछ जरुरत से ज्यादी लम्बी थी पर राज साहब हमेशा ही बड़े कैनवास के फिल्मकार थे. राज की हर फ़िल्म की तरह इस फ़िल्म के गीतों ने भी धूम मचायी. "बोल राधा बोल", "बुड्डा मिल गया", "ये मेरा प्रेम पत्र" जैसे लाजवाब गीतों के अलावा एक गीत और था "दोस्त दोस्त न रहा...". जिस खूबसूरती से राज ने इस गीत को फिल्माया फ़िल्म का एक एक किरदार और उसके मन के भावों जिस तरीके परदे पर उभारा गया इस गीत में, वो हिन्दी फ़िल्म क्राफ्ट में राज की दक्षता का जीवंत उदाहरण है.

कुछ साल और आगे बढ़ते हैं. शानदार अभिनय से सजी "तीसरी कसम" और उनकी बेहद महत्वकांक्षी फ़िल्म "मेरा नाम जोकर" की नकामियाबी ने राज को बहुत बड़ा सदमा दिया. उन्होंने फैसला किया की अब वो अभिनय नही करेंगे. चुनांचे उन्होंने परदे पर उतरा अपने मंझले बेटे ऋषि कपूर को. ऋषि इससे पहले "मेरा नाम जोकर" राज के बचपन की भूमिका निभा चुके थे. साथ ही एक नई नायिका दी उन्होंने फ़िल्म जगत को डिम्पल कपाडिया के रूप में. दोनों ही कलाकार अपनी "टीनएज" अवस्था में थे जब ये फ़िल्म शुरू की. "बॉबी" को हम राज की पहली शो मैन सरीखी फ़िल्म मान सकते हैं जहाँ उन्होंने फ़िल्म को कामियाब बनाने के लिए सभी हथकंडे अपनाए और फ़िल्म को एक "लार्जर देन लाइफ" प्रस्तुति दी. के ऐ अब्बास की लिखी इस प्रेम कहानी में राज ने सब कुछ दिया दर्शकों को. सुखद अंत दिया कहानी को ताकि खतरा कम रहे असफलता का. सुपर हिट संगीत और नए परिधानों में सजा धजा एक प्रेमी युगल जिसने एक पूरी पीढी को प्रेरित किया दीवारों को तोड़ कर प्रेम करने के लिए. ऋषि कपूर अगले २० सालों तक कमोबेश इसी रोमांटिक इमेज में जीये. फ़िल्म का एक दृश्य विशेष ध्यान आकर्षित करता है. युवा नायक नायिका से मिलने उसके घर जाता है. पकौडे बना रही नायिका जब दरवाज़ा खोलती है तो अनजाने में हाथ में लगा आटा अपने बालों में लगा बैठती है. कहते हैं कि जब राज पहली बार नर्गिस के घर गए थे तब कुछ ऐसा ही हुआ था. नायक का नायिका से पूछना "मुझसे दोस्ती करोगी" एक ऐसा संवाद था जिसने आने वाली पीढी के फिल्मकारों को एक लड़का और लड़की की दोस्ती और प्रेम जैसे विषय पर फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया. सूरज बड़जात्या की "मैंने प्यार किया" और करण जौहर की "कुछ कुछ होता है" जैसी फिल्में इसका उदाहरण है. राज साहब की ८४ वीं जयंती पर उन्हें आवाज़ का सलाम.

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