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Sunday, January 26, 2014

गणतन्त्र दिवस पर विशेष : महात्मा गाँधी का प्रिय भजन



  
स्वरगोष्ठी – 152 में आज

रागों में भक्तिरस – 20

एक भजन जिसे राष्ट्रव्यापी सम्मान मिला 
  
‘वैष्णवजन तो तेने कहिए...’





‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के संचालक मण्डल की ओर से सभी पाठकों-श्रोताओं को आज गणतन्त्र दिवस पर हार्दिक बधाई। आज के इस पावन राष्ट्रीय पर्व पर हम अपने साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर प्रस्तुत कर रहे हैं, एक विशेष अंक। आपको स्मरण ही होगा कि ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ जारी है। आज इस श्रृंखला की समापन कड़ी के साथ मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीत-रसिकों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हमने भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और कुछ प्रमुख भक्त कवियों की रचनाएँ प्रस्तुत की है। इसके साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवाए। श्रृंखला की पिछली 19 कड़ियों में हमने हिन्दी के अलावा मराठी, कन्नड, गुजराती, राजस्थानी, ब्रज, अवधी आदि भाषा-बोलियों में रचे गए भक्तिगीतों का रसास्वादन कराने का प्रयास किया। आज श्रृंखला की समापन कड़ी में राष्ट्रीय पर्व के अवसर पर हम आपसे एक ऐसे भजन पर चर्चा करेंगे, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक लोकप्रियता प्राप्त है। पन्द्रहवीं शताब्दी के भक्तकवि नरसी मेहता का पद- ‘वैष्णवजन तो तेने कहिए...’ महात्मा गाँधी की प्रार्थना सभाओं में गाये जाने के कारण राष्ट्रीय स्तर का गीत बन चुका है। आज हम आपको यह भजन संगीत के वरिष्ठ कलासाधकों, उस्ताद राशिद खाँ, उस्ताद शाहिद परवेज़ और विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी सहित चौथे दशक की फिल्मों की सुप्रसिद्ध गायिका अमीरबाई कर्नाटकी के  स्वरों में प्रस्तुत करेंगे। 
 


गुजराती साहित्य के सन्तकवि नरसी मेहता का जन्म गुजरात के जूनागढ़ अंचल में 1414 ई. में हुआ था। उनके कृतित्व की गुणबत्ता से प्रभावित होकर भारतीय साहित्य के इतिहासकारों ने ‘नरसी-मीरा’ के नाम से एक स्वतंत्र काव्यकाल का निर्धारण किया है। पदप्रणेता के रूप में गुजराती साहित्य में नरसी मेहता का लगभग वही स्थान है जो हिन्दी में महाकवि सूरदास का है। उनके माता-पिता का बचपन में ही देहान्त हो गया था। बाल्यकाल से ही साधु-सन्तों की मण्डलियों के साथ भ्रमण करते रहे। यहाँ तक कि एक बार द्वारका जाकर रासलीला के दर्शन भी किए। इस सत्संग का उनके जीवन पर ऐसा गहरा प्रभाव पड़ा कि वे गृहस्थ होते हुए भी हर समय कृष्णभक्ति में तल्लीन रहते थे। नरसी मेहता तत्कालीन समाज में व्याप्त आडम्बर और रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्षरत थे। उनके लिए सब बराबर थे। वे छुआ-छूत नहीं मानते थे और हर मानव को बराबर समझते थे। उन्होने हरिजनों की बस्ती में जाकर उनके साथ कीर्तन भी किया करते थे। इससे क्रुद्ध होकर बिरादरी ने उनका बहिष्कार तक कर दिया, पर वे अपने मत से डिगे नहीं। एक जनश्रुति के अनुसार हरिजनों के साथ उनके सम्पर्क की बात सुनकर जब जूनागढ़ के राजा ने उनकी परीक्षा लेनी चाही तो कीर्तन में लीन नरसी मेहता के गले में अन्तरिक्ष से फूलों की माला पड़ गई थी। जिस नागर समाज ने उन्हें बहिष्कृत किया था अन्त में उसी समाज ने उन्हें अपना रत्न माना और आज भी गुजरात में ही नहीं सम्पूर्ण देश में उनकी मान्यता है। भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से अभिसिंचित उनकी कृतियों का एक समृद्ध भण्डार है। उनकी कुछ चर्चित कृतियाँ हैं- सुदामा चरित्र, गोविन्द गमन, दानलीला, चातुरियो, राससहस्त्रपदी, श्रृंगारमाला आदि। अनेक पदों में उन्होने मानव-धर्म की व्याख्या की है। गाँधी जी के प्रिय भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ में भी भक्त नरसी ने सच्चे मानव-धर्म को ही परिभाषित किया है। भजन का मूल पाठ इस प्रकार है-

वैष्णव जन तो तेने कहिये, जे पीड परायी जाणे रे। 

पर दुःखे उपकार करे तो ये मन अभिमान न आणे रे।

सकळ लोकमाँ सहुने वन्दे, निन्दा न करे केनी रे। 

वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे। 

समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे। 

 जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे।

मोह माया व्यापे नहि जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मनमाँ रे। 

रामनाम शुं ताळी रे लागी, सकळ तीरथ तेना तनमाँ रे। 

वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे। 

भणे नरसैयॊ तेनुं दरसन करतां, कुळ एकोतेर तार्या रे॥

‘स्वरगोष्ठी’ के आज के अंक में आप इस भजन को जुगलबन्दी के रूप में सुनेगे। रामपुर सहसवान गायकी में सिद्ध उस्ताद राशिद खाँ और सितार के इटावा बाज के संवाहक उस्ताद शाहिद परवेज़ की अनूठी जुगलबन्दी में नरसी का यह भजन प्रस्तुत है। इन दोनों कलासाधकों ने भजन के भाव पक्ष को राग खमाज के स्वरों में भलीभाँति सम्प्रेषित किया है। राग खमाज की चर्चा हम इस जुगलबन्दी के बाद करेंगे।



गायन और सितार वादन जुगलबन्दी : ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ : उस्ताद राशिद खाँ और उस्ताद शाहिद परवेज़





महात्मा गाँधी के सर्वप्रिय भजनों में सम्मिलित नरसी मेहता के इस भजन को प्रस्तुत करने के लिए राग खमाज के स्वर सम्भवतः सबसे उपयुक्त है। अधिकतर गायक-वादक कलासाधकों ने भजन ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ को खमाज या मिश्र खमाज में ही प्रस्तुत किया है। पण्डित विष्णु नारायण भातखण्डे द्वारा प्रवर्तित दस थाट के सिद्धान्त का खमाज भी एक थाट है। राग खमाज इसी थाट का आश्रय राग माना जाता है। इसके आरोह में ऋषभ स्वर वर्जित होता है। अवरोह में सभी सात स्वरों का प्रयोग होता है। अर्थात इसकी जाति षाड़व-सम्पूर्ण है। इसके आरोह में शुद्ध निषाद और अवरोह में कोमल निषाद का प्रयोग किया जाता है। शेष स्वर शुद्ध होते हैं। इस राग का वादी स्वर गान्धार और संवादी स्वर निषाद माना जाता है। रात्रि का दूसरा प्रहर इस राग के गायन-वादन के लिए उपयुक्त होता है। राग खमाज श्रृंगार और भक्ति भाव की अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त होता है। इसीलिए अधिकतर ठुमरी गायन में इसी राग का प्रयोग किया जाता है।

अब हम आपको नरसी मेहता का यह भजन विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सुनवाते है। संगीत की दक्षिण और उत्तर भारतीय, दोनों संगीत पद्यतियों में दक्ष, विश्वविख्यात गायिका एम.एस. शुभलक्ष्मी ने अनेक भक्त कवियों की रचनाओं को अपना स्वर देकर अविस्मरणीय कर दिया है। भारत की लगभग सभी भाषाओं में गाने वाली एम.एस. शुभलक्ष्मी को 1988 में भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार ‘भारतरत्न’ से अलंकृत किया गया था। आइए इन्हीं महान गायिका से सुनते हैं, नरसी मेहता का यह पद।



नरसी भजन : ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ : विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी





गुजराती के भक्तकवि नरसी मेहता के व्यक्तित्व और कृतित्व पर 1940 में फिल्म ‘नरसी भगत’ का निर्माण हुआ था। उस समय के चर्चित गायक-अभिनेता विष्णुपन्त पगनीस ने इस फिल्म में भक्त नरसी की भूमिका की थी। फिल्म में अभिनेत्री दुर्गा खोटे और अमीरबाई कर्नाटकी ने भी गायन-अभिनय किया था। फिल्म के गीतो को शंकरराव व्यास ने संगीतबद्ध किया था। फिल्म में यह भजन विष्णुपन्त पगनीस और अमीरबाई कर्नाटकी ने अलग-अलग गाया था। इस भजन को गाकर अमीरबाई कर्नाटकी को अपार लोकप्रियता मिली थी। फिल्म में गाये अमीरबाई के इस भजन को सुन कर महात्मा गाँधी ने गायिका की प्रशंसा की थी। अब आप यह भजन गायिका अमीरबाई कर्नाटकी के स्वर में सुनिए और मुझे इस अंक को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए। 





नरसी भजन : ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए...’ : अमीरबाई कर्नाटकी : फिल्म नरसी भगत





   
आज की पहेली


‘स्वरगोष्ठी’ के 152वें अंक की पहेली में आज हम आपको एक महान गायक की आवाज़ में भक्ति रचना का अंश सुनवा रहे है। इसे सुन कर आपको दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। 160वें अंक की पहेली के सम्पन्न होने तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला (सेगमेंट) का विजेता घोषित किया जाएगा।



1 – आलाप के इस अंश को सुन कर गायक को पहचानिए और हमे उनका नाम लिख भेजिए।

2 – इस आलाप में आपको किस राग का संकेत प्राप्त हो रहा है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 154वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।

   
पिछली पहेली और श्रृंखला के विजेता


‘स्वरगोष्ठी’ की 150वीं कड़ी में हमने आपको गोस्वामी तुलसीदास के एक पद के गायन का अंश प्रस्तुत कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- गायक दत्तात्रेय विष्णु पलुस्कर और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- दादरा ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर हैदराबाद से डी. हरिणा माधवी, जबलपुर से क्षिति तिवारी और चण्डीगढ़ से हरकीरत सिंह ने दिया है। तीनों प्रतिभागियों को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।

150वें अंक की पहेली के साथ ही हमारी यह श्रृंखला भी पूरी हुई। इस श्रृंखला में सर्वाधिक 18 अंक लेकर जबलपुर की क्षिति तिवारी ने प्रथम स्थान, 12-12 अंक अर्जित कर हमारे दो प्रतियोगियों, जौनपुर (उत्तर प्रदेश) के डॉ. पी.के. त्रिपाठी और चंडीगढ़ के हरकीरत सिंह ने दूसरा स्थान तथा 5 अंक प्राप्त कर हैदराबाद की डी. हरिणा माधवी ने तीसरा स्थान प्राप्त किया है। सभी विजेताओं को हार्दिक बधाई।

   
अपनी बात


   
मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ के अन्तर्गत आज के अंक के साथ ही हमारी यह लघु श्रृंखला भी पूर्ण हुई। हम शीघ्र ही एक नई श्रृंखला के साथ उपस्थित होंगे। इस बीच हम अपने पाठकों/श्रोताओं के अनुरोध पर कुछ अंक जारी रखेंगे। अगले अंक में हम अवसर विशेष को ध्यान में तैयार किया गया अंक प्रस्तुत करने जा रहे हैं। अगले अंक के साथ रविवार को प्रातः 9 बजे हम ‘स्वरगोष्ठी’ के इसी मंच पर सभी संगीत-प्रेमियों का स्वागत करेंगे।



प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

Sunday, December 22, 2013

मीरा का एक और पद : विविध धुनों में


स्वरगोष्ठी – 147 में आज


रागों में भक्तिरस – 15


‘श्याम मने चाकर राखो जी...’


‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ के मंच पर जारी लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की पन्द्रहवीं कड़ी में मैं कृष्णमोहन मिश्र, आप सब संगीतानुरागियों का हार्दिक अभिनन्दन करता हूँ। मित्रों, इस श्रृंखला के अन्तर्गत हम आपके लिए भारतीय संगीत के कुछ भक्तिरस प्रधान राग और उनमें निबद्ध रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे हैं। साथ ही उस भक्ति रचना के फिल्म में किये गए प्रयोग भी आपको सुनवा रहे हैं। श्रृंखला की पिछली कड़ी में हमने सोलहवीं शताब्दी की भक्त कवयित्री के एक पद- ‘एरी मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दर्द न जाने कोय...’ पर आपके साथ चर्चा की थी। आज की कड़ी में हम मीराबाई के साहित्य और संगीत पर चर्चा जारी रखते हुए एक और बेहद चर्चित पद- ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ सुनवाएँगे। इस भजन को विख्यात गायिका एम.एस. शुभलक्ष्मी, वाणी जयराम, लता मंगेशकर और चौथे दशक की एक विस्मृत गायिका सती देवी ने गाया है। इन चारो गायिकाओं ने मीरा का एक ही पद अलग-अलग धुनों में गाया है। आप इस भक्तिगीत के चारो संस्करण सुनिए और स्वरों के परिवर्तन से गीत के भाव में होने वाले आंशिक बदलाव का प्रत्यक्ष अनुभव कीजिए। 


तिहासकारों के अनुसार भक्त कवयित्री मीराबाई का जन्म विक्रमी संवत 1561 अर्थात 1504 ई. के श्रावण मास की प्रतिपदा तिथि को हुआ था। अजमेर के लेखक श्री ओमप्रकाश ने अपनी पुस्तक ‘मेरे तो गिरधर गोपाल’ की भूमिका में मीरा की भक्ति रचनाओं का विवेचन करते हुए लिखा है- “सर्वथा प्रतिकूल परिस्थितियों में मुगल आक्रमणकारियों से भयाक्रान्त समाज को मीरा ने भक्ति का सम्बल दिया। पूरे भारतवर्ष के कोने-कोने में भक्ति आन्दोलन चल रहे थे। मीरा ने भी उसी संस्कृति के भक्ति-प्रवाह को परिपुष्ट किया। ‘नारी भोग्या नहीं, माँ है’ की जीवन-दृष्टि देकर नारी को नव प्रतिष्ठा दी। समाज की सुव्यवस्था हेतु कुरीतियों का उन्मूलन कर, चिर विद्रोहिणी की भूमिका निभाते हुए समाज-सुधार का कर्तव्य निभाया।”

आज के अंक में हमने मीरा का वह पद चुना है जिसमें वह अपने आराध्य श्रीकृष्ण से आग्रह कर रही हैं कि ‘हे श्याम मुझे अपना चाकर बना लो’। सबसे पहले आप यह भक्तिगीत सुप्रसिद्ध गायिका विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी के स्वरों में सुनेगे। मीरा के व्यक्तित्व, कृतित्व और जीवन दर्शन पर 1947 में चन्द्रप्रभा मूवीटोन द्वारा निर्मित फिल्म ‘मीरा’ के गीतों में उन्होने स्वयं अपना स्वर दिया था। यह फिल्म पहले तमिल में और फिर हिन्दी में भी बनी थी। विदुषी एम.एस. शुभलक्ष्मी ने इस फिल्म में न केवल गीत गाये, बल्कि मीरा की भूमिका में अभिनय भी किया था। फिल्म के संगीत निर्देशक एस.वी. वेंकटरमन, जी. रामनाथन् और नरेश भट्टाचार्य थे। फिल्म में मीरा का यह पद एक अप्रचलित राग बिहारी के स्वरों में निबद्ध है। मीरा-भजन के इस संस्करण के बाद आप इसका दूसरा संस्करण भी सुनेगे। भजन- ‘मने चाकर राखो जी...’ का यह संस्करण चौथे दशक में सक्रिय किन्तु वर्तमान में विस्मृत गायिका सती देवी ने गाया है। गायिका सती देवी चर्चित पार्श्वगायक किशोर कुमार की पहली पत्नी रूमा गुहा ठाकुरता (गांगुली) की माँ थीं। चौथे और पाँचवें दशक में गाये गए इस मीरा-भजन के इन दोनों संस्करणों का आप रसास्वादन कीजिए।


मीरा भजन : ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ : एम.एस. शुभलक्ष्मी : फिल्म मीरा (1947)




मीरा भजन : ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ : सती देवी : गैर फिल्मी भजन



भक्त कवयित्री मीरा के पद ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ पर हमारी यह चर्चा जारी है। मीरा के जीवन दर्शन पर एक और फिल्म ‘मीरा’ 1979 में गीतकार गुलजार के निर्देशन में बनी थी। इस फिल्म में भी मीरा के अन्य पदों के साथ-साथ ‘श्याम मने चाकर राखो जी...’ भी शामिल था, जिसे वाणी जयराम ने अपना स्वर दिया था। फिल्म के संगीत निर्देशक विश्वविख्यात संगीतज्ञ पण्डित रविशंकर थे। उन्होने इस भजन को राग भैरवी के स्वर दिये। ‘स्वरगोष्ठी’ के पिछले कई अंकों में हम राग भैरवी की चर्चा करते रहे हैं। राग भैरवी के आरोह स्वर हैं, सा, रे॒ (कोमल), ग॒ (कोमल), म, प, ध॒ (कोमल), नि॒ (कोमल), सां तथा अवरोह के स्वर, सां, नि॒ (कोमल), ध॒ (कोमल), प, म ग (कोमल), रे॒ (कोमल), सा होते हैं। इस राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यूँ तो इसके गायन-वादन का समय प्रातःकाल, सन्धिप्रकाश बेला में है, किन्तु आम तौर पर राग ‘भैरवी’ का गायन-वादन किसी संगीत-सभा अथवा समारोह के अन्त में किये जाने की परम्परा बन गई है। राग ‘भैरवी’ को ‘सदा सुहागिन राग’ भी कहा जाता है। मीरा का यह पद पहले आप राग भैरवी के स्वरो में सुनेगे और फिर उसके बाद यही पद राग बागेश्री के स्वरो पर आधारित प्रस्तुत करेंगे। यह संस्करण हमने 1956 में प्रदर्शित फिल्म ‘तूफान और दीया’ से लिया है। भजन के स्थायी की पंक्ति में श्याम के स्थान पर गिरधारी शब्द का प्रयोग हुआ है। इसके संगीत निर्देशक बसन्त देसाई थे और इस भजन को लता मंगेशकर ने स्वर दिया था। गीत में राग बागेश्री की स्पष्ट झलक मिलती है। बेहद लोकप्रिय राग है, बागेश्री। कुछ लोग इसे बागेश्वरी नाम से भी सम्बोधित करते हैं, किन्तु वरिष्ठ गायिका विदुषी गंगूबाई हंगल के अनुसार इस राग का सही नाम बागेश्री ही होना चाहिए। काफी थाट के अन्तर्गत माना जाने वाला यह राग कर्नाटक संगीत के नटकुरंजी राग से काफी मिलता-जुलता है। राग बागेश्री में पंचम स्वर का अल्पत्व प्रयोग होता है। षाड़व-सम्पूर्ण जाति के इस राग के आरोह में ऋषभ वर्जित होता है। कुछ विद्वान आरोह में पंचम का प्रयोग न करके औड़व-सम्पूर्ण रूप में इस राग को गाते-बजाते हैं। इसमें गान्धार और निषाद स्वर कोमल प्रयोग किये जाते हैं। राग का वादी स्वर मध्यम और संवादी स्वर षडज होता है। यह राधा का सर्वप्रिय राग माना जाता है। आप मीरा के पद- ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ को पहले राग भैरवी और फिर राग बागेश्री के स्वरों में सुनिए और मुझे श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’ की इस कड़ी को यहीं विराम देने की अनुमति दीजिए।


राग भैरवी : ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ : वाणी जयराम : फिल्म मीरा (1979)




राग बागेश्री : ‘श्याम माने चाकर राखो जी...’ : लता मंगेशकर : फिल्म तूफान और दीया




आज की पहेली

‘स्वरगोष्ठी’ की 147वीं संगीत पहेली में हम आपको एक बेहद लोकप्रिय भजन का अंश सुनवा रहे हैं। इसे सुन कर आपको निम्नलिखित दो प्रश्नों के उत्तर देने हैं। ‘स्वरगोष्ठी’ के 150वें अंक तक जिस प्रतिभागी के सर्वाधिक अंक होंगे, उन्हें इस श्रृंखला का विजेता घोषित किया जाएगा।


1 – संगीत के इस अंश को सुन कर पहचानिए कि इस रचना में किस राग की झलक है?

2 – इस रचना में किस ताल का प्रयोग किया गया है?

आप अपने उत्तर केवल swargoshthi@gmail.com या radioplaybackindia@live.com पर ही शनिवार मध्यरात्रि से पूर्व तक भेजें। comments में दिये गए उत्तर मान्य नहीं होंगे। विजेता का नाम हम ‘स्वरगोष्ठी’ के 149वें अंक में प्रकाशित करेंगे। इस अंक में प्रस्तुत गीत-संगीत, राग, अथवा कलासाधक के बारे में यदि आप कोई जानकारी या अपने किसी अनुभव को हम सबके बीच बाँटना चाहते हैं तो हम आपका इस संगोष्ठी में स्वागत करते हैं। आप पृष्ठ के नीचे दिये गए comments के माध्यम से तथा swargoshthi@gmail.com अथवा radioplaybackindia@live.com पर भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर सकते हैं।


पिछली पहेली के विजेता

‘स्वरगोष्ठी’ की 145वीं संगीत पहेली में हमने आपको पण्डित रविशंकर द्वारा स्वरबद्ध और वाणी जयराम की आवाज़ में प्रस्तुत मीरा के एक भजन का अंश सुनवा कर आपसे दो प्रश्न पूछे थे। पहले प्रश्न का सही उत्तर है- राग तोड़ी और दूसरे प्रश्न का सही उत्तर है- सात मात्रा का रूपक ताल। इस अंक के दोनों प्रश्नो के सही उत्तर एकमात्र प्रतिभागी जबलपुर की क्षिति तिवारी ने दिया है। क्षिति जी को ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ की ओर से हार्दिक बधाई।


झरोखा अगले अंक का

मित्रों, ‘रेडियो प्लेबैक इण्डिया’ के साप्ताहिक स्तम्भ ‘स्वरगोष्ठी’ पर जारी है, लघु श्रृंखला ‘रागों में भक्तिरस’, जिसके अन्तर्गत हमने आज की कड़ी में आपसे एक बार फिर भक्त कवयित्री मीरा के एक और पद पर चर्चा की। अगले अंक में आप एक और भक्तकवि महात्मा कबीर की एक भक्ति-रचना का रसास्वादन करेंगे जिसे अनेक शीर्षस्थ कलासाधकों ने अलग-अलग रागों का आधार लेकर भक्तिरस को सम्प्रेषित किया है। इस श्रृंखला की आगामी कड़ियों के लिए आप अपनी पसन्द के भक्तिरस प्रधान रागों या रचनाओं की फरमाइश कर सकते हैं। हम आपके सुझावों और फरमाइशों का स्वागत करते हैं। अगले अंक में रविवार को प्रातः 9 बजे ‘स्वरगोष्ठी’ के इस मंच पर आप सभी संगीत-रसिकों की हमें प्रतीक्षा रहेगी।


प्रस्तुति : कृष्णमोहन मिश्र 

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