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Friday, June 3, 2011

लाईफ बहुत सिंपल है....वाकई अमोल गुप्ते और हितेश सोनी के रचे इन गीतों सुनकर आपको भी यकीन हो जायेगा

Taaza Sur Taal (TST) - 16/2011 - STANLEY KA DABBA

दोस्तों मुझे यकीन है कि "तारे ज़मीन पर" आपकी पसंदीदा फिल्मों में से एक होगी. अगर हाँ तो आप ये भी जानते होंगें कि इस फिल्म के निर्देशक पहले अमोल गुप्ते नियुक्त हुए थे, बाद में कुछ कारणों के चलते अमोल, अमीर से अलग हो गए और अमीर ने खुद फिल्म का निर्देशन किया. पर ये भी सच है कि उस फिल्म में अमोल का योगदान एक लेखक से बहुत कुछ अधिक था, जाहिर है जब उस अमोल की खुद निर्देशित फिल्म आये और उसमें भी बच्चों की ही प्रमुख भूमिकाएं हो तो उम्मीदें बेहद बढ़ जाती है. "तारे ज़मीन पर" में संगीत था शंकर एहसान लॉय की तिकड़ी का और कुछ गीत तो फिल्म के ऐसे थे कि आने वाले कई दशकों तक श्रोताओं को याद रहेंगें. मगर अमोल ने अपनी फिल्म "स्टेनली का डब्बा" के लिए चुना संगीतकार हितेश सोनिक को, और गीतकार की भूमिका खुद उठाने की सोची. हितेश अब तक पार्श्व संगीत के लिए जाने जाते थे और अनुराग कश्यप विशाल भारद्वाज जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम कर चुके है. बतौर स्वतंत्र संगीतकार ये उनकी पहली फिल्म है.

बहरहाल हम आते हैं इस अल्बम के गीतों पर. दरअसल पहला गीत ही ऐसा है जो आपको गहरे तक छूने की कुव्वत रखता है. शान की मधुर आवाज़ और अमोल गुप्ते के अलग "हट के" बोलों में जैसे जादू है. "लाईफ बहुत सिंपल है..." जीवन को सरल और सहज होकर देखने की सीख देती है, हितेश ने संगीत संयोजन बेहद सरल रखा है. और धुन भी मन को छूने में सक्षम है. यक़ीनन आप इस गीत को ड्राईव करते हुए गुनगुनाना चाहेंगें.

सुखविंदर ने सहज होकर गाया है अगला गीत "डब्बा", जिसे सुनकर आपको याद आ जायेगा माँ के हाथों बनाया हुआ टिफिन का डब्बा जिसे स्कूल ले जाते समय ताकीद मिलती थी कि कुछ भी बाकी नहीं छूटना चाहिए, और वो स्कूल रिसेस जिसमें योजना बनती थी इस डिब्बे को कैसे खाली किया जाए. दाल, चावल, पनीर, मशरूम, गोभी....सब कुछ है इस मसाला मिक्स गीत में. सुखविंदर यहाँ आपको एक नए अंदाज़ में दिखेंगें. वो एक ऐसे गायक हैं कि जो गाते हैं उसमें अपना दिल उंडेल देते है, अमोल के गैर पारंपरिक शब्द इस सरल सहज गीत की जान हैं.

शंकर महादेवन की आवाज़ में है अगला गीत "नन्ही सी जान". कहानीनुमा ये गीत अल्बम के अन्य गीतों से अलग कुछ रोक् शैली का है. ये फिल्म की सिचुएशन के अनुरूप होना चाहिए, जो शायद परदे पर अधिक सटीक लगे. विशाल ददलानी आते है अगला गीत लेकर "तेरे अंदर भी कहीं...", ये सोफ्ट रोक् गीत उनकी आवाज़ में खूब जचता है. इस गीत का एक संस्करण आदित्य चक्रवर्ती की किशोर आवाज़ में भी है. अमोल लिखते हैं –"किरणों में नहाके ताज़ा तरीन, खुशियों के निवाले हो ज्यादा महीन, भोला सा दिल करे सबपे यकीन, भेड़ों की भीड़ में भूल आया क्या तू...." वाह

तमाम पुरुष गायकों की भीड़ में एक गीत है जिसमें महिला स्वर सुनाई देता है. इसे गीत को खुद अमोल के स्वरबद्ध किया है. ये गीत एक लोरी है, पता नहीं कितने दिनों बाद फिल्मों में एक अच्छी लोरी सुनने को मिली है, पार्श्व वाध्य के रूप में सिर्फ बांसुरी के स्वर हैं, और हंसिका अय्यर की सुरीली आवाज़ में बहुत प्यारा बन पड़ा है ये गीत – झूला झूल...., अवश्य सुनियेगा. व्यक्तिगत तौर पर मैं इस अल्बम की सिफारिश अवश्य करूँगा, बाकी सुनकर आप भी बताएं कि ये धीमा, सुरीला संगीत अपनी सहजता में आपको किस हद तक भाया है.

आवाज़ रेटिंग - 8/10

एक और बात: इस एलबम के सारे गाने आप यहाँ पर सुन सकते हैं।




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Friday, April 29, 2011

बेहद प्रयोगधर्मी है शोर इन द सिटी का संगीत

Taaza Sur Taal (TST) - 10/2011 - Shor In The City

'ताज़ा सुर ताल' के सभी पाठकों को सुजॉय चटर्जी का नमस्कार! पिछले कई हफ़्तों से 'टी.एस.टी' में हम ऐसी फ़िल्मों की संगीत समीक्षा प्रस्तुत कर रहे हैं जो लीक से हटके हैं। आज भी एक ऐसी ही फ़िल्म को लेकर हाज़िर हुए हैं, जो २०१० में पुसान अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव और दुबई अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव के लिए मनोनीत हुई थी। इस फ़िल्म के लिये निर्देशक राज निदिमोरु और कृष्णा डी.के को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार भी मिला न्यु यॉर्क के MIAAC में। वैसे भारत के सिनेमाघरों में यह फ़िल्म २८ अप्रैल को प्रदर्शित हो रही है। शोभा कपूर व एकता कपूर निर्मित इस फ़िल्म का शीर्षक है 'शोर इन द सिटी'।

'शोर इन द सिटी' तुषार कपूर, सेन्धिल रामामूर्ती, निखिल द्विवेदी, पितोबश त्रिपाठी, संदीप किशन, गिरिजा ओक, प्रीति देसाई, राधिका आप्टे और अमित मिस्त्री के अभिनय से सजी है। फ़िल्म का पार्श्वसंगीत तैयार किया है रोशन मचाडो नें। फ़िल्म के गीतों का संगीत सचिन-जिगर और हरप्रीत नें तैयार किया हैं। हरप्रीत के दो गीत उनकी सूफ़ी संकलन 'तेरी जुस्तजू' से लिया गया है। गीतकार के रूप में समीर और प्रिया पांचाल नें काम किया है। आइए अब इस ऐल्बम के गीतों की एक एक कर समीक्षा की जाये!

पहला गीत है श्रेया घोषाल और तोची रैना की आवाज़ों में "साइबो"। गीत के बोल हैं "धीरे धीरे, नैनों को धीरे धीरे, जिया को धीरे धीरे, अपना सा लागे है साइबो"। सचिन-जिगर नें अपने पारी की अच्छी शुरुआत की है। भले ही फ़िल्म का नाम है 'शोर इन द सिटी', लेकिन यह गीत शोर-गुल से कोसों दूर है। श्रेया अपनी नर्म मीठी आवाज़ में गीत शुरु करती है, जिसमें पंजाबी अंदाज़ भी है। उसके बाद तोची उसमें अपना रंग भरते हैं। इस गीत की ख़ास बात है इसमें प्रयोग हुए विभिन्न साज़ों का संगम। भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का कैसा ख़ूबसूरत मेल है इस गीत में, इसे सुन कर ही इसका आनंद लिया जा सकता है। इस सुंदर कर्णप्रिय गीत के रीमिक्स संस्करण की क्या आवश्यक्ता पड़ गयी थी, कभी मौका मिले तो संगीतकार व फ़िल्म के निर्माता से ज़रूर पूछूंगा। फ़िल्म के प्रोमोशन में इसी गीत का इस्तमाल हो रहा है।

'शोर इन द सिटी' का दूसरा गीत है फ़िल्म के शीर्षक को सार्थक करता है। जी हाँ, शोर शराबे से भरपूर सूरज जगन, प्रिया पांचाल (जो इस गीत की गीतकार भी हैं) और स्वाति मुकुंद की आवाज़ों में "साले कर्मा इस अ बिच" गीत को सेन्सर बोर्ड कैसे पास करती है, यह भी सोचने वाली बात है। गीत के बीच बीच में रोबोट शैली की आवाज़ों का प्रयोग है। हो सकता है कुछ नौजवानों को गीत पसंद आये, लेकिन मुझे तो केवल शोर ही सुनाई दिया इस गीत में। गीत में रॉक शैली, दमदार गायकी और सख़्त शब्दों का प्रयोग है जो इस गीत को एक "शहरी" रूप प्रदान करती है।

पिछले हफ़्ते 'मेमोरीज़ इन मार्च' में मोहन की आवाज़ में "पोस्ट बॉक्स" गीत की चर्चा आपको याद होगी। 'शोर इन द सिटी' में भी 'अग्नि' के मोहन कन्नन की आवाज़ में एक गीत है "शोर"। गीत भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ शुरु होती है तो लगता है कि यह कर्णप्रियता बनी रहेगी, लेकिन तुरंत पाश्चात्य साज़ों की भीड़ उमड पड़ती है और गीत एक रॉक रूप ले लेता है। इंटरल्युड्स में फिर से शास्त्रीय संगीत और आलाप का फ़्युज़न है। इस तरह का संगीत पाक़िस्तानी बैण्ड्स की खासियत मानी जाती है। गीत की अपनी पहचान है, लेकिन ऐसी भी कोई ख़ास बात नहीं जो भीड़ मे अलग सुनाई दे। गीत को थोड़ा और कर्णप्रिय ट्रीटमेण्ट दिया जा सकता था।

अतिथि संगीतकार हरप्रीत सिंह की धुन पर श्रीराम अय्यर की आवाज़ में "दीम दीम ताना" को सुनकर भी एक बैण्ड गीत की ही याद आती है। काफ़ी तेज़ रफ़्तार वाला गीत है ठीक एक शहर की ज़िंदगी की तरह। ये सब गानें फ़िल्म संगीत की प्रचलित फ़ॉरमैट से अलग तो लगते हैं, लेकिन यह प्रयोग, यह एक्स्पेरीमेण्ट कितना सफल होगा, यह तो वक़्त ही बताएगा। वैसे कुछ साल पहले तक भी ज़माना ऐसा हुआ करता था कि कम से कम कुछ गीत हमारी ज़ुबान पर ज़रूर चढ़ते थे, जिन्हें हम जाने अंजाने गुनगुनाया करते थे। लेकिन आजकल कोई ऐसा गीत सुनाई नहीं देता जो हमारी होठों की शान बन सके। आज मेरे होठों पर जो सब से नया गीत सजता है, वह है 'सिंह इज़ किंग' का "तेरी ओर"। पता नहीं क्यों, इस गीत के बाद कोई ऐसा गीत मुझे भाया ही नहीं जिसे गुनगुनाने को जी चाहे। ख़ैर, मुद्दे पर वापस आते हैं, "दीम दीम ताना" भी एक "अलग" गीत है जिसमें हिंदी रैप का भी प्रयोग हुआ है और अरेंजमेण्ट भी अच्छा है, लेकिन सबकुछ होते हुए भी दिल को छू पाने में असमर्थ है। माफ़ी चाहता हूँ।

ये तो थे इस फ़िल्म के ऑरिजिनल गानों की समीक्षा। इस ऐल्बम में तीन बोनस ट्रैक्स भी है। रूप कुमार राठौड़ का "तेरी जुस्तजू", अग्नि का "उजाले बाज़" और कैलासा का "बबम बम बबम"। दोस्तों, एक पंक्ति में अगर 'शोर इन द सिटी' के साउण्डट्रैक के बारे में बताया जाये तो यही कह सकते हैं कि इस फ़िल्म का संगीत पूर्णत: प्रयोगधर्मी है, जिसमें से ग़ैरफ़िल्मी ऐल्बम के गीतों की महक आतीhttp://www.blogger.com/img/blank.gif है। गानें हो सकता है कि बहुत ख़ास न हो, लेकिन 'ताज़ा सुर ताल' में इसकी समीक्षा प्रस्तुत करने का हमारा उद्येश्य यही है कि हम नये संगीत में हो रहे प्रयोगों की तरफ़ अपना और आपका ध्यान आकृष्ट कर सकते हैं। और हमें पूरा पूरा हक़ भी है कि अगर संगीत कर्णप्रिय नहीं है, अगर उसमें केवल अनर्थक साज़ों का महाकुम्भ है, तो हम उसे नकार दे, उसे अस्वीकार कर दें। इस ऐल्बम को हम दे रहे हैं ७.५ की रेटिंग् और इस ऐल्बम से हमारा पिक है, निस्संदेह, "साइबो"।

फिल्म के गाने आप यहाँ सुन सकते हैं

इसी के साथ 'ताज़ा सुर ताल' के इस अंक को समाप्त करने की हमें इजाज़त दीजिये, नमस्कार!

ताज़ा सुर ताल के वाहक बनिये

अगर आप में नये फ़िल्म संगीत के प्रति लगाव है और आपको लगता है कि आप हर सप्ताह एक नई फ़िल्म के संगीत की समीक्षा लिख सकते हैं, तो हम से सम्पर्क कीजिए oig@hindyugm.com के पते पर। हमें तलाश है एक ऐसे वाहक की जो 'ताज़ा सुर ताल' को अपनी शैली में नियमीत रूप से प्रस्तुत करे, और नये फ़िल्म संगीत के प्रति लोगों की दिलचस्पी बढ़ाये!




अक्सर हम लोगों को कहते हुए सुनते हैं कि आजकल के गीतों में वो बात नहीं। "ताजा सुर ताल" शृंखला का उद्देश्य इसी भ्रम को तोड़ना है। आज भी बहुत बढ़िया और सार्थक संगीत बन रहा है, और ढेरों युवा संगीत योद्धा तमाम दबाबों में रहकर भी अच्छा संगीत रच रहे हैं, बस ज़रूरत है उन्हें ज़रा खंगालने की। हमारा दावा है कि हमारी इस शृंखला में प्रस्तुत गीतों को सुनकर पुराने संगीत के दीवाने श्रोता भी हमसे सहमत अवश्य होंगें, क्योंकि पुराना अगर "गोल्ड" है तो नए भी किसी कोहिनूर से कम नहीं।

Tuesday, November 30, 2010

मस्ती, धमाल और धूम धडाके में "शीला की जवानी" का पान....यानी तीस मार खान

टी एस टी यानी ताज़ा सुर ताल में आज हम हाज़िर हैं इस वर्ष की अंतिम बड़ी फिल्म “तीस मार खान” के संगीत का जिक्र लेकर. फराह खान ने नृत्य निर्देशिका के रूप में शुरूआत की थी और निर्देशिका बनने के बाद तो उन्होंने जैसे कमियाबी के झंडे ही गाढ़ दिए. “मैं हूँ न” और “ओम शांति ओम” जैसी सुपर डुपर हिट फिल्म देने वाली ये सुपर कामियाब निर्देशिका अब लेकर आयीं हैं – तीस मार खान. जाहिर है उम्मीदे बढ़ चढ़ कर होंगीं इस फिल्म से भी. पहली दो फिल्मों में शाहरुख खान के साथ काम करने वाली फराह ने इस बार चुना है अक्षय कुमार को और साथ में है कटरीना कैफ. संगीत है विशाल शेखर का और अतिथि संगीतकार की भूमिका में हैं शिरीष कुंदर जो फराह के पतिदेव भी हैं और अक्षय –सलमान को लेकर “जानेमन” जैसी फिल्मों का निर्देशन भी कर चुके हैं.

अल्बम की शुरूआत होती है शिशिर के ही गीत से जो कि फिल्म का शीर्षक गीत भी है. इस गीत में यदि आप लचर शब्दों को छोड़ दें तो तीन ऐसी बातें हैं जो इस गीत को तुरंत ही एक हिट बना सकता है. पहला है सोनू की बहुआयामी आवाज़ का जलवा. पता नहीं कितनी तरह की आवाजों में उन्होनें इस गीत गाया है और क्या जबरदस्त अंजाम दिया है ये आप सुनकर ही समझ पायेंगें. दूसरी खासियत है इसका सिग्नेचर गिटार पीस, एक एकदम ही आपका ध्यान अपनी तरफ़ खींच लेता है और तीसरी प्रमुख बात है गीत का अंतिम हिस्सा जो डांस फ्लोर में आग लगा सकता है. कुल मिलकार ये शीर्षक गीत आपका इस अल्बम और फिल्म के प्रति उत्साह जगाने में सफल हुआ है ऐसा कहा जा सकता है.

तीस मार खान


अब बात आइटम गीत “शीला की जवानी” की करें. एक बार फिर सुनिधि चौहान ने यहाँ बता दिया कि जब बात आइटम गीत की हो तो उनसे बेहतर कोई नहीं. अजीब मगर दिलचस्प बोल है विशाल के और अंतरे में हल्की कव्वाली का पुट शानदार है. बीट्स कदम थिरका ही देते है. कोई कितना भी इसे बेस्वदा कहे पर फराह के नृत्य निर्देशन और कटरीना के जलवों की बदौलत ये गीत “मुन्नी बदनाम” की ही तरह श्रोताओं के दिलों-दिमाग पर अपना जादू करने वाला है ये बात पक्की है.

शीला की जवानी


हम आपको बता दें कि फिल्म में सलमान खान एक गीत में अतिथि भूमिका में दिखेंगें. सलमान इन दिनों इंडस्ट्री में सबसे “हॉट” माने जा रहे हैं ऐसे में उनकी उपस्तिथि अगले गीत “वल्लाह रे वल्लाह” को लोगों की जुबान पर चढा दे तो भला आश्चर्य कैसा. परंपरा अनुसार फराह ने इस फिल्म में भी कव्वाली रखी है, यहाँ बोल अच्छे है अन्विता दत्त गुप्तन के विशाल शेखर ने भी रोशन साहब के पसंदीदा जेनर को पूरी शिद्दत से निभाया है.

वल्लाह रे वल्लाह


अगले दो गीत साधारण ही हैं “बड़े दिल वाला” में सुखविंदर अपने चिर परिचित अंदाज़ में है तो दिलचस्प से बोलों को श्रेया ने भी बहुत खूब निभाया है. “हैप्पी एंडिंग” गीत खास फराह ने रियलिटी शोस में दिए अपने वादों को निभाने के लिए ही बनाया है ऐसा लगता है. इंडियन आइडल से अभिजीत सावंत, प्राजक्ता शुक्रे, और हर्शित सक्सेना ने मिलकर गाया है इस गीत को जो संभवता फिल्म के अंतिम क्रेडिट में दिखाया जायेगा. वैसे पहले ३ गीत काफी हैं इस अल्बम को एक बड़ा हिट बनाने को. त्योहारों, शादियों के इस रंगीन मौसम में सोच विचार को कुछ समय के लिए दरकिनार कर बस कुछ गीत मस्ती से भरे सुनने का मन करे तो “तीस मार खान” को एक मौका देकर देखिएगा.

बड़े दिल वाला


हैप्पी एंडिंग

Tuesday, November 16, 2010

जी जान से खेले सोहेल सेन आशुतोष के लिए इस बार और साथ मिला जावेद साहब की अनुभवी कलम का

ताज़ा सुर ताल 45/2010

सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी श्रोताओं व पाठकों को मेरा नमस्कार और सजीव जी, आपको भी।

सजीव - आप सभी को मेरा भी नमस्कार और सुजॊय, तुम्हे भी। आज हम एक पीरियड फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं। आशुतोष गोवारिकर एक ऐसे फ़िल्मकार हैं जो पीरियड फ़िल्मों के निर्माण के लिए जाने जाते हैं। 'लगान' और 'जोधा अकबर' इस जौनर में आते हैं। और 'स्वदेस' में उन्होंने बहुत अच्छा संदेश पहुँचाया था इस देश के युवाओं को। और अब वो लेकर आ रहे हैं 'खेलें हम जी जान से'। आज इसी फ़िल्म और इसके गीत संगीत का ज़िक्र।

सुजॊय - मैंने सुना है कि इस फ़िल्म का पार्श्व बंगाल की सरज़मीन है और यह कहानी है आज़ादी के पहले की, आज़ादी के लड़ाई की। 'खेलें हम जी जान से' में मुख्य कलाकार हैं अभिषेक बच्चन, दीपिका पादुकोण, सिकंदर खेर, विशाखा सिंह, सम्राट मुखर्जी, मनिंदर सिंह, फ़ीरोज़ वाहिद ख़ान, श्रेयस पण्डित, अमीन ग़ाज़ी, आदि। जावेद अख़्तर के लिखे गीतों को धुनों में इस बार ए. आर. रहमान ने नहीं, बल्कि सोहैल सेन ने पिरोया है। जी हाँ, वही सोहैल सेन, जिन्होंने आशुतोष की पिछली फ़िल्म 'व्हाट्स योर राशी' में संगीत दिया था।

सजीव - हाँ, और आशुतोष साहब को इस बात के लिए दाद देनी ही पड़ेगी कि 'व्हाट्स योर राशी' के गीतों के ज़्यादा ना चलने के बावजूद सोहैल को इस फ़िल्म में संगीत देने का मौका दिया है। अभी कुछ ही देर में शायद हमें इस बात का अंदाज़ा हो जाएगा कि आशुतोष का यह निर्णय कितना सही था। तो आइए इस फ़िल्म का पहला गीत सुनते हैं सोहैल सेन की ही आवाज़ में।

गीत - ये देस है मेरा


सुजॊय - वाह! आशुतोष ने जैसे 'स्वदेस' के रहमान के "ये जो देस है तेरा" का ही पार्ट-२ बनाया है। लेकिन एक अलग ही अंदाज़ में और गायक - संगीतकार सोहैल सेन ने पूरी पूरी मौलिकता कायम रखा है।

सजीव - सचमुच एक सुरीली शुरुआत इस ऐल्बम की हुई है इस देशभक्ति गीत से। 'स्वदेस' के गीत में था "ये जो देस है तेरा", इसमें है "ये देस है मेरा"। केवल संगीत के लिहाज़ से ही नहीं, एक गायक के रूप में भी सोहैल ने इस गीत को बहुत ही अच्छा निभाया है। वैसे थोड़ा सा रहमान का स्टाइल नज़र आ तो रहा है। हो सकता है कि यह रहमान का नहीं बल्कि आशुतोष का स्टाइल हो, क्या पता! गीत के बोलों की बात की जाए तो जावेद साहब से हम ये तो उम्मीद रख ही सकते हैं। इस गीत के बोल, जैसे कि हमने सुना, हमारे देश के सारे अंधकार दूर करने के करता है, आज़ादी और ख़ुशियों की रोशनी इस देश में वापस आये।

सुजॊय - चलिए इस देशभक्ति के जस्बे को अपने अंदर समाहित कर हम अब बढ़ते हैं ऐल्बम के दूसरे गीत की तरफ़। यह है पामेला जैन और रंजिनी जोसे की युगल आवाज़ों में एक फ़ीमेल डुएट "नैन तेरे झुके झुके क्यों है ये बता, कोई तो है मन में तेरे हमसे सखी ना छुपा"।

गीत - नैन तेरे झुके झुके क्यों है ये बता


सुजॊय - वाह वाह वाह! मुझे इस गीत को सुनते हुए जितनी ख़ुशी हुई, उससे भी अधिक ताज्जुब हुआ यह देख कर कि बंगाल के लोकसंगीत का किस ख़ूबसूरती से इस्तेमाल इस नटखट चंचल गीत में हुआ है! यह धुन बंगाल के बाउल लोक संगीत की धुन है। एक तो संगीत संयोजन का कमाल, और उस धुन पर जावेद साहब ने किस ख़ूबसूरती से अपने शब्दों के मोतियों को पिरोया है! मैं बाक़ी के गीतों को सुने बग़ैर ही कह सकता हूँ कि यह गीत मेरा इस ऐल्बम का सबसे पसंदीदा गीत बना रहेगा।

सजीव - वाक़ई, बहुत दिनों के बाद इस तरह के बंगला के लोकशैली का गीत सुनने को मिला है। बस एक बात जो थोड़ी सी खटकती है, वह यह कि पामिला जैन और रंजिनी की आवाज़ों में ज़्यादा कॊन्ट्रस्ट नहीं है, जिसकी वजह से साफ़ साफ़ पता नहीं चलता कि कौन सी आवाज़ किसकी है, मेरा यह मानना है कि अगर दो आवाज़ें अलग क़िस्म के चुने जाते तो गीत का इम्पैक्ट और भी कई गुणा बढ़ जाता। लेकिन जो भी है, वाक़ई बहुत ही मीठा, सुरीला गीत है।

सुजॊय - इन दो गीतों को सुनने के बाद मेरी तो उम्मीदें बहुत ज़्यादा बढ़ गई हैं इस ऐल्बम से, आइए जल्दी जल्दी तीसरा गाना सुनते हैं, मुझसे तो सब्र नहीं हो रहा।

गीत - खेलें हम जी जान से


सजीव - फ़िल्म का शीर्षक गीत हमने सुना, और अब कि बार एक ऐसा गीत जो फ़िल्म के शीर्षक को सार्थक करे, फ़िल्म की कहानी को सार्थक करे, पूरी जोश के साथ 'सुरेश वाडकर आजीवासन म्युज़िक अकादमी' के बच्चों द्वारा गाये इस समूह गीत में हम 'लगान' के "बार बार हाँ, बोलो यार हाँ" गीत के साथ बहुत कुछ मिलता जुलता अनुभव कर सकते हैं।

सुजॊय - एक अलग तरह का गीत, पहले के दो गीतों से बिल्कुल अलग, कोरस और साज़ों का अच्छा तालमेल। संगीत संयोजन में भी सोहैल ने स्तरीय काम किया है। आइए अब एक नर्मो नाज़ुक रुमानीयत से लवरेज़ युगल गीत सुनते हैं सोहैल सेन और पामिला जैन की आवाज़ों में।

गीत - सपने सलौने


सजीव - इस गीत के अरेंजमेण्ट में भी हम बंगाल के संगीत की झलक पा सकते हैं। गीत के शब्द भी बहुत अच्छे हैं, जिसमें एक प्रेमी कह रहा है कि वो अपने प्यार के सपने और वादे पूरे करेगा लेकिन पहले अपनी देश के प्रति ज़िम्मेदारियों को पूरा करने के बाद ही। और यही बात इस रोमांटिक डुएट की खासियत है।

सुजॊय - मुझे भी यह गीत पसंद आया, लेकिन मास लेवेल पर कितना कामयाब हो पाएगा कह नहीं सकते। ख़ैर, अगले गीत की तरफ़ बढ़ते हैं, अब कि बार "वंदेमातरम"। इसे भी एक ग्रूप ने गाया है, 'सिने सिंगर्स ऐसोसिएशन ग्रूप कोरस'। न जाने क्यों ए. आर. रहमान की थो़ड़ी बहुत छाप नज़र आती है इस गीत में भी।

गीत - वंदेमातरम


सजीव - इस "वंदेमातरम" की खासियत है कि संस्कृत के मूल गीत को हिंदी में अनुवाद कर इसे लिखा व रचा गया है। एक और देशभक्ति गीत इस तरह से फ़िल्म संगीत के ख़ज़ाने को समृद्ध किया। और फ़िल्म के ट्रेलरों में इसी गीत को दिखाया जा रहा है। और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि फ़िल्म में इसे पार्श्वसंगीत के तौर पर इस्तेमाल किया जाएगा, जो कहानी या सीन को और भी ज़्यादा असरदार या भावुक बनाएगा।

सुजॊय - इस फ़िल्म में बस इतने ही गानें हैं, बाक़ी कुछ इन्स्ट्रुमेण्टल वर्ज़न हैं इन्हीं गीतों के, जैसे कि Long Live Chittagong, The Teenager's Whistle, Surjya's Sorrow, Vande Mataram, The Escape, तथा Revolutionary Comrades. आइए इनमें से कम से कम एक यहाँ पर सुन लेते है।

धुन - Revolutionary Comrades


सुजॊय - मज़ा आ गया आज सजीव जी। बहुत दिनों के बाद एक अच्छा ऐल्बम सुनने को मिला जिसे सुनकर दिल को बहुत ही सुकून और शांति मिली है। और जैसा कि मैंने पहले कहा था, अब भी मैं अपने उसी बात पर बरकरार रहते हुए यह ऐलान करता हूँ कि "नैन तेरे झुके झुके" ही मेरा फ़ेवरीट नंबर है इस फ़िल्म का। आशुतोष गिवारिकर, सोहैल सेन और जावेद अख़्तर को मेरी तरफ़ से "थम्प्स अप"!!! आपके क्या विचार हैं सजीव जी?

सजीव - देखिये सुजॉय, अक्सर हम कहते हैं कि पुराना संगीत बहुत अच्छा था, बात में सच्चाई भी नज़र आती है क्योंकि आज इतने सालों के बाद भी वो हमें मधुर लगते हैं, जानते हैं वजह क्या है ?....उन गीतों को, गीतकार, संगीतकार, निर्देशक, गायक और जितने भी साजिन्दे उससे जुड़े हुए हैं उन सब का भरपूर स्नेह मिलता था मतलब हर गीत को एक शिशु की तरह संवार कर सबके सामने लाया जाता था. अब मेकिंग में वो प्यार नहीं रहा सब कुछ आनन् फानन में होता है....मगर जब भी कोई काम दिल से होता है वो दिल तक अवश्य पहुँचता है, अभी हाल में गुज़ारिश के गीत भी इसी श्रेणी में आते हैं और अब इस फिल्म के गीतों को देखिये, इन्हें सुनकर पता लगता है कि इन पर कितनी मेहनत की गयी, इन्हें प्यार से संवारा गया है, दिल से संजोया गया है तभी तो देखिये दिल को छू पा रहे हैं, आशुतोष, सोहेल और जावेद भाई को इस शानदार प्रस्तुति के लिए बधाई. मुझे तो सभी गीत बेहद पसंद आये पर शीर्षक गीत बेहद खास लगा उसके कोरस के चलते. इसे सुनकर सचमुच ४० वें दशक की एक युवा टीम सामने साकार हो जाती है.

सुजॊय - और आज की इस प्रस्तुति को समाप्त करने से पहले मैं 'ताज़ा सुर ताल' के अपने दोस्तों को यह बता दूँ कि अगले हफ़्ते से मैं इस स्तंभ का हिस्सा नहीं रहूँगा, कम से कम अगले कुछ हफ़्तों या महीनों के लिए, लेकिन 'ओल्ड इज़ गोल्ड' पर हमारी मुलाक़ात युंही होती रहेगी। 'ताज़ा सुर ताल' के महफ़िल की शमा सजीव और विश्वदीपक युंही जलाते रहेंगे। इसी बात पर अब हमें आज के इस अंक को समाप्त करने की इजाज़त दीजिए, नमस्कार!

Tuesday, November 9, 2010

"दस तोला" सोना लेकर आये गुलज़ार, सन्देश के साथ तो प्रीतम ने धमाल किया "गोलमाल" के साथ

ताज़ा सुर ताल ४३/२०१०


सुजॊय - 'ताज़ा सुर ताल' के सभी चाहनेवालों को हमारा नमस्कार! सजीव जी, विश्व दीपक जी तो दीपावली की छुट्टियों में घर गए हुए हैं, और आशा है उन्होंने यह त्योहार बहुत अच्छी तरह से मनाया होगा।

सजीव - सभी को मेरा भी नमस्कार, दीवाली अच्छी रही। और बॊलीवूड की यह रवायत रही है कि दीवाली में कोई ना कोई बड़ी बजट की फ़िल्म रिलीज़ होती आई है। इस परम्परा को बरकरार रखते हुए इस बार दीवाली की शान बनी है दो फ़िल्में - 'ऐक्शन रिप्ले' और 'गोलमाल-३'।

सुजॊय - 'ऐक्शन रिप्ले' के गानें हमने पिछले हफ़्ते सुने थे, आज बारी 'गोलमाल-३' की। और साथ ही हम 'दस तोला' फ़िल्म के गीत भी सुनेंगे। शुरु करते हैं 'गोलमाल-३-' से। रोहित शेट्टी निर्देशित इस मल्टि-स्टारर फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं मिथुन चक्रवर्ती, अजय देवगन, करीना कपूर, अरशद वारसी, तुषार कपूर, श्रेयास तलपडे, कुणाल खेमू, रत्ना पाठक, जॊनी लीवर, संजय मिश्रा, व्रजेश हिरजी, अशिनी कल्सेकर, मुरली शर्मा और मुकेश तिवारी। फ़िल्म में गीत संगीत का ज़िम्मा उठाया है कुमार और प्रीतम ने। इस ऐल्बम के पहले गीत की शुरुआत उसी जाने पहचाने "गोलमाल गोलमाल" लाइन से होती है। लीजिए पहले गीत सुनिए, फिर बात आगे बढ़ाते हैं।

गीत - गोलमाल गोलमाल


सजीव - के.के., अनूष्का मनचन्दा और मोनाली ठाकुर की आवाज़ों में इस हाइ-एनर्जी गीत में यकीनन वही "गोलमाल" का ठप्पा है। विशाल-शेखर के जगह पर अब प्रीतम आ गए हैं। 'गोलमाल' की कहानी और चरित्रों को ध्यान में रखते हुए थिरकन भरे इस गीत में गायकों द्वारा जिस तरह की अदायगी की ज़रूरत थी, वो सब कुछ मौजूद है। यह ऐसा गीत है जो लोगों की ज़ुबान पर तो नहीं चढ़ सकते, क्योंकि यह पूरी तरह से सिचुएशनल गीत है जिसका महत्व केवल फ़िल्म के पर्दे पर ही रहेगा।

सुजॊय - ऒरिजिनल 'गोलमाल' के शीर्षक गीत "गोलमाल गोलमाल एवरीथिंग् गॊन्ना बी गोलमाल" में जो बात थी, वह बात इस गीत में नज़र नहीं आई। और शायद यही बत फ़िल्म के निर्माता निर्देशक ने भी महसूस की होगी, तभी तो उस गीत का टैग लाइन इस गीत में डाल दिया गया। ख़ैर, आइए दूसरा गीत सुनते हैं, जिसे गाया है शान और अनूष्खा मनचन्दा ने। "अपना हर दिन ऐसे जीयो जैसे कि आख़िरी हो" एक आशावादी और जीवन से भरपूर गीत है जिसे सुनकर एक पॊज़िटिव फ़ील होने लगेगी। आइए सुन लेते हैं....

गीत - अपना हर दिन


सजीव - "ये ज़िंदगी रफ़्तार से चल पड़ी, जाते हुए राहों में हमसे अभी कहके गई, हमारा ये वक़्त हमारा, जो एक बार गया तो आये ना दुबारा, समझ लो ज़रा ये हवाओं का इशारा....", इस भाव पर पहले भी कई गीत बन चुके हैं, जैसे कि "कल क्या होगा किसको पता, अभी ज़िंदगी का ले लो मज़ा"। इस गीत का भी मूड बिल्कुल ऐसा ही है और कम्पोज़िशन में भी कुछ कुछ उस ७० के दशक का फ़ील है। कुमार के फ़िलोसोफ़िक शब्दों को प्रीतम ने अच्छी धुन दी है।

सुजॊय - अगर इस गीत के रीदम और संगीत संयोजन को आप ध्यान से सुनें तो इसमें आपको कुछ कुछ 'भागमभाग' फ़िल्म के "सिगनल" गीत की झलक मिलेगी। और 'दे दना दन' के "बामुलाइज़ा" से भी कुछ कुछ मिलता जुलता है। कुल मिलाकर यह ख़ुशनुमा, ज़िंदगी से लचरेज़ गीत।

सजीव - तीसरा गीत है नीरज श्रीधर और अंतरा मोइत्रा की आवाज़ों में, "आले, अब जो भी हो, हो जाने दो"। एक क्लब मूड भड़का देने वाला यह गीत है, सुनते हैं....

गीत - आले


सुजॊय - प्रीतम के संगीत की खासियत ही यह है कि जिस तरह की कहानी और फ़िल्म का पार्श्व हो, उसके साथ पूरा पूरा न्यय करते हुए गाने कम्पोज़ करते हैं। हर तरह के गानें बड़ी सहजता से बना लेते हैं। 'गोलमाल-३' एक मस्ती, मज़ाक और हास्य रस की फ़िल्म है, इसलिए इस फ़िल्म के गीतों से बहुत ज़्यादा क्लास की उम्मीद रखना उचित नहीं है। जिस तरह की फ़िल्म है, उसी तरह का संगीत है, और इसे हल्के फुल्के अंदाज़ में ही हमें गले लगानी चाहिए।

सजीव - यह जो "आले" शब्द है, वह 'यूरोपॊप' जौनर का है, जिसे यूरोपीयन क्लब पॊप म्युज़िक में ख़ूब सुनाई देता है।

सुजॊय - और यूरोपीयन फ़ूटबॊल कार्निवल में भी उतना ही सुनाई पड़ता है। यूरोपीयन पॊप संगीत में रुचि रखने वाले लोगों को यह गीत ख़ास पसंद आयेगा, जिन्हें "ऐकुआ" और "पेट शॊप बॊय्ज़" ग्रूप्स के गीत पसंद हैं।

सजीव - और फिर इस गीत में 'तुम मिले' फ़िल्म के शीर्षक गीत के धुन की भी छाया मिलती है, "तुम मिले तो मिल गया ये जहाँ...."

सुजॊय - बिल्कुल! चलिए आगे बढ़ा जाए और सुनें फ़िल्म का चौथा गीत "देसी कली", सुनिधि चौहान और नीरज श्रीधर की आवाज़ों में।

गीत - देसी कली


सजीव - प्रियंका चोपड़ा के "देसी गर्ल" के बाद अब करीना कपूर बनी है "देसी कली"। "देसी गर्ल" की तरह "देसी कली" में भी वह बात है जो इसे दूर तक ले जाएगी। इस ऐल्बम में अब तक जितने भी गानें हमने सुनें हैं, शायद यही सब से उपर है। बाकी तीन गीतों की तरह यह भी सिचुएशनल सॊंग् है, लेकिन अलग सुनते हुए भी अच्छा लगता है। वैसे ये गीत फिल्म से नदारद है.

सुजॊय - इस ऐल्बम में बप्पी लाहिड़ी की 'डिस्को डान्सर' फ़िल्म के दो गीतों का रिवाइव्ड वर्ज़न भी मौजूद हैं। क्योंकि इस फ़िल्म में मिथुन चक्रवर्ती ने एक मुख्य भूमिका निभाई है, इसलिए यह बहुत ज़्यादा ताज्जुब की बात नही कि इस ऐल्बम में 'ये दो गीत शामिल किए गए हैं। एक तो है बप्पी दा की ही आवाज़ में "आइ ऐम ए डिस्को डान्सर", और दूसरा गीत है "याद आ रहा है तेरा प्यार", जिसे इस ऐल्बम के लिए सूदेश भोसले ने गाया है। इन गीतों के ऒरिजिनल वर्ज़नों को सुनने के बाद अब ऐसे वर्ज़नों की ज़रूरत नहीं पड़ती, इसलिए इन गीतों को हम यहाँ शामिल नहीं कर रहे हैं। सजीव जी, 'गोलमाल-३' फ़िल्म तो मैंने नहीं देखी, लेकिन क्योंकि आपने यह फ़िल्म दीवाली पर देखी है, तो आप ही बताइए कि आपके क्या विचार हैं फ़िल्म के बारे में भी, और इस साउण्डट्रैक के बारे में भी?

सजीव - हाँ सुजॉय मैंने ये फिल्म सपरिवार देखी. फिल्म के लिए पहले से ही मूड सेट था कि सिर्फ हँसना हँसाना और कुछ नहीं. अगर आप भी फिल्म की तकनिकी बारीकियों को दरकिनार रख सिर्फ मस्ती के उद्देश्य से इसे देखेंगें तो भरपूर आनंद उठा पायेंगें. यूँ भी इस फिल्म के पहले दो संस्करण काफी अच्छे रहे हैं, और ये तीसरा अंक भी कुछ कम नहीं है. फिल्म पैसा वसूल है टाईम पास है.

सुजॊय - चलिए अब बढ़ते हैं आज की दूसरी फ़िल्म 'दस तोला' की तरफ़। गीतकार गुलज़ार और संगीतकार संदेश शांडिल्य का अनोखा कम्बिनेशन में इस फ़िल्म के गानें भी भीड़ से थोड़े अलग सुनाई देते हैं। २२ अक्टुबर को यह फ़िल्म रिलीज़ हो चुकी है 'आर्यन ब्रदर्स एण्टरटेण्मेण्ट' के बैनर तले। अजय निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं मनोज बाजपयी, आरति छाबड़िया, दिलीप प्रभावलकर, सिद्धार्थ मक्कर, गोविंद नामदेव, असरानी, निनाद कामत, भरती आचरेकर आदि। तो चलिए फ़िल्म का पहला गाना सुना जाए मोहित चौहान की आवाज़ में।

गीत - ऐसा होता था


सजीव - इस गीत की ख़ास बात मुझे यह लगी कि मोहित चौहान और संदेश शांडिल्य, दोनों ही थोड़े से ठहराव भरे गीतों के लिए जाने जाते हैं। ऐसे में यह गीत तेज़ रफ़्तार वाला है। वैसे रिदम कैची है और सुनने में अच्छा लग रहा है। लोक धुनों की थापें और साथ में परक्युशन, अच्छा समन्वय, और जहाँ पर गुलज़ार साहब की कलम चलती हैं, वहाँ कुछ और कहने की गुंजाइश ख़त्म हो जाती है। चलिए अब दूसरे गीत की तरफ़ बढ़ा जाए।

सुजॊय - दूसरा गाना है सुखविंदर सिंह की आवाज़ में। इस गीत के बोलों में गुलज़ार साहब का ख़ास पसंदीदा अंदाज़ सुनाई देता है। मेरा इशारा चिनार के पत्तों की तरफ़ है। गुलज़ार साहब इस गीत में लिखते हैं, "लाल लाल लाल हुआ पत्ता चिनार का, माटी कुम्हार की, सोना सुन्हार का, गिन गिन गिन दिन इंतज़ार का..."। धुन और रिदम कुछ कुछ सुना सुना सा ज़रूर लग रहा है, लेकिन एक बार फिर वही बात, कि जहाँ गुलज़ार साहब की लेखनी हो, वहाँ हर कमी पूरी हो जाती है। सुनते हैं यह गीत...

गीत - लाल लाल लाल हुआ पत्ता चिनार का


सजीव - सही में, इस गीत में 'माचिस' के संगीत की ख़ुशबू जैसे कहीं आ कर चली गई। "चप्पा चप्पा चरखा चले" की भी याद आ ही गई। अगले गीत में आवाज़ है सोनू निगम की। इस बार यह एक स्लो नंबर है, "तुम बोलो ना बोलो", एक नर्मो-नाज़ुक गीत और ऐसे गीतों के साथ सोनू की कशिश भरी आवाज़ बहुत न्याय करती है।

सुजॊय - सोनू के साथ कोरस का इस्तेमाल भी ख़ूबसूरती के साथ किया गया है। गुलज़ार साहब के बोलों को थोड़ा लिखने का मन कर रहा है यहाँ, "मेरी आदत में नहीं है कोई रिश्ता तोड़ देना, मेरे शायर ने कहा था मोड़ देकर छोड़ देना, अजनबी फिर अजनबी है, गहने बहुत पहनोगी, याद का ज़ेवर नया है, दर्द जो घुलते नहीं है, रंग वो धुलते नहीं है, सारे गिले बाक़ी रहे, मगर याद है, तुम बोलो ना बोलो..."। इसमें देखिए "मोड़ देकर छोड़ देने" की जो बात गुलज़ार साहब ने शायर के माध्यम से कहा है, आपको याद होगा कि महेन्दर कपूर के गाये साहिर साहब के लिखे "चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों" गीत में उन्होंने लिखा था "वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना ना हो मुमकिन, उसे एक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा"। तो आइए सुनते है सोनू निगम की आवाज़ में यह गीत...

गीत - तुम बोलो ना बोलो


सजीव - और अब फ़िल्म का अंतिम गीत। इस गीत के दो वर्ज़न हैं, एक सुखविंदर सिंह की आवाज़ में और दूसरा सुनिधि चौहान का गाया हुआ। और क्योंकि हमने सुखविंदर सिंह की आवाज़ अभी अभी सुनी है, तो क्यों ना सुनिधि की आवाज़ इस गीत में सुन ली जाए! गीत है "जी ना जल‍इयो"। सुनिधि की अपनी ख़ास गायकी इसमें झलकती है। लोक और शास्त्रीय संगीत के पुट लेकर यह गीत शुरु होती है, लेकिन रिदम पाश्चात्य है। इस तरह से एक फ़्युज़न वाला गाना है यह।

सुजॊय - सजीव जी, मैंने इस गीत का प्रोमो 'चित्रलोक' कार्यक्रम में कई दिनों तक सुना है, पता नहीं मुझे क्यों ऐसा लगता है कि अगर इसमें फ़्युज़न के बजाय शास्त्रीय और लोक संगीत के शुद्ध रूप को रखा जाता तो गाना ज़्यादा दिल को छूता। पाश्चात्य रिदम की वजह से जैसे गीत में फ़ील कम हो गया है। वैसे यह मेरा व्यक्तिगत राय ही है। चलिए हमारे सुनने वालों को भी इसे सुनने का मौका देते हैं और देखते हैं कि उनके क्या विचार हैं।

गीत - जी ना जल‍इयो रे


सुजॊय - 'दस तोला' कम बजट की फ़िल्म हो सकती है, लेकिन इसका संगीत उदासीन नहीं है। मेरा पसंदीदा गीत "लाल लाल लाल हुआ पत्ता चिनार का" है। और अब सजीव जी, आप अपनी राय बताएँ और आज की प्रस्तुति को सम्पन्न करें।

सजीव - बिलकुल सुजॉय, वैसे तो फिल्म के चारों गीत खासकर लाल लाल लाल हुआ और तुम बोलो न बोलो मुझे बहुत अच्छे लगे, पर उनके अच्छे लगने की वजह गुलज़ार साहब का खास अंदाज़ ही है. दरअसल उनके शब्दों को सुरों से पिरोना बेहद कठिन काम है. आर डी और अब विशाल इसे भली भांति समझते हैं. सन्देश ने बहुत अच्छी कोशिश की है, मगर गीतों में लोकप्रियता का पुट धुनों में जरा कम झलकता है. फिर भी औसत से ऊपर तो हैं ही फिल्म के गीत.

Tuesday, August 24, 2010

दिल खोल के लेट्स रॉक....करण जौहर लाये हैं एक बार फिर "फैमिली" में शंकर एहसान लॉय के संगीत का तड़का

ताज़ा सुर ताल ३२/२०१०

सुजॊय - नमस्कार! आप सभी को रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनएँ और विश्व दीपक जी, आपको भी।

विश्व दीपक - सभी श्रोताओं व पाठकों और सुजॉय, तुम्हे भी मेरी ओर से ढेरों शुभकमानाएँ! सुजॉय, रक्षाबंधन भाई बहन के प्यार का पर्व है। इस दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधते हुए उसके सुरक्षा की कामना करती है और भाई भी अपनी बहन को ख़ुश रखने और उसकी रक्षा करने का प्रण लेता है। कुल मिलाकर पारिवारिक सौहार्द का यह त्योहार है।

सुजॉय - जी हाँ, यह एक पारिवारिक त्योहार है और आपने परिवार, यानी फ़ैमिली का ज़िक्र छेड़ा तो मुझे याद आया कि पिछले हफ़्ते हमने वादा किया था कि इस हफ़्ते हम 'टी.एस.टी' में 'वी आर फ़ैमिली' के गानें सुनवाएँगे। तो लीजिए, रक्षाबंधन पर आप सभी अपने फ़मिली के साथ आनंद लीजिए इसी फ़िल्म के गानों का। आज छुट्टी का दिन है, आप सब के फ़ैमिली मेम्बर्स घर पर ही मौजूद होंगे, तो राखी पर्व की ख़ुशियाँ मनाइए 'वी आर फैमिली' के गीतों को सुनते हुए।

विश्व दीपक - इससे पहले की फ़िल्म का पहला गाना सुनें, मैं यह बता दूँ कि यह धर्मा प्रोडक्शन्स यानी कि करण जोहर की निर्मित फ़िल्म है, जिसका निर्देशन किया है सिद्धार्थ पी. मल्होत्रा ने। फ़िल्म में संगीत भी करण जोहर के पसंदीदा संगीतकार तिकड़ी शंकर-अहसान-लॉय ने दिया है तथा गानें इसमें लिखे हैं इरशाद कामिल और अन्विता दत्तगुप्तन ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं काजोल, करीना कपूर, अर्जुन रामपाल, आँचल मुन्जल, नोमिनाथ जिन्स्बर्ग और दीया सोनेचा। आइए सुनते हैं फ़िल्म का पहला गीत राहत फ़तेह अली ख़ान, श्रेया घोषाल और शंकर महादेवन की आवाज़ों में।

गीत - आँखों में नींदें


सुजॉय - सुरीला गाना है, शंकर-अहसान-लॉय का स्टाइल साफ़ झलकता है, बीट्स भी उनके पिछले करण जोहर की फ़िल्मों के गीतों की तरह है। श्रेया और राहत साहब के जो शास्त्रीय शैली में आलाप गाए हैं, उससे गीत को एक अलग मुकाम मिला है। श्रेया और राहत साहब के गाए "तेरी ओर" गीत की तरह यह गीत भी बहुत सुरीला है और इसे भी ख़ूब सुना जाएगा ऐसा मेरा विश्वास है।

विश्व दीपक - और गीतकार की बात करें तो इरशाद कामिल ने प्रीतम के साथ ही सब से ज़्यादा काम किया है। पहली बार शंकर-अहसान-लॉय के लिए उन्होंने गीत लिखा है इस फ़िल्म में। आपने बीट्स की बात की तो मुझे भी फ़ील हुआ कि इस तिकड़ी ने यही बीट्स 'कल हो ना हो' फ़िल्म के "कुछ तो हुआ है"। चलिए अब आगे बढ़ा जाए, और सुना जाए इस फ़िल्म का शायद सब से चर्चित गीत जिसे फ़िल्म के प्रोमोज़ में ख़ूब दिखाया और बजाया गया है। एल्विस प्रेस्ली के मशहूर रॉक सॉन्ग "जेल-हाउस रॉक" से इन्स्पायर्ड यह गीत है "दिल खोल के लेट्स रॉक", सुनते हैं...

गीत -दिल खोल के लेट्स रॉक


सुजॉय - सुनने में आया है कि एल्विस प्रेस्ली की इस धुन का इस्तेमाल करने से पहले इसकी अनुमति ली गई है। फ़िल्म में यह गीत काजोल, करीना और अर्जुन पर फ़िल्माया गया है और आवाज़ें हैं अनुष्का मनचन्दा, आकृति कक्कर और सूरज जगन की। शंकर-अहसान-लॉय ने एल्विस के कॉम्पोज़िशन और अरेंजमेण्ट के साथ भी छेड़-छाड़ नहीं किया है और ्जैसा कि हमने बताया कि इसकी अनुमति ली गई है, तो एक तरह से इसे एल्विस के गीत का official adaptation भी कह सकते हैं।

विश्व दीपक - इस गीत को लिखा है अन्विता दत्तगुप्तन ने जो आज के दौर की सक्रीय गीतकार बनती जा रही हैं। उन्होंने बस यही गीत इस फ़िल्म में लिखा है। "मुझे नहीं पता मैं क्या गाउँगी, उल्टे सीधे लफ़्ज़ों से बनाउँगी", "मैं तो भूल गई फिर क्या वर्डिंग्स थे" जै्सी लाइनों की कल्पना शायद दस साल पहले भी फ़िल्मी गीतों में नहीं की जा सकती थी। इसमें कोई शक़ नहीं धीरे धीरे फ़िल्मों की कहानियाँ और गानें हक़ीक़त की ज़िंदगी के ज़्यादा करीब आती जा रही हैं।

सुजॉय - वैसे तो जैसा कि आपने कहा कि एल्विस का ही अरेंजमेण्ट बरकरार है, बस दूसरे इंटरल्युड में कुछ देसी ठेकों का भी मज़ा लिया जा सकता है। कुल मिलाकर सिचुएशनल गीत है, लेकिन इसे अलग सुनते हुए भी ख़ूब मज़ा आता है। यह गीत भी मेरे ख़याल से लम्बे समय तक पसंद किया जाएगा। और अब फ़िल्म का तीसरा गीत जो पिछले गीत के मुकाबले बिलकुल ही अलग हट कर है, आइए पहले सुन लेते हैं।
गीत - रहम-ओ-करम


विश्व दीपक - "रहम-ओ-करम" शंकर महादेवन और विशाल दादलानी की आवाज़ों में था और इसे सुनते हुए 'माइ नेम इज़ ख़ान' के "नूर-ए-ख़ुदा" की याद आ ही जाती है जिसे शंकर महादेवन के साथ अदनान सामी और श्रेया घोषाल ने गाया था। "रहम-ओ-करम" दरसल एक फ़्युज़न है, एक तरफ़ सूफ़ी रंग भी है और संगीत में सॉफ्ट रॉक अपील भी। शंकर और विशाल ने एक प्रार्थना की तरह इस गीत को गाया है और कोरस का इस्तेमाल भी सुंदर तरीके से किया गया है।

सुजॉय - जब कोरस "रहम-ओ-करम" गाते हैं, तो ज़रा सी "तेरी है ज़मीं तेरा आसमाँ" की भी शायद एक हल्की सी झलक मिल जाती है। शायद वजह है चर्च में कॊयर की जो गायन शैली होती है, उस तरह की गायकी इन दोनों में प्रयोग हुआ है। ईलेक्ट्रिक गीटार और परक्युशन्स का इस्तेमाल इस गीत के अरेंजमेण्ट की विशेषताएँ हैं। अब अगले गीत की तरफ़ बढ़ा जाए, सोनू निगम और श्रेया घोषाल की आवाज़ें इस हफ़्ते भी जारी है, एक और नर्मो-नाज़ुक रोमांटिक डुएट। सुनिए...

गीत - हमेशा ऐण्ड फ़ॉरेवर दिल में तू


विश्व दीपक - सुजॉय, आपने अभी कुछ देर पहले चर्च-कॉयर की बात की थी, तो इस गीत में भी कोरल का जिस तरह से इस्तेमाल किया गया है, वह भी उसी अंदाज़ का है। पियानो का बड़ा ही सुरीला इस्तेमाल पूरे गीत में होता है। यह भी एक सॊफ़्ट रॊक नंबर है और सोनू और श्रेया की आवाज़ों ने गीत के साथ पूरा पूरा न्याय किया है। यह गीत भले चार्ट-बस्टर ना साबित हो, लेकिन इस तरह के गानों के क़द्रदानों की भी कोई कमी नहीं है, और अच्छे संगीत के क़द्रदान इस गीत को हाथों-हाथ ग्रहण करेंगे, ऐसी उम्मीद हम रखते हैं।

सुजॉय - "हमेशा ऐण्ड फ़ॉरएवर" की धुन को ही जारी रखते हुए शंकर-अहसान-लॉय ने बनाया है एक और ऐसा ही सॉफ़्ट नंबर "सुन ले दुआ ये आसमान", जिसे बेला शेण्डे ने गाया है। यह पिछले गीत से भी ज़्यादा धीमा है, और जो शायद करण जोहर स्टाइल के जज़्बाती थीम म्युज़िक की श्रेणी में स्थान रखता है। चलिए यह गीत भी सुन लिया जाए और फिर उसके बाद हम इस पूरे ऐल्बम के बारे में अपनी राय बताएँगे।

गीत - सुन ले दुआ ये आसमान


सुजॉय - तो फ़िल्म के सभी ५ गानें हमने सुनें। हर गीत को अलग अलग सुना जाए तो सभी गानें अच्छे हैम इसमें कोई शक़ नहीं, लेकिन जो गानें मुझे ख़ास पसंद आए, वो हैं "आँखों में नींदें" और "रहम-ओ-करम"। 'वी आर फ़ैमिली' ऐल्बम को 'अबव ऐवरेज' ही माना जाना चाहिए, सभी गानें सिचुएशनल है या थीम बेस्ड हैं, और फ़िल्म की कामयाबी पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। फ़िल्म चल पड़ी तो इन गीतों भी बढ़ावा मिलेगा। तो मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ३.५ की रेटिंग, और आप सभी को यही कहेंगे कि आज इस ख़ुशी के अवसर पर, यानी रक्षाबंधन पर दिल खोल के लेट्स रॉक!!!

विश्व दीपक - वैसे कोई भी गीत ऐसा नहीं है जिसके बारे में कहा जा सके कि धूम मचा देंगें, पर सभी गीत सुरीले और सोलफुल अवश्य हैं. फिल्म में काजोल है तो एक जबरदस्त अभिनय की उनसे उम्मीद रहेगी. आपने सही कहा गारा फिल्म दर्शकों के मन छू पाए तो इसके संगीत भी चल निकलेगा....

आवाज़ रेटिंग्स: वी आर फैमिली: ***

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ९४- अन्विता दत्तगुप्तन का लिखा वव कौन सा गीत है जिसे गा कर शिल्पा राव को पुरस्कार मिला था?

TST ट्रिविया # ९५- एल्विस प्रेस्ली के "जेल-हाउस रॉक" गीत को Rolling Stone's List of The 500 Greatest Songs of All Time में कौन सा स्थान मिला है?

TST ट्रिविया # ९६- करण-जोहर और शंकर-अहसान-लॉय के अलावा 'कल हो ना हो' और 'वी आर फ़मिली' के संगीत में और क्या समानता आप ढूँढ़ सकते हैं?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछले हफ़्ते के सवालों के जवाब:

१. ज़ी सा रे गा मा
२. "छोटी छोटी रातें लम्बी हो जाती हैं" (तुम बिन)
३. दोनों में राहत फ़तेह अली ख़ान - श्रेया घोषाल तथा सोनू निगम - श्रेया घोषाल के गाए युगल गीत हैं।

एक बार फिर सीमा जी २ सही जवाबों के साथ हाज़िर हुई, बधाई

Tuesday, July 6, 2010

मुंबई है एक बार फिर फिल्म का विषय, और गैंगस्टरों की मारधाड के बीच भी है संगीत में मधुरता

ताज़ा सुर ताल २५/२०१०

सुजॊय - सजीव, बहुत दिनों के बाद आप से इस 'टी.एस.टी' के स्तंभ में मुलाक़ात हो रही है। और बताइए, हाल में आपने कौन कौन सी नई फ़िल्में देखीं और आपके क्या विचार हैं उनके बारे में?

सजीव - सुजॉय मैंने "काईट्स", "रावण" और "राजनीति" देखी. रावण और राजनीति मुझे पैसा वसूल लगी तो काईट्स उबाऊ. रावण बेशक चली नहीं पर जहाँ तक मेरा सवाल है मैं फिल्मों को सिर्फ कहानी के लिए नहीं देखता हूँ, मैं जिस मणि का कायल हूँ निर्देशन के लिए वही मणि "युवा" और "दिल से" के बाद मुझे यहाँ दिखे....जबरदस्त संगीत और छायाकारी है फिल्म की. राजनीति भी रणबीर और कंपनी के शानदार अभिनय के लिए देखी जा सकती है, बस मुझे कर्ण के पास कुंती के जाने वाला एपिसोड निरर्थक लगा, नाना पाटेकर हमेशा की तरह....सोलिड....खैर छोडो ये सब....आज का मेनू बताओ...

सुजॊय - जैसे कि इस साल का सातवाँ महीना शुरु हो गया है, तो ऐसे में अगर हम पिछले ६ महीनों की तरफ़ अपनी नज़र घुमाएँ, तो आपको क्या लगता है कौन कौन से गीत उपरी पायदानों पर चल रहे हैं इस साल? मेरे सीलेक्शन कुछ इस तरह के हैं - सर्वर्श्रेष्ठ गीत - "दिल तो बच्चा है जी" (इश्क़िया), सर्वश्रेष्ठ गायक - के.के ("ज़िंदगी दो पल की" - काइट्स), सर्वश्रेष्ठ गायिका - रेखा भारद्वाज ("कान्हा" - वीर), सर्वश्रेष्ठ गीतकार - गुलज़ार ("दिल तो बच्चा है जी" - इश्क़िया), सर्वश्रेष्ठ संगीतकार - उस्ताद शुजात हुसैन ख़ान (मिस्टर सिंह ऐण्ड मिसेस मेहरा)।

सजीव - अरे वाह सुजॉय, बिलकुल यही सूची मेरी भी है, बस श्रेष्ठ गायिका के लिए मेरा नामांकन रिचा शर्मा के लिए होगा, "फ़रियाद है शिकायत है" गाने के लिए....बहुत ही अच्छा गाया गया है ये.

सुजॊय - सजीव, अभी पिछले ही हफ़्ते मैं विश्व दीपक जी को बता रहा था कि आजकल समानांतर सिनेमा और व्यावसायिक सिनेमा के बीच की दूरी बहुत कम सी हो गई है। आजकल पारम्परिक फ़ॊरमुला फ़िल्में बहुत कम ही बन रही है और फ़िल्मकार नए नए और विविध विषयों पर फ़िल्में बना रहे हैं।

सजीव - बिलकुल सही बात है, पश्चिमी सिनेमा की तरह हमारे देश में भी अब फ़ॊरमुला से हट के फ़िल्में आ रही हैं, जिसके लिए इस पीढ़ी के फ़िल्म निर्माताओं को दाद देनी ही पड़ेगी। तो बताओ कि आज हम किस फ़िल्म के गानें सुनने जा रहे हैं?

सुजॊय - आज हम लेकर आए हैं फ़िल्म 'वन्स अपॊन अ टाइम इन मुंबई' के गीतों को। जैसा कि सुनने में आया है कि यह फ़िल्म रजत अरोड़ा की लिखी कहानी है जो ७० के दशक की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसलिए ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म का संगीत भी उसी दौर के मुताबिक़ होनी चाहिए।

सजीव - संगीतकार प्रीतम को इस फ़िल्म के संगीत का ज़िम्मा सौंपा गया था और अब देखना यह है कि उन्होने कितना न्याय किया है फ़िल्म की ज़रूरत के हिसाब से। बातचीत आगे बढ़ाने से पहले सुन लेते हैं फ़िल्म का पहला गीत मोहित चौहान की आवाज़ में। गीत लिखा है इरशाद कामिल ने।

गीत:पी लूँ होठों की सरगम


सुजॊय - यह गीत आजकल ख़ूब बज रहा है एफ़.एम चैनल्स पर। और सुनते सुनते गीत जैसे ज़हन में चढ़ सा गया है इन दिनों। मोहित की आवाज़ में यह रोमांटिक गीत सुनने में अच्छा लगता है। कोरस का इस्तेमाल सूफ़ी और क़व्वाली के अंदाज़ में किया गया है। प्रीतम धीरे धीरे ऐसे संगीतकार बनते जा रहे हैं जिनके गीतों से कुछ ना कुछ उम्मीदें हम ज़रूर रख सकते हैं, और वो निराश नहीं करते। उनके गीतों की लोकप्रियता का मुझे सब से बड़ा कारण यह लगता है कि वो अपनी धुनों में मेलोडी भी बरक़रार रखते हैं और आज की पीढ़ी को पसंद आने वाली मॊडर्ण अंदाज़ भी मिलाते हैं।

सजीव - और दूसरा गीत भी क़व्वाली शैली का ही है जिसे राहत फ़तेह अली ख़ान, तुल्सी कुमार और साथियों ने गाया है। गीत इरशाद कामिल का ही है। इसमें भी वही रूमानीयत भरा अंदाज़, जो पहले गीत के मुक़ाबले और परवान चढ़ती है।

सुजॊय - इस गीत को सुनने से पहले हम बता दें कि 'वन्स अपॊन अ टाइम इन मुंबई' एकता कपूर - शोभा कपूर की फ़िल्म है जिसे निर्देशित किया है मिलन लुथरिया ने। फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं अजय देवगन, ईमरान हाशमी, कंगना रनौत, प्राची देसाई, और रणदीप हूडा। क्योंकि यह फ़िल्म दो पीढ़ी के दो गैंगस्टर की कहानी है, इसमें अजय का नाम है हाजी मस्तान, और ईमरान हाशमी का नाम है दावूद इब्राहिम। और अब सुनिए यह गीत।

गीत: तुम जो आए


सजीव - इस रोमांटिक समा को और भी ज़्यादा पुख़्ता बनाता हुआ अब आ रहा है फ़िल्म का तीसरा गीत "आइ एम इन लव" कार्तिक की आवाज़ में। यह वही कार्तिक हैं जिनकी आवाज़ का इस्तेमाल ए. आर. रहमान भी कर चुके हैं। ख़ैर, इस गीत को लिखा है नीलेश मिश्रा ने। सुना है इस गीत के दो और वर्ज़न हैं, एक के.के. की आवाज़ में और दूसरा एक डान्स वर्ज़न है।

सुजॊय - कार्तिक की आवाज़ में प्लेबैक वाली बात है, अच्छी आवाज़ है लेकिन पता नहीं क्यों उनके गानें ज़्यादा नहीं आते। अगर उनका ट्रैक रिकार्ड देखा जाए तो उन्होने कई हिट गीत गाए हैं जैसे कि फ़िल्म 'गजनी' का "बहका मैं बहका", फ़िल्म 'युवराज' का "शन्नो शन्नो", '१३-बी' का "बड़े से शहर में", 'दिल्ली-६' का "हे काला बंदर" और अभी हाल ही में फ़िल्म 'रावण' में उनका गाया "बहने दे मुझे बहने दे" ख़ूब पसंद किया जा रहा है।

सजीव - दरअसल कार्तिक दक्षिण में आज के दौर अग्रणी गायकों में से एक हैं। भले ही उनके हिंदी गानें ज़्यादा नहीं आए हैं, लेकिन दक्षिण में उनके गानें बेशुमार आ रहे हैं। तो चलो फिर कार्तिक की आवाज़ में यह गीत सुन लेते हैं।

गीत: आइ एम इन लव


सुजॊय - वाह! अच्छी मेलोडी थी इस गाने में। शुरुआती संगीत में पियानो जैसे नोट्स एक मूड बना देता है, और उसके बाद कार्तिक की सूदिंग् आवाज़ में ये नर्मोनाज़ुक बोल, क्या बात है! फिर से वही बात दोहराउँगा कि प्रीतम मेलोडी को बरकरार रखते हुए जो आज की यूथ अपील डालते हैम अपने गानों में, वही बात उनके गीतों को मक़बूल कर देती है। वैसे सजीव, इस गीत को सुनते हुए मुझे के.के. की आवाज़ की भी याद आ रही थी। ऐसा लग रहा था कि जैसे यह के.के टाइप का गीत है।

सजीव - शायद तभी के.के. की आवाज़ में भी यह गीत साउंड ट्रैक में रखा गया है। इस वर्ज़न को हम आज यहाँ तो नहीं सुनेंगे लेकिन उम्मीद है के.के ने भी बढ़िया ही निभाया होगा इस गीत को। चलो अब आगे बढ़ते हैं और एक बिलकुल ही अलग अंदाज़ का गीत सुनते हैं। यह दरअसल एक रीमिक्स नंबर है। ७० के दशक के दो ज़रबरदस्त राहुल देब बर्मन हिट्स "दुनिया में लोगों को" और "मोनिका ओ माइ डारलिंग" को मिलाकर इस गीत का आधार तैयार किया गया है और उसमें नए बोल डाले गए हैं "परदा परदा अपनों से कैसा परदा"।

गीत: परदा परदा


सुजॊय - हम्म्म्म.... वैसे कोई नई चीज़ तो नहीं, लेकिन एक तरह से ट्रिब्यूट सॊंग् माना जा सकता है उस पूरे दशक के नाम। सुनिधि चौहान इस तरह के गीतों को तो ख़ूब अंजाम देती है ही है, लेकिन आर. डी. बर्मन जैसी आवाज़ निकालने वाले गायक राना मजुमदार को भी दाद देनी ही पड़ेगी। सुनिधि गीत में "वो आ गया, देखो वो आ गया" जिस तरह से गाती हैं, हमें यकायक आशा जी वाली अंदाज़ याद आ जाती है।

सजीव - और अब अंतिम गीत अमिताभ भट्टाचार्य की कलम से। मिका की आवाज़ में है यह गीत "बाबूराव मस्त है", जो बाबू राव की शख़सीयत बताता है। शरारती अंदाज़ में लिखा हुआ यह एक तरह से हास्य गीत है।

सुजॊय - इस गीत को ध्यान से सुनिएगा क्योंकि इस गीत की ख़ासीयत ही है इसके बोल। मामला मस्त है!!!!

गीत: बाबूराव


"वंस अपोन अ टाइम इन मुंबई" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***१/२

सुजॊय - हाँ तो क्या ख़याल है सजीव? शुरु में हमने कहा था कि फ़िल्म ७० के दशक की कहानी है। तो क्या संगीत में उसकी छाप नज़र आई? भई, मेरा ख़याल तो यही है कि गानें अच्छे हैं लेकिन ७० के दशक का स्टाइल तो सिवाय "परदा परदा" के किसी और गीत में नज़र नहीं आया। "पी लूँ" और "आइ एम इन लव" मेरे पसंदीदा गानें हैं इस फ़िल्म के। और मेरी तरफ़ से इस ऐल्बम को ३.५ की रेटिंग्।

सजीव - सहमत हूँ आपसे एक बार फिर, बढ़िया गाने हैं....पी लूं अपने फिल्मांकन के लिए चर्चित होगा, और भीगे होंठ तेरे जैसा एक हिट गीत साबित होगा आने वाले दिनों में. पर्दा भी सुनने में कम और देखने में ज्यादा अच्छा होगा ऐसी उम्मीद है, "आई ऍम इन लव" और "तुम आये" मुझे बेहद अच्छे लगे...बाबु राव भी मस्त है :)

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ७३- गायक कार्तिक ने सन् २००२ में आशा भोसले के साथ एक गीत गाया था। बताइए फ़िल्म का नाम और गीत के बोल।

TST ट्रिविया # ७४- 'वन्स अपॊन अ टाइम इन मुंबई', 'ये दिल आशिक़ाना' तथा 'धड़कन' फ़िल्मों में एक गीत ऐसा है जिनमें कम से कम एक समानता है। बताइए क्या समानता है।

TST ट्रिविया # ७५- ईमरान हाशमी अभिनीत वह कौन सी फ़िल्म है जिसमें के.के की आवाज़ में एक बेहद मक़बूल गीत आया था जिसके एक अंतरे में पंक्ति है "कैसे कटे ज़िंदगी मायूसियाँ बेबसी"।


TST ट्रिविया में अब तक -
कमाल है, क्या सवाल बहुत मुश्किल हैं, या फिर हमारे श्रोताओं ने नए संगीत को सुनना छोड़ दिया है....सीमा जी आपकी कमी खल रही है

Monday, April 12, 2010

राजेश रोशन के सुरों की डोर पर संगीत का आसमां छूती "काईट्स"

ताज़ा सुर ताल १५/२०१०

सुजॊय- सजीव, कुछ निर्देशक और अभिनेता ऐसे हैं जिनकी फ़िल्मों का लोग बेसबरी से इंतज़ार करते हैं। ये कलाकार ना केवल बहुत कम फ़िल्में बनाते हैं, बल्कि हर फ़िल्म में कुछ नया इस फ़िल्म जगत को देते हैं। राकेश रोशन और उनके सुपुत्र हृतिक रोशन के फ़िल्मों का जो कारवाँ 'कहो ना प्यार है' की ज़बरदस्त कामयाबी से शुरु हुआ था, वह कारवाँ उसी कामयाबी की राह पर आगे बढ़ता हुआ, 'कोई मिल गया' और 'क्रिश' जैसी ब्लॊकबस्टर फ़िल्मों के पड़ाव से गुज़र कर अब एक और महत्वपूर्ण पड़ाव की ओर अग्रसर हो रहा है, जिस पड़ाव का नाम है 'काइट्स'।

सजीव - 'काइट्स' की चर्चा काफ़ी समय से हो रही है और इस फ़िल्म से लोगों को बहुत सी उम्मीदें हैं। लेकिन इस फ़िल्म को राकेश रोशन ने ज़रूर प्रोड्युस किया है, लेकिन इस बार निर्देशन की बगडोर उन्होने अपने हाथ में नहीं लिया, बल्कि यह भार सौंपा गया 'लाइफ़ इन अ मेट्रो' और 'गैंगस्टर' जैसी सफल फ़िल्मों के निर्देशक अनुराग बासु को।

सुजॊय - संगीत की बात करें तो अनुराग बासु की फ़िल्मों में अक्सर प्रीतम का ही संगीत होता है। लेकिन क्योंकि यह रोशन परिवार की फ़िल्म है तो फिर राजेश रोशन के अलावा और कौन हो सकता है फ़िल्म के संगीतकार। और वैसे भी जितनी भी बार राकेश, राजेश और ऋतिक की तिकड़ी एक जुट हुई है, हमें अच्छा संगीत सुनने को मिला है।

सजीव - भले ही राजेश रोशन अपने करीयर में कई संगीत संबंधित विवादों से घिरे रहे हैं, यह बात भी सच है कि वो उन बहुत ही गिने चुने संगीतकारों में से हैं जिन्होने बदलते वक़्त, रुचि और चलन के साथ अपने आप को ढाला है और जिसका नतीजा यह है कि ७० के दशक में उनका सगीत जितना हिट था, आज २०१० के दशक में भी युवाओं के दिलों पर उतने ही हावी हैं।

सुजॊय - तो सजीव, हृतिक रोशन और बारबरा मोरी अभिनीत 'काइट्स' के गीत संगीत की चर्चा आज 'ताज़ा सुर ताल' में हो रही है, आइए इस फ़िल्म का पहला गीत सुनते हैं के.के की आवाज़ में, जिसे लिखा है नासिर फ़राज़ ने। पहले गीत सुन लेते हैं, फिर अपनी चर्चा आगे बढ़ाएँगे।

गीत: ज़िंदगी दो पल की


सजीव - वाह! बहुत ही अच्छी धुन जो एक ताज़ा हवा के झोंके की तरह आई। जैसा कि मैंने कहा था कि राजेश रोशन हर दौर के टेस्ट के अनुरूप अपने संगीत को हाला है। के.के की आवाज़ की मिठास और पैशन, दोनों ही साफ़ झलकता है इस गीत में। भारतीय और पाश्चात्य साज़ों का जो तालमेल रोशन साहब ने बनाया है, गीत को बड़ा ही मेलडियस बनाता है। और जहाँ पर के.के "इंतेज़ार कब तलक" गाते हैं, उसमें राजेश रोशन का अंदाज़ आप नोटिस कर सकते हैं।

सुजॊय - कुल मिलाकर यह गीत इन दिनों ख़ूब लोकप्रिय हो रहा है और इसी गीत के ज़रिए टीवी के परदे पर फ़िल्म को प्रोमोट भी किया जा रहा है। के.के. ने इस फ़िल्म में एक और गीत गाया है "दिल क्यों ये मेरा शोर करे"। बड़ा ही सॊफ़्ट नंबर है। एक जालस्थल पर किसी ने इस गीत के बारे में यह लिखा है कि आप किसी लॊंग् ड्राइव पे निकल पड़े हो, चारों तरफ़ प्रकृति की शोभा पूरे शबाब पे हो, और एक कभी ना ख़त्म होनेवाली सड़क, ऐसे में इस गीत को बार बार सुनने का मज़ा कुछ और ही होगा।

सजीव - नासिर फ़राज़ के नर्मोनाज़ुक और काव्यात्मक शब्द और के.के. की नर्म आवाज़ ने इस गीत को बेहद कर्णप्रिय बनाता है। के.के. की खासियत है कि वो दमदार और नर्म, दोनों ही तरह के गीत वो बख़ूबी गा लेते हैं। वैसे इस गीत में आगे चलकर उनकी आवाज़ की वही दमदार और पैशन वाली अंदाज़ सुनाई देती है। वैसे इस गीत में कुछ कुछ अनुराग बासु - प्रीतम - के.के वाले गीतों की झलक भी मिलती है।

सुजॊय - और शायद बैण्ड म्युज़िक के इस्तेमाल की वजह से भी कुछ हद तक ऐसा लगा हो। जो भी है, के.के के गाए ये दोनों ही गीत लोग पसंद करेंगे ऐसी उम्मीद की जा सकती है। तो आइए अब इस गीत को सुना जाए।

गीत: दिल क्यों ये मेरा शोर करे


सजीव - 'काइट्स' फ़िल्म का अगला गीत है विशाल दादलानी और सूरज जगन की आवाज़ों में। ये दो नाम सुनते ही आप समझ ही चुके होंगे कि गाना किस अंदाज़ का होगा! जी हाँ, रॊक शैली में बना यह गीत गीटार की धुन से शुरु हो कर विशाल की आवाज़ टेक-ओवर कर लेती है। बाद में सूरज जगन अपनी उसी गायकी का परिचय देते हैं जिसे अंग्रेज़ी में 'फ़ुल थ्रोटेड रेंडिशन' कहते हैं।

सुजॊय - इससे पहले 'क्रेज़ी-४' फ़िल्म में विशाल दादलानी को राजेश रोशन ने गवाया था। आजकल बहुत से संगीतकार विशाल से गानें गवा रहे हैं।

सजीव - इस गीत को भी नासिर फ़राज़ ने ही लिखा है, लेकिन पिछले दो गीतों की तरह शायद यह गीत आपके दिल में बहुत ज़्यादा जगह ना बना सके। पर हो सकता है कि फ़िल्म में कहानी के अनुरूप यह गीत होगा और उसे परदे पर देखते हुए इसका अलग ही मज़ा आएगा।

सुजॊय - वैसे सजीव, कई बार अगर इस गीत को सुनें तो अच्छा ज़रूर लगने लगता है। आइए इस गीत को सुनते हैं और इस गीत के बारे में राय हम श्रोताओं पर ही छोड़ते हैं।

गीत: तुम भी हो वही


सजीव - फ़िल्म 'जुली' में प्रीति सागर ने गाया था "माइ हार्ट इज़ बीटिंग्", जो कि एक पूर्णत: अंग्रेज़ी गीत था। राजेश रोशन द्वारा स्वरबद्ध यह गीत कालजयी हो गया है। अब फ़िल्म 'काइट्स' के लिए भी उन्होने एक अंग्रेज़ी गीत कॊम्पोज़ किया है, जो कि इस फ़िल्म का शीर्षक गीत भी है - "काइट्स इन द स्काई"। इस गीत में एक अंतर्राष्ट्रीय अपील है और संगीत संयोजन भी बिल्कुल उसी अंदाज़ का है जो अंदाज़ आजकल विदेशी ऐल्बम्स के गीतों में सुनाई देता है।

सुजॊय - और उससे भी बड़ी बात यह कि इस गीत को और कोई नहीं बल्कि ऋतिक रोशन ने गाया है और यह उनका पहला गीत है। और मानना पड़ेगा कि उन्होने बहुत ही अच्छे गायन का परिचय दिया है। और क्यों ना दें, वो हैं ही परफ़ेक्शनिस्ट। जो भी काम वो करते हैं, पूरे परफ़ेक्शन के साथ करते हैं।

सजीव - इस गीत में ऋतिक का साथ दिया है सुज़ेन डी'मेलो ने। इस गीत को लिखा है आसिफ़ अली बेग ने। सुनते हैं।

गीत: काइट्स इन द स्काई


सुजॊय - ऋतिक रोशन की फ़िल्म हो और उसमें उनकी ज़बरदस्त नृत्यकला का परिचय ना मिले यह कैसे हो सकता है! फ़िल्म 'कोई मिल गया' में "इट्स मैजिक" की तरह 'काइट्स' में भी राजेश रोशन ने अपने भतीजे साहब के लिए एक ऐसा ज़बरदस्त गीत रचा है जिसका शीर्षक है "फ़ायर"। यानी कि अंग्रेज़ी में कहें तो Hrithik is gonna set the stage on fire!!!

सजीव - और इस गीत को राजेश रोशन ने ख़ुद गाया भी है और उनका साथ दिया है विशाल दादलानी, अनुश्का मनचंदा और अनिरुद्ध भोला ने। गीत में बोल बहुत ही कम है, डान्स म्युज़िक ही हावी है और पूरी तरह से टेक्नो म्युज़िक है।

सुजॉय- इसे फिल्म का थीम संगीत भी कहा जा सकता है, "दिल तो पागल है" फिल्म में जिस तरह संगीत से और नृत्य से "जलन" की भावना को परदे पर साकार किया गया था, इस ट्रैक में "फायर" को परिभाषित किया गया है. संगीत आपके जेहन को रचनात्मक बनाता है, वेल डन राजेश रोशन साहब

गीत: फ़ायर


"काईट्स" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ****
बहुत ही अगल किस्म का संगीत है जिसे सफर में या फिर रात अँधेरे कमरे में अकेले बैठ कर सुना जा सकता है. रोमांटिक गीतों में जैसे के के ने जाँ फूंक दी है. ऋतिक की आवाज़ में एक गीत है जो खूब भाता है. राजेश रोशन ने आज के दौर के संगीत में मेलोडी का सुन्दर मिश्रण किया है. एक अच्छी एल्बम.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ४३- जोश', 'हेल्लो ब्रदर' और 'काइट्स' फ़िल्म को आप किस तरह से आपस में जोड़ सकते हैं?

TST ट्रिविया # ४४-राजेश रोशन ने 'काइट्स' के एक गीत में अपनी आवाज़ दी है। उनकी आवाज़ में क्या आपको कोई और गीत भी याद आता है? बताइए फ़िल्म का नाम और गीत के बोल।

TST ट्रिविया # ४५- बताइए उस फ़िल्म का नाम जिसमें हृतिक रोशन ने पहली बार काम किया था बतौर बाल कलाकार।


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी सभी जवाब सही हैं, बधाई

Monday, April 5, 2010

पी से पाठशाला और पी से प्रिंस....दो युवा संगीतकारों ने धाक जमाई इन बड़ी फिल्मों से

ताज़ा सुर ताल १४/२०१०

सुजॊय - सजीव, साल २०१० का एक चौथाई पूरा हो चुका है, यानी कि तीन महीने। इन तीन महीनों में हमने जिन जिन फ़िल्मों के संगीत की चर्चा यहाँ की, अपने नए साथियों के लिए बता दें उन फ़िल्मों के नाम।

सजीव - बिल्कुल बताओ, इससे इस बरस अब तक बनी फ़िल्मों का एक छोटा सा रीकैप भी हो जाएगा।

सुजॊय - ये फ़िल्में हैं दुल्हा मिल गया, वीर, रण, इश्क़िया, माइ नेम इज़ ख़ान, स्टाइकर, रोड टू संगम, लाहौर, सदियाँ, एल.एस.डी, शिवाजी दि बॊस, कार्तिक कॊलिंग् कार्तिक, वेल डन अब्बा।

सजीव - और हमने दो ग़ैर फ़िल्मी ऐल्बम्स की भी चर्चा की - अमन की आशा, और अपना होम प्रोडक्शन काव्यनाद। तो अब हम आगे बढ़ते हैं और आज हम लेकर आए हैं दो फ़िल्मों के गानें। पहली फ़िल्म है 'पाठशाला'। इस फ़िल्म की चर्चा और प्रचार काफ़ी पहले से शुरु हो गई थी, लेकिन फ़िल्म के बनने में बहुत लम्बा समय लग गया।

सुजॊय - लेकिन इस फ़िल्म का संगीत बिल्कुल फ़्रेश है। फ़िल्म में गीत संगीत हनीफ़ शेख़ का है। फ़िल्म के गीतों को गाया है लकी अली, कैलाश खेर, विशाल दादलानी, तुलसी कुमार और सलीम मरचेंट ने। गीतों में विविधता है, मेलोडी भी है और कुछ गानें आपके क़दमों को थिरकाने वाले भी हैं। और क्यों ना हो जब फ़िल्म का नायक शाहिद कपूर हैं।

सजीव - तो इस फ़िल्म के दो गीत हम यहाँ सुनेंगे, पहला गाना है लकी अली का गाया हुआ। गीटार के ख़ूबसूरत और प्रॊमिनेन्ट प्रयोग से सजा यह गीत है "बेक़रार"। बहुत दिनों के बाद लकी अली की आवाज़ सुनाई दी है। एक यूथ अपील है इस गीत में और बोल भी तो कितने ख़ूबसूरत हैं, "सूनी सूनी राहों में है तेरा ही इंतेज़ार, जली बूझी साँसों से अब तेरा ही है ख़ुमार, न जाने मैंने क्या खोया क्या पाया कुछ भी ना समझे यहाँ, भुला के सारी बातों को जी आया फिर भी ना आए क़रार, बेक़रार"। कहीं पर बहुत ऊँचे सुर हैं तो कहीं पर नाज़ुकी। लकी अली ने बड़ा ही ख़ूबसूरत अंजाम दिया है इस गीत को। और हनीफ़ की प्रतिभा को भी सलाम जिन्होने इस गीत को लिखा भी है और सुरों में ढाला है।

गीत - बेक़रार


सुजॊय - 'पाठशाला' में कुल पाँच गानें हैं। "बेक़रार" के बाद जो गीत हमें सुनना चाहिए वह बेशक़ कैलाश खेर का गाया "ऐ ख़ुदा" है। कैलाश खेर की आवाज़ में वह देसी महक है कि जिससे उनकी अवाज़ कभी बासी नहीं लगती। भले ही वो अपनी एक ही शैली व अंदाज़ में गाते हैं, लेकिन हर बार हमें सुन कर अच्छा ही लगता है।

सजीव - वैसे इस गीत को सुनते हुए कैलाश का गाया "या रब्बा" गीत की याद आ ही जाती है, जिसमें संगीत था शंकर अहसान लॊय का।

सुजॊय - तो फिर इस गीत को सुनते हैं और हम भी इसी बात को महसूस करने की कोशिश करते हैं।

गीत - ऐ ख़ुदा


सजीव - और अब आ रहे हैं प्रिन्स। जब म्युज़िक कंपनी 'टिप्स' हो, और गीतकार समीर हो, तो अगर श्रोता ९० के दशक के मेलडी की उम्मीद करें तो उन्हे ज़्यादा दोष नहीं दिया जा सकता।

सुजॊय - वैसे फ़िल्म 'प्रिन्स' के संगीतकार हैं सचिन गुप्ता, जिन्होने इससे पहले कुछ कम बजट की फ़िल्मों में संगीत दिया है। शायद यही उनकी पहली बड़ी फ़िल्म है। 'प्रिन्स' के कुछ गानें वैसे तो इन दिनों काफ़ी बज रहे हैं, और जो गीत सब से ज़्यादा सुनाई दे रहा है आजकल, उसी को सब से पहले सुना जाए!

सजीव - तुम्हारा इशारा "ओ मेरे ख़ुदा" की तरफ़ ही होगा। आतिफ़ असलम और श्रेया घोषाल की आवाज़ों में इस गीत से इतनी उम्मीदें लगाई गई कि इस गीत के कुल चार वर्ज़न साउंड ट्रैक में रखे गए हैं। लेकिन वाक़ई इस गीत में कुच ऐसी बात है कि जो आज के दौर के किसी कामयाब गीत में होनी चाहिए। भले ही गीत अंदाज़ पाश्चात्य है, लेकिन मेलडी बहुत सुरीला है, और श्रेया और आतिफ़ ने जैसे बिल्कुल इस गीत को जो मूड चाहिए था, वह बना दिया है।

सुजॊय - इस तरह के रोमांटिक गीतों में आतिफ़ की आवाज़ बहुत जचती है। हालाँकि बहुत से गायक और संगीतकार आतिफ़ को गायक मानने से ही इंकार कर देते हैं, लेकिन जो हक़ीक़त है उससे कोई मुंह नहीं मोड़ सकता। और हक़ीक़त यही है कि जो भी गीत आतिफ़ गाते हैं, वह युवा दिलों की धड़कर बन जाते हैं। अच्छा सजीव, यह गीत जिस तरह से शुरु होता है कि "जागी जागी सोयी ना मैं सारी रात तेरे लिए, भीगी भीगी पलकें मेरी उदास तेरे लिए, अखियाँ बिछाई मैंने तेरे लिए, दुनिया भुलाई मैंने तेरे लिए, जन्नतें सजाई मैंने तेरे लिए, छोड़ दी ख़ुदाई मैंने तेरे लिए"; तो इसमें "जागी जागी सोयी ना मैं सारी रात", इतना जो हिस्सा है, इसकी धुन आपको किसी पुराने गीत से मिलती जुलती लगती है?

सजीव - याद तो नहीं आ रहा, चलो तुम ही बताओ।

सुजॊय - दरसल यह मेरी खोज नहीं है, इंटरनेट पर ही मैंने यह बात पढ़ी और जब ख़ुद उस गीत को अपने पी.सी पर सुना तो यक़ीन हो गया। वह गीत है ९० के दशक की फ़िल्म 'यलगार' का, "हो जाता है कैसे प्यार न जाने कोई"। इस गीत के अंतरे का जो धुन है, जिसमें कुमार सानू गाते हैं "षोख़ हसीना से मिलने के बाद..." या फिर जब सपना मुखर्जी गाती हैं "लाख कोई सोचे सारे सारी रात..."। आप भी सुनिए इस गीत को और हमारे तमाम श्रोताओं को भी 'यलगार' के इस गीत को सुनने का सुझाव हम देंगे। लेकिन फिलहाल हम आपको सुनवा रहे हैं आतिफ़ और श्रेया का गाया "तेरे लिए"।

गीत - तेरे लिए


सजीव - अच्छा इस गीत से पहले तुम बता रहे थे कि इस गीत के चार वर्ज़न हैं, तो उनके बारे में भी बताते चलें।

सुजॊय - बाक़ी के तीन वर्ज़न रीमिक्स वर्ज़न हैं जिनका कुछ इस तरह से नामकरण किया किया गया है - 'डान्स मिक्स' जिसे शायद डिस्कोज़ के लिए बनाया गया होगा; दूसरा है 'हिप हॊप मिक्स' जो पहले के मुक़ाबले थोड़ा और सेन्सुयस भी। आतिफ़ की आवाज़ में एक सेन्सुयस फ़ील है जो इस तरह के गीतों में थोड़ा और जान डाल देता है। और जो तीसरा वर्ज़न है उसका नाम है 'अनप्लग्ड वर्ज़न' जिसमें अनर्थक साज़ों की भीड़ नहीं है, बल्कि केवल गीटार की पार्श्व में सुनाई देता है और इस वर्ज़न में आवाज़ ख़ुद सचिन गुप्ता की ही है। वेल डन सचिन!

सजीव - और दूसरे गीत की बारी। आतिफ़ असलम की आवाज़ और फिर से ईलेक्ट्रिक गीटार का इस्तेमाल। इसे फ़िल्म का थीम सॊंग् भी कहा जा सकता है जो नायक की शख्सियत का बयाँ करती है। "कौन हूँ मैं किसकी मुझे तलाश ", इस गीत में एक रॊक फ़ील है, केवल एक बार सुन कर शायद यह गीत आप के ज़हन में ना बैठ पाए, क्योंकि इस तरह के गीतों को 'सिचुयशनल सॊंग्' कहते हैं, जिसका अर्थ है कि फ़िल्म के कहानी के साथ ही इस गीत को जोड़ा जा सकता है। लेकिन बार बार सुन कर अच्छा लगने लगता है। और हो सकता है कि इसे सुनते हुए आपको 'शहंशाह' फ़िल्म का "अंधेरी रातों में सुनसान राहों पर" गीत याद आ जाए! सुनते हैं...

गीत - कौन हूँ मैं


सुजॊय - और अब आज का अंतिम गीत, और एक बार फिर आतिफ़ असलम की आवाज़। यह गीत है "आ भी जा सनम"। दरअसल इस फ़िल्म में एक गीत है "ओ मेरे ख़ुदा"। करीब करीब उसी धुन पर इस गीत को बनाया गया है, बस रीदम थोड़ी धीमी है। यह एक टिपिकल आतिफ़ असलम नंबर है और पहले भी इस तरह के गानें वो कई बार गा चुके हैं। इसलिए शायद बहुत ज़्यादा नयापन आपको इस गीत में ना लगे, लेकिन गाना अच्छा है, ठीक ठाक बना है।

सजीव - सुजॊय, इसे इत्तेफ़ाक़ ही कहो या कुछ और, हमने आज 'पाठशाला' और 'प्रिन्स' के गानें बजाए, और देखो इन दोनों फ़िल्मों को मैं शंकर अहसान लॊय के साथ जोड़ सकता हूँ, जब कि इन दोनों फ़िल्मों से शंकर अहसान लॊय का कुछ लेना देना नहीं है।

सुजॊय - वह कैसे?

सजीव - अब देखो, याद है मैंने कुछ देर पहले कहा था कैलाश खेर का गाया गीत "ऐ ख़ुद" शंकर अहसान लॊय के बनाए "ओ रब्बा" से मिलता जुलता है; अब देखो 'प्रिन्स' का यह गीत "ओ मेरे ख़ुदा" या "आ भी जा सनम" भी तो शंकर अहसान लॊय की फ़िल्म 'लंदन ड्रीम्स' के एक गीत से बहुत मिलता जुलता है। याद है 'लंदन ड्रीम्स' में एक गाना था "शोला शोला", उस गीत की पंक्ति "और चल तू पिघल हवा है तू बह निकल, राहें बना रस्ते बना चल रे" की धुन "ओ मेरे सनम" के बहुत करीब है।

सुजॊय - वाह! सही है! तो चलिए अब यह गीत सुनते हैं।

गीत - आ भी जा सनम


"पाठशाला" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
कुछ खास गायक गायिकाओं की आवाजें, संगीत में नयापन इस अल्बम को कुछ हद तक खास बनाता है. हालांकि शेल्फ वेल्यु नहीं है बहुत फिर भी लकी अली को बहुत दिनों बाद फिर से सुनना सुखद ही है

"प्रिंस" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
रेस की टीम ने आपको याद होगा जम कर धूम मचाई थी भले ही धुनें चुराई हुई थी, वही टीम यहाँ फिर है बस संगीतकार प्रीतम को बदल दिया गया है, जब धुनें चुरानी ही हों तो नामी संगीतकार को लेकर क्या करना :) खैर टिप्स की फिल्मों का फार्मूला साफ़ सपाट होता है, धूम धड़ाके वाला संगीत जिसकी आयु फिल्म के सिनेमाघरों पर टिकने तक ही होती है. आतिफ की आवाज़ में "खुदा" शब्द का उच्चारण कानों को चुभता है, बहरहाल नाचने झूमने का मन हो तो इस फुट टैप्पिंग अल्बम को सुना जा सकता है.

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ४०- हनीफ़ शेख़ ने अहमद ख़ान की फ़िल्म 'पाठशाला' में संगीत दिया और गानें भी लिखे हैं। बताइए कि इससे पहले अहमद ख़ान की कौन सी फ़िल्म में हनीफ़ ने गीत गाया था और वह गीत कौन सा था?

TST ट्रिविया # ४१- इनका असली नाम है मकसूद महमूद अली। इनका जन्म १९ सितंबर १९५८ को हुआ था। इनकी माँ मशहूर अदाकारा मीना कुमारी की बहन थीं। बताइए इस शख़्स को दुनिया किस नाम से जानती है?

TST ट्रिविया # ४२- आतिफ़ असलम बहुत जल्दी फ़िल्म के पर्दे पर नज़र आएँगे बतौर हीरो। बताइए किस पाक़िस्तानी निर्देशक की यह फ़िल्म है और फ़िल्म का नाम क्या है?


TST ट्रिविया में अब तक -
सीमा जी एक बार फिर बुलंदी पर हैं, बधाई

Monday, March 29, 2010

विंटेज रहमान, ठन्डे शंकर, और सक्रिय शांतनु हैं आज के टी एस टी मेनू में

ताज़ा सुर ताल १३/२०१०

सजीव- 'ताज़ा सुर ताल' में आज एक नहीं बल्कि तीन तीन फ़िल्मो के गीत गूंजेंगे जो हाल ही में प्रदर्शित हुईं हैं। ये तीनों फ़िल्में एक दूसरे से बिल्कुल अलग है, एक दूजे से बिल्कुल जुदा है। सुजॊय, तुम्हे याद है एक दौर ऐसा था जब ए. आर. रहमान नए नए हिंदी फ़िल्मी दुनिया में आए थे और उस दौर में दक्षिण के कई फ़िल्मों को हिंदी में डब किया जा रहा था जिनमें रहमान का संगीत था।

सुजॊय - हाँ, जैसे कि 'हम से है मुक़ाबला', 'दुनिया दिलवालों की', 'रोजा' और बहुत सी ऐसी फ़िल्में जिन्हे हिंदी में डब किया गया था। इन फ़िल्मों के गानें ऒर्जिनली तमिल होने की वजह से इन्ही धुनों पर हिंदी के बोल लिखना भी एक चैलेंज हुआ करता था।

सजीव - हाँ, और यह काम उन दिनों भली भाँती कर लिया करते थे गीतकार पी.के. मिश्रा। ख़ैर, वह दौर तो गुज़र चुका है, लेकिन हाल में रहमान की धुनों वाली एक और मशहूर तमिल फ़िल्म को हिंदी में डब किया गया है। यह फ़िल्म है 'शिवाजी दि बॊस'।

सुजॊय - सजीव, मुझे याद है २००७ के जून महीने में मैं अपने काम के सिलसिले में चेन्नई गया हुआ था, उन दिनों यह तमिल फ़िल्म वहाँ रिलीज़ हुई थी। मुझे अब भी याद है रजनीकांत के बड़े बड़े पोस्टर्स पूरे शहर भर में छाए हुए थे।

सजीव - बिल्कुल ठीक, १५ जून २००७ को यह फ़िल्म रिलीज़ हुई थी, और इसका हिंदी वर्ज़न रिलीज़ हुआ है ८ जनवरी २०१० को। वी.एम प्रोडक्शन्स निर्मित व एस. शंकर निर्देशित इस फ़िल्म के मुख्य कलाकार थे रजनीकांत, श्रिया सरन, सुमन, विवेक, रघुवरण प्रमुख। ए. आर. रहमान ने न केवल फ़िल्म के गाने स्वरबद्ध किए बल्कि पार्श्व संगीत भी तैयार किया।

सुजॊय - तो सजीव, बात संगीत के चल पड़ी है तो आगे बढ़ने से पहले अपने श्रोताओं को सुनवा देते हैं इस फ़िल्म से एक गीत। इस गीत को सुनते हुए हिंदी प्रांत के श्रोताओं को एक अंदाज़ा हो जाएगा दक्षिण में चल रहे संगीत के बारे में। इसे गाया है ब्लाज़, रैग्ज़, तन्वी, सुरेश पीटर ने। इस गीत के तमिल वर्ज़न को विजय ने लिखा था।

गीत - स्टाइल


सुजॊय - 'शिवाजी दि बॊस' फ़िल्म एक सुप्रतिष्ठित सॊफ़्टवेयर सिस्टेम आर्किटेक्ट शिवाजी के इर्द गिर्द घूमती है, जो हाल ही में भारत लौटा है अमेरीका में अपना कार्य समाप्त कर। उसका सपना है कि भारत आकर वो इस समाज को मुफ़्त चिकित्सा व शिक्षा दिलवाए। लेकिन उसे यहाँ पर कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अब उसके पास अपने तरीके से इस करप्ट सिस्टेम का मुकाबला करना है। यही है इस फ़िल्म की मूल कहानी। इस फ़िल्म को उस समय तक का सब से महँगी फ़िल्म मानी गई जो ६० करोड़ की राशी में बनी थी, और इस फ़िल्म ने १०० करोड़ के उपर का व्यापार किया, यानी कि ४० करोड़ का मुनाफ़ा।

सजीव - अब इसी फ़िल्म का एक और गीत सुन लेते हैं जिसे हरिहरण और मधुश्री ने गाया है। मधुश्री ने युं तो बहुत कम फ़िल्मों में गाया हैं, लेकिन जितने भी गीत गाये हैं उनमें से ज़्यादातर ए. आर. रहमान के गानें हैं। यह गीत है "वाह जी वाह जी वाह जी, मेरा जीवन है शिवाजी"। इसका तमिल संस्करण भी इन्ही गायकों की आवाज़ों में है और उसे लिखा था वैरामुथु ने।

सुजॊय - गीत सुनने से पहले आपको बता दें कि २००८ में इस फ़िल्म को फ़िल्मफ़ेयर-दक्षिण अवार्ड्स में बहुत सारे पुरस्कार मिले। तमाम और पुरस्कारों के अलावा सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और ए. आर. रहमान को सर्वश्रेष्ठ संगीतकर का पुरस्कार मिला था।

गीत - वाह जी वाह जी



सजीव - अब हम आते हैं आज की दूसरी फ़िल्म पर। 'कार्तिक कॊलिंग् कार्तिक'। इस फ़िल्म के रिलीज़ से पहले जिस तरह की उम्मीदें इससे की जा रहीं थीं, शायद उतनी यह फ़िल्म खरी नहीं उतरी और सिनेमाघरों से जल्दी ही यह फ़िल्म उतर गई। जहाँ तक संगीत का सवाल है, इस फ़िल्म के कम से कम दो गीतों ने लोगों के दिलों को ज़रूर छुआ।

सुजॊय - और इनमें से एक गीत ने लोगों के दिलों को ही नहीं, बल्कि कदमों को ज़रूर छुआ। जब शंकर अहसान लॊय का संगीत हो और जावेद अख़्तर के गीत हों, तो गानें अच्छे बनेंगे ही। तो सजीव, क्योंकि आज हम इस फ़िल्म का एक ही गीत सुनेंगे, इसलिए क्यों ना हम उसी गीत को यहाँ बजाएँ जो सब से ज़्यादा हिट रहा.

सजीव - बिल्कुल, "उफ़ तेरी अदा", यह गीत इन दिनों काफ़ी बज रहा है। शंकर महादेवन, अलिज़ा मेन्डोन्सा और साथियों की आवाज़ें हैं इस गाने में। मेरा ख़याल है कि गीत के बोलों पर ज़्यादा ध्यान ना देकर इसकी रिदम के साथ झूमना चाहिए, तभी इसे ज़्यादा एंजॊय किया जा सकेगा।

गीत - उफ़ तेरी अदा


सुजॊय - और अब आज की तीसरी व अंतिम फ़िल्म की बारी। यह फ़िल्म भी प्रदर्शित हो चुकी है, 'वेल डन अब्बा'। श्याम बेनेगल जैसे निर्देशक के फ़िल्म की और उनके फ़िल्मों के संगीत की भूमिका देने की आवश्यक्ता नहीं पड़ती। उनकी शुरुआती फ़िल्मों का संगीत देखिए और आज के दौर में बनी उनकी फ़िल्मों का संगीत, कितना फ़र्क आ गया है, लेकिन समानांतर सिनेमा का जो उनका स्टाइल है, वह उन्होने बरकरार रखा है।'ज़ुबेदा' और 'बोस दि फ़ॊरगोटेन हीरो' में उन्होने रहमान का संगीत लिया था, फिर उसके बाद वो मुड़ गए शान्तनु मोइत्र की तरफ़ जिनके साथ उन्होने इससे पहले 'वेलकम टू सज्जनपुर' में काम किया था। और अब ये दोनों साथ में फिर एक बार आए हैं 'वेल डन अब्बा' में।

सजीव - शान्तनु मोइत्र और उनके गीतकार जोड़ीदार स्वानंद किरकिरे का काम हमेशा ही उत्कृष्ट होता है। बहुत कम फ़िल्में करते हैं ये दोनों लेकिन हर एक फ़िल्म के गानें बहुत ख़ास हुआ करते हैं चाहे फ़िल्म चले या ना चले। '३ इडियट्स' की अपार सफलता के बाद अब ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म के गीतों से भी लोग उमीदें ज़रूर लगाएँगे, लेकिन लोगों को यह भी याद रखना होगा कि '३ इडियट्स' एक व्यावसायिक फ़िल्म थी और 'वेल डन अब्बा' एक पैरलेल फ़िल्म है। इनका आपस में तुलना करना निरर्थक है।

सुजॊय - 'वेल डन अब्बा' के मुख्य कलाकार हैं बोमन इरानी, मिनिशा लाम्बा, रवि किशन और सोनाली। स्वानंद किरकिरे के अलावा अशोक मिश्र और इला अरुण ने भी इसमें गीत लिखे हैं। तो चलिए पहला गीत सुनते हैं इला अरुण और डैनियल जॊर्ज की आवाज़ों में "मेरी बन्नो होशियार"। यह एक शादी वाला गाना है और इसमें बोल भी गुदगुदाने वाले हैं।

सजीव - और पार्श्व में जो तेलुगू के शब्द आते है, उनसे भी गीत में एक ख़ास बात आ गई है। अच्छा सुजॊय इस गीत को सुनो और सुनने के बाद बताओ कि तुम्हे इस गीत से कौन सी पुरानी फ़िल्मी गीत की याद आई।

गीत - मेरी बन्नो होशियार


सुजॊय - सजीव, मुझे लगता है कि इस गीत की धुन मिलती जुलती है 'दो आँखें बारह हाथ' फ़िल्म में लता जी के गाए गीत "स‍इयां झूठों का बड़ा सरताज निकला" से। दरअसल क्या है कि इस तरह के उत्तर भारत के शादी वाले गीतों की धुन लगभग एक जैसी ही होती है जो लम्बे समय से चली आ रही है। धुन वही है लेकिन बोल बदलते जाते हैं। इसलिए हम यह नहीं कह सकते कि किसी तरह की 'ट्युन लिफ़्टिंग्' हुई है, बस यही कह सकते हैं कि इसे एक पारम्परिक धुन मान लें।

सजीव - ठीक कहा। और अब एक सुफ़ी शैली में बना गीत राघव और राजा हसन की आवाज़ में। रियल्टी शो से उभरे राजा हसन को आजकल मौके मिलने लगे हैं, हो सकता है कि धीरे धीरे वो सीढियाँ चढ़ते जाएँगे। यह गीत है "रहीमन इश्क का धागा रे, कबहूँ ना चटकाना रे"। रहीम के दोहों पर आधारित यह गीत सुनते हुए आपको अपने बचपन की याद ज़रूर आ जाएगी जब हिंदी के पाठ्यक्रम में रहीम और कबीर जैसे संतों के दोहों के पाठ हुआ करते थे।

सुजॊय - और इन दोहों में जीवन दर्शन के उपदेशों को कितनी ख़ूबसूरती के साथ प्रकृति से उदाहरण लेकर समझाया गया है। याद है फ़िल्म 'अखियों के झरोखों से' फ़िल्म में भी इसी तरह का एक दोहावलि गीत था जिसमें एक प्रतियोगिता में नायक और नायिका दोहों से एक दूसरे का मुकाबला करते हैं। उस गीत में पहला दोहा था "बड़े बड़ाई ना करे बड़े ना बोले बोल, रहीमन हीरा कब कहे लाख टका मेरो मोल"।

सजीव - और पता है 'अखियों के झरोखों से' के उस दोहावलि में भी इस दोहे का शुमार किया गया था, यानी कि "रहीमन इश्क का धागा रे..."। सचमुच, ये दोहे सुनकर बहुत सुकून मिलता है, और 'वेल डन अब्बा' के इस गीत में भी वही बात है। सुनते हैं।

गीत - रहीमन इश्क का धागा


"शिवाजी दा बॉस" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
बोलों पर बिना ध्यान दिए यदि विंटेज रहमान को एक बार फिर सुनना चाहते हैं तो अल्बम खरीद लाईये. ये रहमान का वो अंदाज़ है जहाँ संगीत धुनों पर खुल कर बरसता है, हिंदी फिल्मों में रहमान बेहद संयम बरतते हैं साजों के चुनाव आदि के मामले में, यहाँ मेचुरिटी नज़र आती है, पर इस तरह की तमिल फिल्मों में जहाँ उन्हें बस "धाकड" संगीत देना होता है, वो लौट आते हैं अपने पुराने अंदाज़ में, ये वही अंदाज़ है.

"कार्तिक कौल्लिंग कार्तिक" के संगीत को आवाज़ रेटिंग **१/२
गीतकार संगीतकार की ये वो टीम है जिसने संगीत की दुनिया को एक से एक गीत दिए हैं, पर विडम्बना देखिये ये जोड़ी अब अपना चार्म खोती सी दिखाई दे रही है. नएपन् का सतत अभाव.

"वेल डन अब्बा" के संगीत को आवाज़ रेटिंग ***
अल्बम के लिहाज से न सही पर फिल्म की पठकथा के अनुरूप नज़र पड़ता है ये संगीत. यहाँ भी कोई नयापन नहीं है, पर गीत मधुर जरूर लगते हैं

और अब आज के ३ सवाल

TST ट्रिविया # ३७- शिवाजी दि बॊस' ए.वी.एम की फ़िल्म थी। बताइए ए.वी.एम की पहली हिंदी फ़िल्म कौन सी थी और किस साल प्रदर्शित हुई थी?

TST ट्रिविया # ३८- एक ऐसा साल था जिस साल फ़िल्मफ़ेयर के अन्तर्गत जतिन ललित को सर्वश्रेष्ठ संगीतकार का पुरस्कार मिला था, और उसी साल ए. आर. रहमान को फ़िल्मफ़ेयर का आर. डी. बर्मन अवार्ड मिला था। बताइए वह कौन साल था और जतिन ललित और रहमान को किन किन फ़िल्मों के लिए ये पुरस्कार मिले थे?

TST ट्रिविया # ३९- रहीम का वह कौन सा दोहा है जिसमें बिगड़ी बात फिर ना बन पाने की बात कही गई है?


TST ट्रिविया में अब तक -
पिछली बार अल्बम के चयन को लेकर कुछ बात छिड़ी, देखिये हमारा काम नयी अल्बोम के संगीत के बारे में जानकारी देना है ये तो श्रोता ही बतायेंगें कि वो कितने सार्थक हैं. मुनीश जी और तन्हा जी आप दोनों के विचारों का हम स्वागत करते हैं. सीमा जी केवल एक ही जवाब. चलिए अन्य दो जवाब हम दिए देते हैं.
जिन ३ गीतों में हमने समानता पूछी थी उन तीनों गीतों के संगीतकार महिला हैं और उनकी आवाज़ भी इन गीतों में शामिल है। पहला गीत सरस्वती देवी का है (फ़िल्म" अछूत कन्या), दूसरा गीत उषा खन्ना (फ़िल्म: बिन फेरे हम तेरे)।
दिबाकर बनर्जी का टीवी सीरियल था 'नॊट ए नाइस मैन टू नो'.

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