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Tuesday, March 5, 2013

शोभा रस्तोगी "शोभा" की लघुकथा कत्ल किसका

'बोलती कहानियाँ' स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में तपन शर्मा की लघुकथा "शवयात्रा" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं शोभा रस्तोगी "शोभा" की लघुकथा "कत्ल किसका", जिसका वाचन किया है अनुराग शर्मा ने।

इस लघुकथा का गद्य जनगाथा पर उपलब्ध है। इसका कुल प्रसारण समय 1 मिनट 41 सेकंड है। आप भी सुनें और अपने मित्रों और परिचितों को भी सुनाएँ और हमें यह भी बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

 यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं तो अधिक जानकारी के लिए कृपया admin@radioplaybackindia.com पर सम्पर्क करें।

शोभा जी दिल्ली में अध्यापन करती हैं। उनकी रचनाएँ प्रतिष्ठित हिन्दी पत्रिकाओं में छपती रही हैं।

हर सप्ताह यहीं पर सुनें एक नयी कहानी

"बी एस एफ की गाडियाँ दनादन रौंदाई गईं।"
(शोभा रस्तोगी "शोभा" की लघुकथा "कत्ल किसका" से एक अंश)

नीचे के प्लेयर से सुनें.

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#Eighth Story, Qatl Kiska, Shobha Rastogi/Hindi Audio Book/2013/8. Voice: Anurag Sharma

Saturday, March 26, 2011

सुनो कहानी: मनोहर कहानी - मुंशी नवल किशोर

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अनुराग शर्मा की आवाज़ में असग़र वजाहत की लघुकथा "हँसी" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं मुंशी नवल किशोर द्वारा सन् 1882 में प्रकाशित कथा संग्रह मनोहर कहानी में से "एक शिक्षाप्रद कहानी", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

इस शिक्षाप्रद कहानी का कुल प्रसारण समय 1 मिनट 27 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

असग़र वजाहत के सौजन्य से इस कथा का टेक्स्ट बीबीसी पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।




मुंशी नवल किशोर (1836-1895)

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

,‘‘महाराज ! मैं तो अपने ठाकुर को रिझाता हूँ और कोई रीझा तो क्या, न रीझा तो क्या?’’
(मनोहर कहानी की "शिक्षाप्रद कहानी" से एक अंश)


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#123nd Story, Manohar Kahani: Munshi Nawal Kishore/Hindi Audio Book/2011/6. Voice: Anurag Sharma

Saturday, March 12, 2011

सुनो कहानी: हँसी - असग़र वजाहत

'सुनो कहानी' इस स्तम्भ के अंतर्गत हम आपको सुनवा रहे हैं प्रसिद्ध कहानियाँ। पिछले सप्ताह आपने अर्चना चावजी की आवाज़ में अनुराग शर्मा की कहानी "जाके कभी न परी बिवाई" का पॉडकास्ट सुना था। आज हम आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं असग़र वजाहत की एक कहानी "हँसी", जिसको स्वर दिया है अनुराग शर्मा ने।

कहानी "हँसी" का कुल प्रसारण समय 2 मिनट 26 सेकंड है। सुनें और बतायें कि हम अपने इस प्रयास में कितना सफल हुए हैं।

इस कथा का टेक्स्ट लघुकथा.com पर उपलब्ध है।

यदि आप भी अपनी मनपसंद कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, धारावाहिको, प्रहसनों, झलकियों, एकांकियों, लघुकथाओं को अपनी आवाज़ देना चाहते हैं हमसे संपर्क करें। अधिक जानकारी के लिए कृपया यहाँ देखें।



रात के वक्त़ रूहें अपने बाल-बच्चों से मिलने आती हैं।
~ असगर वज़ाहत

हर शनिवार को आवाज़ पर सुनें एक नयी कहानी

डॉक्टर बोला, ‘‘नहीं, यह बीमारी नहीं है, क्योंकि बीमारियों की किताब में इसका जि़क्र नहीं है।’’
(असग़र वजाहत की "हँसी" से एक अंश)


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#122nd Story, Hansi: Asghar Wajahat/Hindi Audio Book/2011/5. Voice: Anurag Sharma

Wednesday, September 8, 2010

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए.. पेश-ए-नज़र है अल्लामा इक़बाल का दर्द मेहदी हसन की जुबानी

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९९

सितारों के आगे जहाँ और भी हैं,
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं|

अगर खो गया एक नशेमन तो क्या ग़म
मक़ामात-ए-आह-ओ-फ़ुग़ाँ और भी हैं|

गए दिन के तन्हा था मैं अंजुमन में
यहाँ अब मेरे राज़दाँ और भी हैं|

हमारे यहाँ कुछ शायर ऐसे हुए हैं, जिन्हें हमने उनकी कुछ ग़ज़लों (कभी-कभी तो महज़ एक ग़ज़ल या एक नज़्म) तक हीं बाँधकर रखा है। ऐसे हीं एक शायर हैं, "मोहम्मद इक़बाल"। अभी हमने ऊपर जो शेर पढे, उन शेरों में से कम-से-कम एक शेर तो (पहला शेर हीं) अमूमन हर इंसान की जुबान पर काबिज़ है ,लेकिन ऐसे कितने हैं, जिन्हें इन शेरों के शायर का नाम पता है। हाँ, "इक़बाल" के नाम से सभी वाकिफ़ हैं, लेकिन कितनों की इसकी जानकारी है कि "सितारों के आगे... " कहकर लोगों में आशा की एक नई लहर पैदा करने वाला शायर "इक़बाल" हीं है। हमारे लिए तो इक़बाल बस "सारे जहां से अच्छा" तक हीं सीमित हैं। और यही कारण है कि जब हम बड़े शायरों की गिनती करते हैं तो ग़ालिब के दौर के शायरों को गिनने के बाद सीधे हीं फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ तक पहुँच जाते हैं, लेकिन भूल जाते हैं कि इन दो दौरों के बीच भी एक शायर हुआ है, जिसने पुरानी शायरी और नई शायरी के बीच एक पुल की तरह काम किया है। मेरे हिसाब से ऐसी गलती या ऐसी अनदेखी बस हिन्दुस्तान में हीं होती है, क्योंकि पाकिस्तान के तो ये क़ौमी शायर (राष्ट्रकवि) हैं और इनके जन्म की सालगिरह पर यानि कि ९ नवंबर को वहाँ सार्वजनिक (राष्ट्रीय) छुट्टी होती है।

मैंने अपने कई लेखों में यह लिखा है कि फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ग़ालिब के एकमात्र उत्तराधिकारी थे, यह बात शायद सच हो, लेकिन यह भी सच है कि उर्दू भाषा ने ‘ग़ालिब’ के अतिरिक्त अभी तक इक़बाल से बड़ा शायर उत्पन्न नहीं किया। ग़ालिब के उत्तराधिकारी होने वाली बात इसलिए सच हो सकती है क्योंकि इक़बाल पर सबसे ज्यादा प्रभाव मौलाना 'रूमी' का था। हाँ, साथ-हीं-साथ ये ग़ालिब और जर्मन शायर 'गेटे' को भी खूब पढा करते थे, लेकिन ’रूमी’ की बात तो कुछ और हीं थी। इक़बाल की शायरी प्रसिद्धि के मामले में ग़ालिब के आस-पास ठहरती है, ऐसा कईयों का मानना है.. उन्हीं में से एक हैं उर्दू पत्रिका "मख़जन" के भूतपूर्व संपादक "स्वर्गीय शेख अब्दुल कादिर बैरिस्टर-एट-लॉ"। उन्होंने कहा था (साभार: प्रकाश पंडित):

"अगर मैं तनासख़ (आवागमन) का क़ायल होता तो ज़रूर कहता कि ‘ग़ालिब’ को उर्दू और फ़ारसी शायरी से जो इश़्क था उसने उनकी रूह को अदम (परलोक) में भी चैन नहीं लेने दिया और मजबूर किया कि वह फिर किसी इन्सानी जिस्म में पहुँचकर शायरी के चमन की सिंचाई करे; और उसने पंजाब के एक गोशे में, जिसे स्यालकोट कहते हैं, दोबारा जन्म लिया और मोहम्मद इक़बाल नाम पाया।"

इक़बाल के बारे में और कुछ जानने के लिए चलिए प्रकाश पंडित जी की पुस्तक "इक़बाल और उनकी शायरी" को खंगालते हैं:

सन् १८९९ में इक़बाल ने पंजाब विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए. किया। और यही वह ज़माना था जब लाहौर के सीमित क्षेत्र से निकलकर उनकी शायरी की चर्चा पूरे भारत में पहुँची। पत्रिका ‘मख़ज़न’ उन दिनों उर्दू की सर्वोत्तम पत्रिका मानी जाती थी। उसके सम्पादक स्वर्गीय शेख़ अब्दुल क़ादिर ‘अंजुमने-हिमायते-इस्लाम’ के जल्सों में इक़बाल को नज़्में पढ़ते देख चुके थे और देख चुके थे कि इन दर्द-भरी नज़्मों को सुनकर उपस्थिति सज्जनों की आँखों में आँसू आ जाते हैं। उन्होंने इक़बाल की नज़्मों को ‘मख़ज़न’ में विशेष स्थान देना शुरू किया। पहली नज़्म ‘हिमालय’/’हिमाला’ के प्रकाशन पर ही, जो अप्रैल १९०१ के अंक में निकली, पूरा उर्दू-जगत् चौंक उठा। सभाओं द्वारा प्रार्थनाएं की जाने लगीं कि उनके वार्षिक सम्मेलनों में वे अपनी नज़्मों के पाठ द्वारा लोगों को लाभान्वित करें। स्वर्गीय अब्दुल क़ादिर के कथनानुसार उन दिनों इक़बाल शे’र कहने पर आते तो एक-एक बैठक में अनगिनत शे’र कह डालते। "मैंने उन दिनों उन्हें कभी काग़ज़-क़लम लेकर शे’र लिखते नहीं देखा। गढ़े-गढ़ाए शब्दों का एक दरिया या चश्मा उबलता मालूम होता था। अपने शे’र सुरीली आवाज़ में, तरन्नुम से (गाकर) पढ़ते थे। स्वयं झूमते थे, औरों को झुमाते थे। यह विचित्र विशेषता है कि मस्तिष्क ऐसा पाया था कि जितने शे’र इस प्रकार ज़बान से निकलते थे, सब-के-सब दूसरे समय और दूसरे दिन उसी क्रम से मस्तिष्क में सुरक्षित होते थे।"

शायरी कैसी हो, इस बारे में इक़बाल का ख्याल था: "अगरचे आर्ट के मुतअ़ल्लिक़ दो नज़रिये (दृष्टिकोण) मौजूद हैं : अव्वल यह कि आर्ट की ग़रज़ (उद्देश्य) महज़ हुस्न (सौंदर्य) का अहसास (अनुभूति) पैदा करना है और दोयम यह है कि आर्ट से ज़िन्दगी को फ़ायदा पहुँचाना चाहिए। मेरा ज़ाती ख़याल यह है कि आर्ट ज़िन्दगी के मातहत है। हर चीज़ को इन्सानी ज़िन्दगी के लिए वक़्त होना चाहिए और इसलिए हर आर्ट जो ज़िन्दगी के लिए मुफ़ीद हो, अच्छा और जाइज़ है। और जो ज़िन्दगी के ख़िलाफ़ हो, जो इन्सानों की हिम्मतों को पस्त और उनके जज़बाते-आलिया (उच्च भावनाओं) को मुर्दा करने वाला हो, क़ाबिले-नफ़रत है और उसकी तरवीज (प्रसार) हुकूमत की तरफ़ से ममनू (निषिद्ध) क़रार दी जानी चाहिए।" इसी ख्य़ाल के तहत १९०५ तक (जब तक वे उच्च शिक्षा के लिए यूरोप नहीं गए थे) वे देश-प्रेम में डूबी हुई तथा भारत की पराधीनता और दरिद्रता पर खून के आँसू रुलाने वाली नज़्मों की रचना करते रहे। उन्होंने हर किसी के मुख में यह प्रार्थना डाली:

हो मेरे दम से यूं ही मेरे वतन की ज़ीनत
जिस तरह फूल से होती है चमन की ज़ीनत


फिर १९०५ में उनका यूरोप जाना हुआ। वहाँ छोटे-बड़े और काले-गोरे का भेद-भाव देखकर उनके हृदय पर गहरी चोट लगी। अब विशाल अध्ययन तथा विस्तृत निरीक्षण के बाद उनकी क़लम से ऐसे शेर निकलने लगे:

दियारे-मग़रिब के रहनेवालों खुदा की बस्ती दुकां नहीं है
खरा जिसे तुम समझ रहे हो, वो अब ज़रे-कम-अयार होगा
तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही खुदकशी करेगी
जो शाख़े-नाजुक पे आशियाना बनेगा नापायदार होगा


वे अब प्रगतिशील शायरी की और कूच करने लगे। ये इक़बाल ही थे जिन्होंने सबसे पहले ‘इंक़िलाब’ (क्रान्ति) का प्रयोग राजनीतिक तथा सामाजिक परिवर्तन के अर्थों में किया और उर्दू शायरी को क्रान्ति का वस्तु-विषय दिया। पूँजीपति और मज़दूर, ज़मींदार और किसान, स्वामी और सेवक, शासक और पराधीन की परस्पर खींचातानी के जो विषय हम आज की उर्दू शायरी में देखते हैं, उन सबपर सबसे पहले इक़बाल ने ही क़लम उठाई थी और यही वे विषय हैं जिनसे उनके बाद की पूरी पीढ़ी प्रभावित हुई और यह प्रभाव राष्ट्रवादी, रोमांसवादी और क्रान्तिवादी शायरों से होता हुआ आधुनिक काल के प्रगतिशील शायरों तक पहुँचा है।

१९०८ में यूरोप से लौटने के बाद वे उर्दू की बजाय फ़ारसी में अधिक लिखने लगे। फ़ारसी इस्तेमाल करने का कारण यह था कि उर्दू भाषा का शब्द-भण्डार फ़ारसी के मुक़ाबले में बहुत कम है। वहीं कुछ लोगों का मत यह है कि अब वे केवल भारत के लिए नहीं, संसार-भर के मुसलमानों के लिए शे’र कहना चाहते थे। कारण कुछ भी हो, वास्तविकता यह है कि फ़ारसी भाषा में शे’र कहने से उनका यश भारत से निकलकर न केवल ईरान, अफ़ग़ानिस्तान, टर्की और मिश्र तक पहुँचा, बल्कि ‘असरारे-ख़ुदी’ (अहंभाव के रहस्य) पुस्तक की रचना और डॉक्टर निकल्सन के उसके अंग्रेज़ी अनुवाद से तो पूरे यूरोप और अमरीका की नज़रें इस महान भारतीय कवि की ओर उठ गईं। और फिर अंग्रेज़ी सरकार ने उन्हें ‘सर’ की श्रेष्ठ उपाधि प्रदान की।

इक़बाल का जन्म ९ नवंबर १८७७ को स्यालकोट में हुआ था। पुरखे कश्मीरी ब्राह्मण थे जिन्होंने तीन सौ वर्ष पूर्व इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया था और कश्मीर से निकलकर पंजाब में आ बसे थे। उनके पिता एक अच्छे सूफी संत थे। यह उनके पिता की हीं तालीम थी कि इक़बाल की शायरी में गहरी सोच के दर्शन होते हैं। जैसे कि इन्हीं शेरों को देखिए:

पत्थर की मूरतों में समझा है तू ख़ुदा है
ख़ाक-ए-वतन का मुझ को हर ज़र्रा देवता है

ख़ुदा के बन्दे तो हैं हज़ारों बनो‌ में फिरते हैं मारे-मारे
मैं उसका बन्दा बनूँगा जिसको ख़ुदा के बन्दों से प्यार होगा

भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूँ, सज़ा चाहता हूँ


इक़बाल के बारे में इतनी जानकारियों के बाद चलिए अब हम आज की ग़ज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की ग़ज़ल को अपनी मखमली आवाज़ से मुकम्मल किया है उस्ताद मेहदी हसन ने। तो लीजिए पेश-ए-खिदमत है "राख" को परीशां करके "दिल" बना देने वाली ग़ज़ल, जो इक़बाल की पुस्तक "बाम-ए-जिब्रील" में दर्ज़ है:

परीशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए
जो मुश्किल अब है यारब फिर वोही मुश्किल न बन जाए

कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को
___ सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए

बनाया इश्क़ ने दरिया-ए-ना-पैगा-गराँ मुझको
ये मेरी ख़ुद निगहदारी मेरा साहिल न बन जाए

अरूज़-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
के ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "बेगाने" और शेर कुछ यूँ था-

गै़रों की दोस्ती पर क्यों ऐतबार कीजे
ये दुश्मनी करेंगे, बेगाने आदमी हैं

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

चलो अच्छा है अपनों में कोई गैर तो निकला.
अगर होते सभी अपने तो बेगाने कहाँ जाते. (राजेंद्र कृष्ण)

अगर पाना है सुकून तो कुछ बेगाने तलाश कर
अपनों के यहाँ तो आजकल महफ़िल नहीं होती (अवनींद्र जी)

जब से वे दिल की महफ़िल से रुखसत हुए ,
सारे मोसम अपने अब बेगाने हो गए . (मंजु जी)

अपनों- बेगानों का फ़रक न रहा होता ,
कभी वो नजरें यूं चुरा के न गया होता
जाना ही था तो बता के जाता ,
रास्ता हमने खुद ही दिखा दिया होता (नीलम जी)

जिस की ख़ातिर शहर भी छोड़ा जिस के लिये बदनाम हुए,
आज वही हम से बेगाने-बेगाने से रहते हैं| (हबीब जालिब)

ख्वाबों पे कोई जोर नहीं उनकी मनमानी होती है
बेगाने दिल में बसने की उनसे नादानी होती है. (शन्नो जी)

यूँ तो पिछली महफ़िल के सबसे पहले मेहमान थे "नीरज रोहिल्ला" जी, लेकिन सही शब्द की पहचान कर अवध जी महफ़िल की शान बने। नीरज जी, सच कहूँ तो महफ़िल सजाने से पहले मुझे भी इस बात की जानकारी नहीं थी कि "ख़ूब परदा है... " वाला शेर "दाग़" का है। मैं बता नहीं सकता कि महफ़िल लिखने का मुझे कितना फायदा हो रहा है। आलेख पसंद करने के लिए आपका और अन्य मित्रों का तह-ए-दिल से आभार। अवध जी, ये हाज़िर-गैरहाज़िर होने का खेल कब तक खेलते रहिएगा.. हमारे नियमित पाठक/श्रोता क्यों नहीं बन जाते.. :) अवनींद्र जी, आपके इस स्वरचित शेर के क्या कहने.. इसी तरह हर बार महफ़िल में चार चाँद लगाते रहें। मंजु जी और नीलम जी, हमें अच्छा लगा कि हमारे बहाने आपको भी छुट्टी मिल गई :) लेकिन आगे से ऐसा नहीं होगा.. हम इसका आपको यकीन दिलाते हैं। सजीव जी, महफ़िल जैसी भी बन पड़ी है, सब आपकी दुआओं का हीं असर है.. हमारे लिए यूँ हीं दुआ करते रहिएगा। शन्नो जी, आपको भी जन्माष्टमी की शुभकामनाएँ, और हाँ ईद, तीज और गणेश-चतुर्थी की शुभकामनाएँ भी लगे हाथों कबूल कीजिए। (बस शन्नो जी हीं क्यों.. ये बधाईयाँ तो हरेक स्वजन के लिए हैं)। आशीष जी, हबीब साहब के शेरों से हमें रूबरू कराने के लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, July 28, 2010

सरकती जाये है रुख से नक़ाब .. अमीर मीनाई की दिलफ़रेब सोच को आवाज़ से निखारा जगजीत सिंह ने

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९४

वो बेदर्दी से सर काटे 'अमीर' और मैं कहूँ उन से,
हुज़ूर आहिस्ता-आहिस्ता जनाब आहिस्ता-आहिस्ता।

आज की महफ़िल इसी शायर के नाम है, जो मौत की माँग भी अपने अलहदा अंदाज़ में कर रहा है। इस शायर के क्या कहने जो औरों के दर्द को खुद का दर्द समझता है और परेशान हो जाता है। तभी तो उसे कहना पड़ा है कि:

खंजर चले किसी पे तड़पते हैं हम 'अमीर'
सारे जहाँ का दर्द हमारे जिगर में है

इन दो शेरों के बाद आप समझ तो गए हीं होंगे कि मैं किन शायर कि बात कर रहा हूँ। अरे भाई, ये दोनों शेर दो अलग-अलग गज़लों के मक़ते हैं और नियमानुसार मक़ते में शायर का तखल्लुस भी शामिल होता है। तो इन दो शेरों में तखल्लुस है "अमीर"। यानि कि शायर का नाम है "अमीर" और पूरा नाम... "अमीर मीनाई"।

अमीर मीनाई के बारे में बहुत कुछ तो नहीं है अंतर्जाल पर. जितना कि इनके समकालीन "दाग़ दहलवी" के बारे में है। और इसकी वज़ह जानकारों के हिसाब से यह है कि दाग़ उस जमाने के "हिन्दी और उर्दू" के सबसे बड़े शायर थे और उन्होंने हीं "हिन्दी-उर्दू" शायरी को "फ़ारसी" के फ़ंदे से बाहर निकाला था, वहीं अमीर की मक़बूलियत बस कुछ ग़ज़लों और "पैगम्बर-ए-इस्लाम" के लिए लिखे हुए उनके कुछ क़सीदों के कारण थी। चाहे जो भी सबब हो और भले हीं अमीर की प्रसिद्धि दाग़ से कम हो, लेकिन सादगी के मामले में अमीर का कोई सानी न था। यह जानते हुए भी कि लोग दाग को ज्यादा सराहते थे, अमीर उन लोगों में हीं शामिल हो जाते थे और खुलकर दाग का पक्ष लेते थे। इस बारे में एक वाक्या बड़ा हीं प्रसिद्ध है:

एक बार मुंशी ‘मुनीर’ शिकोहाबादी ने सरे-दरबार हजरत ‘दाग़’ का दामन थामकर कहा कि-‘क्या तुम्हारे शेर लोगोंकी ज़वानों पर रह जाते हैं और मेरे शेरों पर लोंगों की न ख़ास तवज्जह होती है, न कोई याद रखता है।’ इसपर जनाब ‘अमीर मीनाई’ ने फ़र्माया- "यह खुदादाद मक़बूलियत है, इसपर किसीका बस नहीं।"

तो ऐसा खुला-दिल और साफ़-दिल थे अमीर मीनाई। चलिए इनके बारे में थोड़ा और जानते हैं:

अमीर अहमद अमीर मीनाई का जन्म १८२८ में लखनऊ में हुआ था। उन्होंने बहुत हीं कम उम्र (१५ साल) में जनाब मुज़फ़्फ़र अली असीर की शागिर्दगी में शायरी लिखनी शुरू कर दी थी और इस कारण लड़कपन में हीं अपनी शायरी के कारण खासे मक़बूल भी हो गए। महज़ २४ साल की उम्र में उन्हें राज-दरबार में सम्मानित किया गया। १८५७ में जब लखनऊ अपने पतन की ओर अग्रसर हो उठा तो अमीर मीनाई की माली हालत भी धीरे-धीरे खराब होने लगी। अपनी इस हालत को सुधारने के लिए उन्हें रामपुर के नवाब का आग्रह मानना पड़ा। और वे लखनऊ छोडने को विवश हो उठे। रामपुर जाने के बाद वे वहाँ ३४ साल रहे। वहाँ वे पहले नवाब युसूफ़ अली खाँ और फिर कलब अली खाँ के दरबार में रहे। रामपुर के नवाबों के इंतक़ाल के बाद अमीर हैदराबाद की ओर कूच कर गए। वहाँ वे निज़ामों के लिए शायरी करने लगे। लेकिन उन्हें यह बंदगी रास न आई और सिर्फ़ ९ साल के बाद हीं वे जहां-ए-फ़ानी को छोड़ने पर आमादा हो उठे। इस तरह १९०० ईस्वी में शायरी और ग़ज़लों ने उन्हें अंतिम विदाई दी।

अमीर मीनाई न सिर्फ़ साहित्य के अनमोल रत्न थे(हैं), बल्कि वे एक जाने-माने दार्शनिक और शब्द-कोषकर्त्ता (lexicographer) भी थे। उन्होंने एक शांत और संयम से भरी आध्यात्मिक ज़िंदगी व्यतीत की। वे घमंड और ईर्ष्या से दूर एक बड़े हीं नेक इंसान थे। उनकी यह खासियत उनकी शायरी में बःई दिखती है, जो बिना किसी लाग-लपेट के लिखी हुई मालूम पड़ती है।

अमीर मीनाई ने पैग़म्बरे इस्लाम और उनके परिजनों की प्रशंसा में बहुत से कसीदे लिखे हैं। उनकी कुल २२ पुस्तकें हैं, जिनमें "मसनविए नूरे तजल्ली" , "मसनविए अब्रे तजल्ली" और "शामे अबद" का नाम सबसे आगे आता है। जहाँ तक शायरी के संकलन का सवाल है तो इस मामले में उनके दो संकलन खासे मक़बूल हुए - "मराफ़ उल गज़ब" और "सनम खान ए इश्क़"।

हमने अमीर के उस्ताद के बारे में तो जान लिया। अब बारी है इनके शागिर्दों की। यूँ तो अमीर के कई शागिर्द थे, लेकिन जिन दो का नाम बड़ी इज़्ज़त से लिया जाता है - उनमें से एक थे "जां निसार अख़्तर" के अब्बा मुज़तर ख़ैराबादी और दूसरे मुमताज़ अली ’आह’। ’आह’ ने अमीर मीनाई पर एक किताब भी लिखी है, जिसका नाम है -"सीरत-ए-अमीर अहमद अमीर मीनाई"। इस कि़ताब में अमीर मीनाई से जुड़े ढेर सारे वाक़यात हैं। उन्हीं में से एक है "अमीर मीनाई" द्वारा "ग़ालिब" की जमीन पर दो-दो गज़लों का लिखा जाना। नहीं समझे? अच्छा तो आपने ग़ालिब की वो ग़ज़ल तो पढी हीं होगी जिसका मतला है:

यह न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इन्तिज़ार होता !

जिस दौरान (लगभग १८६० में) ग़ालिब ने यह ग़ज़ल लिखी थी, उस समय अमीर नवाब युसुफ़ अली ख़ान ’नाज़िम’ वाली-ए-रामपुर के दरबार से मुन्सलिक थे। नवाब साहब की फ़रमाईश पर अमीर ने इसी जमीन पर ग़ज़ल लिखी थी। ये तो सभी जानते हैं कि अमीर बहुत बिसयार-गो (लंबी-लंबी ग़ज़लें लिखने वाले) थे, तो उन्होंने इसी जमीन पर दूसरी भी ग़ज़ल लिख डाली। मैं दोनों ग़ज़लें पूरी की पूरी यहाँ पेश तो नहीं कर सकता, लेकिन हाँ उन ग़ज़लों के दो-दो शेर आपको उपलब्ध करवाए देता हूँ। पूरी ग़ज़ल पढनी हो तो यहाँ जाएँ:

ग़ज़ल १:

मिरे बस में या तो यारब ! वो सितम-शि’आर होता
ये न था तो काश दिल पर मुझे इख़्तियार होता !

मिरी ख़ाक भी लहद में न रही ’अमीर’ बाक़ी
उन्हें मरने ही का अब तक नहीं ऐतिबार होता !


ग़ज़ल २:

नयी चोटें चलतीं क़ातिल जो कभी दो-चार होता
जो उधर से वार होता तो इधर से वार होता

शब-ए-वस्ल तू जो बेख़ुद नो हुआ ’अमीर’ चूका
तिरे आने का कभी तो उसे इन्तिज़ार होता !


इन दो ग़ज़लों से रूबरू कराने के बाद चलिए अब आपके सामने अमीर साहब के दो-तीन फुटकर शेर भी पेश किए देता हूँ:

मेहरबाँ होके बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त
मैं गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूँ

तेरी मस्जिद में वाइज़ ख़ास हैं औक़ात रहमत के,
हमारे मयकदे में रात-दिन रहमत बरसती है।

गर्द उड़ी आशिक़ की तुरबत से तो झूंझलाकर कहा,
वाह! सिर पे चढने लगी पाँव की ठुकराई हुई।


इतनी बातचीत के बाद अब हमें आज की ग़ज़ल की ओर रूख करना चाहिए। क्या कहते हैं आप? है ना। तो आज हम जो ग़ज़ल लेकर आप सबके सामने हाज़िर हुए हैं, उसे गाया है ग़ज़ल गायकी के उस्ताद और अपने चहेतों के बीच "जग्गू दादा" के नाम से जाने जाने वाले "जगजीत सिंह" जी ने। जग्गू दादा यह ग़ज़ल जितनी दफ़ा गाते हैं, उतनी दफ़ा वे इसमें अलग-अलग तरह का तड़का डालते हैं, क्योंकि उनके हिसाब से इसी ग़ज़ल से उन्हें मक़बूलियत हासिल हुई थी। मैं यह ग़ज़ल आपको सुनवाऊँ, उससे पहले यह बताना चाहूँगा कि किस तरह इसी जमीन का इस्तेमाल कर दो अलग-अलग शायरों/गीतकारों ने दो अलग-अलग गानों को तैयार किया है। हसरत जयपुरी ने लिखा "मोहब्बत रंग लाएगी जनाब आहिस्ता-आहिस्ता" तो निदा फ़ाज़ली साहब ने इसी तर्ज़ पर "नज़र से फूल चुनती है नज़र आहिस्ता-आहिस्ता" को जन्म दिया। है ना ये कमाल की बात। ऐसे कमाल तो रोज हीं हिन्दी फिल्मों में होते रहे हैं। जनाब हसरत जयपुरी ने ऐसा तो मोमिन खाँ मोमिन के शेर "तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता" के साथ भी किया था, जब उन्होंने इसी शेर को एक-दो शब्द काँट-छाँटकर अपने गाने "ओ मेरे शाहे-खुबाँ" में जोड़ लिया था। अरे भाई, अगर किसी का शेर पसंद आ जाए तो उसे जस-का-तस अपने गाने/गज़ल में रखो, लेकिन हाँ उसे क्रेडिट भी दो। ओह्ह.. क्रेडिट की बात अगर हमने शुरू कर दी तो फिर "बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी।" इसलिए इस बहस को यही विश्राम देते हैं और सुनते हैं जग्गू दादा की मखमली आवाज़ में आज की ग़ज़ल:

सरकती जाये है रुख़ से नक़ाब आहिस्ता-आहिस्ता
निकलता आ रहा है आफ़ताब आहिस्ता-आहिस्ता

जवाँ होने लगे जब वो तो हम से कर लिया पर्दा
हया यकलख़्त आई और ____ आहिस्ता-आहिस्ता

शब-ए-फ़ुर्कत का जागा हूँ फ़रिश्तों अब तो सोने दो
कभी फ़ुर्सत में कर लेना हिसाब आहिस्ता-आहिस्ता

सवाल-ए-वस्ल पर उन को उदू का ख़ौफ़ है इतना
दबे होंठों से देते हैं जवाब आहिस्ता आहिस्ता

हमारे और तुम्हारे प्यार में बस फ़र्क़ है इतना
इधर तो जल्दी जल्दी है उधर आहिस्ता आहिस्ता




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "सबा" और शेर कुछ यूँ था-

किसी खयाल की खुशबू, किसी बदन की महक,
दर-ए-क़फ़स पे खड़ी है सबा पयाम लिए।

इस शब्द पर ये सारे शेर महफ़िल में कहे गए:

सबा से ये कह दो कि कलियाँ बिछाए, वो देखो वो जानेबहार आ रहा है,
चुरा ले गया है जो इन आँखों की नींदें, वोही ले के दिल का करार आ रहा है. - जलील "मलीहाबादी"

जो आके रुके दामन पे ’सबा’, वो अश्क नहीं है पानी है
जो अश्क न छलके आँखों से,उस अश्क की कीमत होती है - सबा अफ़गानी (नीलम जी, ये तो बड़ा गज़ब किया आपने। शेर ऐसा डालना था जिसमें ’सबा’ का कोई मतलब निकले, लेकिन यहाँ तो "सबा" रचनाकार का हीं नाम है.. चलिए इस बार मुआफ़ किया :) अगली बार से ध्यान रखिएगा।)

उसकी बातों से बेरुखाई की सबा आती है
पर यादों ने दम तोड़ना न सीखा अब तक. (शन्नो जी)

किसी की शाम ए सादगी सहर का रंग पा गयी
सबा के पाव थक गये मगर बहार आ गयी। (’अनाम’ शायर)

बस चार शेरों को देखकर आप सब सकते में तो आ हीं गए होंगे। क्योंकि जहाँ पिछली महफ़िल में २९ टिप्पणियाँ (यह पोस्ट लिखने तक) आईं, उनमें काम के बस ४ हीं शेर निकले। तो दर-असल बात ये है कि आपकी "ग़ज़ल" बिना सुने टिप्पणी देने की आदत ने हीं आप सबों का लुटिया डुबोया है। आशीष जी ने जैसे हीं यह लिख दिया कि सही शब्द "हवा" है, आप सब "हवा" के पीछे पड़ गए और शेर पर शेर उड़ेलने लगे। अरे भाईयों, कम से कम एक बार ग़ज़ल को सुन तो लिया होता। उसके बाद आराम से शेर लिखते, किस चीज की जल्दीबाजी थी। अब मैं यह नहीं समझ पा रहा कि जब आपके पास ग़ज़ल सुनने को वक़्त नहीं तो मैं इतना बड़ा पोस्ट जो लिखता हूँ, उसे पढने की जहमत आप उठाते होंगे भी या नहीं। क्योंकि ग़ज़ल सुनने में तो कोई मेहनत भी नहीं करनी पड़ती, जबकि पढने में आँखों और दिमाग को कष्ट देना होता है। फिर जब आप सुनने की हीं मेहनत नहीं करना चाहते (अब आप यह नहीं कहिएगा कि ग़ज़ल सुने थे, और वह गायब शब्द हवा हीं था.... यह संभव हीं नहीं है क्योंकि आबिदा परवीन की आवाज़ इतनी भी उलझाऊ/कन्फ़्यूज करने वाली नहीं) तो और किसी चीज की उम्मीद तो बेबुनियाद हीं है। मैं यह सब क्यों कह रहा हूँ? पता नहीं... मुझे बस इतना पता है कि मैं आप सबको अपने परिवार का एक अंग, एक सदस्य मानता हूँ और इसीलिए महफ़िल में पूरी तरह से रम जाता हूँ। अब अगर आप इतना भी सहयोग नहीं करेंगे कि कम से कम ग़ज़ल सुन लें तो फिर मेरा हौसला तो जाता हीं रहेगा.. ना? शायद मैं हद से ज्यादा भावुक हो रहा हूँ। अगर यह बात है तो भी मैं शांत नहीं रहने वाला। फिर आप चाहे इसे मेरा बाल-हठ समझें या कुछ और.. लेकिन अगली बार से आपने ऐसी गलती की तो मैं इससे भी बड़ा "सेंटी"(दू:ख से जन्मा, दु:ख से भरा और दु:खी कर देने वाला) नोट लिखूँगा। ठीक है? :) हाँ तो, "हवा" और "सबा" की इस रस्सा-कस्सी में ’सबा’ की जीत हुई और इस नाते "अवध" जी पिछली महफ़िल के "सरताज़" घोषित किए जाते हैं।

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Wednesday, July 21, 2010

ये कौन आता है तन्हाईयों में जाम लिए.. मख़्दूम मोहिउद्दीन के लफ़्ज़ औ' आबिदा की पुकार..वाह जी वाह!

महफ़िल-ए-ग़ज़ल #९३

दिन से महीने और फिर बरस बीत गये
फिर क्यूं हर शब तन्हाई आंख से आंसू बनकर ढल जाती है
फिर क्यूं हर शब तेरे शे’र तेरी आवाज गूंजा करती है
फजाओं में आसमानों में
मुझे यूं महसूस होता है
जैसे तू हयात बन गया है
और मैं मर गया हूं।

अपने पिता "मख़्दूम मोहिउद्दीन" को याद करते हुए उनके जन्म-शताब्दी के मौके पर उनके पुत्र "नुसरत मोहिउद्दीन" की ये पंक्तियाँ मख़्दूम की शायरी के दीवानों को अश्कों और जज़्बातों से लबरेज कर जाती हैं। मैंने "मख़्दूम की शायरी के दीवाने" इसलिए कहा क्योंकि आज भी हममें से कई सारे लोग "मख़्दूम" से अनजाने हैं, लेकिन जो भी "मख्दूम" को जानते हैं उनके लिए मख़्दूम "शायर-ए-इंक़लाब" से कम कुछ भी नहीं। जिसने भी "मख़्दूम" की शायरी पढी या सुनी है, वह उनका दीवाना हुए बिना रह नहीं सकता। हैदराबाद से ताल्लुक रखने वाला यह शायर "अंग्रेजों" और "निज़ाम" की मुखालफ़त करने के कारण हमेशा हीं लोगों के दिलों में रहा है। उर्दू अदब में कई सारे ऐसे शायर हुए हैं, जिन्हें बस लिखने से काम था, तो कई ऐसे भी हुए हैं, जिन्होंने जहाँ अपनी लेखनी से आग लगाई, वहीं अपनी हरक़तों से "शासन" की नाक में दम तक कर दिया। "मख़्दूम" इसी दूसरी तरह के शायर थे। "तेलंगना" की माँग (यह माँग अभी तक चल हीं रही है) और "हैदराबाद" को "निज़ाम" से मुक्त कराने का जुनून इनकी आँखों में और इनके जज़्बो में बखूबी नज़र आता था। "तेलंगना" की स्त्रियों (जिन्हें तेलंगन कहा जाता है) को जगाने के लिए इनकी लिखी हुई यह नज़्म आज भी वही पुरजोर असर रखती है:

फिरने वाली खेत की मेड़ों पर बलखाती हुई,
नर्मो-शीरीं क़हक़हों के फूल बरसाती हुई,
कंगनों से खेलती, औरों से शरमाती हुई,

अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा,
हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा।

देखने आते हैं तारे शब में सुनकर तेरा नाम,
जलवे सुबह-ओ-शाम के होते हैं तुझसे हमकलाम,
देख फितरत कर रही है, तुझको झुक-झुककर सलाम,

अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा,
हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा।

ले चला जाता हूँ आँखों में लिए तस्वीर को,
ले चला जाता हूँ पहलू में छुपाए तीर को,
ले चला जाता हूँ फैला राग की तनवीर को,

अजनबी को देखकर खामोश मत हो, गाए जा,
हाँ तेलंगन गाए जा, बाँकी तेलंगन गाए जा।

मख़्दूम ऐसी आज़ादी का सपना देखते थे, जिसमें मज़दूरों का राज हो, जहाँ सही मायने में "स्वराज" हो। इस मुद्दे पर लिखी मख़्दूम की यह नज़्म "आजादी के मतवालों" के बीच बेहद मक़बूल थी, भले हीं गाने वालों को इसके "नगमानिगार" की जानकारी न हो:

वह जंग ही क्या वह अमन ही क्या
दुश्मन जिसमें ताराज़ न हो
वह दुनिया दुनिया क्या होगी
जिस दुनिया में स्वराज न हो
वह आज़ादी आज़ादी क्या
मज़दूर का जिसमें राज न हो

लो सुर्ख़ सवेरा आता है आज़ादी का आज़ादी का
गुलनार तराना गाता है आज़ादी का आज़ादी का
देखो परचम लहराता है आज़ादी का आज़ादी का

मख़्दूम का "बागी तेवर" देखकर आप सबको यह यकीन हो चला होगा कि ये बस इंक़लाब की हीं बोली जानते हैं.. इश्क़-मोहब्बत से इनका दूर-दूर का नाता नहीं। लेकिन ऐसा कतई नहीं है। दर-असल इश्क़े-मजाज़ी में इनका कोई सानी नहीं। प्यार-मोहब्बत की भाषा इनसे बढकर किसी ने नही पढी। कहने वाले यहाँ तक कहते हैं कि "मजाज़ लखनवी" "उर्दू अदब के कीट्स" न कहे जाते, अगर "मख्दूम" ने "मजाज़" के लिए "जमीन" न तैयार की होती। मजाज़ ने इश्क़िया शायरी के जलवे इन्हीं से सीखे हैं। इश्क़ में कोई कहाँ तक लिख सकता है, इसकी मिसाल मख़्दूम साहब का यह शेर है:

न माथे पर शिकन होती, न जब तेवर बदलते थे
खुदा भी मुस्‍कुरा देता था जब हम प्यार करते थे


मख़्दूम की इसी अनोखी अदा पर रीझ कर "ग़ालिब" के शागिर्द "मौलाना हाली" के नाती "ख्वाज़ा अहमद अब्बास" कहते हैं: ”मख्दूम एक धधकती ज्वाला थे और ओस की ठंडी बूंदे भी। वे क्रांतिकारी छापामार की बंदूख थे और संगीतकार का सितार भी। वे बारूद की गंध थे और चमेली की महक भी।”

मख़्दूम साहब की जन्म-शताब्दी के मौके पर नुसरत मोहिउद्दीन और "हिन्दी साहित्य संवाद" के संपादक शशिनारायण स्वाधीन के द्वारा संपादित की हुई पुस्तक "सरमाया - मख़्दूम समग्र" का विमोचन किया गया। इस पुस्तक में "बक़लम-मख़्दूम" नाम से एक अध्याय है,जिसमें मख़्दूम साहब ने "शेरो-शायरी" पर खुलकर चर्चा की है। खैर.. इस किताब की बात कभी बाद में करेंगे। वैसे क्या आपको पता है कि मख्दूम ने तेलंगाना में किसानों के साथ जो संघर्ष किया उसे लेकर उर्दू के महान उपन्यासकार कृषन चंदर ने ‘जब खेत जागे’ नाम का उपन्यास लिखा था, जिस पर गौतम घोष ने तेलुगू में ‘मां भूमि’ फिल्म बनाई। मख्दूम की प्रमुख कृतियों में सुर्ख सवेरा, गुल-ए-तर और बिसात-ए-रक्स हैं। इतना हीं नहीं, मख्दूम ने जार्ज बर्नाड शा के नाटक ‘विडोवर्स हाउस’ का उर्दू में ‘होष के नाखून’ नाम से और एंटन चेखव के नाटक ‘चेरी आर्चर्ड’ का ‘फूल बन’ नाम से रूपांतर किया। मख्दूम ने रवींद्रनाथ टैगोर और उनकी शायरी पर एक लंबा लेख भी लिखा। इसके अलावा मख़्दूम ने तीन कविताओं के अनुवाद किए, जिनमें एक कविता "तातरी शायर" जम्बूल जावर की है, तो दो कविताएँ अंग्रेजी कवयित्री इंदिरा देवी धनराजगीर की हैं। अगर जगह की कमी न होती, तो मैं आपका परिचय इन तीन कविताओं से जरूर करवाता।

बातें बहुत हो गईं, फिर भी कहने को कई सारी चीजें बची हैं। सब कुछ तो एक महफ़िल में समेटा नहीं जा सकता, इसलिए अगर आपकी जिज्ञासा शांत न हुई हो तो कृपया यहाँ और यहाँ हो आएँ। चलिए, अब आज की ग़ज़ल की ओर रूख करते हैं। आज की ग़ज़ल एक तरह से बड़ी हीं खास है। एक तरह से क्यों. दोनों हीं तरह से खास है. और वो इसलिए क्योंकि इस ग़ज़ल में आवाज़ें हैं "मुज़फ़्फ़र अली" और "आबिदा परवीन" की। आवाज़ों का ये संगम इससे पहले और इसके अलावा कहीं और सुनने को नहीं मिलता। मुज़फ़्फ़र साहब के आवाज़ की शोखी और आबिदा की आवाज़ का मर्दानापन "ग़ज़ल" को किसी और हीं दुनिया में ले जाता है। तो तैयार हो जाईये, इस अनूठी ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाने को:

उसी अदा से, उसी बांकपन के साथ आओ,
फिर एक बार उसी अंजुमन के साथ आओ,
हम अपने एक दिल-ए-बेखता के साथ आएँ,
तुम अपने महशर-ए-दार-ओ-रसन के साथ आओ।

ये कौन आता है तन्हाईयों में जाम लिए,
दिलों में चाँदनी रातों का एहतमाम लिए।

चटक रही है किसी याद की कली दिल में,
नज़र में रक़्स-ए-बहारां की सुबहो-शाम लिए।

महक-महक के जगाती रही नसीम-ए-सहर,
लबों पे यार-ए-मसीहा नफ़स का नाम लिए।

किसी खयाल की खुशबू, किसी बदन की महक,
दर-ए-क़फ़स पे खड़ी है ____ पयाम लिए।

बजा रहा था कहीं दूर कोई शहनाई,
उठा हूँ आँखों में इक ख्वाब-ए-नातमाम लिए।




चलिए अब आपकी बारी है महफ़िल में रंग ज़माने की... ऊपर जो गज़ल हमने पेश की है, उसके एक शेर में कोई एक शब्द गायब है। आपको उस गज़ल को सुनकर सही शब्द की शिनाख्त करनी है और साथ ही पेश करना है एक ऐसा शेर जिसके किसी भी एक मिसरे में वही खास शब्द आता हो. सही शब्द वाले शेर ही शामिल किये जायेंगें, तो जेहन पे जोर डालिए और बूझिये ये पहेली!

इरशाद ....

पिछली महफिल के साथी -

पिछली महफिल का सही शब्द था "क़यामत" और शेर कुछ यूँ था-

तेरा पहलू तेरे दिल की तरह आबाद रहे
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की

कई हफ़्तों के बाद महफ़िल में पहली हाज़िरी लगाई शरद जी ने और इसलिए उन्हें "शान-ए-महफ़िल" से नवाज़ा जा रहा है। शरद जी के बाद महफ़िल में चहल-कदमी करती हुई शन्नो जी नज़र आईं.. आपने अपने शेर कहने शुरू हीं किए थे कि "जाने-अनजाने" नीलम जी की कही एक बात आपको चुभ गई.. फिर आगे चलकर अवनींद्र जी ने कुछ कहा और उनके कहे पर आपने अपना एक शेर डाल दिया जिससे अवनींद्र जी कुछ उदास हुए और आप परेशान हो गईं। अरे भाईयों, दोस्तों.. ये हो क्या रहा है? हम फिर से वही गलतियाँ क्यों कर रहे हैं, जिनसे सब के सब तौबा कर चुके हैं। यहाँ पर मैं किसी एक पर दोष नहीं डाल रहा, लेकिन इतना तो कहना हीं चाहूँगा कि ये "बचकानी" हरकतें "महफ़िल" में सही नहीं लगती। मेरे अग्रजों एवं मेरी अग्रजाओं(चूँकि आप सब मुझसे बड़े हैं.. उम्र में) ज़रा मेरा भी तो ध्यान करो.. मैं महफ़िल सजाऊँ या फिर महफ़िल पर निगरानी रखूँ। मैं पहले हीं कह चुका हूँ कि महफ़िल आपकी है, इसलिए लड़ना-झगड़ना या महफ़िल छोड़कर जाना (या फिर जाने की सोचना) तो अच्छा नहीं। आपको किसी की बात बुरी लगे तो नज़र-अंदाज़ कर दीजिए... लेकिन उससे बड़ा मसला तो ये है कि ऐसी बात कहीं हीं क्यों जाए। कभी-कभी कहने वाले की मंशा बुरी नहीं होती, लेकिन चूँकि वो खुलकर कह नहीं पाता या फिर "बात" को "आधे" पर हीं रोक देता है, ऐसी स्थिति में अन्य लोग उसका कुछ भी मतलब निकाल सकते हैं.. और अगर मतलब "अहितकारी" हुआ तो "बुरा" भी मान सकते हैं। इसलिए ऐसी बातें करने से बचें। मैंने अभी तक जो भी कहा, वो कोई आदेश नहीं, बल्कि "एक छोटे भाई" का आग्रह-मात्र है। अगर आप मानेंगे तो आपका अनुज "सही से" महफ़िल का संचालन कर पाएगा। चँकि आज इतना कुछ कह दिया, इसलिए दूसरे मित्रों, अग्रजों एवं अग्रजाओं का जिक्र नहीं कर पा रहा हूँ। इस गुस्ताखी के लिए मुझे मुआफ़ कीजिएगा। मैं यकीन दिलाता हूँ कि अगली महफ़िल में सारी "टिप्पणियाँ" सम्मिलित की जाएँगी... बशर्ते ऐसी हीं कोई विकट समस्या उत्पन्न न हो जाए। और हाँ, मेरी तबियत अब ठीक है, आप सबने मेरा ख्याल रखा, इसके लिए आपका तहे-दिल से आभार!

और अब पेश हैं आप सबके शेर:

ग़र खुदा मुझसे कहे कुछ माँग अय बन्दे मेरे
मैं ये माँगू महफ़िलों के दौर यूँ चलते रहें ।
हमनिवाला, हमपियाला, हमसफ़र, हमराज़ हों,
ता कयामत जो चिरागों की तरह जलते रहें ॥ (शरद जी)

माना के तबाही में कुछ हाथ है दुश्मन का
कुछ चाल कयामत की अपने भी तो चलते हैं (नीलम जी)

सुमन जो सेज पर सजे थे .
उन्ही से कयामत की अर्थी सजाई गई . (मंजु जी)

जाते हुए कहते हो क़यामत को मिलेंगे,
क्या ख़ूब ? क़यामत का है गोया कोई दिन और. (ग़ालिब)

ज़िंदगी की राहों में रंजो-ग़म के मेले हैं,
भीड़ है क़यामत की फिर भी हम अकेले हैं।

चेहरे पर झुर्रियों ने कयामत बना दिया
आईना देखने की भी हिम्मत नहीं रहीं (ख़ुमार बाराबंकवी)

जो दिल को ख़ुशी की आदत न होती
रूह में भी इतनी सदाक़त न होती !
ज़माने की लय पे जिए जाते होते
तेरी बेरुखी भी क़यामत न होती !! (अवनींद्र जी)

मेरी गुस्ताखियों को खुदा माफ़ करना
कि इसके पहले कोई क़यामत आ जाये. (शन्नो जी)

चलिए तो इन्हीं बातों के साथ अगली महफिल तक के लिए अलविदा कहते हैं। खुदा हाफ़िज़!

प्रस्तुति - विश्व दीपक


ग़ज़लों, नग्मों, कव्वालियों और गैर फ़िल्मी गीतों का एक ऐसा विशाल खजाना है जो फ़िल्मी गीतों की चमक दमक में कहीं दबा दबा सा ही रहता है. "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" श्रृंखला एक कोशिश है इसी छुपे खजाने से कुछ मोती चुन कर आपकी नज़र करने की. हम हाज़िर होंगे हर बुधवार एक अनमोल रचना के साथ, और इस महफिल में अपने मुक्तलिफ़ अंदाज़ में आपके मुखातिब होंगे कवि गीतकार और शायर विश्व दीपक "तन्हा". साथ ही हिस्सा लीजिये एक अनोखे खेल में और आप भी बन सकते हैं -"शान-ए-महफिल". हम उम्मीद करते हैं कि "महफ़िल-ए-ग़ज़ल" का ये आयोजन आपको अवश्य भायेगा.

Thursday, August 20, 2009

प्यार में आता नहीं उसको गुंजाइशें करना- हुमैरा रहमान

सुनिए मशहूर ऊर्दू शायरा हुमैरा रहमान का साक्षात्कार

हम समय-समय पर कला, साहित्य और संस्कृति जगत की हस्तियों से आपको रूबरु करवाते रहते हैं। आज मिलिए प्रसिद्ध ऊर्दू शायरा हुमैरा रहमान से, जिनका नाम परवीन शाक़िर की परम्परा को आगे बढ़ाने के तौर पर भी लिया जाता है। हुमैरा रहमान जब दिल्ली में हुए एक अंतर्राष्ट्रीय मुशायरा 'जश्न-ए-बहारा' में भाग लेने भारत आई थीं तो हमारे साथी निखिल आनंद गिरि ने उनसे मुलाक़ात की और इंटरनेट की दुनिया का परिचय दिया। हुमैरा ने पूरे एक घंटे तक कविता (ग़ज़ल), हिन्दुस्तान-पाकिस्तान-अमेरिका, रिश्ते, शिक्षा, राजनीति और अपनी पसंद-नापसंद, अपने बचपन पर खुलकर बात की। कुछ ग़ज़लें भी कहीं, कुछ सलाहें भी दी। सुनिए और बताइए कि आपको यह साक्षात्कार कैसा लगा?




हुमैरा रहमान

हुमैरा रहमान ऊर्दू शायरी का एक चर्चित नाम है और एक अंतर्राष्ट्रीय चेहरा है। हुमैरा की बचपन से ही साहित्य में रुचि थी। स्नातक की पढ़ाई करने के दरम्यान गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ मुल्तान (पाकिस्तान) के स्टूडेंट यूनियन की ये महासचिव रहीं। कॉलेज के दिनों से ही ये ग़ज़लपाठ, कार्यक्रम-प्रबंधन से जुड़ी रहीं। कॉलेज से पहले के दिनों में (1969-70) इन्होंने महिलाओं के लिए 'बज़्म-ए-हरीम-ए-फ़न' नामक साहित्यिक संस्था का गठन किया और इसकी महासचिव रहीं। आगे इनका जुड़ाव रेडियो पाकिस्तान, कराची (1971-76) से हुआ, जहाँ इन्होंने रेडियो उद्‍घोषक और ड्रामा कलाकार के तौर पर अपनी सेवाएँ दीं। हुमैरा का नाम पाकिस्तान की शुरू के तीन महिला उद्‍घोषकों में भी लिया जाता है। सन 1977 में ये बीबीसी, लंदन से जुड़ गयीं, जहाँ इन्होंने एनांउसर, स्क्रिप्ट लेखक के तौर पर काम किया (1988 तक)।

बाद में यह न्यूयॉर्क चली आयीं जहाँ 1990 में न्यूयॉर्क स्थित यॉन्कर्स पब्लिक लाइबरेरी में ये मॉडरेटर हो गईं और पाकिस्तान की सांस्कृतिक विरासत को दुनिया की नज़र करने के लिए अनेक प्रोग्रेम किये। 1999 में न्यूयॉर्क की एशिया सोशायटी के लिए भी मॉडरेटर का काम किया। 2000-2002 तक इन्होंने वेस्टचेस्टर मुस्लिम सेंटर, न्यूयॉर्क में ऊर्दू भाषा अध्यापन का काम किया। पिछले 1 साल से न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में ऊर्दू भाषा की संयुक्त प्रशिक्षक के तौर पर काम कर रही हैं।

दुनिया भर के लगभग सभी नामी मुशायरों में हुमैरा रहमान काव्यपाठ कर चुकी हैं। देश-विदेश के रेडियो और टीवी कार्यक्रमों में अपनी ग़ज़लों के हवाले से लोगों के दिलों में अपना विशेष स्थान बना चुकीं हुमैरा की तीन पुस्तकें 'ज़ख़्म ज़ख़्म उजाला'(संपादन), 'इंदेमाल', 'इंतेसाब' भी प्रकाशित हैं।

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